भीष्म पर्व · अध्याय 49
शङ्ख का आक्रमण और भीष्म का प्रहार: पहले दिन का अन्त
श्वेत की मृत्यु का समाचार सुनकर विचलित धृतराष्ट्र पूछते हैं कि उसके बाद पाण्डवों और धृष्टद्युम्न ने क्या किया; वे उस युद्ध के लिए अपने पुत्र को दोष देते हैं जिसे दुर्योधन और उसके साथियों के सिवा कोई नहीं चाहता था, और सञ्जय से पूरा वृत्तान्त सुनाने को कहते हैं। सञ्जय कहते हैं कि दोष उन्हीं का है और अब पछताना व्यर्थ है; फिर वे बताते हैं कि श्वेत का भाई शङ्ख शल्य पर टूट पड़ा, भीष्म शङ्ख पर चढ़ आए और अर्जुन ने उसकी रक्षा की, और फिर भीष्म ने सूर्यास्त तक द्रुपद की सेना और समूची पाण्डव-सेना का संहार किया, जब पाण्डवों ने अपनी सेनाएँ लौटा लीं और पहले दिन का युद्ध समाप्त हुआ।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.49.1)
श्वेते सेनापतौ तात संग्रामे निहते परैः । किमकुर्वन्महेष्वासाः पाञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥
śvete senāpatau tāta saṃgrāme nihate paraiḥ | kimakurvanmaheṣvāsāḥ pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha
हे तात, जब शत्रुओं ने युद्ध में सेनापति श्वेत को मार गिराया, तब पाण्डवों के साथ पाञ्चाल महाधनुर्धरों ने क्या किया?
श्लोक 2 (6.49.2)
सेनापतिं समाकर्ण्य श्वेतं युधि निपातितम् । तदर्थं यततां चापि परेषां प्रपलायिनाम् ॥
senāpatiṃ samākarṇya śvetaṃ yudhi nipātitam | tadarthaṃ yatatāṃ cāpi pareṣāṃ prapalāyinām
उन्होंने सुना कि उनका सेनापति श्वेत युद्ध में मार गिराया गया; और जो शत्रु उसके लिए जूझे और फिर भाग खड़े हुए —
श्लोक 3 (6.49.3)
मनः प्रीणाति मे वाक्यं जयं संजय शृण्वतः । प्रत्युपायं चिन्तयन्तः सज्जनाः प्रस्रवन्ति मे ॥
manaḥ prīṇāti me vākyaṃ jayaṃ saṃjaya śṛṇvataḥ | pratyupāyaṃ cintayantaḥ sajjanāḥ prasravanti me
हे सञ्जय, विजय का समाचार सुनते हुए वह वृत्तान्त मेरे मन को प्रसन्न करता है। फिर भी जब सोचता हूँ कि सज्जन कोई प्रत्युपाय सोच रहे होंगे, तो मेरा हृदय पिघल जाता है।
श्लोक 4 (6.49.4)
स हि वीरोऽनुरक्तश्च वृद्धः कुरुपतिस्तदा । कृतं वैरं सदा तेन पितुः पुत्रेण धीमता ॥
sa hi vīro'nuraktaśca vṛddhaḥ kurupatistadā | kṛtaṃ vairaṃ sadā tena pituḥ putreṇa dhīmatā
वह वीर था और निष्ठावान भी, और उस समय कुरुओं के वृद्ध स्वामी वहाँ उपस्थित थे। उस बुद्धिमान पुत्र का अपने पिता से सदा वैर रहा था।
श्लोक 5 (6.49.5)
तस्योद्वेगभयाच्चापि संश्रितः पाण्डवान्पुरा । सर्वं बलं परित्यज्य दुर्गं संश्रित्य तिष्ठति ॥
tasyodvegabhayāccāpi saṃśritaḥ pāṇḍavānpurā | sarvaṃ balaṃ parityajya durgaṃ saṃśritya tiṣṭhati
पिता की अप्रसन्नता के भय से उसने बहुत पहले पाण्डवों की शरण ली थी; अपनी सारी सेना छोड़कर वह एक दुर्ग का आश्रय लेकर रहता था।
श्लोक 6 (6.49.6)
पाण्डवानां प्रतापेन दुर्गं देशं निवेश्य च । सपत्नान्सततं बाधन्नार्यवृत्तिमनुष्ठितः ॥
pāṇḍavānāṃ pratāpena durgaṃ deśaṃ niveśya ca | sapatnānsatataṃ bādhannāryavṛttimanuṣṭhitaḥ
पाण्डवों के प्रताप से उसने एक सुरक्षित, दुर्गम देश बसाया और अपने शत्रुओं को निरन्तर पीड़ित करते हुए आर्यों के आचरण का पालन किया।
श्लोक 7 (6.49.7)
आश्चर्यं वै सदा तेषां पुरा राज्ञां सुदुर्मतिः । ततो युधिष्ठिरे भक्तः कथं सञ्जय सूदितः ॥
āścaryaṃ vai sadā teṣāṃ purā rājñāṃ sudurmatiḥ | tato yudhiṣṭhire bhaktaḥ kathaṃ sañjaya sūditaḥ
वह उन पुराने राजाओं के लिए सदा एक आश्चर्य रहा — पहले अत्यन्त दुर्बुद्धि, फिर युधिष्ठिर का भक्त। हे सञ्जय, वह कैसे मारा गया?
श्लोक 8 (6.49.8)
प्रक्षिप्तः संमतः क्षुद्रः पुत्रो मे पुरुषाधमः । न युद्धं रोचयेद्भीष्मो न चाचार्यः कथंचन ॥
prakṣiptaḥ saṃmataḥ kṣudraḥ putro me puruṣādhamaḥ | na yuddhaṃ rocayedbhīṣmo na cācāryaḥ kathaṃcana
मेरा पुत्र उतावला, आत्मसंतुष्ट, क्षुद्र और पुरुषों में अधम है। भीष्म युद्ध को कभी पसन्द नहीं करते, न आचार्य द्रोण किसी प्रकार,
श्लोक 9 (6.49.9)
न कृपो न च गान्धारी नाहं सञ्जय रोचये । न वासुदेवो वार्ष्णेयो धर्मराजश्च पाण्डवः ॥
na kṛpo na ca gāndhārī nāhaṃ sañjaya rocaye | na vāsudevo vārṣṇeyo dharmarājaśca pāṇḍavaḥ
न कृपाचार्य, न गान्धारी; हे सञ्जय, मैं भी इसे नहीं चाहता; न वृष्णिवंशी वासुदेव, न पाण्डुपुत्र धर्मराज;
श्लोक 10 (6.49.10)
न भीमो नार्जुनश्चैव न यमौ पुरुषर्षभौ । वार्यमाणो मया नित्यं गान्धार्या विदुरेण च ॥
na bhīmo nārjunaścaiva na yamau puruṣarṣabhau | vāryamāṇo mayā nityaṃ gāndhāryā vidureṇa ca
न भीम, न अर्जुन, न पुरुषश्रेष्ठ नकुल-सहदेव। फिर भी मेरे, गान्धारी के और विदुर के बार-बार रोकने पर भी,
श्लोक 11 (6.49.11)
जामदग्न्येन रामेण व्यासेन च महात्मना । दुर्योधनो युध्यमानो नित्यमेव हि सञ्जय ॥
jāmadagnyena rāmeṇa vyāsena ca mahātmanā | duryodhano yudhyamāno nityameva hi sañjaya
जमदग्निपुत्र परशुराम और महात्मा व्यास के रोकने पर भी, हे सञ्जय, दुर्योधन सदा युद्ध पर ही तुला रहा।
श्लोक 12 (6.49.12)
कर्णस्य मतमास्थाय सौबलस्य च पापकृत् । दुःशासनस्य च तथा पाण्डवान्नान्वचिन्तयत् ॥
karṇasya matamāsthāya saubalasya ca pāpakṛt | duḥśāsanasya ca tathā pāṇḍavānnānvacintayat
कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि और दुःशासन की सम्मति पर चलते हुए उस पापी ने पाण्डवों का कुछ भी विचार नहीं किया।
श्लोक 13 (6.49.13)
तस्याहं व्यसनं घोरं मन्ये प्राप्तं तु सञ्जय । श्वेतस्य च विनाशेन भीष्मस्य विजयेन च ॥
tasyāhaṃ vyasanaṃ ghoraṃ manye prāptaṃ tu sañjaya | śvetasya ca vināśena bhīṣmasya vijayena ca
हे सञ्जय, मुझे लगता है कि श्वेत के विनाश और भीष्म की विजय से अब उस पर घोर विपत्ति आ पड़ी है।
श्लोक 14 (6.49.14)
संक्रुद्धः कृष्णसहितः पार्थः किमकरोद्युधि । अर्जुनाद्धि भयं भूयस्तन्मे तात न शाम्यति ॥
saṃkruddhaḥ kṛṣṇasahitaḥ pārthaḥ kimakarodyudhi | arjunāddhi bhayaṃ bhūyastanme tāta na śāmyati
क्रोध से भरे हुए अर्जुन ने श्रीकृष्ण के साथ युद्ध में क्या किया? हे तात, मुझे अर्जुन से और भी अधिक भय है, और वह शान्त नहीं होता।
श्लोक 15 (6.49.15)
स हि शूरश्च कौन्तेयः क्षिप्रकारी धनंजयः । मन्ये शरैः शरीराणि शत्रूणां प्रमथिष्यति ॥
sa hi śūraśca kaunteyaḥ kṣiprakārī dhanaṃjayaḥ | manye śaraiḥ śarīrāṇi śatrūṇāṃ pramathiṣyati
क्योंकि कुन्तीपुत्र धनञ्जय शूर है और शीघ्रता से काम करने वाला है; मुझे लगता है कि वह अपने बाणों से शत्रुओं के शरीर मथ डालेगा।
श्लोक 16 (6.49.16)
ऐन्द्रिमिन्द्रानुजसमं महेन्द्रसदृशं बले । अमोघक्रोधसंकल्पं दृष्ट्वा वः किमभून्मनः ॥
aindrimindrānujasamaṃ mahendrasadṛśaṃ bale | amoghakrodhasaṃkalpaṃ dṛṣṭvā vaḥ kimabhūnmanaḥ
इन्द्र के अनुज विष्णु के समान, बल में महेन्द्र के तुल्य, जिसका क्रोध और संकल्प कभी व्यर्थ नहीं जाता, उस इन्द्रपुत्र अर्जुन को देखकर तुम लोगों के मन की क्या दशा हुई?
श्लोक 17 (6.49.17)
तथैव वेदविच्छूरो ज्वलनार्कसमद्युतिः । इन्द्रास्त्रविदमेयात्मा प्रपतन्समितिंजयः ॥
tathaiva vedavicchūro jvalanārkasamadyutiḥ | indrāstravidameyātmā prapatansamitiṃjayaḥ
और इसी प्रकार वह वेदों का ज्ञाता शूरवीर, जो अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी है, इन्द्र के अस्त्र को जानने वाला, अपार आत्मबल वाला, संग्राम में विजयी, आगे बढ़ता हुआ,
श्लोक 18 (6.49.18)
वज्रसंस्पर्शरूपाणामस्त्राणां च प्रयोजकः । सखड्गाक्षेपहस्तस्तु घोषं चक्रे महारथः ॥
vajrasaṃsparśarūpāṇāmastrāṇāṃ ca prayojakaḥ | sakhaḍgākṣepahastastu ghoṣaṃ cakre mahārathaḥ
वज्र के स्पर्श-सरीखे अस्त्रों का प्रयोग करने वाला, वह महारथी जिसने हाथ में तलवार उठाकर गर्जना की —
श्लोक 19 (6.49.19)
स सञ्जय महाप्राज्ञो द्रुपदस्यात्मजो बली । धृष्टद्युम्नः किमकरोच्छ्वेते युधि निपातिते ॥
sa sañjaya mahāprājño drupadasyātmajo balī | dhṛṣṭadyumnaḥ kimakarocchvete yudhi nipātite
हे सञ्जय, द्रुपद के उस महाबुद्धिमान, बलवान पुत्र धृष्टद्युम्न ने युद्ध में श्वेत के गिर जाने पर क्या किया?
श्लोक 20 (6.49.20)
पुरा चैवापराधेन वधेन च चमूपतेः । मन्ये मनः प्रजज्वाल पाण्डवानां महात्मनाम् ॥
purā caivāparādhena vadhena ca camūpateḥ | manye manaḥ prajajvāla pāṇḍavānāṃ mahātmanām
पहले किए गए अपराधों से और अब अपने सेनापति के वध से, मुझे लगता है, महात्मा पाण्डवों के मन धधक उठे होंगे।
श्लोक 21 (6.49.21)
तेषां क्रोधं चिन्तयंस्तु अहःसु च निशासु च । न शान्तिमधिगच्छामि दुर्योधनकृतेन हि । कथं चाभून्महायुद्धं सर्वमाचक्ष्व सञ्जय ॥
teṣāṃ krodhaṃ cintayaṃstu ahaḥsu ca niśāsu ca | na śāntimadhigacchāmi duryodhanakṛtena hi | kathaṃ cābhūnmahāyuddhaṃ sarvamācakṣva sañjaya
दिन-रात उनके क्रोध के बारे में सोचते हुए मुझे दुर्योधन के किए के कारण शान्ति नहीं मिलती। वह महायुद्ध कैसे हुआ? हे सञ्जय, मुझे सब कुछ बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 22 (6.49.22)
शृणु राजन्स्थिरो भूत्वा तवापनयनो महान् । न च दुर्योधने दोषमिमामाधातुमर्हसि ॥
śṛṇu rājansthiro bhūtvā tavāpanayano mahān | na ca duryodhane doṣamimāmādhātumarhasi
हे राजन्, स्थिर होकर सुनिए: यह बड़ी भूल आपकी अपनी नीति की है। इसका दोष आपको दुर्योधन पर नहीं डालना चाहिए।
श्लोक 23 (6.49.23)
गतोदके सेतुबन्धो यादृक्तादृङ्मतिस्तव । संदीप्ते भवने यद्वत्कूपस्य खननं तथा ॥
gatodake setubandho yādṛktādṛṅmatistava | saṃdīpte bhavane yadvatkūpasya khananaṃ tathā
आपका यह सोच-विचार वैसा ही है जैसे पानी बह जाने के बाद बाँध बाँधना, या घर में आग लग जाने पर कुआँ खोदना।
श्लोक 24 (6.49.24)
गतपूर्वाह्णभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि दारुणे । तावकानां परेषां च पुनर्युद्धमवर्तत ॥
gatapūrvāhṇabhūyiṣṭhe tasminnahani dāruṇe | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca punaryuddhamavartata
उस भयानक दिन, जब पूर्वाह्न का अधिकांश भाग बीत चुका था, आपके योद्धाओं और शत्रुओं के बीच फिर से युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 25 (6.49.25)
श्वेतं तु निहतं दृष्ट्वा विराटस्य चमूपतिम् । कृतवर्मणा च सहितं दृष्ट्वा शल्यमवस्थितम् ॥
śvetaṃ tu nihataṃ dṛṣṭvā virāṭasya camūpatim | kṛtavarmaṇā ca sahitaṃ dṛṣṭvā śalyamavasthitam
विराट के सेनापति श्वेत को मारा गया देखकर, और शल्य को कृतवर्मा के साथ खड़ा देखकर,
श्लोक 26 (6.49.26)
शङ्खः क्रोधात्प्रजज्वाल हविषा हव्यवाडिव । स विस्फार्य महच्चापं शक्रचापोपमं बली ॥
śaṅkhaḥ krodhātprajajvāla haviṣā havyavāḍiva | sa visphārya mahaccāpaṃ śakracāpopamaṃ balī
शङ्ख क्रोध से वैसे ही धधक उठा जैसे घी की आहुति से अग्नि। इन्द्रधनुष के समान अपने विशाल धनुष को तानकर वह बलवान योद्धा
श्लोक 27 (6.49.27)
अभ्यधावज्जिघांसन्वै शल्यं मद्राधिपं युधि । महता रथसङ्घेन समन्तात्परिरक्षितः ॥
abhyadhāvajjighāṃsanvai śalyaṃ madrādhipaṃ yudhi | mahatā rathasaṅghena samantātparirakṣitaḥ
मद्रराज शल्य को मार डालने की इच्छा से युद्ध में उस पर टूट पड़ा; रथों का एक विशाल समूह चारों ओर से उसकी रक्षा कर रहा था।
श्लोक 28 (6.49.28)
सृजन्बाणमयं वर्षं प्रायाच्छल्यरथं प्रति । तमापतन्तं संप्रेक्ष्य मत्तवारणविक्रमम् ॥
sṛjanbāṇamayaṃ varṣaṃ prāyācchalyarathaṃ prati | tamāpatantaṃ saṃprekṣya mattavāraṇavikramam
बाणों की वर्षा करता हुआ वह शल्य के रथ की ओर बढ़ा। मतवाले हाथी के समान पराक्रम से उसे आते देखकर
श्लोक 29 (6.49.29)
तावकानां रथाः सप्त समन्तात्पर्यवारयन् । मद्रराजं परीप्सन्तो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतम् ॥
tāvakānāṃ rathāḥ sapta samantātparyavārayan | madrarājaṃ parīpsanto mṛtyordaṃṣṭrāntaraṃ gatam
आपके सात रथियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया; वे मद्रराज को बचाना चाहते थे, जो मानो मृत्यु की दाढ़ों के बीच जा पहुँचा था —
श्लोक 30 (6.49.30)
बृहद्बलश्च कौसल्यो जयत्सेनश्च मागधः । तथा रुक्मरथो राजन्पुत्रः शल्यस्य मानितः ॥
bṛhadbalaśca kausalyo jayatsenaśca māgadhaḥ | tathā rukmaratho rājanputraḥ śalyasya mānitaḥ
कोसलराज बृहद्बल, मगधराज जयत्सेन, और हे राजन्, शल्य का सम्मानित पुत्र रुक्मरथ;
श्लोक 31 (6.49.31)
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्भोजश्च सुदक्षिणः । बृहत्क्षत्रस्य दायादः सैन्धवश्च जयद्रथः ॥
vindānuvindāvāvantyau kāmbhojaśca sudakṣiṇaḥ | bṛhatkṣatrasya dāyādaḥ saindhavaśca jayadrathaḥ
अवन्ती के विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण, बृहत्क्षत्र का उत्तराधिकारी, और सिन्धुराज जयद्रथ।
श्लोक 32 (6.49.32)
नानाधातुविचित्राणि कार्मुकाणि महात्मनाम् । विस्फारितान्यदृश्यन्त तोयदेष्विव विद्युतः ॥
nānādhātuvicitrāṇi kārmukāṇi mahātmanām | visphāritānyadṛśyanta toyadeṣviva vidyutaḥ
उन महात्माओं के अनेक धातुओं के रंगों से चित्रित धनुष खिंचे हुए ऐसे दिखाई दिए जैसे बादलों में बिजली।
श्लोक 33 (6.49.33)
ते तु बाणमयं वर्षं शङ्खमूर्ध्नि न्यपातयन् । निदाघान्तेऽनिलोद्धृता मेघा इव नगे जलम् ॥
te tu bāṇamayaṃ varṣaṃ śaṅkhamūrdhni nyapātayan | nidāghānte'niloddhṛtā meghā iva nage jalam
उन्होंने शङ्ख के सिर पर बाणों की वर्षा की, जैसे ग्रीष्म के अन्त में वायु से उड़ाए गए मेघ पर्वत पर जल बरसाते हैं।
श्लोक 34 (6.49.34)
ततः क्रुद्धो महेष्वासः सप्तभल्लैः सुतेजनैः । धनूंषि तेषामाच्छिद्य ननर्द पृतनापतिः ॥
tataḥ kruddho maheṣvāsaḥ saptabhallaiḥ sutejanaiḥ | dhanūṃṣi teṣāmācchidya nanarda pṛtanāpatiḥ
तब उस क्रुद्ध महाधनुर्धर सेनानायक ने सात पैने भल्ल बाणों से उनके धनुष काट डाले और गर्जना की।
श्लोक 35 (6.49.35)
ततो भीष्मो महाबाहुर्विनद्य जलदो यथा । तालमात्रं धनुर्गृह्य शङ्खमभ्यद्रवद्रणे ॥
tato bhīṣmo mahābāhurvinadya jalado yathā | tālamātraṃ dhanurgṛhya śaṅkhamabhyadravadraṇe
तब महाबाहु भीष्म मेघ के समान गर्जना करके ताड़ के बराबर ऊँचा धनुष लेकर रणभूमि में शङ्ख की ओर दौड़े।
श्लोक 36 (6.49.36)
तमुद्यन्तमुदीक्ष्याथ महेष्वासं महाबलम् । संत्रस्ता पाण्डवी सेना वातवेगहतेव नौः ॥
tamudyantamudīkṣyātha maheṣvāsaṃ mahābalam | saṃtrastā pāṇḍavī senā vātavegahateva nauḥ
उस महाबली महाधनुर्धर को आक्रमण के लिए उठा देखकर पाण्डव-सेना आँधी के थपेड़े खाई नाव की तरह काँप उठी।
श्लोक 37 (6.49.37)
ततोऽर्जुनः संत्वरितः शङ्खस्यासीत्पुरःसरः । भीष्माद्रक्ष्योऽयमद्येति ततो युद्धमवर्तत ॥
tato'rjunaḥ saṃtvaritaḥ śaṅkhasyāsītpuraḥsaraḥ | bhīṣmādrakṣyo'yamadyeti tato yuddhamavartata
तब अर्जुन तुरन्त शङ्ख के आगे आ खड़े हुए, यह सोचकर कि "आज इसकी भीष्म से रक्षा करनी है"; और फिर युद्ध आरम्भ हुआ।
श्लोक 38 (6.49.38)
हाहाकारो महानासीद्योधानां युधि युध्यताम् । तेजस्तेजसि संपृक्तमित्येवं विस्मयं ययुः ॥
hāhākāro mahānāsīdyodhānāṃ yudhi yudhyatām | tejastejasi saṃpṛktamityevaṃ vismayaṃ yayuḥ
वहाँ लड़ते हुए योद्धाओं में बड़ा कोलाहल मच गया। "तेज से तेज टकराया है" — ऐसा कहते हुए वे विस्मित हो गए।
श्लोक 39 (6.49.39)
अथ शल्यो गदापाणिरवतीर्य महारथात् । शङ्खस्य चतुरो वाहानहनद्भरतर्षभ ॥
atha śalyo gadāpāṇiravatīrya mahārathāt | śaṅkhasya caturo vāhānahanadbharatarṣabha
तब हे भरतश्रेष्ठ, शल्य ने हाथ में गदा लेकर अपने विशाल रथ से उतरकर शङ्ख के चारों घोड़े मार डाले।
श्लोक 40 (6.49.40)
स हताश्वाद्रथात्तूर्णं खड्गमादाय विद्रुतः । बीभत्सोश्च रथं प्राप्य पुनः शान्तिमविन्दत ॥
sa hatāśvādrathāttūrṇaṃ khaḍgamādāya vidrutaḥ | bībhatsośca rathaṃ prāpya punaḥ śāntimavindata
घोड़े मारे जाने पर शङ्ख तुरन्त रथ से कूदकर तलवार लिए दौड़ा और बीभत्सु (अर्जुन) के रथ पर पहुँचकर फिर निश्चिन्त हुआ।
श्लोक 41 (6.49.41)
ततो भीष्मरथात्तूर्णमुत्पतन्ति पतत्रिणः । यैरन्तरीक्षं भूमिश्च सर्वतः समवस्तृता ॥
tato bhīṣmarathāttūrṇamutpatanti patatriṇaḥ | yairantarīkṣaṃ bhūmiśca sarvataḥ samavastṛtā
तब भीष्म के रथ से तेजी से पंखधारी बाण उड़ने लगे, जिनसे आकाश और पृथ्वी सब ओर से ढक गए।
श्लोक 42 (6.49.42)
पञ्चालानथ मत्स्यांश्च केकयांश्च प्रभद्रकान् । भीष्मः प्रहरतां श्रेष्ठः पातयामास पत्रिभिः ॥
pañcālānatha matsyāṃśca kekayāṃśca prabhadrakān | bhīṣmaḥ praharatāṃ śreṣṭhaḥ pātayāmāsa patribhiḥ
योद्धाओं में श्रेष्ठ भीष्म ने अपने पंखदार बाणों से पाञ्चालों, मत्स्यों, केकयों और प्रभद्रकों को मार गिराया।
श्लोक 43 (6.49.43)
उत्सृज्य समरे राजन्पाण्डवं सव्यसाचिनम् । अभ्यद्रवत पाञ्चाल्यं द्रुपदं सेनया वृतम् ॥
utsṛjya samare rājanpāṇḍavaṃ savyasācinam | abhyadravata pāñcālyaṃ drupadaṃ senayā vṛtam
हे राजन्, युद्ध में पाण्डुपुत्र सव्यसाची अर्जुन को छोड़कर वे अपनी सेना से घिरे पाञ्चालराज द्रुपद पर टूट पड़े —
श्लोक 44 (6.49.44)
प्रियं संबन्धिनं राजञ्शरानवकिरन्बहून् । अग्निनेव प्रदग्धानि वनानि शिशिरात्यये ॥
priyaṃ saṃbandhinaṃ rājañśarānavakiranbahūn | agnineva pradagdhāni vanāni śiśirātyaye
जो उनके प्रिय सम्बन्धी थे — उन पर बहुत-से बाण बरसाते हुए। जैसे शिशिर के अन्त में आग से जले हुए वन दिखते हैं,
श्लोक 45 (6.49.45)
शरदग्धान्यदृश्यन्त सैन्यानि द्रुपदस्य ह । अत्यतिष्ठद्रणे भीष्मो विधूम इव पावकः ॥
śaradagdhānyadṛśyanta sainyāni drupadasya ha | atyatiṣṭhadraṇe bhīṣmo vidhūma iva pāvakaḥ
वैसे ही द्रुपद की सेनाएँ बाणों से जली हुई दिखाई दीं। रणभूमि में भीष्म धुएँ रहित अग्नि के समान प्रखर होकर स्थित थे।
श्लोक 46 (6.49.46)
मध्यन्दिने यथाऽऽदित्यं तपन्तमिव तेजसा । न शेकुः पाण्डवेयस्य योधा भीष्मं निरीक्षितुम् ॥
madhyandine yathā''dityaṃ tapantamiva tejasā | na śekuḥ pāṇḍaveyasya yodhā bhīṣmaṃ nirīkṣitum
जैसे दोपहर में अपने तेज से तपते सूर्य को कोई देख नहीं सकता, वैसे ही पाण्डुपुत्र के योद्धा भीष्म की ओर देख न सके।
श्लोक 47 (6.49.47)
वीक्षांचक्रुः समंतात्ते पाण्डवा भयपीडिताः । त्रातारं नाध्यगच्छन्त गावः शीतार्दिता इव ॥
vīkṣāṃcakruḥ samaṃtātte pāṇḍavā bhayapīḍitāḥ | trātāraṃ nādhyagacchanta gāvaḥ śītārditā iva
भय से पीड़ित पाण्डवों ने चारों ओर देखा, पर ठंड से ठिठुरी गायों की तरह उन्हें कोई रक्षक नहीं मिला।
श्लोक 48 (6.49.48)
सा तु यौधिष्ठिरी सेना गाङ्गेयशरपीडिता । सिंहेनेव विनिर्भिन्ना शुक्ला गौरिव गोपतेः ॥
sā tu yaudhiṣṭhirī senā gāṅgeyaśarapīḍitā | siṃheneva vinirbhinnā śuklā gauriva gopateḥ
गङ्गानन्दन भीष्म के बाणों से पीड़ित युधिष्ठिर की सेना ऐसी हो गई जैसे सिंह द्वारा चीर डाली गई ग्वाले की श्वेत गाय।
श्लोक 49 (6.49.49)
हते विप्रद्रुते सैन्ये निरुत्साहे विमर्दिते । हाहाकारो महानासीत्पाण्डुसैन्येषु भारत ॥
hate vipradrute sainye nirutsāhe vimardite | hāhākāro mahānāsītpāṇḍusainyeṣu bhārata
हे भारत, सेना के मारे जाने, भाग खड़े होने, निरुत्साहित और कुचल दिए जाने पर पाण्डु-सेनाओं में बड़ा हाहाकार मच गया।
श्लोक 50 (6.49.50)
ततो भीष्मः शान्तनवो नित्यं मण्डलकार्मुकः । मुमोच बाणान्दीप्ताग्रानहीनाशीविषानिव ॥
tato bhīṣmaḥ śāntanavo nityaṃ maṇḍalakārmukaḥ | mumoca bāṇāndīptāgrānahīnāśīviṣāniva
तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने, जिनका धनुष निरन्तर मण्डलाकार खिंचा रहता था, विषैले सर्पों के समान जलती नोकों वाले बाण छोड़े।
श्लोक 51 (6.49.51)
शरैरेकायनीकुर्वन्दिशः सर्वा यतव्रतः । जघान पाण्डवरथानादिश्यादिश्य भारत ॥
śarairekāyanīkurvandiśaḥ sarvā yatavrataḥ | jaghāna pāṇḍavarathānādiśyādiśya bhārata
हे भारत, अपने बाणों से सभी दिशाओं को एक ही मार्ग बनाते हुए उस दृढ़व्रती ने एक-एक को लक्ष्य बनाकर पाण्डवों के रथियों को मार गिराया।
श्लोक 52 (6.49.52)
ततः सैन्येषु भग्नेषु मथितेषु च सर्वशः । प्राप्ते चास्तं दिनकरे न प्राज्ञायत किंचन ॥
tataḥ sainyeṣu bhagneṣu mathiteṣu ca sarvaśaḥ | prāpte cāstaṃ dinakare na prājñāyata kiṃcana
तब सेनाओं के सब ओर से टूट जाने और कुचल दिए जाने पर, और सूर्य के अस्त हो जाने पर, कुछ भी दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 53 (6.49.53)
भीष्मं च समुदीर्यन्तं दृष्ट्वा पार्था महाहवे । अवहारमकुर्वन्त सैन्यानां भरतर्षभ ॥
bhīṣmaṃ ca samudīryantaṃ dṛṣṭvā pārthā mahāhave | avahāramakurvanta sainyānāṃ bharatarṣabha
और हे भरतश्रेष्ठ, उस महासंग्राम में भीष्म को उग्र होते देखकर पाण्डवों ने अपनी सेनाएँ युद्ध से लौटा लीं।