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भीष्म पर्व · अध्याय 112

द्रोण द्वारा अपशकुनों का वर्णन और अश्वत्थामा को युद्ध का आदेश

दसवें दिन पाण्डव सेना को तितर-बितर करते हुए द्रोण अपने चारों ओर के शकुनों को देखकर पुत्र अश्वत्थामा से कहते हैं कि आज ही वह दिन है जब अर्जुन भीष्म-वध के लिए पूरा प्रयत्न करेंगे — बाण अपने-आप उछल रहे हैं, पशु-पक्षी चीख रहे हैं, सूर्य से उल्का गिरी है और देवालयों की प्रतिमाएँ काँप और रो रही हैं। वे सोचते हैं कि भीष्म ने शिखण्डी पर कभी प्रहार न करने का प्रण किया है, अर्जुन और युधिष्ठिर के क्रोध की महिमा बताते हैं, और क्षत्रिय-धर्म के नाते अश्वत्थामा को उत्तम अस्त्र लेकर धृष्टद्युम्न और भीम से लड़ने भेजते हैं, जबकि स्वयं युधिष्ठिर पर जाते हैं। पुत्र को यह शिक्षा देकर द्रोण युधिष्ठिर से युद्ध करने लगते हैं।

अध्याय 111अध्याय-सूचीअध्याय 113

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.112.1)

अथ वीरो महेष्वासो मत्तवारणविक्रमः । समादाय महच्चापं मत्तवारणवारणम् ॥

atha vīro maheṣvāso mattavāraṇavikramaḥ | samādāya mahaccāpaṃ mattavāraṇavāraṇam

तब मतवाले हाथी के समान पराक्रमी उस वीर महाधनुर्धर ने अपना वह विशाल धनुष उठाया जो मतवाले हाथियों को भी रोक देता था,

श्लोक 2 (6.112.2)

विधुन्वानो नरश्रेष्ठो द्रावयाणो वरूथिनीम् । पृतनां पाण्डवेयानां गाहमानो महाबलः ॥

vidhunvāno naraśreṣṭho drāvayāṇo varūthinīm | pṛtanāṃ pāṇḍaveyānāṃ gāhamāno mahābalaḥ

और उसे कँपाते हुए उस महाबली नरश्रेष्ठ ने शत्रु-सेना को खदेड़ते हुए पाण्डवों की सेना में प्रवेश किया।

श्लोक 3 (6.112.3)

निमित्तानि निमित्तज्ञः सर्वतो वीक्ष्य वीर्यवान् । प्रतपन्तमनीकानि द्रोणः पुत्रमभाषत ॥

nimittāni nimittajñaḥ sarvato vīkṣya vīryavān | pratapantamanīkāni droṇaḥ putramabhāṣata

शकुनों के ज्ञाता पराक्रमी द्रोण ने चारों ओर के लक्षणों को देखकर, शत्रु-सेनाओं को संतप्त करते अपने पुत्र से कहा।

द्रोण उवाच

श्लोक 4 (6.112.4)

अयं हि दिवसस्तात यत्र पार्थो महाबलः । जिघांसुः समरे भीष्मं परं यत्नं करिष्यति ॥

ayaṃ hi divasastāta yatra pārtho mahābalaḥ | jighāṃsuḥ samare bhīṣmaṃ paraṃ yatnaṃ kariṣyati

"बेटा, यही वह दिन है जब महाबली पार्थ युद्ध में भीष्म को मारने की इच्छा से अपना पूरा प्रयत्न करेंगे।

श्लोक 5 (6.112.5)

उत्पतन्ति हि मे बाणा धनुः प्रस्फुरतीव च । योगमस्त्राणि नेच्छन्ति क्रूरं मे वर्तते मनः ॥

utpatanti hi me bāṇā dhanuḥ prasphuratīva ca | yogamastrāṇi necchanti krūraṃ me vartate manaḥ

मेरे बाण अपने-आप उछल रहे हैं, धनुष मानो फड़क रहा है, अस्त्र प्रयोग में आना नहीं चाहते, और मेरा मन क्रूर हो रहा है।

श्लोक 6 (6.112.6)

दिक्ष्वशान्तानि घोराणि व्याहरन्ति मृगद्विजाः । नीचैर्गृध्रा निलीयन्ते भारतानां चमूं प्रति ॥

dikṣvaśāntāni ghorāṇi vyāharanti mṛgadvijāḥ | nīcairgṛdhrā nilīyante bhāratānāṃ camūṃ prati

सब दिशाओं में पशु-पक्षी निरंतर भयानक स्वर में चीख रहे हैं; गिद्ध नीचे उतरकर भरतवंशियों की सेना की ओर मुँह करके बैठ रहे हैं।

श्लोक 7 (6.112.7)

नष्टप्रभ इवादित्यः सर्वतो लोहिता दिशः । रसते व्यथते भूमिः कम्पतीव च सर्वशः ॥

naṣṭaprabha ivādityaḥ sarvato lohitā diśaḥ | rasate vyathate bhūmiḥ kampatīva ca sarvaśaḥ

सूर्य मानो प्रभाहीन हो गया है, दिशाएँ चारों ओर लाल हैं; पृथ्वी गरज रही है, भयभीत-सी व्यथित है और सब ओर से काँप रही है।

श्लोक 8 (6.112.8)

कङ्कगृध्रा बलाकाश्च व्याहरन्ति मुहुर्मुहुः । शिवाश्चैवाशिवा घोरा वेदयन्त्यो महद्भयम् ॥

kaṅkagṛdhrā balākāśca vyāharanti muhurmuhuḥ | śivāścaivāśivā ghorā vedayantyo mahadbhayam

कंक, गिद्ध और बगुले बार-बार चीख रहे हैं, और अमंगल-सूचक भयानक सियारिनें बड़े भय की सूचना दे रही हैं।

श्लोक 9 (6.112.9)

पपात महती चोल्का मध्येनादित्यमण्डलात् । सकबन्धश्च परिघो भानुमावृत्य तिष्ठति ॥

papāta mahatī colkā madhyenādityamaṇḍalāt | sakabandhaśca parigho bhānumāvṛtya tiṣṭhati

सूर्य-मण्डल के बीच से एक बड़ी उल्का गिरी है, और कबन्ध (सिरहीन धड़) सहित एक परिघ (मेघ-रेखा) सूर्य को ढँककर खड़ा है।

श्लोक 10 (6.112.10)

परिवेषस्तथा घोरश्चन्द्रभास्करयोरभूत् । वेदयानो भयं घोरं राज्ञां देहावकर्तनम् ॥

pariveṣastathā ghoraścandrabhāskarayorabhūt | vedayāno bhayaṃ ghoraṃ rājñāṃ dehāvakartanam

चन्द्रमा और सूर्य के चारों ओर भयानक घेरा बन गया है, जो राजाओं के शरीरों के कटने का घोर भय सूचित कर रहा है।

श्लोक 11 (6.112.11)

देवतायतनस्थाश्च कौरवेन्द्रस्य देवताः । कम्पन्ते च हसन्ते च नृत्यन्ति च रुदन्ति च ॥

devatāyatanasthāśca kauravendrasya devatāḥ | kampante ca hasante ca nṛtyanti ca rudanti ca

कौरवराज के देवालयों में स्थित देव-प्रतिमाएँ काँप रही हैं, हँस रही हैं, नाच रही हैं और रो रही हैं।

श्लोक 12 (6.112.12)

अपसव्यं ग्रहाश्चक्रुरलक्ष्माणं दिवाकरम् । अवाक्शिराश्च भगवानुपातिष्ठत चन्द्रमाः ॥

apasavyaṃ grahāścakruralakṣmāṇaṃ divākaram | avākśirāśca bhagavānupātiṣṭhata candramāḥ

ग्रहों ने अशुभ लक्षणों वाले सूर्य की उलटी परिक्रमा की है, और भगवान चन्द्रमा अपने शृंग नीचे किए हुए उदित हुए हैं।

श्लोक 13 (6.112.13)

वपूंषि च नरेन्द्राणां विगताभानि लक्षये । धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु न च भ्राजन्ति दंशिताः ॥

vapūṃṣi ca narendrāṇāṃ vigatābhāni lakṣaye | dhārtarāṣṭrasya sainyeṣu na ca bhrājanti daṃśitāḥ

मैं राजाओं के शरीरों को कान्तिहीन देख रहा हूँ, और धृतराष्ट्रपुत्र की सेनाओं में कवचधारी योद्धा शोभा नहीं पा रहे।

श्लोक 14 (6.112.14)

सेनयोरुभयोश्चापि समन्ताच्छ्रूयते महान् । पाञ्चजन्यस्य निर्घोषो गाण्डीवस्य च निःस्वनः ॥

senayorubhayoścāpi samantācchrūyate mahān | pāñcajanyasya nirghoṣo gāṇḍīvasya ca niḥsvanaḥ

दोनों सेनाओं में चारों ओर पाञ्चजन्य शंख का महान घोष और गाण्डीव धनुष की टंकार सुनाई दे रही है।

श्लोक 15 (6.112.15)

ध्रुवमास्थाय बीभत्सुरुत्तमास्त्राणि संयुगे । अपास्यान्यान्रणे योधानभ्येष्यति पितामहम् ॥

dhruvamāsthāya bībhatsuruttamāstrāṇi saṃyuge | apāsyānyānraṇe yodhānabhyeṣyati pitāmaham

निश्चय ही बीभत्सु (अर्जुन) इस युद्ध में उत्तम अस्त्रों का सहारा लेकर, दूसरे योद्धाओं को हटाते हुए पितामह पर चढ़ आएँगे।

श्लोक 16 (6.112.16)

हृष्यन्ति रोमकूपाणि सीदतीव च मे मनः । चिन्तयित्वा महाबाहो भीष्मार्जुनसमागमम् ॥

hṛṣyanti romakūpāṇi sīdatīva ca me manaḥ | cintayitvā mahābāho bhīṣmārjunasamāgamam

हे महाबाहो, भीष्म और अर्जुन की भिड़ंत का विचार करके मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं और मन मानो बैठा जा रहा है।

श्लोक 17 (6.112.17)

तं चेह निकृतिप्रज्ञं पाञ्चाल्यं पापचेतसम् । पुरस्कृत्य रणे पार्थो भीष्मस्यायोधनं गतः ॥

taṃ ceha nikṛtiprajñaṃ pāñcālyaṃ pāpacetasam | puraskṛtya raṇe pārtho bhīṣmasyāyodhanaṃ gataḥ

और यहाँ पार्थ उस छल-बुद्धि, पापी हृदय वाले पाञ्चाल (शिखण्डी) को युद्ध में आगे करके भीष्म से लड़ने गए हैं।

श्लोक 18 (6.112.18)

अब्रवीच्च पुरा भीष्मो नाहं हन्यां शिखण्डिनम् । स्त्री ह्येषा विहिता धात्रा दैवाच्च स पुनः पुमान् ॥

abravīcca purā bhīṣmo nāhaṃ hanyāṃ śikhaṇḍinam | strī hyeṣā vihitā dhātrā daivācca sa punaḥ pumān

भीष्म ने पहले ही कहा था — 'मैं शिखण्डी को नहीं मारूँगा; विधाता ने उसे स्त्री बनाया था, और दैववश वह फिर पुरुष हो गया।'

श्लोक 19 (6.112.19)

असंकल्पध्वजश्चैव याज्ञसेनिर्महाबलः । न चामङ्गलिके तस्मिन्प्रहरेदापगासुतः ॥

asaṃkalpadhvajaścaiva yājñasenirmahābalaḥ | na cāmaṅgalike tasminpraharedāpagāsutaḥ

और महाबली याज्ञसेनि (शिखण्डी) अशुभ ध्वज के समान है; उस अमंगल व्यक्ति पर गङ्गापुत्र प्रहार नहीं करेंगे।

श्लोक 20 (6.112.20)

एतद्विचिन्तयानस्य प्रज्ञा सीदति मे भृशम् । अभ्युद्यतो रणे पार्थः कुरुवृद्धमुपाद्रवत् ॥

etadvicintayānasya prajñā sīdati me bhṛśam | abhyudyato raṇe pārthaḥ kuruvṛddhamupādravat

यह सोचते-सोचते मेरी बुद्धि बहुत व्याकुल हो रही है। युद्ध के लिए उद्यत पार्थ कुरुवृद्ध (भीष्म) पर टूट पड़े हैं।

श्लोक 21 (6.112.21)

युधिष्ठिरस्य च क्रोधो भीष्मश्चार्जुनसंगतः । मम चास्त्रसमारम्भः प्रजानामशिवं ध्रुवम् ॥

yudhiṣṭhirasya ca krodho bhīṣmaścārjunasaṃgataḥ | mama cāstrasamārambhaḥ prajānāmaśivaṃ dhruvam

युधिष्ठिर का क्रोध, अर्जुन से भिड़े हुए भीष्म और मेरा अस्त्र उठाना — ये निश्चय ही प्रजा के लिए अमंगलकारी हैं।

श्लोक 22 (6.112.22)

मनस्वी बलवाञ्शूरः कृतास्त्रोऽलघुविक्रमः । दूरपाती दृढेषुश्च निमित्तज्ञश्च पाण्डवः ॥

manasvī balavāñśūraḥ kṛtāstro'laghuvikramaḥ | dūrapātī dṛḍheṣuśca nimittajñaśca pāṇḍavaḥ

पाण्डुपुत्र अर्जुन मनस्वी, बलवान, शूर, अस्त्रविद्या में निपुण, महान पराक्रमी, दूर तक बाण चलाने वाले, दृढ़ बाणों वाले और शकुनों के ज्ञाता हैं।

श्लोक 23 (6.112.23)

अजेयः समरे चापि देवैरपि सवासवैः । बलवान्बुद्धिमांश्चैव जितक्लेशो युधां वरः ॥

ajeyaḥ samare cāpi devairapi savāsavaiḥ | balavānbuddhimāṃścaiva jitakleśo yudhāṃ varaḥ

इन्द्र सहित देवता भी उन्हें युद्ध में नहीं जीत सकते; वे बलवान और बुद्धिमान हैं, कष्टों को जीत चुके हैं और योद्धाओं में श्रेष्ठ हैं।

श्लोक 24 (6.112.24)

विजयी च रणे नित्यं भैरवास्त्रश्च पाण्डवः । अभ्युद्यतं रणे दृष्ट्वा भैरवास्त्रं च पाण्डवम् । तस्य मार्गं परिहरन्द्रुतं गच्छ यतव्रत ॥

vijayī ca raṇe nityaṃ bhairavāstraśca pāṇḍavaḥ | abhyudyataṃ raṇe dṛṣṭvā bhairavāstraṃ ca pāṇḍavam | tasya mārgaṃ pariharandrutaṃ gaccha yatavrata

पाण्डुपुत्र युद्ध में सदा विजयी हैं और भयंकर अस्त्रों वाले हैं। भयंकर अस्त्रों के साथ युद्ध को उद्यत पाण्डव को देखकर, हे व्रतधारी, उनके मार्ग से हटकर शीघ्र चले जाओ।

श्लोक 25 (6.112.25)

पश्याद्यैतन्महाघोरे संयुगे वैशसं महत् । हेमचित्राणि शूराणां महान्ति च शुभानि च ॥

paśyādyaitanmahāghore saṃyuge vaiśasaṃ mahat | hemacitrāṇi śūrāṇāṃ mahānti ca śubhāni ca

देखो, आज इस महाभयानक युद्ध में कैसा भारी संहार हो रहा है। वीरों के सोने से चित्रित विशाल और सुन्दर

श्लोक 26 (6.112.26)

कवचान्यवदीर्यन्ते शरैः सन्नतपर्वभिः । छिद्यन्ते च ध्वजाग्राणि तोमराश्च धनूंषि च ॥

kavacānyavadīryante śaraiḥ sannataparvabhiḥ | chidyante ca dhvajāgrāṇi tomarāśca dhanūṃṣi ca

कवच झुकी गाँठों वाले बाणों से फाड़े जा रहे हैं; ध्वजाओं के अग्रभाग, तोमर और धनुष काटे जा रहे हैं;

श्लोक 27 (6.112.27)

प्रासाश्च विमलास्तीक्ष्णाः शक्त्यश्च कनकोज्ज्वलाः । वैजयन्त्यश्च नागानां संक्रुद्धेन किरीटिना ॥

prāsāśca vimalāstīkṣṇāḥ śaktyaśca kanakojjvalāḥ | vaijayantyaśca nāgānāṃ saṃkruddhena kirīṭinā

चमकीले तीखे प्रास, सोने से दमकती शक्तियाँ और हाथियों की वैजयन्ती पताकाएँ भी — क्रुद्ध किरीटी (अर्जुन) के द्वारा।

श्लोक 28 (6.112.28)

नायं संरक्षितुं कालः प्राणान्पुत्रोपजीविभिः । याहि स्वर्गं पुरस्कृत्य यशसे विजयाय च ॥

nāyaṃ saṃrakṣituṃ kālaḥ prāṇānputropajīvibhiḥ | yāhi svargaṃ puraskṛtya yaśase vijayāya ca

बेटा, यह आश्रितों के लिए प्राण बचाने का समय नहीं है। स्वर्ग को लक्ष्य बनाकर यश और विजय के लिए आगे बढ़ो।

श्लोक 29 (6.112.29)

रथनागहयावर्तां महाघोरां सुदुर्गमाम् । रथेन संग्रामनदीं तरत्येष कपिध्वजः ॥

rathanāgahayāvartāṃ mahāghorāṃ sudurgamām | rathena saṃgrāmanadīṃ taratyeṣa kapidhvajaḥ

यह कपिध्वज (अर्जुन) रथ, हाथी और घोड़ों के भँवरों वाली, अत्यन्त भयानक और दुर्गम युद्ध-नदी को रथ से पार कर रहे हैं।

श्लोक 30 (6.112.30)

ब्रह्मण्यता दमो दानं तपश्च चरितं महत् । इहैव दृश्यते पार्थे भ्राता यस्य धनञ्जयः ॥

brahmaṇyatā damo dānaṃ tapaśca caritaṃ mahat | ihaiva dṛśyate pārthe bhrātā yasya dhanañjayaḥ

ब्राह्मण-भक्ति, इन्द्रिय-संयम, दान, तप और महान आचरण — ये सब यहीं पार्थ युधिष्ठिर में दिखाई देते हैं, जिनके भाई धनञ्जय हैं,

श्लोक 31 (6.112.31)

भीमसेनश्च बलवान्माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । वासुदेवश्च वार्ष्णेयो यस्य नाथो व्यवस्थितः ॥

bhīmasenaśca balavānmādrīputrau ca pāṇḍavau | vāsudevaśca vārṣṇeyo yasya nātho vyavasthitaḥ

और बलवान भीमसेन तथा माद्री के दोनों पुत्र पाण्डव हैं; और वृष्णिवंशी वासुदेव जिनके रक्षक बनकर खड़े हैं।

श्लोक 32 (6.112.32)

तस्यैष मन्युप्रभवो धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । तपोभावितदेहस्य कोपो दहति वाहिनीम् ॥

tasyaiṣa manyuprabhavo dhārtarāṣṭrasya durmateḥ | tapobhāvitadehasya kopo dahati vāhinīm

दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र के दिए दुःख से जन्मा, तप से पवित्र देह वाले उन युधिष्ठिर का यह क्रोध ही इस सेना को जला रहा है।

श्लोक 33 (6.112.33)

एष संदृश्यते पार्थो वासुदेवव्यपाश्रयः । दारयन्सर्वसैन्यानि धार्तराष्ट्राणि सर्वशः ॥

eṣa saṃdṛśyate pārtho vāsudevavyapāśrayaḥ | dārayansarvasainyāni dhārtarāṣṭrāṇi sarvaśaḥ

वह देखो, वासुदेव का आश्रय लिये पार्थ धृतराष्ट्रपुत्र की सारी सेनाओं को सब ओर से चीरते दिखाई दे रहे हैं।

श्लोक 34 (6.112.34)

एतदालोक्यते सैन्यं क्षोभ्यमाणं किरीटिना । महोर्मिनद्धं सुमहत्तिमिनेव महाजलम् ॥

etadālokyate sainyaṃ kṣobhyamāṇaṃ kirīṭinā | mahorminaddhaṃ sumahattimineva mahājalam

किरीटी द्वारा मथी जाती यह सेना ऐसी दिखाई देती है जैसे तिमि मत्स्य द्वारा विक्षुब्ध, बड़ी-बड़ी लहरों से भरा विशाल जलाशय।

श्लोक 35 (6.112.35)

हाहाकिलकिलाशब्दाः श्रूयन्ते च चमूमुखे । याहि पाञ्चालदायादमहं यास्ये युधिष्ठिरम् ॥

hāhākilakilāśabdāḥ śrūyante ca camūmukhe | yāhi pāñcāladāyādamahaṃ yāsye yudhiṣṭhiram

सेना के अग्रभाग में हाहाकार और किलकिलाहट के शब्द सुनाई दे रहे हैं। तुम पाञ्चालराज के उत्तराधिकारी (धृष्टद्युम्न) पर जाओ; मैं युधिष्ठिर पर जाऊँगा।

श्लोक 36 (6.112.36)

दुर्गमं ह्यन्तरं राज्ञो व्यूहस्यामिततेजसः । समुद्रकुक्षिप्रतिमं सर्वतोऽतिरथैः स्थितैः ॥

durgamaṃ hyantaraṃ rājño vyūhasyāmitatejasaḥ | samudrakukṣipratimaṃ sarvato'tirathaiḥ sthitaiḥ

अमित तेजस्वी राजा युधिष्ठिर के व्यूह का भीतरी भाग समुद्र की कोख के समान दुर्गम है, क्योंकि उसके चारों ओर अतिरथी खड़े हैं।

श्लोक 37 (6.112.37)

सात्यकिश्चाभिमन्युश्च धृष्टद्युम्नवृकोदरौ । पर्यरक्षन्त राजानं यमौ च मनुजेश्वरम् ॥

sātyakiścābhimanyuśca dhṛṣṭadyumnavṛkodarau | paryarakṣanta rājānaṃ yamau ca manujeśvaram

सात्यकि, अभिमन्यु, धृष्टद्युम्न, वृकोदर (भीम) और दोनों जुड़वाँ भाई उस नरेश्वर राजा की रक्षा कर रहे थे।

श्लोक 38 (6.112.38)

उपेन्द्रसदृशश्यामो महाशाल इवोद्गतः । एष गच्छत्यनीकाग्रे द्वितीय इव फल्गुनः ॥

upendrasadṛśaśyāmo mahāśāla ivodgataḥ | eṣa gacchatyanīkāgre dvitīya iva phalgunaḥ

उपेन्द्र (विष्णु) के समान श्याम, ऊँचे उठे महान शाल वृक्ष-सा यह (अभिमन्यु) दूसरे फाल्गुन (अर्जुन) की भाँति सेना के अग्रभाग में चल रहा है।

श्लोक 39 (6.112.39)

उत्तमास्त्राणि चाधत्स्व गृहीत्वा च महद्धनुः । पार्षतं याहि राजानं युध्यस्व च वृकोदरम् ॥

uttamāstrāṇi cādhatsva gṛhītvā ca mahaddhanuḥ | pārṣataṃ yāhi rājānaṃ yudhyasva ca vṛkodaram

उत्तम अस्त्रों को धारण करो और विशाल धनुष उठाओ; राजकुमार पार्षत (धृष्टद्युम्न) पर जाओ और वृकोदर (भीम) से युद्ध करो।

श्लोक 40 (6.112.40)

को हि नेच्छेत्प्रियं पुत्रं जीवन्तं शाश्वतीः समाः । क्षत्रधर्मं तु संप्रेक्ष्य ततस्त्वां नियुनज्म्यहम् ॥

ko hi necchetpriyaṃ putraṃ jīvantaṃ śāśvatīḥ samāḥ | kṣatradharmaṃ tu saṃprekṣya tatastvāṃ niyunajmyaham

कौन नहीं चाहेगा कि उसका प्रिय पुत्र अनन्त वर्षों तक जीवित रहे? परन्तु क्षत्रिय-धर्म को देखते हुए मैं तुम्हें इस कार्य में लगाता हूँ।

श्लोक 41 (6.112.41)

एष चातिरणे भीष्मो दहते वै महाचमूम् । युद्धेषु सदृशस्तात यमस्य वरुणस्य च ॥

eṣa cātiraṇe bhīṣmo dahate vai mahācamūm | yuddheṣu sadṛśastāta yamasya varuṇasya ca

और ये भीष्म इस घोर संग्राम में विशाल सेना को जला रहे हैं; बेटा, युद्धों में वे यम और वरुण के समान हैं।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 42 (6.112.42)

पुत्रं समनुशास्यैवं भारद्वाजः प्रतापवान् । महारणे महाराज धर्मराजमयोधयत् ॥

putraṃ samanuśāsyaivaṃ bhāradvājaḥ pratāpavān | mahāraṇe mahārāja dharmarājamayodhayat

हे महाराज, इस प्रकार पुत्र को समझाकर प्रतापी भरद्वाजपुत्र द्रोण उस महासंग्राम में धर्मराज युधिष्ठिर से युद्ध करने लगे।

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