भीष्म पर्व · अध्याय 50
युधिष्ठिर की निराशा और क्रौञ्चारुण व्यूह
पहले दिन के युद्ध के बाद भीष्म द्वारा अपनी सेना के संहार से निराश युधिष्ठिर श्रीकृष्ण के पास जाते हैं और कहते हैं कि अपने मित्र राजाओं को मृत्यु के मुँह में झोंकने से अच्छा है वन चले जाना; वे शिकायत करते हैं कि केवल भीम पूरी शक्ति से लड़ रहे हैं जबकि अर्जुन तटस्थ-से खड़े हैं। श्रीकृष्ण उन्हें धीरज बँधाते हैं और उनके भाइयों, मित्र राजाओं, सेनापति धृष्टद्युम्न और भीष्म की मृत्यु के निमित्त शिखण्डी का स्मरण कराते हैं। युधिष्ठिर धृष्टद्युम्न को सेना का नेतृत्व सौंपते हैं, धृष्टद्युम्न द्रोण, भीष्म आदि से लड़ने की प्रतिज्ञा करते हैं, और युधिष्ठिर के कहने पर दूसरे दिन के लिए क्रौञ्चारुण व्यूह रचते हैं, जिसके अग्रभाग में अर्जुन हैं और सिर, नेत्रों, गर्दन, पीठ तथा पंखों पर अनेक जनपदों के योद्धा नियुक्त हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.50.1)
कृतेऽवहारे सैन्यानां प्रथमे भरतर्षभ । भीष्मे च युद्धसंरब्धे हृष्टे दुर्योधने तथा ॥
kṛte'vahāre sainyānāṃ prathame bharatarṣabha | bhīṣme ca yuddhasaṃrabdhe hṛṣṭe duryodhane tathā
हे भरतश्रेष्ठ, पहले दिन जब सेनाएँ युद्ध से लौटा ली गईं, जब भीष्म युद्ध के लिए उत्तेजित थे और दुर्योधन हर्षित था,
श्लोक 2 (6.50.2)
धर्मराजस्ततस्तूर्णमभिगम्य जनार्दनम् । भ्रातृभिः सहितः सर्वैः सर्वैश्चैव जनेश्वरैः ॥
dharmarājastatastūrṇamabhigamya janārdanam | bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvaiḥ sarvaiścaiva janeśvaraiḥ
तब धर्मराज युधिष्ठिर अपने सब भाइयों और सब राजाओं के साथ तुरन्त जनार्दन श्रीकृष्ण के पास गए।
श्लोक 3 (6.50.3)
शुचा परमया युक्तश्चिन्तयानः पराजयम् । वार्ष्णेयमब्रवीद्राजन्दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् ॥
śucā paramayā yuktaścintayānaḥ parājayam | vārṣṇeyamabravīdrājandṛṣṭvā bhīṣmasya vikramam
हे राजन्, भीष्म का पराक्रम देखकर, परम शोक में डूबे और अपनी पराजय के विषय में सोचते हुए उन्होंने वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 4 (6.50.4)
कृष्ण पश्य महेष्वासं भीष्मं भीमपराक्रमम् । शरैर्दहन्तं सैन्यं मे ग्रीष्मे कक्षमिवानलम् ॥
kṛṣṇa paśya maheṣvāsaṃ bhīṣmaṃ bhīmaparākramam | śarairdahantaṃ sainyaṃ me grīṣme kakṣamivānalam
"हे कृष्ण, भयंकर पराक्रमी महाधनुर्धर भीष्म को देखो, जो अपने बाणों से मेरी सेना को वैसे ही जला रहे हैं जैसे ग्रीष्म में आग सूखे घास-फूस को।
श्लोक 5 (6.50.5)
कथमेनं महात्मानं शक्ष्यामः प्रतिवीक्षितुम् । लेलिह्यमानं सैन्यं मे हविष्मन्तमिवानलम् ॥
kathamenaṃ mahātmānaṃ śakṣyāmaḥ prativīkṣitum | lelihyamānaṃ sainyaṃ me haviṣmantamivānalam
हम इस महात्मा की ओर देख भी कैसे सकेंगे, जो मेरी सेना को वैसे ही चाट रहे हैं जैसे अग्नि हवि को?
श्लोक 6 (6.50.6)
एतं हि पुरुषव्याघ्रं धनुष्मन्तं महाबलम् । दृष्ट्वा विप्रद्रुतं सैन्यं समरे मार्गणाहतम् ॥
etaṃ hi puruṣavyāghraṃ dhanuṣmantaṃ mahābalam | dṛṣṭvā vipradrutaṃ sainyaṃ samare mārgaṇāhatam
इस महाबली धनुर्धर पुरुषसिंह को देखते ही मेरी सेना युद्ध में उसके बाणों से आहत होकर भाग खड़ी हुई है।
श्लोक 7 (6.50.7)
शक्यो जेतुं यमः क्रुद्धो वज्रपाणिश्च संयुगे । वरुणः पाशभृद्वापि कुबेरो वा गदाधरः ॥
śakyo jetuṃ yamaḥ kruddho vajrapāṇiśca saṃyuge | varuṇaḥ pāśabhṛdvāpi kubero vā gadādharaḥ
क्रुद्ध यम को जीता जा सकता है, युद्ध में वज्रधारी इन्द्र को भी, पाशधारी वरुण को या गदाधारी कुबेर को भी;
श्लोक 8 (6.50.8)
न तु भीष्मो महातेजाः शक्यो जेतुं महाबलः । सोऽहमेवं गते मग्नो भीष्मागाधजलेऽप्लवः ॥
na tu bhīṣmo mahātejāḥ śakyo jetuṃ mahābalaḥ | so'hamevaṃ gate magno bhīṣmāgādhajale'plavaḥ
पर महातेजस्वी, महाबली भीष्म को नहीं जीता जा सकता। ऐसी स्थिति में मैं बिना नाव के भीष्म-रूपी अथाह जल में डूब रहा हूँ,
श्लोक 9 (6.50.9)
आत्मनो बुद्धिदौर्बल्याद्भीष्ममासाद्य केशव । वनं यास्यामि वार्ष्णेय श्रेयो मे तत्र जीवितुम् ॥
ātmano buddhidaurbalyādbhīṣmamāsādya keśava | vanaṃ yāsyāmi vārṣṇeya śreyo me tatra jīvitum
हे केशव, अपनी ही बुद्धि की दुर्बलता से भीष्म से भिड़कर। हे वार्ष्णेय, मैं वन को चला जाऊँगा; मेरे लिए वहीं जीना श्रेयस्कर है,
श्लोक 10 (6.50.10)
न त्वेतान्पृथिवीपालान्दातुं भीष्माय मृत्यवे । क्षपयिष्यति सेनां मे कृष्ण भीष्मो महास्त्रवित् ॥
na tvetānpṛthivīpālāndātuṃ bhīṣmāya mṛtyave | kṣapayiṣyati senāṃ me kṛṣṇa bhīṣmo mahāstravit
बजाय इसके कि मैं इन पृथ्वीपालों को मृत्यु-रूप भीष्म के हवाले कर दूँ। हे कृष्ण, महान अस्त्रों के ज्ञाता भीष्म मेरी सेना का नाश कर डालेंगे।
श्लोक 11 (6.50.11)
यथाऽनलं प्रज्वलितं पतङ्गाः समभिद्रुताः । विनाशायोपगच्छन्ति तथा मे सैनिको जनः ॥
yathā'nalaṃ prajvalitaṃ pataṅgāḥ samabhidrutāḥ | vināśāyopagacchanti tathā me sainiko janaḥ
जैसे पतंगे जलती आग पर टूट पड़ते हैं और नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही मेरे सैनिक विनाश की ओर जा रहे हैं।
श्लोक 12 (6.50.12)
क्षयं नीतोऽस्मि वार्ष्णेय राज्यहेतोः पराक्रमी । भ्रातरश्चैव मे वीराः कर्शिताः शरपीडिताः ॥
kṣayaṃ nīto'smi vārṣṇeya rājyahetoḥ parākramī | bhrātaraścaiva me vīrāḥ karśitāḥ śarapīḍitāḥ
हे वार्ष्णेय, राज्य के लिए पराक्रम करते हुए भी मैं विनाश के कगार पर पहुँचा दिया गया हूँ; और मेरे वीर भाई बाणों से पीड़ित होकर क्षीण हो गए हैं।
श्लोक 13 (6.50.13)
मत्कृते भ्रातृहार्देन राज्याद्भ्रष्टास्तथा सुखात् । जीवितं बहुमन्येऽहं जीवितं ह्यद्य दुर्लभम् ॥
matkṛte bhrātṛhārdena rājyādbhraṣṭāstathā sukhāt | jīvitaṃ bahumanye'haṃ jīvitaṃ hyadya durlabham
मेरे कारण, भाई के प्रति स्नेह से, वे राज्य और सुख दोनों से वंचित हुए। अब मैं जीवन को बहुत मूल्यवान समझता हूँ, क्योंकि आज जीवन बचाना कठिन है।
श्लोक 14 (6.50.14)
जीवितस्य च शेषेण तपस्तप्स्यामि दुश्चरम् । न घातयिष्यामि रणे मित्राणीमानि केशव ॥
jīvitasya ca śeṣeṇa tapastapsyāmi duścaram | na ghātayiṣyāmi raṇe mitrāṇīmāni keśava
अपने बचे हुए जीवन में मैं कठोर तप करूँगा; हे केशव, मैं इन मित्रों को युद्ध में नहीं मरवाऊँगा।
श्लोक 15 (6.50.15)
रथान्मे बहुसाहस्रान्दिव्यैरस्त्रैर्महाबलः । घातयत्यनिशं भीष्मः प्रवराणां प्रहारिणाम् ॥
rathānme bahusāhasrāndivyairastrairmahābalaḥ | ghātayatyaniśaṃ bhīṣmaḥ pravarāṇāṃ prahāriṇām
महाबली भीष्म अपने दिव्य अस्त्रों से मेरे हज़ारों रथियों को, जो श्रेष्ठ योद्धा हैं, निरन्तर मार रहे हैं।
श्लोक 16 (6.50.16)
किं नु कृत्वा हितं मे स्याद्ब्रूहि माधव माचिरम् । मध्यस्थमिव पश्यामि समरे सव्यसाचिनम् ॥
kiṃ nu kṛtvā hitaṃ me syādbrūhi mādhava māciram | madhyasthamiva paśyāmi samare savyasācinam
हे माधव, बताओ, शीघ्र बताओ, क्या करने से मेरा हित होगा? सव्यसाची अर्जुन को तो मैं युद्ध में तटस्थ-सा खड़ा देखता हूँ।
श्लोक 17 (6.50.17)
एको भीमः परं शक्त्या युध्यत्येव महाभुजः । केवलं बाहुवीर्येण क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥
eko bhīmaḥ paraṃ śaktyā yudhyatyeva mahābhujaḥ | kevalaṃ bāhuvīryeṇa kṣatradharmamanusmaran
केवल महाबाहु भीम ही पूरी शक्ति से लड़ रहे हैं, केवल अपनी भुजाओं के बल से, क्षत्रिय-धर्म का स्मरण करते हुए।
श्लोक 18 (6.50.18)
गदया वीरघातिन्या यथोत्साहं महामनाः । करोत्यसुकरं कर्म रथाश्वनरपङ्क्तिषु ॥
gadayā vīraghātinyā yathotsāhaṃ mahāmanāḥ | karotyasukaraṃ karma rathāśvanarapaṅktiṣu
वह महामनस्वी अपनी वीरों का संहार करने वाली गदा से पूरे उत्साह के साथ रथों, घोड़ों और पैदलों की पंक्तियों में दुष्कर कर्म कर रहे हैं।
श्लोक 19 (6.50.19)
नालमेष क्षयं कर्तुं परसैन्यस्य मारिष । आर्जवेनैव युद्धेन वीर वर्षशतैरपि ॥
nālameṣa kṣayaṃ kartuṃ parasainyasya māriṣa | ārjavenaiva yuddhena vīra varṣaśatairapi
परन्तु हे मित्र, हे वीर, केवल सीधे-सादे युद्ध से वह सौ वर्षों में भी शत्रु-सेना का विनाश नहीं कर सकते।
श्लोक 20 (6.50.20)
एकोऽस्त्रवित्सखा तेऽयं सोऽप्यस्मान्समुपेक्षते । निर्दह्यमानान्भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ॥
eko'stravitsakhā te'yaṃ so'pyasmānsamupekṣate | nirdahyamānānbhīṣmeṇa droṇena ca mahātmanā
तुम्हारा यह मित्र ही अकेला अस्त्रों का ज्ञाता है, और वह भी हमारी उपेक्षा कर रहा है, जबकि भीष्म और महात्मा द्रोण हमें जलाए डाल रहे हैं।
श्लोक 21 (6.50.21)
दिव्यान्यस्त्राणि भीष्मस्य द्रोणस्य च महात्मनः । धक्ष्यन्ति क्षत्रियान्सर्वान्प्रयुक्तानि पुनः पुनः ॥
divyānyastrāṇi bhīṣmasya droṇasya ca mahātmanaḥ | dhakṣyanti kṣatriyānsarvānprayuktāni punaḥ punaḥ
भीष्म और महात्मा द्रोण के दिव्य अस्त्र, बार-बार चलाए जाकर, सभी क्षत्रियों को भस्म कर देंगे।
श्लोक 22 (6.50.22)
कृष्ण भीष्मः सुसंरब्धः सहितः सर्वपार्थिवैः । क्षपयिष्यति नो नूनं यादृशोऽस्य पराक्रमः ॥
kṛṣṇa bhīṣmaḥ susaṃrabdhaḥ sahitaḥ sarvapārthivaiḥ | kṣapayiṣyati no nūnaṃ yādṛśo'sya parākramaḥ
हे कृष्ण, क्रोध से भरे भीष्म सब राजाओं के साथ मिलकर निश्चय ही हमारा नाश कर देंगे, ऐसा उनका पराक्रम है।
श्लोक 23 (6.50.23)
स त्वं पश्य महाभाग योगेश्वर महारथम् । भीष्मं यः शमयेत्संख्ये दावाग्निं जलदो यथा ॥
sa tvaṃ paśya mahābhāga yogeśvara mahāratham | bhīṣmaṃ yaḥ śamayetsaṃkhye dāvāgniṃ jalado yathā
इसलिए हे महाभाग, हे योगेश्वर, ऐसे महारथी को खोजो जो युद्ध में भीष्म को वैसे ही शान्त कर दे जैसे मेघ दावानल को।
श्लोक 24 (6.50.24)
तव प्रसादाद्गोविन्द पाण्डवा निहतद्विषः । स्वराज्यमनुसंप्राप्ता मोदिष्यन्ते सबान्धवाः ॥
tava prasādādgovinda pāṇḍavā nihatadviṣaḥ | svarājyamanusaṃprāptā modiṣyante sabāndhavāḥ
हे गोविन्द, तुम्हारी कृपा से पाण्डव अपने शत्रुओं को मारकर अपना राज्य फिर पा लेंगे और बन्धु-बान्धवों के साथ आनन्द मनाएँगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 25 (6.50.25)
एवमुक्त्वा ततः पार्थो ध्यायन्नास्ते महामनाः । चिरमन्तर्मना भूत्वा शोकोपहतचेतनः ॥
evamuktvā tataḥ pārtho dhyāyannāste mahāmanāḥ | ciramantarmanā bhūtvā śokopahatacetanaḥ
ऐसा कहकर महामनस्वी युधिष्ठिर बहुत देर तक भीतर ही भीतर खोए हुए, शोक से व्याकुल चित्त से चिन्तन करते बैठे रहे।
श्लोक 26 (6.50.26)
शोकार्तं तमथो ज्ञात्वा दुःखोपहतचेतसम् । अब्रवीत्तत्र गोविन्दो हर्षयन्सर्वपाण्डवान् ॥
śokārtaṃ tamatho jñātvā duḥkhopahatacetasam | abravīttatra govindo harṣayansarvapāṇḍavān
उन्हें शोक से पीड़ित और दुःख से व्याकुलचित्त जानकर गोविन्द ने वहाँ सब पाण्डवों को हर्षित करते हुए कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 27 (6.50.27)
माशुचो भरतश्रेष्ठ न त्वं शोचितुमर्हसि । यस्य ते भ्रातरः शूराः सर्वलोकेषु धन्विनः ॥
māśuco bharataśreṣṭha na tvaṃ śocitumarhasi | yasya te bhrātaraḥ śūrāḥ sarvalokeṣu dhanvinaḥ
"हे भरतश्रेष्ठ, शोक मत कीजिए; आपको शोक करना उचित नहीं, क्योंकि आपके भाई शूरवीर हैं और सब लोकों में प्रसिद्ध धनुर्धर हैं।
श्लोक 28 (6.50.28)
अहं च प्रियकृद्राजन्सात्यकिश्च महायशाः । विराटद्रुपदौ चेमौ धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥
ahaṃ ca priyakṛdrājansātyakiśca mahāyaśāḥ | virāṭadrupadau cemau dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ
हे राजन्, मैं भी आपका प्रिय करने वाला हूँ, और महायशस्वी सात्यकि भी, और ये दोनों विराट और द्रुपद, तथा पृषतवंशी धृष्टद्युम्न भी।
श्लोक 29 (6.50.29)
तथैव सबलाश्चेमे राजानो राजसत्तम । त्वत्प्रसादं प्रतीक्षन्ते त्वद्भक्ताश्च विशांपते ॥
tathaiva sabalāśceme rājāno rājasattama | tvatprasādaṃ pratīkṣante tvadbhaktāśca viśāṃpate
हे राजश्रेष्ठ, हे प्रजापालक, इसी प्रकार ये राजा भी अपनी सेनाओं सहित आपके भक्त हैं और आपकी कृपा की प्रतीक्षा करते हैं।
श्लोक 30 (6.50.30)
एष ते पार्षतो नित्यं हितकामः प्रिये रतः । सैनापत्यमनुप्राप्तो धृष्टद्युम्नो महाबलः ॥
eṣa te pārṣato nityaṃ hitakāmaḥ priye rataḥ | saināpatyamanuprāpto dhṛṣṭadyumno mahābalaḥ
यह पृषत का पौत्र, महाबली धृष्टद्युम्न, जो सदा आपका हित चाहता है और आपके प्रिय में लगा रहता है, सेनापति के पद पर आ चुका है;
सञ्जय उवाच
श्लोक 31 (6.50.31)
शिखण्डी च महाबाहो भीष्मस्य निधनं किल । एतच्छ्रुत्वा ततो धर्मो धृष्टद्युम्नं महारथम् । अब्रवीत्समितौ तस्यां वासुदेवस्य शृण्वतः ॥
śikhaṇḍī ca mahābāho bhīṣmasya nidhanaṃ kila | etacchrutvā tato dharmo dhṛṣṭadyumnaṃ mahāratham | abravītsamitau tasyāṃ vāsudevasya śṛṇvataḥ
"और हे महाबाहो, शिखण्डी निश्चय ही भीष्म की मृत्यु का कारण है।" यह सुनकर धर्मराज ने उस सभा में वासुदेव के सुनते हुए महारथी धृष्टद्युम्न से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 32 (6.50.32)
धृष्टद्युम्न निबोधेदं यत्त्वां वक्ष्यामि मारिष । नातिक्रम्यं भवेत्तच्च वचनं मम भाषितम् ॥
dhṛṣṭadyumna nibodhedaṃ yattvāṃ vakṣyāmi māriṣa | nātikramyaṃ bhavettacca vacanaṃ mama bhāṣitam
"हे धृष्टद्युम्न, हे मित्र, जो मैं तुमसे कहने जा रहा हूँ उसे सुनो; मेरे कहे हुए वचन का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
श्लोक 33 (6.50.33)
भवान्सेनापतिर्मह्यं वासुदेवेन संमितः । कार्तिकेयो यथा नित्यं देवानामभवत्पुरा ॥
bhavānsenāpatirmahyaṃ vāsudevena saṃmitaḥ | kārtikeyo yathā nityaṃ devānāmabhavatpurā
वासुदेव की सम्मति से तुम मेरे सेनापति हो। जैसे प्राचीन काल में कार्तिकेय सदा देवताओं के सेनापति रहे,
श्लोक 34 (6.50.34)
तथा त्वमपि पाण्डूनां सेनानीः पुरुषर्षभ । स त्वं पुरुषशार्दूल विक्रम्य जहि कौरवान् ॥
tathā tvamapi pāṇḍūnāṃ senānīḥ puruṣarṣabha | sa tvaṃ puruṣaśārdūla vikramya jahi kauravān
वैसे ही हे पुरुषश्रेष्ठ, तुम भी पाण्डवों के सेनानायक हो। इसलिए हे पुरुषसिंह, पराक्रम दिखाकर कौरवों का संहार करो।
श्लोक 35 (6.50.35)
अहं च तेऽनुयास्यामि भीमः कृष्णश्च मारिष । माद्रीपुत्रौ च सहितौ द्रौपदेयाश्च दंशिताः ॥
ahaṃ ca te'nuyāsyāmi bhīmaḥ kṛṣṇaśca māriṣa | mādrīputrau ca sahitau draupadeyāśca daṃśitāḥ
हे मित्र, मैं तुम्हारे पीछे चलूँगा, और भीम तथा श्रीकृष्ण भी, और दोनों माद्रीपुत्र साथ-साथ, और कवच धारण किए द्रौपदी के पुत्र भी,
सञ्जय उवाच
श्लोक 36 (6.50.36)
ये चान्ये पृथिवीपालाः प्रधानाः पुरुषर्षभ । तत उद्धर्षयन्सर्वान्धृष्टद्युम्नोऽभ्यभाषत ॥
ye cānye pṛthivīpālāḥ pradhānāḥ puruṣarṣabha | tata uddharṣayansarvāndhṛṣṭadyumno'bhyabhāṣata
"और अन्य प्रमुख पृथ्वीपाल भी, हे पुरुषश्रेष्ठ।" तब सबको हर्षित करते हुए धृष्टद्युम्न ने कहा —
धृष्टद्युम्न उवाच
श्लोक 37 (6.50.37)
अहं द्रोणान्तकः पार्थ विहितः शम्भुना पुरा । रणे भीष्मं कृपं द्रोणं तथा शल्यं जयद्रथम् ॥
ahaṃ droṇāntakaḥ pārtha vihitaḥ śambhunā purā | raṇe bhīṣmaṃ kṛpaṃ droṇaṃ tathā śalyaṃ jayadratham
"हे पार्थ, बहुत पहले शम्भु ने मुझे द्रोण का संहारक नियत किया था। आज युद्ध में मैं भीष्म, कृप, द्रोण, शल्य और जयद्रथ से,
सञ्जय उवाच
श्लोक 38 (6.50.38)
सर्वानद्य रणे दृप्तान्प्रतियोत्स्यामि पार्थिव । अथोत्क्रुष्टं महेष्वासैः पाण्डवैर्युद्धदुर्मदैः ॥
sarvānadya raṇe dṛptānpratiyotsyāmi pārthiva | athotkruṣṭaṃ maheṣvāsaiḥ pāṇḍavairyuddhadurmadaiḥ
"इन सब अभिमानियों से, हे राजन्, मैं आज युद्ध करूँगा।" तब युद्ध में उन्मत्त पाण्डव महाधनुर्धरों ने ज़ोर से सिंहनाद किया,
श्लोक 39 (6.50.39)
समुद्यते पार्थिवेन्द्रे पार्षते शत्रुसूदने । तमब्रवीत्ततः पार्थः पार्षतं पृतनापतिम् ॥
samudyate pārthivendre pārṣate śatrusūdane | tamabravīttataḥ pārthaḥ pārṣataṃ pṛtanāpatim
जब शत्रुओं का संहार करने वाला, राजाओं में श्रेष्ठ पार्षत (धृष्टद्युम्न) युद्ध के लिए उद्यत हुआ। तब युधिष्ठिर ने सेनापति धृष्टद्युम्न से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 40 (6.50.40)
व्यूहः क्रौञ्चारुणो नाम सर्वशत्रुनिबर्हणः । यं बृहस्पतिरिन्द्राय तदा देवासुरेऽब्रवीत् ॥
vyūhaḥ krauñcāruṇo nāma sarvaśatrunibarhaṇaḥ | yaṃ bṛhaspatirindrāya tadā devāsure'bravīt
"क्रौञ्चारुण नाम का एक व्यूह है, जो सब शत्रुओं का नाश करने वाला है, जिसे बृहस्पति ने देवासुर-संग्राम के समय इन्द्र को बताया था।
श्लोक 41 (6.50.41)
तं यथावत्प्रतिव्यूहं परानीकविनाशनम् । अदृष्टपूर्वं राजानः पश्यन्तु कुरुभिः सह ॥
taṃ yathāvatprativyūhaṃ parānīkavināśanam | adṛṣṭapūrvaṃ rājānaḥ paśyantu kurubhiḥ saha
उस शत्रु-सेना का नाश करने वाले प्रतिव्यूह को विधिपूर्वक रचो; राजा लोग कौरवों के साथ वह देखें जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 42 (6.50.42)
यथोक्तः स नृदेवेन विष्णुर्वज्रभृता यथा । प्रभाते सर्वसैन्यानामग्रे चक्रे धनञ्जयम् ॥
yathoktaḥ sa nṛdevena viṣṇurvajrabhṛtā yathā | prabhāte sarvasainyānāmagre cakre dhanañjayam
उस नरदेव के ऐसा कहने पर, जैसे वज्रधारी इन्द्र के कहने पर विष्णु करते हैं, उसने प्रभात होते ही धनञ्जय को सब सेनाओं के आगे रखा।
श्लोक 43 (6.50.43)
आदित्यपथगः केतुस्तस्याद्भुतमनोरमः । शासनात्पुरुहूतस्य निर्मितो विश्वकर्मणा ॥
ādityapathagaḥ ketustasyādbhutamanoramaḥ | śāsanātpuruhūtasya nirmito viśvakarmaṇā
उनका अद्भुत और मनोहर ध्वज, जो सूर्य के मार्ग तक जाता था, इन्द्र की आज्ञा से विश्वकर्मा ने बनाया था।
श्लोक 44 (6.50.44)
इन्द्रायुधसवर्णाभिः पताकाभिरलङ्कृतः । आकाशग इवाकाशे गन्धर्वनगरोपमः ॥
indrāyudhasavarṇābhiḥ patākābhiralaṅkṛtaḥ | ākāśaga ivākāśe gandharvanagaropamaḥ
इन्द्रधनुष के रंगों वाली पताकाओं से सजा वह ध्वज आकाश में पक्षी के समान विचरता और गन्धर्व-नगर के समान दिखाई देता था।
श्लोक 45 (6.50.45)
नृत्यमान इवाभाति रथचर्यासु मारिष । तेन रत्नवता पार्थः स च गाण्डीवधन्वना ॥
nṛtyamāna ivābhāti rathacaryāsu māriṣa | tena ratnavatā pārthaḥ sa ca gāṇḍīvadhanvanā
हे मान्यवर, रथ के चलने पर वह नाचता हुआ-सा प्रतीत होता था। उस रत्नजटित ध्वज से पार्थ, और गाण्डीवधारी से वह ध्वज,
श्लोक 46 (6.50.46)
बभूव परमोपेतः सुमेरुरिव भानुना । शिरोऽभूद्द्रुपदो राजा महत्या सेनया वृतः ॥
babhūva paramopetaḥ sumeruriva bhānunā | śiro'bhūddrupado rājā mahatyā senayā vṛtaḥ
दोनों परम शोभा से युक्त हुए, जैसे सूर्य से सुमेरु। विशाल सेना से घिरे राजा द्रुपद उस व्यूह के सिर बने;
श्लोक 47 (6.50.47)
कुन्तिभोजश्च चैद्यश्च चक्षुर्भ्यां तौ जनेश्वरौ । दाशार्णकाः प्रभद्राश्च दाशेरकगणैः सह ॥
kuntibhojaśca caidyaśca cakṣurbhyāṃ tau janeśvarau | dāśārṇakāḥ prabhadrāśca dāśerakagaṇaiḥ saha
कुन्तिभोज और चेदिराज, वे दोनों जनेश्वर उसके नेत्र बने। दाशार्णक और प्रभद्र, दाशेरक-गणों के साथ,
श्लोक 48 (6.50.48)
अनूपकाः किराताश्च ग्रीवायां भरतर्षभ । पटच्चरैश्च पौण्ड्रैश्च राजन्पौरवकैस्तथा ॥
anūpakāḥ kirātāśca grīvāyāṃ bharatarṣabha | paṭaccaraiśca pauṇḍraiśca rājanpauravakaistathā
अनूपक और किरात, हे भरतश्रेष्ठ, उसकी गर्दन पर थे। हे राजन्, पटच्चरों, पौण्ड्रों और पौरवकों के साथ,
श्लोक 49 (6.50.49)
निषादैः सहितश्चापि पृष्ठमासीद्युधिष्ठिरः । पक्षौ तु भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥
niṣādaiḥ sahitaścāpi pṛṣṭhamāsīdyudhiṣṭhiraḥ | pakṣau tu bhīmasenaśca dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ
और निषादों के साथ भी, युधिष्ठिर उसकी पीठ बने। भीमसेन और पृषतवंशी धृष्टद्युम्न उसके दोनों पंख बने,
श्लोक 50 (6.50.50)
द्रौपदेयाभिमन्युश्च सात्यकिश्च महारथः । पिशाचा दारदाश्चैव पुण्ड्राः कुण्डीविषैः सह ॥
draupadeyābhimanyuśca sātyakiśca mahārathaḥ | piśācā dāradāścaiva puṇḍrāḥ kuṇḍīviṣaiḥ saha
साथ में द्रौपदी के पुत्र, अभिमन्यु और महारथी सात्यकि। पिशाच, दारद, कुण्डीविषों के साथ पुण्ड्र,
श्लोक 51 (6.50.51)
मारुता धेनुकाश्चैव तंगणाः परतंगणाः । बाह्लिकास्तित्तिराश्चैव चोलाः पाण्ड्याश्च भारत ॥
mārutā dhenukāścaiva taṃgaṇāḥ parataṃgaṇāḥ | bāhlikāstittirāścaiva colāḥ pāṇḍyāśca bhārata
मारुत, धेनुक, तंगण और परतंगण, बाह्लिक, तित्तिर, चोल और पाण्ड्य, हे भारत —
श्लोक 52 (6.50.52)
एते जनपदा राजन्दक्षिणं पक्षमाश्रिताः । अग्निवेशास्तु हुण्डाश्च मालवा दानभारयः ॥
ete janapadā rājandakṣiṇaṃ pakṣamāśritāḥ | agniveśāstu huṇḍāśca mālavā dānabhārayaḥ
हे राजन्, ये जनपद दाहिने पंख पर स्थित हुए। अग्निवेश और हुण्ड, मालव, दानभारि,
श्लोक 53 (6.50.53)
शबरा उद्भसाश्चैव वत्साश्च सह नाकुलैः । नकुलः सहदेवश्च वामं पक्षं समाश्रिताः ॥
śabarā udbhasāścaiva vatsāśca saha nākulaiḥ | nakulaḥ sahadevaśca vāmaṃ pakṣaṃ samāśritāḥ
शबर, उद्भस, और नाकुलों के साथ वत्स — ये नकुल और सहदेव के साथ बाएँ पंख पर स्थित हुए।
श्लोक 54 (6.50.54)
रथानामयुतं पक्षौ शिरस्तु नियुतं तथा । पृष्ठमर्बुदमेवासीत्सहस्राणि च विंशतिः ॥
rathānāmayutaṃ pakṣau śirastu niyutaṃ tathā | pṛṣṭhamarbudamevāsītsahasrāṇi ca viṃśatiḥ
दोनों पंखों में दस हज़ार रथ थे, सिर पर एक लाख, और पीठ पर दस करोड़ और बीस हज़ार;
श्लोक 55 (6.50.55)
ग्रीवायां नियुतं चापि सहस्राणि च सप्ततिः । पक्षकोटिप्रपक्षेषु पक्षान्तेषु च वारणाः ॥
grīvāyāṃ niyutaṃ cāpi sahasrāṇi ca saptatiḥ | pakṣakoṭiprapakṣeṣu pakṣānteṣu ca vāraṇāḥ
गर्दन पर एक लाख और सत्तर हज़ार। पंखों के छोरों, उप-पंखों और पंखों के सिरों पर हाथी चल रहे थे,
श्लोक 56 (6.50.56)
जग्मुः परिवृता राजंश्चलन्त इव पर्वताः । जघनं पालयामास विराटः सह केकयैः ॥
jagmuḥ parivṛtā rājaṃścalanta iva parvatāḥ | jaghanaṃ pālayāmāsa virāṭaḥ saha kekayaiḥ
हे राजन्, सेनाओं से घिरे हुए, मानो चलते-फिरते पर्वत हों। विराट केकयों के साथ पिछले भाग की रक्षा कर रहे थे,
श्लोक 57 (6.50.57)
काशिराजश्च शैब्यश्च रथानामयुतैस्त्रिभिः । एवमेनं महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः ॥
kāśirājaśca śaibyaśca rathānāmayutaistribhiḥ | evamenaṃ mahāvyūhaṃ vyūhya bhārata pāṇḍavāḥ
और काशिराज तथा शैब्य तीस हज़ार रथों के साथ। हे भारत, इस प्रकार यह महाव्यूह रचकर पाण्डव
श्लोक 58 (6.50.58)
सूर्योदयं त इच्छन्तः स्थिता युद्धाय दंशिताः । तेषामादित्यवर्णानि विमलानि महान्ति च । श्वेतच्छत्राण्यशोभन्त वारणेषु रथेषु च ॥
sūryodayaṃ ta icchantaḥ sthitā yuddhāya daṃśitāḥ | teṣāmādityavarṇāni vimalāni mahānti ca | śvetacchatrāṇyaśobhanta vāraṇeṣu ratheṣu ca
कवच पहनकर युद्ध के लिए तैयार खड़े सूर्योदय की प्रतीक्षा करने लगे। उनके सूर्य के समान रंग वाले, निर्मल और विशाल श्वेत छत्र हाथियों और रथों पर शोभा पा रहे थे।