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भीष्म पर्व · अध्याय 114

भीम और अर्जुन द्वारा कौरव-पंक्तियों का संहार

दसवें दिन अर्जुन और भीम एक साथ शल्य, कृप, सुशर्मा, जयद्रथ, धृतराष्ट्र के पुत्रों और अन्य सेनानायकों से भिड़ते हैं और रणभूमि को शवों से पाट देते हैं। शल्य अर्जुन, श्रीकृष्ण और भीम को घायल करते हैं; द्रोण और मगधराज जयत्सेन युद्ध में आ पहुँचते हैं, भीम जयत्सेन को भगा देते हैं और द्रोण से बाणों का आदान-प्रदान करते हैं, तथा अर्जुन सुशर्मा की सेना को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। फिर पाण्डव शिखण्डी को आगे करके भीष्म पर टूट पड़ते हैं, जिन पर इस पूरे युद्ध-रूपी जुए का दाँव लगा है, और भीष्म उनके आक्रमण को वैसे ही झेलते हैं जैसे महासागर तट से जा मिलता है।

अध्याय 113अध्याय-सूचीअध्याय 115

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.114.1)

अर्जुनस्तु रणे शल्यं यतमानं महारथम् । छादयामास समरे शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

arjunastu raṇe śalyaṃ yatamānaṃ mahāratham | chādayāmāsa samare śaraiḥ sannataparvabhiḥ

उधर रणभूमि में अर्जुन ने पूरे यत्न से लड़ रहे महारथी शल्य को चिकनी गाँठों वाले बाणों से ढक दिया।

श्लोक 2 (6.114.2)

सुशर्माणं कृपं चैव त्रिभिस्त्रिभिरविध्यत । प्राग्ज्योतिषं च समरे सैन्धवं च जयद्रथम् ॥

suśarmāṇaṃ kṛpaṃ caiva tribhistribhiravidhyata | prāgjyotiṣaṃ ca samare saindhavaṃ ca jayadratham

उन्होंने सुशर्मा और कृप को तीन-तीन बाणों से बींधा; और उस युद्ध में प्राग्ज्योतिष के राजा तथा सिन्धुराज जयद्रथ को,

श्लोक 3 (6.114.3)

चित्रसेनं विकर्णं च कृतवर्माणमेव च । दुर्मर्षणं च राजेन्द्र ह्यावन्त्यौ च महारथौ ॥

citrasenaṃ vikarṇaṃ ca kṛtavarmāṇameva ca | durmarṣaṇaṃ ca rājendra hyāvantyau ca mahārathau

चित्रसेन, विकर्ण और कृतवर्मा को भी, हे राजेन्द्र, दुर्मर्षण को और अवन्ती के दोनों महारथियों को,

श्लोक 4 (6.114.4)

एकैकं त्रिभिरानर्च्छत्कङ्कबर्हिणवाजितैः । शरैरतिरथो युद्धे पीडयन्वाहिनीं तव ॥

ekaikaṃ tribhirānarcchatkaṅkabarhiṇavājitaiḥ | śarairatiratho yuddhe pīḍayanvāhinīṃ tava

उस अतिरथी ने युद्ध में आपकी सेना को पीड़ित करते हुए इनमें से एक-एक को कंक और मोर के पंखों वाले तीन-तीन बाणों से मारा।

श्लोक 5 (6.114.5)

जयद्रथो रणे पार्थं विद्ध्वा भारत सायकैः । भीमं विव्याध तरसा चित्रसेनरथे स्थितः ॥

jayadratho raṇe pārthaṃ viddhvā bhārata sāyakaiḥ | bhīmaṃ vivyādha tarasā citrasenarathe sthitaḥ

हे भारत, चित्रसेन के रथ पर खड़े जयद्रथ ने रण में पार्थ को बाणों से बींधकर बड़े वेग से भीम को भी बींध डाला।

श्लोक 6 (6.114.6)

शल्यश्च समरे जिष्णुं कृपश्च रथिनां वरः । विव्याधाते महाराज बहुधा मर्मभेदिभिः ॥

śalyaśca samare jiṣṇuṃ kṛpaśca rathināṃ varaḥ | vivyādhāte mahārāja bahudhā marmabhedibhiḥ

हे महाराज, शल्य ने और रथियों में श्रेष्ठ कृप ने युद्ध में जिष्णु (अर्जुन) को मर्मभेदी बाणों से बार-बार बींधा।

श्लोक 7 (6.114.7)

चित्रसेनादयश्चैव पुत्रास्तव विशांपते । पञ्चभिः पञ्चभिस्तूर्णं संयुगे निशितैः शरैः ॥

citrasenādayaścaiva putrāstava viśāṃpate | pañcabhiḥ pañcabhistūrṇaṃ saṃyuge niśitaiḥ śaraiḥ

हे प्रजानाथ, चित्रसेन आदि आपके पुत्रों ने भी उस संग्राम में तुरंत पाँच-पाँच तीखे बाणों से

श्लोक 8 (6.114.8)

आजघ्नुरर्जुनं सङ्ख्ये भीमसेनं च मारिष । तौ तत्र रथिनां श्रेष्ठौ कौन्तेयौ भरतर्षभौ ॥

ājaghnurarjunaṃ saṅkhye bhīmasenaṃ ca māriṣa | tau tatra rathināṃ śreṣṭhau kaunteyau bharatarṣabhau

हे आर्य, युद्ध में अर्जुन और भीमसेन पर प्रहार किया। रथियों में श्रेष्ठ, भरतवंश के वे दोनों श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र

श्लोक 9 (6.114.9)

अपीडयेतां समरे त्रिगर्तानां महद्बलम् । सुशर्मापि रणे पार्थं शरैर्नवभिराशुगैः ॥

apīḍayetāṃ samare trigartānāṃ mahadbalam | suśarmāpi raṇe pārthaṃ śarairnavabhirāśugaiḥ

रणभूमि में त्रिगर्तों की विशाल सेना को पीड़ित करने लगे। सुशर्मा ने भी युद्ध में नौ शीघ्रगामी बाणों से पार्थ पर प्रहार करके

श्लोक 10 (6.114.10)

ननाद बलवन्नादं त्रासयानो महद्बलम् । अन्ये च रथिनः शूरा भीमसेनधनञ्जयौ ॥

nanāda balavannādaṃ trāsayāno mahadbalam | anye ca rathinaḥ śūrā bhīmasenadhanañjayau

विशाल सेना को भयभीत करते हुए बड़े ज़ोर से गर्जना की। दूसरे शूरवीर रथियों ने भी भीमसेन और धनञ्जय को

श्लोक 11 (6.114.11)

विव्यधुर्निशितैर्बाणै रुक्मपुङ्खैरजिह्मगैः । तेषां च रथिनां मध्ये कौन्तेयौ भरतर्षभौ ॥

vivyadhurniśitairbāṇai rukmapuṅkhairajihmagaiḥ | teṣāṃ ca rathināṃ madhye kaunteyau bharatarṣabhau

सुनहरे पंखों वाले, सीधे जाने वाले तीखे बाणों से बींधा। उन रथियों के बीच भरतश्रेष्ठ दोनों कुन्तीपुत्र

श्लोक 12 (6.114.12)

क्रीडमानौ रथोदारौ चित्ररूपौ व्यदृश्यताम् । आमिषेप्सू गवां मध्ये सिंहाविव मदोत्कटौ ॥

krīḍamānau rathodārau citrarūpau vyadṛśyatām | āmiṣepsū gavāṃ madhye siṃhāviva madotkaṭau

युद्ध में क्रीड़ा करते हुए वे दोनों श्रेष्ठ रथी अद्भुत रूप में दिखाई दिए, मानो गौओं के झुंड के बीच मांस के लोभी, मद से उन्मत्त दो सिंह हों।

श्लोक 13 (6.114.13)

छित्त्वा धनूंषि शूराणां शरांश्च बहुधा रणे । पातयामासतुर्वीरौ शिरांसि शतशो नृणाम् ॥

chittvā dhanūṃṣi śūrāṇāṃ śarāṃśca bahudhā raṇe | pātayāmāsaturvīrau śirāṃsi śataśo nṛṇām

रण में योद्धाओं के धनुषों और बाणों को अनेक प्रकार से काटकर उन दोनों वीरों ने सैकड़ों मनुष्यों के सिर गिरा दिए।

श्लोक 14 (6.114.14)

रथाश्च बहवो भग्ना हयाश्च शतशो हताः । गजाश्च सगजारोहाः पेतुरुर्व्यां महाहवे ॥

rathāśca bahavo bhagnā hayāśca śataśo hatāḥ | gajāśca sagajārohāḥ petururvyāṃ mahāhave

उस महायुद्ध में बहुत-से रथ टूट गए, सैकड़ों घोड़े मारे गए, और सवारों सहित हाथी धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 15 (6.114.15)

रथिनः सादिनश्चापि तत्रतत्र निषूदिताः । दृश्यन्ते बहवो राजन्वेष्टमानाः समन्ततः ॥

rathinaḥ sādinaścāpi tatratatra niṣūditāḥ | dṛśyante bahavo rājanveṣṭamānāḥ samantataḥ

हे राजन्, जहाँ-तहाँ मारे गए बहुत-से रथी और घुड़सवार चारों ओर छटपटाते दिखाई दे रहे थे।

श्लोक 16 (6.114.16)

हतैर्गजपदात्योघैर्वाजिभिश्च निषूदितैः । रथैश्च बहुधा भग्नैः समास्तीर्यत मेदिनी ॥

hatairgajapadātyoghairvājibhiśca niṣūditaiḥ | rathaiśca bahudhā bhagnaiḥ samāstīryata medinī

मारे गए हाथियों और पैदलों के समूहों से, संहार किए गए घोड़ों से और अनेक प्रकार से टूटे रथों से धरती पट गई;

श्लोक 17 (6.114.17)

छत्रैश्च बहुधा च्छिन्नैर्ध्वजैश्च विनिपातितैः । अङ्कुशैरपविद्धैश्च परिस्तोमैश्च भारत ॥

chatraiśca bahudhā cchinnairdhvajaiśca vinipātitaiḥ | aṅkuśairapaviddhaiśca paristomaiśca bhārata

हे भारत, टुकड़े-टुकड़े हुए छत्रों से, गिराई गई ध्वजाओं से, इधर-उधर फेंके गए अंकुशों से और हाथियों की झूलों से;

श्लोक 18 (6.114.18)

केयूरैरङ्गदैर्हारै राङ्कवैर्मृदितैस्तथा । उष्णीषैर्ऋष्टिभिश्चैव चामरव्यजनैरपि ॥

keyūrairaṅgadairhārai rāṅkavairmṛditaistathā | uṣṇīṣairṛṣṭibhiścaiva cāmaravyajanairapi

केयूरों, अंगदों और हारों से, रौंदे गए ऊनी वस्त्रों से, पगड़ियों और भालों से, तथा चँवरों और पंखों से;

श्लोक 19 (6.114.19)

तत्रतत्रापविद्धैश्च बाहुभिश्चन्दनोक्षितैः । ऊरुभिश्च नरेन्द्राणां समास्तीर्यत मेदिनी ॥

tatratatrāpaviddhaiśca bāhubhiścandanokṣitaiḥ | ūrubhiśca narendrāṇāṃ samāstīryata medinī

और जहाँ-तहाँ पड़ी राजाओं की चन्दन-लिप्त भुजाओं और जाँघों से धरती पट गई।

श्लोक 20 (6.114.20)

तत्राद्भुतमपश्याम रणे पार्थस्य विक्रमम् । शरैः संवार्य तान्वीरान्यज्जघान महाबलः ॥

tatrādbhutamapaśyāma raṇe pārthasya vikramam | śaraiḥ saṃvārya tānvīrānyajjaghāna mahābalaḥ

वहाँ हमने रण में पार्थ का अद्भुत पराक्रम देखा, कि उस महाबली ने बाणों से उन वीरों को रोककर मार गिराया।

श्लोक 21 (6.114.21)

पुत्रस्तु तव तं दृष्ट्वा भीमार्जुनपराक्रमम् । गाङ्गेयस्य रथाभ्याशमुपजग्मे महाबलः ॥

putrastu tava taṃ dṛṣṭvā bhīmārjunaparākramam | gāṅgeyasya rathābhyāśamupajagme mahābalaḥ

आपका महाबली पुत्र भीम और अर्जुन का वह पराक्रम देखकर गंगापुत्र भीष्म के रथ के समीप जा पहुँचा।

श्लोक 22 (6.114.22)

कृपश्च कृतवर्मा च सैन्धवश्च जयद्रथः । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ नाजहुः संयुगं तदा ॥

kṛpaśca kṛtavarmā ca saindhavaśca jayadrathaḥ | vindānuvindāvāvantyau nājahuḥ saṃyugaṃ tadā

कृप, कृतवर्मा, सिन्धुराज जयद्रथ और अवन्ती के विन्द-अनुविन्द ने उस समय युद्ध नहीं छोड़ा।

श्लोक 23 (6.114.23)

ततो भीमो महेष्वासः फल्गुनश्च महारथः । कौरवाणां चमूं घोरां भृशं दुद्रुवतू रणे ॥

tato bhīmo maheṣvāsaḥ phalgunaśca mahārathaḥ | kauravāṇāṃ camūṃ ghorāṃ bhṛśaṃ dudruvatū raṇe

तब महान धनुर्धर भीम और महारथी फाल्गुन (अर्जुन) ने रण में कौरवों की भयंकर सेना को बुरी तरह खदेड़ दिया।

श्लोक 24 (6.114.24)

ततो बर्हिणवाजानामयुतान्यर्बुदानि च । धनञ्जयरथे तूर्णं पातयन्ति स्म भूमिपाः ॥

tato barhiṇavājānāmayutānyarbudāni ca | dhanañjayarathe tūrṇaṃ pātayanti sma bhūmipāḥ

तब राजाओं ने धनञ्जय के रथ पर तुरंत मोरपंखी बाणों की दस-दस हज़ार और करोड़ों की संख्या में वर्षा की।

श्लोक 25 (6.114.25)

ततस्ताञ्शरजालेन सन्निवार्य महारथान् । पार्थः समन्तात्समरे प्रेषयामास मृत्यवे ॥

tatastāñśarajālena sannivārya mahārathān | pārthaḥ samantātsamare preṣayāmāsa mṛtyave

तब पार्थ ने बाणों के जाल से उन महारथियों को चारों ओर से रोककर युद्ध में मृत्यु के पास भेज दिया।

श्लोक 26 (6.114.26)

शल्यस्तु समरे जिष्णुं क्रीडन्निव महारथः । आजघानोरसि क्रुद्धो भल्लैः सन्नतपर्वभिः ॥

śalyastu samare jiṣṇuṃ krīḍanniva mahārathaḥ | ājaghānorasi kruddho bhallaiḥ sannataparvabhiḥ

महारथी शल्य ने मानो खेल-खेल में क्रोधपूर्वक जिष्णु की छाती पर चिकनी गाँठों वाले भल्लों से प्रहार किया।

श्लोक 27 (6.114.27)

तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा हस्तावापं च पञ्चभिः । अथैनं सायकैस्तीक्ष्णैर्भृशं विव्याध मर्मणि ॥

tasya pārtho dhanuśchittvā hastāvāpaṃ ca pañcabhiḥ | athainaṃ sāyakaistīkṣṇairbhṛśaṃ vivyādha marmaṇi

पार्थ ने पाँच बाणों से उनका धनुष और हस्तत्राण काट डाला और फिर तीखे बाणों से उनके मर्मस्थानों को गहराई तक बींध दिया।

श्लोक 28 (6.114.28)

अथान्यद्धनुरादाय समरे भारसाधनम् । मद्रेश्वरो रणे जिष्णुं ताडयामास रोषितः ॥

athānyaddhanurādāya samare bhārasādhanam | madreśvaro raṇe jiṣṇuṃ tāḍayāmāsa roṣitaḥ

तब मद्रराज ने दूसरा, भार सहने में समर्थ धनुष उठाकर क्रोध में रण में जिष्णु पर प्रहार किया

श्लोक 29 (6.114.29)

त्रिभिः शरैर्महाराज वासुदेवं च पञ्चभिः । भीमसेनं च नवभिर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

tribhiḥ śarairmahārāja vāsudevaṃ ca pañcabhiḥ | bhīmasenaṃ ca navabhirbāhvorurasi cārpayat

हे महाराज, तीन बाणों से; और वासुदेव को पाँच बाणों से मारा, तथा भीमसेन की भुजाओं और छाती में नौ बाण धँसा दिए।

श्लोक 30 (6.114.30)

ततो द्रोणो महाराज मागधश्च महारथः । दुर्योधनसमादिष्टौ तं देशमुपजग्मतुः ॥

tato droṇo mahārāja māgadhaśca mahārathaḥ | duryodhanasamādiṣṭau taṃ deśamupajagmatuḥ

तब, हे महाराज, दुर्योधन की आज्ञा से द्रोण और मगध के महारथी (जयत्सेन) उस स्थान पर आ पहुँचे

श्लोक 31 (6.114.31)

यत्र पार्थो महाराज भीमसेनश्च पाण्डवः । कौरव्यस्य महासेनां जघ्नतुः सुमहारथौ ॥

yatra pārtho mahārāja bhīmasenaśca pāṇḍavaḥ | kauravyasya mahāsenāṃ jaghnatuḥ sumahārathau

जहाँ, हे महाराज, पार्थ और पाण्डुपुत्र भीमसेन, वे दोनों महारथी, कौरवराज की विशाल सेना का संहार कर रहे थे।

श्लोक 32 (6.114.32)

जयत्सेनस्तु समरे भीमं भीमायुधं युधि । विव्याध निशितैर्बाणैरष्टभिर्भरतर्षभ ॥

jayatsenastu samare bhīmaṃ bhīmāyudhaṃ yudhi | vivyādha niśitairbāṇairaṣṭabhirbharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, युद्धभूमि में जयत्सेन ने भयंकर आयुधों वाले भीम को आठ तीखे बाणों से बींधा।

श्लोक 33 (6.114.33)

तं भीमो दशभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः । सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥

taṃ bhīmo daśabhirviddhvā punarvivyādha pañcabhiḥ | sārathiṃ cāsya bhallena rathanīḍādapātayat

भीम ने उसे दस बाणों से बींधकर फिर पाँच बाणों से बींधा, और एक भल्ल से उसके सारथि को रथ की बैठक से गिरा दिया।

श्लोक 34 (6.114.34)

उद्भ्रांतैस्तुरगैः सोऽथ द्रवमाणैः समन्ततः । मागधोऽपसृतो राजा सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥

udbhrāṃtaisturagaiḥ so'tha dravamāṇaiḥ samantataḥ | māgadho'pasṛto rājā sarvasainyasya paśyataḥ

उसके घोड़े बिदककर चारों ओर भागने लगे, और मगधराज सारी सेना के देखते-देखते रणभूमि से दूर चला गया।

श्लोक 35 (6.114.35)

द्रोणश्च विवरं दृष्ट्वा भीमसेनं शिलीमुखैः । विव्याध बाणैर्निशितैः पञ्चषष्टिभिरायसैः ॥

droṇaśca vivaraṃ dṛṣṭvā bhīmasenaṃ śilīmukhaiḥ | vivyādha bāṇairniśitaiḥ pañcaṣaṣṭibhirāyasaiḥ

द्रोण ने अवसर देखकर भीमसेन को पैंसठ तीखे लोहे के बाणों से बींध दिया।

श्लोक 36 (6.114.36)

तं भीमः समरश्लाघी गुरुं पितृसमं रणे । विव्याध पञ्चभिर्भल्लैस्तथा षष्ट्या च भारत ॥

taṃ bhīmaḥ samaraślāghī guruṃ pitṛsamaṃ raṇe | vivyādha pañcabhirbhallaistathā ṣaṣṭyā ca bhārata

हे भारत, युद्ध पर गर्व करने वाले भीम ने पिता के समान अपने गुरु को रण में पाँच भल्लों से और फिर साठ बाणों से बींधा।

श्लोक 37 (6.114.37)

अर्जुनस्तु सुशर्माणं विद्ध्वा बहुभिरायसैः । व्यधमत्तस्य तत्सैन्यं महाभ्राणि यथाऽनिलः ॥

arjunastu suśarmāṇaṃ viddhvā bahubhirāyasaiḥ | vyadhamattasya tatsainyaṃ mahābhrāṇi yathā'nilaḥ

अर्जुन ने बहुत-से लोहे के बाणों से सुशर्मा को बींधकर उसकी सेना को वैसे ही तितर-बितर कर दिया जैसे वायु बड़े-बड़े बादलों को उड़ा देती है।

श्लोक 38 (6.114.38)

ततो भीष्मश्च राजा च कौसल्यश्च बृहद्बलः । समवर्तन्त संक्रुद्धा भीमसेनधनञ्जयौ ॥

tato bhīṣmaśca rājā ca kausalyaśca bṛhadbalaḥ | samavartanta saṃkruddhā bhīmasenadhanañjayau

तब भीष्म, राजा (दुर्योधन) और कोसलराज बृहद्बल क्रोध में भरकर भीमसेन और धनञ्जय की ओर मुड़े।

श्लोक 39 (6.114.39)

तथैव पाण्डवाः शूरा धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । अभ्यद्रवन्रणे भीष्मं व्यादितास्यमिवान्तकम् ॥

tathaiva pāṇḍavāḥ śūrā dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | abhyadravanraṇe bhīṣmaṃ vyāditāsyamivāntakam

इसी प्रकार शूरवीर पाण्डव और पृषतवंशी धृष्टद्युम्न मुँह फैलाए यमराज के समान भीष्म पर रण में टूट पड़े।

श्लोक 40 (6.114.40)

शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् । अभ्यद्रवत संहृष्टो भयं त्यक्त्वा महारथात् ॥

śikhaṇḍī tu samāsādya bharatānāṃ pitāmaham | abhyadravata saṃhṛṣṭo bhayaṃ tyaktvā mahārathāt

शिखण्डी भरतवंशियों के पितामह के पास पहुँचकर, उस महारथी का भय त्यागकर, हर्ष के साथ उन पर झपटा।

श्लोक 41 (6.114.41)

युधिष्ठिरमुखाः पार्थाः पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । अयोधयन्रणे भीष्मं सहिताः सर्वसृञ्जयैः ॥

yudhiṣṭhiramukhāḥ pārthāḥ puraskṛtya śikhaṇḍinam | ayodhayanraṇe bhīṣmaṃ sahitāḥ sarvasṛñjayaiḥ

युधिष्ठिर आदि पार्थ शिखण्डी को आगे करके सब सृञ्जयों के साथ मिलकर रण में भीष्म से लड़ने लगे।

श्लोक 42 (6.114.42)

तथैव तावकाः सर्वे पुरस्कृत्य यतव्रतम् । शिखण्डिप्रमुखान्पार्थान्योधयन्ति स्म संयुगे ॥

tathaiva tāvakāḥ sarve puraskṛtya yatavratam | śikhaṇḍipramukhānpārthānyodhayanti sma saṃyuge

उसी प्रकार आपके सब योद्धा दृढ़व्रती भीष्म को आगे करके उस संग्राम में शिखण्डी आदि पार्थों से लड़ने लगे।

श्लोक 43 (6.114.43)

ततः प्रववृते युद्धं कौरवाणां भयावहम् । तत्र पाण्डुसुतैः सार्धं भीष्मस्य विजयं प्रति ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ kauravāṇāṃ bhayāvaham | tatra pāṇḍusutaiḥ sārdhaṃ bhīṣmasya vijayaṃ prati

तब वहाँ पाण्डुपुत्रों के साथ भीष्म की विजय को लेकर ऐसा युद्ध छिड़ा जो कौरवों के लिए भयावह था।

श्लोक 44 (6.114.44)

तावकानां जये भीष्मो ग्लह आसीद्विशांपते । तत्र हि द्यूतमासक्तं विजयायेतराय वा ॥

tāvakānāṃ jaye bhīṣmo glaha āsīdviśāṃpate | tatra hi dyūtamāsaktaṃ vijayāyetarāya vā

हे प्रजानाथ, आपके पक्ष की विजय के लिए भीष्म ही दाँव थे; उन्हीं पर विजय या पराजय के लिए जुआ खेला जा रहा था।

श्लोक 45 (6.114.45)

धृष्टद्युम्नस्तु राजेन्द्र सर्वसैन्यान्यचोदयत् । अभ्यद्रवत गाङ्गेयं मा भैष्ट रथसत्तमाः ॥

dhṛṣṭadyumnastu rājendra sarvasainyānyacodayat | abhyadravata gāṅgeyaṃ mā bhaiṣṭa rathasattamāḥ

हे राजेन्द्र, धृष्टद्युम्न ने सारी सेनाओं को प्रेरित किया: "गंगापुत्र पर धावा बोलो! हे श्रेष्ठ रथियो, डरो मत!"

श्लोक 46 (6.114.46)

सेनापतिवचः श्रुत्वा पाण्डवानां वरूथिनी । भीष्मं समभ्ययात्तूर्णं प्राणांस्त्यक्त्वा महाहवे ॥

senāpativacaḥ śrutvā pāṇḍavānāṃ varūthinī | bhīṣmaṃ samabhyayāttūrṇaṃ prāṇāṃstyaktvā mahāhave

सेनापति के वचन सुनकर पाण्डवों की सेना उस महायुद्ध में प्राणों का मोह छोड़कर तुरंत भीष्म पर चढ़ आई।

श्लोक 47 (6.114.47)

भीष्मोऽपि रथिनां श्रेष्ठः प्रतिजग्राह तां चमूम् । आपतन्तीं महाराज वेलामिव महोदधिः ॥

bhīṣmo'pi rathināṃ śreṣṭhaḥ pratijagrāha tāṃ camūm | āpatantīṃ mahārāja velāmiva mahodadhiḥ

हे महाराज, रथियों में श्रेष्ठ भीष्म ने भी अपनी ओर उमड़ती उस सेना को वैसे ही झेला जैसे महासागर तट से जा टकराता है।

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