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भीष्म पर्व · अध्याय 111

भीष्म के चारों ओर द्वन्द्वयुद्ध

सञ्जय दसवें दिन के उन द्वन्द्वयुद्धों का वर्णन करते हैं जिनमें कौरव वीर पाण्डव योद्धाओं से भीष्म की रक्षा करते हैं। सात्यकि अलम्बुष और भगदत्त से लड़ते हैं और भगदत्त की शक्ति के दो टुकड़े कर देते हैं; दुर्योधन अपने भाइयों को आदेश देता है कि सात्यकि जीवित न बच निकले। सुदक्षिण अभिमन्यु को रोकता है, अश्वत्थामा विराट और द्रुपद से, कृप सहदेव से, विकर्ण नकुल से, दुर्मुख घटोत्कच से, कृतवर्मा धृष्टद्युम्न से और भूरिश्रवा भीम से युद्ध करते हैं। द्रोण युधिष्ठिर की पूरी सेना को रोक देते हैं, चित्रसेन चेकितान से लड़ता है, और दुःशासन के बार-बार रोकने पर भी अर्जुन कौरव सेना को रौंद डालते हैं।

अध्याय 110अध्याय-सूचीअध्याय 112

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.111.1)

सात्यकिं दंशितं युद्धे भीष्मायाभ्युद्यतं रणे । आर्श्यशृङ्गिर्महेष्वासो वारयामास संयुगे ॥

sātyakiṃ daṃśitaṃ yuddhe bhīṣmāyābhyudyataṃ raṇe | ārśyaśṛṅgirmaheṣvāso vārayāmāsa saṃyuge

युद्ध के लिए कवच धारण किए, रण में भीष्म पर बढ़ते सात्यकि को महाधनुर्धर ऋष्यशृङ्ग के पुत्र (अलम्बुष) ने युद्ध में रोक लिया।

श्लोक 2 (6.111.2)

माधवस्तु सुसंक्रुद्धो राक्षसं नवभिः शरैः । आजघान रणे राजन्प्रहसन्निव भारत ॥

mādhavastu susaṃkruddho rākṣasaṃ navabhiḥ śaraiḥ | ājaghāna raṇe rājanprahasanniva bhārata

हे राजन्, हे भारत, तब अत्यन्त क्रुद्ध माधव (सात्यकि) ने मानो हँसते हुए रण में उस राक्षस पर नौ बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 3 (6.111.3)

तथैव राक्षसो राजन्माधवं नवभिः शरैः । अर्दयामास राजेन्द्र संक्रुद्धः शिनिपुङ्गवम् ॥

tathaiva rākṣaso rājanmādhavaṃ navabhiḥ śaraiḥ | ardayāmāsa rājendra saṃkruddhaḥ śinipuṅgavam

हे राजन्, हे राजेन्द्र, इसी प्रकार उस राक्षस ने भी क्रुद्ध होकर शिनिवंश के श्रेष्ठ वीर माधव को नौ बाणों से पीड़ित किया।

श्लोक 4 (6.111.4)

शैनेयः शरसङ्घं तु प्रेषयामास संयुगे । राक्षसाय सुसंक्रुद्धो माधवः परवीरहा ॥

śaineyaḥ śarasaṅghaṃ tu preṣayāmāsa saṃyuge | rākṣasāya susaṃkruddho mādhavaḥ paravīrahā

तब शत्रुवीरों का संहार करने वाले शिनि के पौत्र माधव ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर रण में उस राक्षस पर बाणों का समूह छोड़ा।

श्लोक 5 (6.111.5)

ततो रक्षो महाबाहुं सात्यकिं सत्यविक्रमम् । विव्याध विशिखैस्तीक्ष्णैः सिंहनादं ननाद च ॥

tato rakṣo mahābāhuṃ sātyakiṃ satyavikramam | vivyādha viśikhaistīkṣṇaiḥ siṃhanādaṃ nanāda ca

तब उस राक्षस ने सत्यपराक्रमी महाबाहु सात्यकि को तीखे बाणों से बींधा और सिंह के समान गर्जना की।

श्लोक 6 (6.111.6)

माधवस्तु भृशं विद्धो राक्षसेन रणे तदा । धैर्यमालम्ब्य तेजस्वी जहास च ननाद च ॥

mādhavastu bhṛśaṃ viddho rākṣasena raṇe tadā | dhairyamālambya tejasvī jahāsa ca nanāda ca

उस युद्ध में राक्षस द्वारा गहरे बींधे जाने पर भी तेजस्वी माधव ने धैर्य धारण किया, और हँसते हुए गरज उठे।

श्लोक 7 (6.111.7)

भगदत्तस्ततः क्रुद्धो माधवं निशितैः शरैः । ताडयामास समरे तोत्रैरिव महागजम् ॥

bhagadattastataḥ kruddho mādhavaṃ niśitaiḥ śaraiḥ | tāḍayāmāsa samare totrairiva mahāgajam

तब भगदत्त ने क्रोध में भरकर युद्ध में माधव पर तीखे बाणों से ऐसे प्रहार किया, जैसे महावत अंकुशों से बड़े हाथी को मारता है।

श्लोक 8 (6.111.8)

विहाय राक्षसं युद्धे शैनेयो रथिनां वरः । प्राग्ज्योतिषाय चिक्षेप शरान्संनतपर्वणः ॥

vihāya rākṣasaṃ yuddhe śaineyo rathināṃ varaḥ | prāgjyotiṣāya cikṣepa śarānsaṃnataparvaṇaḥ

युद्ध में राक्षस को छोड़कर रथियों में श्रेष्ठ शिनि के पौत्र ने प्राग्ज्योतिष के राजा पर झुकी गाँठों वाले बाण चलाए।

श्लोक 9 (6.111.9)

तस्य प्राग्ज्योतिषो राजा माधवस्य महद्धनुः । चिच्छेद शतधारेण भल्लेन कृतहस्तवत् ॥

tasya prāgjyotiṣo rājā mādhavasya mahaddhanuḥ | ciccheda śatadhāreṇa bhallena kṛtahastavat

प्राग्ज्योतिष के राजा ने सधे हुए हाथ से अनेक धारों वाले भल्ल बाण से माधव का विशाल धनुष काट डाला।

श्लोक 10 (6.111.10)

अथान्यद्धनुरादाय वेगवत्परवीरहा । भगदत्तं रणे क्रुद्धं विव्याध निशितैः शरैः ॥

athānyaddhanurādāya vegavatparavīrahā | bhagadattaṃ raṇe kruddhaṃ vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ

दूसरा धनुष उठाकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले उस वेगशाली वीर ने रण में क्रुद्ध भगदत्त को तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 11 (6.111.11)

सोऽतिविद्धो महेष्वासः सृक्किणी परिसंलिहन् । शक्तिं कनकवैडूर्यभूषितामायसीं दृढाम् ॥

so'tividdho maheṣvāsaḥ sṛkkiṇī parisaṃlihan | śaktiṃ kanakavaiḍūryabhūṣitāmāyasīṃ dṛḍhām

गहरे घायल उस महाधनुर्धर ने होंठों के कोने चाटते हुए सोने और वैदूर्य से सजी, लोहे की एक सुदृढ़ शक्ति उठाई,

श्लोक 12 (6.111.12)

यमदण्डोपमां घोरां चिक्षेप परमाहवे । तामापतन्तीं सहसा तस्य बाहुबलेरिताम् ॥

yamadaṇḍopamāṃ ghorāṃ cikṣepa paramāhave | tāmāpatantīṃ sahasā tasya bāhubaleritām

जो यमदण्ड के समान भयंकर थी, और उसे उस घोर युद्ध में फेंक दिया। उसकी भुजाओं के बल से फेंकी गई उस शक्ति को सहसा आती देखकर

श्लोक 13 (6.111.13)

सात्यकिः समरे राजन्द्विधा चिच्छेद सायकैः । ततः पपात सहसा महोल्केव हतप्रभा ॥

sātyakiḥ samare rājandvidhā ciccheda sāyakaiḥ | tataḥ papāta sahasā maholkeva hataprabhā

हे राजन्, सात्यकि ने युद्ध में अपने बाणों से उसके दो टुकड़े कर दिए; और वह प्रभाहीन हुई बड़ी उल्का के समान सहसा गिर पड़ी।

श्लोक 14 (6.111.14)

शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशांपते । महता रथवंशेन वारयामास माधवम् ॥

śaktiṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā putrastava viśāṃpate | mahatā rathavaṃśena vārayāmāsa mādhavam

हे प्रजानाथ, शक्ति को नष्ट हुई देखकर आपके पुत्र ने रथों की एक विशाल पंक्ति से माधव को घेरकर रोक दिया।

श्लोक 15 (6.111.15)

तथा परिवृतं दृष्ट्वा वार्ष्णेयानां महारथम् । दुर्योधनो भृशं क्रुद्धो भ्रातॄन्सर्वानुवाच ह ॥

tathā parivṛtaṃ dṛṣṭvā vārṣṇeyānāṃ mahāratham | duryodhano bhṛśaṃ kruddho bhrātṝnsarvānuvāca ha

वृष्णिवंश के उस महारथी को इस प्रकार घिरा देखकर दुर्योधन ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपने सब भाइयों से कहा:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 16 (6.111.16)

तथा कुरुत कौरव्या यथा वः सात्यको युधि । न जीवन्प्रतिनिर्याति महतोऽस्माद्रथव्रजात् ॥

tathā kuruta kauravyā yathā vaḥ sātyako yudhi | na jīvanpratiniryāti mahato'smādrathavrajāt

हे कौरवो, ऐसा करो कि इस युद्ध में सात्यकि इस विशाल रथसमूह से जीवित न निकल पाए।

सञ्जय उवाच

श्लोक 17 (6.111.17)

तस्मिन्हते हतं मन्ये पाण्डवानां महद्बलम् । तथेति च वचस्तस्य परिगृह्य महारथाः ॥

tasminhate hataṃ manye pāṇḍavānāṃ mahadbalam | tatheti ca vacastasya parigṛhya mahārathāḥ

'उसके मारे जाने पर मैं पाण्डवों की विशाल सेना को मरी हुई ही मानता हूँ।' 'ऐसा ही हो' कहकर उसकी बात मानते हुए उन महारथियों ने

श्लोक 18 (6.111.18)

शैनेयं योधयामासुर्भीष्मायाभ्युद्यतं रणे । अभिमन्युं तदाऽऽयान्तं भीष्मस्याभ्युद्यतं वधे । काम्भोजराजो बलवान्वारयामास संयुगे ॥

śaineyaṃ yodhayāmāsurbhīṣmāyābhyudyataṃ raṇe | abhimanyuṃ tadā''yāntaṃ bhīṣmasyābhyudyataṃ vadhe | kāmbhojarājo balavānvārayāmāsa saṃyuge

रण में भीष्म पर बढ़ते शिनि के पौत्र से युद्ध किया। उसी समय भीष्म के वध को उद्यत होकर आते अभिमन्यु को बलवान् काम्बोजराज ने युद्ध में रोक दिया।

श्लोक 19 (6.111.19)

आर्जुनिं नृपतिर्विद्ध्वा शरैः सन्नतपर्वभिः । पुनरेव चतुःषष्ट्या राजन्विव्याध तं नृप ॥

ārjuniṃ nṛpatirviddhvā śaraiḥ sannataparvabhiḥ | punareva catuḥṣaṣṭyā rājanvivyādha taṃ nṛpa

हे राजन्, उस राजा ने झुकी गाँठों वाले बाणों से अर्जुन के पुत्र को बींधकर फिर चौंसठ बाणों से उसे बींध दिया।

श्लोक 20 (6.111.20)

सुदक्षिणस्तु समरे पुनर्विव्याध तं पञ्चभिः । सारथिं चास्य नवभिरिच्छन्भीष्मस्य जीवितम् ॥

sudakṣiṇastu samare punarvivyādha taṃ pañcabhiḥ | sārathiṃ cāsya navabhiricchanbhīṣmasya jīvitam

भीष्म के प्राणों की रक्षा चाहते हुए सुदक्षिण ने युद्ध में फिर पाँच बाणों से उसे और नौ बाणों से उसके सारथि को बींध दिया।

श्लोक 21 (6.111.21)

तद्युद्धमासीत्सुमहत्तयोस्तत्र समागमे । यदाभ्यधावद्गाङ्गेयं शिखण्डी शत्रुकर्शनः ॥

tadyuddhamāsītsumahattayostatra samāgame | yadābhyadhāvadgāṅgeyaṃ śikhaṇḍī śatrukarśanaḥ

जब शत्रुओं को क्षीण करने वाला शिखण्डी गंगापुत्र पर टूट पड़ा, तब वहाँ उन दोनों के आमने-सामने होने पर बड़ा भारी युद्ध हुआ।

श्लोक 22 (6.111.22)

विराटद्रुपदौ वृद्धौ वारयन्तौ महाचमूम् । भीष्मं च युधि संरब्धावाद्रवन्तौ महारथौ ॥

virāṭadrupadau vṛddhau vārayantau mahācamūm | bhīṣmaṃ ca yudhi saṃrabdhāvādravantau mahārathau

विशाल सेना को रोकते हुए और युद्ध में क्रोधपूर्वक भीष्म पर टूट पड़ते वृद्ध महारथी विराट और द्रुपद का

श्लोक 23 (6.111.23)

अश्वत्थामा रणे क्रुद्धः समायाद्रथसत्तमः । ततः प्रववृते युद्धं तयोस्तस्य च भारत ॥

aśvatthāmā raṇe kruddhaḥ samāyādrathasattamaḥ | tataḥ pravavṛte yuddhaṃ tayostasya ca bhārata

सामना रथियों में श्रेष्ठ अश्वत्थामा ने रण में क्रुद्ध होकर किया। हे भारत, तब उन दोनों और उसके बीच युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 24 (6.111.24)

विराटो दशभिर्भल्लैराजघान परंतप । यतमानं महेष्वासं द्रौणिमाहवशोभिनम् ॥

virāṭo daśabhirbhallairājaghāna paraṃtapa | yatamānaṃ maheṣvāsaṃ drauṇimāhavaśobhinam

हे परन्तप, विराट ने प्रयत्न करते, युद्ध में शोभा पाने वाले महाधनुर्धर द्रोणपुत्र पर दस भल्ल बाणों से प्रहार किया,

श्लोक 25 (6.111.25)

द्रुपदश्च त्रिभिर्बाणैर्विव्याध निशितैस्तदा । गुरुपुत्रं समासाद्य प्रहरन्तौ महाबलौ ॥

drupadaśca tribhirbāṇairvivyādha niśitaistadā | guruputraṃ samāsādya praharantau mahābalau

और द्रुपद ने उसे तीन तीखे बाणों से बींधा; वे दोनों महाबली गुरुपुत्र के सामने पहुँचकर उस पर प्रहार कर रहे थे।

श्लोक 26 (6.111.26)

अश्वत्थामा ततस्तौ तु विव्याध बहुभिः शरैः । विराटद्रुपदौ वीरौ भीष्मं प्रति समुद्यतौ ॥

aśvatthāmā tatastau tu vivyādha bahubhiḥ śaraiḥ | virāṭadrupadau vīrau bhīṣmaṃ prati samudyatau

तब अश्वत्थामा ने भीष्म की ओर बढ़ते उन दोनों वीरों, विराट और द्रुपद, को बहुत-से बाणों से बींध दिया।

श्लोक 27 (6.111.27)

तत्राद्भुतमपश्याम वृद्धयोश्चरितं महत् । यद्द्रौणिसायकान्घोरान्प्रत्यवारयतां युधि ॥

tatrādbhutamapaśyāma vṛddhayoścaritaṃ mahat | yaddrauṇisāyakānghorānpratyavārayatāṃ yudhi

वहाँ हमने उन दोनों वृद्धों का अद्भुत और महान् पराक्रम देखा, कि उन्होंने युद्ध में द्रोणपुत्र के भयंकर बाणों को रोक दिया।

श्लोक 28 (6.111.28)

सहदेवं तथाऽऽयान्तं कृपः शारद्वतोऽभ्ययात् । यथा नागो वने नागं मत्तो मत्तमुपाद्रवत् ॥

sahadevaṃ tathā''yāntaṃ kṛpaḥ śāradvato'bhyayāt | yathā nāgo vane nāgaṃ matto mattamupādravat

सहदेव को आते देख शरद्वान् के पुत्र कृप उस पर ऐसे झपटे, जैसे वन में एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथी पर झपटता है।

श्लोक 29 (6.111.29)

कृपश्च समरे शूरो माद्रीपुत्रं महारथम् । आजघान शरैस्तूर्णं सप्तत्या रुक्मभूषणैः ॥

kṛpaśca samare śūro mādrīputraṃ mahāratham | ājaghāna śaraistūrṇaṃ saptatyā rukmabhūṣaṇaiḥ

और शूरवीर कृप ने युद्ध में माद्री के महारथी पुत्र पर सोने से सजे सत्तर बाणों से तुरन्त प्रहार किया।

श्लोक 30 (6.111.30)

तस्य माद्रीसुतश्चापं द्विधा चिच्छेद सायकैः । अथैनं छिन्नधन्वानं विव्याध नवभिः शरैः ॥

tasya mādrīsutaścāpaṃ dvidhā ciccheda sāyakaiḥ | athainaṃ chinnadhanvānaṃ vivyādha navabhiḥ śaraiḥ

माद्रीपुत्र ने अपने बाणों से उनका धनुष दो टुकड़ों में काट दिया, और फिर धनुष कटे हुए कृप को नौ बाणों से बींध दिया।

श्लोक 31 (6.111.31)

सोऽन्यत्कार्मुकमादाय समरे भारसाधनम् । माद्रीपुत्रं सुसंहृष्टो दशभिर्निशितैः शरैः ॥

so'nyatkārmukamādāya samare bhārasādhanam | mādrīputraṃ susaṃhṛṣṭo daśabhirniśitaiḥ śaraiḥ

युद्ध में भार सहने योग्य दूसरा धनुष उठाकर, अत्यन्त उत्साहित कृप ने दस तीखे बाणों से

श्लोक 32 (6.111.32)

आजघानोरसि क्रुद्ध इच्छन्भीष्मस्य जीवितम् । तथैव पाण्डवो राजञ्छारद्वतममर्षणम् ॥

ājaghānorasi kruddha icchanbhīṣmasya jīvitam | tathaiva pāṇḍavo rājañchāradvatamamarṣaṇam

भीष्म के प्राणों की रक्षा चाहते हुए क्रोधपूर्वक माद्रीपुत्र की छाती पर प्रहार किया। हे राजन्, इसी प्रकार पाण्डुपुत्र ने भी उस असहिष्णु शारद्वत (कृप) की

श्लोक 33 (6.111.33)

आजघानोरसि क्रुद्धो भीष्मस्य वधकाङ्क्षया । तयोर्युद्धं समभवद्धोररूपं भयावहम् ॥

ājaghānorasi kruddho bhīṣmasya vadhakāṅkṣayā | tayoryuddhaṃ samabhavaddhorarūpaṃ bhayāvaham

छाती पर भीष्म-वध की इच्छा से क्रोधपूर्वक प्रहार किया। उन दोनों के बीच भयंकर रूप वाला, डरावना युद्ध हुआ।

श्लोक 34 (6.111.34)

नकुलं तु रणे क्रुद्धो विकर्णः शत्रुतापनः । विव्याध सायकैः षष्ट्या रक्षन्भीष्मं महाबलम् ॥

nakulaṃ tu raṇe kruddho vikarṇaḥ śatrutāpanaḥ | vivyādha sāyakaiḥ ṣaṣṭyā rakṣanbhīṣmaṃ mahābalam

शत्रुओं को तपाने वाले विकर्ण ने रण में क्रुद्ध होकर, महाबली भीष्म की रक्षा करते हुए, नकुल को साठ बाणों से बींध दिया।

श्लोक 35 (6.111.35)

नकुलोऽपि भृशं विद्धस्तव पुत्रेण धीमता । विकर्णं सप्तसप्तत्या निर्बिभेद शिलीमुखैः ॥

nakulo'pi bhṛśaṃ viddhastava putreṇa dhīmatā | vikarṇaṃ saptasaptatyā nirbibheda śilīmukhaiḥ

आपके बुद्धिमान् पुत्र द्वारा गहरे बींधे गए नकुल ने भी विकर्ण को सतहत्तर बाणों से बींध दिया।

श्लोक 36 (6.111.36)

तत्र तौ नरशार्दूलौ भीष्महेतोः परंतपौ । अन्योन्यं जघ्नतुर्वीरौ गोष्ठे गोवृषभाविव ॥

tatra tau naraśārdūlau bhīṣmahetoḥ paraṃtapau | anyonyaṃ jaghnaturvīrau goṣṭhe govṛṣabhāviva

वहाँ शत्रुओं को तपाने वाले वे दोनों नरसिंह वीर भीष्म के लिए एक-दूसरे पर ऐसे प्रहार करने लगे, जैसे गोशाला में दो साँड़ भिड़ते हैं।

श्लोक 37 (6.111.37)

घटोत्कचं रणे यान्तं निघ्नन्तं तव वाहिनीम् । दुर्मुखः समरे प्रायाद्भीष्महेतोः पराक्रमी ॥

ghaṭotkacaṃ raṇe yāntaṃ nighnantaṃ tava vāhinīm | durmukhaḥ samare prāyādbhīṣmahetoḥ parākramī

रण में बढ़ते और आपकी सेना का संहार करते घटोत्कच पर पराक्रमी दुर्मुख भीष्म के लिए युद्ध में चढ़ आया।

श्लोक 38 (6.111.38)

हैडिम्बस्तु रणे राजन्दुर्मुखं शत्रुतापनम् । आजघानोरसि क्रुद्धः शरेणानतपर्वणा ॥

haiḍimbastu raṇe rājandurmukhaṃ śatrutāpanam | ājaghānorasi kruddhaḥ śareṇānataparvaṇā

हे राजन्, हिडिम्बा के पुत्र ने रण में क्रुद्ध होकर शत्रुओं को तपाने वाले दुर्मुख की छाती पर चिकनी गाँठों वाले बाण से प्रहार किया।

श्लोक 39 (6.111.39)

भीमसेनसुतं चापि दुर्मुखः सुमुखैः शरैः । षष्ट्या वीरो नदन्हृष्टो विव्याध रणमूर्धनि ॥

bhīmasenasutaṃ cāpi durmukhaḥ sumukhaiḥ śaraiḥ | ṣaṣṭyā vīro nadanhṛṣṭo vivyādha raṇamūrdhani

और वीर दुर्मुख ने हर्ष से गरजते हुए युद्ध के मुहाने पर भीमसेन के पुत्र को अच्छी नोक वाले साठ बाणों से बींध दिया।

श्लोक 40 (6.111.40)

धृष्टद्युम्नं तथाऽऽयान्तं भीष्मस्य वधकाङ्क्षिणम् । हार्दिक्यो वारयामास रथश्रेष्ठं महारथः ॥

dhṛṣṭadyumnaṃ tathā''yāntaṃ bhīṣmasya vadhakāṅkṣiṇam | hārdikyo vārayāmāsa rathaśreṣṭhaṃ mahārathaḥ

भीष्म-वध के इच्छुक, आगे बढ़ते रथियों में श्रेष्ठ धृष्टद्युम्न को हृदिक के पुत्र महारथी (कृतवर्मा) ने रोक दिया।

श्लोक 41 (6.111.41)

हार्दिक्यः पार्षतं चापि विद्ध्वा पञ्चभिरायसैः । पुनः पञ्चाशता तूर्णं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥

hārdikyaḥ pārṣataṃ cāpi viddhvā pañcabhirāyasaiḥ | punaḥ pañcāśatā tūrṇaṃ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

हृदिक के पुत्र ने पृषत के पौत्र (धृष्टद्युम्न) को लोहे के पाँच बाणों से बींधकर, फिर तुरन्त पचास बाणों से बींधा और 'ठहरो, ठहरो!' कहकर ललकारा।

श्लोक 42 (6.111.42)

आजघान महाबाहुः पार्षतं तं महारथम् । तं चैव पार्षतो राजन्हार्दिक्यं नवभिः शरैः ॥

ājaghāna mahābāhuḥ pārṣataṃ taṃ mahāratham | taṃ caiva pārṣato rājanhārdikyaṃ navabhiḥ śaraiḥ

उस महाबाहु ने महारथी पार्षत (धृष्टद्युम्न) पर प्रहार किया। और हे राजन्, पार्षत ने भी हृदिकपुत्र को नौ

श्लोक 43 (6.111.43)

विव्याध निशितैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रैरजिह्मगैः । तयोः समभवद्युद्धं भीष्महेतोर्महाहवे ॥

vivyādha niśitaistīkṣṇaiḥ kaṅkapatrairajihmagaiḥ | tayoḥ samabhavadyuddhaṃ bhīṣmahetormahāhave

तीखे, पैने, सीधे जाने वाले कंकपत्र बाणों से बींध दिया। उस महायुद्ध में भीष्म के लिए उन दोनों के बीच ऐसा युद्ध हुआ,

श्लोक 44 (6.111.44)

अन्योन्यातिशये युक्तं यथा वृत्रमहेन्द्रयोः । भीमसेनं तथाऽऽयान्तं भीष्मं प्रति महारथम् ॥

anyonyātiśaye yuktaṃ yathā vṛtramahendrayoḥ | bhīmasenaṃ tathā''yāntaṃ bhīṣmaṃ prati mahāratham

जिसमें दोनों एक-दूसरे से बढ़ जाने में जुटे थे, जैसे वृत्र और महेन्द्र का युद्ध हुआ था। भीष्म की ओर बढ़ते महारथी भीमसेन पर

श्लोक 45 (6.111.45)

भूरिश्रवाभ्ययात्तूर्णं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । सौमदत्तिरथो भीममाजघान स्तनान्तरे ॥

bhūriśravābhyayāttūrṇaṃ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt | saumadattiratho bhīmamājaghāna stanāntare

भूरिश्रवा तुरन्त चढ़ आया और 'ठहरो, ठहरो!' कहकर ललकारा। फिर सोमदत्त के पुत्र ने भीम की छाती के बीच

श्लोक 46 (6.111.46)

नाराचेन सुतीक्ष्णेन रुक्मपुङ्खेन संयुगे । उरःस्थेन बभौ तेन भीमसेनः प्रतापवान् ॥

nārācena sutīkṣṇena rukmapuṅkhena saṃyuge | uraḥsthena babhau tena bhīmasenaḥ pratāpavān

युद्ध में सुनहरे पंखों वाले अत्यन्त तीखे नाराच से प्रहार किया। छाती में धँसे उस बाण से प्रतापी भीमसेन ऐसे शोभित हुए,

श्लोक 47 (6.111.47)

स्कन्दशक्त्या यथा क्रौञ्चः पुरा नृपतिसत्तम । तौ शरान्सूर्यसंकाशान्कर्मारपरिमार्जितान् ॥

skandaśaktyā yathā krauñcaḥ purā nṛpatisattama | tau śarānsūryasaṃkāśānkarmāraparimārjitān

हे नृपश्रेष्ठ, जैसे प्राचीन काल में स्कन्द की शक्ति से क्रौञ्च पर्वत शोभित हुआ था। सूर्य के समान चमकते, लोहारों द्वारा माँजे गए बाण

श्लोक 48 (6.111.48)

अन्योन्यस्य रणे क्रुद्धौ चिक्षिपाते नरर्षभौ । भीमो भीष्मवधाकाङ्क्षी सौमदत्तिं महारथम् ॥

anyonyasya raṇe kruddhau cikṣipāte nararṣabhau | bhīmo bhīṣmavadhākāṅkṣī saumadattiṃ mahāratham

वे दोनों नरश्रेष्ठ क्रोध में भरकर एक-दूसरे पर रण में फेंकने लगे। भीष्म-वध के इच्छुक भीम महारथी सोमदत्तपुत्र से,

श्लोक 49 (6.111.49)

तथा भीष्मजये गृध्नुः सौमदत्तिस्तु पाण्डवम् । कृतप्रतिकृते यत्तौ योधयामासतू रणे ॥

tathā bhīṣmajaye gṛdhnuḥ saumadattistu pāṇḍavam | kṛtapratikṛte yattau yodhayāmāsatū raṇe

और भीष्म की विजय के इच्छुक सोमदत्तपुत्र पाण्डुपुत्र से; प्रहार और प्रतिप्रहार में जुटे वे दोनों रण में एक-दूसरे से लड़ते रहे।

श्लोक 50 (6.111.50)

युधिष्ठिरं तु कौन्तेयं महत्या सेनया वृतम् । भीष्माभिमुखमायान्तं भारद्वाजो न्यवारयत् ॥

yudhiṣṭhiraṃ tu kaunteyaṃ mahatyā senayā vṛtam | bhīṣmābhimukhamāyāntaṃ bhāradvājo nyavārayat

विशाल सेना से घिरे, भीष्म की ओर बढ़ते कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को भारद्वाज (द्रोण) ने रोक दिया।

श्लोक 51 (6.111.51)

द्रोणस्य रथनिर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् । श्रुत्वा प्रभद्रका राजन्समकम्पन्त मारिष ॥

droṇasya rathanirghoṣaṃ parjanyaninadopamam | śrutvā prabhadrakā rājansamakampanta māriṣa

हे राजन्, हे मान्यवर, मेघ-गर्जना के समान द्रोण के रथ की घरघराहट सुनकर प्रभद्रक काँप उठे।

श्लोक 52 (6.111.52)

सा सेना महती राजन्पाण्डुपुत्रस्य संयुगे । द्रोणेन वारिता यत्ता न चचाल पदात्पदम् ॥

sā senā mahatī rājanpāṇḍuputrasya saṃyuge | droṇena vāritā yattā na cacāla padātpadam

हे राजन्, युद्ध में द्रोण द्वारा रोकी गई पाण्डुपुत्र की वह विशाल सेना पूरा प्रयत्न करने पर भी एक पग भी आगे न बढ़ सकी।

श्लोक 53 (6.111.53)

चेकितानं रणे यत्तं भीष्मं प्रति जनेश्वर । चित्रसेनस्तव सुतः क्रुद्धरूपमवारयत् ॥

cekitānaṃ raṇe yattaṃ bhīṣmaṃ prati janeśvara | citrasenastava sutaḥ kruddharūpamavārayat

हे जनेश्वर, युद्ध में सजग और क्रुद्ध रूप वाले चेकितान को भीष्म की ओर बढ़ते देख आपके पुत्र चित्रसेन ने रोक दिया।

श्लोक 54 (6.111.54)

भीष्महेतोः पराक्रान्तश्चित्रसेनः पराक्रमी । चेकितानं परं शक्त्या योधयामास भारत ॥

bhīṣmahetoḥ parākrāntaścitrasenaḥ parākramī | cekitānaṃ paraṃ śaktyā yodhayāmāsa bhārata

हे भारत, भीष्म के लिए पराक्रम दिखाते हुए पराक्रमी चित्रसेन ने पूरी शक्ति से चेकितान से युद्ध किया।

श्लोक 55 (6.111.55)

तथैव चेकितानोऽपि चित्रसेनमवारयत् । तद्युद्धमासीत्सुमहत्तयोस्तत्र समागमे ॥

tathaiva cekitāno'pi citrasenamavārayat | tadyuddhamāsītsumahattayostatra samāgame

इसी प्रकार चेकितान ने भी चित्रसेन को रोका। वहाँ उन दोनों के आमने-सामने होने पर बड़ा भारी युद्ध हुआ।

श्लोक 56 (6.111.56)

अर्जुनो वार्यमाणस्तु बहुशस्तत्र भारत । विमुखीकृत्य पुत्रं ते सेनां तव ममर्द ह ॥

arjuno vāryamāṇastu bahuśastatra bhārata | vimukhīkṛtya putraṃ te senāṃ tava mamarda ha

हे भारत, वहाँ बार-बार रोके जाने पर भी अर्जुन ने आपके पुत्र को पीठ दिखाने पर विवश कर दिया और आपकी सेना को रौंद डाला।

श्लोक 57 (6.111.57)

दुःशासनोऽपि परया शक्त्या पार्थमवारयत् । कथं भीष्मं न नो हन्यादिति निश्चित्य भारत ॥

duḥśāsano'pi parayā śaktyā pārthamavārayat | kathaṃ bhīṣmaṃ na no hanyāditi niścitya bhārata

हे भारत, दुःशासन ने भी यह निश्चय करके कि वह किसी भी प्रकार हमारे भीष्म को न मार पाए, पूरी शक्ति से पार्थ को रोका।

श्लोक 58 (6.111.58)

सा वध्यमाना समरे पुत्रस्य तव वाहिनी । लोड्यते रथिभिः श्रेष्ठैस्तत्रतत्रैव भारत ॥

sā vadhyamānā samare putrasya tava vāhinī | loḍyate rathibhiḥ śreṣṭhaistatratatraiva bhārata

हे भारत, युद्ध में मारी जाती आपके पुत्र की वह सेना श्रेष्ठ रथियों द्वारा जहाँ-तहाँ मथ दी गई।

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