भीष्म पर्व · अध्याय 120
अर्जुन द्वारा भीष्म को बाणों का तकिया
धृतराष्ट्र भीष्म के पतन पर विलाप करते हैं, और संजय बताते हैं कि संध्या के समय पितामह बाणों की ऐसी शय्या पर गिरे जिसने उन्हें भूमि को छूने नहीं दिया; आकाश अंधकारमय हो गया, ऋषियों ने उनकी प्रशंसा की और दोनों सेनाओं ने युद्ध रोक दिया। कौरव और पाण्डव उन्हें प्रणाम करने आते हैं; कोमल तकिये अस्वीकार करके भीष्म अर्जुन से वीरशय्या के योग्य तकिया माँगते हैं, और अर्जुन तीन बाणों से उनका सिर थाम देते हैं। भीष्म सूर्य के उत्तरायण होने तक वहीं लेटे रहने का निश्चय करते हैं, अपने चारों ओर खाई खुदवाने को कहते हैं और वैद्यों को लौटा देते हैं; राजा उनकी रक्षा का प्रबन्ध करके शिविरों को लौट जाते हैं। उस रात श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को बधाई देते हैं, और युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि विजय केवल श्रीकृष्ण की कृपा से ही मिलती है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.120.1)
कथमासंस्तदा योधा हीना भीष्मेण सञ्जय । बलिना देवकल्पेन कौमारब्रह्मचारिणा ॥
kathamāsaṃstadā yodhā hīnā bhīṣmeṇa sañjaya | balinā devakalpena kaumārabrahmacāriṇā
हे संजय, उस समय बलवान, देवतुल्य और कुमारावस्था से ही ब्रह्मचारी भीष्म से रहित होकर योद्धाओं की क्या दशा हुई?
श्लोक 2 (6.120.2)
तदैव निहतान्मन्ये कुरूनन्यांश्च पाण्डवैः । न प्राहरद्यदा भीष्मो घृणित्वाद्द्रुपदात्मजम् ॥
tadaiva nihatānmanye kurūnanyāṃśca pāṇḍavaiḥ | na prāharadyadā bhīṣmo ghṛṇitvāddrupadātmajam
मैं मानता हूँ कि जिस क्षण भीष्म ने करुणावश द्रुपदपुत्र पर प्रहार नहीं किया, उसी क्षण पाण्डवों ने कुरुओं और अन्य सबको मार डाला था।
श्लोक 3 (6.120.3)
ततो दुःखतरं मन्ये किमन्यत्प्रभविष्यति । अद्यैव निहतं श्रुत्वा पितरं मम दुर्मतेः ॥
tato duḥkhataraṃ manye kimanyatprabhaviṣyati | adyaiva nihataṃ śrutvā pitaraṃ mama durmateḥ
आज ही मुझ दुर्बुद्धि के पिता के मारे जाने का समाचार सुनकर, इससे बढ़कर और कौन-सा दुःख होगा?
श्लोक 4 (6.120.4)
अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम सञ्जय । श्रुत्वा विनिहतं भीष्मं शतधा यन्न दीर्यते ॥
aśmasāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ mama sañjaya | śrutvā vinihataṃ bhīṣmaṃ śatadhā yanna dīryate
हे संजय, निश्चय ही मेरा हृदय लोहे का बना है, जो भीष्म के मारे जाने का समाचार सुनकर भी सौ टुकड़े नहीं हो जाता।
श्लोक 5 (6.120.5)
यदन्यन्निहतेनाजौ भीष्मेण जयमिच्छता । चेष्टितं कुरुसिंहेन तन्मे कथय सुव्रत ॥
yadanyannihatenājau bhīṣmeṇa jayamicchatā | ceṣṭitaṃ kurusiṃhena tanme kathaya suvrata
हे सुव्रत, युद्ध में गिराए जाने के बाद भी विजय की इच्छा रखने वाले उस कुरुसिंह भीष्म ने और जो कुछ किया, वह मुझे बताओ।
श्लोक 6 (6.120.6)
पुनःपुनर्न मृष्यामि हतं देवव्रतं रणे । न हतो जामदग्न्येन दिव्यैरस्त्रैश्च यः पुरा ॥
punaḥpunarna mṛṣyāmi hataṃ devavrataṃ raṇe | na hato jāmadagnyena divyairastraiśca yaḥ purā
बार-बार सोचकर भी मैं यह सहन नहीं कर पाता कि देवव्रत युद्ध में मारे गए — वे, जिन्हें पूर्वकाल में जमदग्निपुत्र परशुराम भी दिव्य अस्त्रों से नहीं मार सके थे।
श्लोक 7 (6.120.7)
स हतो द्रौपदेयेन पाञ्चाल्येन शिखण्डिना ॥
sa hato draupadeyena pāñcālyena śikhaṇḍinā
वही अब द्रुपद के पुत्र, पांचालराजकुमार शिखण्डी द्वारा मारे गए!
सञ्जय उवाच
श्लोक 8 (6.120.8)
सायाह्ने न्यपतद्भूमौ धार्तराष्ट्रान्विषादयन् ॥
sāyāhne nyapatadbhūmau dhārtarāṣṭrānviṣādayan
संध्या के समय वे धृतराष्ट्र के पुत्रों को विषाद में डुबोते हुए भूमि पर गिर पड़े
श्लोक 9 (6.120.9)
पाञ्चालान्हर्षयंश्चैव भीष्मः कुरुपितामहः । स शेते शरतल्पस्थो मेदिनीमस्पृशंस्तदा ॥
pāñcālānharṣayaṃścaiva bhīṣmaḥ kurupitāmahaḥ | sa śete śaratalpastho medinīmaspṛśaṃstadā
और पांचालों को हर्षित करते हुए — कुरुओं के पितामह भीष्म। वे बाणों की शय्या पर पड़े हैं, उस समय भी पृथ्वी का स्पर्श किए बिना।
श्लोक 10 (6.120.10)
भीष्मो रथात्प्रपतितः संछिन्नो बहुभिः शरैः । हाहेति तुमुलः शब्दो भूतानां समपद्यत ॥
bhīṣmo rathātprapatitaḥ saṃchinno bahubhiḥ śaraiḥ | hāheti tumulaḥ śabdo bhūtānāṃ samapadyata
जब अनेक बाणों से छिन्न-भिन्न होकर भीष्म रथ से गिरे, तब समस्त प्राणियों में "हाय! हाय!" का भारी कोलाहल मच गया।
श्लोक 11 (6.120.11)
सीमावृक्षे निपतिते कुरूणां समितिंजये । सेनयोरुभयो राजन्क्षत्रियान्भयमाविशत् ॥
sīmāvṛkṣe nipatite kurūṇāṃ samitiṃjaye | senayorubhayo rājankṣatriyānbhayamāviśat
हे राजन्, युद्ध में विजय दिलाने वाले, कुरुओं की सीमा के वृक्ष-सरीखे भीष्म के गिर जाने पर दोनों सेनाओं के क्षत्रियों में भय समा गया।
श्लोक 12 (6.120.12)
भीष्मं शान्तनवं दृष्ट्वा विशीर्णकवचध्वजम् । कुरवः पर्यवर्तन्त पाण्डवाश्च विशांपते ॥
bhīṣmaṃ śāntanavaṃ dṛṣṭvā viśīrṇakavacadhvajam | kuravaḥ paryavartanta pāṇḍavāśca viśāṃpate
हे प्रजानाथ, शान्तनुनन्दन भीष्म को टूटे कवच और ध्वज के साथ देखकर कौरव और पाण्डव उन्हें घेरकर खड़े हो गए।
श्लोक 13 (6.120.13)
खं तमःसंवृतमभूदासीद्भानुर्गतप्रभः । ररास पृथिवी चैव भीष्मे शान्तनवे हते ॥
khaṃ tamaḥsaṃvṛtamabhūdāsīdbhānurgataprabhaḥ | rarāsa pṛthivī caiva bhīṣme śāntanave hate
आकाश अंधकार से ढक गया, सूर्य की प्रभा जाती रही, और शान्तनुनन्दन भीष्म के मारे जाने पर पृथ्वी भी चीत्कार कर उठी।
श्लोक 14 (6.120.14)
अयं ब्रह्मविदां श्रेष्ठो गतिर्ब्रह्मविदां सदा । इत्यभाषन्त भूतानि शयानं पुरुषर्षभम् ॥
ayaṃ brahmavidāṃ śreṣṭho gatirbrahmavidāṃ sadā | ityabhāṣanta bhūtāni śayānaṃ puruṣarṣabham
"ये ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं, ये सदा ब्रह्मज्ञानियों की गति हैं" — लेटे हुए उस पुरुषश्रेष्ठ के विषय में प्राणी ऐसा कहने लगे।
श्लोक 15 (6.120.15)
अयं पितरमाज्ञाय कामार्तं शन्तनुं पुरा । ऊर्ध्वरेतसमात्मानं चकार पुरुषर्षभः ॥
ayaṃ pitaramājñāya kāmārtaṃ śantanuṃ purā | ūrdhvaretasamātmānaṃ cakāra puruṣarṣabhaḥ
"पूर्वकाल में अपने पिता शान्तनु को कामपीड़ित जानकर इस पुरुषश्रेष्ठ ने स्वयं को ऊर्ध्वरेता (आजीवन ब्रह्मचारी) बना लिया था।"
श्लोक 16 (6.120.16)
इति स्म शरतल्पस्थं भरतानां पितामहम् । ऋषयस्त्वभ्यभाषन्त सहिताः सिद्धचारणैः ॥
iti sma śaratalpasthaṃ bharatānāṃ pitāmaham | ṛṣayastvabhyabhāṣanta sahitāḥ siddhacāraṇaiḥ
बाणशय्या पर पड़े भरतवंशियों के पितामह के विषय में सिद्धों और चारणों के साथ ऋषि इस प्रकार कहने लगे।
श्लोक 17 (6.120.17)
हते शान्तनवे भीष्मे भरतानां पितामहे । न किंचित्प्रत्यपद्यन्त पुत्रास्तव हि मारिष ॥
hate śāntanave bhīṣme bharatānāṃ pitāmahe | na kiṃcitpratyapadyanta putrāstava hi māriṣa
हे मान्यवर, भरतवंशियों के पितामह शान्तनुनन्दन भीष्म के मारे जाने पर आपके पुत्रों को कुछ भी नहीं सूझा।
श्लोक 18 (6.120.18)
विषण्णवदनाश्चासन्हतश्रीकाश्च भारत । अतिष्ठन्व्रीडिताश्चैव ह्रिया युक्ता ह्यधोमुखाः ॥
viṣaṇṇavadanāścāsanhataśrīkāśca bhārata | atiṣṭhanvrīḍitāścaiva hriyā yuktā hyadhomukhāḥ
हे भारत, उनके मुख उदास हो गए और उनकी शोभा नष्ट हो गई; वे लज्जित होकर, संकोच से सिर झुकाए खड़े रह गए।
श्लोक 19 (6.120.19)
पाण्डवाश्च जयं लब्ध्वा संग्रामशिरसि स्थिताः । सर्वे दध्मुर्महाशङ्खान्हेमजालपरिष्कृतान् ॥
pāṇḍavāśca jayaṃ labdhvā saṃgrāmaśirasi sthitāḥ | sarve dadhmurmahāśaṅkhānhemajālapariṣkṛtān
और पाण्डवों ने विजय पाकर युद्ध के अग्रभाग में खड़े होकर सबने सोने की जाली से सजे अपने महाशंख बजाए।
श्लोक 20 (6.120.20)
हर्षात्तूर्यसहस्रेषु वाद्यमानेषु चानघ । अपश्याम महाराज भीमसेनं महाबलम् ॥
harṣāttūryasahasreṣu vādyamāneṣu cānagha | apaśyāma mahārāja bhīmasenaṃ mahābalam
हे निष्पाप महाराज, जब हर्ष में सहस्रों बाजे बज रहे थे, तब हमने महाबली भीमसेन को देखा —
श्लोक 21 (6.120.21)
विक्रीडमानं कौन्तेयं हर्षेण महता युतम् । निहत्य तरसा शत्रुं महाबलसमन्वितम् ॥
vikrīḍamānaṃ kaunteyaṃ harṣeṇa mahatā yutam | nihatya tarasā śatruṃ mahābalasamanvitam
कुन्तीपुत्र को, जो महान बल से युक्त शत्रु को वेग से मारकर अत्यंत हर्ष में भरा क्रीड़ा कर रहा था।
श्लोक 22 (6.120.22)
संमोहश्चापि तुमुलः कुरूणामभवत्ततः । कर्णदुर्योधनौ चापि निःश्वसेतां मुहुर्मुहुः ॥
saṃmohaścāpi tumulaḥ kurūṇāmabhavattataḥ | karṇaduryodhanau cāpi niḥśvasetāṃ muhurmuhuḥ
तब कौरवों पर भारी मोह छा गया, और कर्ण तथा दुर्योधन भी बार-बार लंबी साँसें भरने लगे।
श्लोक 23 (6.120.23)
तथा निपातिते भीष्मे कौरवाणां पितामहे । हाहाभूतमभूत्सर्वं निर्मर्यादमवर्तत ॥
tathā nipātite bhīṣme kauravāṇāṃ pitāmahe | hāhābhūtamabhūtsarvaṃ nirmaryādamavartata
कौरवों के पितामह भीष्म के इस प्रकार गिराए जाने पर सब ओर हाहाकार मच गया और सारी मर्यादा टूट गई।
श्लोक 24 (6.120.24)
दृष्ट्वा च पतितं भीष्मं पुत्रो दुःशासनस्तव । उत्तमं जवमास्थाय द्रोणानीकमुपाद्रवत् ॥
dṛṣṭvā ca patitaṃ bhīṣmaṃ putro duḥśāsanastava | uttamaṃ javamāsthāya droṇānīkamupādravat
भीष्म को गिरा देखकर आपका पुत्र दुःशासन पूरे वेग से द्रोण की सेना की ओर दौड़ा।
श्लोक 25 (6.120.25)
भ्रात्रा प्रस्थापितो वीरः स्वेनानीकेन दंशितः । प्रययौ पुरुषव्याघ्रः स्वसैन्यमभिहर्षयन् ॥
bhrātrā prasthāpito vīraḥ svenānīkena daṃśitaḥ | prayayau puruṣavyāghraḥ svasainyamabhiharṣayan
भाई (दुर्योधन) के भेजे हुए वह पुरुषसिंह वीर कवच पहने अपनी सेना के साथ अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाता हुआ चल पड़ा।
श्लोक 26 (6.120.26)
तमायान्तमभिप्रेक्ष्य कुरवः पर्यवारयन् । दुःशासनं महाराज किमयं वक्ष्यतीति च ॥
tamāyāntamabhiprekṣya kuravaḥ paryavārayan | duḥśāsanaṃ mahārāja kimayaṃ vakṣyatīti ca
हे महाराज, उसे आते देखकर कौरव यह सोचते हुए दुःशासन को घेरकर खड़े हो गए कि यह क्या कहेगा।
श्लोक 27 (6.120.27)
ततो द्रोणाय निहतं भीष्ममाचष्ट कौरवः । द्रोणस्तदाऽप्रियं श्रुत्वा मुमोह भरतर्षभ ॥
tato droṇāya nihataṃ bhīṣmamācaṣṭa kauravaḥ | droṇastadā'priyaṃ śrutvā mumoha bharatarṣabha
तब उस कौरव ने द्रोण को भीष्म के मारे जाने का समाचार दिया; हे भरतश्रेष्ठ, वह अप्रिय समाचार सुनकर द्रोण मूर्च्छित हो गए।
श्लोक 28 (6.120.28)
स संज्ञामुपलभ्याशु भारद्वाजः प्रतापवान् । निवारयामास तदा स्वान्यनीकानि मारिष ॥
sa saṃjñāmupalabhyāśu bhāradvājaḥ pratāpavān | nivārayāmāsa tadā svānyanīkāni māriṣa
हे मान्यवर, प्रतापी भरद्वाजनन्दन ने शीघ्र ही होश में आकर तब अपनी सेनाओं को युद्ध से रोक दिया।
श्लोक 29 (6.120.29)
विनिवृत्तान्कुरून्दृष्ट्वा पाण्डवापि स्वसैनिकान् । रथैः शीघ्राश्वसंयुक्तैः समन्तात्पर्यवारयन् ॥
vinivṛttānkurūndṛṣṭvā pāṇḍavāpi svasainikān | rathaiḥ śīghrāśvasaṃyuktaiḥ samantātparyavārayan
कौरवों को लौटते देखकर पाण्डवों ने भी तेज घोड़ों वाले रथ चारों ओर भेजकर अपने सैनिकों को रोक लिया।
श्लोक 30 (6.120.30)
निवृत्तेषु च सैन्येषु पारम्पर्येण सर्वशः । निर्मुक्तकवचाः सर्वे भीष्ममीयुर्नराधिपाः ॥
nivṛtteṣu ca sainyeṣu pāramparyeṇa sarvaśaḥ | nirmuktakavacāḥ sarve bhīṣmamīyurnarādhipāḥ
जब सब ओर की सेनाएँ क्रम से लौट गईं, तब सभी राजा अपने कवच उतारकर भीष्म के पास गए।
श्लोक 31 (6.120.31)
व्युपरम्य ततो युद्धाद्योधाः शतसहस्रशः । उपतस्थुर्महात्मानं प्रजापतिमिवामराः ॥
vyuparamya tato yuddhādyodhāḥ śatasahasraśaḥ | upatasthurmahātmānaṃ prajāpatimivāmarāḥ
युद्ध से विरत होकर लाखों योद्धा उस महात्मा के पास वैसे ही उपस्थित हुए जैसे देवता प्रजापति के पास।
श्लोक 32 (6.120.32)
ते तु भीष्मं समासाद्य शयानं भरतर्षभम् । अभिवाद्यावतिष्ठन्त पाण्डवाः कुरुभिः सह ॥
te tu bhīṣmaṃ samāsādya śayānaṃ bharatarṣabham | abhivādyāvatiṣṭhanta pāṇḍavāḥ kurubhiḥ saha
लेटे हुए भरतश्रेष्ठ भीष्म के पास पहुँचकर पाण्डव और कौरव साथ-साथ उन्हें प्रणाम करके खड़े हो गए।
श्लोक 33 (6.120.33)
अथ पाण्डून्कुरूंश्चैव प्रणिपत्याग्रतः स्थितान् । अभ्यभाषत धर्मात्मा भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥
atha pāṇḍūnkurūṃścaiva praṇipatyāgrataḥ sthitān | abhyabhāṣata dharmātmā bhīṣmaḥ śāntanavastadā
तब धर्मात्मा शान्तनुनन्दन भीष्म ने प्रणाम करके सामने खड़े पाण्डवों और कौरवों से कहा —
भीष्म उवाच
श्लोक 34 (6.120.34)
स्वागतं वो महाभागाः स्वागतं वो महारथाः । तुष्यामि दर्शनाच्चाहं युष्माकममरोपमाः ॥
svāgataṃ vo mahābhāgāḥ svāgataṃ vo mahārathāḥ | tuṣyāmi darśanāccāhaṃ yuṣmākamamaropamāḥ
"हे महाभाग्यशालियो, तुम्हारा स्वागत है! हे महारथियो, तुम्हारा स्वागत है! देवताओं के समान तुम सबको देखकर मैं प्रसन्न हूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 35 (6.120.35)
अभिनन्द्य स तानेवं शिरसा लम्बताऽब्रवीत् । परपार्श्वे तव सुतान्स्थितानुद्वीक्ष्य भारत । शिरो मे लम्बतेऽत्यर्थमुपधानं प्रदीयताम् ॥
abhinandya sa tānevaṃ śirasā lambatā'bravīt | parapārśve tava sutānsthitānudvīkṣya bhārata | śiro me lambate'tyarthamupadhānaṃ pradīyatām
हे भारत, इस प्रकार उनका अभिनन्दन करके, दूसरी ओर खड़े आपके पुत्रों की ओर देखते हुए, वे लटकते सिर से बोले — "मेरा सिर बहुत अधिक लटक रहा है, मुझे तकिया दिया जाए।"
श्लोक 36 (6.120.36)
ततो नृपाः समाजह्रुस्तनूनि च मृदूनि च । उपधानानि मुख्यानि नैच्छत्तानि पितामहः ॥
tato nṛpāḥ samājahrustanūni ca mṛdūni ca | upadhānāni mukhyāni naicchattāni pitāmahaḥ
तब राजा लोग पतले और कोमल उत्तम तकिये ले आए, किन्तु पितामह ने उन्हें नहीं चाहा।
श्लोक 37 (6.120.37)
अथाब्रवीन्नरव्याघ्रः प्रहसन्निव तान्नृपान् । नैतानि वीरशय्यासु युक्तरूपाणि पार्थिवाः ॥
athābravīnnaravyāghraḥ prahasanniva tānnṛpān | naitāni vīraśayyāsu yuktarūpāṇi pārthivāḥ
तब उस पुरुषसिंह ने मानो मुस्कराते हुए उन राजाओं से कहा — "हे राजाओ, ये वीरशय्या के योग्य नहीं हैं।"
श्लोक 38 (6.120.38)
ततो वीक्ष्य नरश्रेष्ठमभ्यभाषत पाण्डवम् । धनञ्जयं दीर्घबाहुं सर्वलोकमहारथम् ॥
tato vīkṣya naraśreṣṭhamabhyabhāṣata pāṇḍavam | dhanañjayaṃ dīrghabāhuṃ sarvalokamahāratham
फिर उस नरश्रेष्ठ की ओर देखकर उन्होंने सम्पूर्ण लोक के महारथी, दीर्घबाहु पाण्डुपुत्र धनंजय से कहा —
भीष्म उवाच
श्लोक 39 (6.120.39)
धनञ्जय महाबाहो शिरो मे तात लम्बते । दीयतामुपधानं वै यद्युक्तमिह मन्यसे ॥
dhanañjaya mahābāho śiro me tāta lambate | dīyatāmupadhānaṃ vai yadyuktamiha manyase
"हे महाबाहु धनंजय, तात, मेरा सिर लटक रहा है। यहाँ जो उचित समझो, ऐसा तकिया मुझे दो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 40 (6.120.40)
समारोप्य महच्चापमभिवाद्य पितामहम् । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥
samāropya mahaccāpamabhivādya pitāmaham | netrābhyāmaśrupūrṇābhyāmidaṃ vacanamabravīt
तब अर्जुन ने अपने महान धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर और पितामह को प्रणाम करके आँसू भरी आँखों से यह वचन कहा —
अर्जुन उवाच
श्लोक 41 (6.120.41)
आज्ञापय कुरुश्रेष्ठ सर्वशस्त्रभृतां वर । प्रेष्योऽहं तव दुर्धर्ष क्रियतां किं पितामह ॥
ājñāpaya kuruśreṣṭha sarvaśastrabhṛtāṃ vara | preṣyo'haṃ tava durdharṣa kriyatāṃ kiṃ pitāmaha
"हे कुरुश्रेष्ठ, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, आज्ञा दीजिए! हे दुर्धर्ष, मैं आपका सेवक हूँ। हे पितामह, बताइए क्या किया जाए?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 42 (6.120.42)
तमब्रवीच्छान्तनवः शिरो मे तात लम्बते । दीयतामुपधानं मे यद्युक्तमिह मन्यसे । उपधानं कुरुश्रेष्ठ उपधेहि ममार्जुन ॥
tamabravīcchāntanavaḥ śiro me tāta lambate | dīyatāmupadhānaṃ me yadyuktamiha manyase | upadhānaṃ kuruśreṣṭha upadhehi mamārjuna
शान्तनुनन्दन ने उनसे कहा — "तात, मेरा सिर लटक रहा है। यहाँ जो उचित समझो, वैसा तकिया मुझे दिया जाए। हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन, मेरे लिए तकिया लगा दो।
भीष्म उवाच
श्लोक 43 (6.120.43)
वीरशय्यानुरूपं वै शीघ्रं वीर प्रयच्छ मे । त्वं हि पार्थ समर्थो वै श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥
vīraśayyānurūpaṃ vai śīghraṃ vīra prayaccha me | tvaṃ hi pārtha samartho vai śreṣṭhaḥ sarvadhanuṣmatām
हे वीर, वीरशय्या के अनुरूप तकिया मुझे शीघ्र दो; क्योंकि हे पार्थ, तुम समर्थ हो, समस्त धनुर्धारियों में श्रेष्ठ हो,
सञ्जय उवाच
श्लोक 44 (6.120.44)
क्षत्रधर्मस्य वेत्ता च बुद्धिसत्वगुणान्वितः । फल्गुनोऽपि तथेत्युक्त्वा व्यवसायं परंजयः ॥
kṣatradharmasya vettā ca buddhisatvaguṇānvitaḥ | phalguno'pi tathetyuktvā vyavasāyaṃ paraṃjayaḥ
क्षत्रियधर्म के ज्ञाता हो और बुद्धि, धैर्य तथा सद्गुणों से युक्त हो।" फाल्गुन ने भी "ऐसा ही हो" कहा, और उचित उद्योग का निश्चय करके उन शत्रुविजेता ने
श्लोक 45 (6.120.45)
गृह्यानुमन्त्र्य गाण्डीवं शरान्सन्नतपर्वणः । अनुमान्य महात्मानं भरतानां महारथम् ॥
gṛhyānumantrya gāṇḍīvaṃ śarānsannataparvaṇaḥ | anumānya mahātmānaṃ bharatānāṃ mahāratham
गाण्डीव उठाया, झुकी गाँठों वाले बाणों को मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया, और भरतवंश के उस महात्मा महारथी की अनुमति लेकर
श्लोक 46 (6.120.46)
त्रिभिस्तीक्ष्णैर्महावेगैरुदगृह्णाच्छिरः शरैः । अभिप्राये तु विदिते धर्मात्मा सव्यसाचिना ॥
tribhistīkṣṇairmahāvegairudagṛhṇācchiraḥ śaraiḥ | abhiprāye tu vidite dharmātmā savyasācinā
तीन तीखे और वेगवान बाणों से उनका सिर थाम दिया। सव्यसाची ने जब उनका अभिप्राय समझ लिया, तब धर्मात्मा
श्लोक 47 (6.120.47)
अतुष्यद्भरतश्रेष्ठो भीष्मो धर्मार्थतत्त्ववित् । उपधानेन दत्तेन प्रत्यनन्दद्धनञ्जयम् ॥
atuṣyadbharataśreṣṭho bhīṣmo dharmārthatattvavit | upadhānena dattena pratyanandaddhanañjayam
धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले भरतश्रेष्ठ भीष्म प्रसन्न हुए, और दिए गए तकिये के लिए उन्होंने धनंजय का अभिनन्दन किया।
श्लोक 48 (6.120.48)
प्राह सर्वान्समुद्वीक्ष्य भरतान्भारतं प्रति । कुन्तीपुत्रं युधां श्रेष्ठं सुहृदां प्रीतिवर्धनम् ॥
prāha sarvānsamudvīkṣya bharatānbhārataṃ prati | kuntīputraṃ yudhāṃ śreṣṭhaṃ suhṛdāṃ prītivardhanam
फिर सब भरतवंशियों की ओर देखकर उन्होंने योद्धाओं में श्रेष्ठ, मित्रों का आनन्द बढ़ाने वाले उस भरतवंशी कुन्तीपुत्र (अर्जुन) से कहा —
भीष्म उवाच
श्लोक 49 (6.120.49)
शयनस्यानुरूपं मे पाण्डवोपहितं त्वया । यद्यन्यथा प्रपद्येथाः शपेयं त्वामहं पुरा ॥
śayanasyānurūpaṃ me pāṇḍavopahitaṃ tvayā | yadyanyathā prapadyethāḥ śapeyaṃ tvāmahaṃ purā
"हे पाण्डुनन्दन, तुमने मेरी शय्या के अनुरूप तकिया दिया है। यदि तुम अन्यथा करते, तो मैं तुम्हें शाप दे देता।
श्लोक 50 (6.120.50)
एवमेव महाबाहो धर्मेषु परितिष्ठता । स्वप्तव्यं क्षत्रियेणाजौ शरतल्पगतेन वै ॥
evameva mahābāho dharmeṣu paritiṣṭhatā | svaptavyaṃ kṣatriyeṇājau śaratalpagatena vai
हे महाबाहु, अपने धर्मों में दृढ़ रहने वाले क्षत्रिय को युद्धभूमि में बाणशय्या पर इसी प्रकार सोना चाहिए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 51 (6.120.51)
एवमुक्त्वा तु बीभत्सुं सर्वांस्तानब्रवीद्वचः । राज्ञश्च राजपुत्रांश्च पाण्डवैरभिसंवृतान् ॥
evamuktvā tu bībhatsuṃ sarvāṃstānabravīdvacaḥ | rājñaśca rājaputrāṃśca pāṇḍavairabhisaṃvṛtān
बीभत्सु से ऐसा कहकर उन्होंने पाण्डवों के साथ वहाँ एकत्र सभी राजाओं और राजकुमारों से यह वचन कहा —
भीष्म उवाच
श्लोक 52 (6.120.52)
पश्यध्वमुपधानं मे पाण्डवेनाभिसन्धितम् । शयेयमस्यां शय्यायां यावदावर्तनं रवेः ॥
paśyadhvamupadhānaṃ me pāṇḍavenābhisandhitam | śayeyamasyāṃ śayyāyāṃ yāvadāvartanaṃ raveḥ
"देखो, पाण्डुपुत्र ने मेरे लिए कैसा तकिया लगाया है! सूर्य के लौटने (उत्तरायण होने) तक मैं इसी शय्या पर लेटा रहूँगा।
श्लोक 53 (6.120.53)
ये तदा धारयिष्यन्ति ते च प्रेक्ष्यन्ति मां नृपाः । दिशं वैश्रवणाक्रान्तां यदा गन्ता दिवाकरः ॥
ye tadā dhārayiṣyanti te ca prekṣyanti māṃ nṛpāḥ | diśaṃ vaiśravaṇākrāntāṃ yadā gantā divākaraḥ
जो राजा तब तक जीवित रहेंगे, वे मुझे देखेंगे — जब सूर्य वैश्रवण (कुबेर) की उत्तर दिशा की ओर जाएँगे।
श्लोक 54 (6.120.54)
नूनं सप्ताश्वयुक्तेन रथेनोत्तमतेजसा । रक्ष्येऽहं वै मम प्राणान्सुहृदः सुप्रियानिव ॥
nūnaṃ saptāśvayuktena rathenottamatejasā | rakṣye'haṃ vai mama prāṇānsuhṛdaḥ supriyāniva
निश्चय ही, जब तक सूर्य सात घोड़ों वाले परम तेजस्वी रथ से (उत्तर की ओर) नहीं चलते, तब तक मैं अपने प्राणों की रक्षा प्रिय मित्रों की भाँति करूँगा।
श्लोक 55 (6.120.55)
परिखाः खन्यतामत्र ममावसदने नृपाः । उपासिष्ये विवस्वन्तमेवं शरशताचितः । उपारमध्वं संग्रामाद्वैरमुत्सृज्य पार्थिवाः ॥
parikhāḥ khanyatāmatra mamāvasadane nṛpāḥ | upāsiṣye vivasvantamevaṃ śaraśatācitaḥ | upāramadhvaṃ saṃgrāmādvairamutsṛjya pārthivāḥ
हे राजाओ, यहाँ मेरे विश्राम-स्थान के चारों ओर खाई खुदवा दी जाए। सैकड़ों बाणों से इस प्रकार बिंधा हुआ मैं सूर्य की उपासना करूँगा। हे राजाओ, तुम लोग वैर छोड़कर युद्ध से विरत हो जाओ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 56 (6.120.56)
उपातिष्ठन्नथो वैद्याः शल्योद्धरणकोविदाः । सर्वोपकरणैर्युक्ताः कुशलैः साधुशिक्षिताः ॥
upātiṣṭhannatho vaidyāḥ śalyoddharaṇakovidāḥ | sarvopakaraṇairyuktāḥ kuśalaiḥ sādhuśikṣitāḥ
तब बाण निकालने में कुशल वैद्य वहाँ उपस्थित हुए, जो सब उपकरणों से सुसज्जित थे और निपुण गुरुओं से भली-भाँति शिक्षित थे।
श्लोक 57 (6.120.57)
तान्दृष्ट्वा जाह्नवीपुत्रः प्रोवाच तनयं तव । दत्तदेया विसृज्यन्तां पूजयित्वा चिकित्सकाः ॥
tāndṛṣṭvā jāhnavīputraḥ provāca tanayaṃ tava | dattadeyā visṛjyantāṃ pūjayitvā cikitsakāḥ
उन्हें देखकर जाह्नवीनन्दन ने आपके पुत्र से कहा — "इन चिकित्सकों का सम्मान करके और उचित दक्षिणा देकर इन्हें विदा कर दिया जाए।
भीष्म उवाच
श्लोक 58 (6.120.58)
एवंगते मयेदानीं वैद्यैः कार्यमिहास्ति किम् । क्षत्रधर्मे प्रशस्तां हि प्राप्तोऽस्मि परमां गतिम् ॥
evaṃgate mayedānīṃ vaidyaiḥ kāryamihāsti kim | kṣatradharme praśastāṃ hi prāpto'smi paramāṃ gatim
ऐसी दशा में अब मुझे वैद्यों से क्या काम? क्षत्रियधर्म में जिसकी प्रशंसा की गई है, वह परम गति मैं पा चुका हूँ।
श्लोक 59 (6.120.59)
नैष धर्मो महीपालाः शरतल्पगतस्य मे । एभिरेव शरैश्चाहं दग्धव्योऽग्नौ नराधिपाः ॥
naiṣa dharmo mahīpālāḥ śaratalpagatasya me | ebhireva śaraiścāhaṃ dagdhavyo'gnau narādhipāḥ
हे भूपालो, बाणशय्या पर पड़े व्यक्ति के लिए यह धर्म नहीं है। हे नरपतियो, इन्हीं बाणों के साथ मुझे अग्नि में जलाया जाना चाहिए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 60 (6.120.60)
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य पुत्रो दुर्योधनस्तव । वैद्यान्विसर्जयामास पूजयित्वा यथार्हतः ॥
tacchrutvā vacanaṃ tasya putro duryodhanastava | vaidyānvisarjayāmāsa pūjayitvā yathārhataḥ
उनके वचन सुनकर आपके पुत्र दुर्योधन ने वैद्यों का यथायोग्य सम्मान करके उन्हें विदा कर दिया।
श्लोक 61 (6.120.61)
ततस्ते विस्मयं जग्मुर्नानाजनपदेश्वराः । स्थितिं धर्मे परां दृष्ट्वा भीष्मस्यामिततेजसः ॥
tataste vismayaṃ jagmurnānājanapadeśvarāḥ | sthitiṃ dharme parāṃ dṛṣṭvā bhīṣmasyāmitatejasaḥ
तब नाना देशों के अधिपति अपार तेजस्वी भीष्म की धर्म में ऐसी परम निष्ठा देखकर विस्मित हो गए।
श्लोक 62 (6.120.62)
उपधानं ततो दत्त्वा पितुस्ते मनुजेश्वराः । सहिताः पाण्डवाः सर्वे कुरवश्च महारथाः ॥
upadhānaṃ tato dattvā pituste manujeśvarāḥ | sahitāḥ pāṇḍavāḥ sarve kuravaśca mahārathāḥ
तब आपके पिता को तकिया देकर वे सब नरेश — सभी पाण्डव और कौरव महारथी — एक साथ
श्लोक 63 (6.120.63)
उपगम्य महात्मानं शयानं शयने शुभे ॥
upagamya mahātmānaṃ śayānaṃ śayane śubhe
उस सुन्दर शय्या पर लेटे महात्मा के पास गए।
श्लोक 64 (6.120.64)
तेऽभिवाद्य ततो भीष्मं कृत्वा च त्रिःप्रदक्षिणम् । विधाय रक्षां भीष्मस्य सर्व एव समन्ततः ॥
te'bhivādya tato bhīṣmaṃ kṛtvā ca triḥpradakṣiṇam | vidhāya rakṣāṃ bhīṣmasya sarva eva samantataḥ
भीष्म को प्रणाम करके और उनकी तीन बार परिक्रमा करके, तथा उनके चारों ओर रक्षा का प्रबन्ध करके,
श्लोक 65 (6.120.65)
वीराः स्वशिबिराण्येव ध्यायन्तः परमातुराः । निवेशायाभ्युपागच्छन्सायाह्ने रुधिरोक्षिताः ॥
vīrāḥ svaśibirāṇyeva dhyāyantaḥ paramāturāḥ | niveśāyābhyupāgacchansāyāhne rudhirokṣitāḥ
वे वीर अत्यंत व्याकुल और चिन्तामग्न होकर, रक्त से लथपथ, संध्या के समय विश्राम के लिए अपने-अपने शिविरों को लौट गए।
श्लोक 66 (6.120.66)
निविष्टान्पाण्डवांश्चैव प्रीयमाणान्महारथान् । भीष्मस्य पतनं दृष्ट्वा उपगम्य महाबलः ॥
niviṣṭānpāṇḍavāṃścaiva prīyamāṇānmahārathān | bhīṣmasya patanaṃ dṛṣṭvā upagamya mahābalaḥ
जब महारथी पाण्डव भीष्म का पतन देखकर प्रसन्न होते हुए शिविर में ठहर गए, तब वे महाबली (श्रीकृष्ण) उनके पास आए
श्लोक 67 (6.120.67)
उवाच माधवः काले धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । दिष्ट्या जयसि कौरव्य दिष्ट्या भीष्मो निपातितः ॥
uvāca mādhavaḥ kāle dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram | diṣṭyā jayasi kauravya diṣṭyā bhīṣmo nipātitaḥ
और माधव ने उचित समय पर धर्मपुत्र युधिष्ठिर से कहा — "हे कुरुनन्दन, सौभाग्य से तुम विजयी हो रहे हो; सौभाग्य से भीष्म गिरा दिए गए,
वासुदेव उवाच
श्लोक 68 (6.120.68)
अवध्यो मानुषैरेव सत्यसन्धो महारथः । अथवा दैवतैः सार्धं सर्वशास्त्रस्य पारगः ॥
avadhyo mānuṣaireva satyasandho mahārathaḥ | athavā daivataiḥ sārdhaṃ sarvaśāstrasya pāragaḥ
वे सत्यप्रतिज्ञ महारथी, जो मनुष्यों से अवध्य थे, अथवा देवताओं के साथ भी अवध्य थे, और समस्त शास्त्रों के पारंगत थे।
श्लोक 69 (6.120.69)
त्वां तु चक्षुर्हणं प्राप्य दग्धो घोरेण चक्षुषा ॥
tvāṃ tu cakṣurhaṇaṃ prāpya dagdho ghoreṇa cakṣuṣā
किन्तु दृष्टि मात्र से भस्म कर देने वाले तुमसे भिड़कर वे तुम्हारी भयंकर दृष्टि से जल गए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 70 (6.120.70)
एवमुक्तो धर्मराजः प्रत्युवाच जनार्दनम् ॥
evamukto dharmarājaḥ pratyuvāca janārdanam
ऐसा कहे जाने पर धर्मराज ने जनार्दन को उत्तर दिया —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 71 (6.120.71)
तव प्रसादाद्विजयः क्रोधात्तव पराजयः । त्वं हि नः शरणं कृष्ण भक्तानामभयंकरः ॥
tava prasādādvijayaḥ krodhāttava parājayaḥ | tvaṃ hi naḥ śaraṇaṃ kṛṣṇa bhaktānāmabhayaṃkaraḥ
"हे कृष्ण, आपकी कृपा से विजय होती है और आपके क्रोध से पराजय। आप ही हमारे शरणदाता हैं, भक्तों को अभय देने वाले हैं।
श्लोक 72 (6.120.72)
अनाश्चर्यो जयस्तेषां येषां त्वमसि केशव । रक्षिता समरे नित्यं नित्यं चापि हिते रतः ॥
anāścaryo jayasteṣāṃ yeṣāṃ tvamasi keśava | rakṣitā samare nityaṃ nityaṃ cāpi hite rataḥ
हे केशव, जिनके आप युद्ध में सदा रक्षक हैं और जिनके हित में सदा लगे रहते हैं, उनकी विजय में कोई आश्चर्य नहीं।
श्लोक 73 (6.120.73)
सर्वथा त्वां समासाद्य नाश्चर्यमिति मे मतिः ॥
sarvathā tvāṃ samāsādya nāścaryamiti me matiḥ
आपको पाकर तो यह सर्वथा आश्चर्य की बात नहीं है — ऐसा मेरा मत है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 74 (6.120.74)
एवमुक्तः प्रत्युवाच स्मयमानो जनार्दनः । तवैवैतद्युक्तरूपं वचनं पार्थिवोत्तम ॥
evamuktaḥ pratyuvāca smayamāno janārdanaḥ | tavaivaitadyuktarūpaṃ vacanaṃ pārthivottama
ऐसा कहे जाने पर जनार्दन ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया — "हे राजश्रेष्ठ, ऐसे वचन आपके ही योग्य हैं।"