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भीष्म पर्व · अध्याय 15

संजय का वृत्तान्त आरम्भ: दुर्योधन का भीष्म-रक्षा का आदेश

संजय उत्तर देते हैं कि धृतराष्ट्र को दोष दुर्योधन पर नहीं डालना चाहिए, क्योंकि जो अपने ही दुराचरण का फल भोगता है वह दूसरे को दोष नहीं दे सकता, और पाण्डवों ने उनकी ओर देखकर ही लंबे समय तक अन्याय सहा। जिनके वरदान से वे सारा युद्ध देख-सुन सकते हैं, उन व्यास को नमस्कार कर वे वृत्तान्त आरम्भ करते हैं। सेनाओं के व्यूह में खड़े होने पर दुर्योधन दुःशासन से कहता है कि भीष्म, जो पहले स्त्री रहे शिखण्डी से नहीं लड़ेंगे, उनकी सबसे बढ़कर रक्षा की जाए, ताकि अर्जुन से सुरक्षित शिखण्डी उन्हें मार न सके।

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सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.15.1)

त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो महाराज यथार्हसि । न तु दुर्योधने दोषमिममासङ्क्तुमर्हसि ॥

tvadyukto'yamanupraśno mahārāja yathārhasi | na tu duryodhane doṣamimamāsaṅktumarhasi

महाराज, आपका यह प्रश्न उचित और आपके योग्य है; परन्तु यह दोष आपको दुर्योधन पर नहीं डालना चाहिए।

श्लोक 2 (6.15.2)

य आत्मनो दुश्चरितादशुभं प्राप्नुयान्नरः । एनसा तेन नान्यं स उपाशङ्कितुमर्हति ॥

ya ātmano duścaritādaśubhaṃ prāpnuyānnaraḥ | enasā tena nānyaṃ sa upāśaṅkitumarhati

जो मनुष्य अपने ही दुराचरण से अशुभ फल पाता है, उसे उस पाप के लिए किसी दूसरे पर दोष नहीं डालना चाहिए।

श्लोक 3 (6.15.3)

महाराज मनुष्येषु निन्द्यं यः सर्वमाचरेत् । स वध्यः सर्वलोकस्य निन्दितानि समाचरन् ॥

mahārāja manuṣyeṣu nindyaṃ yaḥ sarvamācaret | sa vadhyaḥ sarvalokasya ninditāni samācaran

महाराज, मनुष्यों में जो व्यक्ति सब निन्दित कर्म करता है, वह निन्दित आचरण के कारण सारे संसार द्वारा वध के योग्य है।

श्लोक 4 (6.15.4)

निकारो निकृतिप्रज्ञैः पाण्डवैस्त्वत्प्रतीक्षया । अनुभूतः सहामात्यैः क्षान्तश्च सुचिरं वने ॥

nikāro nikṛtiprajñaiḥ pāṇḍavaistvatpratīkṣayā | anubhūtaḥ sahāmātyaiḥ kṣāntaśca suciraṃ vane

छल को भली-भाँति समझते हुए भी पाण्डवों ने आपकी ओर देखकर अपने मन्त्रियों सहित अपमान सहा और बहुत समय तक वन में धैर्य से उसे झेला।

श्लोक 5 (6.15.5)

हयानां च गजानां च राज्ञां चामिततेजसाम् । प्रत्यक्षं यन्मया दृष्टं दृष्टं योगबलेन च ॥

hayānāṃ ca gajānāṃ ca rājñāṃ cāmitatejasām | pratyakṣaṃ yanmayā dṛṣṭaṃ dṛṣṭaṃ yogabalena ca

घोड़ों, हाथियों और अमित तेजस्वी राजाओं का जो कुछ मैंने अपनी आँखों से देखा और जो योगबल से देखा,

श्लोक 6 (6.15.6)

शृणु तत्पृथिवीपाल मा च शोके मनः कृथाः । दिष्टमेतत्पुरा नूनमिदमेव नराधिप ॥

śṛṇu tatpṛthivīpāla mā ca śoke manaḥ kṛthāḥ | diṣṭametatpurā nūnamidameva narādhipa

हे पृथ्वीपालक, उसे सुनिए और मन को शोक में मत डुबोइए। हे नरेश, यह निश्चय ही पहले से नियत था; ऐसा ही होना था।

श्लोक 7 (6.15.7)

नमस्कृत्वा प्रवक्ष्यामि पाराशर्याय धीमते । यस्य प्रसादाद्दिव्यं तत्प्राप्तं ज्ञानमनुत्तमम् ॥

namaskṛtvā pravakṣyāmi pārāśaryāya dhīmate | yasya prasādāddivyaṃ tatprāptaṃ jñānamanuttamam

उन बुद्धिमान पराशरपुत्र व्यास को नमस्कार करके मैं कहूँगा, जिनकी कृपा से मुझे वह परम दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है,

श्लोक 8 (6.15.8)

दृष्टिश्चातीन्द्रिया राजन्दूराच्छ्रवणमेव च । परचित्तस्य विज्ञानमतीतानागतस्य च ॥

dṛṣṭiścātīndriyā rājandūrācchravaṇameva ca | paracittasya vijñānamatītānāgatasya ca

राजन्, इन्द्रियों से परे देखने की शक्ति, दूर से सुनने की शक्ति, दूसरों के मन को और भूत तथा भविष्य को जानने की शक्ति,

श्लोक 9 (6.15.9)

व्युत्थितोत्पत्तिविज्ञानमाकाशे च गतिः शुभा । अस्त्रैरसङ्गो युद्धेषु वरदानान्महात्मनः ॥

vyutthitotpattivijñānamākāśe ca gatiḥ śubhā | astrairasaṅgo yuddheṣu varadānānmahātmanaḥ

मर्यादा से भटकने वालों के भटकने का कारण जानने की शक्ति, आकाश में शुभ गति, और युद्ध में अस्त्रों से अछूता रहना; यह सब उस महात्मा के वरदान से मिला है।

श्लोक 10 (6.15.10)

शृणु मे विस्तरेणेदं विचित्रं परमाद्भुतम् । भरतानामभूद्युद्धं यथा तद्रोमहर्षणम् ॥

śṛṇu me vistareṇedaṃ vicitraṃ paramādbhutam | bharatānāmabhūdyuddhaṃ yathā tadromaharṣaṇam

मुझसे विस्तार से यह विचित्र और परम अद्भुत वृत्तान्त सुनिए कि भरतवंशियों का वह रोमांचकारी युद्ध कैसे हुआ।

श्लोक 11 (6.15.11)

तेष्वनीकेषु यत्तेषु व्यूढेषु च विधानतः । दुर्योधनो महाराज दुःशासनमथाब्रवीत् ॥

teṣvanīkeṣu yatteṣu vyūḍheṣu ca vidhānataḥ | duryodhano mahārāja duḥśāsanamathābravīt

महाराज, जब वे सेनाएँ तैयार होकर विधिपूर्वक व्यूह में खड़ी हो गईं, तब दुर्योधन ने दुःशासन से कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 12 (6.15.12)

दुःशासन रथास्तूर्णं युज्यन्तां भीष्मरक्षिणः । अनीकानि च सर्वाणि शीघ्रं त्वमनुचोदय ॥

duḥśāsana rathāstūrṇaṃ yujyantāṃ bhīṣmarakṣiṇaḥ | anīkāni ca sarvāṇi śīghraṃ tvamanucodaya

“दुःशासन, भीष्म की रक्षा करने वाले रथ तुरन्त जुतवाओ और सारी सेनाओं को शीघ्र आगे बढ़ाओ।

श्लोक 13 (6.15.13)

अयं स मामभिप्राप्तो वर्षपूगाभिचिन्तितः । पाण्डवानां ससैन्यानां कुरूणां च समागमः ॥

ayaṃ sa māmabhiprāpto varṣapūgābhicintitaḥ | pāṇḍavānāṃ sasainyānāṃ kurūṇāṃ ca samāgamaḥ

पाण्डवों की सेना और कौरवों की यह भिड़ंत, जिसका मैं वर्षों से चिन्तन करता रहा, अब मेरे सामने आ पहुँची है।

श्लोक 14 (6.15.14)

नातः कार्यतमं मन्ये रणे भीष्मस्य रक्षणात् । हन्याद्गुप्तो ह्यसौ पार्थान्सोमकांश्च ससृञ्जयान् ॥

nātaḥ kāryatamaṃ manye raṇe bhīṣmasya rakṣaṇāt | hanyādgupto hyasau pārthānsomakāṃśca sasṛñjayān

इस युद्ध में मैं भीष्म की रक्षा से बढ़कर कोई कार्य नहीं मानता। सुरक्षित रहने पर वे पृथापुत्रों, सोमकों और सृञ्जयों को मार डालेंगे।

श्लोक 15 (6.15.15)

अब्रवीच्च विशुद्धात्मा नाहं हन्यां शिखण्डिनम् । श्रूयते स्त्री ह्यसौ पूर्वं तस्माद्वर्ज्यो रणे मम ॥

abravīcca viśuddhātmā nāhaṃ hanyāṃ śikhaṇḍinam | śrūyate strī hyasau pūrvaṃ tasmādvarjyo raṇe mama

और उन शुद्धात्मा ने कहा है — ‘मैं शिखण्डी को नहीं मारूँगा। सुना जाता है कि वह पहले स्त्री था, इसलिए युद्ध में मुझे उसे छोड़ देना है।’

श्लोक 16 (6.15.16)

तस्माद्भीष्मो रक्षितव्यो विशेषेणेति मे मतिः । शिखण्डिनो वधे यत्ताः सर्वे तिष्ठन्तु मामकाः ॥

tasmādbhīṣmo rakṣitavyo viśeṣeṇeti me matiḥ | śikhaṇḍino vadhe yattāḥ sarve tiṣṭhantu māmakāḥ

इसलिए मेरा मत है कि भीष्म की विशेष रूप से रक्षा की जाए। मेरे सब योद्धा शिखण्डी के वध के लिए तत्पर रहें।

श्लोक 17 (6.15.17)

तथा प्राच्याः प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्योत्तरापथाः । सर्वथाऽस्त्रेषु कुशलास्ते रक्षन्तु पितामहम् ॥

tathā prācyāḥ pratīcyāśca dākṣiṇātyottarāpathāḥ | sarvathā'streṣu kuśalāste rakṣantu pitāmaham

पूर्व और पश्चिम के, दक्षिण और उत्तर देशों के, अस्त्रों में सब प्रकार से कुशल योद्धा पितामह की रक्षा करें।

श्लोक 18 (6.15.18)

अरक्ष्यमाणं हि वृको हन्यात्सिंहं महाबलम् । मा सिंहं जम्बुकेनेव घातयामः शिखण्डिना ॥

arakṣyamāṇaṃ hi vṛko hanyātsiṃhaṃ mahābalam | mā siṃhaṃ jambukeneva ghātayāmaḥ śikhaṇḍinā

रक्षा न हो तो भेड़िया भी महाबली सिंह को मार सकता है। हम सिंह को सियार के हाथों, अर्थात् शिखण्डी के हाथों, न मरने दें।

श्लोक 19 (6.15.19)

वामं चक्रं युधामन्युरुत्तमौजाश्च दक्षिणम् । गोप्तारौ फाल्गुनं प्राप्तौ फाल्गुनोऽपि शिखण्डिनः ॥

vāmaṃ cakraṃ yudhāmanyuruttamaujāśca dakṣiṇam | goptārau phālgunaṃ prāptau phālguno'pi śikhaṇḍinaḥ

बाएँ पहिये की रक्षा युधामन्यु और दाहिने की उत्तमौजा करते हैं; ये दोनों रक्षक अर्जुन के साथ लगे हैं, और अर्जुन स्वयं शिखण्डी के रक्षक हैं।

श्लोक 20 (6.15.20)

संरक्ष्यमाणः पार्थेन भीष्मेण च विवर्जितः । यथा न हन्याद्गाङ्गेयं दुःशासन तथा कुरु ॥

saṃrakṣyamāṇaḥ pārthena bhīṣmeṇa ca vivarjitaḥ | yathā na hanyādgāṅgeyaṃ duḥśāsana tathā kuru

अर्जुन से सुरक्षित और भीष्म द्वारा छोड़ा गया शिखण्डी गंगापुत्र को न मार सके; दुःशासन, ऐसा ही प्रबन्ध करो।”

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