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भीष्म पर्व · अध्याय 118

दसवें दिन भीष्म का संहार

सेनाएँ ऐसे घमासान में उलझ जाती हैं जहाँ कोई दल अपने समान दल से नहीं भिड़ता; भीष्म पाण्डवों के मर्म काटते हैं और अर्जुन कौरवों के हाथियों को गिराते हैं। धृष्टद्युम्न सोमकों और सृञ्जयों को भीष्म पर भेजता है, और भीष्म परशुराम से मिली शिक्षा के बल पर सात महारथियों, हज़ारों मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों, विराट के भाई शतानीक तथा हज़ारों राजाओं का वध करते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को उन्हें रोकने के लिए प्रेरित करते हैं; अर्जुन पीड़ित पाण्डव वीरों को उबारते हैं, और शिखण्डी को आगे करके पाण्डव योद्धा भीष्म को घेर लेते हैं, पर भीष्म अब भी शिखण्डी पर बाण नहीं चलाते।

अध्याय 117अध्याय-सूचीअध्याय 119

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.118.1)

असंव्यूढेष्वनीकेषु भूयिष्ठमनुवर्तिषु । ब्रह्मलोकपराः सर्वे समपद्यन्त भारत ॥

asaṃvyūḍheṣvanīkeṣu bhūyiṣṭhamanuvartiṣu | brahmalokaparāḥ sarve samapadyanta bhārata

हे भारत, जब सेनाओं की व्यूह-रचना बिखर गई और अधिकांश योद्धा आगे बढ़ते जा रहे थे, तब वे सब ब्रह्मलोक को ही लक्ष्य मानकर लड़ने लगे।

श्लोक 2 (6.118.2)

न ह्यनीकमनीकेषु समसज्जत संकुले । रथा न रथिभिः सार्धं पादाता न पदातिभिः ॥

na hyanīkamanīkeṣu samasajjata saṃkule | rathā na rathibhiḥ sārdhaṃ pādātā na padātibhiḥ

उस घमासान में कोई दल अपने समान दल से नहीं भिड़ा; न रथ रथियों से लड़े, न पैदल पैदलों से;

श्लोक 3 (6.118.3)

अश्वा नाश्वैरयुध्यन्त गजा न गजयोधिभिः । उन्मत्तवन्महाराज युध्यन्ते तत्र भारत ॥

aśvā nāśvairayudhyanta gajā na gajayodhibhiḥ | unmattavanmahārāja yudhyante tatra bhārata

न घोड़े घोड़ों से लड़े, न हाथी हाथी-योद्धाओं से; हे महाराज, हे भारत, वहाँ वे उन्मत्तों की तरह लड़ रहे थे।

श्लोक 4 (6.118.4)

महान्व्यतिकरो रौद्रः सेनयोः समपद्यत । नरनागगणेष्वेवं विकीर्णेषु च सर्वशः ॥

mahānvyatikaro raudraḥ senayoḥ samapadyata | naranāgagaṇeṣvevaṃ vikīrṇeṣu ca sarvaśaḥ

दोनों सेनाओं में भारी और भयंकर उथल-पुथल मच गई। इस प्रकार मनुष्यों और हाथियों के झुंड सब ओर बिखर जाने पर

श्लोक 5 (6.118.5)

क्षये तस्मिन्महारौद्रे निर्विशेषमजायत । ततः शल्यः कृपश्चैव चित्रसेनश्च भारत ॥

kṣaye tasminmahāraudre nirviśeṣamajāyata | tataḥ śalyaḥ kṛpaścaiva citrasenaśca bhārata

उस महाभयंकर संहार में अपने-पराए का कोई भेद न रहा। तब, हे भारत, शल्य, कृप और चित्रसेन,

श्लोक 6 (6.118.6)

दुःशासनो विकर्णश्च रथानास्थाय भास्वरान् । पाण्डवानां रणे शूरा ध्वजिनीं समकम्पयन् ॥

duḥśāsano vikarṇaśca rathānāsthāya bhāsvarān | pāṇḍavānāṃ raṇe śūrā dhvajinīṃ samakampayan

दुःशासन और विकर्ण, इन शूरवीरों ने अपने चमकते रथों पर सवार होकर युद्ध में पाण्डवों की सेना को कँपा दिया।

श्लोक 7 (6.118.7)

सा वध्यमाना समरे पाण्डुसेना महात्मभिः । त्रातारं नाध्यगच्छद्वै मज्जमानेव नौर्जले ॥

sā vadhyamānā samare pāṇḍusenā mahātmabhiḥ | trātāraṃ nādhyagacchadvai majjamāneva naurjale

उन महारथियों के हाथों युद्ध में मारी जाती पाण्डु-सेना को, जल में डूबती नाव की तरह, कोई रक्षक न मिला।

श्लोक 8 (6.118.8)

यथा हि शैशिरः कालो गवां मर्माणि कृन्तति । तथा पाण्डुसुतानां वै भीष्मो मर्माणि कृन्तति ॥

yathā hi śaiśiraḥ kālo gavāṃ marmāṇi kṛntati | tathā pāṇḍusutānāṃ vai bhīṣmo marmāṇi kṛntati

जैसे शिशिर ऋतु गौओं के मर्मस्थलों को काटती है, वैसे ही भीष्म पाण्डुपुत्रों के मर्मों को काट रहे थे।

श्लोक 9 (6.118.9)

तथैव तव सैन्यस्य पार्थेन च महात्मना । नवमेघप्रतीकाशाः पातिता बहुधा गजाः ॥

tathaiva tava sainyasya pārthena ca mahātmanā | navameghapratīkāśāḥ pātitā bahudhā gajāḥ

इसी प्रकार महात्मा पार्थ ने भी आपकी सेना के, नये बादलों जैसे दिखने वाले, बहुत-से हाथियों को मार गिराया।

श्लोक 10 (6.118.10)

मृद्यमानाश्च दृश्यन्ते पार्थेन नरयूथपाः । इषुभिस्ताड्यमानाश्च नाराचैश्च सहस्रशः ॥

mṛdyamānāśca dṛśyante pārthena narayūthapāḥ | iṣubhistāḍyamānāśca nārācaiśca sahasraśaḥ

पार्थ द्वारा रौंदे जाते, बाणों और हज़ारों नाराचों से आहत होते सेनानायक दिखाई दे रहे थे।

श्लोक 11 (6.118.11)

पेतुरार्तस्वरं घोरं कृत्वा तत्र महागजाः । आनद्धाभरणैः कायैर्निहतानां महात्मनाम् ॥

peturārtasvaraṃ ghoraṃ kṛtvā tatra mahāgajāḥ | ānaddhābharaṇaiḥ kāyairnihatānāṃ mahātmanām

बड़े-बड़े हाथी भयानक आर्तनाद करते हुए वहाँ गिर पड़े। मारे गए महामना वीरों के आभूषणों से सजे शरीरों से

श्लोक 12 (6.118.12)

छन्नमायोधनं रेजे शिरोभिश्च सकुण्डलैः । तस्मिन्नेव महाराज महावीरवरक्षये ॥

channamāyodhanaṃ reje śirobhiśca sakuṇḍalaiḥ | tasminneva mahārāja mahāvīravarakṣaye

और कुण्डलों वाले सिरों से ढकी हुई रणभूमि शोभा पा रही थी। हे महाराज, श्रेष्ठ वीरों के उस महासंहार में,

श्लोक 13 (6.118.13)

भीष्मे च युधि विक्रान्ते पाण्डवे च धनञ्जये । ते पराक्रान्तमालोक्य राजन्युधि पितामहम् ॥

bhīṣme ca yudhi vikrānte pāṇḍave ca dhanañjaye | te parākrāntamālokya rājanyudhi pitāmaham

जब भीष्म और पाण्डुपुत्र धनञ्जय युद्ध में पराक्रम दिखा रहे थे, तब हे राजन्, पितामह को रण में आगे बढ़ते देखकर

श्लोक 14 (6.118.14)

अभ्यवर्तन्त ते पुत्राः सर्वे सैन्यपुरस्कृताः । इच्छन्तो निधनं युद्धे स्वर्गं कृत्वा परायणम् ॥

abhyavartanta te putrāḥ sarve sainyapuraskṛtāḥ | icchanto nidhanaṃ yuddhe svargaṃ kṛtvā parāyaṇam

आपके सभी पुत्र अपनी सेनाओं को आगे करके बढ़ चले; वे युद्ध में मृत्यु चाहते थे और स्वर्ग को ही परम लक्ष्य बना चुके थे।

श्लोक 15 (6.118.15)

पाण्डवानभ्यवर्तन्त तस्मिन्वीरवरक्षये । पाण्डवापि महाराज स्मरन्तो विविधान्बहून् ॥

pāṇḍavānabhyavartanta tasminvīravarakṣaye | pāṇḍavāpi mahārāja smaranto vividhānbahūn

श्रेष्ठ वीरों के उस संहार में वे पाण्डवों पर चढ़ आए। और हे महाराज, पाण्डव भी उन अनेक प्रकार के

श्लोक 16 (6.118.16)

क्लेशान्कृतान्सपुत्रेण त्वया पूर्वं नराधिप । भयं त्यक्त्वा रणे शूरा ब्रह्मलोकाय तत्पराः ॥

kleśānkṛtānsaputreṇa tvayā pūrvaṃ narādhipa | bhayaṃ tyaktvā raṇe śūrā brahmalokāya tatparāḥ

क्लेशों को याद करके, जो हे नराधिप, आपने और आपके पुत्र ने पहले उन्हें दिए थे, भय त्यागकर, ब्रह्मलोक पाने में तत्पर उन शूरवीरों ने

श्लोक 17 (6.118.17)

तावकांस्तव पुत्रांश्च योधयन्ति प्रहृष्टवत् । सेनापतिस्तु समरे प्राह सेनां महारथः ॥

tāvakāṃstava putrāṃśca yodhayanti prahṛṣṭavat | senāpatistu samare prāha senāṃ mahārathaḥ

आपके सैनिकों और पुत्रों से हर्षपूर्वक युद्ध किया। तब सेनापति महारथी (धृष्टद्युम्न) ने युद्ध में सेना से कहा,

श्लोक 18 (6.118.18)

अभिद्रवत गाङ्गेयं सोमकाः सृञ्जयैः सह । सेनापतिवचः श्रुत्वा सोमकाः सृञ्जयाश्च ते ॥

abhidravata gāṅgeyaṃ somakāḥ sṛñjayaiḥ saha | senāpativacaḥ śrutvā somakāḥ sṛñjayāśca te

'हे सोमको, सृञ्जयों के साथ गंगापुत्र पर धावा बोलो!' सेनापति के वचन सुनकर वे सोमक और सृञ्जय

श्लोक 19 (6.118.19)

अभ्यद्रवन्त गाङ्गेयं शरवृष्ट्या समाहताः । वध्यमानस्ततो राजन्पिता शान्तनवस्तव ॥

abhyadravanta gāṅgeyaṃ śaravṛṣṭyā samāhatāḥ | vadhyamānastato rājanpitā śāntanavastava

बाणों की वर्षा से आहत होते हुए भी गंगापुत्र पर टूट पड़े। तब, हे राजन्, घायल होते हुए आपके पिता शान्तनुनन्दन

श्लोक 20 (6.118.20)

अमर्षवशमापन्नो योधयामास सृञ्जयान् । तस्य कीर्तिमतस्तात पुरा रामेण धीमता ॥

amarṣavaśamāpanno yodhayāmāsa sṛñjayān | tasya kīrtimatastāta purā rāmeṇa dhīmatā

क्रोध के वश होकर सृञ्जयों से लड़ने लगे। हे तात, उन कीर्तिमान भीष्म को बहुत पहले बुद्धिमान परशुराम ने

श्लोक 21 (6.118.21)

संप्रदत्ताऽस्त्रशिक्षा वै परानीकविनाशनी । स तां विद्यामधिष्ठाय कुर्वन्परबलक्षयम् ॥

saṃpradattā'straśikṣā vai parānīkavināśanī | sa tāṃ vidyāmadhiṣṭhāya kurvanparabalakṣayam

शत्रु-सेनाओं का नाश करने वाली अस्त्र-शिक्षा दी थी। उसी विद्या का आश्रय लेकर शत्रु-सेना का संहार करते हुए

श्लोक 22 (6.118.22)

अहन्यहनि पार्थानां वृद्धः कुरुपितामहः । भीष्मो दशसहस्राणि जघान परवीरहा ॥

ahanyahani pārthānāṃ vṛddhaḥ kurupitāmahaḥ | bhīṣmo daśasahasrāṇi jaghāna paravīrahā

कुरुओं के वृद्ध पितामह, शत्रु-वीरों के संहारक भीष्म प्रतिदिन पार्थों के दस हज़ार योद्धाओं को मारते थे।

श्लोक 23 (6.118.23)

तस्मिंस्तु दशमे प्राप्ते दिवसे भरतर्षभ । एको भीष्मो हि मत्स्येषु पाञ्चालेषु च संयुगे ॥

tasmiṃstu daśame prāpte divase bharatarṣabha | eko bhīṣmo hi matsyeṣu pāñcāleṣu ca saṃyuge

हे भरतश्रेष्ठ, जब वह दसवाँ दिन आया, तब अकेले भीष्म ने युद्ध में मत्स्यों और पाञ्चालों के बीच

श्लोक 24 (6.118.24)

गजाश्वममितं हत्वा हत्वा सप्त महारथान् । हत्वा पञ्चसहस्राणि रथानां प्रपितामहः ॥

gajāśvamamitaṃ hatvā hatvā sapta mahārathān | hatvā pañcasahasrāṇi rathānāṃ prapitāmahaḥ

असंख्य हाथी-घोड़ों को मारा और सात महारथियों का वध किया; उन प्रपितामह ने पाँच हज़ार रथों को,

श्लोक 25 (6.118.25)

नराणां च महायुद्धे सहस्राणि चतुर्दश । दन्तिनां च सहस्राणि हयानामयुतं पुनः ॥

narāṇāṃ ca mahāyuddhe sahasrāṇi caturdaśa | dantināṃ ca sahasrāṇi hayānāmayutaṃ punaḥ

उस महायुद्ध में चौदह हज़ार मनुष्यों को, हज़ारों हाथियों को और फिर दस हज़ार घोड़ों को

श्लोक 26 (6.118.26)

शिक्षाबलेन न्यहनत्पिता तव विशांपते । ततः सर्वमहीपानां क्षपयित्वा वरूथिनीम् ॥

śikṣābalena nyahanatpitā tava viśāṃpate | tataḥ sarvamahīpānāṃ kṣapayitvā varūthinīm

हे प्रजानाथ, आपके पिता ने अपनी शिक्षा के बल से मार गिराया। फिर सब राजाओं की सेनाओं का क्षय करके

श्लोक 27 (6.118.27)

विराटस्य प्रियो भ्राता शतानीको निपातितः । शतानीकं च समरे हत्वा भीष्मः प्रतापवान् ॥

virāṭasya priyo bhrātā śatānīko nipātitaḥ | śatānīkaṃ ca samare hatvā bhīṣmaḥ pratāpavān

उन्होंने विराट के प्रिय भाई शतानीक को मार गिराया। युद्ध में शतानीक को मारकर प्रतापी भीष्म ने

श्लोक 28 (6.118.28)

सहस्राणि महाराज राज्ञां भल्लैरपातयत् । उद्विग्नाः समरे योधा विक्रोशन्ति धनञ्जयम् ॥

sahasrāṇi mahārāja rājñāṃ bhallairapātayat | udvignāḥ samare yodhā vikrośanti dhanañjayam

हे महाराज, अपने भल्लों से हज़ारों राजाओं को गिरा दिया। युद्ध में घबराए हुए योद्धा धनञ्जय को पुकारने लगे।

श्लोक 29 (6.118.29)

ये च केचन पार्थानामभियाता धनञ्जयम् । राजानो भीष्ममासाद्य गतास्ते यमसादनम् ॥

ye ca kecana pārthānāmabhiyātā dhanañjayam | rājāno bhīṣmamāsādya gatāste yamasādanam

पार्थों के जो भी राजा धनञ्जय के पीछे चले, वे भीष्म से भिड़कर यमलोक चले गए।

श्लोक 30 (6.118.30)

किरन्दश दिशो भीष्मः शरजालैः समन्ततः । अतीत्य सेनां पार्थानामवतस्थे चमूमुखे ॥

kirandaśa diśo bhīṣmaḥ śarajālaiḥ samantataḥ | atītya senāṃ pārthānāmavatasthe camūmukhe

दसों दिशाओं में चारों ओर बाणों के जाल बिखेरते हुए भीष्म पार्थों की सेना को लाँघकर सेना के मुहाने पर डट गए।

श्लोक 31 (6.118.31)

स कृत्वा सुमहत्कर्म तस्मिन्वै दशमेऽहनि । सेनयोरन्तरे तिष्ठन्प्रगृहीतशरासनः ॥

sa kṛtvā sumahatkarma tasminvai daśame'hani | senayorantare tiṣṭhanpragṛhītaśarāsanaḥ

उस दसवें दिन महान् पराक्रम करके वे हाथ में धनुष लिए दोनों सेनाओं के बीच खड़े थे,

श्लोक 32 (6.118.32)

न चैनं पार्थिवाः केचिच्छक्ता राजन्निरीक्षितुम् । मध्यं प्राप्तं यथा ग्रीष्मे तपन्तं भास्करं दिवि ॥

na cainaṃ pārthivāḥ kecicchaktā rājannirīkṣitum | madhyaṃ prāptaṃ yathā grīṣme tapantaṃ bhāskaraṃ divi

और हे राजन्, कोई भी राजा उनकी ओर वैसे ही नहीं देख पाता था जैसे ग्रीष्म में दोपहर को आकाश में तपते सूर्य की ओर।

श्लोक 33 (6.118.33)

यथा दैत्यचमूं शक्रस्तापयामास संयुगे । तथा भीष्मः पाण्डवेयांस्तापयामास भारत ॥

yathā daityacamūṃ śakrastāpayāmāsa saṃyuge | tathā bhīṣmaḥ pāṇḍaveyāṃstāpayāmāsa bhārata

हे भारत, जैसे इन्द्र ने युद्ध में दैत्यों की सेना को संतप्त किया था, वैसे ही भीष्म ने पाण्डवों को संतप्त कर दिया।

श्लोक 34 (6.118.34)

तथा चैनं पराक्रान्तमालोक्य मधुसूदनः । उवाच देवकीपुत्रः प्रीयमाणो धनञ्जयम् ॥

tathā cainaṃ parākrāntamālokya madhusūdanaḥ | uvāca devakīputraḥ prīyamāṇo dhanañjayam

उन्हें ऐसा पराक्रम दिखाते देखकर देवकीनन्दन मधुसूदन ने प्रेमपूर्वक धनञ्जय से कहा,

वासुदेव उवाच

श्लोक 35 (6.118.35)

एष शान्तनवो भीष्मः सेनयोरन्तरे स्थितः । सन्निहत्य बलादेनं विजयस्ते भविष्यति ॥

eṣa śāntanavo bhīṣmaḥ senayorantare sthitaḥ | sannihatya balādenaṃ vijayaste bhaviṣyati

'ये शान्तनुनन्दन भीष्म दोनों सेनाओं के बीच खड़े हैं। बलपूर्वक इन्हें मार गिराओ, तो विजय तुम्हारी होगी।

श्लोक 36 (6.118.36)

बलात्संस्तम्भयस्वैनं यत्रैषा भिद्यते चमूः । न हि भीष्मशरानन्यः सोढुमुत्सहते विभो ॥

balātsaṃstambhayasvainaṃ yatraiṣā bhidyate camūḥ | na hi bhīṣmaśarānanyaḥ soḍhumutsahate vibho

जहाँ यह सेना टूट रही है, वहाँ बलपूर्वक इन्हें रोको; क्योंकि हे प्रभो, भीष्म के बाणों को सह सके, ऐसा और कोई नहीं है।'

सञ्जय उवाच

श्लोक 37 (6.118.37)

ततस्तस्मिन्क्षणे राजंश्चोदितो वानरध्वजः । सध्वजं सरथं साश्वं भीष्ममन्तर्दधे शरैः ॥

tatastasminkṣaṇe rājaṃścodito vānaradhvajaḥ | sadhvajaṃ sarathaṃ sāśvaṃ bhīṣmamantardadhe śaraiḥ

तब, हे राजन्, उसी क्षण प्रेरणा पाकर वानरध्वज अर्जुन ने भीष्म को ध्वज, रथ और घोड़ों सहित बाणों से ढक दिया।

श्लोक 38 (6.118.38)

स चापि कुरुमुख्यानामृषभः पाण्डवेरितान् । शरव्रातैः शरव्रातान्बहुधा विदुधाव तान् ॥

sa cāpi kurumukhyānāmṛṣabhaḥ pāṇḍaveritān | śaravrātaiḥ śaravrātānbahudhā vidudhāva tān

और कुरु-प्रमुखों में श्रेष्ठ भीष्म ने पाण्डुपुत्र के छोड़े बाण-समूहों को अपने बाण-समूहों से अनेक प्रकार से छिन्न-भिन्न कर दिया।

श्लोक 39 (6.118.39)

ततः पाञ्चालराजश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् । पाण्डवो भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥

tataḥ pāñcālarājaśca dhṛṣṭaketuśca vīryavān | pāṇḍavo bhīmasenaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ

तब पाञ्चालराज, पराक्रमी धृष्टकेतु, पाण्डुपुत्र भीमसेन, पृषतनन्दन धृष्टद्युम्न,

श्लोक 40 (6.118.40)

यमौ च चेकितानश्च केकयाः पञ्च चैव ह । सात्यकिश्च महाबाहुः सौभद्रोऽथ घटोत्कचः ॥

yamau ca cekitānaśca kekayāḥ pañca caiva ha | sātyakiśca mahābāhuḥ saubhadro'tha ghaṭotkacaḥ

नकुल-सहदेव, चेकितान, पाँचों केकय, महाबाहु सात्यकि, सुभद्रानन्दन (अभिमन्यु) और घटोत्कच,

श्लोक 41 (6.118.41)

द्रौपदेयाः शिखण्डी च कुन्तिभोजश्च वीर्यवान् । विराटश्च महाराज पाण्डवेया महाबलाः ॥

draupadeyāḥ śikhaṇḍī ca kuntibhojaśca vīryavān | virāṭaśca mahārāja pāṇḍaveyā mahābalāḥ

द्रौपदी के पुत्र, शिखण्डी, पराक्रमी कुन्तिभोज और विराट; हे महाराज, पाण्डव-पक्ष के ये महाबली योद्धा,

श्लोक 42 (6.118.42)

एते चान्ये च बहवः पीडिता भीष्मसायकैः । समुद्धृताः फल्गुनेन निमग्नाः शोकसागरे ॥

ete cānye ca bahavaḥ pīḍitā bhīṣmasāyakaiḥ | samuddhṛtāḥ phalgunena nimagnāḥ śokasāgare

ये और दूसरे बहुत-से योद्धा, जो भीष्म के बाणों से पीड़ित होकर शोक-सागर में डूब गए थे, फाल्गुन ने उबार लिए।

श्लोक 43 (6.118.43)

ततः शिखण्डी वेगेन प्रगृह्य परमायुधम् । भीष्ममेवाभिदुद्राव रक्ष्यमाणः किरीटिना ॥

tataḥ śikhaṇḍī vegena pragṛhya paramāyudham | bhīṣmamevābhidudrāva rakṣyamāṇaḥ kirīṭinā

तब शिखण्डी उत्तम आयुध लेकर, किरीटी से रक्षित होकर, वेग से भीष्म पर ही टूट पड़ा।

श्लोक 44 (6.118.44)

ततोऽस्यानुचरान्हत्वा सर्वान्रणविभागवित् । भीष्ममेवाभिदुद्राव बीभत्सुरपराजितः ॥

tato'syānucarānhatvā sarvānraṇavibhāgavit | bhīṣmamevābhidudrāva bībhatsuraparājitaḥ

फिर रण-विभाग के ज्ञाता, अपराजित बीभत्सु ने भीष्म के सब अनुचरों को मारकर स्वयं भीष्म पर धावा बोला।

श्लोक 45 (6.118.45)

सात्यकिश्चेकितानश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । विराटो द्रुपदश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥

sātyakiścekitānaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | virāṭo drupadaścaiva mādrīputrau ca pāṇḍavau

सात्यकि, चेकितान, पृषतनन्दन धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद और माद्री के दोनों पाण्डव पुत्र

श्लोक 46 (6.118.46)

दुद्रुवुर्भीष्ममेवाजौ रक्षिता दृढधन्वना । अभिमन्युश्च समरे द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ॥

dudruvurbhīṣmamevājau rakṣitā dṛḍhadhanvanā | abhimanyuśca samare draupadyāḥ pañca cātmajāḥ

उस दृढ़ धनुर्धर से रक्षित होकर युद्ध में भीष्म पर ही दौड़े। अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्रों ने भी

श्लोक 47 (6.118.47)

ददृशुः समरे भीष्मं समुद्यतमहायुधम् । ते सर्वे दृढधन्वानः संयुगेष्वपलायिनः ॥

dadṛśuḥ samare bhīṣmaṃ samudyatamahāyudham | te sarve dṛḍhadhanvānaḥ saṃyugeṣvapalāyinaḥ

युद्ध में बड़ा आयुध उठाए भीष्म को देखा। वे सब दृढ़ धनुर्धर, जो युद्ध से कभी पीछे नहीं हटते थे,

श्लोक 48 (6.118.48)

बहुधा भीष्ममानर्च्छुर्मार्गणैः क्षतमार्गणैः । विधूय तान्बाणगणान्ये मुक्ताः पार्थिवोत्तमैः ॥

bahudhā bhīṣmamānarcchurmārgaṇaiḥ kṣatamārgaṇaiḥ | vidhūya tānbāṇagaṇānye muktāḥ pārthivottamaiḥ

घाव करने वाले बाणों से भीष्म पर बार-बार प्रहार करने लगे। उन श्रेष्ठ राजाओं द्वारा छोड़े गए बाण-समूहों को झटककर

श्लोक 49 (6.118.49)

पाण्डवानामदीनात्मा व्यगाहत वरूथिनीम् । चक्रे शरविघातं च क्रीडन्निव पितामहः ॥

pāṇḍavānāmadīnātmā vyagāhata varūthinīm | cakre śaravighātaṃ ca krīḍanniva pitāmahaḥ

अदीन-हृदय पितामह पाण्डवों की सेना में घुस गए और मानो खेल-खेल में उनके बाणों को काटते रहे।

श्लोक 50 (6.118.50)

नाभिसंधत्त पाञ्चाल्ये स्मयमानो मुहुर्मुहुः । स्त्रीत्वं तस्यानुसंस्मृत्य भीष्मो बाणाञ्शिखण्डिने ॥

nābhisaṃdhatta pāñcālye smayamāno muhurmuhuḥ | strītvaṃ tasyānusaṃsmṛtya bhīṣmo bāṇāñśikhaṇḍine

बार-बार मुस्कराते हुए वे पाञ्चाल-कुमार पर निशाना नहीं साधते थे; उसके स्त्री होने का स्मरण करके भीष्म ने शिखण्डी पर बाण नहीं चलाए,

श्लोक 51 (6.118.51)

जघान द्रुपदानीके रथान्सप्त महारथः । ततः किलकिलाशब्दः क्षणेन समभूत्तदा ॥

jaghāna drupadānīke rathānsapta mahārathaḥ | tataḥ kilakilāśabdaḥ kṣaṇena samabhūttadā

पर उन महारथी ने द्रुपद की सेना के सात रथियों का वध कर डाला। तब क्षणभर में किलकिलाहट का शोर उठा

श्लोक 52 (6.118.52)

मत्स्यपाञ्चालचेदीनां तमेकमभिधावताम् । ते नराश्वरथव्रातैर्मार्गणैश्च परंतप ॥

matsyapāñcālacedīnāṃ tamekamabhidhāvatām | te narāśvarathavrātairmārgaṇaiśca paraṃtapa

मत्स्य, पाञ्चाल और चेदि योद्धाओं का, जो उस अकेले पर दौड़ पड़े थे। हे परन्तप, उन्होंने मनुष्यों, घोड़ों और रथों के समूहों तथा बाणों से

श्लोक 53 (6.118.53)

तमेकं छादयामासुर्मेघा इव दिवाकरम् । भीष्मं भागीरथीपुत्रं प्रतपन्तं रणे रिपून् ॥

tamekaṃ chādayāmāsurmeghā iva divākaram | bhīṣmaṃ bhāgīrathīputraṃ pratapantaṃ raṇe ripūn

रण में शत्रुओं को संतप्त करते उन अकेले भागीरथीपुत्र भीष्म को ऐसे ढक दिया जैसे बादल सूर्य को।

श्लोक 54 (6.118.54)

ततस्तस्य च तेषां च युद्धे देवासुरोपमे । किरीटी भीष्ममानर्च्छ पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ॥

tatastasya ca teṣāṃ ca yuddhe devāsuropame | kirīṭī bhīṣmamānarccha puraskṛtya śikhaṇḍinam

तब उनके और उन योद्धाओं के बीच देवासुर-संग्राम जैसे उस युद्ध में किरीटी अर्जुन ने शिखण्डी को आगे करके भीष्म पर आक्रमण किया।

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