भीष्म पर्व · अध्याय 122
शरशय्या पर भीष्म से कर्ण की भेंट
राजाओं के लौट जाने पर कर्ण शीघ्रता से पड़े हुए भीष्म के पास आकर उनके चरणों में गिर जाता है। भीष्म उसे गले लगाकर बताते हैं कि वह कुन्ती और सूर्य का पुत्र है, अपनी पहले की कठोरता का कारण समझाते हैं, उसके पराक्रम की प्रशंसा करते हैं और पाण्डवों से मेल कर लेने को कहते हैं। कर्ण अपना जन्म स्वीकार करता है, पर दुर्योधन से विश्वासघात नहीं करेगा और अर्जुन से युद्ध की अनुमति माँगता है; भीष्म अनुमति दे देते हैं। अन्त में वैशम्पायन भीष्मपर्व के श्रवण के फल का वर्णन करते हुए पर्व समाप्त करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.122.1)
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे जग्मुः स्वानालयान्पुनः । तूष्णींभूते महाराज भीष्मे शन्तनुनन्दने ॥
tataste pārthivāḥ sarve jagmuḥ svānālayānpunaḥ | tūṣṇīṃbhūte mahārāja bhīṣme śantanunandane
तब वे सब राजा फिर अपने-अपने निवासों को लौट गए, हे महाराज, और शन्तनु के पुत्र भीष्म मौन पड़े रहे।
श्लोक 2 (6.122.2)
श्रुत्वा तु निहतं भीष्मं राधेयः पुरुषर्षभः । ईषदागतसंत्रासस्त्वरयोपजगाम ह ॥
śrutvā tu nihataṃ bhīṣmaṃ rādheyaḥ puruṣarṣabhaḥ | īṣadāgatasaṃtrāsastvarayopajagāma ha
उधर पुरुषश्रेष्ठ राधेय (कर्ण) भीष्म के गिरने की बात सुनकर कुछ भय से काँपता हुआ शीघ्रता से उनके पास आया।
श्लोक 3 (6.122.3)
स ददर्श महात्मानं शरतल्पगतं तदा । जन्मशय्यागतं वीरं कार्तिकेयमिव प्रभुम् ॥
sa dadarśa mahātmānaṃ śaratalpagataṃ tadā | janmaśayyāgataṃ vīraṃ kārtikeyamiva prabhum
उसने महात्मा भीष्म को शरशय्या पर पड़े देखा, मानो वह वीर अपनी जन्म-शय्या पर लेटा हो, प्रभु कार्तिकेय के समान।
श्लोक 4 (6.122.4)
निमीलिताक्षं तं वीरं साश्रुकण्ठस्तदा वृषा । अभ्येत्य पादयोस्तस्य निपपात महाद्युतिः ॥
nimīlitākṣaṃ taṃ vīraṃ sāśrukaṇṭhastadā vṛṣā | abhyetya pādayostasya nipapāta mahādyutiḥ
आँसुओं से भरे कण्ठ वाला महातेजस्वी वृष (कर्ण) बन्द नेत्रों वाले उस वीर के पास पहुँचकर उनके चरणों में गिर पड़ा।
श्लोक 5 (6.122.5)
राधेयोऽहं कुरुश्रेष्ठ नित्यमक्षिगतस्तव । द्वेष्योऽत्यन्तमनागाः सन्निति चैनमुवाच ह ॥
rādheyo'haṃ kuruśreṣṭha nityamakṣigatastava | dveṣyo'tyantamanāgāḥ sanniti cainamuvāca ha
"हे कुरुश्रेष्ठ, मैं राधेय हूँ, जो सदा आपकी आँखों में खटकता रहा, निरपराध होकर भी अत्यन्त द्वेष का पात्र रहा" — उसने उनसे ऐसा कहा।
श्लोक 6 (6.122.6)
तच्छ्रुत्वा कुरुवृद्धो हि शरैः संवृतलोचनः । रहितं धिष्ण्यमालोक्य समुत्सार्य च रक्षिणः ॥
tacchrutvā kuruvṛddho hi śaraiḥ saṃvṛtalocanaḥ | rahitaṃ dhiṣṇyamālokya samutsārya ca rakṣiṇaḥ
यह सुनकर बाणों से बन्द आँखों वाले कुरुओं के वृद्ध भीष्म ने उस स्थान को एकान्त देखा और पहरेदारों को हटा दिया,
श्लोक 7 (6.122.7)
पितेव पुत्रं गाङ्गेयः परिरभ्यैकपाणिना । शनैरुद्वीक्ष्य सस्नेहमिदं वचनमब्रवीत् ॥
piteva putraṃ gāṅgeyaḥ parirabhyaikapāṇinā | śanairudvīkṣya sasnehamidaṃ vacanamabravīt
और पिता जैसे पुत्र को गले लगाता है, वैसे ही गंगापुत्र ने उसे एक हाथ से गले लगाया, धीरे से उसकी ओर देखा और स्नेहपूर्वक ये वचन कहे।
भीष्म उवाच
श्लोक 8 (6.122.8)
न विप्रियं ममैवेह यत्स्पर्धेथा मया सह । यदि मां नाधिगच्छेथा न ते श्रेयो ध्रुवं भवेत् ॥
na vipriyaṃ mamaiveha yatspardhethā mayā saha | yadi māṃ nādhigacchethā na te śreyo dhruvaṃ bhavet
"तुम जो मुझसे होड़ करते रहे, वह मुझे किसी प्रकार अप्रिय नहीं है। यदि तुम मेरे पास न आते, तो निश्चय ही तुम्हारा कल्याण न होता।
श्लोक 9 (6.122.9)
कौन्तेयस्त्वं न राधेयो न तवाधिरथः पिता । सूर्यजस्त्वं महाबाहो विदितो नारदान्मया ॥
kaunteyastvaṃ na rādheyo na tavādhirathaḥ pitā | sūryajastvaṃ mahābāho vidito nāradānmayā
तुम कुन्ती के पुत्र हो, राधा के नहीं; अधिरथ तुम्हारे पिता नहीं हैं। हे महाबाहो, तुम सूर्य के पुत्र हो — यह मैंने नारद से जाना है,
श्लोक 10 (6.122.10)
कृष्णद्वैपायनाच्चैव तेजसा च न संशयः । न च द्वेषोऽस्ति मे तात त्वयि सत्यं ब्रवीमि ते ॥
kṛṣṇadvaipāyanāccaiva tejasā ca na saṃśayaḥ | na ca dveṣo'sti me tāta tvayi satyaṃ bravīmi te
और कृष्ण द्वैपायन से भी, और तुम्हारे तेज से भी — इसमें संदेह नहीं। हे तात, मेरे मन में तुम्हारे प्रति द्वेष नहीं है; मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।
श्लोक 11 (6.122.11)
तेजोवधनिमित्तं तु परुषं त्वाहमब्रुवम् । अकस्मात्पाण्डवान्हि त्वं द्विषसीति मतिर्मम ॥
tejovadhanimittaṃ tu paruṣaṃ tvāhamabruvam | akasmātpāṇḍavānhi tvaṃ dviṣasīti matirmama
मैंने तुमसे कठोर बातें केवल तुम्हारे गर्व को तोड़ने के लिए कही थीं; मुझे लगता था कि तुम अकारण पाण्डवों से द्वेष करते हो।
श्लोक 12 (6.122.12)
येनासि बहुशो राज्ञा चोदितः सूतनन्दन । जातोऽसि धर्मलोपेन ततस्ते बुद्धिरीदृशी ॥
yenāsi bahuśo rājñā coditaḥ sūtanandana | jāto'si dharmalopena tataste buddhirīdṛśī
हे सूतपुत्र, उस राजा ने तुम्हें बार-बार उकसाया, और तुम धर्म के उल्लंघन से उत्पन्न हुए हो, इसीलिए तुम्हारी बुद्धि ऐसी हो गई है —
श्लोक 13 (6.122.13)
नीचाश्रयान्मत्सरेण द्वेषिणी गुणिनामपि । तेनासि बहुशो रूक्षं श्रावितः कुरुसंसदि ॥
nīcāśrayānmatsareṇa dveṣiṇī guṇināmapi | tenāsi bahuśo rūkṣaṃ śrāvitaḥ kurusaṃsadi
नीच का आश्रय लेने और ईर्ष्या के कारण गुणवानों तक के प्रति द्वेष रखने वाली। इसी से कुरुओं की सभा में तुम्हें बार-बार कठोर बातें सुननी पड़ीं।
श्लोक 14 (6.122.14)
जानामि समरे वीर्यं शत्रुभिर्दुःसहं भुवि । ब्रह्मण्यतां च शौर्यं च दाने च परमां स्थितिम् ॥
jānāmi samare vīryaṃ śatrubhirduḥsahaṃ bhuvi | brahmaṇyatāṃ ca śauryaṃ ca dāne ca paramāṃ sthitim
मैं जानता हूँ कि युद्ध में तुम्हारा पराक्रम पृथ्वी पर शत्रुओं के लिए असह्य है; ब्राह्मणों के प्रति तुम्हारी भक्ति, तुम्हारी शूरता और दान में तुम्हारी सर्वोच्च स्थिति भी मैं जानता हूँ।
श्लोक 15 (6.122.15)
न त्वया सदृशः कश्चित्पुरुषेष्वमरोपम । कुलभेदभयाच्चाहं सदा परुषमुक्तवान् ॥
na tvayā sadṛśaḥ kaścitpuruṣeṣvamaropama | kulabhedabhayāccāhaṃ sadā paruṣamuktavān
हे देवतुल्य, मनुष्यों में तुम्हारे समान कोई नहीं है; कुल में फूट पड़ने के भय से ही मैं तुमसे सदा कठोर बोलता रहा।
श्लोक 16 (6.122.16)
इष्वस्त्रे भारसंधाने लाघवेऽस्त्रबले तथा । सदृशः फल्गुनेनासि कृष्णेन च महात्मना ॥
iṣvastre bhārasaṃdhāne lāghave'strabale tathā | sadṛśaḥ phalgunenāsi kṛṣṇena ca mahātmanā
धनुर्विद्या में, शस्त्रों का भार सँभालने में, हाथ की फुर्ती में और अस्त्रों के बल में तुम फल्गुन (अर्जुन) और महात्मा कृष्ण के समान हो।
श्लोक 17 (6.122.17)
कर्ण काशिपुरं गत्वा त्वयैकेन धनुष्मता । कन्यार्थे कुरुराजस्य राजानो मृदिता युधि ॥
karṇa kāśipuraṃ gatvā tvayaikena dhanuṣmatā | kanyārthe kururājasya rājāno mṛditā yudhi
हे कर्ण, काशी नगरी में जाकर तुम अकेले धनुर्धर ने कुरुराज (दुर्योधन) की कन्या-प्राप्ति के लिए युद्ध में राजाओं को कुचल डाला था।
श्लोक 18 (6.122.18)
तथा च बलवान्राजा जरासन्धो दुरासदः । समरे समरश्लाघिन्न त्वया सदृशोऽभवत् ॥
tathā ca balavānrājā jarāsandho durāsadaḥ | samare samaraślāghinna tvayā sadṛśo'bhavat
और बलवान तथा दुर्धर्ष राजा जरासन्ध भी, हे युद्ध की प्रशंसा चाहने वाले, समर में तुम्हारे समान नहीं था।
श्लोक 19 (6.122.19)
ब्रह्मण्यः सत्त्वयोधी च तेजसा च बलेन च । देवगर्भसमः सङ्ख्ये मनुष्यैरधिको युधि ॥
brahmaṇyaḥ sattvayodhī ca tejasā ca balena ca | devagarbhasamaḥ saṅkhye manuṣyairadhiko yudhi
तुम ब्राह्मणों के भक्त हो, सच्चे साहस से लड़ने वाले हो; तेज और बल में तथा युद्ध में देवपुत्र के समान हो और संग्राम में मनुष्यों से बढ़कर हो।
श्लोक 20 (6.122.20)
व्यपनीतोऽद्य मन्युर्मे यस्त्वां प्रति पुरा कृतः । दैवं पुरुषकारेण न शक्यमतिवर्तितुम् ॥
vyapanīto'dya manyurme yastvāṃ prati purā kṛtaḥ | daivaṃ puruṣakāreṇa na śakyamativartitum
तुम्हारे प्रति मैंने जो क्रोध पहले रखा था, वह आज दूर हो गया। पुरुषार्थ से दैव को लाँघा नहीं जा सकता।
श्लोक 21 (6.122.21)
सोदर्याः पाण्डवा वीरा भ्रातरस्तेऽरिसूदन । संगच्छ तैर्महाबाहो मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥
sodaryāḥ pāṇḍavā vīrā bhrātaraste'risūdana | saṃgaccha tairmahābāho mama cedicchasi priyam
हे शत्रुसूदन, वीर पाण्डव तुम्हारे सहोदर भाई हैं। हे महाबाहो, यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो उनसे मिल जाओ।
श्लोक 22 (6.122.22)
मया भवतु निर्वृत्तं वैरमादित्यनन्दन । पृथिव्यां सर्वराजानो भवन्त्वद्य निरामयाः ॥
mayā bhavatu nirvṛttaṃ vairamādityanandana | pṛthivyāṃ sarvarājāno bhavantvadya nirāmayāḥ
हे सूर्यपुत्र, वैर मुझसे ही समाप्त हो जाए, और पृथ्वी के सब राजा आज निर्विघ्न और सुखी हों।"
कर्ण उवाच
श्लोक 23 (6.122.23)
जानाम्येव महाबाहो सर्वमेतन्न संशयः । यथा वदसि मे भीष्म कौन्तेयोऽहं न सूतजः ॥
jānāmyeva mahābāho sarvametanna saṃśayaḥ | yathā vadasi me bhīṣma kaunteyo'haṃ na sūtajaḥ
"हे महाबाहो, जैसा आप कहते हैं, वह सब मैं जानता हूँ, इसमें संदेह नहीं, हे भीष्म — मैं कुन्ती का पुत्र हूँ, सूतपुत्र नहीं।
श्लोक 24 (6.122.24)
अवकीर्णस्त्वहं कुन्त्या सूतेन च विवर्धितः । भुक्त्वा दुर्योधनैश्वर्यं न मिथ्या कर्तुमुत्सहे ॥
avakīrṇastvahaṃ kuntyā sūtena ca vivardhitaḥ | bhuktvā duryodhanaiśvaryaṃ na mithyā kartumutsahe
किन्तु कुन्ती ने मुझे त्याग दिया था और मुझे एक सूत ने पाला। दुर्योधन के ऐश्वर्य का भोग करके मैं उसे झूठा नहीं कर सकता।
श्लोक 25 (6.122.25)
वसुदेवसुतो यद्वत्पाण्डवाय दृढव्रतः । वसु चैव शरीरं च पुत्रदारं तथा यशः ॥
vasudevasuto yadvatpāṇḍavāya dṛḍhavrataḥ | vasu caiva śarīraṃ ca putradāraṃ tathā yaśaḥ
जैसे वसुदेव के पुत्र (कृष्ण) दृढ़ व्रत वाले होकर पाण्डव के लिए खड़े हैं, वैसे ही मैं दुर्योधन के लिए हूँ — धन, शरीर, पुत्र, स्त्री और यश —
श्लोक 26 (6.122.26)
सर्वं दुर्योधनस्यार्थे त्यक्तं मे भूरिदक्षिण । मा चैतद्व्याधिमरणं क्षत्रं स्यादिति कौरव ॥
sarvaṃ duryodhanasyārthe tyaktaṃ me bhūridakṣiṇa | mā caitadvyādhimaraṇaṃ kṣatraṃ syāditi kaurava
हे भूरिदक्षिण, यह सब मैंने दुर्योधन के लिए त्याग दिया है; और हे कौरव, यह क्षत्रिय-धर्म रोग से मरने वाला न हो।
श्लोक 27 (6.122.27)
कोपिताः पाण्डवा नित्यं मयाऽश्रित्य सुयोधनम् । अवश्यभावी ह्यर्थोऽयं यो न शक्यो निवर्तितुम् ॥
kopitāḥ pāṇḍavā nityaṃ mayā'śritya suyodhanam | avaśyabhāvī hyartho'yaṃ yo na śakyo nivartitum
सुयोधन का आश्रय लेकर मैंने पाण्डवों को सदा कुपित किया है। यह बात अवश्य होने वाली है, इसे टाला नहीं जा सकता।
श्लोक 28 (6.122.28)
दैवं पुरुषकारेण को विवर्तितुमुत्सहेत् । पृथिवीक्षयशंसीनि निमित्तानि पितामह ॥
daivaṃ puruṣakāreṇa ko vivartitumutsahet | pṛthivīkṣayaśaṃsīni nimittāni pitāmaha
पुरुषार्थ से दैव को पलटने का साहस कौन कर सकता है? हे पितामह, पृथ्वी के विनाश की सूचना देने वाले जो शकुन हैं,
श्लोक 29 (6.122.29)
भवद्भिरुपलब्धानि कथितानि च संसदि । पाण्डवा वासुदेवश्च विदिता मम सर्वशः ॥
bhavadbhirupalabdhāni kathitāni ca saṃsadi | pāṇḍavā vāsudevaśca viditā mama sarvaśaḥ
वे आपने देखे और सभा में कहे भी। पाण्डव और वासुदेव मुझे सब प्रकार से ज्ञात हैं —
श्लोक 30 (6.122.30)
अजेयाः पुरुषैरन्यैरिति तांश्चोत्सहामहे । विजयिष्ये रणे पाण्डूनिति मे निश्चितं मतम् ॥
ajeyāḥ puruṣairanyairiti tāṃścotsahāmahe | vijayiṣye raṇe pāṇḍūniti me niścitaṃ matam
कि वे दूसरे पुरुषों से अजेय हैं; फिर भी हम उनका सामना करने का साहस करते हैं। "मैं युद्ध में पाण्डवों को जीतूँगा" — यह मेरा दृढ़ निश्चय है।
श्लोक 31 (6.122.31)
न च शक्यमवस्रष्टुं वैरमेतत्सुदारुणम् । धनंजयेन योत्स्येऽहं स्वधर्मप्रीतमानसः ॥
na ca śakyamavasraṣṭuṃ vairametatsudāruṇam | dhanaṃjayena yotsye'haṃ svadharmaprītamānasaḥ
और यह अत्यन्त भयंकर वैर छोड़ा नहीं जा सकता। अपने धर्म में प्रसन्न मन से मैं धनंजय से युद्ध करूँगा।
श्लोक 32 (6.122.32)
अनुजानीष्व मां तात युद्धाय कृतनिश्चयम् । अनुज्ञातस्त्वया वीर युध्येयमिति मे मतिः ॥
anujānīṣva māṃ tāta yuddhāya kṛtaniścayam | anujñātastvayā vīra yudhyeyamiti me matiḥ
हे तात, मुझे आज्ञा दीजिए; मैं युद्ध का निश्चय कर चुका हूँ। हे वीर, मेरा विचार है कि मैं आपकी अनुमति पाकर ही युद्ध करूँ।
श्लोक 33 (6.122.33)
दुरुक्तं विप्रतीपं वा रभसाच्चापलात्तथा । यन्मयेह कृतं किंचित्तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥
duruktaṃ vipratīpaṃ vā rabhasāccāpalāttathā | yanmayeha kṛtaṃ kiṃcittanme tvaṃ kṣantumarhasi
आवेश या चपलता से मैंने यहाँ जो कुछ कठोर या विपरीत किया हो, उसके लिए आप मुझे क्षमा करें।"
भीष्म उवाच
श्लोक 34 (6.122.34)
न चेच्छक्यमवस्रष्टुं वैरमेतत्सुदारुणम् । अनुजानामि कर्ण त्वां युध्यस्व स्वर्गकाम्यया ॥
na cecchakyamavasraṣṭuṃ vairametatsudāruṇam | anujānāmi karṇa tvāṃ yudhyasva svargakāmyayā
"यदि यह अत्यन्त भयंकर वैर छोड़ा नहीं जा सकता, तो हे कर्ण, मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ — स्वर्ग की कामना से युद्ध करो।
श्लोक 35 (6.122.35)
निर्मन्युर्गतसंरम्भः कृतकर्मा रणे स्म ह । यथाशक्ति यथोत्साहं सतां वृत्तेषु वृत्तवान् ॥
nirmanyurgatasaṃrambhaḥ kṛtakarmā raṇe sma ha | yathāśakti yathotsāhaṃ satāṃ vṛtteṣu vṛttavān
क्रोध और आवेश से रहित होकर तुमने रण में अपना कर्तव्य निभाया है, और अपनी शक्ति तथा उत्साह के अनुसार सज्जनों के आचरण का पालन किया है।
श्लोक 36 (6.122.36)
अहं त्वामनुजानामि यदिच्छसि तदाप्नुहि । क्षत्रधर्मजिताँल्लोकानवाप्स्यसि धनंजयात् ॥
ahaṃ tvāmanujānāmi yadicchasi tadāpnuhi | kṣatradharmajitām̐llokānavāpsyasi dhanaṃjayāt
मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ; जो चाहो पाओ। धनंजय के हाथ से तुम क्षत्रिय-धर्म द्वारा जीते जाने वाले लोक प्राप्त करोगे।
श्लोक 37 (6.122.37)
युध्यस्व निरहंकारो बलवीर्यव्यपाश्रयः । धर्म्याद्धि युद्धादधिकं क्षत्रियस्य न विद्यते ॥
yudhyasva nirahaṃkāro balavīryavyapāśrayaḥ | dharmyāddhi yuddhādadhikaṃ kṣatriyasya na vidyate
अहंकार छोड़कर अपने बल और पराक्रम का आश्रय लेकर युद्ध करो; क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कुछ नहीं है।
श्लोक 38 (6.122.38)
प्रशमे हि कृतो यत्नः सुमहान्सुचिरं मया । न चैव शकितः कर्तुं यतो धर्मस्ततो जयः ॥
praśame hi kṛto yatnaḥ sumahānsuciraṃ mayā | na caiva śakitaḥ kartuṃ yato dharmastato jayaḥ
मैंने शान्ति के लिए बहुत बड़ा और बहुत समय तक प्रयत्न किया, पर उसे सफल न कर सका। जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 39 (6.122.39)
इत्युक्तवति गाङ्गेये अभिवाद्योपमन्त्र्य च । राधेयो रथमारुह्य प्रायात्तव सुतं प्रति ॥
ityuktavati gāṅgeye abhivādyopamantrya ca | rādheyo rathamāruhya prāyāttava sutaṃ prati
गंगापुत्र के ऐसा कहने पर राधेय ने उन्हें प्रणाम किया, उनसे विदा ली, रथ पर चढ़ा और आपके पुत्र (दुर्योधन) की ओर चल पड़ा।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (6.122.40)
इत्येतद्बहुवृत्तान्तं भीष्मपर्वाखिलं मया । शृण्वते ते महाराज प्रोक्तं पापहरं शुभम् ॥
ityetadbahuvṛttāntaṃ bhīṣmaparvākhilaṃ mayā | śṛṇvate te mahārāja proktaṃ pāpaharaṃ śubham
इस प्रकार, हे महाराज, अनेक वृत्तान्तों से भरा यह सम्पूर्ण भीष्मपर्व मैंने तुम्हें सुनाया, जो सुनने वाले के पापों को हरने वाला और कल्याणकारी है।
श्लोक 41 (6.122.41)
यः श्रावयेत्सदा राजन्ब्राह्मणान्वेदपारगान् । श्रद्धावन्तश्च ये चापि श्रोष्यन्ति मनुजा भुवि ॥
yaḥ śrāvayetsadā rājanbrāhmaṇānvedapāragān | śraddhāvantaśca ye cāpi śroṣyanti manujā bhuvi
हे राजन्, जो इसे वेदपारंगत ब्राह्मणों को सदा सुनाता है, और पृथ्वी पर जो श्रद्धावान लोग इसे सुनेंगे,
श्लोक 42 (6.122.42)
विधूय सर्वपापानि विहायान्ते कलेवरम् । प्रयान्ति तत्पदं विष्णोर्यत्प्राप्य न निवर्तते ॥
vidhūya sarvapāpāni vihāyānte kalevaram | prayānti tatpadaṃ viṣṇoryatprāpya na nivartate
वे सब पापों को धोकर, अन्त में शरीर त्याग कर विष्णु के उस परमपद को जाते हैं, जिसे पाकर फिर लौटना नहीं होता।
श्लोक 43 (6.122.43)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भारतं भरतर्षभ । शृणुयात्सिद्धिमन्विच्छन्निह वामुत्र मानवः ॥
tasmātsarvaprayatnena bhārataṃ bharatarṣabha | śṛṇuyātsiddhimanvicchanniha vāmutra mānavaḥ
इसलिए, हे भरतश्रेष्ठ, इस लोक और परलोक में सिद्धि चाहने वाले मनुष्य को पूरे प्रयत्न से भारत का श्रवण करना चाहिए।
श्लोक 44 (6.122.44)
भोजनं भोजयेद्विप्रान्गन्धमाल्यैरलङ्कृतान् । भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दद्यात्पानीयमुत्तमम् ॥
bhojanaṃ bhojayedviprāngandhamālyairalaṅkṛtān | bhīṣmaparvaṇi rājendra dadyātpānīyamuttamam
हे राजेन्द्र, भीष्मपर्व के अवसर पर गन्ध और मालाओं से सजे ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और उत्तम पेय जल देना चाहिए।