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भीष्म पर्व · अध्याय 14

भीष्म के लिए धृतराष्ट्र का विलाप

यह सुनकर कि दस दिनों के युद्ध के बाद भीष्म शिखण्डी के हाथों गिर गए, धृतराष्ट्र लंबा विलाप करते हैं। वे पूछते हैं कि भीष्म के पहियों, बगलों और अग्रभाग की रक्षा किसने की, जिन्हें परशुराम भी न जीत सके उन्हें पाण्डव कैसे गिरा सके, और उनके गिरने पर दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दुःशासन ने क्या कहा। अपने हृदय को लोहे का और काल को अजेय बताते हुए वे संजय से सारा युद्ध क्रम से सुनाने को कहते हैं।

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (6.14.1)

कथं कुरूणामृषभो हतो भीष्मः शिखण्डिना । कथं रथात्स न्यपतित्पिता मे वासवोपमः ॥

kathaṃ kurūṇāmṛṣabho hato bhīṣmaḥ śikhaṇḍinā | kathaṃ rathātsa nyapatitpitā me vāsavopamaḥ

कुरुओं में श्रेष्ठ भीष्म शिखण्डी के हाथों कैसे मारे गए? इन्द्र के समान मेरे पिता अपने रथ से कैसे गिर पड़े?

श्लोक 2 (6.14.2)

कथमाचक्ष्व मे योधा हीना भीष्मेण संजय । बलिना देवकल्पेन गुर्वर्थे ब्रह्मचारिणा ॥

kathamācakṣva me yodhā hīnā bhīṣmeṇa saṃjaya | balinā devakalpena gurvarthe brahmacāriṇā

संजय, मुझे बताओ कि देवतुल्य बलवान भीष्म के बिना, जिन्होंने पिता के लिए ब्रह्मचर्य धारण किया था, मेरे योद्धाओं की क्या दशा हुई।

श्लोक 3 (6.14.3)

तस्मिन्हते महाप्राज्ञे महेष्वासे महाबले । महासत्त्वे नरव्याघ्रे किमु आसीन्मनस्तव ॥

tasminhate mahāprājñe maheṣvāse mahābale | mahāsattve naravyāghre kimu āsīnmanastava

जब वे महाप्राज्ञ, महाधनुर्धर, महाबली और महान धैर्य वाले पुरुषसिंह मारे गए, तब तुम्हारे मन की क्या दशा हुई?

श्लोक 4 (6.14.4)

आर्तिं परामाविशति मनः शंससि मे हतम् । कुरूणामृषभं वीरमकम्पं पुरुषर्षभम् ॥

ārtiṃ parāmāviśati manaḥ śaṃsasi me hatam | kurūṇāmṛṣabhaṃ vīramakampaṃ puruṣarṣabham

जब तुम बताते हो कि कुरुओं में श्रेष्ठ, अविचल वीर, पुरुषोत्तम भीष्म मारे गए, तो मेरा मन घोर व्यथा में डूब जाता है।

श्लोक 5 (6.14.5)

के तं यान्तमनुप्राप्ताः के वास्यासन्पुरोगमाः । केऽतिष्ठन्के न्यवर्तन्त केऽन्ववर्तन्त सञ्जय ॥

ke taṃ yāntamanuprāptāḥ ke vāsyāsanpurogamāḥ | ke'tiṣṭhanke nyavartanta ke'nvavartanta sañjaya

जब वे युद्ध के लिए आगे बढ़े, तब कौन उनके पीछे गए और कौन उनके आगे रहे? संजय, कौन डटे रहे, कौन लौट गए और कौन उनके साथ बढ़ते रहे?

श्लोक 6 (6.14.6)

के शूरा रथशार्दूलमद्भुतं क्षत्रियर्षभम् । तथाऽनीकं गाहमानं सहसा पृष्ठतोऽन्वयुः ॥

ke śūrā rathaśārdūlamadbhutaṃ kṣatriyarṣabham | tathā'nīkaṃ gāhamānaṃ sahasā pṛṣṭhato'nvayuḥ

जब रथियों में सिंह के समान वह अद्भुत क्षत्रियश्रेष्ठ सहसा शत्रु-सेना में घुसा, तब कौन-से शूरवीर उसके पीछे-पीछे गए?

श्लोक 7 (6.14.7)

यस्तमोऽर्क इवापोहन्परसैन्यममित्रहा । सहस्ररश्मिप्रतिमः परेषां भयमादधत् ॥

yastamo'rka ivāpohanparasainyamamitrahā | sahasraraśmipratimaḥ pareṣāṃ bhayamādadhat

वे शत्रुनाशक, जो सूर्य की भाँति अन्धकार के समान शत्रु-सेना को हटा देते थे, जो सहस्र किरणों वाले सूर्य के समान शत्रुओं में भय भर देते थे,

श्लोक 8 (6.14.8)

अकरोद्दुष्करं कर्म रणे पाण्डुसुतेषु यः । ग्रसमानमनीकानि य एनं पर्यवारयन् ॥

akarodduṣkaraṃ karma raṇe pāṇḍusuteṣu yaḥ | grasamānamanīkāni ya enaṃ paryavārayan

जिन्होंने युद्ध में पाण्डुपुत्रों के विरुद्ध कठिन पराक्रम किया; जब वे उनकी सेनाओं को निगल रहे थे, तब जिन्होंने उन्हें घेर लिया,

श्लोक 9 (6.14.9)

कृतिनं तं दुराधर्षं सञ्जयास्य त्वमन्तिके । कथं शान्तनवं युद्धे पाण्डवाः प्रत्यवारयन् ॥

kṛtinaṃ taṃ durādharṣaṃ sañjayāsya tvamantike | kathaṃ śāntanavaṃ yuddhe pāṇḍavāḥ pratyavārayan

उन पाण्डवों ने उस कुशल और दुर्जय शान्तनुनन्दन को युद्ध में कैसे रोका? संजय, तुम तो उनके निकट थे।

श्लोक 10 (6.14.10)

निकृन्तन्तमनीकानि शरदंष्ट्रं मनस्विनम् । चापव्यात्ताननं घोरमसिजिह्वं दुरासदम् ॥

nikṛntantamanīkāni śaradaṃṣṭraṃ manasvinam | cāpavyāttānanaṃ ghoramasijihvaṃ durāsadam

वे सेनाओं को काटते चलते थे; बाण ही उनके दाँत थे, धनुष ही खुला हुआ मुख और खड्ग ही जीभ थी; ऐसे भयंकर, मनस्वी और दुर्धर्ष थे वे।

श्लोक 11 (6.14.11)

अनर्हं पुरुषव्याघ्रं ह्रीमन्तमपराजितम् । पातयामास कौन्तेयः कथं तमजितं युधि ॥

anarhaṃ puruṣavyāghraṃ hrīmantamaparājitam | pātayāmāsa kaunteyaḥ kathaṃ tamajitaṃ yudhi

जो ऐसे अन्त के योग्य नहीं थे, उन लज्जाशील, कभी पराजित न होने वाले, अजेय पुरुषसिंह को कुन्तीपुत्र ने युद्ध में कैसे गिरा दिया?

श्लोक 12 (6.14.12)

उग्रधन्वानमुग्रेषुं वर्तमानं रथोत्तमे । परेषामुत्तमाङ्गानि प्रचिन्वन्तमथेषुभिः ॥

ugradhanvānamugreṣuṃ vartamānaṃ rathottame | pareṣāmuttamāṅgāni pracinvantamatheṣubhiḥ

उग्र धनुष और उग्र बाणों वाले वे श्रेष्ठ रथ पर खड़े होकर अपने बाणों से शत्रुओं के सिर फूलों की तरह चुनते जाते थे;

श्लोक 13 (6.14.13)

पाण्डवानां महत्सैन्यं यं दृष्ट्वोद्यतमाहवे । कालाग्निमिव दुर्धर्षं समचेष्टत नित्यशः ॥

pāṇḍavānāṃ mahatsainyaṃ yaṃ dṛṣṭvodyatamāhave | kālāgnimiva durdharṣaṃ samaceṣṭata nityaśaḥ

उन्हें युद्ध के लिए उद्यत और प्रलय की अग्नि के समान दुर्धर्ष देखकर पाण्डवों की विशाल सेना सदा मरते हुए पशु की तरह छटपटाने लगती थी।

श्लोक 14 (6.14.14)

परिकृष्य स सेनां तु दशरात्रमनीकहा । जगामास्तमिवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥

parikṛṣya sa senāṃ tu daśarātramanīkahā | jagāmāstamivādityaḥ kṛtvā karma suduṣkaram

सेनाओं का संहार करने वाले वे भीष्म दस रातों तक शत्रु-सेना को झकझोरकर और अत्यन्त कठिन पराक्रम करके सूर्य की भाँति अस्त हो गए।

श्लोक 15 (6.14.15)

यः स शक्र इवाक्षय्यं वर्षं शरमयं क्षिपन् । जघान युधि योधानामर्बुदं दशभिर्दिनैः ॥

yaḥ sa śakra ivākṣayyaṃ varṣaṃ śaramayaṃ kṣipan | jaghāna yudhi yodhānāmarbudaṃ daśabhirdinaiḥ

जिन्होंने इन्द्र के समान बाणों की अक्षय वर्षा करते हुए दस दिनों में युद्ध में दस करोड़ योद्धाओं को मार डाला,

श्लोक 16 (6.14.16)

स शेते निहतो भूमौ वातभुग्न इव द्रुमः । मम दुर्मन्त्रितेनाजौ यथा नार्हति भारतः ॥

sa śete nihato bhūmau vātabhugna iva drumaḥ | mama durmantritenājau yathā nārhati bhārataḥ

वे आज मेरी कुमन्त्रणा के कारण युद्धभूमि में आँधी से टूटे वृक्ष की भाँति मरे पड़े हैं; भरतवंशी भीष्म ऐसी दशा के योग्य नहीं थे।

श्लोक 17 (6.14.17)

कथं शान्तनवं दृष्ट्वा पाण्डवानामनीकिनी । प्रहर्तुमशकत्तत्र भीष्मं भीमपराक्रमम् ॥

kathaṃ śāntanavaṃ dṛṣṭvā pāṇḍavānāmanīkinī | prahartumaśakattatra bhīṣmaṃ bhīmaparākramam

शान्तनुनन्दन को देखकर पाण्डवों की सेना वहाँ उस भयंकर पराक्रमी भीष्म पर प्रहार कैसे कर सकी?

श्लोक 18 (6.14.18)

कथं भीष्मेण संग्रामं प्राकुर्वन्पाण्डुनन्दनाः । कथं च नाजयद्भीष्मो द्रोणे जीवति सञ्जय ॥

kathaṃ bhīṣmeṇa saṃgrāmaṃ prākurvanpāṇḍunandanāḥ | kathaṃ ca nājayadbhīṣmo droṇe jīvati sañjaya

पाण्डुपुत्रों ने भीष्म से युद्ध कैसे किया? और संजय, द्रोण के जीवित रहते भीष्म विजय क्यों न पा सके?

श्लोक 19 (6.14.19)

कृपे सन्निहिते तत्र भरद्वाजात्मजे तथा । भीष्मः प्रहरतां श्रेष्ठः कथं स निधनं गतः ॥

kṛpe sannihite tatra bharadvājātmaje tathā | bhīṣmaḥ praharatāṃ śreṣṭhaḥ kathaṃ sa nidhanaṃ gataḥ

जब वहाँ कृपाचार्य और भरद्वाजपुत्र द्रोण भी पास ही थे, तब योद्धाओं में श्रेष्ठ भीष्म मृत्यु को कैसे प्राप्त हुए?

श्लोक 20 (6.14.20)

कथं चातिरथस्तेन पाञ्चाल्येन शिखण्डिना । भीष्मो विनिहतो युद्धे देवैरपि दुरासदः ॥

kathaṃ cātirathastena pāñcālyena śikhaṇḍinā | bhīṣmo vinihato yuddhe devairapi durāsadaḥ

देवताओं के लिए भी दुर्जय अतिरथी भीष्म पाञ्चाल शिखण्डी के हाथों युद्ध में कैसे मारे गए?

श्लोक 21 (6.14.21)

यः स्पर्धते रणे नित्यं जामदग्न्यं महाबलम् । अजितं जामदग्न्येन शक्रतुल्यपराक्रमम् ॥

yaḥ spardhate raṇe nityaṃ jāmadagnyaṃ mahābalam | ajitaṃ jāmadagnyena śakratulyaparākramam

जो रणभूमि में सदा महाबली जमदग्निपुत्र परशुराम से भी लोहा लेते रहे, जिन्हें परशुराम भी जीत न सके, जिनका पराक्रम इन्द्र के समान था,

श्लोक 22 (6.14.22)

तं हतं समरे भीष्मं महारथकुलोदितम् । सञ्जयाचक्ष्व मे वीरं येन शर्म न विद्महे ॥

taṃ hataṃ samare bhīṣmaṃ mahārathakuloditam | sañjayācakṣva me vīraṃ yena śarma na vidmahe

महारथियों के कुल में उत्पन्न वे वीर भीष्म युद्ध में मारे गए। संजय, उनके विषय में मुझे बताओ; उनके बिना हमें कोई शान्ति नहीं।

श्लोक 23 (6.14.23)

मामकाः के महेष्वासा नाजहुः सञ्जयाच्युतम् । दुर्योधनसमादिष्टाः के वीराः पर्यवारयन् ॥

māmakāḥ ke maheṣvāsā nājahuḥ sañjayācyutam | duryodhanasamādiṣṭāḥ ke vīrāḥ paryavārayan

संजय, मेरे किन महाधनुर्धरों ने उस अडिग वीर का साथ नहीं छोड़ा? दुर्योधन की आज्ञा से किन वीरों ने उन्हें घेरकर रखा?

श्लोक 24 (6.14.24)

यच्छिखण्डिमुखाः सर्वे पाण्डवा भीष्ममभ्ययुः । कच्चित्ते कुरवः सर्वे नाजहुः सञ्जयाच्युतम् ॥

yacchikhaṇḍimukhāḥ sarve pāṇḍavā bhīṣmamabhyayuḥ | kaccitte kuravaḥ sarve nājahuḥ sañjayācyutam

जब शिखण्डी को आगे करके सब पाण्डव भीष्म पर चढ़ आए, तब संजय, क्या सब कुरुओं ने उस अडिग वीर का साथ नहीं छोड़ा?

श्लोक 25 (6.14.25)

अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम । यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं भीष्मं न दीर्यते ॥

aśmasāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ sudṛḍhaṃ mama | yacchrutvā puruṣavyāghraṃ hataṃ bhīṣmaṃ na dīryate

निश्चय ही मेरा हृदय लोहे का बना और अत्यन्त कठोर है, जो पुरुषसिंह भीष्म के मारे जाने की बात सुनकर भी फटता नहीं।

श्लोक 26 (6.14.26)

यस्मिन्सत्यं च मेधा च नीतिश्च भरतर्षभे । अप्रमेयाणि दुर्धर्षे कथं स निहतो युधि ॥

yasminsatyaṃ ca medhā ca nītiśca bharatarṣabhe | aprameyāṇi durdharṣe kathaṃ sa nihato yudhi

जिस दुर्धर्ष भरतश्रेष्ठ में सत्य, मेधा और नीति अपार थीं, वे युद्ध में कैसे मारे गए?

श्लोक 27 (6.14.27)

मौर्वीघोषस्तनयित्नुः पृषत्कपृषतो महान् । धनुर्ह्रादमहाशब्दो महामेघ इवोन्नतः ॥

maurvīghoṣastanayitnuḥ pṛṣatkapṛṣato mahān | dhanurhrādamahāśabdo mahāmegha ivonnataḥ

वे एक विशाल, ऊँचे उठे मेघ के समान थे: प्रत्यंचा की टंकार उसका गर्जन थी, बाण उसकी बूँदें थे और धनुष की ध्वनि उसका महानाद थी;

श्लोक 28 (6.14.28)

योऽभ्यवर्षत कौन्तेयान्सपाञ्चालान्ससृञ्जयान् । निघ्नन्पररथान्वीरो दानवानिव वज्रभृत् ॥

yo'bhyavarṣata kaunteyānsapāñcālānsasṛñjayān | nighnanpararathānvīro dānavāniva vajrabhṛt

उन वीर ने पाञ्चालों और सृञ्जयों सहित कुन्तीपुत्रों पर बाण बरसाए, और जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवों को मारते हैं, वैसे ही शत्रु-रथियों का संहार किया।

श्लोक 29 (6.14.29)

इष्वस्त्रसागरं घोरं बाणग्रहं दुरासदम् । कार्मुकोर्मिणमक्षय्यमद्वीपं चलमप्लवम् ॥

iṣvastrasāgaraṃ ghoraṃ bāṇagrahaṃ durāsadam | kārmukormiṇamakṣayyamadvīpaṃ calamaplavam

वे बाणों और अस्त्रों के भयंकर, दुस्तर समुद्र थे: बाण उसके ग्राह थे, धनुष उसकी लहरें; वह अक्षय, द्वीपरहित, चंचल और बिना नौका का था;

श्लोक 30 (6.14.30)

गदासिमकरावासं हयावर्त्तं गजाकुलम् । पदातिमत्स्यकलिलं शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनम् ॥

gadāsimakarāvāsaṃ hayāvarttaṃ gajākulam | padātimatsyakalilaṃ śaṅkhadundubhiniḥsvanam

गदाएँ और खड्ग उसके मगर थे, घोड़े उसके भँवर; वह हाथियों से भरा था, पैदल सैनिक उसकी मछलियाँ थे, और उसमें शंखों और दुन्दुभियों का घोष गूँजता था।

श्लोक 31 (6.14.31)

हयान्गजपदातींश्च रथांश्च तरसा बहून् । निमज्जयन्तं समरे परवीरापहारिणम् ॥

hayāngajapadātīṃśca rathāṃśca tarasā bahūn | nimajjayantaṃ samare paravīrāpahāriṇam

वे युद्ध में बहुत-से घोड़ों, हाथियों, पैदलों और रथों को वेग से डुबो देते थे और शत्रु-वीरों के प्राण हर लेते थे;

श्लोक 32 (6.14.32)

विदह्यमानं कोपेन तेजसा च परंतपम् । वेलेव मकरावासं के वीराः पर्यवारयन् ॥

vidahyamānaṃ kopena tejasā ca paraṃtapam | veleva makarāvāsaṃ ke vīrāḥ paryavārayan

क्रोध और तेज से प्रज्वलित उस शत्रुतापन वीर को, जैसे तट मगरों के निवास समुद्र को घेरे रहता है, वैसे किन वीरों ने घेरे रखा?

श्लोक 33 (6.14.33)

भीष्मो यदकरोत्कर्म समरे सञ्जयारिहा । दुर्योधनहितार्थाय के तस्यास्य पुरोऽभवन् ॥

bhīṣmo yadakarotkarma samare sañjayārihā | duryodhanahitārthāya ke tasyāsya puro'bhavan

संजय, जब शत्रुनाशक भीष्म दुर्योधन के हित के लिए युद्ध में पराक्रम कर रहे थे, तब उनके आगे कौन थे?

श्लोक 34 (6.14.34)

के रक्षन्दक्षिणं चक्रं भीष्मस्यामिततेजसः । पृष्ठतः के परान्वीरानपासेधन्यतव्रताः ॥

ke rakṣandakṣiṇaṃ cakraṃ bhīṣmasyāmitatejasaḥ | pṛṣṭhataḥ ke parānvīrānapāsedhanyatavratāḥ

अमित तेजस्वी भीष्म के दाहिने पहिये की रक्षा किसने की? किन व्रतनिष्ठ वीरों ने पीछे से आने वाले शत्रु-वीरों को रोका?

श्लोक 35 (6.14.35)

के पुरस्तादवर्तन्त रक्षन्तो भीष्ममन्तिके । के रक्षन्नुत्तरं चक्रं वीरा वीरस्य युध्यतः ॥

ke purastādavartanta rakṣanto bhīṣmamantike | ke rakṣannuttaraṃ cakraṃ vīrā vīrasya yudhyataḥ

कौन आगे रहकर भीष्म के निकट उनकी रक्षा करते रहे? युद्ध करते उस वीर के बाएँ पहिये की रक्षा किन वीरों ने की?

श्लोक 36 (6.14.36)

वामे चक्रे वर्तमानाः केऽघ्नन्सञ्जय सृञ्जयान् । अग्रतोऽग्र्यमनीकेषु केऽभ्यरक्षन्दुरासदम् ॥

vāme cakre vartamānāḥ ke'ghnansañjaya sṛñjayān | agrato'gryamanīkeṣu ke'bhyarakṣandurāsadam

संजय, बाएँ पहिये के पास रहकर किन्होंने सृञ्जयों का संहार किया? सेनाओं के अग्रभाग में उस अग्रणी, दुर्धर्ष वीर की रक्षा किसने की?

श्लोक 37 (6.14.37)

पार्श्वतः केऽभ्यरक्षन्त गच्छन्तो दुर्गमां गतिम् । समूहे के परान्वीरान्प्रत्ययुध्यन्त सञ्जय ॥

pārśvataḥ ke'bhyarakṣanta gacchanto durgamāṃ gatim | samūhe ke parānvīrānpratyayudhyanta sañjaya

कठिन मार्ग पर बढ़ते हुए उनकी बगलों की रक्षा किसने की? संजय, भीड़ के बीच किन्होंने शत्रु-वीरों से लोहा लिया?

श्लोक 38 (6.14.38)

रक्ष्यमाणः कथं वीरैर्गोप्यमानाश्च तेन ते । दुर्जयानामनीकानि नाजयंस्तरसा युधि ॥

rakṣyamāṇaḥ kathaṃ vīrairgopyamānāśca tena te | durjayānāmanīkāni nājayaṃstarasā yudhi

वीर उनकी रक्षा कर रहे थे और वे उन वीरों की; तब भी वे युद्ध में उन दुर्जय शत्रुओं की सेनाओं को शीघ्र क्यों न जीत सके?

श्लोक 39 (6.14.39)

सर्वलोकेश्वरस्येव परमस्य प्रजापतेः । कथं प्रहर्तुमपि ते शेकुः सञ्जय पाण्डवाः ॥

sarvalokeśvarasyeva paramasya prajāpateḥ | kathaṃ prahartumapi te śekuḥ sañjaya pāṇḍavāḥ

संजय, जो समस्त लोकों के स्वामी परम प्रजापति के समान थे, उन पर पाण्डव प्रहार भी कैसे कर सके?

श्लोक 40 (6.14.40)

यस्मिन्द्वीपे समाश्वस्य युध्यन्ते कुरवः परैः । तं निमग्नं नरव्याघ्रं भीष्मं शंससि सञ्जय ॥

yasmindvīpe samāśvasya yudhyante kuravaḥ paraiḥ | taṃ nimagnaṃ naravyāghraṃ bhīṣmaṃ śaṃsasi sañjaya

जिस द्वीप का आश्रय लेकर कुरु शत्रुओं से लड़ते थे, संजय, तुम कहते हो कि वह पुरुषसिंह भीष्म डूब गया।

श्लोक 41 (6.14.41)

यस्य वीर्यं समाश्रित्य मम पुत्रो बृहद्बलः । न पाण्डवानगणयत्कथं स निहतः परैः ॥

yasya vīryaṃ samāśritya mama putro bṛhadbalaḥ | na pāṇḍavānagaṇayatkathaṃ sa nihataḥ paraiḥ

जिनके पराक्रम के भरोसे मेरे महाबली पुत्र ने पाण्डवों को कुछ नहीं गिना, वे शत्रुओं के हाथ कैसे मारे गए?

श्लोक 42 (6.14.42)

यः पुरा विबुधैः सर्वैः सहाये युद्धदुर्मदः । काङ्क्षितो दानवान्घ्नद्भिः पिता मम महाव्रतः ॥

yaḥ purā vibudhaiḥ sarvaiḥ sahāye yuddhadurmadaḥ | kāṅkṣito dānavānghnadbhiḥ pitā mama mahāvrataḥ

प्राचीन काल में दानवों का वध करते हुए सब देवता जिन्हें युद्ध में सहायक के रूप में चाहते थे, वे रणदुर्मद, महान व्रतधारी मेरे पिता,

श्लोक 43 (6.14.43)

यस्मिञ्जाते महावीर्ये शान्तनुर्लोकविश्रुतः । शोकं दैन्यं च दुःखं च प्राजहात्स च तत्क्षणे ॥

yasmiñjāte mahāvīrye śāntanurlokaviśrutaḥ | śokaṃ dainyaṃ ca duḥkhaṃ ca prājahātsa ca tatkṣaṇe

जिस महावीर के जन्म लेते ही लोकप्रसिद्ध शान्तनु ने उसी क्षण शोक, दीनता और दुःख त्याग दिए;

श्लोक 44 (6.14.44)

प्रोक्तं परायणं प्राज्ञं स्वधर्मनिरतं शुचिम् । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं कथं शंससि मे हतम् ॥

proktaṃ parāyaṇaṃ prājñaṃ svadharmanirataṃ śucim | vedavedāṅgatattvajñaṃ kathaṃ śaṃsasi me hatam

जो लोकविख्यात, सबके आश्रय, बुद्धिमान, स्वधर्म में निरत, पवित्र और वेद-वेदांगों के तत्त्वज्ञ थे, उन्हें तुम मारा गया कैसे बताते हो?

श्लोक 45 (6.14.45)

सर्वास्त्रविनयोपेतं शान्तं दान्तं मनस्विनम् । हतं शान्तनवं श्रुत्वा मन्ये शेषं हतं बलम् ॥

sarvāstravinayopetaṃ śāntaṃ dāntaṃ manasvinam | hataṃ śāntanavaṃ śrutvā manye śeṣaṃ hataṃ balam

जो सब अस्त्रों की शिक्षा से सम्पन्न, शान्त, संयमी और मनस्वी थे, उन शान्तनुनन्दन के मारे जाने का समाचार सुनकर मैं मानता हूँ कि हमारी बची हुई सेना भी मारी जा चुकी।

श्लोक 46 (6.14.46)

धर्मादधर्मो बलवान्संप्राप्त इति मे मतिः । यत्र वृद्धं गुरुं हत्वा राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः ॥

dharmādadharmo balavānsaṃprāpta iti me matiḥ | yatra vṛddhaṃ guruṃ hatvā rājyamicchanti pāṇḍavāḥ

मेरा मत है कि अधर्म धर्म से बलवान हो गया है, क्योंकि पाण्डव अपने वृद्ध गुरुजन को मारकर राज्य चाहते हैं।

श्लोक 47 (6.14.47)

जामदग्न्यः पुरा रामः सर्वास्त्रविदनुत्तमः । अम्बार्थमुद्यतः सङ्ख्ये भीष्मेण युधि निर्जितः ॥

jāmadagnyaḥ purā rāmaḥ sarvāstravidanuttamaḥ | ambārthamudyataḥ saṅkhye bhīṣmeṇa yudhi nirjitaḥ

प्राचीन काल में समस्त अस्त्रों के अनुपम ज्ञाता जमदग्निपुत्र परशुराम अम्बा के लिए युद्ध में उतरे और भीष्म ने उन्हें युद्ध में परास्त कर दिया।

श्लोक 48 (6.14.48)

तमिन्द्रसमकर्माणं ककुदं सर्वधन्विनाम् । हतं शंससि मे भीष्मं किं नु दुःखमतः परम् ॥

tamindrasamakarmāṇaṃ kakudaṃ sarvadhanvinām | hataṃ śaṃsasi me bhīṣmaṃ kiṃ nu duḥkhamataḥ param

इन्द्र के समान कर्म करने वाले, समस्त धनुर्धरों के शिरोमणि भीष्म को तुम मारा गया बताते हो। इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?

श्लोक 49 (6.14.49)

असकृत्क्षत्रियव्राताः सङ्ख्ये येन विनिर्जिताः । जामदग्न्येन वीरेण परवीरनिघातिना । न हतो यो महाबुद्धिः स हतोऽद्य शिखण्डिना ॥

asakṛtkṣatriyavrātāḥ saṅkhye yena vinirjitāḥ | jāmadagnyena vīreṇa paravīranighātinā | na hato yo mahābuddhiḥ sa hato'dya śikhaṇḍinā

जिन वीर, शत्रु-संहारक जमदग्निपुत्र ने क्षत्रियों के समूहों को बार-बार युद्ध में परास्त किया, उनसे भी जो महाबुद्धिमान न मारे गए, वे आज शिखण्डी के हाथों मारे गए।

श्लोक 50 (6.14.50)

तस्मान्नूनं महावीर्याद्भार्गवाद्युद्धदुर्मदात् । तेजोवीर्यबलैर्भूयाञ्शिखण्डी द्रुपदात्मजः ॥

tasmānnūnaṃ mahāvīryādbhārgavādyuddhadurmadāt | tejovīryabalairbhūyāñśikhaṇḍī drupadātmajaḥ

तब तो निश्चय ही द्रुपदपुत्र शिखण्डी तेज, पराक्रम और बल में उस महापराक्रमी, रणदुर्मद भृगुवंशी परशुराम से भी बढ़कर है,

श्लोक 51 (6.14.51)

यः शूरं कृतिनं युद्धे सर्वशस्त्रविशारदम् । परमास्त्रविदं वीरं जघान भरतर्षभम् ॥

yaḥ śūraṃ kṛtinaṃ yuddhe sarvaśastraviśāradam | paramāstravidaṃ vīraṃ jaghāna bharatarṣabham

जिसने युद्ध में उस शूरवीर, कुशल, सब शस्त्रों में निपुण और परम अस्त्रों के ज्ञाता भरतश्रेष्ठ वीर को मार डाला।

श्लोक 52 (6.14.52)

के वीरास्तममित्रघ्नमन्वयुः शस्त्रसंसदि । शंस मे तद्यथा चासीद्युद्धं भीष्मस्य पाण्डवैः ॥

ke vīrāstamamitraghnamanvayuḥ śastrasaṃsadi | śaṃsa me tadyathā cāsīdyuddhaṃ bhīṣmasya pāṇḍavaiḥ

शस्त्रों के उस संग्राम में किन वीरों ने उस शत्रुनाशक का अनुसरण किया? मुझे बताओ कि पाण्डवों के साथ भीष्म का युद्ध कैसे हुआ।

श्लोक 53 (6.14.53)

योषेव हतवीरा मे सेना पुत्रस्य सञ्जय । अगोपमिव चोद्भ्रान्तं गोकुलं तद्बलं मम ॥

yoṣeva hatavīrā me senā putrasya sañjaya | agopamiva codbhrāntaṃ gokulaṃ tadbalaṃ mama

संजय, मेरे पुत्र की सेना उस स्त्री के समान है जिसका वीर मारा गया हो; मेरी वह सेना बिना ग्वाले के घबराकर बिखरे गोसमूह जैसी है।

श्लोक 54 (6.14.54)

पौरुषं सर्वलोकस्य परं यस्मिन्महाहवे । परासक्ते च वस्तस्मिन्कथमासीन्मनस्तदा ॥

pauruṣaṃ sarvalokasya paraṃ yasminmahāhave | parāsakte ca vastasminkathamāsīnmanastadā

उस महायुद्ध में सारे जगत् का परम पौरुष जिनमें था, उनके परलोक चले जाने पर तब तुम लोगों के मन की क्या दशा हुई?

श्लोक 55 (6.14.55)

जीवितेऽप्यद्य सामर्थ्यं किमिवास्मासु सञ्जय । घातयित्वा महावीर्यं पितरं लोकधार्मिकम् ॥

jīvite'pyadya sāmarthyaṃ kimivāsmāsu sañjaya | ghātayitvā mahāvīryaṃ pitaraṃ lokadhārmikam

संजय, लोक में धर्मात्मा कहलाने वाले अपने महापराक्रमी पिता को मरवाकर अब हममें जीवित रहने की भी क्या सामर्थ्य बची है?

श्लोक 56 (6.14.56)

अगाधे सलिले मग्नां नावं दृष्ट्वेव पारगाः । भीष्मे हते भृशं दुःखान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

agādhe salile magnāṃ nāvaṃ dṛṣṭveva pāragāḥ | bhīṣme hate bhṛśaṃ duḥkhānmanye śocanti putrakāḥ

जैसे पार जाने वाले लोग अथाह जल में अपनी नाव डूबी देखकर शोक करते हैं, वैसे ही मैं समझता हूँ कि भीष्म के मारे जाने पर मेरे पुत्र अत्यन्त दुःख से शोक कर रहे हैं।

श्लोक 57 (6.14.57)

अद्रिसारमयं नूनं हृदयं मम सञ्जय । यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं भीष्मं न दीर्यते ॥

adrisāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ mama sañjaya | yacchrutvā puruṣavyāghraṃ hataṃ bhīṣmaṃ na dīryate

संजय, निश्चय ही मेरा हृदय चट्टान का बना है, जो पुरुषसिंह भीष्म के मारे जाने की बात सुनकर भी फटता नहीं।

श्लोक 58 (6.14.58)

यस्मिन्नस्त्राणि मेधा च नीतिश्च पुरुषर्षभे । अप्रमेयाणि दुर्धर्षे कथं स निहतो युधि ॥

yasminnastrāṇi medhā ca nītiśca puruṣarṣabhe | aprameyāṇi durdharṣe kathaṃ sa nihato yudhi

जिस दुर्धर्ष पुरुषश्रेष्ठ में अस्त्रविद्या, मेधा और नीति अपार थीं, वे युद्ध में कैसे मारे गए?

श्लोक 59 (6.14.59)

न चास्त्रेण न शौर्येण तपसा मेधया न च । न धृत्या न पुनस्त्यागान्मृत्योः कश्चिद्विमुच्यते ॥

na cāstreṇa na śauryeṇa tapasā medhayā na ca | na dhṛtyā na punastyāgānmṛtyoḥ kaścidvimucyate

न अस्त्र से, न शौर्य से, न तप से, न बुद्धि से, न धैर्य से और न त्याग से ही कोई मृत्यु से छूट पाता है।

श्लोक 60 (6.14.60)

कालो नूनं महावीर्यः सर्वलोकदुरत्ययः । यत्र शान्तनवं भीष्मं हतं शंससि सञ्जय ॥

kālo nūnaṃ mahāvīryaḥ sarvalokaduratyayaḥ | yatra śāntanavaṃ bhīṣmaṃ hataṃ śaṃsasi sañjaya

निश्चय ही काल महाबलवान है और सारे जगत् में कोई उसे लाँघ नहीं सकता, क्योंकि संजय, तुम शान्तनुनन्दन भीष्म को मारा गया बता रहे हो।

श्लोक 61 (6.14.61)

पुत्रशोकाभिसंतप्तो महद्दुःखमचिन्तयन् । आशंसेऽहं परं त्राणं भीष्माच्छान्तनुनन्दनात् ॥

putraśokābhisaṃtapto mahadduḥkhamacintayan | āśaṃse'haṃ paraṃ trāṇaṃ bhīṣmācchāntanunandanāt

पुत्रों के शोक से संतप्त रहते हुए मैंने इस महान दुःख की कल्पना भी नहीं की थी; मुझे शान्तनुनन्दन भीष्म से परम रक्षा की आशा थी।

श्लोक 62 (6.14.62)

यदादित्यमिवापश्यत्पतितं भुवि सञ्जय । दुर्योधनः शान्तनवं किं तदा प्रत्यपद्यत ॥

yadādityamivāpaśyatpatitaṃ bhuvi sañjaya | duryodhanaḥ śāntanavaṃ kiṃ tadā pratyapadyata

संजय, जब दुर्योधन ने शान्तनुनन्दन को सूर्य की भाँति भूमि पर गिरा देखा, तब उसने क्या किया?

श्लोक 63 (6.14.63)

नाहं स्वेषां परेषां वा बुद्ध्या सञ्जय चिन्तयन् । शेषं किंचित्प्रपश्यामि प्रत्यनीके महीक्षिताम् ॥

nāhaṃ sveṣāṃ pareṣāṃ vā buddhyā sañjaya cintayan | śeṣaṃ kiṃcitprapaśyāmi pratyanīke mahīkṣitām

संजय, बुद्धि से विचार करने पर मुझे युद्ध की पंक्तियों में अपने या पराये राजाओं में से कोई भी बचा हुआ नहीं दिखता।

श्लोक 64 (6.14.64)

दारुणः क्षत्रधर्मोऽयमृषिभिः संप्रदर्शितः । यत्र शान्तनवं हत्वा राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः ॥

dāruṇaḥ kṣatradharmo'yamṛṣibhiḥ saṃpradarśitaḥ | yatra śāntanavaṃ hatvā rājyamicchanti pāṇḍavāḥ

ऋषियों द्वारा बताया गया यह क्षत्रिय-धर्म बड़ा कठोर है, जिसके कारण पाण्डव शान्तनुनन्दन को मारकर राज्य चाहते हैं।

श्लोक 65 (6.14.65)

वयं वा राज्यमिच्छामो घातयित्वा महाव्रतम् । क्षत्रधर्मे स्थिताः पार्था नापराध्यन्ति पुत्रकाः ॥

vayaṃ vā rājyamicchāmo ghātayitvā mahāvratam | kṣatradharme sthitāḥ pārthā nāparādhyanti putrakāḥ

और हम भी उस महाव्रती को मरवाकर राज्य चाहते हैं। क्षत्रिय-धर्म में स्थित पृथापुत्र कोई अपराध नहीं करते, और न मेरे पुत्र ही।

श्लोक 66 (6.14.66)

एतदार्येण कर्तव्यं कृच्छ्रास्वापत्सु सञ्जय । पराक्रमः पराशक्तिस्तत्तु तस्मिन्प्रतिष्ठितम् ॥

etadāryeṇa kartavyaṃ kṛcchrāsvāpatsu sañjaya | parākramaḥ parāśaktistattu tasminpratiṣṭhitam

संजय, घोर संकट में श्रेष्ठ पुरुष को यही करना चाहिए कि पूरी शक्ति से पराक्रम दिखाए; और यह गुण उनमें दृढ़ता से प्रतिष्ठित था।

श्लोक 67 (6.14.67)

अनीकानि विनिघ्नन्तं ह्रीमन्तमपराजितम् । कथं शान्तनवं तातं पाण्डुपुत्रा न्यवारयन् ॥

anīkāni vinighnantaṃ hrīmantamaparājitam | kathaṃ śāntanavaṃ tātaṃ pāṇḍuputrā nyavārayan

सेनाओं का संहार करते हुए उन लज्जाशील, अपराजित पिता शान्तनुनन्दन को पाण्डुपुत्रों ने कैसे रोका?

श्लोक 68 (6.14.68)

यथायुक्तान्यनीकानि कथं युद्धं महात्मभिः । कथं वा निहतो भीष्मः पिता सञ्जय मे परैः ॥

yathāyuktānyanīkāni kathaṃ yuddhaṃ mahātmabhiḥ | kathaṃ vā nihato bhīṣmaḥ pitā sañjaya me paraiḥ

सेनाएँ किस प्रकार सजाई गईं? उन महात्माओं के साथ युद्ध कैसे हुआ? और संजय, मेरे पिता भीष्म शत्रुओं के हाथ कैसे मारे गए?

श्लोक 69 (6.14.69)

दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः । दुःशासनश्च कितवो हते भीष्मे किमब्रुवन् ॥

duryodhanaśca karṇaśca śakuniścāpi saubalaḥ | duḥśāsanaśca kitavo hate bhīṣme kimabruvan

दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि और जुआरी दुःशासन ने भीष्म के मारे जाने पर क्या कहा?

श्लोक 70 (6.14.70)

यच्छरीरैरुपास्तीर्णां नरवारणवाजिनाम् । शरशक्तिमहाखड्गतोमराक्षां महाभयाम् । प्राविशन्कितवा मन्दाः सभां युद्धदुरासदाम् ॥

yaccharīrairupāstīrṇāṃ naravāraṇavājinām | śaraśaktimahākhaḍgatomarākṣāṃ mahābhayām | prāviśankitavā mandāḥ sabhāṃ yuddhadurāsadām

मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों के शरीरों से पटी हुई, बाण, शक्ति, बड़े-बड़े खड्ग और तोमर जिसके पासे थे, ऐसी अत्यन्त भयानक और दुर्गम युद्धरूपी द्यूतसभा में वे मूर्ख जुआरी घुस गए।

श्लोक 71 (6.14.71)

प्राणद्यूते प्रतिभये केऽदीव्यन्त नरर्षभाः । के जीयन्ते जितास्तत्र कृतलक्ष्या निपातिताः । अन्ये भीष्माच्छान्तनवात्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

prāṇadyūte pratibhaye ke'dīvyanta nararṣabhāḥ | ke jīyante jitāstatra kṛtalakṣyā nipātitāḥ | anye bhīṣmācchāntanavāttanmamācakṣva sañjaya

प्राणों के उस भयावह जुए में किन नरश्रेष्ठों ने दाँव लगाए? वहाँ कौन हार रहे हैं, कौन हारे, और शान्तनुनन्दन भीष्म के अतिरिक्त और कौन निशाना बनकर गिराए गए? संजय, यह मुझे बताओ।

श्लोक 72 (6.14.72)

न हि मे शान्तिरस्तीह श्रुत्वा देवव्रतं हतम् । पितरं भीमकर्माणं भीष्ममाहवशोभिनम् ॥

na hi me śāntirastīha śrutvā devavrataṃ hatam | pitaraṃ bhīmakarmāṇaṃ bhīṣmamāhavaśobhinam

भयंकर कर्म करने वाले, युद्ध में शोभा पाने वाले मेरे पिता देवव्रत भीष्म के मारे जाने का समाचार सुनकर मुझे यहाँ तनिक भी शान्ति नहीं है।

श्लोक 73 (6.14.73)

आर्तिं मे हृदये रूढां महतीं पुत्रहानिजाम् । त्वं हि मे सर्पिषेवाग्निमुद्दीपयसि सञ्जय ॥

ārtiṃ me hṛdaye rūḍhāṃ mahatīṃ putrahānijām | tvaṃ hi me sarpiṣevāgnimuddīpayasi sañjaya

पुत्रों के विनाश से उत्पन्न जो भारी व्यथा मेरे हृदय में जमी है, संजय, उसे तुम वैसे ही भड़का रहे हो जैसे घी आग को।

श्लोक 74 (6.14.74)

महान्तं भारमुद्यम्य विश्रुतं सार्वलौकिकम् । दृष्ट्वा विनिहतं भीष्मं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

mahāntaṃ bhāramudyamya viśrutaṃ sārvalaukikam | dṛṣṭvā vinihataṃ bhīṣmaṃ manye śocanti putrakāḥ

जिन्होंने सारे संसार में प्रसिद्ध एक महान भार उठा रखा था, उन भीष्म को मारा गया देखकर मैं समझता हूँ मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 75 (6.14.75)

श्रोष्यामि तानि दुःखानि दुर्योधनकृतान्यहम् । तस्मान्मे सर्वमाचक्ष्व यद्वृत्तं तत्र सञ्जय ॥

śroṣyāmi tāni duḥkhāni duryodhanakṛtānyaham | tasmānme sarvamācakṣva yadvṛttaṃ tatra sañjaya

दुर्योधन के किए हुए उन दुःखों को मैं सुनूँगा। इसलिए संजय, वहाँ जो कुछ हुआ, सब मुझे बताओ।

श्लोक 76 (6.14.76)

यद्वृत्तं तत्र संग्रामे मन्दस्याबुद्धिसंभवम् । अपनीतं सुनीतं यत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

yadvṛttaṃ tatra saṃgrāme mandasyābuddhisaṃbhavam | apanītaṃ sunītaṃ yattanmamācakṣva sañjaya

उस युद्ध में उस मूर्ख की नासमझी से जो कुछ हुआ, चाहे वह बुरी नीति हो या अच्छी, संजय, वह मुझे बताओ।

श्लोक 77 (6.14.77)

यत्कृतं तत्र संग्रामे भीष्मेण जयमिच्छता । तेजोयुक्तं कृतास्त्रेण शंस तच्चाप्यशेषतः ॥

yatkṛtaṃ tatra saṃgrāme bhīṣmeṇa jayamicchatā | tejoyuktaṃ kṛtāstreṇa śaṃsa taccāpyaśeṣataḥ

विजय चाहने वाले अस्त्रविद् भीष्म ने उस युद्ध में जो तेजस्वी कर्म किए, वह भी पूरा-पूरा बताओ।

श्लोक 78 (6.14.78)

यथा तदभवद्युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः । क्रमेण येन यस्मिंश्च काले यच्च यथाऽभवत् ॥

yathā tadabhavadyuddhaṃ kurupāṇḍavasenayoḥ | krameṇa yena yasmiṃśca kāle yacca yathā'bhavat

कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं में वह युद्ध कैसे हुआ, किस क्रम से, किस समय, और क्या कुछ किस प्रकार घटा, यह बताओ।

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