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भीष्म पर्व · अध्याय 121

अर्जुन का पृथ्वी भेदकर भीष्म को जल पिलाना

प्रभात होने पर दोनों पक्षों के राजा, कन्याएँ, नगरवासी और वादक बाणशय्या पर लेटे भीष्म के चारों ओर एकत्र होते हैं, और अपने शस्त्र रखकर पहले की भाँति साथ बैठते हैं। घावों से पीड़ित भीष्म जल माँगते हैं; राजाओं द्वारा लाए गए जल-कलश और भोज्य पदार्थों को केवल मानवीय सुख कहकर अस्वीकार करके वे अर्जुन को बुलाते हैं, और अर्जुन पर्जन्यास्त्र से अभिमन्त्रित बाण द्वारा उनके पास की पृथ्वी को बेधकर शीतल, सुगन्धित जलधारा निकालकर उन्हें तृप्त करते हैं। दिव्य अस्त्रों पर अर्जुन के अद्वितीय अधिकार की प्रशंसा करते हुए भीष्म दुर्योधन से आग्रह करते हैं कि उनकी मृत्यु के साथ ही युद्ध समाप्त कर दे, पाण्डवों को आधा राज्य देकर समय रहते संधि कर ले; किन्तु मरणासन्न व्यक्ति जैसे औषध को नहीं चाहता, वैसे ही दुर्योधन यह हितकर सलाह स्वीकार नहीं करता।

अध्याय 120अध्याय-सूचीअध्याय 122

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.121.1)

व्युष्टायां तु महाराज शर्वर्यां सर्वपार्थिवाः । पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च उपातिष्ठन्पितामहम् ॥

vyuṣṭāyāṃ tu mahārāja śarvaryāṃ sarvapārthivāḥ | pāṇḍavā dhārtarāṣṭrāśca upātiṣṭhanpitāmaham

हे महाराज, रात बीतने पर सब राजा — पाण्डव और धृतराष्ट्र के पुत्र — पितामह की सेवा में उपस्थित हुए।

श्लोक 2 (6.121.2)

तं वीरशयने वीरं शयानं कुरुसत्तम । अभिवाद्योपतस्थुर्वै क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् ॥

taṃ vīraśayane vīraṃ śayānaṃ kurusattama | abhivādyopatasthurvai kṣatriyāḥ kṣatriyarṣabham

हे कुरुश्रेष्ठ, वीरशय्या पर लेटे उस वीर को प्रणाम करके क्षत्रिय उस क्षत्रियश्रेष्ठ की सेवा में खड़े हो गए।

श्लोक 3 (6.121.3)

कन्याश्चन्दनचूर्णैश्च लाजैर्माल्यैश्च सर्वशः । अवाकिरञ्छान्तनवं तत्र गत्वा सहस्रशः ॥

kanyāścandanacūrṇaiśca lājairmālyaiśca sarvaśaḥ | avākirañchāntanavaṃ tatra gatvā sahasraśaḥ

हजारों कन्याओं ने वहाँ जाकर शान्तनुनन्दन पर चारों ओर से चन्दन-चूर्ण, लावा (खील) और मालाएँ बरसाईं।

श्लोक 4 (6.121.4)

स्त्रियो वृद्धास्तथा बालाः प्रेक्षकाश्च पृथग्जनाः । समभ्ययुः शान्तनवं भूतानीव तमोनुदम् ॥

striyo vṛddhāstathā bālāḥ prekṣakāśca pṛthagjanāḥ | samabhyayuḥ śāntanavaṃ bhūtānīva tamonudam

स्त्रियाँ, वृद्ध, बालक, दर्शक और साधारण जन शान्तनुनन्दन के पास वैसे ही आए जैसे प्राणी अंधकार मिटाने वाले सूर्य के पास आते हैं।

श्लोक 5 (6.121.5)

तूर्याणि शतसङ्ख्यानि तथैव नटनर्तकाः । शिल्पिनश्च तथाऽऽजग्मुः कुरुवृद्धं पितामहम् ॥

tūryāṇi śatasaṅkhyāni tathaiva naṭanartakāḥ | śilpinaśca tathā''jagmuḥ kuruvṛddhaṃ pitāmaham

सैकड़ों बाजे, नट और नर्तक, तथा शिल्पी भी कुरुओं के वृद्ध पितामह के पास आए।

श्लोक 6 (6.121.6)

उपागम्य च राजेन्द्र सन्नाहान्विप्रमुच्य ते । आयुधानि च निक्षिप्य सहिताः कुरुपाण्डवाः ॥

upāgamya ca rājendra sannāhānvipramucya te | āyudhāni ca nikṣipya sahitāḥ kurupāṇḍavāḥ

हे राजेन्द्र, वहाँ आकर कौरवों और पाण्डवों ने साथ-साथ अपने कवच उतार दिए और आयुध रख दिए,

श्लोक 7 (6.121.7)

अन्वासन्त दुराधर्षं देवव्रतमरिंदमम् । अन्योन्यं प्रीतिमन्तस्ते यथापूर्वं यथावयः ॥

anvāsanta durādharṣaṃ devavratamariṃdamam | anyonyaṃ prītimantaste yathāpūrvaṃ yathāvayaḥ

और शत्रुदमन, दुर्धर्ष देवव्रत के पास बैठ गए — पहले की तरह एक-दूसरे के प्रति प्रेमभाव रखते हुए, अवस्था के क्रम से।

श्लोक 8 (6.121.8)

सा पार्थिवशताकीर्णा समितिर्भीष्मशोभिता । शुशुभे भारती दीप्ता दिवीवादित्यमण्डलम् ॥

sā pārthivaśatākīrṇā samitirbhīṣmaśobhitā | śuśubhe bhāratī dīptā divīvādityamaṇḍalam

सैकड़ों राजाओं से भरी और भीष्म से सुशोभित भरतवंशियों की वह सभा आकाश में सूर्यमण्डल की भाँति दीप्तिमान होकर शोभित हुई।

श्लोक 9 (6.121.9)

विबभौ च नृपाणां सा गङ्गासुतमुपासताम् । देवानामिव देवेशं पितामहमुपासताम् ॥

vibabhau ca nṛpāṇāṃ sā gaṅgāsutamupāsatām | devānāmiva deveśaṃ pitāmahamupāsatām

गंगापुत्र की उपासना करते हुए राजाओं की वह सभा वैसी ही शोभित हुई जैसे देवेश्वर पितामह (ब्रह्मा) की उपासना करते हुए देवताओं की सभा।

श्लोक 10 (6.121.10)

भीष्मस्तु वेदनां धैर्यान्निगृह्य भरतर्षभ । अभितप्तः शरैश्चैव नातिहृष्टमनाऽब्रवीत् ॥

bhīṣmastu vedanāṃ dhairyānnigṛhya bharatarṣabha | abhitaptaḥ śaraiścaiva nātihṛṣṭamanā'bravīt

हे भरतश्रेष्ठ, भीष्म ने धैर्य से अपनी पीड़ा को रोका, किन्तु बाणों से संतप्त होने के कारण उदास मन से बोले।

श्लोक 11 (6.121.11)

शराभितप्तकायो हि शस्त्रसंपातमूर्च्छितः । पानीयमिति संप्रेक्ष्य राज्ञस्तान्प्रत्यभाषत ॥

śarābhitaptakāyo hi śastrasaṃpātamūrcchitaḥ | pānīyamiti saṃprekṣya rājñastānpratyabhāṣata

बाणों से उनका शरीर जल रहा था और शस्त्रों के प्रहार से वे मूर्च्छित-से हो रहे थे; उन्होंने राजाओं की ओर देखकर उनसे कहा — "जल!"

श्लोक 12 (6.121.12)

ततस्ते क्षत्रिया राजन्नुपाजह्रुः समन्ततः । भक्ष्यानुच्चावचान्राजन्वारिकुम्भांश्च शीतलान् ॥

tataste kṣatriyā rājannupājahruḥ samantataḥ | bhakṣyānuccāvacānrājanvārikumbhāṃśca śītalān

हे राजन्, तब क्षत्रिय चारों ओर से भाँति-भाँति के भोज्य पदार्थ और शीतल जल के घड़े ले आए।

श्लोक 13 (6.121.13)

उपानीतं तु पानीयं दृष्ट्वा शान्तनवोऽब्रवीत् । न मेऽद्य सेवितुं योग्या भोगाः केवलमानुषाः ॥

upānītaṃ tu pānīyaṃ dṛṣṭvā śāntanavo'bravīt | na me'dya sevituṃ yogyā bhogāḥ kevalamānuṣāḥ

लाए गए जल को देखकर शान्तनुनन्दन ने कहा — "केवल मनुष्यों के योग्य भोग आज मेरे सेवन के योग्य नहीं हैं।

भीष्म उवाच

श्लोक 14 (6.121.14)

अपक्रान्तो मनुष्येभ्यः शरशय्यां गतो ह्यहम् । प्रतीक्षमाणस्तिष्ठामि निवृत्तिं शशिसूर्ययोः ॥

apakrānto manuṣyebhyaḥ śaraśayyāṃ gato hyaham | pratīkṣamāṇastiṣṭhāmi nivṛttiṃ śaśisūryayoḥ

मैं मनुष्यों के संसार से हट चुका हूँ और बाणशय्या पर पड़ा हूँ; चन्द्रमा और सूर्य के लौटने की प्रतीक्षा करता हुआ मैं यहाँ ठहरा हूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 15 (6.121.15)

एवमुक्त्वा तदोवाच भीष्मः शरशतैश्चितः । पयः पास्यामि गोपाला गोमयं न तु गोमयम् । गोमयेनाग्निवर्णेन गोमयं न तु गोमयम् ॥

evamuktvā tadovāca bhīṣmaḥ śaraśataiścitaḥ | payaḥ pāsyāmi gopālā gomayaṃ na tu gomayam | gomayenāgnivarṇena gomayaṃ na tu gomayam

ऐसा कहकर सैकड़ों बाणों से बिंधे भीष्म ने तब कहा — "हे गोपालो (पृथ्वी के रक्षको), मैं वह जल पीऊँगा जो 'गो' (पृथ्वी) से उत्पन्न हो, न कि गोमय (गोबर); अग्नि-सदृश 'गो' (बाण) के द्वारा पृथ्वी से निकाला गया जल — पृथ्वी से उत्पन्न, पर गोबर नहीं।"

श्लोक 16 (6.121.16)

एवमुक्त्वा शान्तनवो निन्दन्वाक्येन पार्थिवान् । अर्जुनं द्रष्टुमिच्छामीत्यभ्यभाषत भारत ॥

evamuktvā śāntanavo nindanvākyena pārthivān | arjunaṃ draṣṭumicchāmītyabhyabhāṣata bhārata

हे भारत, ऐसा कहकर और अपने वचनों से राजाओं की निन्दा करके शान्तनुनन्दन ने कहा — "मैं अर्जुन को देखना चाहता हूँ।"

श्लोक 17 (6.121.17)

अथोपेत्य महाबाहुरभिवाद्य पितामहम् । अतिष्ठत्प्राञ्जलिः प्रह्वः किं करोमीति चाब्रवीत् ॥

athopetya mahābāhurabhivādya pitāmaham | atiṣṭhatprāñjaliḥ prahvaḥ kiṃ karomīti cābravīt

तब महाबाहु अर्जुन पास आए, पितामह को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रता से खड़े होकर बोले — "मैं क्या करूँ?"

श्लोक 18 (6.121.18)

तं दृष्ट्वा पाण्डवं राजन्नभिवाद्याग्रतः स्थितम् । अभ्यभाषत धर्मात्मा भीष्मः प्रीतो धनंजयम् ॥

taṃ dṛṣṭvā pāṇḍavaṃ rājannabhivādyāgrataḥ sthitam | abhyabhāṣata dharmātmā bhīṣmaḥ prīto dhanaṃjayam

हे राजन्, प्रणाम करके सामने खड़े पाण्डुपुत्र को देखकर धर्मात्मा भीष्म ने प्रसन्न होकर धनंजय से कहा —

भीष्म उवाच

श्लोक 19 (6.121.19)

दह्यतीव शरीरं मे संवृतस्य तवेषुभिः । मर्माणि परिदूयन्ते मुखं च परिशुष्यति ॥

dahyatīva śarīraṃ me saṃvṛtasya taveṣubhiḥ | marmāṇi paridūyante mukhaṃ ca pariśuṣyati

"तुम्हारे बाणों से ढका हुआ मेरा शरीर मानो जल रहा है; मेरे मर्मस्थल पीड़ा से तप रहे हैं और मुँह सूख रहा है।

श्लोक 20 (6.121.20)

वेदनार्तशरीरस्य प्रयच्छापो ममार्जुन । त्वं हि शक्तो महेष्वास दातुमम्भो यथाविधि ॥

vedanārtaśarīrasya prayacchāpo mamārjuna | tvaṃ hi śakto maheṣvāsa dātumambho yathāvidhi

हे अर्जुन, पीड़ा से व्याकुल शरीर वाले मुझको जल दो; हे महाधनुर्धर, तुम ही विधिपूर्वक जल देने में समर्थ हो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 21 (6.121.21)

अर्जुनस्तु तथेत्युक्त्वा रथमारुह्य वीर्यवान् । अधिज्यं बलवत्कृत्वा गाण्डीवं व्याक्षिपद्धनुः ॥

arjunastu tathetyuktvā rathamāruhya vīryavān | adhijyaṃ balavatkṛtvā gāṇḍīvaṃ vyākṣipaddhanuḥ

अर्जुन ने "ऐसा ही हो" कहा और वह पराक्रमी रथ पर चढ़ गया; उसने बलपूर्वक गाण्डीव पर प्रत्यंचा चढ़ाकर धनुष की टंकार की।

श्लोक 22 (6.121.22)

तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । वित्रेसुः सर्वभूतानि सर्वे श्रुत्वा च पार्थिवाः ॥

tasya jyātalanirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | vitresuḥ sarvabhūtāni sarve śrutvā ca pārthivāḥ

वज्र की गड़गड़ाहट-सी उसकी प्रत्यंचा की ध्वनि से सब प्राणी काँप उठे, और उसे सुनकर सब राजा भी भयभीत हो गए।

श्लोक 23 (6.121.23)

ततः प्रदक्षिणं कृत्वा रथेन रथिनां वरः । शयानं भरतश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥

tataḥ pradakṣiṇaṃ kṛtvā rathena rathināṃ varaḥ | śayānaṃ bharataśreṣṭhaṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam

तब रथियों में श्रेष्ठ अर्जुन ने रथ से, लेटे हुए भरतश्रेष्ठ, समस्त शस्त्रधारियों में उत्तम भीष्म की प्रदक्षिणा की।

श्लोक 24 (6.121.24)

संधाय च शरं दीप्तमभिमन्त्र्य स पाण्डवः । पर्जन्यास्त्रेण संयोज्य सर्वलोकस्य पश्यतः ॥

saṃdhāya ca śaraṃ dīptamabhimantrya sa pāṇḍavaḥ | parjanyāstreṇa saṃyojya sarvalokasya paśyataḥ

पाण्डुपुत्र ने एक दीप्तिमान बाण चढ़ाया, उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया और सारे संसार के देखते-देखते उसे पर्जन्यास्त्र से युक्त किया।

श्लोक 25 (6.121.25)

अविध्यत्पृथिवीं पार्थः पार्श्वे भीष्मस्य दक्षिणे । उत्पपात ततो धारा वारिणो विमला शुभा ॥

avidhyatpṛthivīṃ pārthaḥ pārśve bhīṣmasya dakṣiṇe | utpapāta tato dhārā vāriṇo vimalā śubhā

पार्थ ने भीष्म की दाहिनी ओर पृथ्वी को बेध दिया; तब वहाँ से जल की निर्मल, शुभ धारा फूट निकली,

श्लोक 26 (6.121.26)

शीतस्यामृतकल्पस्य दिव्यगन्धरसस्य च । अतर्पयत्ततः पार्थः शीतया जलधारया ॥

śītasyāmṛtakalpasya divyagandharasasya ca | atarpayattataḥ pārthaḥ śītayā jaladhārayā

जो शीतल, अमृत के समान और दिव्य गन्ध तथा रस से युक्त थी। उस शीतल जलधारा से पार्थ ने तब तृप्त किया

श्लोक 27 (6.121.27)

भीष्मं कुरूणामृषभं दिव्यं दिव्यपराक्रमम् । कर्मणा तेन पार्थस्य शक्रस्येव विकुर्वतः ॥

bhīṣmaṃ kurūṇāmṛṣabhaṃ divyaṃ divyaparākramam | karmaṇā tena pārthasya śakrasyeva vikurvataḥ

कुरुश्रेष्ठ, दिव्य और दिव्य पराक्रम वाले भीष्म को। इन्द्र के समान अद्भुत कर्म करने वाले पार्थ के उस कर्म से

श्लोक 28 (6.121.28)

विस्मयं परमं जग्मुस्ततस्ते वसुधाधिपाः । तत्कर्म प्रेक्ष्य बीभत्सोरतिमानुषविक्रमम् ॥

vismayaṃ paramaṃ jagmustataste vasudhādhipāḥ | tatkarma prekṣya bībhatsoratimānuṣavikramam

वे सब राजा परम विस्मय में पड़ गए। बीभत्सु के उस अलौकिक पराक्रम को देखकर

श्लोक 29 (6.121.29)

संप्रावेपन्त कुरवो गावः शीतार्दिता इव । विस्मयाच्चोत्तरीयाणि व्याविध्यन्सर्वतो नृपाः ॥

saṃprāvepanta kuravo gāvaḥ śītārditā iva | vismayāccottarīyāṇi vyāvidhyansarvato nṛpāḥ

कौरव ऐसे काँपने लगे जैसे सर्दी से ठिठुरती गायें काँपती हैं; और विस्मय में राजाओं ने चारों ओर अपने उत्तरीय वस्त्र हवा में घुमाए।

श्लोक 30 (6.121.30)

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् । तृप्तः शान्तनवश्चापि राजन्बीभत्सुमब्रवीत् ॥

śaṅkhadundubhinirghoṣastumulaḥ sarvato'bhavat | tṛptaḥ śāntanavaścāpi rājanbībhatsumabravīt

चारों ओर शंखों और दुन्दुभियों का तुमुल नाद होने लगा। हे राजन्, तब तृप्त हुए शान्तनुनन्दन ने बीभत्सु से कहा,

श्लोक 31 (6.121.31)

सर्वपार्थिववीराणां सन्निधौ पूजयन्निव । नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि कौरवनन्दन ॥

sarvapārthivavīrāṇāṃ sannidhau pūjayanniva | naitaccitraṃ mahābāho tvayi kauravanandana

मानो सब वीर राजाओं के सामने उनका सम्मान करते हुए — "हे महाबाहु कौरवनन्दन, तुममें यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

भीष्म उवाच

श्लोक 32 (6.121.32)

कथितो नारदेनासि पूर्वर्षिरमितद्युते । वासुदेवसहायस्त्वं महत्कर्म करिष्यसि ॥

kathito nāradenāsi pūrvarṣiramitadyute | vāsudevasahāyastvaṃ mahatkarma kariṣyasi

हे अमित तेजस्वी, नारद ने तुम्हें पुरातन ऋषि बताया था। वासुदेव की सहायता से तुम ऐसा महान कर्म करोगे

श्लोक 33 (6.121.33)

यन्नोत्सहति देवेन्द्रः सह देवैरपि ध्रुवम् । विदुस्त्वां निधनं पार्थ सर्वक्षत्रस्य तद्विदः ॥

yannotsahati devendraḥ saha devairapi dhruvam | vidustvāṃ nidhanaṃ pārtha sarvakṣatrasya tadvidaḥ

जिसे देवराज इन्द्र देवताओं के साथ मिलकर भी निश्चय ही नहीं कर सकते। हे पार्थ, जो देवताओं का रहस्य जानते हैं, वे तुम्हें समस्त क्षत्रियों के विनाश का कारण मानते हैं।

श्लोक 34 (6.121.34)

धनुर्धराणामेकस्त्वं पृथिव्यां प्रवरो नृषु ॥

dhanurdharāṇāmekastvaṃ pṛthivyāṃ pravaro nṛṣu

पृथ्वी के धनुर्धारियों में, मनुष्यों में तुम अकेले ही सर्वश्रेष्ठ हो।

श्लोक 35 (6.121.35)

मनुष्या जगति श्रेष्ठाः पक्षिणां पतगेश्वरः । सरितां सागरः श्रेष्ठो गौर्वरिष्ठा चतुष्पदाम् ॥

manuṣyā jagati śreṣṭhāḥ pakṣiṇāṃ patageśvaraḥ | saritāṃ sāgaraḥ śreṣṭho gaurvariṣṭhā catuṣpadām

जगत् में मनुष्य श्रेष्ठ हैं, पक्षियों में पक्षिराज गरुड़, नदियों में सागर श्रेष्ठ है और चौपायों में गाय सबसे उत्तम है;

श्लोक 36 (6.121.36)

आदित्यस्तेजसां श्रेष्ठो गिरीणां हिमवान्वरः । जातीनां ब्राह्मणः श्रेष्ठः श्रेष्ठस्त्वमसि धन्विनां ॥

ādityastejasāṃ śreṣṭho girīṇāṃ himavānvaraḥ | jātīnāṃ brāhmaṇaḥ śreṣṭhaḥ śreṣṭhastvamasi dhanvināṃ

तेजस्वियों में सूर्य श्रेष्ठ है, पर्वतों में हिमालय उत्तम है, जातियों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है — और धनुर्धारियों में तुम श्रेष्ठ हो।

श्लोक 37 (6.121.37)

न वै श्रुतं धार्तराष्ट्रेण वाक्यं । मयोच्यमानं विदुरेण चैव । द्रोणेन रामेण जनार्दनेन । मुहुर्मुहुः सञ्जयेनापि चोक्तम् ॥

na vai śrutaṃ dhārtarāṣṭreṇa vākyaṃ | mayocyamānaṃ vidureṇa caiva | droṇena rāmeṇa janārdanena | muhurmuhuḥ sañjayenāpi coktam

धृतराष्ट्र के पुत्र ने न मेरी कही बात सुनी, न विदुर की, न द्रोण, परशुराम और जनार्दन की, और न संजय की, जो बार-बार यही कहते रहे।

श्लोक 38 (6.121.38)

परीतबुद्धिर्हि विसंज्ञकल्पो । दुर्योधनो न च तच्छ्रद्दधाति । स शेष्यते वै निहतश्चिराय । शास्त्रातिगो भीमबलाभिभूतः ॥

parītabuddhirhi visaṃjñakalpo | duryodhano na ca tacchraddadhāti | sa śeṣyate vai nihataścirāya | śāstrātigo bhīmabalābhibhūtaḥ

उसकी बुद्धि विपरीत हो गई है, वह संज्ञाहीन-सा है; दुर्योधन उस बात पर विश्वास नहीं करता। शास्त्र की मर्यादा लाँघने वाला वह भीम के बल से पराजित होकर मारा जाएगा और चिरकाल तक भूमि पर पड़ा रहेगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 39 (6.121.39)

एतच्छ्रुत्वा तद्वचः कौरवेन्द्रो । दुर्योधनो दीनमना बभूव । तमब्रवीच्छान्तनवोऽभिवीक्ष्य । निबोध राजन्भव वीतमन्युः ॥

etacchrutvā tadvacaḥ kauravendro | duryodhano dīnamanā babhūva | tamabravīcchāntanavo'bhivīkṣya | nibodha rājanbhava vītamanyuḥ

वह वचन सुनकर कौरवराज दुर्योधन का मन उदास हो गया। शान्तनुनन्दन ने उसकी ओर देखकर कहा — "हे राजन्, सुनो और क्रोध त्याग दो।

भीष्म उवाच

श्लोक 40 (6.121.40)

दृष्टं दुर्योधनैतत्ते यथा पार्थेन धीमता । जलस्य धारा जनिता शीतस्यामृतगन्धिनः ॥

dṛṣṭaṃ duryodhanaitatte yathā pārthena dhīmatā | jalasya dhārā janitā śītasyāmṛtagandhinaḥ

हे दुर्योधन, तुमने देखा कि बुद्धिमान पार्थ ने किस प्रकार अमृत-सी सुगन्ध वाले शीतल जल की धारा उत्पन्न कर दी।

श्लोक 41 (6.121.41)

एतस्य कर्ता लोकेऽस्मिन्नान्यः कश्चन विद्यते । आग्नेयं वारुणं सौम्यं वायव्यमथ वैष्णवम् ॥

etasya kartā loke'sminnānyaḥ kaścana vidyate | āgneyaṃ vāruṇaṃ saumyaṃ vāyavyamatha vaiṣṇavam

इस लोक में ऐसा करने वाला और कोई नहीं है। आग्नेय, वारुण, सौम्य, वायव्य और वैष्णव अस्त्र,

श्लोक 42 (6.121.42)

ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं पारमेष्ठ्यं प्रजापतेः । धातुस्त्वष्टुश्च सवितुर्वैवस्वतमथापि वा ॥

aindraṃ pāśupataṃ brāhmaṃ pārameṣṭhyaṃ prajāpateḥ | dhātustvaṣṭuśca saviturvaivasvatamathāpi vā

ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म, प्रजापति का पारमेष्ठ्य, धाता, त्वष्टा और सविता के अस्त्र, अथवा वैवस्वत (यम) का अस्त्र —

श्लोक 43 (6.121.43)

सर्वस्मिन्मानुषे लोके वेत्त्येको हि धनञ्जयः । कृष्णो वा देवकीपुत्रो नान्यो वेदेह कश्चन ॥

sarvasminmānuṣe loke vettyeko hi dhanañjayaḥ | kṛṣṇo vā devakīputro nānyo vedeha kaścana

समस्त मनुष्यलोक में इन्हें केवल धनंजय जानते हैं, या देवकीपुत्र कृष्ण; यहाँ और कोई इन्हें नहीं जानता।

श्लोक 44 (6.121.44)

अशक्यः पाण्डवस्तात युद्धे जेतुं कथंचन । अमानुषाणि कर्माणि यस्यैतानि महात्मनः ॥

aśakyaḥ pāṇḍavastāta yuddhe jetuṃ kathaṃcana | amānuṣāṇi karmāṇi yasyaitāni mahātmanaḥ

तात, युद्ध में पाण्डुपुत्र को किसी भी प्रकार नहीं जीता जा सकता — उस महात्मा के ये कर्म अलौकिक हैं।

श्लोक 45 (6.121.45)

तेन सत्ववता सङ्ख्ये शूरेणाहवशोभिना । जिष्णुना समरे राजन्संधिर्भवतु मा चिरम् ॥

tena satvavatā saṅkhye śūreṇāhavaśobhinā | jiṣṇunā samare rājansaṃdhirbhavatu mā ciram

हे राजन्, युद्ध में शोभा पाने वाले उस धैर्यवान शूरवीर जिष्णु (अर्जुन) के साथ बिना विलम्ब संधि हो जाए।

श्लोक 46 (6.121.46)

यावत्कृष्णो महाबाहुः स्वाधीनः कुरुसत्तम । तावत्पार्थेन शूरेण संधिस्ते तात युज्यताम् ॥

yāvatkṛṣṇo mahābāhuḥ svādhīnaḥ kurusattama | tāvatpārthena śūreṇa saṃdhiste tāta yujyatām

हे कुरुश्रेष्ठ, जब तक महाबाहु कृष्ण अभी स्वाधीन हैं, तब तक, तात, वीर पार्थ के साथ संधि कर लो।

श्लोक 47 (6.121.47)

यावन्न ते चमूः सर्वाः शरैः सन्नतपर्वभिः । नाशयत्यर्जुनस्तावत्संधिस्ते तात युज्यताम् ॥

yāvanna te camūḥ sarvāḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ | nāśayatyarjunastāvatsaṃdhiste tāta yujyatām

जब तक अर्जुन अपने झुकी गाँठों वाले बाणों से तुम्हारी सारी सेनाओं का नाश नहीं कर देते, तब तक, तात, संधि कर लो।

श्लोक 48 (6.121.48)

यावत्तिष्ठन्ति समरे हतशेषाः सहोदराः । नृपाश्च बहवो राजंस्तावत्संधिः प्रयुज्यताम् ॥

yāvattiṣṭhanti samare hataśeṣāḥ sahodarāḥ | nṛpāśca bahavo rājaṃstāvatsaṃdhiḥ prayujyatām

हे राजन्, जब तक मारे जाने से बचे तुम्हारे सगे भाई और बहुत-से राजा युद्ध में खड़े हैं, तब तक संधि कर ली जाए।

श्लोक 49 (6.121.49)

न निर्दहति ते यावत्क्रोधदीप्तेक्षणश्चमूम् । युधिष्ठिरो रणे तावत्संधिस्ते तात युज्यताम् ॥

na nirdahati te yāvatkrodhadīptekṣaṇaścamūm | yudhiṣṭhiro raṇe tāvatsaṃdhiste tāta yujyatām

जब तक क्रोध से दहकती आँखों वाले युधिष्ठिर युद्ध में तुम्हारी सेना को भस्म नहीं कर देते, तब तक, तात, संधि कर लो।

श्लोक 50 (6.121.50)

नकुलः सहदेवश्च भीमसेनश्च पाण्डवः । यावच्चमूं महाराज नाशयन्ति न सर्वशः ॥

nakulaḥ sahadevaśca bhīmasenaśca pāṇḍavaḥ | yāvaccamūṃ mahārāja nāśayanti na sarvaśaḥ

हे महाराज, जब तक नकुल, सहदेव और पाण्डुपुत्र भीमसेन तुम्हारी सेना का पूर्ण विनाश नहीं कर देते,

श्लोक 51 (6.121.51)

तावत्ते पाण्डवैर्वीरैः सौहार्दं मम रोचते । युद्धं मदन्तमेवास्तु तात संशाम्य पाण्डवैः ॥

tāvatte pāṇḍavairvīraiḥ sauhārdaṃ mama rocate | yuddhaṃ madantamevāstu tāta saṃśāmya pāṇḍavaiḥ

तब तक वीर पाण्डवों के साथ तुम्हारा सौहार्द हो जाए, यही मुझे अच्छा लगता है। तात, युद्ध मेरे अन्त के साथ ही समाप्त हो जाए; पाण्डवों से शान्ति कर लो।

श्लोक 52 (6.121.52)

एतत्ते रोचतां वाक्यं यदुक्तोऽसि मयाऽनघ । एतत्क्षममहं मन्ये तव चैव कुलस्य च ॥

etatte rocatāṃ vākyaṃ yadukto'si mayā'nagha | etatkṣamamahaṃ manye tava caiva kulasya ca

हे निष्पाप, मैंने तुमसे जो कहा है, वह वचन तुम्हें प्रिय लगे। मैं इसे तुम्हारे और तुम्हारे कुल के लिए उचित मानता हूँ।

श्लोक 53 (6.121.53)

त्यक्त्वा मन्युं व्युपशाम्यस्व पार्थैः । पर्याप्तमेतद्यत्कृतं फल्गुनेन । भीष्मस्यान्तादस्तु वः सौहृदं च । जीवन्तु शेषाः साधु राजन्प्रसीद ॥

tyaktvā manyuṃ vyupaśāmyasva pārthaiḥ | paryāptametadyatkṛtaṃ phalgunena | bhīṣmasyāntādastu vaḥ sauhṛdaṃ ca | jīvantu śeṣāḥ sādhu rājanprasīda

क्रोध छोड़कर पार्थों से शान्ति कर लो; फाल्गुन ने जो किया है, वह पर्याप्त है। भीष्म के अन्त के साथ तुम लोगों में मित्रता हो जाए; जो शेष बचे हैं वे जीवित रहें। हे राजन्, प्रसन्न हो जाओ।

श्लोक 54 (6.121.54)

राज्यस्यार्धं दीयतां पाण्डवाना- । मिन्द्रप्रस्थं धर्मराजोऽभियातु । मा मित्रध्रुक्पार्थिवानां जघन्यः । पापां कीर्तिं प्राप्स्यसे कौरवेन्द्र ॥

rājyasyārdhaṃ dīyatāṃ pāṇḍavānā- | mindraprasthaṃ dharmarājo'bhiyātu | mā mitradhrukpārthivānāṃ jaghanyaḥ | pāpāṃ kīrtiṃ prāpsyase kauravendra

पाण्डवों को आधा राज्य दे दिया जाए; धर्मराज इन्द्रप्रस्थ चले जाएँ। हे कौरवराज, मित्रद्रोही बनकर राजाओं में अधम मत बनो और पाप-भरी अपकीर्ति मत पाओ।

श्लोक 55 (6.121.55)

ममावसानाच्छान्तिरस्तु प्रजानां । संगच्छन्तां पाण्डवाः प्रीतिमन्तः । पिता पुत्रं मातुलं भागिनेयो । भ्राता चैव भ्रातरं प्रैतु राजन् ॥

mamāvasānācchāntirastu prajānāṃ | saṃgacchantāṃ pāṇḍavāḥ prītimantaḥ | pitā putraṃ mātulaṃ bhāgineyo | bhrātā caiva bhrātaraṃ praitu rājan

मेरे अन्त के साथ प्रजा को शान्ति मिले। पाण्डव प्रेमपूर्वक (तुमसे) मिलें; हे राजन्, पिता पुत्र से, भानजा मामा से और भाई भाई से जा मिले।

श्लोक 56 (6.121.56)

न चेदेवं प्राप्तकालं वचो मे । मोहाविष्टः प्रतिपत्स्यस्यबुद्ध्या । तप्स्यस्यन्ते एतदन्ताः स्थ सर्वे । सत्यामेतां भारतीमीरयामि ॥

na cedevaṃ prāptakālaṃ vaco me | mohāviṣṭaḥ pratipatsyasyabuddhyā | tapsyasyante etadantāḥ stha sarve | satyāmetāṃ bhāratīmīrayāmi

यदि मोह में पड़कर तुम अपनी अबुद्धि से मेरे इन समयोचित वचनों को स्वीकार नहीं करोगे, तो अन्त में पछताओगे; तुम सबका यही अन्त होगा। मैं यह सत्य वाणी कह रहा हूँ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 57 (6.121.57)

एतद्वाक्यं सौहृदादापगेयो । मध्ये राज्ञां भारतं श्रावयित्वा । तूष्णीमासीच्छल्यसंतप्तमर्मा । योज्यात्मानं वेदनां संनियम्य ॥

etadvākyaṃ sauhṛdādāpageyo | madhye rājñāṃ bhārataṃ śrāvayitvā | tūṣṇīmāsīcchalyasaṃtaptamarmā | yojyātmānaṃ vedanāṃ saṃniyamya

राजाओं के बीच भरतवंशी (दुर्योधन) को सौहार्दवश ये वचन सुनाकर, बाणों के फलों से संतप्त मर्मस्थलों वाले गंगापुत्र अपने मन को योग में लगाकर और पीड़ा को रोककर मौन हो गए।

श्लोक 58 (6.121.58)

धर्मार्थसहितं वाक्यं श्रुत्वा हितमनामयम् । नारोचयत पुत्रस्ते मुमूर्षुरिव भेषजम् ॥

dharmārthasahitaṃ vākyaṃ śrutvā hitamanāmayam | nārocayata putraste mumūrṣuriva bheṣajam

किन्तु धर्म और अर्थ से युक्त, हितकारी और निर्दोष उस वचन को सुनकर भी आपके पुत्र को वह वैसे ही अच्छा नहीं लगा जैसे मरणासन्न व्यक्ति को औषध।

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