भीष्म पर्व · अध्याय 117
अर्जुन द्वारा अपने विरुद्ध भेजे गए राजाओं का संहार
दसवें दिन शिखण्डी भीष्म पर प्रहार करता है, पर भीष्म उसके स्त्री-रूप में जन्म का स्मरण करके उस पर वार नहीं करते और मुस्कराते हुए उसके बाण सहते हैं। दुःशासन अकेले पार्थों से जूझता है, जब तक अर्जुन उसे परास्त नहीं कर देते; फिर दुर्योधन पश्चिम, उत्तर और पूर्व के अनेक जनपदों के योद्धाओं को अर्जुन पर भेजता है, जिन्हें अर्जुन दिव्य अस्त्रों से पतंगों की तरह जला डालते हैं और दुःशासन, विविंशति, कृप, विकर्ण तथा शल्य को रथहीन कर देते हैं। रणभूमि में भीषण संहार फैल जाता है; धृष्टद्युम्न सोमकों और सृञ्जयों को भीष्म पर भेजता है, और जब भीष्म अर्जुन पर दिव्य अस्त्र उठाते हैं तो शिखण्डी को सामने आता देख उसे लौटा लेते हैं, जबकि अर्जुन कौरव-सेना का संहार करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.117.1)
शिखण्डी तु रणे भीष्ममासाद्य पुरुषर्षभम् । दशभिर्निशितैर्भल्लैराजघान स्तनान्तरे ॥
śikhaṇḍī tu raṇe bhīṣmamāsādya puruṣarṣabham | daśabhirniśitairbhallairājaghāna stanāntare
युद्ध में पुरुषश्रेष्ठ भीष्म के पास पहुँचकर शिखण्डी ने दस तीखे भल्लों से उनकी छाती के बीचोंबीच प्रहार किया।
श्लोक 2 (6.117.2)
शिखण्डिनं तु गाङ्गेयः क्रोधदीप्तेन चक्षुषा । संप्रेक्षत कटाक्षेण निर्दहन्निव भारत ॥
śikhaṇḍinaṃ tu gāṅgeyaḥ krodhadīptena cakṣuṣā | saṃprekṣata kaṭākṣeṇa nirdahanniva bhārata
हे भारत, गंगापुत्र ने क्रोध से दहकती आँखों से शिखण्डी को तिरछी दृष्टि से ऐसे देखा, मानो उसे भस्म कर देंगे।
श्लोक 3 (6.117.3)
स्त्रीत्वं तस्य स्मरन्राजन्सर्वलोकस्य पश्यतः । नाजघान रणे भीष्मः स च तन्नावबुद्धवान् ॥
strītvaṃ tasya smaranrājansarvalokasya paśyataḥ | nājaghāna raṇe bhīṣmaḥ sa ca tannāvabuddhavān
हे राजन्, उसके स्त्री होने का स्मरण करके भीष्म ने सारे संसार के देखते हुए भी युद्ध में उस पर प्रहार नहीं किया; और शिखण्डी यह बात समझ नहीं पाया।
श्लोक 4 (6.117.4)
अर्जुनस्तु महाराज शिखण्डिनमभाषत । अभित्वरस्वास्य वधे शिखण्डिन्रथसत्तम ॥
arjunastu mahārāja śikhaṇḍinamabhāṣata | abhitvarasvāsya vadhe śikhaṇḍinrathasattama
तब, हे महाराज, अर्जुन ने शिखण्डी से कहा, 'हे रथियों में श्रेष्ठ शिखण्डी, इनके वध में शीघ्रता करो।
अर्जुन उवाच
श्लोक 5 (6.117.5)
किं ते विवक्षया वीर जहि भीष्मं महारथम् । न ह्यन्यमनुपश्यामि कंचिद्यौधिष्ठिरे बले ॥
kiṃ te vivakṣayā vīra jahi bhīṣmaṃ mahāratham | na hyanyamanupaśyāmi kaṃcidyaudhiṣṭhire bale
हे वीर, बातों से क्या होगा? महारथी भीष्म को मार डालो। युधिष्ठिर की सेना में मुझे ऐसा कोई दूसरा नहीं दिखता
श्लोक 6 (6.117.6)
यः शक्तः समरे भीष्मं योधयेत पितामहम् । ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
yaḥ śaktaḥ samare bhīṣmaṃ yodhayeta pitāmaham | ṛte tvāṃ puruṣavyāghra satyametadbravīmi te
जो समर में पितामह भीष्म से जूझ सके; हे पुरुषसिंह, तुम्हें छोड़कर कोई नहीं। यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।'
सञ्जय उवाच
श्लोक 7 (6.117.7)
एवमुक्तस्तु पार्थेन शिखण्डी भरतर्षभ । शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पितामहमुपाद्रवत् ॥
evamuktastu pārthena śikhaṇḍī bharatarṣabha | śarairnānāvidhaistūrṇaṃ pitāmahamupādravat
हे भरतश्रेष्ठ, पार्थ के ऐसा कहने पर शिखण्डी अनेक प्रकार के बाण लेकर तुरंत पितामह पर टूट पड़ा।
श्लोक 8 (6.117.8)
अचिन्तयित्वा तान्बाणान्पिता देवव्रतस्तव । अर्जुनं समरे क्रुद्धं वारयामास सायकैः ॥
acintayitvā tānbāṇānpitā devavratastava | arjunaṃ samare kruddhaṃ vārayāmāsa sāyakaiḥ
उन बाणों की कोई परवाह न करके आपके पिता देवव्रत ने युद्ध में क्रुद्ध अर्जुन को अपने बाणों से रोक दिया।
श्लोक 9 (6.117.9)
तथैव च चमूं सर्वां पाण्डवानां महारथः । अप्रैषीत्स शरैस्तीक्ष्णैः परलोकाय मारिष ॥
tathaiva ca camūṃ sarvāṃ pāṇḍavānāṃ mahārathaḥ | apraiṣītsa śaraistīkṣṇaiḥ paralokāya māriṣa
और इसी प्रकार, हे माननीय, उन महारथी ने अपने तीखे बाणों से पाण्डवों की सारी सेना को परलोक पहुँचाया।
श्लोक 10 (6.117.10)
तथैव पाण्डवा राजन्सैन्येन महता वृताः । भीष्मं संछादयामासुर्मेघा इव दिवाकरम् ॥
tathaiva pāṇḍavā rājansainyena mahatā vṛtāḥ | bhīṣmaṃ saṃchādayāmāsurmeghā iva divākaram
उसी प्रकार, हे राजन्, विशाल सेना से घिरे पाण्डवों ने भीष्म को ऐसे ढक दिया जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं।
श्लोक 11 (6.117.11)
स समन्तात्परिवृतो भीष्मो हि भरतर्षभ । निर्ददाह रणे शूरान्वने वह्निरिव ज्वलन् ॥
sa samantātparivṛto bhīṣmo hi bharatarṣabha | nirdadāha raṇe śūrānvane vahniriva jvalan
हे भरतश्रेष्ठ, चारों ओर से घिरे भीष्म ने युद्ध में शूरवीरों को वैसे ही जला डाला जैसे वन में धधकती आग।
श्लोक 12 (6.117.12)
तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् । अयोधयच्च यत्पार्थं जुगोप च पितामहम् ॥
tatrādbhutamapaśyāma tava putrasya pauruṣam | ayodhayacca yatpārthaṃ jugopa ca pitāmaham
वहाँ हमने आपके पुत्र का अद्भुत पराक्रम देखा: उसने पार्थ से युद्ध भी किया और पितामह की रक्षा भी की।
श्लोक 13 (6.117.13)
कर्मणा तेन समरे तव पुत्रस्य धन्विनः । दुःशासनस्य तुतुषुः सर्वे लोका महात्मनः ॥
karmaṇā tena samare tava putrasya dhanvinaḥ | duḥśāsanasya tutuṣuḥ sarve lokā mahātmanaḥ
आपके धनुर्धर पुत्र महामना दुःशासन के युद्ध में किए उस पराक्रम से सब लोक प्रसन्न हो उठे,
श्लोक 14 (6.117.14)
यदेकः समरे पार्थान्सानुगान्समयोधयत् । न चैनं पाण्डवा युद्धे वारयामासुरुल्बणम् ॥
yadekaḥ samare pārthānsānugānsamayodhayat | na cainaṃ pāṇḍavā yuddhe vārayāmāsurulbaṇam
क्योंकि उसने अकेले ही युद्ध में अनुयायियों सहित पार्थों से लोहा लिया, और पाण्डव उस उग्र योद्धा को रण में रोक न सके।
श्लोक 15 (6.117.15)
दुःशासनेन समरे रथिनो विरथीकृताः । सादिनश्च महेष्वासा हस्तिनश्च महाबलाः ॥
duḥśāsanena samare rathino virathīkṛtāḥ | sādinaśca maheṣvāsā hastinaśca mahābalāḥ
युद्ध में दुःशासन ने रथियों को रथहीन कर दिया; और घुड़सवार, बड़े-बड़े धनुर्धर तथा महाबली हाथी
श्लोक 16 (6.117.16)
विनिर्भिन्नाः शरैस्तीक्ष्णैर्निपेतुर्वसुधातले । शरातुरास्तथैवान्ये दन्तिनो विद्रुता दिशः ॥
vinirbhinnāḥ śaraistīkṣṇairnipeturvasudhātale | śarāturāstathaivānye dantino vidrutā diśaḥ
उसके तीखे बाणों से विदीर्ण होकर धरती पर गिर पड़े; दूसरे हाथी बाणों से पीड़ित होकर दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 17 (6.117.17)
यथाग्निरिन्धनं प्राप्य ज्वलेद्दीप्तार्चिरुल्बणम् । तथा जज्वाल पुत्रस्ते पाण्डुसेनां विनिर्दहन् ॥
yathāgnirindhanaṃ prāpya jvaleddīptārcirulbaṇam | tathā jajvāla putraste pāṇḍusenāṃ vinirdahan
जैसे ईंधन पाकर आग प्रचण्ड लपटों के साथ धधक उठती है, वैसे ही आपका पुत्र पाण्डु-सेना को जलाता हुआ प्रज्वलित हो उठा।
श्लोक 18 (6.117.18)
तं भारतमहामात्रं पाण्डवानां महारथः । जेतुं नोत्सहते कश्चिन्नाभ्युद्यातुं कथंचन ॥
taṃ bhāratamahāmātraṃ pāṇḍavānāṃ mahārathaḥ | jetuṃ notsahate kaścinnābhyudyātuṃ kathaṃcana
पाण्डवों का कोई भी महारथी भरतवंश के उस श्रेष्ठ योद्धा को जीतने का, या किसी प्रकार उसका सामना करने का भी साहस न कर सका,
श्लोक 19 (6.117.19)
ऋते महेन्द्रतनयाच्छ्वेताश्वात्कृष्णसारथेः । स हि तं समरे राजन्निर्जित्य विजयोऽर्जुनः ॥
ṛte mahendratanayācchvetāśvātkṛṣṇasāratheḥ | sa hi taṃ samare rājannirjitya vijayo'rjunaḥ
सिवाय महेन्द्र के पुत्र अर्जुन के, जिनके घोड़े श्वेत हैं और सारथि श्रीकृष्ण। हे राजन्, विजयी अर्जुन ने युद्ध में उसे परास्त किया
श्लोक 20 (6.117.20)
भीष्ममेवाभिदुद्राव सर्वसैन्यस्य पश्यतः । विजितस्तव पुत्रोऽपि भीष्मबाहुव्यपाश्रयः ॥
bhīṣmamevābhidudrāva sarvasainyasya paśyataḥ | vijitastava putro'pi bhīṣmabāhuvyapāśrayaḥ
और सारी सेना के देखते-देखते भीष्म पर ही धावा बोल दिया। आपका पुत्र पराजित होकर भी भीष्म की भुजाओं का आश्रय लेकर
श्लोक 21 (6.117.21)
पुनः पुनः समाश्वस्य प्रायुध्यत मदोत्कटः । अर्जुनस्तु रणे राजन्योधयन्संव्यराजत ॥
punaḥ punaḥ samāśvasya prāyudhyata madotkaṭaḥ | arjunastu raṇe rājanyodhayansaṃvyarājata
बार-बार सँभलकर रणमद में उन्मत्त होकर लड़ता रहा; और हे राजन्, अर्जुन युद्ध करते हुए रणभूमि में शोभा पा रहे थे।
श्लोक 22 (6.117.22)
शिखण्डी तु रणे राजन्विव्याधैव पितामहम् । शरैरशनिसंस्पर्शैस्तथा सर्पविषोपमैः ॥
śikhaṇḍī tu raṇe rājanvivyādhaiva pitāmaham | śarairaśanisaṃsparśaistathā sarpaviṣopamaiḥ
हे राजन्, शिखण्डी युद्ध में वज्र के समान लगने वाले और सर्प-विष जैसे बाणों से पितामह को बींधता ही रहा।
श्लोक 23 (6.117.23)
न च स्म ते रुजं चक्रुः पितुस्तव जनेश्वर । स्मयमानस्तु गाङ्गेयस्तान्बाणाञ्जगृहे तदा ॥
na ca sma te rujaṃ cakruḥ pitustava janeśvara | smayamānastu gāṅgeyastānbāṇāñjagṛhe tadā
किन्तु, हे जनेश्वर, उन बाणों से आपके पिता को कोई पीड़ा नहीं हुई; गंगापुत्र मुस्कराते हुए उन बाणों को ग्रहण करते रहे।
श्लोक 24 (6.117.24)
उष्णार्तो हि नरो यद्वज्जलधाराः प्रतीच्छति । तथा जग्राह गाङ्गेयः शरधाराः शिखण्डिनः ॥
uṣṇārto hi naro yadvajjaladhārāḥ pratīcchati | tathā jagrāha gāṅgeyaḥ śaradhārāḥ śikhaṇḍinaḥ
जैसे गर्मी से तपा मनुष्य जल की धाराओं का स्वागत करता है, वैसे ही गंगापुत्र ने शिखण्डी की बाण-धाराओं को ग्रहण किया।
श्लोक 25 (6.117.25)
तं क्षत्रिया महाराज ददृशुर्घोरमाहवे । भीष्मं दहन्तं सैन्यानि पाण्डवानां महात्मनाम् ॥
taṃ kṣatriyā mahārāja dadṛśurghoramāhave | bhīṣmaṃ dahantaṃ sainyāni pāṇḍavānāṃ mahātmanām
हे महाराज, क्षत्रियों ने देखा कि भयंकर भीष्म युद्ध में महामना पाण्डवों की सेनाओं को जला रहे हैं।
श्लोक 26 (6.117.26)
ततोऽब्रवीत्तव सुतः सर्वसैन्यानि मारिष । अभिद्रवत संग्रामे फल्गुनं सर्वतो रणे ॥
tato'bravīttava sutaḥ sarvasainyāni māriṣa | abhidravata saṃgrāme phalgunaṃ sarvato raṇe
तब, हे माननीय, आपके पुत्र ने सारी सेनाओं से कहा, 'युद्ध में चारों ओर से फाल्गुन पर धावा बोलो।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 27 (6.117.27)
भीष्मो वः समरे सर्वान्पालयिष्यति धर्मवित् । तद्भयं सुमहत्त्यक्त्वा पाण्डवान्प्रति युध्यत ॥
bhīṣmo vaḥ samare sarvānpālayiṣyati dharmavit | tadbhayaṃ sumahattyaktvā pāṇḍavānprati yudhyata
धर्म के ज्ञाता भीष्म युद्ध में तुम सबकी रक्षा करेंगे। उस भारी भय को त्यागकर पाण्डवों से युद्ध करो।
श्लोक 28 (6.117.28)
एष तालेन महता भीष्मस्तिष्ठति पालयन् । सर्वेषां धार्तराष्ट्राणां समरे शर्म वर्म च ॥
eṣa tālena mahatā bhīṣmastiṣṭhati pālayan | sarveṣāṃ dhārtarāṣṭrāṇāṃ samare śarma varma ca
ये भीष्म अपने विशाल ताल-ध्वज के साथ खड़े होकर युद्ध में सब धार्तराष्ट्रों की रक्षा कर रहे हैं; वे उनके लिए आश्रय भी हैं और कवच भी।
श्लोक 29 (6.117.29)
देवा अपि समुद्युक्ता नालं भीष्मं समासितुम् । किमु पार्था महात्मानं मर्त्यभूता महाबलाः ॥
devā api samudyuktā nālaṃ bhīṣmaṃ samāsitum | kimu pārthā mahātmānaṃ martyabhūtā mahābalāḥ
देवता भी तैयार होकर आएँ तो भीष्म का सामना नहीं कर सकते; फिर मरणधर्मा पार्थ, चाहे कितने ही बलवान हों, उन महात्मा के आगे क्या हैं?
श्लोक 30 (6.117.30)
तस्माद्द्रवत मा योधाः फल्गुनं प्राप्य संयुगे । अहमद्य रणे यत्तो योधयिष्यामि पाण्डवम् ॥
tasmāddravata mā yodhāḥ phalgunaṃ prāpya saṃyuge | ahamadya raṇe yatto yodhayiṣyāmi pāṇḍavam
इसलिए, योद्धाओ, युद्ध में फाल्गुन के सामने आकर भागना मत। आज मैं स्वयं सावधान होकर पाण्डुपुत्र से युद्ध करूँगा,
सञ्जय उवाच
श्लोक 31 (6.117.31)
सहितः सर्वतो यत्तैर्भवद्भिर्वसुधाधिपैः । तच्छ्रुत्वा तु वचो राजंस्तव पुत्रस्य धन्विनः ॥
sahitaḥ sarvato yattairbhavadbhirvasudhādhipaiḥ | tacchrutvā tu vaco rājaṃstava putrasya dhanvinaḥ
चारों ओर से तैयार तुम सब राजाओं के साथ।' हे राजन्, आपके धनुर्धर पुत्र के ये वचन सुनकर
श्लोक 32 (6.117.32)
अर्जुनं प्रति संयत्ता बलवन्तो महाबलाः । ते विदेहाः कलिङ्गाश्च दासेरकगणाश्च ह ॥
arjunaṃ prati saṃyattā balavanto mahābalāḥ | te videhāḥ kaliṅgāśca dāserakagaṇāśca ha
बलवान और महाबली योद्धा अर्जुन से भिड़ने को तैयार हो गए: विदेह, कलिंग और दासेरकों के दल,
श्लोक 33 (6.117.33)
अभिपेतुर्निषादाश्च सौवीराश्च महारणे । बाह्लीका दरदाश्चैव प्रतीच्योदीच्यमालवाः ॥
abhipeturniṣādāśca sauvīrāśca mahāraṇe | bāhlīkā daradāścaiva pratīcyodīcyamālavāḥ
निषाद और सौवीर उस महासमर में उन पर टूट पड़े; बाह्लीक, दरद, पश्चिमी और उत्तरी योद्धा तथा मालव,
श्लोक 34 (6.117.34)
अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः । साल्वः शकास्त्रिगर्ताश्च अम्बष्ठाः केकयैः सह ॥
abhīṣāhāḥ śūrasenāḥ śibayo'tha vasātayaḥ | sālvaḥ śakāstrigartāśca ambaṣṭhāḥ kekayaiḥ saha
अभीषाह, शूरसेन, शिबि और वसाति, शाल्व, शक, त्रिगर्त, और केकयों के साथ अम्बष्ठ
श्लोक 35 (6.117.35)
अभिपेतू रणे पार्थं पतङ्गा इव पावकम् । स तान्सर्वान्सहानीकान्महाराज महारथान् ॥
abhipetū raṇe pārthaṃ pataṅgā iva pāvakam | sa tānsarvānsahānīkānmahārāja mahārathān
युद्ध में पार्थ पर ऐसे टूट पड़े जैसे पतंगे आग पर। हे महाराज, सेनाओं सहित उन सब महारथियों को
श्लोक 36 (6.117.36)
दिव्यान्यस्त्राणि संचिन्त्य प्रसंधाय धनञ्जयः । स तैरस्त्रैर्महावेगैर्ददाह सुमहाबलः ॥
divyānyastrāṇi saṃcintya prasaṃdhāya dhanañjayaḥ | sa tairastrairmahāvegairdadāha sumahābalaḥ
धनञ्जय ने दिव्य अस्त्रों का ध्यान करके उन्हें धनुष पर चढ़ाया, और उन महाबली ने उन महावेगशाली अस्त्रों से
श्लोक 37 (6.117.37)
शरप्रतापैर्बीभत्सुः पतङ्गानिव पावकः । तस्य बाणसहस्राणि सृजतो दृढधन्विनः ॥
śarapratāpairbībhatsuḥ pataṅgāniva pāvakaḥ | tasya bāṇasahasrāṇi sṛjato dṛḍhadhanvinaḥ
बीभत्सु ने अपने बाणों के ताप से उन्हें वैसे ही जला डाला जैसे आग पतंगों को। जब वे दृढ़ धनुर्धर हज़ारों बाण छोड़ रहे थे,
श्लोक 38 (6.117.38)
दीप्यमानमिवाकाशे गाण्डीवं समदृश्यत । ते शरार्ता महाराज विप्रकीर्णमहाध्वजाः ॥
dīpyamānamivākāśe gāṇḍīvaṃ samadṛśyata | te śarārtā mahārāja viprakīrṇamahādhvajāḥ
तब गाण्डीव आकाश में जलता हुआ-सा दिखाई देता था। हे महाराज, बाणों से पीड़ित, बिखरे हुए विशाल ध्वजों वाले
श्लोक 39 (6.117.39)
नाभ्यवर्तन्त राजानः सहिता वानरध्वजम् । सध्वजा रथिनः पेतुर्हयारोहा हयैः सह ॥
nābhyavartanta rājānaḥ sahitā vānaradhvajam | sadhvajā rathinaḥ peturhayārohā hayaiḥ saha
वे राजा मिलकर भी वानरध्वज अर्जुन के सामने टिक न सके। रथी अपने ध्वजों सहित, घुड़सवार अपने घोड़ों सहित,
श्लोक 40 (6.117.40)
सगजाश्च गजारोहाः किरीटिशरताडिताः । ततोऽर्जुनभुजोत्सृष्टैरावृताऽऽसीद्वसुंधरा ॥
sagajāśca gajārohāḥ kirīṭiśaratāḍitāḥ | tato'rjunabhujotsṛṣṭairāvṛtā''sīdvasuṃdharā
और हाथीसवार अपने हाथियों सहित किरीटी के बाणों से आहत होकर गिर पड़े। तब अर्जुन की भुजाओं से छूटे बाणों से धरती ढक गई,
श्लोक 41 (6.117.41)
विद्रुतं दिक्षु सर्वासु शरैर्बलमदृश्यत । अथ पार्थो महाराज द्रावयित्वा वरूथिनीम् ॥
vidrutaṃ dikṣu sarvāsu śarairbalamadṛśyata | atha pārtho mahārāja drāvayitvā varūthinīm
और सेना उनके बाणों से सब दिशाओं में भागती दिखाई दी। तब, हे महाराज, पार्थ ने उस सेना को भगाकर
श्लोक 42 (6.117.42)
दुःशासनाय सुबहून्प्रेषयामास सायकान् । ते तु भित्त्वा तव सुतं दुःशासनमयोमुखाः ॥
duḥśāsanāya subahūnpreṣayāmāsa sāyakān | te tu bhittvā tava sutaṃ duḥśāsanamayomukhāḥ
दुःशासन पर बहुत-से बाण छोड़े। लोहे के मुख वाले वे बाण आपके पुत्र दुःशासन को भेदकर
श्लोक 43 (6.117.43)
धरणीं विविशुः सर्वे वल्मीकमिव पन्नगाः । हयांश्चास्य ततो जघ्ने सारथिं च न्यपातयत् ॥
dharaṇīṃ viviśuḥ sarve valmīkamiva pannagāḥ | hayāṃścāsya tato jaghne sārathiṃ ca nyapātayat
सब के सब धरती में ऐसे समा गए जैसे साँप बाँबी में। फिर उन्होंने उसके घोड़े मार डाले और सारथि को भी गिरा दिया।
श्लोक 44 (6.117.44)
विविंशतिं च विंशत्या विरथीकृतवान्प्रभुः । आजघान भृशं चैव पञ्चभिर्नतपर्वभिः ॥
viviṃśatiṃ ca viṃśatyā virathīkṛtavānprabhuḥ | ājaghāna bhṛśaṃ caiva pañcabhirnataparvabhiḥ
उन प्रभु ने बीस बाणों से विविंशति को रथहीन कर दिया और पाँच सीधी गाँठों वाले बाणों से उस पर गहरा प्रहार किया।
श्लोक 45 (6.117.45)
कृपं विकर्णं शल्यं च विद्ध्वा बहुभिरायसैः । चकार विरथांश्चैव कौन्तेयः श्वेतवाहनः ॥
kṛpaṃ vikarṇaṃ śalyaṃ ca viddhvā bahubhirāyasaiḥ | cakāra virathāṃścaiva kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ
कृप, विकर्ण और शल्य को लोहे के अनेक बाणों से बींधकर श्वेत घोड़ों वाले कुन्तीपुत्र ने उन्हें भी रथहीन कर दिया।
श्लोक 46 (6.117.46)
एवं ते विरथाः सर्वे कृपः शल्यश्च मारिष । दुःशासनो विकर्णश्च तथैव च विविंशतिः ॥
evaṃ te virathāḥ sarve kṛpaḥ śalyaśca māriṣa | duḥśāsano vikarṇaśca tathaiva ca viviṃśatiḥ
इस प्रकार, हे माननीय, रथहीन हुए वे सब, कृप और शल्य, दुःशासन और विकर्ण, तथा विविंशति भी,
श्लोक 47 (6.117.47)
संप्राद्रवन्त समरे निर्जिताः सव्यसाचिना । पूर्वाह्णे भरतश्रेष्ठ पराजित्य महारथान् ॥
saṃprādravanta samare nirjitāḥ savyasācinā | pūrvāhṇe bharataśreṣṭha parājitya mahārathān
सव्यसाची से पराजित होकर युद्ध से भाग खड़े हुए। हे भरतश्रेष्ठ, दिन के पूर्वभाग में उन महारथियों को हराकर
श्लोक 48 (6.117.48)
प्रजज्वाल रणे पार्थो विधूम इव पावकः । तथैव शरवर्षेण भास्करो रश्मिवानिव ॥
prajajvāla raṇe pārtho vidhūma iva pāvakaḥ | tathaiva śaravarṣeṇa bhāskaro raśmivāniva
पार्थ युद्ध में धुएँ-रहित अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठे। और किरणों वाले सूर्य की भाँति बाणों की वर्षा से
श्लोक 49 (6.117.49)
अन्यानपि महाराज तापयामास पार्थिवान् । पराङ्मुखीकृत्य तथा शरवर्षैर्महारथान् ॥
anyānapi mahārāja tāpayāmāsa pārthivān | parāṅmukhīkṛtya tathā śaravarṣairmahārathān
उन्होंने, हे महाराज, दूसरे राजाओं को भी संतप्त कर दिया। बाणों की वर्षा से महारथियों को पीठ दिखाने पर विवश करके
श्लोक 50 (6.117.50)
प्रावर्तयत संग्रामे शोणितोदां महानदीम् । मध्येन कुरुसैन्यानां पाण्डवानां च भारत ॥
prāvartayata saṃgrāme śoṇitodāṃ mahānadīm | madhyena kurusainyānāṃ pāṇḍavānāṃ ca bhārata
उन्होंने, हे भारत, युद्ध में कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं के बीच से रक्तरूपी जल वाली एक विशाल नदी बहा दी।
श्लोक 51 (6.117.51)
तस्मिन्नतिमहाभीमे राजन्वीरवरक्षये । भीष्मं प्रति पराक्रान्ताः पाण्डवाः सह सृञ्जयैः ॥
tasminnatimahābhīme rājanvīravarakṣaye | bhīṣmaṃ prati parākrāntāḥ pāṇḍavāḥ saha sṛñjayaiḥ
हे राजन्, श्रेष्ठ वीरों के उस अत्यन्त भयानक संहार में पाण्डव सृञ्जयों के साथ भीष्म पर पराक्रमपूर्वक टूट पड़े।
श्लोक 52 (6.117.52)
ते पराक्रान्तमालोक्य युधि राजन्पितामहम् । न न्यवर्तन्त ते पुत्रा ब्रह्मलोकपुरस्कृताः ॥
te parākrāntamālokya yudhi rājanpitāmaham | na nyavartanta te putrā brahmalokapuraskṛtāḥ
हे राजन्, युद्ध में पितामह को पराक्रम दिखाते देखकर आपके पुत्र पीछे नहीं हटे; उन्होंने ब्रह्मलोक को ही अपना लक्ष्य बना लिया था।
श्लोक 53 (6.117.53)
इच्छन्तो निधनं युद्धे स्वर्गलोकपरायणाः । पाण्डवानभ्यवर्तन्त तावका युद्धदुर्मदाः ॥
icchanto nidhanaṃ yuddhe svargalokaparāyaṇāḥ | pāṇḍavānabhyavartanta tāvakā yuddhadurmadāḥ
युद्ध में मृत्यु की कामना करते हुए और स्वर्गलोक को ही परम लक्ष्य मानकर आपके रणोन्मत्त योद्धा पाण्डवों पर चढ़ आए।
श्लोक 54 (6.117.54)
पाण्डवाश्च महाराज स्मरन्तो विविधान्बहून् । क्लेशान्कृतान्सपुत्रेण त्वया पूर्वं नराधिप ॥
pāṇḍavāśca mahārāja smaranto vividhānbahūn | kleśānkṛtānsaputreṇa tvayā pūrvaṃ narādhipa
और पाण्डव भी, हे महाराज, हे नराधिप, आपके और आपके पुत्र द्वारा पहले दिए गए अनेक प्रकार के क्लेशों को याद करके,
श्लोक 55 (6.117.55)
भयं त्यक्त्वा रणे शूराः स्वर्गलोकपुरस्कृताः । तावकांस्तव पुत्रांश्च योधयन्ति स्म हृष्टवत् ॥
bhayaṃ tyaktvā raṇe śūrāḥ svargalokapuraskṛtāḥ | tāvakāṃstava putrāṃśca yodhayanti sma hṛṣṭavat
भय त्यागकर, स्वर्गलोक को सामने रखकर, उन शूरवीरों ने हर्ष के साथ आपके सैनिकों और आपके पुत्रों से युद्ध किया।
श्लोक 56 (6.117.56)
गजाश्च रथसङ्घाश्च बहुधा रथिभिर्हताः । रथाश्च निहता नागैर्हयाश्चैव पदातिभिः ॥
gajāśca rathasaṅghāśca bahudhā rathibhirhatāḥ | rathāśca nihatā nāgairhayāścaiva padātibhiḥ
रथियों ने हाथियों और रथ-समूहों को अनेक प्रकार से नष्ट किया; हाथियों ने रथों को और पैदल सैनिकों ने घोड़ों को मारा।
श्लोक 57 (6.117.57)
अन्तरा च्छिद्यमानानि शरीराणि शिरांसि च । निपेतुर्दिक्षु सर्वासु गजाश्वरथयोधिनाम् ॥
antarā cchidyamānāni śarīrāṇi śirāṃsi ca | nipeturdikṣu sarvāsu gajāśvarathayodhinām
हाथी, घोड़े और रथ पर लड़ने वाले योद्धाओं के बीच से कटे धड़ और सिर सब दिशाओं में गिरने लगे।
श्लोक 58 (6.117.58)
छन्नमायोधनं राजन्कुण्डलाङ्गदधारिभिः । पतितैः पात्यमानैश्च राजपुत्रैर्महारथैः ॥
channamāyodhanaṃ rājankuṇḍalāṅgadadhāribhiḥ | patitaiḥ pātyamānaiśca rājaputrairmahārathaiḥ
हे राजन्, कुण्डल और बाजूबंद धारण किए गिरे हुए और गिरते हुए राजकुमारों, महारथियों से रणभूमि ढक गई;
श्लोक 59 (6.117.59)
रथनेमिनिकृत्तैश्च गजैश्चैवावपोथितैः । पादातश्चाप्यधावन्त साश्वाश्च हययोधिनः ॥
rathaneminikṛttaiśca gajaiścaivāvapothitaiḥ | pādātaścāpyadhāvanta sāśvāśca hayayodhinaḥ
रथ के पहियों से कटे और हाथियों से कुचले गए योद्धाओं से भी; पैदल सैनिक दौड़ रहे थे, और घुड़सवार भी अपने घोड़ों सहित।
श्लोक 60 (6.117.60)
गजाश्च रथयोधाश्च परिपेतुः समन्ततः । विकीर्णाश्च रथा भूमौ भग्नचक्रयुगध्वजाः ॥
gajāśca rathayodhāśca paripetuḥ samantataḥ | vikīrṇāśca rathā bhūmau bhagnacakrayugadhvajāḥ
हाथी और रथी चारों ओर दौड़ने लगे, और टूटे पहियों, जुओं और ध्वजों वाले रथ धरती पर बिखरे पड़े थे।
श्लोक 61 (6.117.61)
तद्गजाश्वरथौघानां रुधिरेण समुक्षितम् । छन्नमायोधनं रेजे रक्ताभ्रमिव शारदम् ॥
tadgajāśvarathaughānāṃ rudhireṇa samukṣitam | channamāyodhanaṃ reje raktābhramiva śāradam
हाथियों, घोड़ों और रथों के समूहों के रक्त से भीगी, शवों से ढकी वह रणभूमि शरद् ऋतु के लाल बादल के समान शोभा पा रही थी।
श्लोक 62 (6.117.62)
श्वानः काकाश्च गृध्राश्च वृका गोमायुभिः सह । प्रणेदुर्भक्ष्यमासाद्य विकृताश्च मृगद्विजाः ॥
śvānaḥ kākāśca gṛdhrāśca vṛkā gomāyubhiḥ saha | praṇedurbhakṣyamāsādya vikṛtāśca mṛgadvijāḥ
कुत्ते, कौए, गिद्ध, सियारों के साथ भेड़िये, और विकराल पशु-पक्षी अपना भोजन पाकर चिल्लाने लगे।
श्लोक 63 (6.117.63)
ववुर्बहुविधाश्चैव दिक्षु सर्वासु मारुताः । दृश्यमानेषु रक्षःसु भूतेषु च नदत्सु च ॥
vavurbahuvidhāścaiva dikṣu sarvāsu mārutāḥ | dṛśyamāneṣu rakṣaḥsu bhūteṣu ca nadatsu ca
सब दिशाओं में अनेक प्रकार की हवाएँ चलने लगीं; राक्षस दिखाई दे रहे थे और भूत-प्रेत चीख रहे थे।
श्लोक 64 (6.117.64)
काञ्चनानि च दामानि पताकाश्च महाधनाः । धूयमाना व्यदृश्यन्त सहसा मारुतेरिताः ॥
kāñcanāni ca dāmāni patākāśca mahādhanāḥ | dhūyamānā vyadṛśyanta sahasā māruteritāḥ
सोने की मालाएँ और बहुमूल्य पताकाएँ हवा के झोंकों से सहसा हिलती दिखाई देने लगीं।
श्लोक 65 (6.117.65)
श्वेतच्छत्रसहस्राणि सध्वजाश्च महारथाः । विकीर्णाः समदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥
śvetacchatrasahasrāṇi sadhvajāśca mahārathāḥ | vikīrṇāḥ samadṛśyanta śataśo'tha sahasraśaḥ
हज़ारों श्वेत छत्र और ध्वजों सहित बड़े-बड़े रथ सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में बिखरे दिखाई दिए।
श्लोक 66 (6.117.66)
सपताकाश्च मातङ्गा दिशो जग्मुः शरातुराः । क्षत्रियाश्च मनुष्येन्द्र गदाशक्तिधनुर्धराः ॥
sapatākāśca mātaṅgā diśo jagmuḥ śarāturāḥ | kṣatriyāśca manuṣyendra gadāśaktidhanurdharāḥ
बाणों से पीड़ित, पताकाओं वाले हाथी दिशाओं में भाग चले; और हे मनुष्येन्द्र, गदा, शक्ति और धनुष धारण किए क्षत्रिय
श्लोक 67 (6.117.67)
समन्ततश्च दृश्यन्ते पतिता धरणीतले । इषुभिस्ताड्यमानाश्च नाराचैश्च सहस्रशः । पेतुरार्तस्वरं कृत्वा तत्रतत्र महागजाः ॥
samantataśca dṛśyante patitā dharaṇītale | iṣubhistāḍyamānāśca nārācaiśca sahasraśaḥ | peturārtasvaraṃ kṛtvā tatratatra mahāgajāḥ
चारों ओर धरती पर गिरे दिखाई दे रहे थे। बाणों और हज़ारों नाराचों से आहत होकर बड़े-बड़े हाथी पीड़ा से चिंघाड़ते हुए जहाँ-तहाँ गिर पड़े।
श्लोक 68 (6.117.68)
सेनापतिस्तु समरे प्राह सेनां महारथः । अभ्यद्रवत गाङ्गेयं सैनिकाः किं कृतेन वः ॥
senāpatistu samare prāha senāṃ mahārathaḥ | abhyadravata gāṅgeyaṃ sainikāḥ kiṃ kṛtena vaḥ
तब सेनापति महारथी (धृष्टद्युम्न) ने युद्ध में सेना से कहा, 'सैनिको, गंगापुत्र पर धावा बोलो! अब रुके रहने से क्या लाभ?'
श्लोक 69 (6.117.69)
सेनापतिवचः श्रुत्वा सोमकाः सह सृञ्जयैः । अभ्यद्रवन्त गाङ्गेयं शस्त्रवृष्ट्या समन्ततः ॥
senāpativacaḥ śrutvā somakāḥ saha sṛñjayaiḥ | abhyadravanta gāṅgeyaṃ śastravṛṣṭyā samantataḥ
सेनापति के वचन सुनकर सृञ्जयों सहित सोमकों ने चारों ओर से शस्त्रों की वर्षा करते हुए गंगापुत्र पर धावा बोल दिया।
श्लोक 70 (6.117.70)
ततो भीष्मो महाराज दिव्यमस्त्रमुदीरयन् । अभ्यधावत कौन्तेयं मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥
tato bhīṣmo mahārāja divyamastramudīrayan | abhyadhāvata kaunteyaṃ miṣatāṃ sarvadhanvinām
तब, हे महाराज, भीष्म एक दिव्य अस्त्र का प्रयोग करते हुए सब धनुर्धरों के देखते-देखते कुन्तीपुत्र की ओर दौड़े।
श्लोक 71 (6.117.71)
तं शिखण्डी रणे यान्तमभ्यद्रवत दंशितः । ततः समाहरद्भीष्मस्तदस्त्रं पावकोपमम् ॥
taṃ śikhaṇḍī raṇe yāntamabhyadravata daṃśitaḥ | tataḥ samāharadbhīṣmastadastraṃ pāvakopamam
उन्हें जाते देख कवचधारी शिखण्डी युद्ध में उन पर झपटा; तब भीष्म ने अग्नि के समान वह अस्त्र वापस ले लिया।
श्लोक 72 (6.117.72)
एतस्मिन्नेव काले तु कौन्तेयः श्वेतवाहनः । निजघ्ने तावकं सैन्यं मोहयित्वा पितामहम् ॥
etasminneva kāle tu kaunteyaḥ śvetavāhanaḥ | nijaghne tāvakaṃ sainyaṃ mohayitvā pitāmaham
ठीक उसी समय श्वेत घोड़ों वाले कुन्तीपुत्र ने पितामह को भ्रम में डालकर आपकी सेना का संहार किया।