भीष्म पर्व · अध्याय 18
युद्ध के लिए सन्नद्ध कौरव सेना
संजय दोनों सेनाओं के आमने-सामने आने की तैयारी के कोलाहल का वर्णन करते हैं — शंख, नगाड़े, हाथी और रथ पृथ्वी को कँपा देते हैं, और योद्धाओं के स्वर्णिम ध्वज और कवच अग्नि के समान दमकते हैं। वे भीष्म के पृष्ठरक्षक धृतराष्ट्र-पुत्रों, अपने रथों से पितामह की रक्षा करने वाले बारह जनपदों, मगधराज की गजसेना और असंख्य रक्षकों तथा पैदल सैनिकों के नाम गिनाते हैं; दुर्योधन की ग्यारह अक्षौहिणी सेना ऐसी दिखती है मानो गंगा के बीच यमुना बह रही हो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.18.1)
ततो मुहूर्तात्तुमुलः शब्दो हृदयकम्पनः । अश्रूयत महाराज योधानां प्रयुयुत्सताम् ॥
tato muhūrtāttumulaḥ śabdo hṛdayakampanaḥ | aśrūyata mahārāja yodhānāṃ prayuyutsatām
हे महाराज, फिर क्षण भर में युद्ध के लिए उत्सुक योद्धाओं का हृदय को कँपा देने वाला तुमुल नाद सुनाई दिया।
श्लोक 2 (6.18.2)
शङ्खदुन्दुभिघोषैश्च वारणानां च बृंहितैः । नेमिघोषै रथानां च दीर्यतीव वसुन्धरा ॥
śaṅkhadundubhighoṣaiśca vāraṇānāṃ ca bṛṃhitaiḥ | nemighoṣai rathānāṃ ca dīryatīva vasundharā
शंखों और दुन्दुभियों के घोष, हाथियों की चिंघाड़ और रथों के पहियों की घरघराहट से पृथ्वी मानो फटने लगी।
श्लोक 3 (6.18.3)
हयानां हेषमाणानां योधानां चैव गर्जताम् । क्षणेनैव नभो भूमिः शब्देनापूरितं तदा ॥
hayānāṃ heṣamāṇānāṃ yodhānāṃ caiva garjatām | kṣaṇenaiva nabho bhūmiḥ śabdenāpūritaṃ tadā
हिनहिनाते घोड़ों और गरजते योद्धाओं के शब्द से क्षण भर में ही आकाश और पृथ्वी गूँज उठे।
श्लोक 4 (6.18.4)
पुत्राणां तव दुर्धर्ष पाण्डवानां तथैव च । समकम्पन्त सैन्यानि परस्परसमागमे ॥
putrāṇāṃ tava durdharṣa pāṇḍavānāṃ tathaiva ca | samakampanta sainyāni parasparasamāgame
हे दुर्धर्ष, तुम्हारे पुत्रों और पाण्डवों की सेनाएँ परस्पर आमने-सामने होते समय काँप उठीं।
श्लोक 5 (6.18.5)
तत्र नागा रथाश्चैव जाम्बूनदविभूषिताः । भ्राजमाना व्यदृश्यन्त मेघा इव सविद्युतः ॥
tatra nāgā rathāścaiva jāmbūnadavibhūṣitāḥ | bhrājamānā vyadṛśyanta meghā iva savidyutaḥ
वहाँ जाम्बूनद सोने से सजे हाथी और रथ बिजली से युक्त बादलों के समान चमकते दिखाई दिए।
श्लोक 6 (6.18.6)
ध्वजा बहुविधाकारास्तावकानां नराधिप । काञ्चनाङ्गदिनो रेजुर्ज्वलिता इव पावकाः ॥
dhvajā bahuvidhākārāstāvakānāṃ narādhipa | kāñcanāṅgadino rejurjvalitā iva pāvakāḥ
हे नरेश्वर, तुम्हारे पक्ष के अनेक आकारों वाले, सोने के अंगदों से सजे ध्वज जलती हुई अग्नियों के समान शोभा पा रहे थे।
श्लोक 7 (6.18.7)
स्वेषां चैव परेषां च समदृश्यन्त भारत । महेन्द्रकेतवः शुभ्रा महेन्द्रसदनेष्विव ॥
sveṣāṃ caiva pareṣāṃ ca samadṛśyanta bhārata | mahendraketavaḥ śubhrā mahendrasadaneṣviva
हे भारत, अपने और शत्रु — दोनों पक्षों में उज्ज्वल ध्वज ऐसे दिखाई दिए जैसे इन्द्र के भवनों में इन्द्र के ध्वज।
श्लोक 8 (6.18.8)
काञ्चनैः कवचैर्वीरा ज्वलनार्कसमप्रभैः । सन्नद्धाः समदृश्यन्त ज्वलनार्कसमप्रभाः ॥
kāñcanaiḥ kavacairvīrā jvalanārkasamaprabhaiḥ | sannaddhāḥ samadṛśyanta jvalanārkasamaprabhāḥ
अग्नि और सूर्य के समान चमकते सोने के कवच पहने, युद्ध के लिए सन्नद्ध वीर स्वयं अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 9 (6.18.9)
कुरुयोधवरा राजन्विचित्रायुधकार्मुकाः । उद्यतैरायुधैश्चित्रैस्तलबद्धाः पताकिनः ॥
kuruyodhavarā rājanvicitrāyudhakārmukāḥ | udyatairāyudhaiścitraistalabaddhāḥ patākinaḥ
हे राजन्, विचित्र आयुधों और धनुषों वाले, चमकते शस्त्र उठाए, हाथों में गोह-चर्म के दस्ताने बाँधे और पताकाएँ लिए कौरवों के श्रेष्ठ योद्धा,
श्लोक 10 (6.18.10)
ऋषभाक्षा महेष्वासाश्चमूमुखगता बभुः । पृष्ठगोपास्तु भीष्मस्य पुत्रास्तव नराधिप । दुःशासनो दुर्विषहो दुर्मुखो दुःसहस्तथा ॥
ṛṣabhākṣā maheṣvāsāścamūmukhagatā babhuḥ | pṛṣṭhagopāstu bhīṣmasya putrāstava narādhipa | duḥśāsano durviṣaho durmukho duḥsahastathā
बैल-जैसी आँखों वाले महाधनुर्धर, सेना के अग्रभाग में शोभा पा रहे थे। हे नरेश्वर, तुम्हारे पुत्र भीष्म के पृष्ठरक्षक थे — दुःशासन, दुर्विषह, दुर्मुख और दुःसह,
श्लोक 11 (6.18.11)
विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्च महारथः । सत्यव्रतः पुरुमित्रो जयो भूरिश्रवाः शलः ॥
viviṃśatiścitraseno vikarṇaśca mahārathaḥ | satyavrataḥ purumitro jayo bhūriśravāḥ śalaḥ
विविंशति, चित्रसेन, महारथी विकर्ण, सत्यव्रत, पुरुमित्र, जय, भूरिश्रवा और शल।
श्लोक 12 (6.18.12)
रथा विंशतिसाहस्रास्तथैषामनुयायिनः । अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः ॥
rathā viṃśatisāhasrāstathaiṣāmanuyāyinaḥ | abhīṣāhāḥ śūrasenāḥ śibayo'tha vasātayaḥ
बीस हज़ार रथ उनके पीछे चल रहे थे। अभीषाह, शूरसेन, शिबि और वसाति,
श्लोक 13 (6.18.13)
शाल्वा मत्स्यास्तथाम्बष्ठास्त्रैगर्ताः केकयास्तथा । सौवीराः कैतवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यवासिनः ॥
śālvā matsyāstathāmbaṣṭhāstraigartāḥ kekayāstathā | sauvīrāḥ kaitavāḥ prācyāḥ pratīcyodīcyavāsinaḥ
शाल्व, मत्स्य, अम्बष्ठ, त्रिगर्त, केकय, सौवीर, कैतव, पूर्व के लोग, तथा पश्चिम और उत्तर के निवासी —
श्लोक 14 (6.18.14)
द्वादशैते जनपदाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः । महता रथवंशेन ते ररक्षुः पितामहम् ॥
dvādaśaite janapadāḥ sarve śūrāstanutyajaḥ | mahatā rathavaṃśena te rarakṣuḥ pitāmaham
ये बारह जनपद, सब-के-सब प्राण देने को तैयार शूरवीर, रथों के विशाल समूह से पितामह की रक्षा कर रहे थे।
श्लोक 15 (6.18.15)
अनीकं दशसाहस्रं कुञ्जराणां तरस्विनाम् । मागधो यत्र नृपतिस्तद्रथानीकमन्वयात् ॥
anīkaṃ daśasāhasraṃ kuñjarāṇāṃ tarasvinām | māgadho yatra nṛpatistadrathānīkamanvayāt
दस हज़ार वेगवान् हाथियों की एक सेना, जिसमें मगधराज था, उस रथसेना के पीछे-पीछे चली।
श्लोक 16 (6.18.16)
रथानां चक्ररक्षाश्च पादरक्षाश्च दन्तिनाम् । अभवन्वाहिनीमध्ये शतानामयुतानि षट् ॥
rathānāṃ cakrarakṣāśca pādarakṣāśca dantinām | abhavanvāhinīmadhye śatānāmayutāni ṣaṭ
सेना के बीच रथों के पहियों के रक्षक और हाथियों के पैरों के रक्षक छह अयुत सौ (साठ लाख) थे।
श्लोक 17 (6.18.17)
पादाताश्चाग्रतोऽगच्छन्धनुश्चर्मासिपाणयः । अनेकशतसाहस्रा नखरप्रासयोधिनः ॥
pādātāścāgrato'gacchandhanuścarmāsipāṇayaḥ | anekaśatasāhasrā nakharaprāsayodhinaḥ
आगे-आगे पैदल सैनिक चल रहे थे — हाथों में धनुष, ढाल और तलवार लिए, कई लाख, नखर और प्रास से लड़ने वाले।
श्लोक 18 (6.18.18)
अक्षौहिण्यो दशैका च तव पुत्रस्य भारत । अदृश्यन्त महाराज गङ्गेव यमुनान्तरा ॥
akṣauhiṇyo daśaikā ca tava putrasya bhārata | adṛśyanta mahārāja gaṅgeva yamunāntarā
हे भारत, हे महाराज, तुम्हारे पुत्र की ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ ऐसी दिखाई दे रही थीं मानो गंगा के बीच यमुना बह रही हो।