Skip to main content

भीष्म पर्व · अध्याय 113

दस कौरव महारथियों से भीमसेन का युद्ध

दुर्योधन के पक्ष के दस योद्धा — भगदत्त, कृप, शल्य, कृतवर्मा, अवन्ती के विन्द और अनुविन्द, जयद्रथ, चित्रसेन, विकर्ण और दुर्मर्षण — एक साथ भीम पर टूट पड़ते हैं। भीम उनमें से प्रत्येक को बींधते हैं, कृप और कृतवर्मा के धनुष काटते हैं और जयद्रथ के घोड़ों तथा सारथि को मार डालते हैं, जिससे सिन्धुराज चित्रसेन के रथ पर भाग जाता है; फिर वे अपने ऊपर फेंकी गई शक्ति, तोमर, पट्टिश, शतघ्नी और बाण को काट गिराते हैं। शिखण्डी को आगे किए अर्जुन वहाँ आकर उन दसों को बींधते हैं, और दुर्योधन त्रिगर्तराज सुशर्मा को हजारों रथों के साथ दोनों भाइयों को घेरने भेजता है; तब शत्रुओं से अर्जुन का युद्ध छिड़ जाता है।

अध्याय 112अध्याय-सूचीअध्याय 114

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.113.1)

भगदत्तः कृपः शल्यः कृतवर्मा तथैव च । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्धवश्च जयद्रथः ॥

bhagadattaḥ kṛpaḥ śalyaḥ kṛtavarmā tathaiva ca | vindānuvindāvāvantyau saindhavaśca jayadrathaḥ

भगदत्त, कृप, शल्य और कृतवर्मा, अवन्ती के विन्द और अनुविन्द, सिन्धुराज जयद्रथ,

श्लोक 2 (6.113.2)

चित्रसेनो विकर्णश्च तथा दुर्मर्षणो युवा । दशैते तावका योधा भीमसेनमयोधयन् ॥

citraseno vikarṇaśca tathā durmarṣaṇo yuvā | daśaite tāvakā yodhā bhīmasenamayodhayan

चित्रसेन, विकर्ण और युवा दुर्मर्षण — आपके इन दस योद्धाओं ने भीमसेन से युद्ध किया,

श्लोक 3 (6.113.3)

महत्या सेनया युक्ता नानादेशसमुत्थया । भीष्मस्य समरे राजन्प्रार्थयाना महद्यशः ॥

mahatyā senayā yuktā nānādeśasamutthayā | bhīṣmasya samare rājanprārthayānā mahadyaśaḥ

हे राजन्, अनेक देशों से आई विशाल सेना के साथ, भीष्म के लिए युद्ध में महान यश की कामना करते हुए।

श्लोक 4 (6.113.4)

शल्यस्तु नवभिर्बाणैर्भीमसेनमताडयत् । कृतवर्मा त्रिभिर्बाणैः कृपश्च नवभिः शरैः ॥

śalyastu navabhirbāṇairbhīmasenamatāḍayat | kṛtavarmā tribhirbāṇaiḥ kṛpaśca navabhiḥ śaraiḥ

शल्य ने भीमसेन को नौ बाणों से मारा, कृतवर्मा ने तीन बाणों से और कृप ने नौ बाणों से।

श्लोक 5 (6.113.5)

चित्रसेनो विकर्णश्च भगदत्तश्च मारिष । दशभिर्दशभिर्बाणैर्भीमसेनमताडयन् ॥

citraseno vikarṇaśca bhagadattaśca māriṣa | daśabhirdaśabhirbāṇairbhīmasenamatāḍayan

हे मान्यवर, चित्रसेन, विकर्ण और भगदत्त ने दस-दस बाणों से भीमसेन पर प्रहार किया।

श्लोक 6 (6.113.6)

सैन्धवश्च त्रिभिर्बाणैर्भीमसेनमताडयत् । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥

saindhavaśca tribhirbāṇairbhīmasenamatāḍayat | vindānuvindāvāvantyau pañcabhiḥ pañcabhiḥ śaraiḥ

सिन्धुराज ने तीन बाणों से भीमसेन को मारा, और अवन्ती के विन्द-अनुविन्द ने पाँच-पाँच बाणों से;

श्लोक 7 (6.113.7)

दुर्मर्षणस्तु विंशत्या पाण्डवं निशितैः शरैः । स तान्सर्वान्महाराज राजमानान्पृथक्पृथक् ॥

durmarṣaṇastu viṃśatyā pāṇḍavaṃ niśitaiḥ śaraiḥ | sa tānsarvānmahārāja rājamānānpṛthakpṛthak

और दुर्मर्षण ने बीस तीखे बाणों से पाण्डुपुत्र को बींधा। तब, हे महाराज, उन सब तेजस्वी योद्धाओं को अलग-अलग,

श्लोक 8 (6.113.8)

प्रवीरान्सर्वलोकस्य धार्तराष्ट्रान्महारथान् । जघान समरे वीरः पाण्डवः परवीरहा ॥

pravīrānsarvalokasya dhārtarāṣṭrānmahārathān | jaghāna samare vīraḥ pāṇḍavaḥ paravīrahā

समस्त लोक के प्रमुख वीरों, धृतराष्ट्र-पक्ष के उन महारथियों पर शत्रुवीरों के संहारक वीर पाण्डुपुत्र ने युद्ध में प्रहार किया।

श्लोक 9 (6.113.9)

सप्तभिः शल्यमाविध्यत्कृतवर्माणमष्टभिः । कृपस्य सशरं चापं मध्ये चिच्छेद भारत ॥

saptabhiḥ śalyamāvidhyatkṛtavarmāṇamaṣṭabhiḥ | kṛpasya saśaraṃ cāpaṃ madhye ciccheda bhārata

उन्होंने शल्य को सात और कृतवर्मा को आठ बाणों से बींधा, और हे भारत, कृप के बाण चढ़े धनुष को बीच से काट डाला।

श्लोक 10 (6.113.10)

अथैनं च्छिन्नधन्वानं पुनर्विव्याध सप्तभिः । विन्दानुविन्दौ च तथा त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् ॥

athainaṃ cchinnadhanvānaṃ punarvivyādha saptabhiḥ | vindānuvindau ca tathā tribhistribhiratāḍayat

धनुष कट जाने पर उन्होंने उन्हें फिर सात बाणों से बींधा; और विन्द-अनुविन्द को भी तीन-तीन बाणों से मारा,

श्लोक 11 (6.113.11)

दुर्मर्षणं च विंशत्या चित्रसेनं च पञ्चभिः । विकर्णं दशभिर्बाणैः पञ्चभिश्च जयद्रथम् ॥

durmarṣaṇaṃ ca viṃśatyā citrasenaṃ ca pañcabhiḥ | vikarṇaṃ daśabhirbāṇaiḥ pañcabhiśca jayadratham

दुर्मर्षण को बीस, चित्रसेन को पाँच, विकर्ण को दस और जयद्रथ को पाँच बाणों से।

श्लोक 12 (6.113.12)

विद्ध्वा भीमोऽनदद्धृष्टः सैन्धवं च पुनस्त्रिभिः । अथान्यद्धनुरादाय गौतमो रथिनां वरः ॥

viddhvā bhīmo'nadaddhṛṣṭaḥ saindhavaṃ ca punastribhiḥ | athānyaddhanurādāya gautamo rathināṃ varaḥ

उन्हें बींधकर, और सिन्धुराज को फिर तीन बाणों से मारकर, भीम हर्ष से गरज उठे। तब रथियों में श्रेष्ठ गौतम (कृप) ने दूसरा धनुष लेकर

श्लोक 13 (6.113.13)

भीमं विव्याध संरब्धो दशभिर्निशितैः शरैः । स विद्धो दशभिर्बाणैस्तोत्रैरिव महाद्विपः ॥

bhīmaṃ vivyādha saṃrabdho daśabhirniśitaiḥ śaraiḥ | sa viddho daśabhirbāṇaistotrairiva mahādvipaḥ

क्रोध से भरकर भीम को दस तीखे बाणों से बींधा। अंकुशों से बिंधे महान हाथी की भाँति दस बाणों से घायल होकर

श्लोक 14 (6.113.14)

ततः क्रुद्धो महाराज भीमसेनः प्रतापवान् । गौतमं ताडयामास शरैर्बहुभिराहवे ॥

tataḥ kruddho mahārāja bhīmasenaḥ pratāpavān | gautamaṃ tāḍayāmāsa śarairbahubhirāhave

हे महाराज, प्रतापी भीमसेन क्रुद्ध हो उठे और युद्ध में बहुत-से बाणों से गौतम पर प्रहार किया।

श्लोक 15 (6.113.15)

सैन्धवस्य तथाऽश्वांश्च सारथिं च त्रिभिः शरैः । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय कालान्तकसमद्युतिः ॥

saindhavasya tathā'śvāṃśca sārathiṃ ca tribhiḥ śaraiḥ | prāhiṇonmṛtyulokāya kālāntakasamadyutiḥ

प्रलयकाल के यम के समान तेजस्वी भीम ने तीन बाणों से सिन्धुराज के घोड़ों और सारथि को मृत्युलोक भेज दिया।

श्लोक 16 (6.113.16)

हताश्वात्तु रथात्तूर्णमवप्लुत्य महारथः । शरांश्चिक्षेप निशितान्भीमसेनस्य संयुगे ॥

hatāśvāttu rathāttūrṇamavaplutya mahārathaḥ | śarāṃścikṣepa niśitānbhīmasenasya saṃyuge

घोड़ों के मारे जाने पर वह महारथी झट रथ से कूद पड़ा और युद्ध में भीमसेन पर तीखे बाण चलाने लगा।

श्लोक 17 (6.113.17)

तस्य भीमो धनुर्मध्ये द्वाभ्यां चिच्छेद मारिष । भल्लाभ्यां भरतश्रेष्ठ सैन्धवस्य महात्मनः ॥

tasya bhīmo dhanurmadhye dvābhyāṃ ciccheda māriṣa | bhallābhyāṃ bharataśreṣṭha saindhavasya mahātmanaḥ

हे मान्यवर, हे भरतश्रेष्ठ, भीम ने दो भल्ल बाणों से महामना सिन्धुराज का धनुष बीच से काट डाला।

श्लोक 18 (6.113.18)

स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । चित्रसेनरथं राजन्नारुरोह त्वरान्वितः ॥

sa cchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ | citrasenarathaṃ rājannāruroha tvarānvitaḥ

धनुष कट जाने, रथहीन होने और घोड़ों तथा सारथि के मारे जाने पर, हे राजन्, वह जल्दी से चित्रसेन के रथ पर चढ़ गया।

श्लोक 19 (6.113.19)

अत्यद्भुतं रणे कर्म कृतवांस्तत्र पाण्डवः । महारथाञ्शरैर्विद्ध्वा वारयित्वा च मारिष ॥

atyadbhutaṃ raṇe karma kṛtavāṃstatra pāṇḍavaḥ | mahārathāñśarairviddhvā vārayitvā ca māriṣa

वहाँ पाण्डुपुत्र ने युद्ध में अत्यन्त अद्भुत कर्म किया — हे मान्यवर, महारथियों को बाणों से बींधकर और उन्हें रोककर

श्लोक 20 (6.113.20)

विरथं सैन्धवं चक्रे सर्वलोकस्य पश्यतः । तदा न ममृषे शल्यो भीमसेनस्य विक्रमम् ॥

virathaṃ saindhavaṃ cakre sarvalokasya paśyataḥ | tadā na mamṛṣe śalyo bhīmasenasya vikramam

सबके देखते-देखते सिन्धुराज को रथहीन कर दिया। तब शल्य भीमसेन का पराक्रम सहन न कर सके।

श्लोक 21 (6.113.21)

स संधाय शरांस्तीक्ष्णान्कर्मारपरिमार्जितान् । भीमं विव्याध समरे तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥

sa saṃdhāya śarāṃstīkṣṇānkarmāraparimārjitān | bhīmaṃ vivyādha samare tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

लोहार के हाथों चमकाए गए तीखे बाण चढ़ाकर उन्होंने युद्ध में भीम को बींधा और कहा — 'ठहरो, ठहरो!'

श्लोक 22 (6.113.22)

कृपश्च कृतवर्मा च भगदत्तश्च वीर्यवान् । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ चित्रसेनश्च संयुगे ॥

kṛpaśca kṛtavarmā ca bhagadattaśca vīryavān | vindānuvindāvāvantyau citrasenaśca saṃyuge

कृप, कृतवर्मा, पराक्रमी भगदत्त, अवन्ती के विन्द-अनुविन्द, युद्ध में चित्रसेन,

श्लोक 23 (6.113.23)

दुर्मर्षणो विकर्णश्च सिन्धुराजश्च वीर्यवान् । भीमं ते विव्यधुस्तूर्णं शल्यहेतोररिन्दमाः ॥

durmarṣaṇo vikarṇaśca sindhurājaśca vīryavān | bhīmaṃ te vivyadhustūrṇaṃ śalyahetorarindamāḥ

दुर्मर्षण, विकर्ण और पराक्रमी सिन्धुराज — इन शत्रुदमन योद्धाओं ने शल्य की रक्षा के लिए तुरंत भीम को बींधा।

श्लोक 24 (6.113.24)

स च तान्प्रति विव्याध पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः । शल्यं विव्याध सप्तत्या पुनश्च दशभिः शरैः ॥

sa ca tānprati vivyādha pañcabhiḥ pañcabhiḥ śaraiḥ | śalyaṃ vivyādha saptatyā punaśca daśabhiḥ śaraiḥ

उन्होंने बदले में उन सबको पाँच-पाँच बाणों से बींधा, और शल्य को सत्तर तथा फिर दस बाणों से।

श्लोक 25 (6.113.25)

तं शल्यो नवभिर्भित्त्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः । सारथिं चास्य भल्लेन गाढं विव्याध मर्मणि ॥

taṃ śalyo navabhirbhittvā punarvivyādha pañcabhiḥ | sārathiṃ cāsya bhallena gāḍhaṃ vivyādha marmaṇi

शल्य ने उन्हें नौ बाणों से विदीर्ण किया और फिर पाँच से बींधा, और एक भल्ल से उनके सारथि के मर्मस्थल पर गहरी चोट की।

श्लोक 26 (6.113.26)

विशोकं प्रेक्ष्य निर्भिन्नं भीमसेनः प्रतापवान् । मद्रराजं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

viśokaṃ prekṣya nirbhinnaṃ bhīmasenaḥ pratāpavān | madrarājaṃ tribhirbāṇairbāhvorurasi cārpayat

विशोक (अपने सारथि) को घायल देखकर प्रतापी भीमसेन ने मद्रराज की दोनों भुजाओं और छाती में तीन बाण धँसा दिए।

श्लोक 27 (6.113.27)

तथेतरान्महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः । ताडयामास समरे सिंहवद्विननाद च ॥

tathetarānmaheṣvāsāṃstribhistribhirajihmagaiḥ | tāḍayāmāsa samare siṃhavadvinanāda ca

इसी प्रकार उन्होंने अन्य महाधनुर्धरों को युद्ध में तीन-तीन सीधे जाने वाले बाणों से मारा और सिंह की भाँति गर्जना की।

श्लोक 28 (6.113.28)

ते हि यत्ता महेष्वासाः पाण्डवं युद्धकोविदम् । त्रिभिस्त्रिभिरकुण्ठाग्रैर्भृशं मर्मस्वताडयन् ॥

te hi yattā maheṣvāsāḥ pāṇḍavaṃ yuddhakovidam | tribhistribhirakuṇṭhāgrairbhṛśaṃ marmasvatāḍayan

उन प्रयत्नशील महाधनुर्धरों ने युद्धकुशल पाण्डुपुत्र के मर्मस्थलों पर तीन-तीन तीखी नोक वाले बाणों से गहरा प्रहार किया।

श्लोक 29 (6.113.29)

सोऽतिविद्धो महेष्वासो भीमसेनो न विव्यथे । पर्वतो वारिधाराभिर्वर्षमाणैरिवाम्बुदैः ॥

so'tividdho maheṣvāso bhīmaseno na vivyathe | parvato vāridhārābhirvarṣamāṇairivāmbudaiḥ

बहुत घायल होने पर भी महाधनुर्धर भीमसेन विचलित नहीं हुए, जैसे बरसते बादलों की जलधाराओं से पर्वत विचलित नहीं होता।

श्लोक 30 (6.113.30)

स तु क्रोधसमाविष्टः पाण्डवानां महारथः । मद्रेश्वरं त्रिभिर्बाणैर्भृशं विद्ध्वा महायशाः ॥

sa tu krodhasamāviṣṭaḥ pāṇḍavānāṃ mahārathaḥ | madreśvaraṃ tribhirbāṇairbhṛśaṃ viddhvā mahāyaśāḥ

तब क्रोध से भरे पाण्डवों के उस महायशस्वी महारथी ने मद्रराज को तीन बाणों से गहरा बींधकर,

श्लोक 31 (6.113.31)

कृपं च नवभिर्बाणैर्भृशं विद्ध्वा समन्ततः । प्राग्ज्योतिषं शतैराजौ राजन्विव्याध सायकैः ॥

kṛpaṃ ca navabhirbāṇairbhṛśaṃ viddhvā samantataḥ | prāgjyotiṣaṃ śatairājau rājanvivyādha sāyakaiḥ

और कृप को चारों ओर से नौ बाणों से गहरा बींधकर, हे राजन्, युद्ध में प्राग्ज्योतिषनरेश (भगदत्त) को सैकड़ों बाणों से बींधा।

श्लोक 32 (6.113.32)

ततस्तु सशरं चापं सात्वतस्य महात्मनः । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन चिच्छेद कृतहस्तवत् ॥

tatastu saśaraṃ cāpaṃ sātvatasya mahātmanaḥ | kṣurapreṇa sutīkṣṇena ciccheda kṛtahastavat

फिर सिद्धहस्त योद्धा की भाँति उन्होंने एक अत्यन्त तीखे क्षुरप्र बाण से महामना सात्वत (कृतवर्मा) का बाण चढ़ा धनुष काट डाला।

श्लोक 33 (6.113.33)

तथान्यद्धनुरादाय कृतवर्मा वृकोदरम् । आजघान भ्रुवोर्मध्ये नाराचेन परंतपः ॥

tathānyaddhanurādāya kṛtavarmā vṛkodaram | ājaghāna bhruvormadhye nārācena paraṃtapaḥ

शत्रुओं को तपाने वाले कृतवर्मा ने दूसरा धनुष लेकर वृकोदर की भौंहों के बीच नाराच बाण मारा।

श्लोक 34 (6.113.34)

भीमस्तु समरे विद्ध्वा शल्यं नवभिरायसैः । भगदत्तं त्रिभिश्चैव कृतवर्माणमष्टभिः ॥

bhīmastu samare viddhvā śalyaṃ navabhirāyasaiḥ | bhagadattaṃ tribhiścaiva kṛtavarmāṇamaṣṭabhiḥ

भीम ने युद्ध में शल्य को नौ लोहे के बाणों से, भगदत्त को तीन से और कृतवर्मा को आठ से बींधकर,

श्लोक 35 (6.113.35)

द्वाभ्यां द्वाभ्यां तु विव्याध गौतमप्रभृतीन्रथान् । तेऽपि तं समरे राजन्विव्यधुर्निशितैः शरैः ॥

dvābhyāṃ dvābhyāṃ tu vivyādha gautamaprabhṛtīnrathān | te'pi taṃ samare rājanvivyadhurniśitaiḥ śaraiḥ

गौतम आदि अन्य रथियों को दो-दो बाणों से बींधा; हे राजन्, उन्होंने भी युद्ध में उन्हें तीखे बाणों से बींधा।

श्लोक 36 (6.113.36)

स तथा पीड्यमानोऽपि सर्वशस्त्रैर्महारथैः । मत्वा तृणेन तांस्तुल्यान्विचचार गतव्यथः ॥

sa tathā pīḍyamāno'pi sarvaśastrairmahārathaiḥ | matvā tṛṇena tāṃstulyānvicacāra gatavyathaḥ

उन महारथियों द्वारा सब प्रकार के शस्त्रों से इस प्रकार पीड़ित किए जाने पर भी वे उन्हें तिनके के समान समझकर निर्भय विचरते रहे।

श्लोक 37 (6.113.37)

ते चापि रथिनां श्रेष्ठा भीमाय निशिताञ्शरान् । प्रेषयामासुरव्यग्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

te cāpi rathināṃ śreṣṭhā bhīmāya niśitāñśarān | preṣayāmāsuravyagrāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

वे श्रेष्ठ रथी भी बिना घबराए भीम पर सैकड़ों और हजारों तीखे बाण छोड़ते रहे।

श्लोक 38 (6.113.38)

तस्य शक्तिं महावेगां भगदत्तो महारथः । चिक्षेप समरे वीरः स्वर्णदण्डां महामते ॥

tasya śaktiṃ mahāvegāṃ bhagadatto mahārathaḥ | cikṣepa samare vīraḥ svarṇadaṇḍāṃ mahāmate

हे महामति, महारथी वीर भगदत्त ने युद्ध में उन पर सोने के दण्ड वाली महावेगशालिनी शक्ति फेंकी।

श्लोक 39 (6.113.39)

तोमरं सैन्धवो राजा पट्टसं च महाभुजः । शतघ्नीं च कृपो राजञ्छरं शल्यश्च संयुगे ॥

tomaraṃ saindhavo rājā paṭṭasaṃ ca mahābhujaḥ | śataghnīṃ ca kṛpo rājañcharaṃ śalyaśca saṃyuge

महाबाहु सिन्धुराज ने तोमर और पट्टिश, हे राजन्, कृप ने शतघ्नी और शल्य ने युद्ध में बाण चलाया।

श्लोक 40 (6.113.40)

अथेतरे महेष्वासाः पञ्च पञ्च शिलीमुखान् । भीमसेनं समुद्दिश्य प्रेषयामासुरोजसा ॥

athetare maheṣvāsāḥ pañca pañca śilīmukhān | bhīmasenaṃ samuddiśya preṣayāmāsurojasā

तब अन्य महाधनुर्धरों ने पूरे बल से भीमसेन को लक्ष्य करके पाँच-पाँच बाण छोड़े।

श्लोक 41 (6.113.41)

तोमरं च द्विधा चक्रे क्षुरप्रेणानिलात्मजः । पट्टसं च त्रिभिर्बाणैश्चिच्छेद तिलकाण्डवत् ॥

tomaraṃ ca dvidhā cakre kṣurapreṇānilātmajaḥ | paṭṭasaṃ ca tribhirbāṇaiściccheda tilakāṇḍavat

वायुपुत्र ने क्षुरप्र बाण से तोमर के दो टुकड़े कर दिए और तीन बाणों से पट्टिश को तिल के डंठल की तरह काट डाला।

श्लोक 42 (6.113.42)

स बिभेद शतघ्नीं च नवभिः कङ्कपत्रिभिः । मद्रराजप्रयुक्तं च शरं छित्त्वा महारथः ॥

sa bibheda śataghnīṃ ca navabhiḥ kaṅkapatribhiḥ | madrarājaprayuktaṃ ca śaraṃ chittvā mahārathaḥ

उन्होंने कंकपत्र वाले नौ बाणों से शतघ्नी को तोड़ डाला, और मद्रराज के चलाए बाण को काटकर उस महारथी ने

श्लोक 43 (6.113.43)

शक्तिं चिच्छेद सहसा भगदत्तेरितां रणे । तथेतराञ्शरान्घोराञ्शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

śaktiṃ ciccheda sahasā bhagadatteritāṃ raṇe | tathetarāñśarānghorāñśaraiḥ sannataparvabhiḥ

युद्ध में भगदत्त की फेंकी शक्ति को सहसा काट डाला। फिर दूसरे भयानक बाणों को झुकी गाँठों वाले अपने बाणों से

श्लोक 44 (6.113.44)

भीमसेनो रणश्लाघी त्रिधैकैकं समाच्छिनत् । तांश्च सर्वान्महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् ॥

bhīmaseno raṇaślāghī tridhaikaikaṃ samācchinat | tāṃśca sarvānmaheṣvāsāṃstribhistribhiratāḍayat

युद्ध में गौरव पाने वाले भीमसेन ने एक-एक करके तीन-तीन टुकड़ों में काट डाला, और उन सब महाधनुर्धरों को तीन-तीन बाणों से मारा।

श्लोक 45 (6.113.45)

ततो धनञ्जयस्तत्र वर्तमाने महारणे । आजगाम रथेनाजौ भीमं दृष्ट्वा महारथम् ॥

tato dhanañjayastatra vartamāne mahāraṇe | ājagāma rathenājau bhīmaṃ dṛṣṭvā mahāratham

तब उस महायुद्ध के चलते धनञ्जय रथ पर वहाँ युद्ध में आ पहुँचे, महारथी भीम को

श्लोक 46 (6.113.46)

निघ्नन्तं समरे शत्रून्योधयानं च सायकैः । तौ तु तत्र महात्मानौ समेतौ वीक्ष्य पाण्डवौ ॥

nighnantaṃ samare śatrūnyodhayānaṃ ca sāyakaiḥ | tau tu tatra mahātmānau sametau vīkṣya pāṇḍavau

युद्ध में शत्रुओं को मारते और बाणों से उनसे लड़ते देखकर। उन दोनों महात्मा पाण्डवों को वहाँ एक साथ देखकर

श्लोक 47 (6.113.47)

न शशंसुर्जयं तत्र तावकाः पुरुषर्षभाः । अथार्जुनो रणे भीमं योधयन्तं महारथान् ॥

na śaśaṃsurjayaṃ tatra tāvakāḥ puruṣarṣabhāḥ | athārjuno raṇe bhīmaṃ yodhayantaṃ mahārathān

आपके श्रेष्ठ पुरुषों ने वहाँ विजय की आशा छोड़ दी। तब अर्जुन, जब भीम महारथियों से लड़ रहे थे,

श्लोक 48 (6.113.48)

भीष्मस्य निधनाकाङ्क्षी पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । आससाद रणे वीरांस्तावकान्दश भारत ॥

bhīṣmasya nidhanākāṅkṣī puraskṛtya śikhaṇḍinam | āsasāda raṇe vīrāṃstāvakāndaśa bhārata

भीष्म के वध की इच्छा से शिखण्डी को आगे करके, हे भारत, युद्ध में आपके दस वीरों पर जा पहुँचे,

श्लोक 49 (6.113.49)

ये स्म भीमं रणे राजन्योधयन्तो व्यवस्थिताः । बीभत्सुस्तानथाविध्यद्भीमस्य प्रियकाम्यया ॥

ye sma bhīmaṃ raṇe rājanyodhayanto vyavasthitāḥ | bībhatsustānathāvidhyadbhīmasya priyakāmyayā

जो, हे राजन्, युद्ध में भीम से लड़ते हुए डटे थे; और बीभत्सु ने भीम का हित चाहते हुए उन्हें बींध डाला।

श्लोक 50 (6.113.50)

ततो दुर्योधनो राजा सुशर्माणमचोदयत् । अर्जुनस्य वधार्थाय भीमसेनस्य चोभयोः ॥

tato duryodhano rājā suśarmāṇamacodayat | arjunasya vadhārthāya bhīmasenasya cobhayoḥ

तब राजा दुर्योधन ने अर्जुन और भीमसेन दोनों के वध के लिए सुशर्मा को प्रेरित किया।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 51 (6.113.51)

सुशर्मन्गच्छ शीघ्रं त्वं बलौघैः परिवारितः । जहि पाण्डुसुतावेतौ धनञ्जयवृकोदरौ ॥

suśarmangaccha śīghraṃ tvaṃ balaughaiḥ parivāritaḥ | jahi pāṇḍusutāvetau dhanañjayavṛkodarau

"सुशर्मा, सेना-समूहों से घिरे हुए तुम शीघ्र जाओ और इन दोनों पाण्डुपुत्रों — धनञ्जय और वृकोदर — को मार डालो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 52 (6.113.52)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य त्रैगर्तः प्रस्थलाधिपः । अभिद्रुत्य रणे भीममर्जुनं चैव धन्विनौ ॥

tacchrutvā vacanaṃ tasya traigartaḥ prasthalādhipaḥ | abhidrutya raṇe bhīmamarjunaṃ caiva dhanvinau

उनकी बात सुनकर प्रस्थल के स्वामी त्रिगर्तराज ने युद्ध में दोनों धनुर्धर भीम और अर्जुन पर धावा बोलकर

श्लोक 53 (6.113.53)

रथैरनेकसाहस्रैः समन्तात्पर्यवारयत् । ततः प्रववृते युद्धमर्जुनस्य परैः सह ॥

rathairanekasāhasraiḥ samantātparyavārayat | tataḥ pravavṛte yuddhamarjunasya paraiḥ saha

अनेक सहस्र रथों से उन्हें चारों ओर से घेर लिया। तब शत्रुओं के साथ अर्जुन का युद्ध छिड़ गया।

अध्याय 112अध्याय-सूचीअध्याय 114