भीष्म पर्व · अध्याय 115
भीष्म का युधिष्ठिर से अपने वध का यत्न करने को कहना
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि दसवें दिन भीष्म ने कैसे युद्ध किया, और सञ्जय बताते हैं कि दस दिनों तक पाण्डव सेना का संहार करने के बाद भीष्म जीवन से विरक्त हो गए और उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि अर्जुन को आगे करके उनके वध का यत्न करो। युधिष्ठिर और धृष्टद्युम्न शिखण्डी को आगे रखकर भीष्म को जीतने के लिए अपनी सेना को उत्साहित करते हैं, जबकि दुर्योधन के राजा, द्रोण और दुःशासन भीष्म की रक्षा के लिए उन्हें घेर लेते हैं। योद्धा रणभूमि में जोड़ियाँ बनाकर भिड़ जाते हैं, और भीष्म को लेकर वैसा ही भीषण युद्ध छिड़ जाता है जैसे मांस के एक टुकड़े के लिए दो बाज़ लड़ते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.115.1)
कथं शान्तनवो भीष्मो दशमेऽहनि सञ्जय । अयुध्यत महावीर्यः पाण्डवैः सह सृञ्जयैः ॥
kathaṃ śāntanavo bhīṣmo daśame'hani sañjaya | ayudhyata mahāvīryaḥ pāṇḍavaiḥ saha sṛñjayaiḥ
हे सञ्जय, दसवें दिन महापराक्रमी शान्तनुपुत्र भीष्म ने पाण्डवों और सृञ्जयों के साथ किस प्रकार युद्ध किया?
श्लोक 2 (6.115.2)
कुरवश्च कथं युद्धे पाण्डवान्प्रत्यवारयन् । आचक्ष्व मे महायुद्धं भीष्मस्याहवशोभिनः ॥
kuravaśca kathaṃ yuddhe pāṇḍavānpratyavārayan | ācakṣva me mahāyuddhaṃ bhīṣmasyāhavaśobhinaḥ
और कौरवों ने युद्ध में पाण्डवों को कैसे रोका? युद्ध में शोभा पाने वाले भीष्म के उस महायुद्ध का वर्णन मुझसे करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (6.115.3)
कुरवः पाण्डवैः सार्धं यदयुध्यन्त भारत । यथा च तदभूद्युद्धं तत्तु वक्ष्यामि सांप्रतम् ॥
kuravaḥ pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ yadayudhyanta bhārata | yathā ca tadabhūdyuddhaṃ tattu vakṣyāmi sāṃpratam
हे भारत, कौरवों ने पाण्डवों के साथ जैसे युद्ध किया और वह युद्ध जिस प्रकार हुआ, वह मैं अब आपको बताऊँगा।
श्लोक 4 (6.115.4)
गमिताः परलोकाय परमास्त्रैः किरीटिना । अहन्यहनि संप्राप्ते तावकानां महारथाः ॥
gamitāḥ paralokāya paramāstraiḥ kirīṭinā | ahanyahani saṃprāpte tāvakānāṃ mahārathāḥ
दिन-प्रतिदिन, ज्यों-ज्यों दिन आता गया, किरीटी (अर्जुन) ने अपने उत्तम अस्त्रों से आपके पक्ष के महारथियों को परलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 5 (6.115.5)
यथाप्रतिज्ञं कौरव्यः स चापि समितिंजयः । पार्थानामकरोद्भीष्मः सततं समिति क्षयम् ॥
yathāpratijñaṃ kauravyaḥ sa cāpi samitiṃjayaḥ | pārthānāmakarodbhīṣmaḥ satataṃ samiti kṣayam
और युद्ध में विजयी कुरुवंशी भीष्म भी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार निरन्तर रणभूमि में पार्थों का संहार करते रहे।
श्लोक 6 (6.115.6)
कुरुभिः सहितं भीष्मं युध्यमानं परंतप । अर्जुनं च सपाञ्चाल्यं दृष्ट्वा संशयिता जनाः ॥
kurubhiḥ sahitaṃ bhīṣmaṃ yudhyamānaṃ paraṃtapa | arjunaṃ ca sapāñcālyaṃ dṛṣṭvā saṃśayitā janāḥ
हे परंतप, कौरवों के साथ लड़ते भीष्म को और पाञ्चालों के साथ अर्जुन को देखकर लोग संशय में पड़ गए कि किसकी जीत होगी।
श्लोक 7 (6.115.7)
दशमेऽहनि तस्मिंस्तु भीष्मार्जुनसमागमे । अवर्तत महारौद्रः सततं समिति क्षयः ॥
daśame'hani tasmiṃstu bhīṣmārjunasamāgame | avartata mahāraudraḥ satataṃ samiti kṣayaḥ
उस दसवें दिन भीष्म और अर्जुन के आमने-सामने होने पर युद्ध में निरन्तर अत्यन्त भयंकर संहार हुआ।
श्लोक 8 (6.115.8)
तस्मिन्नयुतशो राजन्भूयश्च स परंतपः । भीष्मः शान्तनवो योधाञ्जघान परमास्त्रवित् ॥
tasminnayutaśo rājanbhūyaśca sa paraṃtapaḥ | bhīṣmaḥ śāntanavo yodhāñjaghāna paramāstravit
हे राजन्, उसमें उत्तम अस्त्रों के ज्ञाता, शत्रुओं को तपाने वाले शान्तनुपुत्र भीष्म ने दस-दस हज़ार और उससे भी अधिक योद्धाओं को मारा।
श्लोक 9 (6.115.9)
येषामज्ञातकल्पानि नामगोत्राणि पार्थिव । ते हतास्तत्र भीष्मेण शूराः सर्वेऽनिवर्तिनः ॥
yeṣāmajñātakalpāni nāmagotrāṇi pārthiva | te hatāstatra bhīṣmeṇa śūrāḥ sarve'nivartinaḥ
हे पृथ्वीपति, जिनके नाम और गोत्र लगभग अज्ञात थे, ऐसे पीठ न दिखाने वाले वे सब शूरवीर वहाँ भीष्म के हाथों मारे गए।
श्लोक 10 (6.115.10)
दशाहानि तथा तप्त्वा भीष्मः पाण्डववाहिनीम् । निरविद्यत धर्मात्मा जीविते स परंतपः ॥
daśāhāni tathā taptvā bhīṣmaḥ pāṇḍavavāhinīm | niravidyata dharmātmā jīvite sa paraṃtapaḥ
इस प्रकार दस दिनों तक पाण्डव सेना को संतप्त करके धर्मात्मा, शत्रुतापन भीष्म जीवन से विरक्त हो गए।
श्लोक 11 (6.115.11)
स क्षिप्रं वधमन्विच्छन्नात्मनोऽभिमुखं रणे । न हन्यां मानवश्रेष्ठान्संग्रामेऽभिमुखानिति ॥
sa kṣipraṃ vadhamanvicchannātmano'bhimukhaṃ raṇe | na hanyāṃ mānavaśreṣṭhānsaṃgrāme'bhimukhāniti
युद्ध में शत्रु के सामने रहते हुए शीघ्र अपनी मृत्यु चाहते हुए, और यह सोचकर कि "अब मैं संग्राम में अपने सामने आए श्रेष्ठ मनुष्यों को नहीं मारूँगा",
श्लोक 12 (6.115.12)
चिन्तयित्वा महाबाहुः पिता देवव्रतस्तव । अभ्याशस्थं महाराज पाण्डवं वाक्यमब्रवीत् ॥
cintayitvā mahābāhuḥ pitā devavratastava | abhyāśasthaṃ mahārāja pāṇḍavaṃ vākyamabravīt
हे महाराज, ऐसा विचार करके आपके पिता महाबाहु देवव्रत ने पास खड़े पाण्डुपुत्र से यह बात कही।
भीष्म उवाच
श्लोक 13 (6.115.13)
युधिष्ठिर महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । शृणुष्व वचनं तात धर्म्यं स्वर्ग्यं च जल्पतः ॥
yudhiṣṭhira mahāprājña sarvaśāstraviśārada | śṛṇuṣva vacanaṃ tāta dharmyaṃ svargyaṃ ca jalpataḥ
हे महाप्राज्ञ, सब शास्त्रों में निपुण युधिष्ठिर, तात, मेरी धर्मसम्मत और स्वर्ग देने वाली बात सुनो।
श्लोक 14 (6.115.14)
निर्विण्णोऽस्मि भृशं तात देहेनानेन भारत । घ्नतश्च मे गतः कालः सुबहून्प्राणिनो रणे ॥
nirviṇṇo'smi bhṛśaṃ tāta dehenānena bhārata | ghnataśca me gataḥ kālaḥ subahūnprāṇino raṇe
हे भारत, तात, मैं इस शरीर से अत्यन्त ऊब गया हूँ; युद्ध में बहुत-से प्राणियों को मारते-मारते मेरा समय बीत गया।
श्लोक 15 (6.115.15)
तस्मात्पार्थं पुरोधाय पाञ्चालान्सृञ्जयांस्तथा । मद्वधे क्रियतां यत्नो मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥
tasmātpārthaṃ purodhāya pāñcālānsṛñjayāṃstathā | madvadhe kriyatāṃ yatno mama cedicchasi priyam
इसलिए यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो पार्थ को आगे करके, पाञ्चालों और सृञ्जयों के साथ, मेरे वध का यत्न करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 16 (6.115.16)
तस्य तन्मतमाज्ञाय पाण्डवः सत्यदर्शनः । भीष्मं प्रति ययौ राजा संग्रामे सह सृञ्जयैः ॥
tasya tanmatamājñāya pāṇḍavaḥ satyadarśanaḥ | bhīṣmaṃ prati yayau rājā saṃgrāme saha sṛñjayaiḥ
उनका अभिप्राय समझकर सत्यदर्शी पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर सृञ्जयों के साथ संग्राम में भीष्म की ओर बढ़े।
श्लोक 17 (6.115.17)
धृष्टद्युम्नस्ततो राजन्पाण्डवश्च युधिष्ठिरः । श्रुत्वा भीष्मस्य तां वाचं चोदयामासतुर्बलम् ॥
dhṛṣṭadyumnastato rājanpāṇḍavaśca yudhiṣṭhiraḥ | śrutvā bhīṣmasya tāṃ vācaṃ codayāmāsaturbalam
हे राजन्, तब धृष्टद्युम्न और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने भीष्म की वह बात सुनकर अपनी सेना को प्रेरित किया:
धृष्टद्युम्नयुधिष्ठिरावूचतुः
श्लोक 18 (6.115.18)
अभिद्रवध्वं युद्ध्यध्वं भीष्मं जयत संयुगे । रक्षिताः सत्यसन्धेन जिष्णुना रिपुजिष्णुना ॥
abhidravadhvaṃ yuddhyadhvaṃ bhīṣmaṃ jayata saṃyuge | rakṣitāḥ satyasandhena jiṣṇunā ripujiṣṇunā
"धावा बोलो, युद्ध करो, रण में भीष्म को जीतो; सत्यप्रतिज्ञ, शत्रुओं को जीतने वाले जिष्णु (अर्जुन) तुम्हारी रक्षा कर रहे हैं।
श्लोक 19 (6.115.19)
अयं चापि महेष्वासः पार्षतो वाहिनीपतिः । भीमसेनश्च समरे पालयिष्यति वो ध्रुवम् ॥
ayaṃ cāpi maheṣvāsaḥ pārṣato vāhinīpatiḥ | bhīmasenaśca samare pālayiṣyati vo dhruvam
यह महान धनुर्धर, सेनापति पृषतपुत्र धृष्टद्युम्न और भीमसेन भी रणभूमि में निश्चय ही तुम्हारी रक्षा करेंगे।
श्लोक 20 (6.115.20)
मा वो भीष्माद्भयं किंचिदस्त्वद्य युधि सृञ्जयाः । ध्रुवं भीष्मं विजेष्यामः पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ॥
mā vo bhīṣmādbhayaṃ kiṃcidastvadya yudhi sṛñjayāḥ | dhruvaṃ bhīṣmaṃ vijeṣyāmaḥ puraskṛtya śikhaṇḍinam
हे सृञ्जयो, आज युद्ध में तुम्हें भीष्म से कुछ भी भय न हो। शिखण्डी को आगे करके हम निश्चय ही भीष्म को जीत लेंगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 21 (6.115.21)
ते तथा समयं कृत्वा दशमेऽहनि पाण्डवाः । ब्रह्मलोकपरा भूत्वा संजग्मुः क्रोधमूर्च्छिताः ॥
te tathā samayaṃ kṛtvā daśame'hani pāṇḍavāḥ | brahmalokaparā bhūtvā saṃjagmuḥ krodhamūrcchitāḥ
दसवें दिन इस प्रकार निश्चय करके पाण्डव ब्रह्मलोक को ही अपना लक्ष्य बनाकर क्रोध से भरे हुए युद्ध में उतरे।
श्लोक 22 (6.115.22)
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य पाण्डवं च धनञ्जयम् । भीष्मस्य पातने यत्नं परमं ते समास्थिताः ॥
śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya pāṇḍavaṃ ca dhanañjayam | bhīṣmasya pātane yatnaṃ paramaṃ te samāsthitāḥ
शिखण्डी और पाण्डुपुत्र धनञ्जय को आगे करके उन्होंने भीष्म को गिराने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया।
श्लोक 23 (6.115.23)
ततस्तव सुतादिष्टा नानाजनपदेश्वराः । द्रोणेन सहपुत्रेण सहसेना महाबलाः ॥
tatastava sutādiṣṭā nānājanapadeśvarāḥ | droṇena sahaputreṇa sahasenā mahābalāḥ
तब आपके पुत्र की आज्ञा से अनेक देशों के महाबली राजा अपनी सेनाओं सहित, पुत्रसहित द्रोण के साथ,
श्लोक 24 (6.115.24)
दुःशासनश्च बलवान्सह सर्वैः सहोदरैः । भीष्मं समरमध्यस्थं पालयांचक्रिरे तदा ॥
duḥśāsanaśca balavānsaha sarvaiḥ sahodaraiḥ | bhīṣmaṃ samaramadhyasthaṃ pālayāṃcakrire tadā
और अपने सब सहोदर भाइयों के साथ बलवान दुःशासन उस समय युद्ध के बीच खड़े भीष्म की रक्षा करने लगे।
श्लोक 25 (6.115.25)
ततस्तु तावकाः शूराः पुरस्कृत्य महाव्रतम् । शिखण्डिप्रमुखान्पार्थान्योधयन्ति स्म संयुगे ॥
tatastu tāvakāḥ śūrāḥ puraskṛtya mahāvratam | śikhaṇḍipramukhānpārthānyodhayanti sma saṃyuge
तब आपके शूरवीर महाव्रती भीष्म को आगे करके संग्राम में शिखण्डी आदि पार्थों से लड़ने लगे।
श्लोक 26 (6.115.26)
चेदिभिस्तु सपाञ्चालैः सहितो वानरध्वजः । ययौ शान्तनवं भीष्मं पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ॥
cedibhistu sapāñcālaiḥ sahito vānaradhvajaḥ | yayau śāntanavaṃ bhīṣmaṃ puraskṛtya śikhaṇḍinam
चेदियों और पाञ्चालों के साथ कपिध्वज अर्जुन शिखण्डी को आगे करके शान्तनुपुत्र भीष्म की ओर बढ़े।
श्लोक 27 (6.115.27)
द्रोणपुत्रं शिनेर्नप्ता धृष्टकेतुस्तु पौरवम् । अभिमन्युः सहामात्यं दुर्योधनमयोधयत् ॥
droṇaputraṃ śinernaptā dhṛṣṭaketustu pauravam | abhimanyuḥ sahāmātyaṃ duryodhanamayodhayat
शिनि के पौत्र (सात्यकि) ने द्रोणपुत्र से, धृष्टकेतु ने पौरव से, और अभिमन्यु ने मन्त्रियों सहित दुर्योधन से युद्ध किया।
श्लोक 28 (6.115.28)
विराटस्तु सहानीकः सहसेनं जयद्रथम् । वृद्धक्षत्रस्य दायादमाससाद परंतप ॥
virāṭastu sahānīkaḥ sahasenaṃ jayadratham | vṛddhakṣatrasya dāyādamāsasāda paraṃtapa
हे परंतप, विराट ने अपनी सेना के साथ वृद्धक्षत्र के पुत्र जयद्रथ और उसकी सेना पर आक्रमण किया।
श्लोक 29 (6.115.29)
मद्रराजं महेष्वासं सहसैन्यं युधिष्ठिरः । भीमसेनोऽभिगुप्तस्तु नागानीकमुपाद्रवत् ॥
madrarājaṃ maheṣvāsaṃ sahasainyaṃ yudhiṣṭhiraḥ | bhīmaseno'bhiguptastu nāgānīkamupādravat
युधिष्ठिर ने सेना सहित महान धनुर्धर मद्रराज पर आक्रमण किया, और सुरक्षित भीमसेन ने हाथियों की सेना पर धावा बोला।
श्लोक 30 (6.115.30)
अप्रधृष्यमनावार्यं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । द्रोणं प्रति ययौ यत्तः पाञ्चाल्यः सह सोदरैः ॥
apradhṛṣyamanāvāryaṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam | droṇaṃ prati yayau yattaḥ pāñcālyaḥ saha sodaraiḥ
पाञ्चालराजकुमार (धृष्टद्युम्न) अपने भाइयों के साथ सावधान होकर सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, अजेय और अनिवार्य द्रोण की ओर बढ़ा।
श्लोक 31 (6.115.31)
कर्णिकारध्वजं चैव सिंहकेतुररिंदमः । प्रत्युज्जगाम सौभद्रं राजपुत्रो बृहद्बलः ॥
karṇikāradhvajaṃ caiva siṃhaketurariṃdamaḥ | pratyujjagāma saubhadraṃ rājaputro bṛhadbalaḥ
सिंहध्वज वाले, शत्रुदमन राजकुमार बृहद्बल ने कर्णिकार-ध्वज वाले सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) का सामना किया।
श्लोक 32 (6.115.32)
शिखण्डिनं च पुत्रास्ते पाण्डवं च धनञ्जयम् । राजभिः समरे पार्थमभिपेतुर्जिघांसवः ॥
śikhaṇḍinaṃ ca putrāste pāṇḍavaṃ ca dhanañjayam | rājabhiḥ samare pārthamabhipeturjighāṃsavaḥ
आपके पुत्र राजाओं के साथ मारने की इच्छा से रण में शिखण्डी और पाण्डुपुत्र धनञ्जय पार्थ पर टूट पड़े।
श्लोक 33 (6.115.33)
तस्मिन्नतिमहाभीमे सेनयोर्वै पराक्रमे । संप्रधावत्स्वनीकेषु मेदिनी समकम्पत ॥
tasminnatimahābhīme senayorvai parākrame | saṃpradhāvatsvanīkeṣu medinī samakampata
दोनों सेनाओं के उस अत्यन्त भयंकर पराक्रम में, जब सैन्य-दल एक-दूसरे पर दौड़ पड़े, तब धरती काँप उठी।
श्लोक 34 (6.115.34)
तान्यनीकान्यनीकेषु समयुध्यन्त भारत । तावकानां परेषां च दृष्ट्वा शान्तनवं रणे ॥
tānyanīkānyanīkeṣu samayudhyanta bhārata | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca dṛṣṭvā śāntanavaṃ raṇe
हे भारत, रण में शान्तनुपुत्र को देखकर आपकी और शत्रुओं की टुकड़ियाँ एक-दूसरे से भिड़ गईं।
श्लोक 35 (6.115.35)
ततस्तेषां प्रयततामन्योन्यमभिधावताम् । प्रादुरासीन्महाशब्दो दिक्षु सर्वासु भारत ॥
tatasteṣāṃ prayatatāmanyonyamabhidhāvatām | prādurāsīnmahāśabdo dikṣu sarvāsu bhārata
हे भारत, तब यत्नपूर्वक एक-दूसरे पर दौड़ते हुए उन योद्धाओं का महान कोलाहल सब दिशाओं में गूँज उठा।
श्लोक 36 (6.115.36)
शङ्खदुन्दुभिघोषश्च वारणानां च बृंहितैः । सिंहनादश्च सैन्यानां दारुणः समपद्यत ॥
śaṅkhadundubhighoṣaśca vāraṇānāṃ ca bṛṃhitaiḥ | siṃhanādaśca sainyānāṃ dāruṇaḥ samapadyata
शंखों और दुन्दुभियों का घोष, हाथियों की चिंघाड़ के साथ, और सेनाओं का सिंहनाद भयंकर हो उठा।
श्लोक 37 (6.115.37)
सा च सर्वनरेन्द्राणां चन्द्रार्कसदृशी प्रभा । हाराङ्गदकिरीटेषु निष्प्रभा समपद्यत ॥
sā ca sarvanarendrāṇāṃ candrārkasadṛśī prabhā | hārāṅgadakirīṭeṣu niṣprabhā samapadyata
और सब राजाओं की चन्द्रमा और सूर्य जैसी प्रभा उनके हारों, अंगदों और मुकुटों में फीकी पड़ गई।
श्लोक 38 (6.115.38)
रजोमेघास्तु संजज्ञुः शस्त्रविद्युद्भिरावृताः । धनुषां चापि निर्घोषो दारुणः समपद्यत ॥
rajomeghāstu saṃjajñuḥ śastravidyudbhirāvṛtāḥ | dhanuṣāṃ cāpi nirghoṣo dāruṇaḥ samapadyata
शस्त्रों की बिजलियों से भरे धूल के बादल उठ खड़े हुए, और धनुषों की टंकार भी भयंकर हो उठी।
श्लोक 39 (6.115.39)
बाणशङ्खप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनाः । रथघोषश्च संजज्ञे सेनयोरुभयोरपि ॥
bāṇaśaṅkhapraṇādāśca bherīṇāṃ ca mahāsvanāḥ | rathaghoṣaśca saṃjajñe senayorubhayorapi
दोनों सेनाओं में बाणों की सनसनाहट, शंखों का नाद, भेरियों के ऊँचे स्वर और रथों की घरघराहट उठने लगी।
श्लोक 40 (6.115.40)
प्रासशक्त्यृष्टिसङ्घैश्च बाणौघैश्च समाकुलम् । निष्प्रकाशमिवाकाशं सेनयोः समपद्यत ॥
prāsaśaktyṛṣṭisaṅghaiśca bāṇaughaiśca samākulam | niṣprakāśamivākāśaṃ senayoḥ samapadyata
प्रासों, शक्तियों और ऋष्टियों के समूहों तथा बाणों की बाढ़ से भरा दोनों सेनाओं के ऊपर का आकाश मानो प्रकाशहीन हो गया।
श्लोक 41 (6.115.41)
अन्योन्यं रथिनः पेतुर्वाजिनश्च महाहवे । कुञ्जरान्कुञ्जरा जघ्नुः पादातांश्च पदातयः ॥
anyonyaṃ rathinaḥ peturvājinaśca mahāhave | kuñjarānkuñjarā jaghnuḥ pādātāṃśca padātayaḥ
उस महायुद्ध में रथी और घुड़सवार एक-दूसरे पर टूट पड़े; हाथियों ने हाथियों को और पैदलों ने पैदलों को मारा।
श्लोक 42 (6.115.42)
तत्रासीत्सुमहद्युद्धं कुरूणां पाण्डवैः सह । भीष्महेतोर्नरव्याघ्र श्येनयोरामिषे यथा ॥
tatrāsītsumahadyuddhaṃ kurūṇāṃ pāṇḍavaiḥ saha | bhīṣmahetornaravyāghra śyenayorāmiṣe yathā
हे नरव्याघ्र, वहाँ भीष्म के कारण कौरवों और पाण्डवों के बीच बहुत बड़ा युद्ध हुआ, जैसे मांस के टुकड़े के लिए दो बाज़ लड़ते हैं।
श्लोक 43 (6.115.43)
तयोः समागमो घोरो बभूव युधि भारत । अन्योन्यस्य वधार्थाय जिगीषूणां महाहवे ॥
tayoḥ samāgamo ghoro babhūva yudhi bhārata | anyonyasya vadhārthāya jigīṣūṇāṃ mahāhave
हे भारत, युद्ध में उन दोनों पक्षों की वह भिड़ंत भयंकर थी; दोनों जीतने के इच्छुक थे और उस महायुद्ध में एक-दूसरे के विनाश पर तुले थे।