भीष्म पर्व · अध्याय 48
भीष्म द्वारा श्वेत का वध
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि जब विराटपुत्र श्वेत शल्य के रथ के पास पहुँचे, तब दोनों सेनाओं और भीष्म ने क्या किया। सञ्जय पहले दिन के अस्त-व्यस्त संहार का, पाण्डव-सेना में भीष्म के और कौरव-सेना में श्वेत के विनाश का, तथा दोनों के लम्बे द्वन्द्व-युद्ध का वर्णन करते हैं — श्वेत भीष्म का ताड़-ध्वज गिरा देते हैं और दो बार उनका धनुष काटते हैं, और भीष्म श्वेत के घोड़ों और सारथी को मारकर उनकी फेंकी हुई शक्ति के टुकड़े कर देते हैं। जब श्वेत गदा से भीष्म का रथ चूर कर देते हैं, तब आकाशवाणी भीष्म से कहती है कि विजय का समय आ गया है; बचाने आए पाण्डव वीरों को रोककर भीष्म ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित बाण से श्वेत का वध करते हैं, और सेनाएँ रात के लिए लौट जाती हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.48.1)
एवं श्वेते महेष्वासे प्राप्ते शल्यरथं प्रति । कुरवः पाण्डवेयाश्च किमकुर्वत सञ्जय ॥
evaṃ śvete maheṣvāse prāpte śalyarathaṃ prati | kuravaḥ pāṇḍaveyāśca kimakurvata sañjaya
हे सञ्जय, जब महाधनुर्धर श्वेत इस प्रकार शल्य के रथ के सामने आ पहुँचे, तब कौरवों और पाण्डवों ने क्या किया?
श्लोक 2 (6.48.2)
भीष्मः शान्तनवः किं वा तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥
bhīṣmaḥ śāntanavaḥ kiṃ vā tanmamācakṣva pṛcchataḥ
और शान्तनुनन्दन भीष्म ने क्या किया? मैं पूछ रहा हूँ, मुझे यह बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (6.48.3)
राजञ्शतसहस्राणि ततः क्षत्रियपुङ्गवाः ॥
rājañśatasahasrāṇi tataḥ kṣatriyapuṅgavāḥ
हे राजन्, तब लाखों श्रेष्ठ क्षत्रिय,
श्लोक 4 (6.48.4)
श्वेतं सेनापतिं शूरं पुरस्कृत्य महारथाः । राज्ञो बलं दर्शयन्तस्तव पुत्रस्य भारत ॥
śvetaṃ senāpatiṃ śūraṃ puraskṛtya mahārathāḥ | rājño balaṃ darśayantastava putrasya bhārata
महारथी योद्धा, वीर सेनापति श्वेत को आगे करके और हे भारत, आपके पुत्र राजा को अपना बल दिखाते हुए,
श्लोक 5 (6.48.5)
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य त्रातुमैच्छन्महारथाः । अभ्यवर्तन्त भीष्मस्य रथं हेमपरिष्कृतम् ॥
śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya trātumaicchanmahārathāḥ | abhyavartanta bhīṣmasya rathaṃ hemapariṣkṛtam
तथा शिखण्डी को आगे करके, अपने पक्ष की रक्षा करने की इच्छा से, वे महारथी भीष्म के स्वर्ण-मण्डित रथ की ओर बढ़े,
श्लोक 6 (6.48.6)
जिघांसन्तं युधांश्रेष्ठं तदासीत्तुमुलं महत् । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि महावैशसमच्युत ॥
jighāṃsantaṃ yudhāṃśreṣṭhaṃ tadāsīttumulaṃ mahat | tatte'haṃ saṃpravakṣyāmi mahāvaiśasamacyuta
उस संहार पर तुले हुए योद्धाओं में श्रेष्ठ भीष्म की ओर। तब बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। हे अच्युत, उस महासंहार का वर्णन मैं आपसे करूँगा,
श्लोक 7 (6.48.7)
तावकानां परेषां च यथा युद्धमवर्तत । तत्राकरोद्रथोपस्थाञ्शून्याञ्शान्तनवो बहून् ॥
tāvakānāṃ pareṣāṃ ca yathā yuddhamavartata | tatrākarodrathopasthāñśūnyāñśāntanavo bahūn
कि आपके और शत्रु-पक्ष के योद्धाओं के बीच युद्ध कैसे हुआ। वहाँ शान्तनुनन्दन ने बहुत-से रथों की बैठकें सूनी कर दीं।
श्लोक 8 (6.48.8)
तत्राद्भुतं महच्चक्रे शरैरार्च्छद्रथोत्तमान् । समावृणोच्छरैरर्कमर्कतुल्यप्रतापवान् ॥
tatrādbhutaṃ mahaccakre śarairārcchadrathottamān | samāvṛṇoccharairarkamarkatulyapratāpavān
वहाँ उन्होंने बड़ा अद्भुत पराक्रम किया: अपने बाणों से उत्तम रथियों को घायल किया। सूर्य के समान प्रतापी भीष्म ने अपने बाणों से सूर्य को भी ढक दिया,
श्लोक 9 (6.48.9)
नुदन्समन्तात्समरे रविरुद्यन्यथा तमः । तेनाजौ प्रेषिता राजञ्शराः शतसहस्रशः ॥
nudansamantātsamare ravirudyanyathā tamaḥ | tenājau preṣitā rājañśarāḥ śatasahasraśaḥ
और रणभूमि में चारों ओर शत्रुओं को वैसे ही खदेड़ दिया जैसे उगता सूर्य अन्धकार को। हे राजन्, उस युद्ध में उनके छोड़े हुए लाखों बाण,
श्लोक 10 (6.48.10)
क्षत्रियान्तकराः सङ्ख्ये महावेगा महाबलाः । शिरांसि पातयामासुर्वीराणां शतशो रणे ॥
kṣatriyāntakarāḥ saṅkhye mahāvegā mahābalāḥ | śirāṃsi pātayāmāsurvīrāṇāṃ śataśo raṇe
जो रण में क्षत्रियों का अन्त करने वाले, बड़े वेगशाली और बलवान थे, युद्धभूमि में सैकड़ों वीरों के सिर गिराने लगे,
श्लोक 11 (6.48.11)
गजान्कण्टकसन्नाहान्वज्रेणेव शिलोच्चयान् । रथा रथेषु संसक्ता व्यदृश्यन्त विशांपते ॥
gajānkaṇṭakasannāhānvajreṇeva śiloccayān | rathā ratheṣu saṃsaktā vyadṛśyanta viśāṃpate
और काँटेदार कवच पहने हाथियों को वैसे ही गिराने लगे जैसे वज्र पर्वत-शिखरों को गिराता है। हे प्रजानाथ, रथ रथों से उलझे हुए दिखाई देते थे।
श्लोक 12 (6.48.12)
एके रथं पर्यवहंस्तुरगाः सतुरंगमम् । युवानं निहतं वीरं लम्बमानं सकार्मुकम् ॥
eke rathaṃ paryavahaṃsturagāḥ saturaṃgamam | yuvānaṃ nihataṃ vīraṃ lambamānaṃ sakārmukam
कुछ घोड़े जुते हुए घोड़ों सहित रथ को इधर-उधर खींचे लिए जा रहे थे, जिस पर कोई युवा वीर मरा पड़ा था, धनुष हाथ में लिए नीचे लटकता हुआ।
श्लोक 13 (6.48.13)
उदीर्णाश्च हया राजन्वहन्तस्तत्रतत्र ह । बद्धखड्गनिषङ्गाश्च विध्वस्तशिरसो हताः ॥
udīrṇāśca hayā rājanvahantastatratatra ha | baddhakhaḍganiṣaṅgāśca vidhvastaśiraso hatāḥ
हे राजन्, उत्तेजित घोड़े उन्हें लिए इधर-उधर दौड़ रहे थे; और तलवारें तथा तरकस बाँधे हुए योद्धा सिर फूटे हुए मरे पड़े थे।
श्लोक 14 (6.48.14)
शतशः पतिता भूमौ वीरशय्यासु शेरते । परस्परेण धावन्तः पतिताः पुनरुत्थिताः ॥
śataśaḥ patitā bhūmau vīraśayyāsu śerate | paraspareṇa dhāvantaḥ patitāḥ punarutthitāḥ
सैकड़ों योद्धा धरती पर गिरकर वीरशय्या पर सो गए। एक-दूसरे पर झपटते हुए योद्धा गिरते और फिर उठ खड़े होते;
श्लोक 15 (6.48.15)
उत्थाय च प्रधावन्तो द्वन्द्वयुद्धमवाप्नुवन् । पीडिताः पुनरन्योन्यं लुठन्तो रणमूर्धनि ॥
utthāya ca pradhāvanto dvandvayuddhamavāpnuvan | pīḍitāḥ punaranyonyaṃ luṭhanto raṇamūrdhani
उठकर फिर दौड़ पड़ते और आमने-सामने द्वन्द्व-युद्ध में भिड़ जाते; घायल होकर वे रणभूमि के अग्रभाग में फिर एक-दूसरे से लिपटकर लुढ़कते।
श्लोक 16 (6.48.16)
सचापाः सनिषङ्गाश्च जातरूपपरिष्कृताः । विस्रब्धहतवीराश्च शतशः परिपीडिताः ॥
sacāpāḥ saniṣaṅgāśca jātarūpapariṣkṛtāḥ | visrabdhahatavīrāśca śataśaḥ paripīḍitāḥ
वहाँ धनुष और तरकस लिए, सोने से सजे योद्धा पड़े थे; कितने ही वीर असावधानी में मारे गए और सैकड़ों बुरी तरह पीड़ित हुए।
श्लोक 17 (6.48.17)
तेनतेनाभ्यधावन्त विसृजन्तश्च भारत । मत्तो गजः पर्यवर्तद्धयांश्च हतसादिनः ॥
tenatenābhyadhāvanta visṛjantaśca bhārata | matto gajaḥ paryavartaddhayāṃśca hatasādinaḥ
हे भारत, बाण छोड़ते हुए योद्धा इधर-उधर दौड़ रहे थे। एक मतवाला हाथी उन घोड़ों को रौंदता हुआ घूम रहा था जिनके सवार मारे जा चुके थे,
श्लोक 18 (6.48.18)
सरथा रथिनश्चापि विमृद्नन्तः समन्ततः । स्यन्दनादपतत्कश्चिन्निहतोऽन्येन सायकैः ॥
sarathā rathinaścāpi vimṛdnantaḥ samantataḥ | syandanādapatatkaścinnihato'nyena sāyakaiḥ
और रथों सहित रथियों को भी, चारों ओर कुचलता हुआ। कोई योद्धा दूसरे के बाणों से मारा जाकर अपने रथ से गिर पड़ा;
श्लोक 19 (6.48.19)
हतसारथिरप्युच्चैः पपात काष्ठवद्रथः । युध्यमानस्य संग्रामे व्यूढे रजसि चोत्थिते ॥
hatasārathirapyuccaiḥ papāta kāṣṭhavadrathaḥ | yudhyamānasya saṃgrāme vyūḍhe rajasi cotthite
किसी रथ का सारथी मारा गया तो वह रथ लकड़ी के लट्ठे की तरह धड़ाम से गिर पड़ा। उस संग्राम में, जब घनी धूल उठ रही थी, लड़ने वाले योद्धा के लिए
श्लोक 20 (6.48.20)
धनुःकूजितविज्ञानं तत्रासीत्प्रतियुद्ध्यतः । गात्रस्पर्शेन योधानां व्यज्ञास्त परिपन्थिनम् ॥
dhanuḥkūjitavijñānaṃ tatrāsītpratiyuddhyataḥ | gātrasparśena yodhānāṃ vyajñāsta paripanthinam
प्रतिद्वन्द्वी को पहचानने का एक ही उपाय था, उसके धनुष की टंकार; योद्धा अंगों के स्पर्श से अपने विरोधी को पहचानते थे।
श्लोक 21 (6.48.21)
युद्ध्यमानं शरै राजन्सिञ्जिनीध्वजिनीरवात् । अन्योन्यं वीरसंशब्दो नाश्रूयत भटैः कृतः ॥
yuddhyamānaṃ śarai rājansiñjinīdhvajinīravāt | anyonyaṃ vīrasaṃśabdo nāśrūyata bhaṭaiḥ kṛtaḥ
हे राजन्, बाणों से लड़ने वाले योद्धा का पता प्रत्यंचाओं और सेना के शोर से ही चलता था; सैनिकों द्वारा एक-दूसरे को दी गई वीरों की ललकार सुनाई नहीं पड़ती थी।
श्लोक 22 (6.48.22)
शब्दायमाने संग्रामे पटहे कर्णदारिणि । युध्यमानस्य संग्रामे कुर्वतः पौरुषं स्वकम् ॥
śabdāyamāne saṃgrāme paṭahe karṇadāriṇi | yudhyamānasya saṃgrāme kurvataḥ pauruṣaṃ svakam
जब संग्राम में कोलाहल मचा था और कान फाड़ देने वाले नगाड़े बज रहे थे, तब उस युद्ध में अपना पराक्रम दिखाते हुए लड़ने वाले योद्धा के
श्लोक 23 (6.48.23)
नाश्रौषं नामगोत्राणि कीर्तनं च परस्परम् । भीष्मचापच्युतैर्बाणैरार्तानां युध्यतां मृधे ॥
nāśrauṣaṃ nāmagotrāṇi kīrtanaṃ ca parasparam | bhīṣmacāpacyutairbāṇairārtānāṃ yudhyatāṃ mṛdhe
न नाम सुनाई देते थे, न गोत्र, न एक-दूसरे को पुकारना। भीष्म के धनुष से छूटे बाणों ने, रणभूमि में पीड़ा से लड़ते हुए
श्लोक 24 (6.48.24)
परस्परेषां वीराणां मनांसि समकम्पयन् । तस्मिन्नत्याकुले युद्धे दारुणे रोमहर्षणे ॥
paraspareṣāṃ vīrāṇāṃ manāṃsi samakampayan | tasminnatyākule yuddhe dāruṇe romaharṣaṇe
दोनों पक्षों के वीरों के मन काँपा दिए। उस अत्यन्त अस्त-व्यस्त, भयानक और रोंगटे खड़े कर देने वाले युद्ध में
श्लोक 25 (6.48.25)
पिता पुत्रं च समरे नाभिजानाति कश्चन । चक्रे भग्ने युगे च्छिन्ने एकधुर्ये हये हतः ॥
pitā putraṃ ca samare nābhijānāti kaścana | cakre bhagne yuge cchinne ekadhurye haye hataḥ
कोई पिता अपने पुत्र को नहीं पहचानता था। किसी का पहिया टूट गया, जुआ टूट गया, एक जुता हुआ घोड़ा मारा गया,
श्लोक 26 (6.48.26)
आक्षिप्तः स्यन्दनाद्वीरः ससारथिरजिह्मगैः । एवं च समरे सर्वे वीराश्च विरथीकृताः ॥
ākṣiptaḥ syandanādvīraḥ sasārathirajihmagaiḥ | evaṃ ca samare sarve vīrāśca virathīkṛtāḥ
तो वह वीर सीधे जाने वाले बाणों से सारथी सहित रथ से नीचे फेंक दिया गया। इस प्रकार उस संग्राम में सभी वीर रथहीन कर दिए गए,
श्लोक 27 (6.48.27)
तेन तेन स्म दृश्यन्ते धावमानाः समंततः । गजो हतः शिरश्छिन्नं मर्म भिन्नं हयो हतः ॥
tena tena sma dṛśyante dhāvamānāḥ samaṃtataḥ | gajo hataḥ śiraśchinnaṃ marma bhinnaṃ hayo hataḥ
और वे चारों ओर इधर-उधर भागते दिखाई देते थे। कहीं हाथी मारा गया, कहीं सिर कटा, कहीं मर्मस्थान बिंधा, कहीं घोड़ा मारा गया;
श्लोक 28 (6.48.28)
अहतः कोऽपि नैवासीद्भीष्मे निघ्नति शात्रवान् । श्वेतः कुरूणामकरोत्क्षयं तस्मिन्महाहवे ॥
ahataḥ ko'pi naivāsīdbhīṣme nighnati śātravān | śvetaḥ kurūṇāmakarotkṣayaṃ tasminmahāhave
जब भीष्म शत्रुओं का संहार कर रहे थे, तब कोई भी अघायल नहीं बचा। उधर उस महायुद्ध में श्वेत ने कौरवों का विनाश किया;
श्लोक 29 (6.48.29)
राजपुत्रान्रथोदारानवधीच्छतसङ्घशः । चिच्छेद रथिनां बाणैः शिरांसि भरतर्षभ ॥
rājaputrānrathodārānavadhīcchatasaṅghaśaḥ | ciccheda rathināṃ bāṇaiḥ śirāṃsi bharatarṣabha
उन्होंने सैकड़ों-सैकड़ों के झुण्डों में श्रेष्ठ रथी राजकुमारों को मार डाला; हे भरतश्रेष्ठ, अपने बाणों से उन्होंने रथियों के सिर काट डाले,
श्लोक 30 (6.48.30)
साङ्गदा बाहवश्चैव धनूंषि च समंततः । रथेषां रथचक्राणि तूणीराणि युगानि च ॥
sāṅgadā bāhavaścaiva dhanūṃṣi ca samaṃtataḥ | ratheṣāṃ rathacakrāṇi tūṇīrāṇi yugāni ca
बाजूबन्द सहित भुजाएँ और चारों ओर धनुष भी; रथ के दण्ड, रथ के पहिये, तरकस और जुए,
श्लोक 31 (6.48.31)
छत्राणि च महार्हाणि पताकाश्च विशांपते । हयौघाश्च रथौघाश्च नरौघाश्चैव भारत ॥
chatrāṇi ca mahārhāṇi patākāśca viśāṃpate | hayaughāśca rathaughāśca naraughāścaiva bhārata
हे प्रजानाथ, बहुमूल्य छत्र और पताकाएँ; हे भारत, घोड़ों के झुण्ड, रथों के झुण्ड और मनुष्यों के झुण्ड,
श्लोक 32 (6.48.32)
वारणाः शतशश्चैव हताः श्वेतेन भारत । वयं श्वेतभयाद्भीता विहाय रथसत्तमम् ॥
vāraṇāḥ śataśaścaiva hatāḥ śvetena bhārata | vayaṃ śvetabhayādbhītā vihāya rathasattamam
और सैकड़ों हाथी, हे भारत, श्वेत के हाथों मारे गए। हम श्वेत के भय से डरकर उस श्रेष्ठ रथी को छोड़कर
श्लोक 33 (6.48.33)
अपयातास्तथा पश्चाद्विभुं पश्याम धृष्णवः । शरपातमतिक्रम्य कुरवः कुरुनन्दन ॥
apayātāstathā paścādvibhuṃ paśyāma dhṛṣṇavaḥ | śarapātamatikramya kuravaḥ kurunandana
पीछे हट गए, फिर भी साहस बनाए रखकर हम अपने स्वामी को देखते रहे। हे कुरुनन्दन, बाणों की मार से बाहर निकलकर हम कौरव
श्लोक 34 (6.48.34)
भीष्मं शान्तनवं युद्धे स्थिताः पश्याम सर्वशः । अदीनो दीनसमये भीष्मोऽस्माकं महाहवे ॥
bhīṣmaṃ śāntanavaṃ yuddhe sthitāḥ paśyāma sarvaśaḥ | adīno dīnasamaye bhīṣmo'smākaṃ mahāhave
सब ओर खड़े होकर युद्ध में शान्तनुनन्दन भीष्म को देखते रहे। उस संकट की घड़ी में भी निर्भीक हमारे भीष्म उस महायुद्ध में
श्लोक 35 (6.48.35)
एकस्तस्थौ नरव्याघ्रो गिरिर्मेरुरिवाचलः । आददान इव प्राणान्सविता शिशिरात्यये ॥
ekastasthau naravyāghro girirmerurivācalaḥ | ādadāna iva prāṇānsavitā śiśirātyaye
अकेले ही खड़े रहे, वे पुरुषसिंह मेरु पर्वत के समान अडिग थे। जैसे शिशिर ऋतु के अन्त में सूर्य प्राणियों के प्राण खींच लेता है,
श्लोक 36 (6.48.36)
गभस्तिभिरिवादित्यस्तस्थौ शरमरीचिमान् । स मुमोच महेष्वासः शरसङ्घाननेकशः ॥
gabhastibhirivādityastasthau śaramarīcimān | sa mumoca maheṣvāsaḥ śarasaṅghānanekaśaḥ
वैसे ही किरणों वाले सूर्य के समान, बाणों को ही किरणें बनाकर वे खड़े थे। उस महाधनुर्धर ने अनेक बार बाणों की झड़ियाँ छोड़ीं,
श्लोक 37 (6.48.37)
निघ्नन्नमित्रान्समरे वज्रपाणिरिवासुरान् । ते वध्यमाना भीष्मेण प्रजहुस्तं महाबलम् ॥
nighnannamitrānsamare vajrapāṇirivāsurān | te vadhyamānā bhīṣmeṇa prajahustaṃ mahābalam
और रण में शत्रुओं का वैसे ही संहार किया जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरों का करते हैं। भीष्म की मार खाकर वे उस महाबली से दूर भाग गए,
श्लोक 38 (6.48.38)
स्वयूथादिव ते यूथान्मुक्तं भूमिषु दारुणम् । तमेवमुपलक्ष्यैको हृष्टः पुष्टः परंतप ॥
svayūthādiva te yūthānmuktaṃ bhūmiṣu dāruṇam | tamevamupalakṣyaiko hṛṣṭaḥ puṣṭaḥ paraṃtapa
जैसे अपने झुण्ड से छूटे किसी भयंकर हाथी से दूसरे झुण्ड भागते हैं। हे परन्तप, उन्हें इस स्थिति में देखकर, अकेले ही, प्रसन्न और बलवान भीष्म,
श्लोक 39 (6.48.39)
दुर्योधनप्रिये युक्तः पाण्डवान्परिशोचयन् । जीवितं दुस्त्यजं त्यक्त्वा भयं च सुमहाहवे ॥
duryodhanapriye yuktaḥ pāṇḍavānpariśocayan | jīvitaṃ dustyajaṃ tyaktvā bhayaṃ ca sumahāhave
दुर्योधन का प्रिय करने में लगे हुए और पाण्डवों को शोक में डालते हुए, उस महायुद्ध में दुस्त्याज्य प्राणों का मोह और भय दोनों छोड़कर,
श्लोक 40 (6.48.40)
पातयामास सैन्यानि पाण्डवानां विशांपते । प्रहरन्तमनीकानि पिता देवव्रतस्तव ॥
pātayāmāsa sainyāni pāṇḍavānāṃ viśāṃpate | praharantamanīkāni pitā devavratastava
हे प्रजानाथ, पाण्डवों की सेनाओं को गिराने लगे। आपके पिता देवव्रत ने सेनापति श्वेत को सेना-दलों पर प्रहार करते देखा,
श्लोक 41 (6.48.41)
दृष्ट्वा सेनापतिं भीष्मस्त्वरितः श्वेतमभ्ययात् । स भीष्मं शरजालेन महता समवाकिरत् ॥
dṛṣṭvā senāpatiṃ bhīṣmastvaritaḥ śvetamabhyayāt | sa bhīṣmaṃ śarajālena mahatā samavākirat
तो भीष्म तुरन्त श्वेत की ओर बढ़े। श्वेत ने भीष्म को बाणों के विशाल जाल से ढक दिया,
श्लोक 42 (6.48.42)
श्वेतं चापि तथा भीष्मः शरौघैः समवाकिरत् । तौ वृषाविव नर्दन्तौ मत्ताविव महाद्विपौ ॥
śvetaṃ cāpi tathā bhīṣmaḥ śaraughaiḥ samavākirat | tau vṛṣāviva nardantau mattāviva mahādvipau
और भीष्म ने भी उसी प्रकार श्वेत को बाणों की बौछारों से ढक दिया। दो साँड़ों की तरह गरजते हुए, दो मतवाले महागजों की तरह,
श्लोक 43 (6.48.43)
व्याघ्राविव सुसंरब्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः । अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य ततस्तौ पुरुषर्षभौ ॥
vyāghrāviva susaṃrabdhāvanyonyamabhijaghnatuḥ | astrairastrāṇi saṃvārya tatastau puruṣarṣabhau
दो क्रोधित बाघों की तरह वे एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे। अस्त्रों से अस्त्रों को रोकते हुए वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ,
श्लोक 44 (6.48.44)
भीष्मः श्वेतश्च युयुधे परस्परवधैषिणौ । एकाह्ना निर्दहेद्भीष्मः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥
bhīṣmaḥ śvetaśca yuyudhe parasparavadhaiṣiṇau | ekāhnā nirdahedbhīṣmaḥ pāṇḍavānāmanīkinīm
भीष्म और श्वेत, एक-दूसरे के वध की इच्छा से लड़ते रहे। भीष्म एक ही दिन में पाण्डवों की सेना को भस्म कर डालते,
श्लोक 45 (6.48.45)
शरैः परमसंक्रुद्धो यदि श्वेतो न पालयेत् । पितामहं ततो दृष्ट्वा श्वेतेन विमुखीकृतम् ॥
śaraiḥ paramasaṃkruddho yadi śveto na pālayet | pitāmahaṃ tato dṛṣṭvā śvetena vimukhīkṛtam
अत्यन्त क्रोध में भरकर अपने बाणों से, यदि श्वेत उसकी रक्षा न करते। तब पितामह को श्वेत द्वारा पीछे हटाया गया देखकर
श्लोक 46 (6.48.46)
प्रहर्षं पाण्डवा जग्मुः पुत्रस्ते विमनाभवत् । ततो दुर्योधनः क्रुद्धः पार्थिवैः परिवारितः ॥
praharṣaṃ pāṇḍavā jagmuḥ putraste vimanābhavat | tato duryodhanaḥ kruddhaḥ pārthivaiḥ parivāritaḥ
पाण्डव हर्षित हुए और आपका पुत्र उदास हो गया। तब क्रोध में भरे दुर्योधन ने राजाओं से घिरकर
श्लोक 47 (6.48.47)
ससैन्यः पाण्डवानीकमभ्यद्रवत संयुगे । दुर्मुखः कृतवर्मा च कृपः शल्यो विशांपतिः ॥
sasainyaḥ pāṇḍavānīkamabhyadravata saṃyuge | durmukhaḥ kṛtavarmā ca kṛpaḥ śalyo viśāṃpatiḥ
अपनी सेना के साथ युद्ध में पाण्डव-सेना पर धावा बोल दिया। दुर्मुख, कृतवर्मा, कृप और राजा शल्य
श्लोक 48 (6.48.48)
भीष्मं जुगुपुरासाद्य तव पुत्रेण नोदिताः । दृष्ट्वा तु पार्थिवैः सर्वैर्दुर्योधनपुरोगमैः ॥
bhīṣmaṃ jugupurāsādya tava putreṇa noditāḥ | dṛṣṭvā tu pārthivaiḥ sarvairduryodhanapurogamaiḥ
आपके पुत्र की प्रेरणा से भीष्म के पास पहुँचकर उनकी रक्षा करने लगे। किन्तु दुर्योधन आदि सब राजाओं द्वारा
श्लोक 49 (6.48.49)
पाण्डवानामनीकानि वध्यमानानि संयुगे । श्वेतो गाङ्गेयमुत्सृज्य तव पुत्रस्य वाहिनीम् ॥
pāṇḍavānāmanīkāni vadhyamānāni saṃyuge | śveto gāṅgeyamutsṛjya tava putrasya vāhinīm
युद्ध में पाण्डवों की सेनाओं का संहार होते देखकर श्वेत ने गंगानन्दन भीष्म को छोड़ दिया और आपके पुत्र की सेना का
श्लोक 50 (6.48.50)
नाशयामास वेगेन वायुर्वृक्षानिवौजसा । द्रावयित्वा चमूं राजन्वैराटिः क्रोधमूर्च्छितः ॥
nāśayāmāsa vegena vāyurvṛkṣānivaujasā | drāvayitvā camūṃ rājanvairāṭiḥ krodhamūrcchitaḥ
वेग से वैसे ही विनाश कर डाला जैसे वायु अपने बल से वृक्षों को उखाड़ देती है। हे राजन्, सेना को भगाकर क्रोध से उन्मत्त विराटपुत्र
श्लोक 51 (6.48.51)
आपतत्सहसा भूयो यत्र भीष्मो व्यवस्थितः । तौ तत्रोपगतौ राजञ्शरदीप्तौ महाबलौ ॥
āpatatsahasā bhūyo yatra bhīṣmo vyavasthitaḥ | tau tatropagatau rājañśaradīptau mahābalau
सहसा फिर वहीं आ पहुँचे जहाँ भीष्म खड़े थे। हे राजन्, बाणों से प्रज्वलित वे दोनों महाबली वहाँ आमने-सामने हुए,
श्लोक 52 (6.48.52)
अयुध्येतां महात्मानौ यथोभौ वृत्रवासवौ । अन्योन्यं तु महाराज परस्परवधैषिणौ ॥
ayudhyetāṃ mahātmānau yathobhau vṛtravāsavau | anyonyaṃ tu mahārāja parasparavadhaiṣiṇau
और वे दोनों महात्मा वैसे ही लड़े जैसे वृत्र और इन्द्र लड़े थे। हे महाराज, एक-दूसरे के वध की इच्छा रखते हुए
श्लोक 53 (6.48.53)
निगृह्य कार्मुकं श्वेतो भीष्मं विव्याध सप्तभिः । पराक्रमं ततस्तस्य पराक्रम्य पराक्रमी ॥
nigṛhya kārmukaṃ śveto bhīṣmaṃ vivyādha saptabhiḥ | parākramaṃ tatastasya parākramya parākramī
श्वेत ने धनुष तानकर भीष्म को सात बाणों से बींध दिया। तब पराक्रमी भीष्म ने अपना पराक्रम दिखाकर तुरन्त उसके पराक्रम को रोक दिया,
श्लोक 54 (6.48.54)
तरसा वारयामास मत्तो मत्तमिव द्विपम् । श्वेतः शान्तनवं भूयः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥
tarasā vārayāmāsa matto mattamiva dvipam | śvetaḥ śāntanavaṃ bhūyaḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ
जैसे एक मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथी को रोकता है। श्वेत ने फिर झुकी गाँठों वाले बाणों से शान्तनुनन्दन को
श्लोक 55 (6.48.55)
विव्याध पञ्चविंशत्या तदद्भुतमिवाभवत् । तं प्रत्यविध्यद्दशभिर्भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥
vivyādha pañcaviṃśatyā tadadbhutamivābhavat | taṃ pratyavidhyaddaśabhirbhīṣmaḥ śāntanavastadā
पच्चीस बाणों से बींध दिया; यह अद्भुत-सा लगा। तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने बदले में उन्हें दस बाणों से बींधा।
श्लोक 56 (6.48.56)
स विद्धस्तेन बलवान्नाकम्पत यथाऽचलः । वैराटिः समरे क्रुद्धो भृशमायम्य कार्मुकम् ॥
sa viddhastena balavānnākampata yathā'calaḥ | vairāṭiḥ samare kruddho bhṛśamāyamya kārmukam
उनसे बिंधकर भी बलवान श्वेत पर्वत के समान अविचल रहे। रण में क्रुद्ध विराटपुत्र ने धनुष को खूब खींचकर
श्लोक 57 (6.48.57)
आजघान ततो भीष्मं श्वेतः क्षत्रियनन्दनः । संप्रहस्य ततः श्वेतः सृक्किणी परिसंलिहन् ॥
ājaghāna tato bhīṣmaṃ śvetaḥ kṣatriyanandanaḥ | saṃprahasya tataḥ śvetaḥ sṛkkiṇī parisaṃlihan
तब भीष्म पर प्रहार किया, क्षत्रियों को आनन्दित करने वाले श्वेत ने। फिर श्वेत ने ठहाका लगाकर, होंठों के कोने चाटते हुए,
श्लोक 58 (6.48.58)
धनुश्चिच्छेद भीष्मस्य नवभिर्दशधा शरैः । संधाय विशिखं चैव शरं लोमप्रवाहिनम् ॥
dhanuściccheda bhīṣmasya navabhirdaśadhā śaraiḥ | saṃdhāya viśikhaṃ caiva śaraṃ lomapravāhinam
नौ बाणों से भीष्म के धनुष के दस टुकड़े कर डाले। और एक पंखदार बाण चढ़ाकर
श्लोक 59 (6.48.59)
उन्ममाथ ततस्तालं ध्वजशीर्षं महात्मनः । केतुं निपतितं दृष्ट्वा भीष्मस्य तनयास्तव ॥
unmamātha tatastālaṃ dhvajaśīrṣaṃ mahātmanaḥ | ketuṃ nipatitaṃ dṛṣṭvā bhīṣmasya tanayāstava
उन महात्मा के ध्वज के शिखर पर लगे ताड़-चिह्न को गिरा दिया। ध्वज को गिरा देखकर आपके पुत्रों ने
श्लोक 60 (6.48.60)
हतं भीष्मममन्यन्त श्वेतस्य वशमागतम् । पाण्डवाश्चापि संहृष्टा दध्मुः शङ्खान्मुदा युताः ॥
hataṃ bhīṣmamamanyanta śvetasya vaśamāgatam | pāṇḍavāścāpi saṃhṛṣṭā dadhmuḥ śaṅkhānmudā yutāḥ
समझा कि भीष्म मारे गए, श्वेत के वश में आ गए। और पाण्डव अत्यन्त प्रसन्न होकर आनन्द से शंख बजाने लगे,
श्लोक 61 (6.48.61)
भीष्मस्य पतितं केतुं दृष्ट्वा तालं महात्मनः । ततो दुर्योधनः क्रोधात्स्वमनीकमनोदयत् ॥
bhīṣmasya patitaṃ ketuṃ dṛṣṭvā tālaṃ mahātmanaḥ | tato duryodhanaḥ krodhātsvamanīkamanodayat
महात्मा भीष्म के ताड़-ध्वज को गिरा हुआ देखकर। तब दुर्योधन ने क्रोध में भरकर अपनी सेना को ललकारा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 62 (6.48.62)
यत्ता भीष्मं परीप्सध्वं रक्षमाणाः समंततः । मा नः प्रपश्यमानानां श्वेतान्मृत्युमवाप्स्यति ॥
yattā bhīṣmaṃ parīpsadhvaṃ rakṣamāṇāḥ samaṃtataḥ | mā naḥ prapaśyamānānāṃ śvetānmṛtyumavāpsyati
"सावधान होकर भीष्म को बचाने का यत्न करो, चारों ओर से उनकी रक्षा करो। ऐसा न हो कि हमारे देखते-देखते श्वेत के हाथों उनकी मृत्यु हो जाए,
सञ्जय उवाच
श्लोक 63 (6.48.63)
भीष्मः शान्तनवः शूरस्तथा सत्यं ब्रवीमि वः । राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा त्वरमाणा महारथाः ॥
bhīṣmaḥ śāntanavaḥ śūrastathā satyaṃ bravīmi vaḥ | rājñastu vacanaṃ śrutvā tvaramāṇā mahārathāḥ
शान्तनुनन्दन वीर भीष्म की; मैं तुमसे सच कहता हूँ।" राजा के ये वचन सुनकर महारथी शीघ्रता से
श्लोक 64 (6.48.64)
बलेन चतुरङ्गेण गाङ्गेयमन्वपालयन् । बाह्लीकः कृतवर्मा च शलः शल्यश्च भारत ॥
balena caturaṅgeṇa gāṅgeyamanvapālayan | bāhlīkaḥ kṛtavarmā ca śalaḥ śalyaśca bhārata
चतुरंगिणी सेना के साथ गंगानन्दन की रक्षा करने लगे। हे भारत, बाह्लीक, कृतवर्मा, शल और शल्य,
श्लोक 65 (6.48.65)
जलसन्धो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः । त्वरमाणास्त्वराकाले परिवार्य समंततः ॥
jalasandho vikarṇaśca citraseno viviṃśatiḥ | tvaramāṇāstvarākāle parivārya samaṃtataḥ
जलसन्ध, विकर्ण, चित्रसेन और विविंशति ने, शीघ्रता के समय शीघ्रता करते हुए, चारों ओर से उन्हें घेरकर
श्लोक 66 (6.48.66)
शस्त्रवृष्टिं सुतुमुलां श्वेतस्योपर्यपातयन् । तान्क्रुद्धो निशितैर्बाणैस्त्वरमाणो महारथः ॥
śastravṛṣṭiṃ sutumulāṃ śvetasyoparyapātayan | tānkruddho niśitairbāṇaistvaramāṇo mahārathaḥ
श्वेत के ऊपर शस्त्रों की भीषण वर्षा की। क्रुद्ध महारथी श्वेत ने शीघ्रता से तीखे बाणों द्वारा
श्लोक 67 (6.48.67)
अवारयदमेयात्मा दर्शयन्पाणिलाघवम् । स निवार्य तु तान्सर्वान्केसरी कुञ्जराविव ॥
avārayadameyātmā darśayanpāṇilāghavam | sa nivārya tu tānsarvānkesarī kuñjarāviva
उन्हें रोक दिया; उस अपार आत्मबल वाले वीर ने अपने हाथों की फुर्ती दिखाई। जैसे सिंह हाथियों को रोक देता है, वैसे ही उन सबको रोककर
श्लोक 68 (6.48.68)
महता शरवर्षेण भीष्मस्य धनुराच्छिनत् । ततोऽन्यद्धनुरादाय भीष्मः शान्तनवो युधि ॥
mahatā śaravarṣeṇa bhīṣmasya dhanurācchinat | tato'nyaddhanurādāya bhīṣmaḥ śāntanavo yudhi
उन्होंने बाणों की भारी वर्षा से भीष्म का धनुष काट डाला। तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने युद्ध में दूसरा धनुष लेकर
श्लोक 69 (6.48.69)
श्वेतं विव्याध राजेन्द्र कङ्कपत्रैः शितैः शरैः । ततः सेनापतिः क्रुद्धो भीष्मं बहुभिरायसैः ॥
śvetaṃ vivyādha rājendra kaṅkapatraiḥ śitaiḥ śaraiḥ | tataḥ senāpatiḥ kruddho bhīṣmaṃ bahubhirāyasaiḥ
हे राजेन्द्र, कंकपक्षी के पंखों वाले तीखे बाणों से श्वेत को बींध दिया। तब क्रुद्ध सेनापति श्वेत ने बहुत-से लोहे के बाणों से भीष्म को
श्लोक 70 (6.48.70)
विव्याध समरे राजन्सर्वलोकस्य पश्यतः । ततः प्रव्यथितो राजा भीष्मं दृष्ट्वा निवारितम् ॥
vivyādha samare rājansarvalokasya paśyataḥ | tataḥ pravyathito rājā bhīṣmaṃ dṛṣṭvā nivāritam
हे राजन्, सबके देखते-देखते रण में बींध डाला। तब भीष्म को रोका गया देखकर राजा दुर्योधन बहुत व्यथित हुए,
श्लोक 71 (6.48.71)
प्रवीरं सर्वलोकस्य श्वेतेन युधि वै तदा । निष्ठानकश्च सुमहांस्तव सैन्यस्य चाभवत् ॥
pravīraṃ sarvalokasya śvetena yudhi vai tadā | niṣṭhānakaśca sumahāṃstava sainyasya cābhavat
समस्त लोक के श्रेष्ठ वीर को युद्ध में श्वेत द्वारा रोका गया देखकर; और आपकी सेना में बड़ा हाहाकार मच गया।
श्लोक 72 (6.48.72)
तं वीरं वारितं दृष्ट्वा श्वेतेन शरविक्षतम् । हतं श्वेतेन मन्यन्ते श्वेतस्य वशमागतम् ॥
taṃ vīraṃ vāritaṃ dṛṣṭvā śvetena śaravikṣatam | hataṃ śvetena manyante śvetasya vaśamāgatam
उस वीर को श्वेत द्वारा रोका गया और बाणों से घायल देखकर लोग समझने लगे कि श्वेत ने उन्हें मार डाला, वे श्वेत के वश में आ गए।
श्लोक 73 (6.48.73)
ततः क्रोधवशं प्राप्तः पिता देवव्रतस्तव । ध्वजमुन्मथितं दृष्ट्वा तां च सेनां निवारिताम् ॥
tataḥ krodhavaśaṃ prāptaḥ pitā devavratastava | dhvajamunmathitaṃ dṛṣṭvā tāṃ ca senāṃ nivāritām
तब आपके पिता देवव्रत क्रोध के वशीभूत हो गए; अपने ध्वज को गिरा और उस सेना को रुका हुआ देखकर
श्लोक 74 (6.48.74)
श्वेतं प्रति महाराज व्यसृजत्सायकान्बहून् । तानावार्य रणे श्वेतो भीष्मस्य रथिनां वरः ॥
śvetaṃ prati mahārāja vyasṛjatsāyakānbahūn | tānāvārya raṇe śveto bhīṣmasya rathināṃ varaḥ
हे महाराज, उन्होंने श्वेत पर बहुत-से बाण छोड़े। रथियों में श्रेष्ठ श्वेत ने रण में उन्हें रोककर
श्लोक 75 (6.48.75)
धनुश्चिच्छेद भल्लेन पुनरेव पितुस्तव । उत्सृज्य कार्मुकं राजन्गाङ्गेयः क्रोधमूर्च्छितः ॥
dhanuściccheda bhallena punareva pitustava | utsṛjya kārmukaṃ rājangāṅgeyaḥ krodhamūrcchitaḥ
भल्ल बाण से फिर आपके पिता भीष्म का धनुष काट डाला। हे राजन्, क्रोध से उन्मत्त गंगानन्दन ने वह धनुष फेंककर
श्लोक 76 (6.48.76)
अन्यत्कार्मुकमादाय विपुलं बलवत्तरम् । तत्र संधाय विपुलान्भल्लान्सप्त शिलाशितान् ॥
anyatkārmukamādāya vipulaṃ balavattaram | tatra saṃdhāya vipulānbhallānsapta śilāśitān
दूसरा बड़ा और अधिक बलवान धनुष उठाया, और उस पर पत्थर पर तेज किए हुए सात बड़े भल्ल बाण चढ़ाकर
श्लोक 77 (6.48.77)
चतुर्भिश्च जघानाश्वाञ्श्वेतस्य पृतनापतेः । ध्वजं द्वाभ्यां तु चिच्छेद सप्तमेन च सारथेः ॥
caturbhiśca jaghānāśvāñśvetasya pṛtanāpateḥ | dhvajaṃ dvābhyāṃ tu ciccheda saptamena ca sāratheḥ
चार से सेनापति श्वेत के घोड़ों को मार डाला, दो से उनका ध्वज काट गिराया, और सातवें
श्लोक 78 (6.48.78)
शिरश्चिच्छेद भल्लेन संक्रुद्धोऽलघुविक्रमः । हताश्वसूतात्स रथादवप्लुत्य महाबलः ॥
śiraściccheda bhallena saṃkruddho'laghuvikramaḥ | hatāśvasūtātsa rathādavaplutya mahābalaḥ
भल्ल से उस महापराक्रमी ने क्रोध में भरकर उनके सारथी का सिर काट डाला। घोड़ों और सारथी के मारे जाने पर महाबली श्वेत रथ से कूद पड़े,
श्लोक 79 (6.48.79)
अमर्षवशमापन्नो व्याकुलः समपद्यत । विरथं रथिनां श्रेष्ठं श्वेतं दृष्ट्वा पितामहः ॥
amarṣavaśamāpanno vyākulaḥ samapadyata | virathaṃ rathināṃ śreṣṭhaṃ śvetaṃ dṛṣṭvā pitāmahaḥ
वे क्रोध के वश में होकर व्याकुल हो उठे। रथियों में श्रेष्ठ श्वेत को रथहीन देखकर पितामह ने
श्लोक 80 (6.48.80)
ताडयामास निशितैः शरसङ्घैः समंततः । स ताड्यमानः समरे भीष्मचापच्युतैः शरैः ॥
tāḍayāmāsa niśitaiḥ śarasaṅghaiḥ samaṃtataḥ | sa tāḍyamānaḥ samare bhīṣmacāpacyutaiḥ śaraiḥ
तीखे बाणों की बौछारों से उन पर चारों ओर से प्रहार किया। रण में भीष्म के धनुष से छूटे बाणों की मार खाते हुए
श्लोक 81 (6.48.81)
स्वरथे धनुरुत्सृज्य शक्तिं जग्राह काञ्चनीम् । ततः शक्तिं रणे श्वेतो जग्राहोग्रं महाभयाम् ॥
svarathe dhanurutsṛjya śaktiṃ jagrāha kāñcanīm | tataḥ śaktiṃ raṇe śveto jagrāhograṃ mahābhayām
श्वेत ने अपना धनुष रथ पर छोड़ दिया और एक सोने की शक्ति उठा ली। तब श्वेत ने रण में उस अत्यन्त भयानक शक्ति को उग्रता से पकड़ा,
श्लोक 82 (6.48.82)
कालदण्डोपमां घोरां मृत्योर्जिह्वामेव श्वसन् । अब्रवीच्च तदा श्वेतो भीष्मं शान्तनवं रणे ॥
kāladaṇḍopamāṃ ghorāṃ mṛtyorjihvāmeva śvasan | abravīcca tadā śveto bhīṣmaṃ śāntanavaṃ raṇe
जो कालदण्ड के समान भयंकर, मानो मृत्यु की जीभ ही थी, और वे ज़ोर-ज़ोर से साँस ले रहे थे। तब श्वेत ने रण में शान्तनुनन्दन भीष्म से कहा:
श्लोक 83 (6.48.83)
तिष्ठेदानीं सुसंरब्धः पश्य मां पुरुषो भव । एवमुक्त्वा महेष्वासो भीष्मं युधि पराक्रमी ॥
tiṣṭhedānīṃ susaṃrabdhaḥ paśya māṃ puruṣo bhava | evamuktvā maheṣvāso bhīṣmaṃ yudhi parākramī
"अब क्रोध में भरकर ठहरो; मुझे देखो, पुरुष बनो!" युद्ध में भीष्म से ऐसा कहकर उस पराक्रमी महाधनुर्धर ने,
श्लोक 84 (6.48.84)
ततः शक्तिममेयात्मा चिक्षेप भुजगोपमाम् । पाण्डवार्थे पराक्रान्तस्तवानर्थं चिकीर्षुकः ॥
tataḥ śaktimameyātmā cikṣepa bhujagopamām | pāṇḍavārthe parākrāntastavānarthaṃ cikīrṣukaḥ
उस अपार आत्मबल वाले वीर ने, पाण्डवों के लिए पराक्रम करते हुए और आपका अनिष्ट करने की इच्छा से, सर्प के समान वह शक्ति चला दी।
श्लोक 85 (6.48.85)
हाहाकारो महानासीत्पुत्राणां ते विशांपते । दृष्ट्वा शक्तिं महाघोरां मृत्योर्दण्डसमप्रभाम् ॥
hāhākāro mahānāsītputrāṇāṃ te viśāṃpate | dṛṣṭvā śaktiṃ mahāghorāṃ mṛtyordaṇḍasamaprabhām
हे प्रजानाथ, मृत्यु के दण्ड के समान चमकती उस महाभयंकर शक्ति को देखकर आपके पुत्रों में बड़ा हाहाकार मच गया,
श्लोक 86 (6.48.86)
श्वेतस्य करनिर्मुक्तां निर्मुक्तोरगसन्निभाम् । अपतत्सहसा राजन्महोल्केव नभस्तलात् ॥
śvetasya karanirmuktāṃ nirmuktoragasannibhām | apatatsahasā rājanmaholkeva nabhastalāt
जो श्वेत के हाथ से छूटी थी और केंचुल छोड़े हुए सर्प के समान थी। हे राजन्, वह आकाश से गिरती बड़ी उल्का के समान सहसा गिरी,
श्लोक 87 (6.48.87)
ज्वलन्तीमन्तरिक्षे तां ज्वालाभिरिव संवृताम् । असंभ्रान्तस्तदा राजन्पिता देवव्रतस्तव ॥
jvalantīmantarikṣe tāṃ jvālābhiriva saṃvṛtām | asaṃbhrāntastadā rājanpitā devavratastava
अन्तरिक्ष में मानो ज्वालाओं से घिरी हुई जलती हुई। हे राजन्, तब आपके पिता देवव्रत ने बिना घबराए
श्लोक 88 (6.48.88)
अष्टभिर्नवभिर्भीष्मः शक्तिं चिच्छेद पत्रिभिः । उत्कृष्टहेमविकृतां निकृतां निशितैः शरैः ॥
aṣṭabhirnavabhirbhīṣmaḥ śaktiṃ ciccheda patribhiḥ | utkṛṣṭahemavikṛtāṃ nikṛtāṃ niśitaiḥ śaraiḥ
आठ-नौ पंखदार बाणों से उस शक्ति को काट डाला; उत्तम सोने से बनी वह शक्ति उनके तीखे बाणों से नीचे गिरा दी गई।
श्लोक 89 (6.48.89)
उच्चुक्रुशुस्ततः सर्वे तावका भरतर्षभ । शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा वैराटिः क्रोधमूर्च्छितः ॥
uccukruśustataḥ sarve tāvakā bharatarṣabha | śaktiṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā vairāṭiḥ krodhamūrcchitaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, तब आपके सभी योद्धा ज़ोर से गर्जना करने लगे। अपनी शक्ति को नष्ट हुआ देखकर क्रोध से उन्मत्त विराटपुत्र,
श्लोक 90 (6.48.90)
कालोपहतचेतास्तु कर्तव्यं नाभ्यजानत । क्रोधसंमूर्च्छितो राजन्वैराटिः प्रहसन्निव ॥
kālopahatacetāstu kartavyaṃ nābhyajānata | krodhasaṃmūrcchito rājanvairāṭiḥ prahasanniva
जिनकी बुद्धि काल ने हर ली थी, यह न समझ सके कि क्या करें। हे राजन्, क्रोध से मूर्च्छित-से विराटपुत्र ने मानो हँसते हुए
श्लोक 91 (6.48.91)
गदां जग्राह संहृष्टो भीष्मस्य निधनं प्रति । क्रोधेन रक्तनयनो दण्डपाणिरिवान्तकः ॥
gadāṃ jagrāha saṃhṛṣṭo bhīṣmasya nidhanaṃ prati | krodhena raktanayano daṇḍapāṇirivāntakaḥ
भीष्म का वध करने के लिए प्रसन्न होकर गदा उठा ली। क्रोध से लाल आँखें किए, हाथ में दण्ड लिए यमराज के समान
श्लोक 92 (6.48.92)
भीष्मं समभिदुद्राव जलौघ इव पर्वतम् । तस्य वेगमसंवार्यं मत्वा भीष्मः प्रतापवान् ॥
bhīṣmaṃ samabhidudrāva jalaugha iva parvatam | tasya vegamasaṃvāryaṃ matvā bhīṣmaḥ pratāpavān
वे भीष्म की ओर वैसे ही दौड़े जैसे जल का प्रवाह पर्वत की ओर। उनके वेग को रोकना असम्भव मानकर प्रतापी भीष्म
श्लोक 93 (6.48.93)
प्रहारविप्रमोक्षार्थं सहसा धरणींगतः । श्वेतः क्रोधसमाविष्टो भ्रामयित्वा तु तां गदाम् ॥
prahāravipramokṣārthaṃ sahasā dharaṇīṃgataḥ | śvetaḥ krodhasamāviṣṭo bhrāmayitvā tu tāṃ gadām
प्रहार से बचने के लिए सहसा धरती पर उतर गए। क्रोध में भरे श्वेत ने वह गदा घुमाकर
श्लोक 94 (6.48.94)
रथे भीष्मस्य चिक्षेप यथा देवो धनेश्वरः । तया भीष्मनिपातिन्या स रथो भस्मसात्कृतः ॥
rathe bhīṣmasya cikṣepa yathā devo dhaneśvaraḥ | tayā bhīṣmanipātinyā sa ratho bhasmasātkṛtaḥ
धनपति कुबेर के समान भीष्म के रथ पर फेंक दी। भीष्म को गिराने के लिए चलाई गई उस गदा से वह रथ भस्म हो गया,
श्लोक 95 (6.48.95)
सध्वजः सह सूतेन साश्वः सयुगबन्धुरः । विरथं रथिनां श्रेष्ठं भीष्मं दृष्ट्वा रथोत्तमाः ॥
sadhvajaḥ saha sūtena sāśvaḥ sayugabandhuraḥ | virathaṃ rathināṃ śreṣṭhaṃ bhīṣmaṃ dṛṣṭvā rathottamāḥ
ध्वज, सारथी, घोड़ों, जुए और ढाँचे सहित। रथियों में श्रेष्ठ भीष्म को रथहीन देखकर उत्तम रथी,
श्लोक 96 (6.48.96)
अभ्यधावन्त सहिताः शल्यप्रभृतयो रथाः । ततोऽन्यं रथमास्थाय धनुर्विस्फार्य दुर्मनाः ॥
abhyadhāvanta sahitāḥ śalyaprabhṛtayo rathāḥ | tato'nyaṃ rathamāsthāya dhanurvisphārya durmanāḥ
शल्य आदि, एक साथ दौड़ पड़े। तब दूसरे रथ पर चढ़कर, धनुष टंकारते हुए, खिन्न मन वाले
श्लोक 97 (6.48.97)
शनकैरभ्यायाच्छ्वेतं गाङ्गेयः प्रहसन्निव । एतस्मिन्नन्तरे भीष्मः शुश्राव विपुलां गिरम् ॥
śanakairabhyāyācchvetaṃ gāṅgeyaḥ prahasanniva | etasminnantare bhīṣmaḥ śuśrāva vipulāṃ giram
गंगानन्दन मानो मुस्कराते हुए धीरे-धीरे श्वेत की ओर बढ़े। इसी बीच भीष्म ने एक गम्भीर वाणी सुनी,
श्लोक 98 (6.48.98)
आकाशादीरितां दिव्यामात्मनो हितसंभवाम् । भीष्मभीष्म महाबाहो शीघ्रं यत्नं कुरुष्व वै ॥
ākāśādīritāṃ divyāmātmano hitasaṃbhavām | bhīṣmabhīṣma mahābāho śīghraṃ yatnaṃ kuruṣva vai
जो आकाश से कही गई दिव्य वाणी थी और उनके हित के लिए थी: "भीष्म, भीष्म, हे महाबाहो, शीघ्र प्रयत्न करो!
श्लोक 99 (6.48.99)
एष ह्यस्य जये कालो निर्दिष्टो विश्वयोनिना । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं देवदूतेन भाषितम् ॥
eṣa hyasya jaye kālo nirdiṣṭo viśvayoninā | etacchrutvā tu vacanaṃ devadūtena bhāṣitam
विश्व के स्रष्टा ने इसे जीतने का यही समय निश्चित किया है।" देवदूत के कहे हुए ये वचन सुनकर
श्लोक 100 (6.48.100)
संप्रहृष्टमना भूत्वा वधे तस्य मनो दधे । विरथं रथिनां श्रेष्ठं श्वेतं दृष्ट्वा पदातिनम् ॥
saṃprahṛṣṭamanā bhūtvā vadhe tasya mano dadhe | virathaṃ rathināṃ śreṣṭhaṃ śvetaṃ dṛṣṭvā padātinam
भीष्म का मन अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उन्होंने श्वेत के वध का निश्चय किया। रथियों में श्रेष्ठ श्वेत को रथहीन और पैदल देखकर
श्लोक 101 (6.48.101)
सहितास्त्वभ्यवर्तन्त परीप्सन्तो महारथाः । सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥
sahitāstvabhyavartanta parīpsanto mahārathāḥ | sātyakirbhīmasenaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ
उन्हें बचाने की इच्छा से महारथी एक साथ आगे बढ़े: सात्यकि, भीमसेन, पृषतवंशी धृष्टद्युम्न,
श्लोक 102 (6.48.102)
कैकेयो धृष्टकेतुश्च अभिमन्युश्च वीर्यवान् । एतानापततः सर्वान्द्रोणशल्यकृपैः सह ॥
kaikeyo dhṛṣṭaketuśca abhimanyuśca vīryavān | etānāpatataḥ sarvāndroṇaśalyakṛpaiḥ saha
कैकेय राजकुमार, धृष्टकेतु और पराक्रमी अभिमन्यु। इन सबको आते देखकर द्रोण, शल्य और कृप के साथ
श्लोक 103 (6.48.103)
अवारयदमेयात्मा वारिवेगानिवाचलः । स निरुद्धेषु सर्वेषु पाण्डवेषु महात्मसु ॥
avārayadameyātmā vārivegānivācalaḥ | sa niruddheṣu sarveṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu
उस अपार आत्मबल वाले भीष्म ने उन्हें वैसे ही रोक दिया जैसे पर्वत जल के वेग को रोकता है। जब सभी महात्मा पाण्डव रोक दिए गए,
श्लोक 104 (6.48.104)
श्वेतः खड्गमथाकृष्य भीष्मस्य धनुराच्छिनत् । तदपास्य धनुश्छिन्नं त्वरमाणः पितामहः ॥
śvetaḥ khaḍgamathākṛṣya bhīṣmasya dhanurācchinat | tadapāsya dhanuśchinnaṃ tvaramāṇaḥ pitāmahaḥ
तब श्वेत ने तलवार खींचकर भीष्म का धनुष काट डाला। कटे हुए धनुष को फेंककर पितामह ने शीघ्रता से,
श्लोक 105 (6.48.105)
देवदूतवचः श्रुत्वा वधे तस्य मनो दधे । ततः प्रचरमाणस्तु पिता देवव्रतस्तव ॥
devadūtavacaḥ śrutvā vadhe tasya mano dadhe | tataḥ pracaramāṇastu pitā devavratastava
देवदूत के वचन सुनकर, श्वेत के वध का निश्चय किया। तब रणभूमि में विचरते हुए आपके पिता देवव्रत ने
श्लोक 106 (6.48.106)
अन्यत्कार्मुकमादाय त्वरमाणो महारथः । क्षणेन सज्यमकरोच्छक्रचापसमप्रभम् ॥
anyatkārmukamādāya tvaramāṇo mahārathaḥ | kṣaṇena sajyamakarocchakracāpasamaprabham
शीघ्रता से दूसरा धनुष उठाया, और उस महारथी ने क्षण भर में इन्द्रधनुष के समान चमकने वाले उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी।
श्लोक 107 (6.48.107)
पिता ते भरतश्रेष्ठ श्वेतं दृष्ट्वा महारथैः । वृतं तं मनुजव्याघ्रैर्भीमसेनपुरोगमैः ॥
pitā te bharataśreṣṭha śvetaṃ dṛṣṭvā mahārathaiḥ | vṛtaṃ taṃ manujavyāghrairbhīmasenapurogamaiḥ
हे भरतश्रेष्ठ, आपके पिता ने श्वेत को भीमसेन आदि पुरुषसिंह महारथियों से घिरा देखकर,
श्लोक 108 (6.48.108)
अभ्यवर्तत गाङ्गेयः श्वेतं सेनापतिं द्रुतम् । आपतन्तं ततो भीष्मो भीमसेनं प्रतापवान् ॥
abhyavartata gāṅgeyaḥ śvetaṃ senāpatiṃ drutam | āpatantaṃ tato bhīṣmo bhīmasenaṃ pratāpavān
गंगानन्दन भीष्म सेनापति श्वेत की ओर तेज़ी से बढ़े। तब अपनी ओर आते हुए भीमसेन को प्रतापी भीष्म ने,
श्लोक 109 (6.48.109)
आजघ्ने विशिखैः षष्ट्या सेनान्यं स महारथः । अभिमन्युं च समरे पिता देवव्रतस्तव ॥
ājaghne viśikhaiḥ ṣaṣṭyā senānyaṃ sa mahārathaḥ | abhimanyuṃ ca samare pitā devavratastava
उस महारथी ने, उस सेनानायक को साठ बाणों से घायल किया। और आपके पिता देवव्रत ने युद्ध में अभिमन्यु को
श्लोक 110 (6.48.110)
आजघ्ने भरतश्रेष्ठस्त्रिभिः सन्नतपर्वभिः । सात्यकिं च शतेनाजौ भरतानां पितामहः ॥
ājaghne bharataśreṣṭhastribhiḥ sannataparvabhiḥ | sātyakiṃ ca śatenājau bharatānāṃ pitāmahaḥ
भरतश्रेष्ठ ने झुकी गाँठों वाले तीन बाणों से घायल किया; भरतवंशियों के पितामह ने रण में सात्यकि को सौ बाणों से,
श्लोक 111 (6.48.111)
धृष्टद्युम्नं च विंशत्या कैकेयं चापि पञ्चभिः । तांश्च सर्वान्महेष्वासान्पिता देवव्रतस्तव ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ ca viṃśatyā kaikeyaṃ cāpi pañcabhiḥ | tāṃśca sarvānmaheṣvāsānpitā devavratastava
धृष्टद्युम्न को बीस से और कैकेय को पाँच बाणों से बींधा। उन सभी महाधनुर्धरों को भयंकर बाणों से रोककर आपके पिता देवव्रत
श्लोक 112 (6.48.112)
वारयित्वा शरैर्घोरैः श्वेतमेवाभिदुद्रुवे । ततः शरं मृत्युसमं भारसाधनमुत्तमम् ॥
vārayitvā śarairghoraiḥ śvetamevābhidudruve | tataḥ śaraṃ mṛtyusamaṃ bhārasādhanamuttamam
केवल श्वेत की ओर दौड़े। तब बलवान भीष्म ने मृत्यु के समान, भारी कार्य सिद्ध करने वाला एक उत्तम बाण
श्लोक 113 (6.48.113)
विकृष्य बलवान्भीष्मः समाधत्त दुरासदम् । ब्रह्मास्त्रेण सुसंयुक्तं तं शरं लोमवाहिनम् ॥
vikṛṣya balavānbhīṣmaḥ samādhatta durāsadam | brahmāstreṇa susaṃyuktaṃ taṃ śaraṃ lomavāhinam
धनुष खींचकर चढ़ाया, जिसका सामना करना कठिन था। ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित उस पंखदार बाण को
श्लोक 114 (6.48.114)
ददृशुर्देवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः । स तस्य कवचं भित्त्वा हृदयं चामितौजसः ॥
dadṛśurdevagandharvāḥ piśācoragarākṣasāḥ | sa tasya kavacaṃ bhittvā hṛdayaṃ cāmitaujasaḥ
देवताओं, गन्धर्वों, पिशाचों, नागों और राक्षसों ने देखा। उस अपरिमित तेज वाले वीर का कवच और हृदय भेदकर
श्लोक 115 (6.48.115)
जगाम धरणीं बाणो महाशनिरिव ज्वलन् । अस्तं गच्छन्यथाऽऽदित्यः प्रभामादाय सत्वरः ॥
jagāma dharaṇīṃ bāṇo mahāśaniriva jvalan | astaṃ gacchanyathā''dityaḥ prabhāmādāya satvaraḥ
वह बाण महान वज्र के समान जलता हुआ धरती में समा गया। जैसे अस्त होता सूर्य अपनी प्रभा लेकर शीघ्र चला जाता है,
श्लोक 116 (6.48.116)
एवं जीवितमादाय श्वेतदेहाज्जगाम ह । तं भीष्मेण नरव्याघ्रं तथा विनिहतं युधि ॥
evaṃ jīvitamādāya śvetadehājjagāma ha | taṃ bhīṣmeṇa naravyāghraṃ tathā vinihataṃ yudhi
वैसे ही वह श्वेत के प्राण लेकर उनके शरीर से निकल गया। भीष्म द्वारा युद्ध में इस प्रकार मारे गए उस पुरुषसिंह को
श्लोक 117 (6.48.117)
प्रपतन्तमपश्याम गिरेः शृङ्गमिव च्युतम् । अशोचन्पाण्डवास्तत्र क्षत्रियाश्च महारथाः ॥
prapatantamapaśyāma gireḥ śṛṅgamiva cyutam | aśocanpāṇḍavāstatra kṣatriyāśca mahārathāḥ
हमने पर्वत से टूटकर गिरते शिखर के समान गिरते देखा। वहाँ पाण्डव और क्षत्रिय महारथी शोक करने लगे,
श्लोक 118 (6.48.118)
प्रहृष्टाश्च सुतास्तुभ्यं कुरवश्चापि सर्वशः । ततो दुःशासनो राजञ्श्वेतं दृष्ट्वा निपातितम् ॥
prahṛṣṭāśca sutāstubhyaṃ kuravaścāpi sarvaśaḥ | tato duḥśāsano rājañśvetaṃ dṛṣṭvā nipātitam
और आपके पुत्र तथा सभी कौरव हर्षित हुए। हे राजन्, तब श्वेत को गिरा हुआ देखकर दुःशासन
श्लोक 119 (6.48.119)
वादित्रनिनदैर्घोरैर्नृत्यति स्म समंततः । तस्मिन्हते महेष्वासे भीष्मेणाहवशोभिना ॥
vāditraninadairghorairnṛtyati sma samaṃtataḥ | tasminhate maheṣvāse bhīṣmeṇāhavaśobhinā
बाजों की भयंकर ध्वनि के बीच चारों ओर नाचने लगा। रणभूमि की शोभा भीष्म द्वारा उस महाधनुर्धर के मारे जाने पर
श्लोक 120 (6.48.120)
प्रावेपन्त महेष्वासाः शिखण्डिप्रमुखा रथाः । ततो धनंजयो राजन्वार्ष्णेयश्चापि सर्वशः ॥
prāvepanta maheṣvāsāḥ śikhaṇḍipramukhā rathāḥ | tato dhanaṃjayo rājanvārṣṇeyaścāpi sarvaśaḥ
शिखण्डी आदि महाधनुर्धर रथी काँप उठे। हे राजन्, तब धनञ्जय अर्जुन और वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण ने भी
श्लोक 121 (6.48.121)
अवहारं शनैश्चक्रुर्निहते वाहिनीपतौ । ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत ॥
avahāraṃ śanaiścakrurnihate vāhinīpatau | tato'vahāraḥ sainyānāṃ tava teṣāṃ ca bhārata
सेनापति के मारे जाने पर धीरे-धीरे सेनाओं को युद्ध से लौटा लिया। हे भारत, तब आपकी और उनकी सेनाएँ लौट गईं,
श्लोक 122 (6.48.122)
तावकानां परेषां च नर्दतां च मुहुर्मुहुः । पार्था विमनसो भूत्वा न्यवर्तन्त महारथाः । चिन्तयन्तो वधं घोरं द्वैरथेन परंतपाः ॥
tāvakānāṃ pareṣāṃ ca nardatāṃ ca muhurmuhuḥ | pārthā vimanaso bhūtvā nyavartanta mahārathāḥ | cintayanto vadhaṃ ghoraṃ dvairathena paraṃtapāḥ
आपके और शत्रु-पक्ष के योद्धा बार-बार गर्जना कर रहे थे। शत्रुओं को तपाने वाले महारथी कुन्तीपुत्र उस द्वन्द्व-युद्ध में हुए भयंकर वध का चिन्तन करते हुए खिन्न मन से लौट गए।