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भीष्म पर्व · अध्याय 17

कौरव सेना का युद्ध के लिए प्रस्थान

संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि युद्ध के दिन भयंकर अपशकुनों के बीच राजा किस प्रकार एकत्र हुए, और भीष्म तथा द्रोण पाण्डवों की विजय चाहते हुए भी अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार कौरवों की ओर से लड़े। भीष्म क्षत्रियों को उत्साहित करते हैं कि युद्ध में मृत्यु स्वर्ग का खुला द्वार है और घर में रोग से मरना क्षत्रिय के लिए अधर्म। कर्ण को युद्ध से अलग रखकर कौरव पक्ष के राजा निकल पड़ते हैं; संजय भीष्म, द्रोण, दुर्योधन, अश्वत्थामा, कृप, जयद्रथ, कलिंगराज, भगदत्त आदि की ध्वजाओं और स्थानों का तथा द्रोण, भीष्म और उनके साथियों द्वारा रचे गए विशाल व्यूह का वर्णन करते हैं।

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.17.1)

यथा स भगवान्व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । तथैव सहिताः सर्वे समाजग्मुर्महीक्षितः ॥

yathā sa bhagavānvyāsaḥ kṛṣṇadvaipāyano'bravīt | tathaiva sahitāḥ sarve samājagmurmahīkṣitaḥ

जैसा भगवान् व्यास — कृष्णद्वैपायन — ने कहा था, ठीक वैसे ही सब राजा एक साथ आ जुटे।

श्लोक 2 (6.17.2)

मघाविषयगः सोमस्तद्दिनं प्रत्यपद्यत । दीप्यमानाश्च संपेतुर्दिवि सप्त महाग्रहाः ॥

maghāviṣayagaḥ somastaddinaṃ pratyapadyata | dīpyamānāśca saṃpeturdivi sapta mahāgrahāḥ

उस दिन चन्द्रमा मघा नक्षत्र के क्षेत्र में पहुँचा, और आकाश में सातों महाग्रह प्रज्वलित होकर एक-दूसरे के पास आ गए।

श्लोक 3 (6.17.3)

द्विधाभूत इवादित्य उदये प्रत्यदृश्यत । ज्वलन्त्या शिखया भूयो भानुमानुदितो रविः ॥

dvidhābhūta ivāditya udaye pratyadṛśyata | jvalantyā śikhayā bhūyo bhānumānudito raviḥ

उदय के समय सूर्य मानो दो टुकड़ों में बँटा हुआ दिखाई दिया; फिर वह तेजस्वी सूर्य जलती हुई ज्वाला की शिखा के साथ और ऊपर उठा।

श्लोक 4 (6.17.4)

ववाशिरे च दीप्तायां दिशि गोमायुवायसाः । लिप्समानाः शरीराणि मांसशोणितभोजनाः ॥

vavāśire ca dīptāyāṃ diśi gomāyuvāyasāḥ | lipsamānāḥ śarīrāṇi māṃsaśoṇitabhojanāḥ

दहकती-सी दिशा में मांस और रक्त खाने वाले सियार और कौए शवों की लालसा में चीखने-चिल्लाने लगे।

श्लोक 5 (6.17.5)

अहन्यहनि पार्थानां वृद्धः कुरुपितामहः । भरद्वाजात्मजश्चैव प्रातरुत्थाय संयतौ ॥

ahanyahani pārthānāṃ vṛddhaḥ kurupitāmahaḥ | bharadvājātmajaścaiva prātarutthāya saṃyatau

प्रतिदिन कुरुओं के वृद्ध पितामह (भीष्म) और भरद्वाज के पुत्र (द्रोण) प्रातःकाल उठकर संयत मन से

श्लोक 6 (6.17.6)

जयोऽस्तु पाण्डुपुत्राणामित्यूचतुररिन्दमौ । युयुधाते तवार्थाय यथा स समयः कृतः ॥

jayo'stu pāṇḍuputrāṇāmityūcaturarindamau | yuyudhāte tavārthāya yathā sa samayaḥ kṛtaḥ

वे दोनों शत्रुदमन वीर कहते — "पाण्डुपुत्रों की विजय हो!" फिर भी जैसी प्रतिज्ञा की गई थी, उसी के अनुसार वे तुम्हारे लिए युद्ध करते थे।

श्लोक 7 (6.17.7)

सर्वधर्मविशेषज्ञः पिता देवव्रतस्तव । समानीय महीपालानिदं वचनमब्रवीत् ॥

sarvadharmaviśeṣajñaḥ pitā devavratastava | samānīya mahīpālānidaṃ vacanamabravīt

सब धर्मों के सूक्ष्म भेदों को जानने वाले, तुम्हारे पिता-तुल्य देवव्रत (भीष्म) ने राजाओं को एकत्र करके यह वचन कहा —

भीष्म उवाच

श्लोक 8 (6.17.8)

इदं वः क्षत्रिया द्वारं स्वर्गायापावृतं महत् । गच्छध्वं तेन शक्रस्य ब्रह्मणः सहलोकताम् ॥

idaṃ vaḥ kṣatriyā dvāraṃ svargāyāpāvṛtaṃ mahat | gacchadhvaṃ tena śakrasya brahmaṇaḥ sahalokatām

"हे क्षत्रियो, स्वर्ग का यह विशाल द्वार तुम्हारे लिए खुला है। इसी से होकर इन्द्र और ब्रह्मा के लोकों में उनके सहवासी बनो।

श्लोक 9 (6.17.9)

एष वः शाश्वतः पन्थाः पूर्वैः पूर्वतरैः कृतः । संभावयध्वमात्मानमव्यग्रमनसो युधि ॥

eṣa vaḥ śāśvataḥ panthāḥ pūrvaiḥ pūrvataraiḥ kṛtaḥ | saṃbhāvayadhvamātmānamavyagramanaso yudhi

यह तुम्हारा सनातन मार्ग है, जिसे तुम्हारे पूर्वजों और उनसे भी पहले के पुरखों ने बनाया है। युद्ध में स्थिर मन से लड़कर अपने को गौरवान्वित करो।

श्लोक 10 (6.17.10)

नाभागोऽथ ययातिश्च मान्धाता नहुषो नृगः । संसिद्धाः परमं स्थानं गताः कर्मभिरीदृशैः ॥

nābhāgo'tha yayātiśca māndhātā nahuṣo nṛgaḥ | saṃsiddhāḥ paramaṃ sthānaṃ gatāḥ karmabhirīdṛśaiḥ

नाभाग, ययाति, मान्धाता, नहुष और नृग ऐसे ही कर्मों से सिद्धि पाकर परम स्थान को पहुँचे।

श्लोक 11 (6.17.11)

अधर्मः क्षत्रियस्यैष यद्व्याधिमरणं गृहे । यदयोनिधनं याति सोऽस्य धर्मः सनातनः ॥

adharmaḥ kṣatriyasyaiṣa yadvyādhimaraṇaṃ gṛhe | yadayonidhanaṃ yāti so'sya dharmaḥ sanātanaḥ

क्षत्रिय के लिए घर में रोग से मरना अधर्म है। शस्त्र से उसकी मृत्यु हो — यही उसका सनातन धर्म है।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 12 (6.17.12)

एवमुक्ता महीपाला भीष्मेण भरतर्षभ । निर्ययुः स्वान्यनीकानि शोभयन्तो रथोत्तमैः ॥

evamuktā mahīpālā bhīṣmeṇa bharatarṣabha | niryayuḥ svānyanīkāni śobhayanto rathottamaiḥ

हे भरतश्रेष्ठ, भीष्म के ऐसा कहने पर राजा अपने उत्तम रथों से अपनी-अपनी सेनाओं की शोभा बढ़ाते हुए उनकी ओर चल पड़े।

श्लोक 13 (6.17.13)

स तु वैकर्तनः कर्णः सामात्यः सह बन्धुभिः । न्यासितः समरे शस्त्रं भीष्मेण भरतर्षभ ॥

sa tu vaikartanaḥ karṇaḥ sāmātyaḥ saha bandhubhiḥ | nyāsitaḥ samare śastraṃ bhīṣmeṇa bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, किन्तु वैकर्तन कर्ण से, उसके मन्त्रियों और बन्धुओं सहित, भीष्म ने इस युद्ध में शस्त्र रखवा दिए थे।

श्लोक 14 (6.17.14)

अपेतकर्णाः पुत्रास्ते राजानश्चैव तावकाः । निर्ययुः सिंहनादेन नादयन्तो दिशो दश ॥

apetakarṇāḥ putrāste rājānaścaiva tāvakāḥ | niryayuḥ siṃhanādena nādayanto diśo daśa

कर्ण के बिना ही तुम्हारे पुत्र और तुम्हारे पक्ष के राजा सिंहनाद से दसों दिशाओं को गुँजाते हुए निकल पड़े।

श्लोक 15 (6.17.15)

श्वेतैश्छत्रैः पताकाभिर्ध्वजवारणवाजिभिः । तान्यनीकानि शोभन्ते गजैरथ पदातिभिः ॥

śvetaiśchatraiḥ patākābhirdhvajavāraṇavājibhiḥ | tānyanīkāni śobhante gajairatha padātibhiḥ

वे सेनाएँ श्वेत छत्रों, पताकाओं, ध्वजों, हाथियों, घोड़ों, गजराजों और पैदल सैनिकों से सुशोभित हो रही थीं।

श्लोक 16 (6.17.16)

भेरीपणवशब्दैश्च दुन्दुभीनां च निःस्वनैः । रथनेमिनिनादैश्च बभूवाकुलिता मही ॥

bherīpaṇavaśabdaiśca dundubhīnāṃ ca niḥsvanaiḥ | rathanemininādaiśca babhūvākulitā mahī

भेरी और पणव के शब्द, दुन्दुभियों के घोष और रथों के पहियों की घरघराहट से पृथ्वी व्याकुल हो उठी।

श्लोक 17 (6.17.17)

काञ्चनाङ्गदकेयूरैः कार्मुकैश्च महारथाः । भ्राजमाना व्यराजन्त साग्नयः पर्वता इव ॥

kāñcanāṅgadakeyūraiḥ kārmukaiśca mahārathāḥ | bhrājamānā vyarājanta sāgnayaḥ parvatā iva

सोने के अंगद और केयूर तथा धनुषों से चमकते हुए महारथी ऐसे शोभा पा रहे थे, जैसे अग्नि से युक्त पर्वत हों।

श्लोक 18 (6.17.18)

तालेन महता भीष्मः पञ्चतारेण केतुना । विमलादित्यसंकाशस्तस्थौ कुरुचमूपरि ॥

tālena mahatā bhīṣmaḥ pañcatāreṇa ketunā | vimalādityasaṃkāśastasthau kurucamūpari

ताड़ और पाँच तारों के चिह्न वाली विशाल ध्वजा से युक्त भीष्म निर्मल सूर्य के समान कौरव सेना के ऊपर खड़े थे।

श्लोक 19 (6.17.19)

ये त्वदीया महेष्वासा राजानो भरतर्षभ । अवर्तन्त यथादेशं राजञ्शान्तनवस्य ते ॥

ye tvadīyā maheṣvāsā rājāno bharatarṣabha | avartanta yathādeśaṃ rājañśāntanavasya te

हे भरतश्रेष्ठ, हे राजन्, तुम्हारे पक्ष के महाधनुर्धर राजा शान्तनुनन्दन (भीष्म) के आदेश के अनुसार अपने-अपने स्थान पर डट गए।

श्लोक 20 (6.17.20)

स तु गोवासनः शैब्यः सहितः सर्वराजभिः । ययौ मातङ्गराजेन राजार्हेण पताकिना । पद्मवर्णस्त्वनीकानां सर्वेषामग्रतः स्थितः ॥

sa tu govāsanaḥ śaibyaḥ sahitaḥ sarvarājabhiḥ | yayau mātaṅgarājena rājārheṇa patākinā | padmavarṇastvanīkānāṃ sarveṣāmagrataḥ sthitaḥ

गोवासन देश का राजा शैब्य सब राजाओं के साथ, राजा के योग्य पताका वाले गजराज पर चला; कमल के समान वर्ण वाला वह सब सेनाओं के आगे खड़ा था।

श्लोक 21 (6.17.21)

अश्वत्थामा ययौ यत्तः सिंहलाङ्गूलकेतुना । श्रुतायुधश्चित्रसेनः पुरुमित्रो विविंशतिः ॥

aśvatthāmā yayau yattaḥ siṃhalāṅgūlaketunā | śrutāyudhaścitrasenaḥ purumitro viviṃśatiḥ

सिंह की पूँछ के चिह्न वाली ध्वजा के साथ अश्वत्थामा सावधान होकर चला; और श्रुतायुध, चित्रसेन, पुरुमित्र, विविंशति,

श्लोक 22 (6.17.22)

शल्यो भूरिश्रवाश्चैव विकर्णश्च महारथः । एते सप्त महेष्वासा द्रोणपुत्रपुरोगमाः ॥

śalyo bhūriśravāścaiva vikarṇaśca mahārathaḥ | ete sapta maheṣvāsā droṇaputrapurogamāḥ

शल्य, भूरिश्रवा और महारथी विकर्ण — ये सात महाधनुर्धर, जिनके आगे द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) थे,

श्लोक 23 (6.17.23)

स्यन्दनैर्वरवर्माणो भीष्मस्यासन्पुरोगमाः । तेषामपि महोत्सेधाः शोभयन्तो रथोत्तमान् ॥

syandanairvaravarmāṇo bhīṣmasyāsanpurogamāḥ | teṣāmapi mahotsedhāḥ śobhayanto rathottamān

उत्तम कवच धारण किए अपने रथों पर भीष्म के आगे-आगे चल रहे थे। उनके ऊँचे ध्वज भी, उनके श्रेष्ठ रथों की शोभा बढ़ाते हुए,

श्लोक 24 (6.17.24)

भ्राजमाना व्यरोचन्त जाम्बूनदमया ध्वजाः । जाम्बूनदमयी वेदी कमण्डलुविभूषिता ॥

bhrājamānā vyarocanta jāmbūnadamayā dhvajāḥ | jāmbūnadamayī vedī kamaṇḍaluvibhūṣitā

जाम्बूनद सोने के बने हुए जगमगा रहे थे। कमण्डलु से सुशोभित सोने की वेदी

श्लोक 25 (6.17.25)

केतुराचार्यमुख्यस्य द्रोणस्य धनुषा सह । अनेकशतसाहस्रमनीकमनुकर्षतः ॥

keturācāryamukhyasya droṇasya dhanuṣā saha | anekaśatasāhasramanīkamanukarṣataḥ

धनुष के चिह्न के साथ आचार्यश्रेष्ठ द्रोण की ध्वजा थी, जो कई लाख सैनिकों की सेना को अपने साथ लिए चल रहे थे।

श्लोक 26 (6.17.26)

महान्दुर्योधनस्यासीन्नागो मणिमयो ध्वजः । तस्य पौरवकालिङ्गकाम्बोजाः ससुदक्षिणाः ॥

mahānduryodhanasyāsīnnāgo maṇimayo dhvajaḥ | tasya pauravakāliṅgakāmbojāḥ sasudakṣiṇāḥ

दुर्योधन की विशाल ध्वजा मणियों से बना हाथी थी। उसके आगे पौरव, कलिंगराज और सुदक्षिण सहित काम्बोज,

श्लोक 27 (6.17.27)

क्षेमधन्वा च शल्यश्च तस्थुः प्रमुखतो रथाः । स्यन्दनेन महार्हेण केतुना वृषभेण च । प्रकर्षन्नेव सेनाग्रं मागधस्य कृपो ययौ ॥

kṣemadhanvā ca śalyaśca tasthuḥ pramukhato rathāḥ | syandanena mahārheṇa ketunā vṛṣabheṇa ca | prakarṣanneva senāgraṃ māgadhasya kṛpo yayau

क्षेमधन्वा और शल्य — ये रथी सबसे आगे खड़े थे। बहुमूल्य रथ और वृषभ-चिह्न वाली ध्वजा के साथ कृप मगधराज की सेना के अग्रभाग को आगे बढ़ाते हुए चले।

श्लोक 28 (6.17.28)

तदङ्गपतिना गुप्तं कृपेण च मनस्विना । शारदाम्बुधरप्रख्यं प्राच्यानां सुमहद्बलम् ॥

tadaṅgapatinā guptaṃ kṛpeṇa ca manasvinā | śāradāmbudharaprakhyaṃ prācyānāṃ sumahadbalam

शरद् ऋतु के बादलों के समान दिखने वाली पूर्वी देशों की वह विशाल सेना अंगराज और मनस्वी कृप द्वारा सुरक्षित थी।

श्लोक 29 (6.17.29)

अनीकप्रमुखे तिष्ठन्वराहेण महायशाः । शुशुभे केतुमुख्येन राजतेन जयद्रथः ॥

anīkapramukhe tiṣṭhanvarāheṇa mahāyaśāḥ | śuśubhe ketumukhyena rājatena jayadrathaḥ

अपनी सेना के अग्रभाग में खड़ा महायशस्वी जयद्रथ चाँदी के वराह-चिह्न वाली अपनी श्रेष्ठ ध्वजा से शोभा पा रहा था।

श्लोक 30 (6.17.30)

शतं रथसहस्राणां तस्यासन्वशवर्तिनः । अष्टौ नागसहस्राणि सादिनामयुतानि षट् ॥

śataṃ rathasahasrāṇāṃ tasyāsanvaśavartinaḥ | aṣṭau nāgasahasrāṇi sādināmayutāni ṣaṭ

एक लाख रथ उसके अधीन थे, साथ ही आठ हज़ार हाथी और साठ हज़ार घुड़सवार।

श्लोक 31 (6.17.31)

तत्सिन्धुपतिना राज्ञा पालितं ध्वजिनीमुखम् । अनन्तरथनागाश्वमशोभत महद्बलम् ॥

tatsindhupatinā rājñā pālitaṃ dhvajinīmukham | anantarathanāgāśvamaśobhata mahadbalam

सिन्धुराज राजा (जयद्रथ) द्वारा सुरक्षित सेना का वह अग्रभाग, अनगिनत रथों, हाथियों और घोड़ों से युक्त वह विशाल बल, अत्यन्त शोभा पा रहा था।

श्लोक 32 (6.17.32)

षष्ट्या रथसहस्रैस्तु नागानामयुतेन च । पतिः सर्वकलिङ्गानां ययौ केतुमता सह ॥

ṣaṣṭyā rathasahasraistu nāgānāmayutena ca | patiḥ sarvakaliṅgānāṃ yayau ketumatā saha

साठ हज़ार रथों और दस हज़ार हाथियों के साथ समस्त कलिंगों का स्वामी केतुमान् के साथ चला।

श्लोक 33 (6.17.33)

तस्य पर्वतसंकाशा व्यरोचन्त महागजाः । यन्त्रतोमरतूणीरैः पताकाभिः सुशोभिताः ॥

tasya parvatasaṃkāśā vyarocanta mahāgajāḥ | yantratomaratūṇīraiḥ patākābhiḥ suśobhitāḥ

उसके पर्वत-जैसे विशाल हाथी यन्त्रों, तोमरों, तूणीरों और पताकाओं से सुसज्जित होकर चमक रहे थे।

श्लोक 34 (6.17.34)

शुशुभे केतुमुख्येन पावकेन कलिङ्गकः । श्वेतच्छत्रेण निष्केण चामरव्यजनेन च ॥

śuśubhe ketumukhyena pāvakena kaliṅgakaḥ | śvetacchatreṇa niṣkeṇa cāmaravyajanena ca

कलिंगराज अग्नि-चिह्न वाली अपनी श्रेष्ठ ध्वजा, श्वेत छत्र, स्वर्ण कण्ठाभरण और चँवरों से शोभा पा रहा था।

श्लोक 35 (6.17.35)

केतुमानपि मातङ्गं विचित्रपरमाङ्कुशम् । आस्थितः समरे राजन्मेघस्थ इव भानुमान् ॥

ketumānapi mātaṅgaṃ vicitraparamāṅkuśam | āsthitaḥ samare rājanmeghastha iva bhānumān

हे राजन्, केतुमान् भी विचित्र और उत्तम अंकुश वाले हाथी पर युद्ध में आरूढ़ होकर बादल पर स्थित सूर्य के समान शोभित था।

श्लोक 36 (6.17.36)

तेजसा दीप्यमानस्तु वारणोत्तममास्थितः । भगदत्तो ययौ राजा यथा वज्रधरस्तथा ॥

tejasā dīpyamānastu vāraṇottamamāsthitaḥ | bhagadatto yayau rājā yathā vajradharastathā

तेज से दीप्त राजा भगदत्त एक उत्तम हाथी पर आरूढ़ होकर वज्रधारी इन्द्र के समान चला।

श्लोक 37 (6.17.37)

गजस्कन्धगतावास्तां भगदत्तेन संमितौ । विन्दानुविन्दावावन्त्यौ केतुमन्तमनुव्रतौ ॥

gajaskandhagatāvāstāṃ bhagadattena saṃmitau | vindānuvindāvāvantyau ketumantamanuvratau

भगदत्त के समान पराक्रमी अवन्ती के दोनों राजकुमार, विन्द और अनुविन्द, हाथियों की पीठ पर सवार होकर केतुमान् के पीछे चल रहे थे।

श्लोक 38 (6.17.38)

स रथानीकवान्व्यूहो हस्त्यङ्गो नृपशीर्षवान् । वाजिपक्षः पतत्युग्रः प्रहसन्सर्वतोमुखः ॥

sa rathānīkavānvyūho hastyaṅgo nṛpaśīrṣavān | vājipakṣaḥ patatyugraḥ prahasansarvatomukhaḥ

वह व्यूह — रथसेना जिसका शरीर था, हाथी अंग, राजा सिर और घोड़े पंख — भयंकर और सब ओर मुख किए हुए, मानो हँसता हुआ झपट रहा था।

श्लोक 39 (6.17.39)

द्रोणेन विहितो राजन्राज्ञा शान्तनवेन च । तथैवाचार्यपुत्रेण बाह्लीकेन कृपेण च ॥

droṇena vihito rājanrājñā śāntanavena ca | tathaivācāryaputreṇa bāhlīkena kṛpeṇa ca

हे राजन्, उसकी रचना द्रोण ने, राजा शान्तनुनन्दन (भीष्म) ने, और इसी प्रकार आचार्यपुत्र (अश्वत्थामा), बाह्लीक और कृप ने की थी।

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