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भीष्म पर्व · अध्याय 19

पाण्डवों का वज्रव्यूह

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि अपनी छोटी सेना से युधिष्ठिर ने भीष्म के व्यूह का उत्तर कैसे दिया। संजय बताते हैं कि बृहस्पति के इस नियम को स्मरण करके कि थोड़ी सेना को सघन होकर लड़ना चाहिए, युधिष्ठिर ने अर्जुन से व्यूह रचने को कहा, और अर्जुन ने भीम को अग्रणी बनाकर इन्द्र का अजेय वज्रव्यूह रचा। संजय पाण्डव वीरों के स्थानों, सबके ऊपर लहराती अर्जुन की वानर-ध्वजा और हाथ में गदा लिए सेना का नेतृत्व करते भीम का वर्णन करते हैं, और फिर सूर्योदय के भयंकर अपशकुनों का — बादलरहित आकाश से गर्जन के साथ वायु, धूल के बवंडर, सूर्य से टकराती उल्का और काँपती पृथ्वी।

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (6.19.1)

अक्षौहिणीं दशैकां च व्यूढां दृष्ट्वा युधिष्ठिरः । कथमल्पेन सैन्येन प्रत्यव्यूहत पाण्डवः ॥

akṣauhiṇīṃ daśaikāṃ ca vyūḍhāṃ dṛṣṭvā yudhiṣṭhiraḥ | kathamalpena sainyena pratyavyūhata pāṇḍavaḥ

ग्यारह अक्षौहिणी सेना को व्यूह में खड़ा देखकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने अपनी थोड़ी-सी सेना से उसके विरुद्ध व्यूह कैसे रचा?

श्लोक 2 (6.19.2)

यो वेद मानुषं व्यूहं दैवं गान्धर्वमासुरम् । कथं भीष्मं स कौन्तेयः प्रत्यव्यूहत सञ्जय ॥

yo veda mānuṣaṃ vyūhaṃ daivaṃ gāndharvamāsuram | kathaṃ bhīṣmaṃ sa kaunteyaḥ pratyavyūhata sañjaya

भीष्म मानव, देव, गन्धर्व और असुर — सभी व्यूहों को जानते हैं। हे संजय, कुन्तीपुत्र ने उनके विरुद्ध अपनी सेना का व्यूह कैसे रचा?

सञ्जय उवाच

श्लोक 3 (6.19.3)

धार्तराष्ट्राण्यनीकानि दृष्ट्वा व्यूढानि पाण्डवः । अभ्यभाषत धर्मात्मा धर्मराजो धनञ्जयम् ॥

dhārtarāṣṭrāṇyanīkāni dṛṣṭvā vyūḍhāni pāṇḍavaḥ | abhyabhāṣata dharmātmā dharmarājo dhanañjayam

धृतराष्ट्र के पुत्रों की सेनाओं को व्यूह में खड़ा देखकर धर्मात्मा पाण्डुपुत्र धर्मराज ने धनंजय से कहा —

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 4 (6.19.4)

महर्षेर्वचनात्तात वेदयन्ति बृहस्पतेः । संहतान्योधयेदल्पान्कामं विस्तारयेद्बहून् ॥

maharṣervacanāttāta vedayanti bṛhaspateḥ | saṃhatānyodhayedalpānkāmaṃ vistārayedbahūn

"तात, महर्षि बृहस्पति के वचन के आधार पर लोग बताते हैं कि थोड़े सैनिकों को सघन रूप से एकत्र करके लड़ाना चाहिए और बहुतों को इच्छानुसार फैलाया जा सकता है।

श्लोक 5 (6.19.5)

सूचीमुखमनीकं स्यादल्पानां बहुभिः सह । अस्माकं च तथा सैन्यमल्पीयः सुतरां परैः ॥

sūcīmukhamanīkaṃ syādalpānāṃ bahubhiḥ saha | asmākaṃ ca tathā sainyamalpīyaḥ sutarāṃ paraiḥ

जब थोड़े बहुतों से लड़ें, तब सेना का व्यूह सूची-मुख (सुई की नोक जैसा) होना चाहिए। और हमारी सेना तो शत्रुओं की अपेक्षा बहुत ही छोटी है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 6 (6.19.6)

एतद्वचनमाज्ञाय महर्षेर्व्यूह पाण्डव । एतच्छ्रुत्वा धर्मराजं प्रत्यभाषत पाण्डवः ॥

etadvacanamājñāya maharṣervyūha pāṇḍava | etacchrutvā dharmarājaṃ pratyabhāṣata pāṇḍavaḥ

"हे पाण्डुनन्दन, महर्षि के इस वचन को ध्यान में रखकर व्यूह रचो।" यह सुनकर पाण्डुपुत्र (अर्जुन) ने धर्मराज को उत्तर दिया —

अर्जुन उवाच

श्लोक 7 (6.19.7)

एष व्यूहामि ते व्यूहं राजसत्तम दुर्जयम् । अचलं नाम वज्राख्यं विहितं वज्रपाणिना ॥

eṣa vyūhāmi te vyūhaṃ rājasattama durjayam | acalaṃ nāma vajrākhyaṃ vihitaṃ vajrapāṇinā

"हे राजश्रेष्ठ, मैं तुम्हारे लिए एक दुर्जय व्यूह रचूँगा — 'अचल' नामक वज्रव्यूह, जिसे वज्रधारी इन्द्र ने बनाया था।

श्लोक 8 (6.19.8)

यः स वात इवोद्भूतः समरे दुःसहः परैः । स नः पुरो योत्स्यते वै भीमः प्रहरतां वरः ॥

yaḥ sa vāta ivodbhūtaḥ samare duḥsahaḥ paraiḥ | sa naḥ puro yotsyate vai bhīmaḥ praharatāṃ varaḥ

जो उठे हुए तूफ़ान के समान है, युद्ध में शत्रुओं के लिए असह्य है — योद्धाओं में श्रेष्ठ वह भीम हमारे आगे रहकर लड़ेगा।

श्लोक 9 (6.19.9)

तेजांसि रिपुसैन्यानां मृद्गन्पुरुषसत्तमः । अग्रेऽग्रणीर्योत्स्यति नो युद्धोपायविचक्षणः ॥

tejāṃsi ripusainyānāṃ mṛdganpuruṣasattamaḥ | agre'graṇīryotsyati no yuddhopāyavicakṣaṇaḥ

शत्रु-सेनाओं के तेज को रौंदता हुआ, युद्ध के उपायों में निपुण वह पुरुषश्रेष्ठ हमारा अगुआ बनकर सबसे आगे लड़ेगा।

श्लोक 10 (6.19.10)

यं दृष्ट्वा कुरवः सर्वे दुर्योधनपुरोगमाः । निवर्तिष्यन्ति संत्रस्ताः सिंहं क्षुद्रमृगा यथा ॥

yaṃ dṛṣṭvā kuravaḥ sarve duryodhanapurogamāḥ | nivartiṣyanti saṃtrastāḥ siṃhaṃ kṣudramṛgā yathā

उसे देखकर दुर्योधन आदि सब कौरव डर कर ऐसे लौट जाएँगे जैसे सिंह को देखकर छोटे पशु।

श्लोक 11 (6.19.11)

तं सर्वे संश्रयिष्यामः प्राकारमकुतोभयाः । भीमं प्रहरतां श्रेष्ठं देवराजमिवामराः ॥

taṃ sarve saṃśrayiṣyāmaḥ prākāramakutobhayāḥ | bhīmaṃ praharatāṃ śreṣṭhaṃ devarājamivāmarāḥ

जैसे देवता देवराज इन्द्र का आश्रय लेते हैं, वैसे ही हम सब योद्धाओं में श्रेष्ठ भीम को परकोटा मानकर उसका आश्रय लेंगे और किसी ओर से भयभीत नहीं होंगे।

श्लोक 12 (6.19.12)

न हि सोऽस्ति पुमाँल्लोके यः संक्रुद्धं वृकोदरम् । द्रष्टुमत्युग्रकर्माणं विषहेत नरर्षभम् ॥

na hi so'sti pumām̐lloke yaḥ saṃkruddhaṃ vṛkodaram | draṣṭumatyugrakarmāṇaṃ viṣaheta nararṣabham

संसार में ऐसा कोई पुरुष नहीं जो क्रोध में भरे, अत्यन्त उग्र कर्म करने वाले नरश्रेष्ठ वृकोदर को देख भी सके।

श्लोक 13 (6.19.13)

भीमसेनो गदां बिभ्रद्वज्रसारमयीं दृढाम् । चरन्वेगेन महता समुद्रमपि शोषयेत् ॥

bhīmaseno gadāṃ bibhradvajrasāramayīṃ dṛḍhām | caranvegena mahatā samudramapi śoṣayet

वज्र के सार से बनी अपनी दृढ़ गदा लिए, बड़े वेग से विचरता भीमसेन समुद्र को भी सुखा सकता है।

श्लोक 14 (6.19.14)

भीमसेनं तदा राजन्दर्शयस्व महाबलम् । केकया धृष्टकेतुश्च चेकितानश्च वीर्यवान् ॥

bhīmasenaṃ tadā rājandarśayasva mahābalam | kekayā dhṛṣṭaketuśca cekitānaśca vīryavān

हे राजन्, तब शत्रुओं को महाबली भीमसेन का दर्शन कराओ। केकय, धृष्टकेतु और पराक्रमी चेकितान —

श्लोक 15 (6.19.15)

एते गच्छन्तु सामात्याः प्रकर्षन्तो जनाधिप । धृतराष्ट्रस्य दायादानिति बीभत्सुरब्रवीत् ॥

ete gacchantu sāmātyāḥ prakarṣanto janādhipa | dhṛtarāṣṭrasya dāyādāniti bībhatsurabravīt

हे जनाधिप, ये अपने मन्त्रियों सहित धृतराष्ट्र के उत्तराधिकारियों को खदेड़ते हुए आगे बढ़ें।" — ऐसा बीभत्सु (अर्जुन) ने कहा।

सञ्जय उवाच

श्लोक 16 (6.19.16)

ब्रुवाणं तु तथा पार्थं सर्वसैन्यानि भारत । अपूजयंस्तदा वाग्भिरनुकूलाभिराहवे ॥

bruvāṇaṃ tu tathā pārthaṃ sarvasainyāni bhārata | apūjayaṃstadā vāgbhiranukūlābhirāhave

हे भारत, पार्थ के ऐसा कहने पर रणभूमि में सब सेनाओं ने अनुकूल वचनों से उनका सम्मान किया।

श्लोक 17 (6.19.17)

एवमुक्त्वा महाबाहुस्तथा चक्रे धनञ्जयः । व्यूह्य तानि बलान्याशु प्रययौ फल्गुनस्तथा ॥

evamuktvā mahābāhustathā cakre dhanañjayaḥ | vyūhya tāni balānyāśu prayayau phalgunastathā

ऐसा कहकर महाबाहु धनंजय ने वैसा ही किया; उन सेनाओं का शीघ्र व्यूह रचकर फाल्गुन (अर्जुन) आगे बढ़े।

श्लोक 18 (6.19.18)

संप्रयातान्कुरून्दृष्ट्वा पाण्डवानां महाचमूः । गङ्गेव पूर्णा स्तिमिता स्पन्दमाना व्यदृश्यत ॥

saṃprayātānkurūndṛṣṭvā pāṇḍavānāṃ mahācamūḥ | gaṅgeva pūrṇā stimitā spandamānā vyadṛśyata

कौरवों को आगे बढ़ते देखकर पाण्डवों की विशाल सेना जल से भरी, शान्त और धीरे-धीरे हिलती हुई गंगा के समान दिखाई दी।

श्लोक 19 (6.19.19)

भीमसेनोऽग्रणीस्तेषां धृष्टद्युम्नश्च वीर्यवान् । नकुलः सहदेवश्च धृष्टकेतुश्च पार्थिवः ॥

bhīmaseno'graṇīsteṣāṃ dhṛṣṭadyumnaśca vīryavān | nakulaḥ sahadevaśca dhṛṣṭaketuśca pārthivaḥ

उनके आगे भीमसेन थे, और साथ में पराक्रमी धृष्टद्युम्न, नकुल, सहदेव तथा राजा धृष्टकेतु।

श्लोक 20 (6.19.20)

विराटश्च ततः पश्चाद्राजाथाक्षौहिणीवृतः । भ्रातृभिः सह पुत्रैश्च सोऽभ्यरक्षत पृष्ठतः ॥

virāṭaśca tataḥ paścādrājāthākṣauhiṇīvṛtaḥ | bhrātṛbhiḥ saha putraiśca so'bhyarakṣata pṛṣṭhataḥ

उनके पीछे एक अक्षौहिणी सेना से घिरे राजा विराट चल रहे थे; वे अपने भाइयों और पुत्रों के साथ पीछे की रक्षा कर रहे थे।

श्लोक 21 (6.19.21)

चक्ररक्षौ तु भीमस्य माद्रीपुत्रौ महाद्युती । द्रौपदेयाः ससौभद्राः पृष्ठगोपास्तरस्विनः ॥

cakrarakṣau tu bhīmasya mādrīputrau mahādyutī | draupadeyāḥ sasaubhadrāḥ pṛṣṭhagopāstarasvinaḥ

माद्री के दोनों तेजस्वी पुत्र भीम के पहियों के रक्षक थे; द्रौपदी के पुत्र और सुभद्रा का पुत्र (अभिमन्यु), वेगवान् वीर, पीछे की रक्षा कर रहे थे।

श्लोक 22 (6.19.22)

धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यस्तेषां गोप्ता महारथः । सहितः पृतनाशूरैः रथमुख्यैः प्रभद्रकैः ॥

dhṛṣṭadyumnaśca pāñcālyasteṣāṃ goptā mahārathaḥ | sahitaḥ pṛtanāśūraiḥ rathamukhyaiḥ prabhadrakaiḥ

पांचालराजकुमार महारथी धृष्टद्युम्न सेना के शूरवीर और श्रेष्ठ रथी प्रभद्रकों के साथ उनके रक्षक थे।

श्लोक 23 (6.19.23)

शिखण्डी तु ततः पश्चादर्जुनेनाभिरक्षितः । यत्तो भीष्मविनाशाय प्रययौ भरतर्षभ ॥

śikhaṇḍī tu tataḥ paścādarjunenābhirakṣitaḥ | yatto bhīṣmavināśāya prayayau bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, उनके पीछे अर्जुन से सुरक्षित शिखण्डी भीष्म के विनाश के लिए सावधान होकर चला।

श्लोक 24 (6.19.24)

पृष्ठतोऽप्यर्जुनस्यासीद्युयुधानो महाबलः । चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमोजसौ ॥

pṛṣṭhato'pyarjunasyāsīdyuyudhāno mahābalaḥ | cakrarakṣau tu pāñcālyau yudhāmanyūttamojasau

अर्जुन के पीछे महाबली युयुधान (सात्यकि) थे; और दो पांचाल वीर, युधामन्यु और उत्तमौजा, उनके पहियों के रक्षक थे।

श्लोक 25 (6.19.25)

राजा तु मध्यमानीके कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । बृहद्भिः कुञ्जरैर्मत्तैश्चलद्भिरचलैरिव ॥

rājā tu madhyamānīke kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | bṛhadbhiḥ kuñjarairmattaiścaladbhiracalairiva

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर सेना के मध्य भाग में थे, चलते-फिरते पर्वतों जैसे विशाल मतवाले हाथियों के बीच।

श्लोक 26 (6.19.26)

अक्षौहिण्याथ पाञ्चाल्यो यज्ञसेनो महामनाः । विराटमन्वयात्पश्चात्पाण्डवार्थं पराक्रमी ॥

akṣauhiṇyātha pāñcālyo yajñaseno mahāmanāḥ | virāṭamanvayātpaścātpāṇḍavārthaṃ parākramī

महामनस्वी और पराक्रमी पांचालराज यज्ञसेन (द्रुपद) एक अक्षौहिणी सेना के साथ पाण्डवों के लिए विराट के पीछे-पीछे चले।

श्लोक 27 (6.19.27)

तेषामादित्यचन्द्राभाः कनकोत्तमभूषणाः । नानाचिह्नधरा राजन्रथेष्वासन्महाध्वजाः ॥

teṣāmādityacandrābhāḥ kanakottamabhūṣaṇāḥ | nānācihnadharā rājanratheṣvāsanmahādhvajāḥ

उनके रथों पर सूर्य और चन्द्रमा के समान चमकते, उत्तम सोने से सजे, अनेक चिह्नों वाले विशाल ध्वज थे।

श्लोक 28 (6.19.28)

समुत्सार्य ततः पश्चाद्धृष्टद्युम्नो महारथः । भ्रातृभिः सहपुत्रैश्च सोऽभ्यरक्षद्युधिष्ठिरम् ॥

samutsārya tataḥ paścāddhṛṣṭadyumno mahārathaḥ | bhrātṛbhiḥ sahaputraiśca so'bhyarakṣadyudhiṣṭhiram

फिर मार्ग बनाते हुए महारथी धृष्टद्युम्न अपने भाइयों और पुत्रों के साथ पीछे से युधिष्ठिर की रक्षा करने लगे।

श्लोक 29 (6.19.29)

त्वदीयानां परेषां च रथेषु विपुलान्ध्वजान् । अभिभूयार्जुनस्यैको रथे तस्थौ महाकपिः ॥

tvadīyānāṃ pareṣāṃ ca ratheṣu vipulāndhvajān | abhibhūyārjunasyaiko rathe tasthau mahākapiḥ

तुम्हारे और शत्रुओं के रथों पर लगे विशाल ध्वजों को मात देता हुआ अर्जुन के रथ पर अकेला महाकपि (हनुमान्) विराजमान था।

श्लोक 30 (6.19.30)

पदातास्त्वग्रतोऽगच्छन्नसिशक्त्यृष्टिपाणयः । अनेकशतसाहस्रा भीमसेनस्य रक्षिणः ॥

padātāstvagrato'gacchannasiśaktyṛṣṭipāṇayaḥ | anekaśatasāhasrā bhīmasenasya rakṣiṇaḥ

आगे-आगे पैदल सैनिक चल रहे थे — हाथों में तलवार, शक्ति और ऋष्टि लिए, कई लाख, भीमसेन के रक्षक।

श्लोक 31 (6.19.31)

वारणा दशसाहस्राः प्रभिन्नकरटामुखाः । शूरा हेममयैर्जालैर्दीप्यमाना इवाचलाः ॥

vāraṇā daśasāhasrāḥ prabhinnakaraṭāmukhāḥ | śūrā hemamayairjālairdīpyamānā ivācalāḥ

दस हज़ार हाथी, जिनकी कनपटियों और मुखों से मद बह रहा था, शूर, सोने की जालियों से पर्वतों के समान चमकते हुए,

श्लोक 32 (6.19.32)

क्षरन्त इव जीमूता महार्हाः पद्मगन्धिनः । राजानमन्वयुः पश्चाज्जीमूता इव वार्षिकाः ॥

kṣaranta iva jīmūtā mahārhāḥ padmagandhinaḥ | rājānamanvayuḥ paścājjīmūtā iva vārṣikāḥ

बरसते बादलों के समान मद टपकाते, बहुमूल्य, कमल-सी सुगन्ध वाले — वर्षा ऋतु के बादलों की तरह राजा के पीछे-पीछे चल रहे थे।

श्लोक 33 (6.19.33)

भीमसेनो गदां भीमां प्रकर्षन्परिघोपमाम् । प्रचकर्ष महासैन्यं दुराधर्षो महामनाः ॥

bhīmaseno gadāṃ bhīmāṃ prakarṣanparighopamām | pracakarṣa mahāsainyaṃ durādharṣo mahāmanāḥ

दुर्धर्ष और महामनस्वी भीमसेन परिघ के समान अपनी भयंकर गदा को घुमाते हुए विशाल सेना को आगे खींचे लिए जा रहे थे।

श्लोक 34 (6.19.34)

तमर्कमिव दुष्प्रेक्ष्यं तपन्तमिव वाहिनीम् । न शेकुः सर्वयोधास्ते प्रतिवीक्षितुमन्तिके ॥

tamarkamiva duṣprekṣyaṃ tapantamiva vāhinīm | na śekuḥ sarvayodhāste prativīkṣitumantike

सूर्य के समान उन्हें देखना कठिन था, मानो वे शत्रुसेना को तपा रहे हों; कोई भी योद्धा पास से उनकी ओर देख नहीं सका।

श्लोक 35 (6.19.35)

वज्रो नामैष स व्यूहो निर्भयः सर्वतोमुखः । चापविद्युद्ध्वजो घोरो गुप्तो गाण्डीवधन्वना ॥

vajro nāmaiṣa sa vyūho nirbhayaḥ sarvatomukhaḥ | cāpavidyuddhvajo ghoro gupto gāṇḍīvadhanvanā

यही वह वज्र नामक व्यूह है — निर्भय, सब ओर मुख वाला, भयंकर, जिसके ध्वजों पर धनुष बिजली-से चमकते हैं, और जिसकी रक्षा गाण्डीवधारी अर्जुन करते हैं।

श्लोक 36 (6.19.36)

यं प्रतिव्यूह्य तिष्ठन्ति पाण्डवास्तव वाहिनीम् । अजेयो मानुषे लोके पाण्डवैरभिरक्षितः ॥

yaṃ prativyūhya tiṣṭhanti pāṇḍavāstava vāhinīm | ajeyo mānuṣe loke pāṇḍavairabhirakṣitaḥ

इसी व्यूह को रचकर पाण्डव तुम्हारी सेना के सामने खड़े हैं; पाण्डवों से सुरक्षित यह व्यूह मनुष्यलोक में अजेय है।

श्लोक 37 (6.19.37)

संध्यां तिष्ठत्सु सैन्येषु सूर्यस्योदयनं प्रति । प्रववौ पृष्ठतो वायुर्निरभ्रे स्तनयित्नुमान् ॥

saṃdhyāṃ tiṣṭhatsu sainyeṣu sūryasyodayanaṃ prati | pravavau pṛṣṭhato vāyurnirabhre stanayitnumān

जब सेनाएँ प्रातःसन्ध्या में सूर्योदय की प्रतीक्षा में खड़ी थीं, तब बादलरहित आकाश में भी गर्जन के साथ पीछे से वायु बहने लगी।

श्लोक 38 (6.19.38)

विष्वग्वाताश्च विववुर्नीचैः शर्करकर्षिणः । रजश्चोद्धूयत महत्तम आच्छादयञ्जगत् ॥

viṣvagvātāśca vivavurnīcaiḥ śarkarakarṣiṇaḥ | rajaścoddhūyata mahattama ācchādayañjagat

चारों ओर नीचे-नीचे कंकड़ उड़ाते बवंडर चलने लगे, और भारी धूल उठकर संसार को अन्धकार से ढकने लगी।

श्लोक 39 (6.19.39)

पपात महती चोल्का प्राङ्मुखी भरतर्षभ । उद्यन्तं सूर्यमाहत्य व्यशीर्यत महास्वना ॥

papāta mahatī colkā prāṅmukhī bharatarṣabha | udyantaṃ sūryamāhatya vyaśīryata mahāsvanā

हे भरतश्रेष्ठ, पूर्व की ओर मुख किए एक विशाल उल्का गिरी; वह उगते हुए सूर्य से टकराकर भयंकर शब्द के साथ बिखर गई।

श्लोक 40 (6.19.40)

अथ संनह्यमानेषु सैन्येषु भरतर्षभ । निष्प्रभोऽभ्युद्ययौ सूर्यः सघोषं भूश्चचाल च ॥

atha saṃnahyamāneṣu sainyeṣu bharatarṣabha | niṣprabho'bhyudyayau sūryaḥ saghoṣaṃ bhūścacāla ca

हे भरतश्रेष्ठ, तब जब सेनाएँ कवच बाँध रही थीं, सूर्य बिना प्रभा के उदित हुआ और पृथ्वी गड़गड़ाहट के साथ काँप उठी।

श्लोक 41 (6.19.41)

व्यशीर्यत सनादा च भूस्तदा भरतर्षभ । निर्घाता बहवो राजन्दिक्षु सर्वासु चाभवन् । प्रादुरासीद्रजस्तीव्रं न प्राज्ञायत किंचन ॥

vyaśīryata sanādā ca bhūstadā bharatarṣabha | nirghātā bahavo rājandikṣu sarvāsu cābhavan | prādurāsīdrajastīvraṃ na prājñāyata kiṃcana

हे भरतश्रेष्ठ, तब पृथ्वी भारी शब्द के साथ फटने लगी; हे राजन्, सब दिशाओं में अनेक वज्रपात होने लगे; घनी धूल छा गई और कुछ भी पहचान में नहीं आता था।

श्लोक 42 (6.19.42)

ध्वजानां धूयमानानां सहसा मातरिश्वना । किङ्किणीजालबद्धानां काञ्चनस्रग्वराम्बरैः ॥

dhvajānāṃ dhūyamānānāṃ sahasā mātariśvanā | kiṅkiṇījālabaddhānāṃ kāñcanasragvarāmbaraiḥ

जब वायु ने सहसा ध्वजों को झकझोरा — घुँघरुओं की जालियों से बँधे, सोने की मालाओं और उत्तम वस्त्रों से युक्त ध्वजों को —

श्लोक 43 (6.19.43)

महतां सपताकानामादित्यसमतेजसाम् । सर्वं झणझणीभूतमासीत्तालवनेष्विव ॥

mahatāṃ sapatākānāmādityasamatejasām | sarvaṃ jhaṇajhaṇībhūtamāsīttālavaneṣviva

पताकाओं से युक्त, सूर्य के समान तेजस्वी उन विशाल ध्वजों से सब ओर झन-झन का शब्द होने लगा, जैसे ताड़ के वन में होता है।

श्लोक 44 (6.19.44)

एवं ते पुरुषव्याघ्राः पाण्डवा युद्धनन्दिनः । व्यवस्थिताः प्रतिव्यूह्य तव पुत्रस्य वाहिनीम् ॥

evaṃ te puruṣavyāghrāḥ pāṇḍavā yuddhanandinaḥ | vyavasthitāḥ prativyūhya tava putrasya vāhinīm

इस प्रकार युद्ध में आनन्द पाने वाले वे पुरुषसिंह पाण्डव तुम्हारे पुत्र की सेना के विरुद्ध व्यूह रचकर डट गए।

श्लोक 45 (6.19.45)

ग्रसन्त इव मज्जानो योधानां भरतर्षभ । दृष्ट्वाग्रतो भीमसेनं गदापाणिमवस्थितम् ॥

grasanta iva majjāno yodhānāṃ bharatarṣabha | dṛṣṭvāgrato bhīmasenaṃ gadāpāṇimavasthitam

हे भरतश्रेष्ठ, हाथ में गदा लिए भीमसेन को आगे खड़ा देखकर योद्धाओं की मज्जा मानो सूखने लगी।

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20