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भीष्म पर्व · अध्याय 116

दसवें दिन के द्वन्द्वयुद्ध; भीष्म द्वारा सोमकों का संहार

दसवें दिन दोनों पक्षों के योद्धा भीष्म के चारों ओर द्वन्द्वयुद्ध करते हैं: अभिमन्यु पहले दुर्योधन से और फिर कोसलराज बृहद्बल से लड़ते हैं, सात्यकि अश्वत्थामा से भिड़ते हैं, पौरव और धृष्टकेतु तलवार-युद्ध में एक-दूसरे को घायल कर रणभूमि से ले जाए जाते हैं, युधिष्ठिर शल्य को पीड़ित करते हैं, विराट जयद्रथ से लड़ते हैं, और द्रोण धृष्टद्युम्न की गदा और शक्ति को नष्ट कर देते हैं। भगदत्त अपने हाथी पर अर्जुन को रोकते हैं, पर अर्जुन शिखण्डी को प्रेरित करते हैं और उन्हें आगे रखकर भीष्म पर धावा बोलते हैं। भीष्म दिव्य अस्त्रों से दावानल की तरह धधकते हुए रथों को सूना कर देते हैं; चेदि, काशी और करूष के चौदह हज़ार महारथी उनके सामने खेत रहते हैं, और अर्जुन तथा शिखण्डी के अतिरिक्त कोई उनका सामना करने का साहस नहीं करता।

अध्याय 115अध्याय-सूचीअध्याय 117

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.116.1)

अभिमन्युर्महाराज तव पुत्रमयोधयत् । महत्या सेनया युक्तं भीष्महेतोः पराक्रमी ॥

abhimanyurmahārāja tava putramayodhayat | mahatyā senayā yuktaṃ bhīṣmahetoḥ parākramī

हे महाराज, पराक्रमी अभिमन्यु ने आपके पुत्र से युद्ध किया, जो विशाल सेना के साथ भीष्म के लिए लड़ रहा था।

श्लोक 2 (6.116.2)

दुर्योधनो रणे कार्ष्णिं नवभिर्नतपर्वभिः । आजघानोरसि क्रुद्धः पुनश्चैनं त्रिभिः शरैः ॥

duryodhano raṇe kārṣṇiṃ navabhirnataparvabhiḥ | ājaghānorasi kruddhaḥ punaścainaṃ tribhiḥ śaraiḥ

रणभूमि में क्रुद्ध दुर्योधन ने कार्ष्णि (अभिमन्यु) की छाती पर झुकी गाँठों वाले नौ बाण मारे, और फिर तीन बाण और मारे।

श्लोक 3 (6.116.3)

तस्य शक्तिं रणे कार्ष्णिर्मृत्योर्जिह्वामिवायसीम् । प्रेषयामास संक्रुद्धो दुर्योधनरथं प्रति ॥

tasya śaktiṃ raṇe kārṣṇirmṛtyorjihvāmivāyasīm | preṣayāmāsa saṃkruddho duryodhanarathaṃ prati

तब क्रोध से भरे कार्ष्णि ने दुर्योधन के रथ की ओर मृत्यु की जीभ के समान लोहे की शक्ति चलाई।

श्लोक 4 (6.116.4)

तामापतन्तीं सहसा घोररूपां विशांपते । द्विधा चिच्छेद ते पुत्रः क्षुरप्रेण महारथः ॥

tāmāpatantīṃ sahasā ghorarūpāṃ viśāṃpate | dvidhā ciccheda te putraḥ kṣurapreṇa mahārathaḥ

हे प्रजानाथ, उस भयानक शक्ति को सहसा अपनी ओर आते देख आपके महारथी पुत्र ने क्षुरप्र बाण से उसके दो टुकड़े कर दिए।

श्लोक 5 (6.116.5)

तां शक्तिं पतितां दृष्ट्वा कार्ष्णिः परमकोपनः । दुर्योधनं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

tāṃ śaktiṃ patitāṃ dṛṣṭvā kārṣṇiḥ paramakopanaḥ | duryodhanaṃ tribhirbāṇairbāhvorurasi cārpayat

शक्ति को गिरा हुआ देख अत्यन्त क्रोधित कार्ष्णि ने तीन बाणों से दुर्योधन की दोनों भुजाओं और छाती को बींध दिया।

श्लोक 6 (6.116.6)

पुनश्चैनं शरैर्घोरैराजघान स्तनान्तरे । दशभिर्भरतश्रेष्ठ दुर्योधनममर्षणम् ॥

punaścainaṃ śarairghorairājaghāna stanāntare | daśabhirbharataśreṣṭha duryodhanamamarṣaṇam

हे भरतश्रेष्ठ, फिर उन्होंने असहनशील दुर्योधन की छाती के बीच दस भयंकर बाण मारे।

श्लोक 7 (6.116.7)

तद्युद्धमभवद्धोरं चित्ररूपं च भारत । ईक्षितृप्रीतिजननं सर्वपार्थिवपूजितम् ॥

tadyuddhamabhavaddhoraṃ citrarūpaṃ ca bhārata | īkṣitṛprītijananaṃ sarvapārthivapūjitam

हे भारत, वह युद्ध भयानक और विचित्र था; उसने देखने वालों को आनन्दित किया और सभी राजाओं ने उसकी प्रशंसा की।

श्लोक 8 (6.116.8)

भीष्मस्य निधनार्थाय पार्थस्य विजयाय च । युयुधाते रणे वीरौ सौभद्रकुरुपुङ्गवौ ॥

bhīṣmasya nidhanārthāya pārthasya vijayāya ca | yuyudhāte raṇe vīrau saubhadrakurupuṅgavau

भीष्म के वध और पार्थ की विजय को लेकर सुभद्रापुत्र और कुरुश्रेष्ठ, वे दोनों वीर रण में परस्पर लड़ते रहे।

श्लोक 9 (6.116.9)

सात्यकिं रभसं युद्धे द्रौणिर्ब्राह्मणपुङ्गवः । आजघानोरसि क्रुद्धो नाराचेन परंतपः ॥

sātyakiṃ rabhasaṃ yuddhe drauṇirbrāhmaṇapuṅgavaḥ | ājaghānorasi kruddho nārācena paraṃtapaḥ

शत्रुओं को तपाने वाले ब्राह्मणश्रेष्ठ द्रौणि (अश्वत्थामा) ने क्रुद्ध होकर युद्ध में वेगशाली सात्यकि की छाती पर नाराच बाण मारा।

श्लोक 10 (6.116.10)

शैनेयोऽपि गुरोः पुत्रं सर्वमर्मसु भारत । अताडयदमेयात्मा नवभिः कङ्कपत्रिभिः ॥

śaineyo'pi guroḥ putraṃ sarvamarmasu bhārata | atāḍayadameyātmā navabhiḥ kaṅkapatribhiḥ

हे भारत, अपार आत्मबल वाले शैनेय (सात्यकि) ने भी गुरुपुत्र के सभी मर्मस्थलों पर कंकपंख वाले नौ बाण मारे।

श्लोक 11 (6.116.11)

अश्वत्थामा तु समरे सात्यकिं नवभिः शरैः । त्रिंशता च पुनस्तूर्णं बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥

aśvatthāmā tu samare sātyakiṃ navabhiḥ śaraiḥ | triṃśatā ca punastūrṇaṃ bāhvorurasi cārpayat

अश्वत्थामा ने समर में सात्यकि को नौ बाणों से बींधा, और फिर तुरन्त तीस बाण उनकी भुजाओं और छाती में मारे।

श्लोक 12 (6.116.12)

सोऽतिविद्धो महेष्वासो द्रोणपुत्रेण सात्यकिः । द्रोणपुत्रं त्रिभिर्बाणैराजघान महायशाः ॥

so'tividdho maheṣvāso droṇaputreṇa sātyakiḥ | droṇaputraṃ tribhirbāṇairājaghāna mahāyaśāḥ

द्रोणपुत्र के बाणों से बुरी तरह घायल होकर महायशस्वी महाधनुर्धर सात्यकि ने द्रोणपुत्र पर तीन बाण मारे।

श्लोक 13 (6.116.13)

पौरवो धृष्टकेतुं च शरैराच्छाद्य संयुगे । बहुधा दारयांचक्रे महेष्वासं महारथः ॥

pauravo dhṛṣṭaketuṃ ca śarairācchādya saṃyuge | bahudhā dārayāṃcakre maheṣvāsaṃ mahārathaḥ

महारथी पौरव ने युद्ध में धृष्टकेतु को बाणों से ढक दिया और उस महाधनुर्धर को अनेक स्थानों पर विदीर्ण कर दिया।

श्लोक 14 (6.116.14)

तथैव पौरवं युद्धे धृष्टकेतुर्महारथः । त्रिंशता निशितैर्बाणैर्विव्याधाशु महाभुजः ॥

tathaiva pauravaṃ yuddhe dhṛṣṭaketurmahārathaḥ | triṃśatā niśitairbāṇairvivyādhāśu mahābhujaḥ

इसी प्रकार महाबाहु महारथी धृष्टकेतु ने भी युद्ध में शीघ्र ही तीस तीखे बाणों से पौरव को बींध दिया।

श्लोक 15 (6.116.15)

पौरवस्तु धनुश्छित्त्वा धृष्टकेतोर्महारथः । ननाद बलवन्नादं विव्याध च शितैः शरैः ॥

pauravastu dhanuśchittvā dhṛṣṭaketormahārathaḥ | nanāda balavannādaṃ vivyādha ca śitaiḥ śaraiḥ

तब महारथी पौरव ने धृष्टकेतु का धनुष काट डाला, ज़ोर से गर्जना की और उन्हें तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 16 (6.116.16)

सोऽन्यत्कार्मुकमादाय पौरवं निशितैः शरैः । आजघान महाराज त्रिसप्तत्या शिलीमुखैः ॥

so'nyatkārmukamādāya pauravaṃ niśitaiḥ śaraiḥ | ājaghāna mahārāja trisaptatyā śilīmukhaiḥ

हे महाराज, धृष्टकेतु ने दूसरा धनुष उठाकर तिहत्तर तीखे बाणों से पौरव पर प्रहार किया।

श्लोक 17 (6.116.17)

तौ तु तत्र महेष्वासौ महामात्रौ महारथौ । महता शरवर्षेण परस्परमवर्षताम् ॥

tau tu tatra maheṣvāsau mahāmātrau mahārathau | mahatā śaravarṣeṇa parasparamavarṣatām

वे दोनों महाधनुर्धर, प्रतिष्ठित और महारथी योद्धा, एक-दूसरे पर बाणों की भारी वर्षा करने लगे।

श्लोक 18 (6.116.18)

अन्योन्यस्य धनुश्छित्त्वा हयान्हत्वा च भारत । विरथावसियुद्धाय समीयतुरमर्षणौ ॥

anyonyasya dhanuśchittvā hayānhatvā ca bhārata | virathāvasiyuddhāya samīyaturamarṣaṇau

हे भारत, एक-दूसरे का धनुष काटकर और घोड़ों को मारकर, वे दोनों असहनशील योद्धा रथहीन होकर तलवार के युद्ध के लिए आमने-सामने आ गए।

श्लोक 19 (6.116.19)

आर्षभे चर्मणी चित्रे शतचन्द्रपुरस्कृते । तारकाशतचित्रे च निस्त्रिंशौ सुमहाप्रभौ ॥

ārṣabhe carmaṇī citre śatacandrapuraskṛte | tārakāśatacitre ca nistriṃśau sumahāprabhau

उन्होंने बैल की खाल की बनी, सौ चन्द्रों से सुसज्जित और सौ तारों से चित्रित विचित्र ढालें और अत्यन्त चमकीली दो तलवारें लीं,

श्लोक 20 (6.116.20)

प्रगृह्य विमलौ राजंस्तावन्योन्यमभिद्रुतौ । वासितासंगमे यत्तौ सिंहाविव महावने ॥

pragṛhya vimalau rājaṃstāvanyonyamabhidrutau | vāsitāsaṃgame yattau siṃhāviva mahāvane

और हे राजन्, उन निर्मल तलवारों को थामकर वे दोनों एक-दूसरे पर ऐसे टूट पड़े जैसे किसी विशाल वन में ऋतुमती सिंहनी के लिए दो सिंह भिड़ जाते हैं।

श्लोक 21 (6.116.21)

मण्डलानि विचित्राणि गतप्रत्यागतानि च । चेरतुर्दर्शयन्तौ च प्रार्थयन्तौ परस्परम् ॥

maṇḍalāni vicitrāṇi gatapratyāgatāni ca | ceraturdarśayantau ca prārthayantau parasparam

वे विचित्र मण्डल बनाते, आगे बढ़ते और पीछे हटते, अपना कौशल दिखाते हुए एक-दूसरे पर घात लगाते घूमते रहे।

श्लोक 22 (6.116.22)

पौरवो धृष्टकेतुं तु शङ्खदेशे महासिना । ताडयामास संक्रुद्धस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् ॥

pauravo dhṛṣṭaketuṃ tu śaṅkhadeśe mahāsinā | tāḍayāmāsa saṃkruddhastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

पौरव ने क्रोध में भरकर अपनी बड़ी तलवार से धृष्टकेतु की कनपटी पर प्रहार किया और कहा, 'ठहरो, ठहरो!'

श्लोक 23 (6.116.23)

चेदिराजोऽपि समरे पौरवं पुरुषर्षभम् । आजघान शिताग्रेण जत्रुदेशे महासिना ॥

cedirājo'pi samare pauravaṃ puruṣarṣabham | ājaghāna śitāgreṇa jatrudeśe mahāsinā

चेदिराज ने भी समर में पुरुषश्रेष्ठ पौरव की हँसली पर तीखी नोक वाली अपनी बड़ी तलवार से प्रहार किया।

श्लोक 24 (6.116.24)

तावन्योन्यं महाराज समासाद्य महाहवे । अन्योन्यवेगाभिहतौ निपेततुररिंदमौ ॥

tāvanyonyaṃ mahārāja samāsādya mahāhave | anyonyavegābhihatau nipetaturariṃdamau

हे महाराज, उस महायुद्ध में एक-दूसरे से भिड़कर वे दोनों शत्रुदमन योद्धा परस्पर के वेगपूर्ण प्रहार से आहत होकर धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 25 (6.116.25)

ततः स्वरथमारोप्य पौरवं तनयस्तव । जयत्सेनो रथेनाजावपोवाह रणाजिरात् ॥

tataḥ svarathamāropya pauravaṃ tanayastava | jayatseno rathenājāvapovāha raṇājirāt

तब आपके पुत्र जयत्सेन ने पौरव को अपने रथ पर चढ़ा लिया और उन्हें रथ द्वारा रणभूमि से दूर ले गए।

श्लोक 26 (6.116.26)

धृष्टकेतुं तु समरे माद्रीपुत्रः प्रतापवान् । अपोवाह रणे क्रुद्धः सहदेवः पराक्रमी ॥

dhṛṣṭaketuṃ tu samare mādrīputraḥ pratāpavān | apovāha raṇe kruddhaḥ sahadevaḥ parākramī

और माद्रीपुत्र प्रतापी, पराक्रमी सहदेव क्रोधपूर्वक धृष्टकेतु को रण से दूर ले गए।

श्लोक 27 (6.116.27)

चित्रसेनः सुशर्माणं विद्ध्वा बहुभिरायसैः । पुनर्विव्याध तं षष्ट्या पुनश्च नवभिः शरैः ॥

citrasenaḥ suśarmāṇaṃ viddhvā bahubhirāyasaiḥ | punarvivyādha taṃ ṣaṣṭyā punaśca navabhiḥ śaraiḥ

चित्रसेन ने सुशर्मा को लोहे के अनेक बाणों से बींधकर फिर साठ बाणों से और फिर नौ बाणों से बींधा।

श्लोक 28 (6.116.28)

सुशर्मा तु रणे क्रुद्धस्तव पुत्रं विशांपते । दशभिर्दशभिश्चैव विव्याध निशितैः शरैः ॥

suśarmā tu raṇe kruddhastava putraṃ viśāṃpate | daśabhirdaśabhiścaiva vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ

हे प्रजानाथ, रण में क्रुद्ध सुशर्मा ने आपके पुत्र को दस-दस तीखे बाणों से बींध डाला।

श्लोक 29 (6.116.29)

चित्रसेनश्च तं राजंस्त्रिंशता नतपर्वभिः । आजघान रणे क्रुद्धः स च तं प्रत्यविध्यत ॥

citrasenaśca taṃ rājaṃstriṃśatā nataparvabhiḥ | ājaghāna raṇe kruddhaḥ sa ca taṃ pratyavidhyata

हे राजन्, चित्रसेन ने भी क्रोधित होकर रण में उन्हें झुकी गाँठों वाले तीस बाण मारे, और सुशर्मा ने भी बदले में उन्हें बींधा।

श्लोक 30 (6.116.30)

भीष्मस्य समरे राजन्यशो मानं च वर्धयन् । सौभद्रो राजपुत्रं तु बृहद्बलमयोधयत् ॥

bhīṣmasya samare rājanyaśo mānaṃ ca vardhayan | saubhadro rājaputraṃ tu bṛhadbalamayodhayat

हे राजन्, इस प्रकार वे समर में भीष्म के यश और सम्मान को बढ़ाते रहे। सुभद्रापुत्र ने राजकुमार बृहद्बल से युद्ध किया,

श्लोक 31 (6.116.31)

पार्थहेतोः पराक्रान्तो भीष्मस्य निधनं प्रति । आर्जुनिं कोसलेन्द्रस्तु विद्ध्वा पञ्चभिरायसैः ॥

pārthahetoḥ parākrānto bhīṣmasya nidhanaṃ prati | ārjuniṃ kosalendrastu viddhvā pañcabhirāyasaiḥ

पार्थ के लिए और भीष्म के वध के उद्देश्य से पराक्रम दिखाते हुए। कोसलराज ने अर्जुनपुत्र को लोहे के पाँच बाणों से बींधकर

श्लोक 32 (6.116.32)

पुनर्विव्याध विंशत्या शरैः सन्नतपर्वभिः । सौभद्रः कोसलेन्द्रं तु विव्याधाष्टभिरायसैः ॥

punarvivyādha viṃśatyā śaraiḥ sannataparvabhiḥ | saubhadraḥ kosalendraṃ tu vivyādhāṣṭabhirāyasaiḥ

फिर झुकी गाँठों वाले बीस बाणों से बींधा। सुभद्रापुत्र ने कोसलराज को लोहे के आठ बाणों से बींधा,

श्लोक 33 (6.116.33)

नाकम्पयत संग्रामे विव्याध च पुनः शरैः । कौसल्यस्य धनुश्चापि पुनश्चिच्छेद फाल्गुनिः ॥

nākampayata saṃgrāme vivyādha ca punaḥ śaraiḥ | kausalyasya dhanuścāpi punaściccheda phālguniḥ

परंतु उन्हें युद्ध में विचलित न कर सके, और फिर उन्होंने बाणों से उन्हें बींधा। फिर फाल्गुनि (अभिमन्यु) ने कोसलराज का धनुष भी काट डाला

श्लोक 34 (6.116.34)

आजघान शरैश्चापि त्रिंशता कङ्कपत्रिभिः । सोऽन्यत्कार्मुकमादाय राजपुत्रो बृहद्बलः ॥

ājaghāna śaraiścāpi triṃśatā kaṅkapatribhiḥ | so'nyatkārmukamādāya rājaputro bṛhadbalaḥ

और कंकपंख वाले तीस बाणों से उन पर प्रहार किया। राजकुमार बृहद्बल ने दूसरा धनुष उठाया

श्लोक 35 (6.116.35)

फाल्गुनिं समरे क्रुद्धो विव्याध बहुभिः शरैः । तयोर्युद्धं समभवद्भीष्महेतोः परंतप ॥

phālguniṃ samare kruddho vivyādha bahubhiḥ śaraiḥ | tayoryuddhaṃ samabhavadbhīṣmahetoḥ paraṃtapa

और क्रुद्ध होकर समर में फाल्गुनि को अनेक बाणों से बींध डाला। हे परंतप, इस प्रकार भीष्म के कारण उन दोनों में युद्ध छिड़ गया,

श्लोक 36 (6.116.36)

संरब्धयोर्महाराज समरे चित्रयोधिनोः । यथा देवासुरे युद्धे बलिवासवयोरभूत् ॥

saṃrabdhayormahārāja samare citrayodhinoḥ | yathā devāsure yuddhe balivāsavayorabhūt

हे महाराज, विचित्र ढंग से लड़ने वाले उन दोनों क्रोधित योद्धाओं का वह युद्ध वैसा ही था जैसा देवासुर-संग्राम में बलि और वासव (इन्द्र) के बीच हुआ था।

श्लोक 37 (6.116.37)

भीमसेनो गजानीकं योधयन्बह्वशोभत । यथा शक्रो वज्रपाणिर्दारयन्पर्वतोत्तमान् ॥

bhīmaseno gajānīkaṃ yodhayanbahvaśobhata | yathā śakro vajrapāṇirdārayanparvatottamān

हाथियों की सेना से लड़ते हुए भीमसेन अत्यन्त शोभा पा रहे थे, मानो वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ पर्वतों को विदीर्ण कर रहे हों।

श्लोक 38 (6.116.38)

ते वध्यमाना भीमेन मातङ्गा गिरिसन्निभाः । निपेतुरुर्व्यां सहिता नादयन्तो वसुंधराम् ॥

te vadhyamānā bhīmena mātaṅgā girisannibhāḥ | nipetururvyāṃ sahitā nādayanto vasuṃdharām

भीम के हाथों मारे जाते हुए पर्वत-सरीखे हाथी एक साथ धरती पर गिर पड़े और उनके गिरने से पृथ्वी गूँज उठी।

श्लोक 39 (6.116.39)

गिरिमात्रा हि ते नागा भिन्नाञ्जनचयोपमाः । विरेजुर्वसुधां प्राप्ता विकीर्णा इव पर्वताः ॥

girimātrā hi te nāgā bhinnāñjanacayopamāḥ | virejurvasudhāṃ prāptā vikīrṇā iva parvatāḥ

पर्वत के आकार के और कूटे हुए अंजन के ढेर-से काले वे हाथी धरती पर पड़े हुए बिखरे पर्वतों के समान दिखाई देते थे।

श्लोक 40 (6.116.40)

युधिष्ठिरो महेष्वासो मद्रराजानमाहवे । महत्या सेनया गुप्तं पीडयामास संगतम् ॥

yudhiṣṭhiro maheṣvāso madrarājānamāhave | mahatyā senayā guptaṃ pīḍayāmāsa saṃgatam

महाधनुर्धर युधिष्ठिर ने युद्ध में विशाल सेना से सुरक्षित होकर सामने आए मद्रराज को कड़ी पीड़ा दी।

श्लोक 41 (6.116.41)

मद्रेश्वरश्च समरे धर्मपुत्रं महारथम् । पीडयामास संरब्धो भीष्महेतोः पराक्रमी ॥

madreśvaraśca samare dharmaputraṃ mahāratham | pīḍayāmāsa saṃrabdho bhīṣmahetoḥ parākramī

और पराक्रमी मद्रराज ने भी क्रोध में भरकर भीष्म के लिए समर में महारथी धर्मपुत्र को पीड़ित किया।

श्लोक 42 (6.116.42)

विराटं सैन्धवो राजा विद्ध्वा सन्नतपर्वभिः । नवभिः सायकैस्तीक्ष्णैस्त्रिंशता पुनरार्पयत् ॥

virāṭaṃ saindhavo rājā viddhvā sannataparvabhiḥ | navabhiḥ sāyakaistīkṣṇaistriṃśatā punarārpayat

सिन्धुराज ने विराट को झुकी गाँठों वाले नौ तीखे बाणों से बींधकर फिर तीस बाण और मारे।

श्लोक 43 (6.116.43)

विराटश्च महाराज सैन्धवं वाहिनीपतिः । त्रिंशद्भिर्निशितैर्बाणैराजघान स्तनान्तरे ॥

virāṭaśca mahārāja saindhavaṃ vāhinīpatiḥ | triṃśadbhirniśitairbāṇairājaghāna stanāntare

हे महाराज, सेनापति विराट ने भी सिन्धुराज की छाती के बीच तीस तीखे बाण मारे।

श्लोक 44 (6.116.44)

चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशौ चित्रवर्मायुधध्वजौ । रेजतुश्चित्ररूपौ तौ संग्रामे मत्स्यसैन्धवौ ॥

citrakārmukanistriṃśau citravarmāyudhadhvajau | rejatuścitrarūpau tau saṃgrāme matsyasaindhavau

विचित्र धनुषों और तलवारों, विचित्र कवचों, आयुधों और ध्वजाओं से युक्त वे दोनों, मत्स्यराज और सिन्धुराज, संग्राम में अद्भुत रूप से शोभायमान हुए।

श्लोक 45 (6.116.45)

द्रोणः पाञ्चालपुत्रेण समागम्य महारणे । महासमुदयं चक्रे शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

droṇaḥ pāñcālaputreṇa samāgamya mahāraṇe | mahāsamudayaṃ cakre śaraiḥ sannataparvabhiḥ

महायुद्ध में पांचालराज के पुत्र से भिड़कर द्रोण ने झुकी गाँठों वाले बाणों से भीषण संग्राम किया।

श्लोक 46 (6.116.46)

ततो द्रोणो महाराज पार्षतस्य महद्धनुः । छित्त्वा पञ्चाशतेषूंश्च पार्षतं प्रति सृष्टवान् ॥

tato droṇo mahārāja pārṣatasya mahaddhanuḥ | chittvā pañcāśateṣūṃśca pārṣataṃ prati sṛṣṭavān

तब, हे महाराज, द्रोण ने पार्षत (धृष्टद्युम्न) का विशाल धनुष काट डाला और पार्षत पर पचास बाण छोड़े।

श्लोक 47 (6.116.47)

सोऽन्यत्कार्मुकमादाय पार्षतः परवीरहा । द्रोणस्य मिषतो युद्धे प्रेषयामास सायकान् ॥

so'nyatkārmukamādāya pārṣataḥ paravīrahā | droṇasya miṣato yuddhe preṣayāmāsa sāyakān

शत्रुवीरों का संहार करने वाले पार्षत ने दूसरा धनुष उठाया और द्रोण के देखते-देखते युद्ध में उन पर बाण चलाए।

श्लोक 48 (6.116.48)

ताञ्छराञ्छरघातेन चिच्छेद स महारथः । द्रोणो द्रुपदपुत्राय प्राहिणोत्पञ्च सायकान् ॥

tāñcharāñcharaghātena ciccheda sa mahārathaḥ | droṇo drupadaputrāya prāhiṇotpañca sāyakān

उस महारथी ने अपने बाणों के प्रहार से उन बाणों को काट गिराया; फिर द्रोण ने द्रुपदपुत्र पर पाँच बाण चलाए।

श्लोक 49 (6.116.49)

ततः क्रुद्धो महाराज पार्षतः परवीरहा । द्रोणाय चिक्षेप गदां यमदण्डोपमां रणे ॥

tataḥ kruddho mahārāja pārṣataḥ paravīrahā | droṇāya cikṣepa gadāṃ yamadaṇḍopamāṃ raṇe

तब, हे महाराज, शत्रुवीरों का नाश करने वाले क्रुद्ध पार्षत ने रण में द्रोण पर यमदण्ड के समान गदा फेंकी।

श्लोक 50 (6.116.50)

तामापतन्तीं सहसा हेमपट्टविभूषिताम् । शरैः पञ्चाशता द्रोणो वारयामास संयुगे ॥

tāmāpatantīṃ sahasā hemapaṭṭavibhūṣitām | śaraiḥ pañcāśatā droṇo vārayāmāsa saṃyuge

सोने की पट्टियों से सजी उस गदा को सहसा आते देख द्रोण ने युद्ध में पचास बाणों से उसे रोक दिया।

श्लोक 51 (6.116.51)

सा छिन्ना बहुधा राजन्द्रोणचापच्युतैः शरैः । चूर्णीकृता विशीर्यन्ती पपात वसुधातले ॥

sā chinnā bahudhā rājandroṇacāpacyutaiḥ śaraiḥ | cūrṇīkṛtā viśīryantī papāta vasudhātale

हे राजन्, द्रोण के धनुष से छूटे बाणों से अनेक टुकड़ों में कटकर वह गदा चूर-चूर हो गई और बिखरती हुई धरती पर गिर पड़ी।

श्लोक 52 (6.116.52)

गदां विनिहतां दृष्ट्वा पार्षतः शत्रुतापनः । द्रोणाय शक्तिं चिक्षेप सर्वपारशवीं शुभाम् ॥

gadāṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā pārṣataḥ śatrutāpanaḥ | droṇāya śaktiṃ cikṣepa sarvapāraśavīṃ śubhām

गदा को नष्ट हुआ देख शत्रुओं को सताने वाले पार्षत ने द्रोण पर पूरी तरह लोहे की बनी एक सुन्दर शक्ति फेंकी।

श्लोक 53 (6.116.53)

तां द्रोणो नवभिर्बाणैश्चिच्छेद युधि भारत । पार्षतं च महेष्वासं पीडयामास संयुगे ॥

tāṃ droṇo navabhirbāṇaiściccheda yudhi bhārata | pārṣataṃ ca maheṣvāsaṃ pīḍayāmāsa saṃyuge

हे भारत, द्रोण ने युद्ध में नौ बाणों से उसे काट डाला और महाधनुर्धर पार्षत को रण में पीड़ित किया।

श्लोक 54 (6.116.54)

एवमेतन्महायुद्धं द्रोणपार्षतयोरभूत् । भीष्मं प्रति महाराज घोररूपं भयानकम् ॥

evametanmahāyuddhaṃ droṇapārṣatayorabhūt | bhīṣmaṃ prati mahārāja ghorarūpaṃ bhayānakam

हे महाराज, इस प्रकार भीष्म को लेकर द्रोण और पार्षत के बीच यह भयंकर और डरावना महायुद्ध हुआ।

श्लोक 55 (6.116.55)

अर्जुनः प्राप्य गाङ्गेयं पीडयन्निशितैः शरैः । अभ्यद्रवत संयत्तो वने मत्तमिव द्विपम् ॥

arjunaḥ prāpya gāṅgeyaṃ pīḍayanniśitaiḥ śaraiḥ | abhyadravata saṃyatto vane mattamiva dvipam

अर्जुन ने गांगेय (भीष्म) के पास पहुँचकर तीखे बाणों से उन्हें पीड़ित करते हुए पूरी तैयारी के साथ उन पर ऐसे धावा किया जैसे वन में किसी मतवाले हाथी पर।

श्लोक 56 (6.116.56)

प्रत्युद्ययौ च तं राजा भगदत्तः प्रतापवान् । त्रिधा भिन्नेन नागेन मदान्धेन महाबलः ॥

pratyudyayau ca taṃ rājā bhagadattaḥ pratāpavān | tridhā bhinnena nāgena madāndhena mahābalaḥ

तब प्रतापी और महाबली राजा भगदत्त तीन स्थानों से मद बहाते, मद से अन्धे हाथी पर सवार होकर उनका सामना करने बढ़े।

श्लोक 57 (6.116.57)

तमापतन्तं सहसा महेन्द्रगजसन्निभम् । परं यत्नं समास्थाय बीभत्सुः प्रत्यपद्यत ॥

tamāpatantaṃ sahasā mahendragajasannibham | paraṃ yatnaṃ samāsthāya bībhatsuḥ pratyapadyata

महेन्द्र के हाथी के समान उस हाथी को सहसा आते देख बीभत्सु (अर्जुन) ने पूरा प्रयत्न करके उसका सामना किया।

श्लोक 58 (6.116.58)

ततो गजगतो राजा भगदत्तः प्रतापवान् । अर्जुनं शरवर्षेण वारयामास संयुगे ॥

tato gajagato rājā bhagadattaḥ pratāpavān | arjunaṃ śaravarṣeṇa vārayāmāsa saṃyuge

तब हाथी पर बैठे प्रतापी राजा भगदत्त ने युद्ध में बाणों की वर्षा से अर्जुन को रोक दिया।

श्लोक 59 (6.116.59)

अर्जुनस्तु ततो नागमायान्तं रजतोपमैः । विमलैरायसैस्तीक्ष्णैरविध्यत महारणे ॥

arjunastu tato nāgamāyāntaṃ rajatopamaiḥ | vimalairāyasaistīkṣṇairavidhyata mahāraṇe

तब अर्जुन ने उस महायुद्ध में आते हुए हाथी को चाँदी-से चमकते, निर्मल, तीखे लोहे के बाणों से बींध दिया।

श्लोक 60 (6.116.60)

शिखण्डिनं च कौन्तेयो याहियाहीत्यचोदयत् । भीष्मं प्रति महाराज जह्येनमिति चाब्रवीत् ॥

śikhaṇḍinaṃ ca kaunteyo yāhiyāhītyacodayat | bhīṣmaṃ prati mahārāja jahyenamiti cābravīt

कुन्तीपुत्र ने शिखण्डी को 'चलो, चलो!' कहकर आगे बढ़ाया, और हे महाराज, उनसे कहा, 'भीष्म की ओर बढ़ो और इन्हें मार डालो!'

श्लोक 61 (6.116.61)

प्राग्ज्योतिषस्ततो हित्वा पाण्डवं पाण्डुपूर्वज । प्रययौ त्वरितो राजन्द्रुपदस्य रथं प्रति ॥

prāgjyotiṣastato hitvā pāṇḍavaṃ pāṇḍupūrvaja | prayayau tvarito rājandrupadasya rathaṃ prati

हे पाण्डु के बड़े भाई, तब प्राग्ज्योतिषराज (भगदत्त) पाण्डव को छोड़कर, हे राजन्, शीघ्रता से द्रुपद के रथ की ओर चल पड़े।

श्लोक 62 (6.116.62)

ततोऽर्जुनो महाराज भीष्ममभ्यद्रवद्द्रुतम् । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य ततो युद्धमवर्तत ॥

tato'rjuno mahārāja bhīṣmamabhyadravaddrutam | śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya tato yuddhamavartata

तब, हे महाराज, अर्जुन शिखण्डी को आगे करके तेज़ी से भीष्म की ओर दौड़े, और फिर युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 63 (6.116.63)

ततस्ते तावकाः शूराः पाण्डवं रभसं युधि । समभ्यधावन्क्रोशन्तस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tataste tāvakāḥ śūrāḥ pāṇḍavaṃ rabhasaṃ yudhi | samabhyadhāvankrośantastadadbhutamivābhavat

तब आपके शूरवीर योद्धा चिल्लाते हुए युद्ध में उस वेगशाली पाण्डव पर टूट पड़े; वह एक अद्भुत दृश्य था।

श्लोक 64 (6.116.64)

नानाविधान्यनीकानि पुत्राणां ते जनाधिप । अर्जुनो व्यधमत्काले दिवीवाभ्राणि मारुतः ॥

nānāvidhānyanīkāni putrāṇāṃ te janādhipa | arjuno vyadhamatkāle divīvābhrāṇi mārutaḥ

हे जनाधिप, अर्जुन ने आपके पुत्रों की नाना प्रकार की सेनाओं को समय रहते ऐसे तितर-बितर कर दिया जैसे आकाश में वायु बादलों को उड़ा देती है।

श्लोक 65 (6.116.65)

शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् । इषुभिस्तूर्णमव्यग्रो बहुभिः स समाचिनोत् ॥

śikhaṇḍī tu samāsādya bharatānāṃ pitāmaham | iṣubhistūrṇamavyagro bahubhiḥ sa samācinot

शिखण्डी ने भरतवंशियों के पितामह के पास पहुँचकर शान्त भाव से शीघ्र ही उन्हें अनेक बाणों से ढक दिया।

श्लोक 66 (6.116.66)

रथाग्न्यगारश्चापार्चिरसिशक्तिगदेन्धनः । शरसङ्घमहाज्वालः क्षत्रियान्समरेऽदहत् ॥

rathāgnyagāraścāpārcirasiśaktigadendhanaḥ | śarasaṅghamahājvālaḥ kṣatriyānsamare'dahat

किन्तु पितामह मानो अग्नि बन गए थे, जिसका अग्निकुण्ड उनका रथ था, ज्वाला धनुष, ईंधन तलवारें, शक्तियाँ और गदाएँ, और विशाल लपटें बाणों के समूह; और उन्होंने रण में क्षत्रियों को जला डाला।

श्लोक 67 (6.116.67)

यथाऽग्निः सुमहानिद्धः कक्षे चरति सानिलः । तथा जज्वाल भीष्मोऽपि दिव्यान्यस्त्राण्युदीरयन् ॥

yathā'gniḥ sumahāniddhaḥ kakṣe carati sānilaḥ | tathā jajvāla bhīṣmo'pi divyānyastrāṇyudīrayan

जैसे प्रज्वलित महान् अग्नि वायु के साथ सूखे झाड़-झंखाड़ में फैलती चली जाती है, वैसे ही दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करते हुए भीष्म भी धधक उठे।

श्लोक 68 (6.116.68)

सोमकांश्च रणे भीष्मो जघ्ने पार्थपदानुगान् । न्यवारयत तत्सैन्यं पाण्डवस्य महारथः ॥

somakāṃśca raṇe bhīṣmo jaghne pārthapadānugān | nyavārayata tatsainyaṃ pāṇḍavasya mahārathaḥ

भीष्म ने रण में पार्थ के पीछे चलने वाले सोमकों का वध किया, और उस महारथी ने पाण्डव की उस सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया।

श्लोक 69 (6.116.69)

सुवर्णपुङ्खैरिषुभिः शितैः सन्नतपर्वभिः । नादयन्स दिशो भीष्मः प्रदिशश्च महाहवे ॥

suvarṇapuṅkhairiṣubhiḥ śitaiḥ sannataparvabhiḥ | nādayansa diśo bhīṣmaḥ pradiśaśca mahāhave

स्वर्णपंख वाले, झुकी गाँठों वाले तीखे बाणों से भीष्म ने उस महायुद्ध में दिशाओं और उपदिशाओं को गुँजा दिया।

श्लोक 70 (6.116.70)

पातयन्रथिनो राजन्हयांश्च सह सादिभिः । मुण्डतालवनानीव चकार स रथव्रजान् ॥

pātayanrathino rājanhayāṃśca saha sādibhiḥ | muṇḍatālavanānīva cakāra sa rathavrajān

हे राजन्, रथियों को और सवारों सहित घोड़ों को गिराते हुए उन्होंने रथों के समूहों को सिर कटे ताड़ के वनों के समान कर दिया।

श्लोक 71 (6.116.71)

निर्मनुष्यान्रथान्राजन्गजानश्वांश्च संयुगे । चकार समरे भीष्मः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥

nirmanuṣyānrathānrājangajānaśvāṃśca saṃyuge | cakāra samare bhīṣmaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ

हे राजन्, सभी शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भीष्म ने उस समर में रथों, हाथियों और घोड़ों को मनुष्यों से खाली कर दिया।

श्लोक 72 (6.116.72)

तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । निशम्य सर्वतो राजन्समकम्पन्त सैनिकाः ॥

tasya jyātalanirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | niśamya sarvato rājansamakampanta sainikāḥ

हे राजन्, वज्र की कड़क-सी उनकी प्रत्यंचा की टंकार को चारों ओर सुनकर सैनिक काँप उठे।

श्लोक 73 (6.116.73)

अमोघा न्यपतन्बाणाः पितुस्ते मनुजेश्वर । नासञ्जन्त शरीरेषु भीष्मचापच्युताः शराः ॥

amoghā nyapatanbāṇāḥ pituste manujeśvara | nāsañjanta śarīreṣu bhīṣmacāpacyutāḥ śarāḥ

हे मनुजेश्वर, आपके पिता के बाण कभी व्यर्थ नहीं गिरे; भीष्म के धनुष से छूटे बाण शरीरों में अटककर नहीं रुकते थे।

श्लोक 74 (6.116.74)

निर्मनुष्यान्रथान्राजन्सुयुक्ताञ्जवनैर्हयैः । वातायमानानद्राक्षं ध्रियमाणान्विशांपते ॥

nirmanuṣyānrathānrājansuyuktāñjavanairhayaiḥ | vātāyamānānadrākṣaṃ dhriyamāṇānviśāṃpate

हे राजन्, मैंने मनुष्यों से खाली, तेज़ घोड़ों से भली-भाँति जुते रथों को हवा की तरह भागते और खिंचे चले जाते देखा, हे प्रजानाथ।

श्लोक 75 (6.116.75)

चेदिकाशिकरूषाणां सहस्राणि चतुर्दश । महारथाः समाख्याताः कुलपुत्रास्तनुत्यजः ॥

cedikāśikarūṣāṇāṃ sahasrāṇi caturdaśa | mahārathāḥ samākhyātāḥ kulaputrāstanutyajaḥ

चेदि, काशी और करूष देशों के चौदह हज़ार विख्यात महारथी, जो कुलीन वंशों के पुत्र थे और प्राण देने को तैयार थे,

श्लोक 76 (6.116.76)

अपरावर्तिनः शूराः सुवर्णविकृतध्वजाः । संग्रामे भीष्ममासाद्य सवाजिरथकुञ्जराः ॥

aparāvartinaḥ śūrāḥ suvarṇavikṛtadhvajāḥ | saṃgrāme bhīṣmamāsādya savājirathakuñjarāḥ

जो कभी पीठ न दिखाने वाले शूर थे और जिनकी ध्वजाएँ सोने से सजी थीं, संग्राम में अपने घोड़ों, रथों और हाथियों सहित भीष्म के सामने आकर

श्लोक 77 (6.116.77)

जग्मुस्ते परलोकाय व्यादितास्यमिवान्तकम् । न तत्रासीद्रणे राजन्सोमकानां महारथः ॥

jagmuste paralokāya vyāditāsyamivāntakam | na tatrāsīdraṇe rājansomakānāṃ mahārathaḥ

मुँह फैलाए काल के मुख में जाने के समान परलोक चले गए। हे राजन्, उस रण में सोमकों का ऐसा कोई महारथी नहीं था

श्लोक 78 (6.116.78)

यः संप्राप्य रणे भीष्मं जीविते स्म मनो दधे । तांश्च सर्वान्रणे योधान्प्रेतराजपुरं प्रति ॥

yaḥ saṃprāpya raṇe bhīṣmaṃ jīvite sma mano dadhe | tāṃśca sarvānraṇe yodhānpretarājapuraṃ prati

जो रण में भीष्म के सामने पहुँचकर फिर भी जीवित रहने की आशा रख सके। और उन सभी योद्धाओं को

श्लोक 79 (6.116.79)

नीतानमन्यन्त जना दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् । न कश्चिदेनं समरे प्रत्युद्याति महारथः ॥

nītānamanyanta janā dṛṣṭvā bhīṣmasya vikramam | na kaścidenaṃ samare pratyudyāti mahārathaḥ

लोगों ने भीष्म का पराक्रम देखकर प्रेतराज (यम) के नगर में पहुँचाया हुआ ही मान लिया। समर में कोई भी महारथी उनका सामना करने आगे नहीं बढ़ता था,

श्लोक 80 (6.116.80)

ऋते पाण्डुसुतं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् । शिखण्डिनं च समरे पाञ्चाल्यममितौजसम् ॥

ṛte pāṇḍusutaṃ vīraṃ śvetāśvaṃ kṛṣṇasārathim | śikhaṇḍinaṃ ca samare pāñcālyamamitaujasam

सिवाय श्वेत घोड़ों वाले और कृष्ण को सारथि बनाए वीर पाण्डुपुत्र (अर्जुन) के, और अमित तेजस्वी पांचालकुमार शिखण्डी के।

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