Skip to main content

भीष्म पर्व · अध्याय 119

भीष्म का पतन

दसवें दिन पाण्डव शिखण्डी को आगे करके भीष्म को घेर लेते हैं, और अर्जुन उनके एक के बाद एक धनुष काटते जाते हैं। पाण्डव अवध्य हैं और शिखण्डी स्त्रीरूप में जन्मा है, इसलिए भीष्म प्रतिकार न करने का निश्चय करते हैं, और आकाश में स्थित ऋषि तथा वसु इसका अनुमोदन करते हैं; वे दुःशासन से कहते हैं कि उन्हें चीरने वाले बाण अर्जुन के हैं, शिखण्डी के नहीं। सर्वांग बिंधकर वे सूर्यास्त से पहले रथ से बाणों की शय्या पर गिरते हैं, और सूर्य के दक्षिणायन में होने के कारण गंगा के भेजे हंसरूप ऋषियों के सामने उत्तरायण तक प्राण धारण करने का संकल्प करते हैं। पाण्डव हर्षित होते हैं, कौरव स्तब्ध रह जाते हैं, और भीष्म योग में स्थित होकर अपने समय की प्रतीक्षा करते हैं।

अध्याय 118अध्याय-सूचीअध्याय 120

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.119.1)

एवं ते पाण्डवाः सर्वे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । विव्यधुः समरे भीष्मं परिवार्य समन्ततः ॥

evaṃ te pāṇḍavāḥ sarve puraskṛtya śikhaṇḍinam | vivyadhuḥ samare bhīṣmaṃ parivārya samantataḥ

इस प्रकार सब पाण्डवों ने शिखण्डी को आगे करके भीष्म को चारों ओर से घेर लिया और युद्ध में उन्हें बींधने लगे।

श्लोक 2 (6.119.2)

शतघ्नीभिः सुघोराभिः परिघैश्च परश्वथैः । मुद्गरैर्मुसलैः प्रासैः क्षेपणीयैश्च सर्वशः ॥

śataghnībhiḥ sughorābhiḥ parighaiśca paraśvathaiḥ | mudgarairmusalaiḥ prāsaiḥ kṣepaṇīyaiśca sarvaśaḥ

भयंकर शतघ्नियों, परिघों और फरसों से, मुद्गरों, मूसलों, प्रासों और हर प्रकार के फेंके जाने वाले अस्त्रों से,

श्लोक 3 (6.119.3)

शरैः कनकपुङ्खैश्च शक्तितोमरकम्पनैः । नाराचैर्वत्सदन्तैश्च भुशुण्डीभिश्च सर्वशः ॥

śaraiḥ kanakapuṅkhaiśca śaktitomarakampanaiḥ | nārācairvatsadantaiśca bhuśuṇḍībhiśca sarvaśaḥ

सोने के पंखों वाले बाणों से, शक्ति, तोमर और कम्पन नामक अस्त्रों से, नाराचों, वत्सदन्त बाणों और भुशुण्डियों से सब ओर से

श्लोक 4 (6.119.4)

अताडयन्रणे भीष्मं सहिताः सर्वसृञ्जयाः । स विशीर्णतनुत्राणः पीडितो बहुभिस्तदा ॥

atāḍayanraṇe bhīṣmaṃ sahitāḥ sarvasṛñjayāḥ | sa viśīrṇatanutrāṇaḥ pīḍito bahubhistadā

सब सृञ्जयों ने मिलकर रणभूमि में भीष्म पर प्रहार किया। उनका कवच छिन्न-भिन्न हो गया था और अनेक योद्धा एक साथ उन्हें पीड़ित कर रहे थे,

श्लोक 5 (6.119.5)

न विव्यथे तदा भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु । संदीप्तशरचापाग्निरस्त्रप्रसृतमारुतः ॥

na vivyathe tadā bhīṣmo bhidyamāneṣu marmasu | saṃdīptaśaracāpāgnirastraprasṛtamārutaḥ

फिर भी मर्मस्थल बिंधते रहने पर भी भीष्म विचलित नहीं हुए। उनके प्रज्वलित बाण और धनुष अग्नि थे, और उनके अस्त्र उस अग्नि को फैलाने वाली वायु;

श्लोक 6 (6.119.6)

नेमिनिर्ह्रादसंतापो महास्त्रोदयपावकः । चित्रचापमहाज्वालो वीरक्षयमहेन्धनः ॥

neminirhrādasaṃtāpo mahāstrodayapāvakaḥ | citracāpamahājvālo vīrakṣayamahendhanaḥ

रथ के पहियों की घरघराहट उसका ताप थी, महान् अस्त्रों का उठना उसका भभकना, उनका विचित्र धनुष उसकी विशाल लपट, और मारे जाते वीर उसका ईंधन।

श्लोक 7 (6.119.7)

युगान्ताग्निसमप्रख्यः परेषां समपद्यत । निवृत्य रथसङ्घानामन्तरेण विनिःसृतः ॥

yugāntāgnisamaprakhyaḥ pareṣāṃ samapadyata | nivṛtya rathasaṅghānāmantareṇa viniḥsṛtaḥ

शत्रुओं को वे युगान्त की अग्नि के समान दिखाई देने लगे। वे लौटकर रथ-समूहों के बीच से होकर बाहर निकल आते,

श्लोक 8 (6.119.8)

दृश्यते स्म नरेन्द्राणां पुनर्मध्यगतश्चरन् । ततः पाञ्चालराजं च धृष्टकेतुमतीत्य च ॥

dṛśyate sma narendrāṇāṃ punarmadhyagataścaran | tataḥ pāñcālarājaṃ ca dhṛṣṭaketumatītya ca

और फिर राजाओं के बीच विचरते दिखाई देते। तब पाञ्चालराज और धृष्टकेतु को लाँघकर

श्लोक 9 (6.119.9)

पाण्डवानीकिनीमध्यमाससाद विशांपते । ततः सात्यकिभीमौ च पाण्डवं च धनञ्जयम् ॥

pāṇḍavānīkinīmadhyamāsasāda viśāṃpate | tataḥ sātyakibhīmau ca pāṇḍavaṃ ca dhanañjayam

हे प्रजानाथ, वे पाण्डव सेना के ठीक बीच में जा पहुँचे। तब सात्यकि और भीम, पाण्डुपुत्र धनञ्जय,

श्लोक 10 (6.119.10)

द्रुपदं च विराटं च धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । भीमघोषैर्महावेगैर्मर्मावरणभेदिभिः ॥

drupadaṃ ca virāṭaṃ ca dhṛṣṭadyumnaṃ ca pārṣatam | bhīmaghoṣairmahāvegairmarmāvaraṇabhedibhiḥ

द्रुपद, विराट और पृषतवंशी धृष्टद्युम्न—इन्हें भयानक शब्द करने वाले, अत्यन्त वेगवान्, कवच और मर्मों को भेदने वाले

श्लोक 11 (6.119.11)

षडेतान्निशितैर्भीष्मः प्रविव्याधोत्तमैः शरैः । तस्य ते निशितान्बाणान्सन्निवार्य महारथाः ॥

ṣaḍetānniśitairbhīṣmaḥ pravivyādhottamaiḥ śaraiḥ | tasya te niśitānbāṇānsannivārya mahārathāḥ

तीखे, उत्तम बाणों से भीष्म ने इन छहों को बींध डाला। उन महारथियों ने उनके तीखे बाणों को रोककर

श्लोक 12 (6.119.12)

दशभिर्दशभिर्भीष्ममर्दयामासुरोजसा । शिखण्डी तु महाबाणान्यान्मुमोच महारथः ॥

daśabhirdaśabhirbhīṣmamardayāmāsurojasā | śikhaṇḍī tu mahābāṇānyānmumoca mahārathaḥ

पूरे बल से भीष्म को दस-दस बाणों से पीड़ित किया। परन्तु महारथी शिखण्डी ने जो बड़े-बड़े बाण छोड़े,

श्लोक 13 (6.119.13)

न चक्रुस्ते रुजं तस्य स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः । ततः किरीटी संरब्धो भीष्ममेवाभ्यधावत ॥

na cakruste rujaṃ tasya svarṇapuṅkhāḥ śilāśitāḥ | tataḥ kirīṭī saṃrabdho bhīṣmamevābhyadhāvata

वे सोने के पंखों वाले, सान पर चढ़े बाण उन्हें कोई पीड़ा न दे सके। तब किरीटी (अर्जुन) क्रोध में भरकर स्वयं भीष्म की ओर दौड़े,

श्लोक 14 (6.119.14)

शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्चास्य समाच्छिनत् । भीष्मस्य धनुषश्छेदं नामृष्यन्त महारथाः ॥

śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya dhanuścāsya samācchinat | bhīṣmasya dhanuṣaśchedaṃ nāmṛṣyanta mahārathāḥ

और शिखण्डी को आगे करके उन्होंने भीष्म का धनुष काट डाला। भीष्म के धनुष का कटना महारथी सहन न कर सके—

श्लोक 15 (6.119.15)

द्रोणश्च कृतवर्मा च सैन्धवश्च जयद्रथः । भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तस्तथैव च ॥

droṇaśca kṛtavarmā ca saindhavaśca jayadrathaḥ | bhūriśravāḥ śalaḥ śalyo bhagadattastathaiva ca

द्रोण और कृतवर्मा, सिन्धुराज जयद्रथ, भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त भी—

श्लोक 16 (6.119.16)

सप्तैते परमक्रुद्धाः किरीटिनमभिद्रुताः । तत्र शस्त्राणि दिव्यानि दर्शयन्तो महारथाः ॥

saptaite paramakruddhāḥ kirīṭinamabhidrutāḥ | tatra śastrāṇi divyāni darśayanto mahārathāḥ

ये सातों अत्यन्त क्रुद्ध होकर किरीटी पर टूट पड़े। वहाँ दिव्य अस्त्रों का प्रदर्शन करते हुए वे महारथी

श्लोक 17 (6.119.17)

अभिपेतुर्भृशं क्रुद्धाश्छादयन्तश्च पाण्डवम् । तेषामापततां शब्दः शुश्रुवे फल्गुनं प्रति ॥

abhipeturbhṛśaṃ kruddhāśchādayantaśca pāṇḍavam | teṣāmāpatatāṃ śabdaḥ śuśruve phalgunaṃ prati

अत्यन्त क्रोध से पाण्डुपुत्र पर झपटे और उन्हें बाणों से ढकने लगे। उनके धावे का कोलाहल फाल्गुन (अर्जुन) के चारों ओर सुनाई दिया,

श्लोक 18 (6.119.18)

उद्धूतानां यथा शब्दः समुद्राणां युगक्षये । घ्नत त्वरत गृह्णीत विद्ध्यध्वमवकर्तत ॥

uddhūtānāṃ yathā śabdaḥ samudrāṇāṃ yugakṣaye | ghnata tvarata gṛhṇīta viddhyadhvamavakartata

जैसे युगान्त में उफनते समुद्रों का गर्जन हो। "मारो, जल्दी करो, पकड़ो, बींधो, काट डालो!"—

श्लोक 19 (6.119.19)

इत्यासीत्तुमुलः शब्दः फल्गुनस्य रथं प्रति । तं शब्दं तुमुलं श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः ॥

ityāsīttumulaḥ śabdaḥ phalgunasya rathaṃ prati | taṃ śabdaṃ tumulaṃ śrutvā pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ

ऐसा तुमुल शब्द फाल्गुन के रथ के चारों ओर उठा। उस तुमुल शब्द को सुनकर पाण्डवों के महारथी,

श्लोक 20 (6.119.20)

अभ्यधावन्परीप्सन्तः फल्गुनं भरतर्षभ । सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥

abhyadhāvanparīpsantaḥ phalgunaṃ bharatarṣabha | sātyakirbhīmasenaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ

हे भरतश्रेष्ठ, फाल्गुन की रक्षा करने को दौड़ पड़े—सात्यकि, भीमसेन, पृषतवंशी धृष्टद्युम्न,

श्लोक 21 (6.119.21)

विराटद्रुपदौ चोभौ राक्षसश्च घटोत्कचः । अभिमन्युश्च संक्रुद्धः सप्तैते क्रोधमूर्च्छिताः ॥

virāṭadrupadau cobhau rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ | abhimanyuśca saṃkruddhaḥ saptaite krodhamūrcchitāḥ

विराट और द्रुपद दोनों, राक्षस घटोत्कच और क्रोध से भरा अभिमन्यु—क्रोध से उन्मत्त ये सातों,

श्लोक 22 (6.119.22)

समभ्यधावंस्त्वरिताश्चित्रकार्मुकधारिणः । तेषां समभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥

samabhyadhāvaṃstvaritāścitrakārmukadhāriṇaḥ | teṣāṃ samabhavadyuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam

विचित्र धनुष धारण किए शीघ्रता से दौड़ पड़े। उनके बीच रोंगटे खड़े कर देने वाला तुमुल युद्ध छिड़ गया,

श्लोक 23 (6.119.23)

संग्रामे भरतश्रेष्ठ देवानां दानवैरिव । शिखण्डी तु रणे श्रेष्ठो रक्ष्यमाणः किरीटिना ॥

saṃgrāme bharataśreṣṭha devānāṃ dānavairiva | śikhaṇḍī tu raṇe śreṣṭho rakṣyamāṇaḥ kirīṭinā

हे भरतश्रेष्ठ, जैसा देवताओं और दानवों का संग्राम हुआ था। इधर रणश्रेष्ठ शिखण्डी ने किरीटी से सुरक्षित रहकर

श्लोक 24 (6.119.24)

अविध्यद्दशभिर्भीष्मं छिन्नधन्वानमाहवे । सारथिं दशभिश्चास्य ध्वजं चैकेन चिच्छिदे ॥

avidhyaddaśabhirbhīṣmaṃ chinnadhanvānamāhave | sārathiṃ daśabhiścāsya dhvajaṃ caikena cicchide

युद्ध में धनुष कट चुके भीष्म को दस बाणों से बींधा; दस बाणों से उनके सारथि को मारा और एक बाण से उनकी ध्वजा काट गिराई।

श्लोक 25 (6.119.25)

सोऽन्यत्कार्मुकमादाय गाङ्गेयो वेगवत्तरम् । तदप्यस्य शितैर्बाणैस्त्रिभिश्चिच्छेद फल्गुनः ॥

so'nyatkārmukamādāya gāṅgeyo vegavattaram | tadapyasya śitairbāṇaistribhiściccheda phalgunaḥ

गंगानन्दन ने दूसरा, और भी वेगवान् धनुष उठाया; उसे भी फाल्गुन ने तीन तीखे बाणों से काट डाला।

श्लोक 26 (6.119.26)

एवं स पाण्डवः क्रुद्ध आत्तमात्तं पुनः पुनः । धनुश्चिच्छेद भीष्मस्य सव्यसाची परंतपः ॥

evaṃ sa pāṇḍavaḥ kruddha āttamāttaṃ punaḥ punaḥ | dhanuściccheda bhīṣmasya savyasācī paraṃtapaḥ

इस प्रकार शत्रुओं को तपाने वाले क्रुद्ध पाण्डुपुत्र सव्यसाची ने, भीष्म जब-जब धनुष उठाते, तब-तब उसे काट डाला।

श्लोक 27 (6.119.27)

स च्छिन्नधन्वा संक्रुद्धः सृक्किणी परिसंलिहन् । शक्तिं जग्राह तरसा गिरीणामपि दारणीम् ॥

sa cchinnadhanvā saṃkruddhaḥ sṛkkiṇī parisaṃlihan | śaktiṃ jagrāha tarasā girīṇāmapi dāraṇīm

धनुष कट जाने पर क्रोध से भरे भीष्म ने होंठों के कोने चाटते हुए वेग से एक ऐसी शक्ति उठाई जो पर्वतों को भी चीर सकती थी,

श्लोक 28 (6.119.28)

तां च चिक्षेप संक्रुद्धः फल्गुनस्य रथं प्रति । तामापतन्तीं संप्रेक्ष्य ज्वलन्तीमशनीमिव ॥

tāṃ ca cikṣepa saṃkruddhaḥ phalgunasya rathaṃ prati | tāmāpatantīṃ saṃprekṣya jvalantīmaśanīmiva

और क्रोधपूर्वक उसे फाल्गुन के रथ की ओर फेंका। वज्र के समान प्रज्वलित उस शक्ति को आते देखकर

श्लोक 29 (6.119.29)

समादत्त शितान्भल्लान्पञ्च पाण्डवनन्दनः । तस्य चिच्छेद तां शक्तिं पञ्चधा पञ्चभिः शरैः ॥

samādatta śitānbhallānpañca pāṇḍavanandanaḥ | tasya ciccheda tāṃ śaktiṃ pañcadhā pañcabhiḥ śaraiḥ

पाण्डवों को आनन्द देने वाले अर्जुन ने पाँच तीखे भल्ल उठाए, और उन पाँच बाणों से उस शक्ति के पाँच टुकड़े कर दिए—

श्लोक 30 (6.119.30)

संक्रुद्धो भरतश्रेष्ठ भीष्मबाहुप्रवेरिताम् । सा पपात तथा च्छिन्ना संक्रुद्धेन किरीटिना ॥

saṃkruddho bharataśreṣṭha bhīṣmabāhupraveritām | sā papāta tathā cchinnā saṃkruddhena kirīṭinā

हे भरतश्रेष्ठ, भीष्म की भुजा से फेंकी गई उस शक्ति को उन्होंने क्रोधपूर्वक काट डाला। क्रुद्ध किरीटी द्वारा इस प्रकार काटी गई वह शक्ति गिर पड़ी,

श्लोक 31 (6.119.31)

मेघबृन्दपरिभ्रष्टा विच्छिन्नेव शतह्रदा । छिन्नां तां शक्तिमालोक्य भीष्मः क्रोधसमन्वितः ॥

meghabṛndaparibhraṣṭā vicchinneva śatahradā | chinnāṃ tāṃ śaktimālokya bhīṣmaḥ krodhasamanvitaḥ

मानो मेघ-समूह से टूटकर गिरी हुई बिजली हो। अपनी शक्ति को कटा हुआ देखकर क्रोध से भरे

श्लोक 32 (6.119.32)

अचिन्तयद्रणे वीरो बुद्ध्या परपुरंजयः । शक्तोऽहं धनुषैकेन निहन्तुं सर्वपाण्डवान् ॥

acintayadraṇe vīro buddhyā parapuraṃjayaḥ | śakto'haṃ dhanuṣaikena nihantuṃ sarvapāṇḍavān

शत्रुनगरों को जीतने वाले वीर भीष्म ने रणभूमि में मन-ही-मन सोचा—"मैं एक ही धनुष से सब पाण्डवों को मार सकता हूँ,

श्लोक 33 (6.119.33)

यद्येषां न भवेद्गोप्ता विष्वक्सेनो महाबलः । अजय्यश्चैव सर्वेषां लोकानामिति मे मतिः । कारणद्वयमास्थाय नाहं योत्स्यामि पाण्डवान् ॥

yadyeṣāṃ na bhavedgoptā viṣvakseno mahābalaḥ | ajayyaścaiva sarveṣāṃ lokānāmiti me matiḥ | kāraṇadvayamāsthāya nāhaṃ yotsyāmi pāṇḍavān

यदि महाबली विष्वक्सेन (श्रीकृष्ण) उनके रक्षक न होते; और मेरा मत है कि वे समस्त लोकों के लिए भी अजेय हैं। दो कारणों से मैं पाण्डवों से युद्ध नहीं करूँगा—

श्लोक 34 (6.119.34)

अवध्यत्वाच्च पाण्डूनां स्त्रीभावाच्च शिखण्डिनः । पित्रा तुष्टेन मे पूर्वं यदा कालीमुदवहम् ॥

avadhyatvācca pāṇḍūnāṃ strībhāvācca śikhaṇḍinaḥ | pitrā tuṣṭena me pūrvaṃ yadā kālīmudavaham

एक तो पाण्डु के पुत्र मेरे लिए अवध्य हैं, दूसरे शिखण्डी स्त्रीरूप में जन्मा है। पूर्वकाल में जब मैं काली (सत्यवती) को ले आया था, तब मेरे पिता ने प्रसन्न होकर

श्लोक 35 (6.119.35)

स्वच्छन्दमरणं दत्तमवध्यत्वं रणे तथा । तस्मान्मृत्युमहं मन्ये प्राप्तकालमिवात्मनः ॥

svacchandamaraṇaṃ dattamavadhyatvaṃ raṇe tathā | tasmānmṛtyumahaṃ manye prāptakālamivātmanaḥ

मुझे इच्छामृत्यु और युद्ध में अवध्यता का वर दिया था। इसलिए मैं समझता हूँ कि मेरी मृत्यु का समय मानो आ पहुँचा है।"

श्लोक 36 (6.119.36)

एवं ज्ञात्वा व्यवसितं भीष्मस्यामिततेजसः । ऋषयो वसवश्चैव वियत्स्था भीष्ममब्रुवन् ॥

evaṃ jñātvā vyavasitaṃ bhīṣmasyāmitatejasaḥ | ṛṣayo vasavaścaiva viyatsthā bhīṣmamabruvan

अमित तेजस्वी भीष्म का यह निश्चय जानकर आकाश में स्थित ऋषियों और वसुओं ने भीष्म से कहा—

ऋषय ऊचुः

श्लोक 37 (6.119.37)

यत्ते व्यवसितं तात तदस्माकमपि प्रियम् । तत्कुरुष्व महाराज युद्धे बुद्धिं निवर्तय ॥

yatte vyavasitaṃ tāta tadasmākamapi priyam | tatkuruṣva mahārāja yuddhe buddhiṃ nivartaya

"तात, तुमने जो निश्चय किया है वह हमें भी प्रिय है। महाराज, वैसा ही करो; युद्ध से अपनी बुद्धि हटा लो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 38 (6.119.38)

अस्य वाक्यस्य निधने प्रादुरासीच्छिवोऽनिलः । अनुलोमः सुगन्धी च पृषतैश्च समन्वितः ॥

asya vākyasya nidhane prādurāsīcchivo'nilaḥ | anulomaḥ sugandhī ca pṛṣataiśca samanvitaḥ

इन वचनों के समाप्त होते ही एक मंगलमय वायु प्रकट हुई—अनुकूल दिशा से बहती, सुगन्धित और जल की फुहारों से युक्त।

श्लोक 39 (6.119.39)

देवदुन्दुभयश्चैव संप्रणेदुर्महास्वनाः । पपात पुष्पवृष्टिश्च भीष्मस्योपरि मारिष ॥

devadundubhayaścaiva saṃpraṇedurmahāsvanāḥ | papāta puṣpavṛṣṭiśca bhīṣmasyopari māriṣa

देवताओं की दुन्दुभियाँ गम्भीर स्वर में बज उठीं, और हे मान्यवर, भीष्म के ऊपर पुष्पों की वर्षा होने लगी।

श्लोक 40 (6.119.40)

न च ताः शुश्रुवे कश्चित्तेषां संवदतां गिरः । ऋते भीष्मं महाबाहुं मां चापि मुनितेजसा ॥

na ca tāḥ śuśruve kaścitteṣāṃ saṃvadatāṃ giraḥ | ṛte bhīṣmaṃ mahābāhuṃ māṃ cāpi munitejasā

उनके परस्पर कहे वचनों को और कोई न सुन सका—केवल महाबाहु भीष्म ने सुना, और मुनि (व्यास) के दिये तेज से मैंने भी।

श्लोक 41 (6.119.41)

संभ्रमश्च महानासीत्त्रिदशानां विशांपते । पतिष्यति रथाद्भीष्मे सर्वलोकप्रिये तदा ॥

saṃbhramaśca mahānāsīttridaśānāṃ viśāṃpate | patiṣyati rathādbhīṣme sarvalokapriye tadā

हे प्रजानाथ, जब सब लोकों के प्रिय भीष्म रथ से गिरने को थे, तब देवताओं में बड़ी हलचल मच गई।

श्लोक 42 (6.119.42)

इति देवगणानां च वाक्यं श्रुत्वा महातपाः । ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नाभ्यवर्तत ॥

iti devagaṇānāṃ ca vākyaṃ śrutvā mahātapāḥ | tataḥ śāntanavo bhīṣmo bībhatsuṃ nābhyavartata

देवगणों के ये वचन सुनकर महातपस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म तब बीभत्सु (अर्जुन) के सामने नहीं बढ़े,

श्लोक 43 (6.119.43)

भिद्यमानः शितैर्बाणैः सर्वावरणभेदिभिः । शिखण्डी तु महाराज भरतानां पितामहम् ॥

bhidyamānaḥ śitairbāṇaiḥ sarvāvaraṇabhedibhiḥ | śikhaṇḍī tu mahārāja bharatānāṃ pitāmaham

यद्यपि सब कवचों को भेदने वाले तीखे बाण उन्हें बींध रहे थे। और महाराज, शिखण्डी ने क्रोधपूर्वक भरतवंशियों के पितामह की

श्लोक 44 (6.119.44)

आजघानोरसि क्रुद्धो नवभिर्निशितैः शरैः । स तेनाभिहतः सङ्ख्ये भीष्मः कुरुपितामहः ॥

ājaghānorasi kruddho navabhirniśitaiḥ śaraiḥ | sa tenābhihataḥ saṅkhye bhīṣmaḥ kurupitāmahaḥ

छाती में नौ तीखे बाण मारे। युद्ध में उनसे आहत होकर भी कुरुपितामह भीष्म

श्लोक 45 (6.119.45)

नाकम्पत महाराज क्षितिकम्पे यथाऽचलः । ततः प्रहस्य बीभत्सुर्व्याक्षिपन्गाण्डिवं धनुः ॥

nākampata mahārāja kṣitikampe yathā'calaḥ | tataḥ prahasya bībhatsurvyākṣipangāṇḍivaṃ dhanuḥ

हे महाराज, वैसे ही नहीं काँपे जैसे भूकम्प में पर्वत नहीं काँपता। तब बीभत्सु ने हँसकर गाण्डीव धनुष खींचते हुए

श्लोक 46 (6.119.46)

गाङ्गेयं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् । पुनः पुनः शतैरेनं त्वरमाणो धनञ्जयः ॥

gāṅgeyaṃ pañcaviṃśatyā kṣudrakāṇāṃ samārpayat | punaḥ punaḥ śatairenaṃ tvaramāṇo dhanañjayaḥ

गंगापुत्र को पच्चीस क्षुद्रक बाणों से बींध दिया। फिर धनञ्जय ने शीघ्रता से बार-बार सैकड़ों बाणों से

श्लोक 47 (6.119.47)

सर्वगात्रेषु संक्रुद्धस्तथा मर्मस्वताडयत् । एवमन्यैरपि भृशं विद्ध्यमानः सहस्रशः ॥

sarvagātreṣu saṃkruddhastathā marmasvatāḍayat | evamanyairapi bhṛśaṃ viddhyamānaḥ sahasraśaḥ

क्रोधपूर्वक उनके सब अंगों और मर्मस्थलों पर प्रहार किया। इसी प्रकार दूसरों के हजारों बाणों से भी भारी चोट खाते हुए

श्लोक 48 (6.119.48)

तानप्याशु शरैर्भीष्मः प्रविव्याध महारथः । तैश्च मुक्ताञ्छरान्भीष्मो युधि सत्यपराक्रमः ॥

tānapyāśu śarairbhīṣmaḥ pravivyādha mahārathaḥ | taiśca muktāñcharānbhīṣmo yudhi satyaparākramaḥ

महारथी भीष्म ने उन्हें भी तुरन्त अपने बाणों से बींध दिया; और युद्ध में सच्चे पराक्रम वाले भीष्म ने उनके छोड़े बाणों को

श्लोक 49 (6.119.49)

निवारयामास शरैः समं सन्नतपर्वभिः । शिखण्डी तु रणे बाणान्यान्मुमोच महारथः ॥

nivārayāmāsa śaraiḥ samaṃ sannataparvabhiḥ | śikhaṇḍī tu raṇe bāṇānyānmumoca mahārathaḥ

झुकी गाँठों वाले बाणों से बराबर रोक दिया। परन्तु महारथी शिखण्डी ने रणभूमि में जो बाण छोड़े,

श्लोक 50 (6.119.50)

न चक्रुस्ते रुजं तस्य रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः । ततः किरीटी संक्रुद्धो भीष्ममेवाभ्यवर्तत ॥

na cakruste rujaṃ tasya rukmapuṅkhāḥ śilāśitāḥ | tataḥ kirīṭī saṃkruddho bhīṣmamevābhyavartata

वे सोने के पंखों वाले, सान पर तेज किए बाण उन्हें कोई पीड़ा न दे सके। तब किरीटी क्रोध में भरकर स्वयं भीष्म की ओर बढ़े,

श्लोक 51 (6.119.51)

शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्चास्य समाच्छिनत् । अथैनं नवभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेन चिच्छिदे ॥

śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya dhanuścāsya samācchinat | athainaṃ navabhirviddhvā dhvajamekena cicchide

और शिखण्डी को आगे करके उनका धनुष काट डाला। फिर नौ बाणों से उन्हें बींधकर एक बाण से उनकी ध्वजा काट गिराई,

श्लोक 52 (6.119.52)

सारथिं विशिखैश्चास्य दशभिः समकम्पयत् । सोऽन्यत्कार्मुकमादाय गाङ्गेयो बलवत्तरम् ॥

sārathiṃ viśikhaiścāsya daśabhiḥ samakampayat | so'nyatkārmukamādāya gāṅgeyo balavattaram

और दस बाणों से उनके सारथि को कँपा दिया। गंगानन्दन ने दूसरा, और भी सुदृढ़ धनुष उठाया;

श्लोक 53 (6.119.53)

तदप्यस्य शितैर्भल्लैस्त्रिधा त्रिभिरघातयत् । निमेषार्धेन कौन्तेय आत्तमात्तं महारणे ॥

tadapyasya śitairbhallaistridhā tribhiraghātayat | nimeṣārdhena kaunteya āttamāttaṃ mahāraṇe

उसे भी कुन्तीपुत्र ने तीन तीखे भल्लों से तीन टुकड़े करके गिरा दिया—उस महायुद्ध में भीष्म जो-जो धनुष उठाते, उसे वे आधे निमेष में ही काट देते।

श्लोक 54 (6.119.54)

एवमस्य धनूंष्याजौ चिच्छेद सुबहून्यथ । ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नात्यवर्तत ॥

evamasya dhanūṃṣyājau ciccheda subahūnyatha | tataḥ śāntanavo bhīṣmo bībhatsuṃ nātyavartata

इस प्रकार अर्जुन ने युद्ध में उनके बहुत-से धनुष काट डाले। तब शान्तनुनन्दन भीष्म बीभत्सु के सामने नहीं बढ़े।

श्लोक 55 (6.119.55)

अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् । सोऽतिविद्धो महेष्वासो दुःशासनमभाषत ॥

athainaṃ pañcaviṃśatyā kṣudrakāṇāṃ samārpayat | so'tividdho maheṣvāso duḥśāsanamabhāṣata

तब अर्जुन ने उन्हें पच्चीस क्षुद्रक बाणों से बींध दिया। गहरे घाव खाकर उस महाधनुर्धर ने दुःशासन से कहा—

भीष्म उवाच

श्लोक 56 (6.119.56)

एष पार्थो रणे क्रुद्धः पाण्डवानां महारथः । शरैरनेकसाहस्रैर्मामेवाभ्यपतद्रणे ॥

eṣa pārtho raṇe kruddhaḥ pāṇḍavānāṃ mahārathaḥ | śarairanekasāhasrairmāmevābhyapatadraṇe

"देखो, पाण्डवों का यह महारथी पार्थ युद्ध में क्रुद्ध होकर अनेक सहस्र बाणों से अकेले मुझ पर ही टूट पड़ा है।

श्लोक 57 (6.119.57)

न चैष समरे शक्यो जेतुं वज्रभृता अपि । न चापि सहिता वीरा देवदानवराक्षसाः ॥

na caiṣa samare śakyo jetuṃ vajrabhṛtā api | na cāpi sahitā vīrā devadānavarākṣasāḥ

इसे तो युद्ध में वज्रधारी इन्द्र भी नहीं जीत सकते; और देवता, दानव तथा राक्षस वीर मिलकर भी

श्लोक 58 (6.119.58)

मां चापि शक्ता निर्जेतुं किमु मर्त्या महारथाः । ऋतेऽर्जुनं सुसंक्रुद्धमेतत्सत्यं ब्रवीमि ते ॥

māṃ cāpi śaktā nirjetuṃ kimu martyā mahārathāḥ | ṛte'rjunaṃ susaṃkruddhametatsatyaṃ bravīmi te

मुझे नहीं जीत सकते—फिर मनुष्य महारथियों की तो बात ही क्या! अत्यन्त क्रुद्ध अर्जुन को छोड़कर कोई नहीं—यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 59 (6.119.59)

एवं तयोः संवदतोः फल्गुनो निशितैः शरैः । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य भीष्मं विव्याध संयुगे ॥

evaṃ tayoḥ saṃvadatoḥ phalguno niśitaiḥ śaraiḥ | śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya bhīṣmaṃ vivyādha saṃyuge

जब वे दोनों इस प्रकार बात कर रहे थे, फाल्गुन ने शिखण्डी को आगे करके युद्ध में भीष्म को तीखे बाणों से बींध डाला।

श्लोक 60 (6.119.60)

ततो दुःशासनं भीष्मः स्मयमान इवाब्रवीत् । अर्दितो निशितैर्बाणैर्भृशं गाण्डीवधन्वना ॥

tato duḥśāsanaṃ bhīṣmaḥ smayamāna ivābravīt | ardito niśitairbāṇairbhṛśaṃ gāṇḍīvadhanvanā

तब गाण्डीवधारी के तीखे बाणों से अत्यन्त पीड़ित भीष्म ने मानो मुस्कराते हुए दुःशासन से कहा—

भीष्म उवाच

श्लोक 61 (6.119.61)

वज्राशनिसमस्पर्शाः सुपुङ्खाः सुप्रतेजनाः । सुमुक्ता अव्यवच्छिन्ना नेमे बाणाः शिखण्डिनः ॥

vajrāśanisamasparśāḥ supuṅkhāḥ supratejanāḥ | sumuktā avyavacchinnā neme bāṇāḥ śikhaṇḍinaḥ

"जिनका स्पर्श वज्र और बिजली के समान है, जो सुन्दर पंखों वाले, पैनी नोक वाले, भली-भाँति छोड़े गए हैं और लगातार आ रहे हैं—ये शिखण्डी के बाण नहीं हैं।

श्लोक 62 (6.119.62)

निकृन्तमाना मर्माणि दृढावरणभेदिनः । मुसला इव मे घ्नन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः ॥

nikṛntamānā marmāṇi dṛḍhāvaraṇabhedinaḥ | musalā iva me ghnanti neme bāṇāḥ śikhaṇḍinaḥ

मेरे मर्मों को काटते, दृढ़ कवचों को भेदते हुए ये मूसलों की तरह मुझ पर चोट कर रहे हैं—ये शिखण्डी के बाण नहीं हैं।

श्लोक 63 (6.119.63)

वज्रदण्डसमस्पर्शा वज्रवेगदुरासदाः । मम प्राणानारुजन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः ॥

vajradaṇḍasamasparśā vajravegadurāsadāḥ | mama prāṇānārujanti neme bāṇāḥ śikhaṇḍinaḥ

जिनका स्पर्श वज्रदण्ड के समान है, जो वज्र के वेग से युक्त और दुःसह हैं, वे मेरे प्राणों को तोड़ रहे हैं—ये शिखण्डी के बाण नहीं हैं।

श्लोक 64 (6.119.64)

नाशयन्तीव मे प्राणान्यमदूता इवागताः । गदापरिघसंस्पर्शा नेमे बाणाः शिखण्डिनः ॥

nāśayantīva me prāṇānyamadūtā ivāgatāḥ | gadāparighasaṃsparśā neme bāṇāḥ śikhaṇḍinaḥ

यमदूतों की तरह आए हुए ये मानो मेरे प्राण नष्ट कर रहे हैं; इनका स्पर्श गदा और परिघ के समान है—ये शिखण्डी के बाण नहीं हैं।

श्लोक 65 (6.119.65)

भुजगा इव संक्रुद्धा लेलिहाना विषोल्बणाः । समाविशन्ति मर्माणि नेमे बाणाः शिखण्डिनः ॥

bhujagā iva saṃkruddhā lelihānā viṣolbaṇāḥ | samāviśanti marmāṇi neme bāṇāḥ śikhaṇḍinaḥ

क्रुद्ध, जीभ लपलपाते, विष से भरे सर्पों की भाँति ये मेरे मर्मों में घुस रहे हैं—ये शिखण्डी के बाण नहीं हैं।

श्लोक 66 (6.119.66)

अर्जुनस्य इमे बाणा नेमे बाणाः शिखण्डिनः । कृन्तन्ति मम गात्राणि माघमां सेगवा इव ॥

arjunasya ime bāṇā neme bāṇāḥ śikhaṇḍinaḥ | kṛntanti mama gātrāṇi māghamāṃ segavā iva

ये अर्जुन के बाण हैं, शिखण्डी के नहीं; ये मेरे अंगों को वैसे ही काट रहे हैं जैसे केकड़ी के बच्चे अपनी माँ को चीरकर निकलते हैं।

श्लोक 67 (6.119.67)

सर्वे ह्यपि न मे दुःखं कुर्युरन्ये नराधिपाः । वीरं गाण्डीवधन्वानमृते जिष्णुं कपिध्वजम् ॥

sarve hyapi na me duḥkhaṃ kuryuranye narādhipāḥ | vīraṃ gāṇḍīvadhanvānamṛte jiṣṇuṃ kapidhvajam

अन्य सब राजा मिलकर भी मुझे पीड़ा नहीं दे सकते—गाण्डीवधारी, कपिध्वज वीर जिष्णु (अर्जुन) को छोड़कर।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 68 (6.119.68)

इति ब्रुवञ्छान्तनवो दिधक्षुरिव पाण्डवम् । शक्तिं भीष्मः स पार्थाय ततश्चिक्षेप भारत ॥

iti bruvañchāntanavo didhakṣuriva pāṇḍavam | śaktiṃ bhīṣmaḥ sa pārthāya tataścikṣepa bhārata

हे भारत, ऐसा कहते हुए शान्तनुनन्दन भीष्म ने, मानो पाण्डुपुत्र को भस्म कर देना चाहते हों, पार्थ पर एक शक्ति चलाई।

श्लोक 69 (6.119.69)

तामस्य विशिखैश्छित्त्वा त्रिधा त्रिभिरपातयत् । पश्यतां कुरुवीराणां सर्वेषां तत्र भारत ॥

tāmasya viśikhaiśchittvā tridhā tribhirapātayat | paśyatāṃ kuruvīrāṇāṃ sarveṣāṃ tatra bhārata

हे भारत, वहाँ सब कुरुवीरों के देखते-देखते अर्जुन ने तीन बाणों से उस शक्ति के तीन टुकड़े करके उसे गिरा दिया।

श्लोक 70 (6.119.70)

चर्माथादत्त गाङ्गेयो जातरूपपरिष्कृतम् । खड्गं चान्यतरप्रेप्सुर्मृत्योरग्रे जयाय वा ॥

carmāthādatta gāṅgeyo jātarūpapariṣkṛtam | khaḍgaṃ cānyataraprepsurmṛtyoragre jayāya vā

तब गंगानन्दन ने सोने से सजी ढाल और तलवार उठाई—दोनों में से एक पाने की इच्छा से: आगे बढ़कर मृत्यु, या विजय।

श्लोक 71 (6.119.71)

तस्य तच्छतधा चर्म व्यधमत्सायकैस्तथा । रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tasya tacchatadhā carma vyadhamatsāyakaistathā | rathādanavarūḍhasya tadadbhutamivābhavat

पर रथ से उतरने से पहले ही अर्जुन ने अपने बाणों से उस ढाल के सौ टुकड़े कर दिए; वह एक अद्भुत-सी बात थी।

श्लोक 72 (6.119.72)

ततो युधिष्ठिरो राजा स्वान्यनीकान्यचोदयत् । अभिद्रवत गाङ्गेयं मा वोऽस्तु भयमण्वपि ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā svānyanīkānyacodayat | abhidravata gāṅgeyaṃ mā vo'stu bhayamaṇvapi

तब राजा युधिष्ठिर ने अपनी सेनाओं को प्रेरित किया—"गंगानन्दन पर धावा बोलो! तुम्हें अणुमात्र भी भय न हो!"

श्लोक 73 (6.119.73)

अथ ते तोमरैः प्रासैर्बाणौघैश्च समन्ततः । पट्टसैश्च सुनिस्त्रिंशैर्नाराचैश्च तथा शितैः ॥

atha te tomaraiḥ prāsairbāṇaughaiśca samantataḥ | paṭṭasaiśca sunistriṃśairnārācaiśca tathā śitaiḥ

तब वे सब ओर से तोमरों, प्रासों और बाणों की बौछारों से, पट्टिशों, उत्तम तलवारों और तीखे नाराचों से,

श्लोक 74 (6.119.74)

वत्सदन्तैश्च भल्लैश्च तमेकमभिदुद्रुवुः । सिंहनादस्ततो घोरः पाण्डवानामभूत्तदा ॥

vatsadantaiśca bhallaiśca tamekamabhidudruvuḥ | siṃhanādastato ghoraḥ pāṇḍavānāmabhūttadā

वत्सदन्त और भल्ल बाणों से उन अकेले पर टूट पड़े। तब पाण्डवों की ओर से भयंकर सिंहनाद उठा।

श्लोक 75 (6.119.75)

तथैव तव पुत्राश्च नेदुर्भीष्मजयैषिणः । तमेकमभ्यरक्षन्त सिंहनादांश्च चक्रिरे ॥

tathaiva tava putrāśca nedurbhīṣmajayaiṣiṇaḥ | tamekamabhyarakṣanta siṃhanādāṃśca cakrire

आपके पुत्र भी भीष्म की विजय चाहते हुए गरज उठे; वे अकेले उन्हीं की रक्षा करने लगे और सिंहनाद करने लगे।

श्लोक 76 (6.119.76)

तत्रासीत्तुमुलं युद्धं तावकानां परैः सह । दशमेऽहनि राजेन्द्र भीष्मार्जुनसमागमे ॥

tatrāsīttumulaṃ yuddhaṃ tāvakānāṃ paraiḥ saha | daśame'hani rājendra bhīṣmārjunasamāgame

हे राजेन्द्र, दसवें दिन भीष्म और अर्जुन की उस भिड़न्त में आपके योद्धाओं और शत्रुओं के बीच तुमुल युद्ध हुआ।

श्लोक 77 (6.119.77)

आसीद्धोर इवावर्तो मुहूर्तमुदधेरिव । सैन्यानां युध्यमानानां निघ्नतामितरेतरम् ॥

āsīddhora ivāvarto muhūrtamudadheriva | sainyānāṃ yudhyamānānāṃ nighnatāmitaretaram

परस्पर लड़ती और एक-दूसरे को मारती सेनाओं का कुछ देर तक ऐसा भयंकर भँवर बना रहा जैसे समुद्र में भँवर उठता है।

श्लोक 78 (6.119.78)

असौम्यरूपा पृथिवी शोणिताक्ताऽभवत्तदा । समं च विषमं चैव न प्राज्ञायत किंचन ॥

asaumyarūpā pṛthivī śoṇitāktā'bhavattadā | samaṃ ca viṣamaṃ caiva na prājñāyata kiṃcana

रक्त से सनी पृथ्वी भयावह दिखने लगी; समतल और ऊबड़-खाबड़ कुछ भी पहचाना नहीं जाता था।

श्लोक 79 (6.119.79)

योधानामयुतं हत्वा तस्मिन्स दशमेऽहनि । अतिष्ठदाहवे भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु ॥

yodhānāmayutaṃ hatvā tasminsa daśame'hani | atiṣṭhadāhave bhīṣmo bhidyamāneṣu marmasu

उस दसवें दिन दस हजार योद्धाओं को मारकर भीष्म मर्मस्थलों के बिंधते रहने पर भी युद्ध में डटे रहे।

श्लोक 80 (6.119.80)

ततः सेनामुखे तस्मिन्स्थितः पार्थो धनुर्धरः । मध्येन कुरुसैन्यानां द्रावयामास वाहिनीम् ॥

tataḥ senāmukhe tasminsthitaḥ pārtho dhanurdharaḥ | madhyena kurusainyānāṃ drāvayāmāsa vāhinīm

तब सेना के अग्रभाग में खड़े धनुर्धर पार्थ ने कुरुसेना के बीच से होकर उस वाहिनी को भगा दिया।

श्लोक 81 (6.119.81)

तत्राद्भुतमपश्याम पाण्डवानां पराक्रमम् । द्रावयामासुरिषुभिः सर्वान्भीष्मपदानुगान् ॥

tatrādbhutamapaśyāma pāṇḍavānāṃ parākramam | drāvayāmāsuriṣubhiḥ sarvānbhīṣmapadānugān

वहाँ हमने पाण्डवों का अद्भुत पराक्रम देखा; उन्होंने अपने बाणों से भीष्म के सब अनुयायियों को भगा दिया।

श्लोक 82 (6.119.82)

वयं श्वेतहयाद्भीताः कुन्तीपुत्राद्धनञ्जयात् । पीड्यमानाः शितैः शस्त्रैः प्राद्रवाम रणे तदा ॥

vayaṃ śvetahayādbhītāḥ kuntīputrāddhanañjayāt | pīḍyamānāḥ śitaiḥ śastraiḥ prādravāma raṇe tadā

श्वेत घोड़ों वाले कुन्तीपुत्र धनञ्जय से भयभीत होकर और उनके तीखे शस्त्रों से पीड़ित होकर हम तब युद्धभूमि से भाग खड़े हुए।

श्लोक 83 (6.119.83)

पाण्डवैः पञ्चभिः सार्धं सात्यकेन च धन्विना । धृष्टद्युम्नमुखैः सर्वैः पाञ्चालैश्च समन्ततः ॥

pāṇḍavaiḥ pañcabhiḥ sārdhaṃ sātyakena ca dhanvinā | dhṛṣṭadyumnamukhaiḥ sarvaiḥ pāñcālaiśca samantataḥ

पाँचों पाण्डवों और धनुर्धर सात्यकि द्वारा, तथा धृष्टद्युम्न आदि सब पाञ्चालों द्वारा चारों ओर से,

श्लोक 84 (6.119.84)

भिद्यमानाः शरैस्तीक्ष्णैः सर्वे कार्ष्णिपुरोगमैः । द्रोणद्रौणिकृपैः सार्धं सर्वे शल्यशलादयः । तावकाः समरे राजञ्जहुर्भीष्मं महामृधे ॥

bhidyamānāḥ śaraistīkṣṇaiḥ sarve kārṣṇipurogamaiḥ | droṇadrauṇikṛpaiḥ sārdhaṃ sarve śalyaśalādayaḥ | tāvakāḥ samare rājañjahurbhīṣmaṃ mahāmṛdhe

और अभिमन्यु आदि सबके द्वारा तीखे बाणों से बिंधकर, हे राजन्, आपके सब योद्धा—शल्य, शल आदि, द्रोण, अश्वत्थामा और कृप के साथ—उस महायुद्ध में भीष्म को छोड़ गए।

श्लोक 85 (6.119.85)

सौवीराः कितवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यमालवाः । अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः ॥

sauvīrāḥ kitavāḥ prācyāḥ pratīcyodīcyamālavāḥ | abhīṣāhāḥ śūrasenāḥ śibayo'tha vasātayaḥ

सौवीर, कितव, पूर्वी, पश्चिमी और उत्तरी लोग, मालव, अभीषाह, शूरसेन, शिबि और वसाति,

श्लोक 86 (6.119.86)

साल्वाश्रयास्त्रिगर्ताश्च अम्बष्ठाः केकयैः सह । द्वादशैते जनपदाः शरार्ता व्रणपीडिताः । संग्रामे प्रजहुर्भीष्मं युध्यमानाः किरीटिना ॥

sālvāśrayāstrigartāśca ambaṣṭhāḥ kekayaiḥ saha | dvādaśaite janapadāḥ śarārtā vraṇapīḍitāḥ | saṃgrāme prajahurbhīṣmaṃ yudhyamānāḥ kirīṭinā

शाल्व और उनके आश्रित, त्रिगर्त, और केकयों सहित अम्बष्ठ—ये बारह जनपद बाणों से आर्त और घावों से पीड़ित होकर, किरीटी से लड़ते हुए, युद्ध में भीष्म को छोड़ गए।

श्लोक 87 (6.119.87)

ततस्तमेकं बहवः परिवार्य समन्ततः । परिकाल्य कुरून्सर्वाञ्शरवर्षैरवाकिरन् ॥

tatastamekaṃ bahavaḥ parivārya samantataḥ | parikālya kurūnsarvāñśaravarṣairavākiran

तब बहुत-से योद्धाओं ने सब कुरुओं को खदेड़कर उन अकेले भीष्म को चारों ओर से घेर लिया और उन पर बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 88 (6.119.88)

निपातयत गृह्णीत युध्यध्वमवकृन्तत । इत्यासीत्तुमुलः शब्दो राजन्भीष्मरथं प्रति ॥

nipātayata gṛhṇīta yudhyadhvamavakṛntata | ityāsīttumulaḥ śabdo rājanbhīṣmarathaṃ prati

"गिरा दो, पकड़ो, लड़ो, काट डालो!"—हे राजन्, भीष्म के रथ के चारों ओर ऐसा तुमुल शब्द उठा।

श्लोक 89 (6.119.89)

निहत्य समरे राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः । न तस्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्व्यङ्गुलमन्तरम् ॥

nihatya samare rājañśataśo'tha sahasraśaḥ | na tasyāsīdanirbhinnaṃ gātre dvyaṅgulamantaram

हे राजन्, यद्यपि उन्होंने युद्ध में सैकड़ों और हजारों को मार गिराया, फिर भी उनके शरीर पर दो अंगुल जगह भी ऐसी न बची जो बिंधी न हो।

श्लोक 90 (6.119.90)

एवंभूतस्तव पिता शरैर्विशकलीकृतः । शिताग्रैः फल्गुनेनाजौ प्राक्शिराः प्रापतद्रथात् ॥

evaṃbhūtastava pitā śarairviśakalīkṛtaḥ | śitāgraiḥ phalgunenājau prākśirāḥ prāpatadrathāt

इस दशा में आपके पिता, युद्ध में फाल्गुन के नुकीले बाणों से छलनी होकर, पूर्व की ओर सिर किए रथ से गिर पड़े,

श्लोक 91 (6.119.91)

किंचिच्छेषे दिनकरे पुत्राणां तव पश्यताम् । हाहेति दिवि देवानां पार्थिवानां च भारत ॥

kiṃciccheṣe dinakare putrāṇāṃ tava paśyatām | hāheti divi devānāṃ pārthivānāṃ ca bhārata

जब दिन थोड़ा ही शेष था, और आपके पुत्र देख रहे थे। हे भारत, आकाश में देवताओं और धरती पर राजाओं के बीच "हाय, हाय!" का

श्लोक 92 (6.119.92)

पतमाने रथाद्भीष्मे बभूव सुमहास्वनः । संपतन्तमभिप्रेक्ष्य महात्मानं पितामहम् ॥

patamāne rathādbhīṣme babhūva sumahāsvanaḥ | saṃpatantamabhiprekṣya mahātmānaṃ pitāmaham

महान् स्वर उठा, जब भीष्म रथ से गिर रहे थे। महात्मा पितामह को गिरते देख

श्लोक 93 (6.119.93)

सह भीष्मेण सर्वेषां प्रापतन्हृदयानि नः । स पपात महाबाहुर्वसुधामनुनादयन् ॥

saha bhīṣmeṇa sarveṣāṃ prāpatanhṛdayāni naḥ | sa papāta mahābāhurvasudhāmanunādayan

भीष्म के साथ ही हम सबके हृदय भी गिर पड़े। वे महाबाहु पृथ्वी को गुँजाते हुए गिरे,

श्लोक 94 (6.119.94)

इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टः केतुः सर्वधनुष्मताम् । धरणीं न स पस्पर्श शरसङ्घैः समावृतः ॥

indradhvaja ivotsṛṣṭaḥ ketuḥ sarvadhanuṣmatām | dharaṇīṃ na sa pasparśa śarasaṅghaiḥ samāvṛtaḥ

मानो गिराया हुआ इन्द्रध्वज हो—वे, जो सब धनुर्धरों की ध्वजा थे; पर बाणों के समूह से ढके होने के कारण उन्होंने धरती का स्पर्श नहीं किया।

श्लोक 95 (6.119.95)

शरतल्पे महेष्वासं शयानं पुरुषर्षभम् । रथात्प्रपतितं चैनं दिव्यो भावः समाविशत् ॥

śaratalpe maheṣvāsaṃ śayānaṃ puruṣarṣabham | rathātprapatitaṃ cainaṃ divyo bhāvaḥ samāviśat

रथ से गिरकर बाणों की शय्या पर लेटे उस महाधनुर्धर, पुरुषश्रेष्ठ में एक दिव्य भाव का संचार हुआ।

श्लोक 96 (6.119.96)

अभ्यवर्षच्च पर्जन्यः प्राकम्पत च मेदिनी । पतन्स ददृशे चापि दक्षिणेन दिवाकरम् ॥

abhyavarṣacca parjanyaḥ prākampata ca medinī | patansa dadṛśe cāpi dakṣiṇena divākaram

मेघ बरसने लगे और पृथ्वी काँप उठी। गिरते हुए उन्होंने यह भी देखा कि सूर्य दक्षिण मार्ग में है।

श्लोक 97 (6.119.97)

संज्ञां चोपालभद्वीरः कालं संचिन्त्य भारत । अन्तरिक्षे च शुश्राव दिव्या वाचः समन्ततः ॥

saṃjñāṃ copālabhadvīraḥ kālaṃ saṃcintya bhārata | antarikṣe ca śuśrāva divyā vācaḥ samantataḥ

हे भारत, समय का विचार करके उस वीर ने अपनी चेतना सँभाले रखी; और उन्होंने आकाश में चारों ओर से दिव्य वाणियाँ सुनीं—

वागुवाच

श्लोक 98 (6.119.98)

कथं महात्मा गाङ्गेयः सर्वशस्त्रभृतां वरः । कालकर्ता नरव्याघ्रः संप्राप्ते दक्षिणायने ॥

kathaṃ mahātmā gāṅgeyaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | kālakartā naravyāghraḥ saṃprāpte dakṣiṇāyane

"सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, पुरुषसिंह, महात्मा गंगानन्दन दक्षिणायन आ जाने पर देह-त्याग कैसे करेंगे?"

सञ्जय उवाच

श्लोक 99 (6.119.99)

स्थितोऽस्मीति च गाङ्गेयस्तच्छ्रुत्वा वाक्यमब्रवीत् । धारयिष्याम्यहं प्राणान्पतितोऽपि महीतले ॥

sthito'smīti ca gāṅgeyastacchrutvā vākyamabravīt | dhārayiṣyāmyahaṃ prāṇānpatito'pi mahītale

यह वचन सुनकर गंगानन्दन ने कहा—"मैं अभी स्थित हूँ। धरती पर गिर जाने पर भी मैं अपने प्राणों को धारण किए रहूँगा,

श्लोक 100 (6.119.100)

उत्तरायणमन्विच्छन्सुगतिप्रतिकाङ्क्षया । तस्य तन्मतमाज्ञाय गङ्गा हिमवतः सुता ॥

uttarāyaṇamanvicchansugatipratikāṅkṣayā | tasya tanmatamājñāya gaṅgā himavataḥ sutā

सद्गति की आकांक्षा से उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हुए।" उनका यह विचार जानकर हिमवान् की पुत्री गंगा ने

श्लोक 101 (6.119.101)

महर्षीन्हंसरूपेण प्रेषयामास तत्र वै । ततस्तं प्रति ते हंसास्त्वरिता मानसौकसः ॥

maharṣīnhaṃsarūpeṇa preṣayāmāsa tatra vai | tatastaṃ prati te haṃsāstvaritā mānasaukasaḥ

वहाँ हंसों के रूप में महर्षियों को भेजा। तब मानसरोवर में रहने वाले वे हंस शीघ्रता से

श्लोक 102 (6.119.102)

आजग्मुः सहिता द्रष्टुं भीष्मं कुरुपितामहम् । यत्र शेते नरश्रेष्ठः शरतल्पे पितामहः ॥

ājagmuḥ sahitā draṣṭuṃ bhīṣmaṃ kurupitāmaham | yatra śete naraśreṣṭhaḥ śaratalpe pitāmahaḥ

एक साथ कुरुपितामह भीष्म को देखने आए, जहाँ नरश्रेष्ठ पितामह बाणों की शय्या पर लेटे थे।

श्लोक 103 (6.119.103)

ते तु भीष्मं समासाद्य ऋषयो हंसरूपिणः । अपश्यञ्छरतल्पस्थं भीष्मं कुरुकुलोद्वहम् ॥

te tu bhīṣmaṃ samāsādya ṛṣayo haṃsarūpiṇaḥ | apaśyañcharatalpasthaṃ bhīṣmaṃ kurukulodvaham

भीष्म के पास पहुँचकर हंसरूपधारी उन ऋषियों ने कुरुकुल के धुरन्धर भीष्म को बाणों की शय्या पर लेटे देखा।

श्लोक 104 (6.119.104)

ते तं दृष्ट्वा महात्मानं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । गाङ्गेयं भरतश्रेष्ठं दक्षिणेन च भास्करम् ॥

te taṃ dṛṣṭvā mahātmānaṃ kṛtvā cāpi pradakṣiṇam | gāṅgeyaṃ bharataśreṣṭhaṃ dakṣiṇena ca bhāskaram

उन महात्मा गंगानन्दन, भरतश्रेष्ठ को देखकर उन्होंने उनकी प्रदक्षिणा की; और सूर्य को दक्षिण मार्ग में देखकर

श्लोक 105 (6.119.105)

इतरेतरमामन्त्र्य प्राहुस्तत्र मनीषिणः । भीष्मः कथं महात्मा सन्संस्थाता दक्षिणायने ॥

itaretaramāmantrya prāhustatra manīṣiṇaḥ | bhīṣmaḥ kathaṃ mahātmā sansaṃsthātā dakṣiṇāyane

उन मनीषियों ने वहाँ आपस में विचार करके कहा—"महात्मा होकर भी भीष्म दक्षिणायन में देह-त्याग कैसे करेंगे?"

श्लोक 106 (6.119.106)

इत्युक्त्वा प्रस्थिता हंसा दक्षिणामभितो दिशम् । संप्रेक्ष्य वै महाबुद्धिश्चिन्तयित्वा च भारत ॥

ityuktvā prasthitā haṃsā dakṣiṇāmabhito diśam | saṃprekṣya vai mahābuddhiścintayitvā ca bhārata

ऐसा कहकर वे हंस दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। हे भारत, उन्हें देखकर उस महाबुद्धिमान् ने विचार किया,

श्लोक 107 (6.119.107)

तानब्रवीच्छान्तनवो नाहं गन्ता कथंचन । दक्षिणावर्त आदित्ये एतन्मे मनसि स्थितम् ॥

tānabravīcchāntanavo nāhaṃ gantā kathaṃcana | dakṣiṇāvarta āditye etanme manasi sthitam

और शान्तनुनन्दन ने उनसे कहा—"सूर्य के दक्षिणायन रहते मैं किसी भी प्रकार नहीं जाऊँगा; यह मेरे मन में निश्चित है।

भीष्म उवाच

श्लोक 108 (6.119.108)

गमिष्यामि स्वकं स्थानमासीद्यन्मे पुरातनम् । उदगायन आदित्ये हंसाः सत्यं ब्रवीमि वः ॥

gamiṣyāmi svakaṃ sthānamāsīdyanme purātanam | udagāyana āditye haṃsāḥ satyaṃ bravīmi vaḥ

हे हंसो, सूर्य के उत्तरायण होने पर मैं अपने उस स्थान को जाऊँगा जो पहले से मेरा था; यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।

श्लोक 109 (6.119.109)

धारयिष्याम्यहं प्राणानुत्तरायणकाङ्क्षया । प्राणानां च समुत्सर्ग ऐश्वर्यं नियतं मम ॥

dhārayiṣyāmyahaṃ prāṇānuttarāyaṇakāṅkṣayā | prāṇānāṃ ca samutsarga aiśvaryaṃ niyataṃ mama

उत्तरायण की आकांक्षा से मैं अपने प्राणों को धारण किए रहूँगा; प्राणों का त्याग मेरे अपने वश में है, यह सामर्थ्य मुझे निश्चित रूप से प्राप्त है।

श्लोक 110 (6.119.110)

तस्मात्प्राणान्धारयिष्ये मुमूर्षुरुदगायने । यश्च दत्तो वरो मह्यं पित्रा तेन महात्मना ॥

tasmātprāṇāndhārayiṣye mumūrṣurudagāyane | yaśca datto varo mahyaṃ pitrā tena mahātmanā

इसलिए मरणासन्न होकर भी मैं उत्तरायण तक प्राणों को धारण करूँगा। और मेरे महात्मा पिता ने मुझे जो वर दिया था—

श्लोक 111 (6.119.111)

छन्दतस्ते भवेन्मृत्युरिति तत्सत्यमस्तु मे । धारयिष्ये ततः प्राणानुत्सर्गे नियते सति ॥

chandataste bhavenmṛtyuriti tatsatyamastu me | dhārayiṣye tataḥ prāṇānutsarge niyate sati

'तुम्हारी मृत्यु तुम्हारी इच्छा से होगी'—वह मेरे लिए सत्य हो। प्राणों का त्याग मेरे वश में होने से मैं उन्हें धारण किए रहूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 112 (6.119.112)

इत्युक्त्वा तांस्तदा हंसान्स शेते शरतल्पगः । एवं कुरूणां पतिते शृङ्गे भीष्मे महौजसि ॥

ityuktvā tāṃstadā haṃsānsa śete śaratalpagaḥ | evaṃ kurūṇāṃ patite śṛṅge bhīṣme mahaujasi

हंसों से ऐसा कहकर वे बाणों की शय्या पर लेटे रहे। इस प्रकार कुरुओं के शिखर, महाबली भीष्म के गिर जाने पर

श्लोक 113 (6.119.113)

पाण्डवाः सृञ्जयाश्चैव सिंहनादं प्रचक्रिरे । तस्मिन्हते महासत्वे भरतानां पितामहे ॥

pāṇḍavāḥ sṛñjayāścaiva siṃhanādaṃ pracakrire | tasminhate mahāsatve bharatānāṃ pitāmahe

पाण्डवों और सृञ्जयों ने सिंहनाद किया। भरतवंशियों के उन महाबली पितामह के मारे जाने पर

श्लोक 114 (6.119.114)

न किंचित्प्रत्यपद्यन्त पुत्रास्ते भरतर्षभ । संमोहश्चैव तुमुलः कुरूणामभवत्तदा ॥

na kiṃcitpratyapadyanta putrāste bharatarṣabha | saṃmohaścaiva tumulaḥ kurūṇāmabhavattadā

हे भरतश्रेष्ठ, आपके पुत्रों को कुछ नहीं सूझा, और कुरुओं में भारी मोह छा गया।

श्लोक 115 (6.119.115)

कृपदुर्योधनमुखा निःश्वस्य रुरुदुस्ततः । विषादाच्च चिरं कालमतिष्ठन्विगतेन्द्रियाः ॥

kṛpaduryodhanamukhā niḥśvasya rurudustataḥ | viṣādācca ciraṃ kālamatiṣṭhanvigatendriyāḥ

कृप, दुर्योधन आदि लंबी साँसें लेकर रोने लगे; और विषाद के कारण वे बहुत देर तक सुध-बुध खोए खड़े रहे।

श्लोक 116 (6.119.116)

दध्युश्चैव महाराज न युद्धे दधिरे मनः । ऊरुग्राहगृहीताश्च नाभ्यधावन्त पाण्डवान् ॥

dadhyuścaiva mahārāja na yuddhe dadhire manaḥ | ūrugrāhagṛhītāśca nābhyadhāvanta pāṇḍavān

हे महाराज, वे चिन्ता में डूब गए और युद्ध में उनका मन नहीं लगा; मानो उनकी जाँघें जकड़ गई हों, वे पाण्डवों पर धावा नहीं कर सके।

श्लोक 117 (6.119.117)

अवध्ये शन्तनोः पुत्रे हते भीष्मे महौजसि । दुःखार्तास्ते ततो राजन्कुरूणां पतयोऽभवन् । अभावः सहसा राजन्कुरुराजस्य तर्कितः ॥

avadhye śantanoḥ putre hate bhīṣme mahaujasi | duḥkhārtāste tato rājankurūṇāṃ patayo'bhavan | abhāvaḥ sahasā rājankururājasya tarkitaḥ

शन्तनु के पुत्र, अवध्य और महाबली भीष्म के मारे जाने पर, हे राजन्, कुरुओं के अधिपति दुःख से व्याकुल हो गए; और कुरुराज के विनाश की आशंका सहसा सामने आ खड़ी हुई।

श्लोक 118 (6.119.118)

हतप्रवीरास्तु वयं निकृत्ताश्च शितैः शरैः । कर्तव्यं नाभिजानीमो निर्जिताः सव्यसाचिना ॥

hatapravīrāstu vayaṃ nikṛttāśca śitaiḥ śaraiḥ | kartavyaṃ nābhijānīmo nirjitāḥ savyasācinā

हम लोग—जिनके प्रमुख वीर मारे जा चुके थे और जो स्वयं तीखे बाणों से कटे हुए थे—सव्यसाची से पराजित होकर नहीं जानते थे कि क्या करें।

श्लोक 119 (6.119.119)

पाण्डवाश्च जयं लब्ध्वा परत्र च परां गतिम् । सर्वे दध्मुर्महाशङ्खाञ्शूराः परिघबाहवः ॥

pāṇḍavāśca jayaṃ labdhvā paratra ca parāṃ gatim | sarve dadhmurmahāśaṅkhāñśūrāḥ parighabāhavaḥ

और पाण्डवों ने, जो विजय और परलोक में भी परम गति पा चुके थे—परिघ जैसी भुजाओं वाले उन सब शूरवीरों ने—अपने महाशंख बजाए;

श्लोक 120 (6.119.120)

सोमकाश्च सपाञ्चालाः प्राहृष्यन्त जनेश्वर । ततस्तूर्यसहस्रेषु नदत्सु स महाबलः ॥

somakāśca sapāñcālāḥ prāhṛṣyanta janeśvara | tatastūryasahasreṣu nadatsu sa mahābalaḥ

हे जनेश्वर, सोमक और पाञ्चाल हर्षित हुए। तब हजारों तूर्यों के बजते समय महाबली

श्लोक 121 (6.119.121)

आस्फोटयामास भृशं भीमसेनो ननाद च । सेनयोरुभयोश्चापि गाङ्गेये निहते विभौ ॥

āsphoṭayāmāsa bhṛśaṃ bhīmaseno nanāda ca | senayorubhayoścāpi gāṅgeye nihate vibhau

भीमसेन ने जोर से ताल ठोंकी और गर्जना की। समर्थ गंगानन्दन के गिर जाने पर दोनों सेनाओं में

श्लोक 122 (6.119.122)

संन्यस्य वीराः शस्त्राणि प्राध्यायन्त समन्ततः । प्राक्रोशन्प्राद्रवंश्चान्ये जग्मुर्मोहं तथाऽपरे ॥

saṃnyasya vīrāḥ śastrāṇi prādhyāyanta samantataḥ | prākrośanprādravaṃścānye jagmurmohaṃ tathā'pare

वीरों ने शस्त्र रख दिए और सब ओर चिन्ता में डूब गए। कुछ चीखने लगे, कुछ भागे, और कुछ मूर्च्छित हो गए;

श्लोक 123 (6.119.123)

क्षत्रं चान्येऽभ्यनिन्दन्त भीष्मं चान्येऽभ्यपूजयन् । ऋषयः पितरश्चैव प्रशशंसुर्महाव्रतम् ॥

kṣatraṃ cānye'bhyanindanta bhīṣmaṃ cānye'bhyapūjayan | ṛṣayaḥ pitaraścaiva praśaśaṃsurmahāvratam

कुछ क्षत्रिय-धर्म की निन्दा करने लगे, और कुछ भीष्म की पूजा करने लगे। ऋषियों और पितरों ने उन महाव्रती की प्रशंसा की,

श्लोक 124 (6.119.124)

भरतानां च ये पूर्वे ते चैनं प्रशशंसिरे । महोपनिषदं चैव योगमास्थाय वीर्यवान् ॥

bharatānāṃ ca ye pūrve te cainaṃ praśaśaṃsire | mahopaniṣadaṃ caiva yogamāsthāya vīryavān

और भरतवंश के जो पूर्वज थे, उन्होंने भी उनकी सराहना की। पराक्रमी और बुद्धिमान् शान्तनुनन्दन महा-उपनिषद् के योग का आश्रय लेकर

श्लोक 125 (6.119.125)

जपञ्शान्तनवो धीमान्कालाकाङ्क्षी स्थितोऽभवत् ॥

japañśāntanavo dhīmānkālākāṅkṣī sthito'bhavat

और उसका जप करते हुए अपने समय की प्रतीक्षा में स्थित रहे।

अध्याय 118अध्याय-सूचीअध्याय 120