भीष्म पर्व · अध्याय 54
भीमसेन द्वारा कलिङ्गों का संहार
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि दुर्योधन के भेजे कलिङ्गराज ने भीम से कैसे युद्ध किया। संजय बताते हैं कि चेदि-योद्धा भीम को छोड़कर लौट गए, फिर भी भीम ने अकेले ही कलिङ्ग राजकुमार शक्रदेव और भानुमान् को मारा, एक हाथी पर चढ़ गए और फिर ढाल-तलवार लेकर पैदल ही कलिङ्ग सेना में घूमते हुए संहार करते रहे; उन्होंने श्रुतायु, उसके चक्ररक्षक सत्यदेव और सत्य तथा केतुमान् का भी वध किया। धृष्टद्युम्न, सात्यकि और पाण्डव सेना उनकी सहायता को आती है; भीष्म आगे बढ़कर भीम के घोड़े मार डालते हैं, पर सात्यकि द्वारा उनके सारथि के मारे जाने पर घोड़े उन्हें रणभूमि से दूर ले जाते हैं। अकेले कलिङ्गों का महाव्यूह रौंद देने पर सात्यकि भीम को गले लगाते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.54.1)
मम पुत्रसमादिष्टः कलिङ्गो वाहिनीपतिः । कथमद्भुतकर्माणं भीमसेनं महाबलम् ॥
mama putrasamādiṣṭaḥ kaliṅgo vāhinīpatiḥ | kathamadbhutakarmāṇaṃ bhīmasenaṃ mahābalam
मेरे पुत्र की आज्ञा पाकर सेनापति कलिङ्गराज ने अद्भुत कर्म करने वाले महाबली भीमसेन से कैसे लोहा लिया —
श्लोक 2 (6.54.2)
चरन्तं गदया वीर दण्डहस्तमिवान्तकम् । योधयामास समरे कलिङ्गः सह सेनया ॥
carantaṃ gadayā vīra daṇḍahastamivāntakam | yodhayāmāsa samare kaliṅgaḥ saha senayā
— उस भीम से, जो दण्डधारी यमराज के समान गदा लेकर रणभूमि में विचर रहे थे? हे वीर, कलिङ्गराज ने अपनी सेना के साथ उनसे रण में कैसे युद्ध किया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (6.54.3)
पुत्रेण तव राजेन्द्र स तथोक्तो महाबलः । महत्या सेनया गुप्तः प्रायाद्भीमरथं प्रति ॥
putreṇa tava rājendra sa tathokto mahābalaḥ | mahatyā senayā guptaḥ prāyādbhīmarathaṃ prati
हे राजेन्द्र, आपके पुत्र के ऐसा कहने पर वह महाबली कलिङ्गराज विशाल सेना से सुरक्षित होकर भीम के रथ की ओर बढ़ा।
श्लोक 4 (6.54.4)
तामापतन्तीं महतीं कलिङ्गानां महाचमूम् । रथाश्वनागकलिलां प्रगृहीतमहायुधाम् ॥
tāmāpatantīṃ mahatīṃ kaliṅgānāṃ mahācamūm | rathāśvanāgakalilāṃ pragṛhītamahāyudhām
रथों, घोड़ों और हाथियों से भरी, बड़े-बड़े अस्त्र उठाए कलिङ्गों की वह विशाल सेना जब टूट पड़ी,
श्लोक 5 (6.54.5)
भीमसेनः कलिङ्गानामार्च्छद्भारत वाहिनीम् । केतुमन्तं च नैषादिमायान्तं सह चेदिभिः ॥
bhīmasenaḥ kaliṅgānāmārcchadbhārata vāhinīm | ketumantaṃ ca naiṣādimāyāntaṃ saha cedibhiḥ
तब हे भारत, भीमसेन चेदियों के साथ कलिङ्गों की उस सेना पर और आगे बढ़ते हुए निषादराज के पुत्र केतुमान् पर चढ़ गए।
श्लोक 6 (6.54.6)
ततः श्रुतायुः संक्रुद्धो राज्ञा केतुमता सह । आससाद रणे भीमं व्यूढानीकेषु चेदिषु ॥
tataḥ śrutāyuḥ saṃkruddho rājñā ketumatā saha | āsasāda raṇe bhīmaṃ vyūḍhānīkeṣu cediṣu
तब क्रोध से भरा श्रुतायु राजा केतुमान् के साथ रण में भीम के सामने आ पहुँचा, जहाँ चेदि अपनी व्यूहबद्ध टुकड़ियों में खड़े थे।
श्लोक 7 (6.54.7)
रथैरनेकसाहस्रैः कलिङ्गानां नराधिप । अयुतेन गजानां च निषादैः सह केतुमान् ॥
rathairanekasāhasraiḥ kaliṅgānāṃ narādhipa | ayutena gajānāṃ ca niṣādaiḥ saha ketumān
हे नरेश, कलिङ्गों के कई हज़ार रथों और दस हज़ार हाथियों के साथ, निषादों को लेकर केतुमान् ने
श्लोक 8 (6.54.8)
भीमसेनं रणे राजन्समन्तात्पर्यवारयत् । चेदिमत्स्यकरूषाश्च भीमसेनपदानुगाः ॥
bhīmasenaṃ raṇe rājansamantātparyavārayat | cedimatsyakarūṣāśca bhīmasenapadānugāḥ
हे राजन्, रण में भीमसेन को चारों ओर से घेर लिया। भीमसेन के पीछे-पीछे चलने वाले चेदि, मत्स्य और करूष
श्लोक 9 (6.54.9)
अभ्यधावन्त समरे निषादान्सह राजभिः । ततः प्रववृते युद्धं घोररूपं भयावहम् ॥
abhyadhāvanta samare niṣādānsaha rājabhiḥ | tataḥ pravavṛte yuddhaṃ ghorarūpaṃ bhayāvaham
रण में राजाओं सहित निषादों पर टूट पड़े। तब भयंकर रूप वाला, डरावना युद्ध छिड़ गया,
श्लोक 10 (6.54.10)
न प्राजानन्त योधाः स्वान्परस्परजिघांसया । घोरमासीत्ततो युद्धं भीमस्य सहसा परैः ॥
na prājānanta yodhāḥ svānparasparajighāṃsayā | ghoramāsīttato yuddhaṃ bhīmasya sahasā paraiḥ
जिसमें एक-दूसरे को मारने की लालसा में योद्धा अपने ही लोगों को पहचान नहीं पा रहे थे। शत्रुओं के साथ भीम का वह अचानक छिड़ा युद्ध बड़ा घोर था,
श्लोक 11 (6.54.11)
यथेन्द्रस्य महाराज महत्या दैत्यसेनया । तस्य सैन्यस्य संग्रामे युध्यमानस्य भारत ॥
yathendrasya mahārāja mahatyā daityasenayā | tasya sainyasya saṃgrāme yudhyamānasya bhārata
हे महाराज, जैसा दैत्यों की विशाल सेना के साथ इन्द्र का हुआ था। हे भारत, रण में लड़ती हुई उस सेना का
श्लोक 12 (6.54.12)
बभूव सुमहाञ्शब्दः सागरस्येव गर्जतः । अन्योन्यं स्म तदा योधा विकर्षन्तो विशांपते ॥
babhūva sumahāñśabdaḥ sāgarasyeva garjataḥ | anyonyaṃ sma tadā yodhā vikarṣanto viśāṃpate
गरजते सागर के समान महान् कोलाहल उठा। हे प्रजानाथ, तब एक-दूसरे को घसीटते हुए योद्धाओं ने
श्लोक 13 (6.54.13)
महीं चक्रुश्चितां सर्वां शशलोहितसन्निभाम् । योधांश्च स्वान्परान्वापि नाभ्यजानञ्जिघांसया ॥
mahīṃ cakruścitāṃ sarvāṃ śaśalohitasannibhām | yodhāṃśca svānparānvāpi nābhyajānañjighāṃsayā
सारी धरती को शशक के रक्त जैसी लाल लाशों के ढेर से पाट दिया। मारने की धुन में वे न अपनों को पहचानते थे, न परायों को;
श्लोक 14 (6.54.14)
स्वानप्याददते स्वाश्च शूराः परमदुर्जयाः । विमर्दः सुमहानासीदल्पानां बहुभिः सह ॥
svānapyādadate svāśca śūrāḥ paramadurjayāḥ | vimardaḥ sumahānāsīdalpānāṃ bahubhiḥ saha
कठिनाई से जीते जाने वाले वीर अपने ही साथियों पर वार कर बैठते थे। थोड़े-से योद्धाओं का बहुतों के साथ बड़ा भारी संघर्ष हुआ —
श्लोक 15 (6.54.15)
कलिङ्गैः सह चैदीनां निषादैश्च विशांपते । कृत्वा पुरुषकारं तु यथाशक्ति महाबलाः ॥
kaliṅgaiḥ saha caidīnāṃ niṣādaiśca viśāṃpate | kṛtvā puruṣakāraṃ tu yathāśakti mahābalāḥ
हे प्रजानाथ, कलिङ्गों और निषादों के साथ चेदियों का। अपनी शक्ति भर पुरुषार्थ दिखाकर वे महाबली
श्लोक 16 (6.54.16)
भीमसेनं परित्यज्य संन्यवर्तन्त चेदयः । सर्वैः कलिङ्गैरासन्नः सन्निवृत्तेषु चेदिषु ॥
bhīmasenaṃ parityajya saṃnyavartanta cedayaḥ | sarvaiḥ kaliṅgairāsannaḥ sannivṛtteṣu cediṣu
चेदि भीमसेन को छोड़कर लौट गए। चेदियों के लौट जाने पर सारे कलिङ्गों ने उन्हें घेर लिया;
श्लोक 17 (6.54.17)
स्वबाहुबलमास्थाय अभ्यवर्षन्त पाण्डवम् । न चचाल रथोपस्थाद्भीमसेनो महाबलः ॥
svabāhubalamāsthāya abhyavarṣanta pāṇḍavam | na cacāla rathopasthādbhīmaseno mahābalaḥ
अपनी भुजाओं के बल के भरोसे वे पाण्डुपुत्र पर अस्त्रों की वर्षा करने लगे। पर महाबली भीमसेन रथ की बैठक से तनिक भी न डिगे;
श्लोक 18 (6.54.18)
शितैरवाकिरद्बाणैः कलिङ्गानां वरूथिनीम् । कालिङ्गस्तु महेष्वासः पुत्रश्चास्य महारथः ॥
śitairavākiradbāṇaiḥ kaliṅgānāṃ varūthinīm | kāliṅgastu maheṣvāsaḥ putraścāsya mahārathaḥ
उन्होंने तीखे बाणों से कलिङ्गों की सेना को ढक दिया। तब महाधनुर्धर कलिङ्गराज और उसका महारथी पुत्र,
श्लोक 19 (6.54.19)
शक्रदेव इति ख्यातो जघ्नतुः पाण्डवं शरैः । ततो भीमो महाबाहुर्विधुन्वन्रुचिरं धनुः ॥
śakradeva iti khyāto jaghnatuḥ pāṇḍavaṃ śaraiḥ | tato bhīmo mahābāhurvidhunvanruciraṃ dhanuḥ
जो शक्रदेव नाम से प्रसिद्ध था, दोनों ने पाण्डुपुत्र पर बाणों से प्रहार किया। तब महाबाहु भीम अपना सुन्दर धनुष हिलाते हुए
श्लोक 20 (6.54.20)
योधयामास कालिङ्गं स्वबाहुबलमाश्रितः । शक्रदेवस्तु समरे विसृजन्सायकान्बहून् ॥
yodhayāmāsa kāliṅgaṃ svabāhubalamāśritaḥ | śakradevastu samare visṛjansāyakānbahūn
अपने भुजबल का सहारा लेकर कलिङ्गराज से लड़ने लगे। शक्रदेव ने रण में बहुत-से बाण छोड़ते हुए
श्लोक 21 (6.54.21)
अश्वाञ्जघान समरे भीमसेनस्य सायकैः । तं दृष्ट्वा विरथं तत्र भीमसेनमरिन्दमम् ॥
aśvāñjaghāna samare bhīmasenasya sāyakaiḥ | taṃ dṛṣṭvā virathaṃ tatra bhīmasenamarindamam
अपने बाणों से भीमसेन के घोड़े मार डाले। शत्रुदमन भीमसेन को वहाँ रथहीन देखकर
श्लोक 22 (6.54.22)
शक्रदेवोऽभिदुद्राव शरैरवकिरञ्शितैः । भीमस्योपरि राजेन्द्र शक्रदेवो महाबलः ॥
śakradevo'bhidudrāva śarairavakirañśitaiḥ | bhīmasyopari rājendra śakradevo mahābalaḥ
शक्रदेव तीखे बाणों की बौछार करता हुआ उन पर झपटा। हे राजेन्द्र, महाबली शक्रदेव ने भीम के ऊपर
श्लोक 23 (6.54.23)
ववर्ष शरवर्षाणि तपान्ते जलदो यथा । हताश्वे तु रथे तिष्ठन्भीमसेनो महाबलः ॥
vavarṣa śaravarṣāṇi tapānte jalado yathā | hatāśve tu rathe tiṣṭhanbhīmaseno mahābalaḥ
वैसे ही बाणों की झड़ी लगा दी जैसे ग्रीष्म के अन्त में बादल बरसता है। मरे घोड़ों वाले रथ पर खड़े महाबली भीमसेन ने
श्लोक 24 (6.54.24)
शक्रदेवाय चिक्षेप सर्वशैक्यायसीं गदाम् । स तया निहतो राजन्कालिङ्गतनयो रथात् ॥
śakradevāya cikṣepa sarvaśaikyāyasīṃ gadām | sa tayā nihato rājankāliṅgatanayo rathāt
शक्रदेव पर पूरी शैक्य लोहे की बनी गदा फेंकी। हे राजन्, उससे आहत होकर कलिङ्गराज का पुत्र रथ से
श्लोक 25 (6.54.25)
विरथः सह सूतेन जगाम धरणीतलम् । हतमात्मसुतं दृष्ट्वा कलिङ्गानां जनाधिपः ॥
virathaḥ saha sūtena jagāma dharaṇītalam | hatamātmasutaṃ dṛṣṭvā kaliṅgānāṃ janādhipaḥ
रथहीन होकर सारथि सहित धरती पर जा गिरा। अपने पुत्र को मरा देखकर कलिङ्गों के राजा ने
श्लोक 26 (6.54.26)
रथैरनेकसाहस्रैर्भीमस्यावारयद्दिशः । अयुतेन गजानां च निषादैः परिवारितः । ततो भीमो महावेगां त्यक्त्वा गुर्वीं महागदां ॥
rathairanekasāhasrairbhīmasyāvārayaddiśaḥ | ayutena gajānāṃ ca niṣādaiḥ parivāritaḥ | tato bhīmo mahāvegāṃ tyaktvā gurvīṃ mahāgadāṃ
कई हज़ार रथों से भीम को सब दिशाओं से घेर लिया; वह स्वयं दस हज़ार हाथियों और निषादों से घिरा था। तब भीम ने अपनी प्रचण्ड वेग वाली भारी महागदा छोड़कर
श्लोक 27 (6.54.27)
निस्त्रिंशमाददे घोरं चिकीर्षुः कर्म दारुणम् । चर्म चाप्रतिमं राजन्नार्षभं पुरुषर्षभ ॥
nistriṃśamādade ghoraṃ cikīrṣuḥ karma dāruṇam | carma cāpratimaṃ rājannārṣabhaṃ puruṣarṣabha
भयंकर कर्म करने की इच्छा से एक भीषण तलवार उठा ली, और हे राजन्, हे पुरुषश्रेष्ठ, बैल की खाल की बनी एक अनुपम ढाल भी,
श्लोक 28 (6.54.28)
नक्षत्रैरर्धचन्द्रैश्च शातकुम्भमयैश्चितम् । कालिङ्गस्तु ततः क्रुद्धो धनुर्ज्यामवमृज्य च ॥
nakṣatrairardhacandraiśca śātakumbhamayaiścitam | kāliṅgastu tataḥ kruddho dhanurjyāmavamṛjya ca
जो सोने के तारों और अर्धचन्द्रों से जड़ी थी। तब क्रोधित कलिङ्गराज ने अपनी प्रत्यञ्चा को पोंछकर
श्लोक 29 (6.54.29)
प्रगृह्य च शरं घोरमेकं सर्पविषोपमम् । प्राहिणोद्भीमसेनाय वधाकाङ्क्षी जनेश्वरः ॥
pragṛhya ca śaraṃ ghoramekaṃ sarpaviṣopamam | prāhiṇodbhīmasenāya vadhākāṅkṣī janeśvaraḥ
सर्प के विष जैसा एक भयंकर बाण उठाया और उस नरेश ने भीमसेन के वध की इच्छा से उसे उन पर छोड़ दिया।
श्लोक 30 (6.54.30)
तमापतन्तं वेगेन प्रेरितं निशितं शरम् । भीमसेनो द्विधा राजंश्चिच्छेद विपुलासिना ॥
tamāpatantaṃ vegena preritaṃ niśitaṃ śaram | bhīmaseno dvidhā rājaṃściccheda vipulāsinā
वेग से छोड़े गए उस तीखे बाण को आते देख, हे राजन्, भीमसेन ने अपनी चौड़ी तलवार से उसके दो टुकड़े कर दिए
श्लोक 31 (6.54.31)
उदक्रोशच्च संहृष्टस्त्रासयानो वरूथिनीम् । कालिङ्गोऽथ ततः क्रुद्धो भीमसेनाय संयुगे ॥
udakrośacca saṃhṛṣṭastrāsayāno varūthinīm | kāliṅgo'tha tataḥ kruddho bhīmasenāya saṃyuge
और हर्ष से गरजकर शत्रुसेना को भयभीत कर दिया। तब क्रुद्ध कलिङ्गराज ने उस संग्राम में भीमसेन पर
श्लोक 32 (6.54.32)
तोमरान्प्राहिणोच्छीघ्रं चतुर्दश शिलाशितान् । तानप्राप्तान्महाबाहुः खगतानेव पाण्डवः ॥
tomarānprāhiṇocchīghraṃ caturdaśa śilāśitān | tānaprāptānmahābāhuḥ khagatāneva pāṇḍavaḥ
शीघ्रता से पत्थर पर तेज़ किए हुए चौदह तोमर फेंके। वे पहुँच भी न पाए थे, आकाश में ही थे, कि महाबाहु पाण्डुपुत्र ने
श्लोक 33 (6.54.33)
चिच्छेद सहसा राजन्नसंभ्रान्तो वरासिना । निकृत्य तु रणे भीमस्तोमरान्वै चतुर्दश ॥
ciccheda sahasā rājannasaṃbhrānto varāsinā | nikṛtya tu raṇe bhīmastomarānvai caturdaśa
हे राजन्, बिना घबराए अपनी उत्तम तलवार से उन्हें तुरन्त काट डाला। रण में उन चौदह तोमरों को काटकर भीम,
श्लोक 34 (6.54.34)
भानुमन्तं ततो भीमः प्राद्रवत्पुरुषर्षभः । भानुमांस्तु ततो भीमं शरवर्षेण च्छादयन् ॥
bhānumantaṃ tato bhīmaḥ prādravatpuruṣarṣabhaḥ | bhānumāṃstu tato bhīmaṃ śaravarṣeṇa cchādayan
वह पुरुषश्रेष्ठ, तब भानुमान् पर झपटे। भानुमान् ने बाणों की वर्षा से भीम को ढकते हुए
श्लोक 35 (6.54.35)
ननाद बलवन्नादं नादयानो नभस्तलम् । न च तं ममृषे भीमः सिंहनादं महाहवे ॥
nanāda balavannādaṃ nādayāno nabhastalam | na ca taṃ mamṛṣe bhīmaḥ siṃhanādaṃ mahāhave
आकाश को गुँजाते हुए ज़ोर से सिंहनाद किया। महायुद्ध में भीम उस सिंहनाद को सह न सके;
श्लोक 36 (6.54.36)
ततः शब्देन महता विननाद महास्वनः । तेन नादेन वित्रस्ता कलिङ्गानां वरूथिनी ॥
tataḥ śabdena mahatā vinanāda mahāsvanaḥ | tena nādena vitrastā kaliṅgānāṃ varūthinī
ऊँचे स्वर वाले भीम ने बड़े ज़ोर से गर्जना की। उस गर्जना से भयभीत होकर कलिङ्गों की सेना ने
श्लोक 37 (6.54.37)
न भीमं समरे मेने मानुषं भरतर्षभ । ततो भीमो महाबाहुर्नर्दित्वा विपुलं स्वनम् ॥
na bhīmaṃ samare mene mānuṣaṃ bharatarṣabha | tato bhīmo mahābāhurnarditvā vipulaṃ svanam
हे भरतश्रेष्ठ, रण में भीम को साधारण मनुष्य नहीं समझा। तब महाबाहु भीम ने ज़ोर से गर्जना करके
श्लोक 38 (6.54.38)
सासिर्वेगवदाप्लुत्य दन्ताभ्यां वारणोत्तमम् । आरुरोह ततो मध्यं नागराजस्य मारिष ॥
sāsirvegavadāplutya dantābhyāṃ vāraṇottamam | āruroha tato madhyaṃ nāgarājasya māriṣa
हाथ में तलवार लिए वेग से उछलकर दाँतों के सहारे उस श्रेष्ठ हाथी पर चढ़ गए, और हे आर्य, उस गजराज की पीठ के बीच जा बैठे।
श्लोक 39 (6.54.39)
ततो मुमोच कालिङ्गः शक्तिं तामकरोद्द्विधा । खड्गेन पृथुना मध्ये भानुमन्तमथाच्छिनत् ॥
tato mumoca kāliṅgaḥ śaktiṃ tāmakaroddvidhā | khaḍgena pṛthunā madhye bhānumantamathācchinat
तब कलिङ्ग राजकुमार ने शक्ति चलाई; भीम ने उसके दो टुकड़े कर दिए और अपनी चौड़ी तलवार से भानुमान् को बीच से काट डाला।
श्लोक 40 (6.54.40)
सोऽन्तरायुधिनं हत्वा राजपुत्रमरिन्दमः । गुरुभारसहे स्कन्धे नागस्यासिमपातयत् ॥
so'ntarāyudhinaṃ hatvā rājaputramarindamaḥ | gurubhārasahe skandhe nāgasyāsimapātayat
हाथी पर बैठकर लड़ने वाले उस राजकुमार को मारकर उस शत्रुदमन ने भारी बोझ सहने वाले हाथी के कन्धे पर तलवार का वार किया।
श्लोक 41 (6.54.41)
छिन्नस्कन्धः स विनदन्पपात गजयूथपः । आरुग्णः सिन्धुवेगेन सानुमानिव पर्वतः ॥
chinnaskandhaḥ sa vinadanpapāta gajayūthapaḥ | ārugṇaḥ sindhuvegena sānumāniva parvataḥ
कन्धा कट जाने पर वह गजयूथपति चिंघाड़ता हुआ ऐसे गिरा जैसे नदी के वेग से टूटकर कोई शिखरों वाला पर्वत गिर पड़े।
श्लोक 42 (6.54.42)
ततस्तस्मादवप्लुत्य गजाद्भारत भारतः । खड्गपाणिरदीनात्मा तस्थौ भूमौ सुदंशितः ॥
tatastasmādavaplutya gajādbhārata bhārataḥ | khaḍgapāṇiradīnātmā tasthau bhūmau sudaṃśitaḥ
हे भारत, तब वह भरतवंशी उस हाथी से कूदकर हाथ में तलवार लिए, अदीन मन से, भली-भाँति कवच पहने धरती पर खड़ा हो गया।
श्लोक 43 (6.54.43)
स चचार बहून्मार्गानभितः पातयन्गजान् । अग्निचक्रमिवाविद्धं सर्वतः प्रत्यदृश्यत ॥
sa cacāra bahūnmārgānabhitaḥ pātayangajān | agnicakramivāviddhaṃ sarvataḥ pratyadṛśyata
वे चारों ओर अनेक पैंतरों से विचरते हुए हाथियों को गिराने लगे; घूमते हुए अग्निचक्र की भाँति वे सब ओर दिखाई देते थे।
श्लोक 44 (6.54.44)
अश्वबृन्देषु नागेषु रथानीकेषु चाभिभूः । पदातीनां च सङ्घेषु विनिघ्नञ्शोणितोक्षितः ॥
aśvabṛndeṣu nāgeṣu rathānīkeṣu cābhibhūḥ | padātīnāṃ ca saṅgheṣu vinighnañśoṇitokṣitaḥ
घोड़ों के झुण्डों में, हाथियों में, रथसेनाओं में और पैदलों के समूहों में संहार करते हुए, लहू से नहाए वे विजयी वीर
श्लोक 45 (6.54.45)
श्येनवद्व्यचरद्भीमो रणेऽरिषु बलोत्कटः । छिन्दंस्तेषां शरीराणि शिरांसि च महाबलः ॥
śyenavadvyacaradbhīmo raṇe'riṣu balotkaṭaḥ | chindaṃsteṣāṃ śarīrāṇi śirāṃsi ca mahābalaḥ
भीम रण में शत्रुओं के बीच बाज़ की तरह विचरने लगे, बल से उग्र; वह महाबली
श्लोक 46 (6.54.46)
खड्गेन शितधारेण संयुगे गजयोधिनाम् । पदातिरेकः संक्रुद्धः शत्रूणां भयवर्धनः ॥
khaḍgena śitadhāreṇa saṃyuge gajayodhinām | padātirekaḥ saṃkruddhaḥ śatrūṇāṃ bhayavardhanaḥ
अपनी तीखी धार वाली तलवार से युद्ध में गजयोद्धाओं के शरीर और सिर काटते जा रहे थे। अकेले, पैदल, क्रोध से भरे, शत्रुओं का भय बढ़ाते हुए
श्लोक 47 (6.54.47)
संमोहयामास स तान्कालान्तकयमोपमः । मूढाश्च ते तमेवाजौ विनदन्तः समाद्रवन् ॥
saṃmohayāmāsa sa tānkālāntakayamopamaḥ | mūḍhāśca te tamevājau vinadantaḥ samādravan
प्रलयकाल के यमराज के समान उन्होंने उन्हें मोहित कर दिया। मोहित हुए वे योद्धा गरजते हुए रण में उन्हीं की ओर दौड़े,
श्लोक 48 (6.54.48)
सासिमुत्तमवेगेन विचरन्तं महारणे । निकृत्य रथिनां चाजौ रथेषाश्च युगानि च ॥
sāsimuttamavegena vicarantaṃ mahāraṇe | nikṛtya rathināṃ cājau ratheṣāśca yugāni ca
जबकि वे तलवार लिए परम वेग से महायुद्ध में विचर रहे थे। रण में रथियों के रथों के ईषादण्ड और जुए काटकर
श्लोक 49 (6.54.49)
जघान रथिनश्चापि बलवान्रिपुमर्दनः । भीमसेनश्चरन्मार्गान्सुबहून्प्रत्यदृश्यत ॥
jaghāna rathinaścāpi balavānripumardanaḥ | bhīmasenaścaranmārgānsubahūnpratyadṛśyata
उस बलवान् शत्रुमर्दन ने रथियों को भी मार डाला। भीमसेन बहुत-से पैंतरे चलते हुए दिखाई दिए:
श्लोक 50 (6.54.50)
भ्रान्तमाविद्धमुद्भ्रान्तमाप्लुतं प्रसृतं प्लुतम् । संपातं समुदीर्णं च दर्शयामास पाण्डवः ॥
bhrāntamāviddhamudbhrāntamāplutaṃ prasṛtaṃ plutam | saṃpātaṃ samudīrṇaṃ ca darśayāmāsa pāṇḍavaḥ
भ्रान्त, आविद्ध, उद्भ्रान्त, आप्लुत, प्रसृत, प्लुत, सम्पात और समुदीर्ण — ये सभी पैंतरे पाण्डुपुत्र ने दिखाए।
श्लोक 51 (6.54.51)
केचिदग्रासिना छिन्नाः पाण्डवेन महात्मना । विनेदुर्भिन्नमर्माणो निपेतुश्च गतासवः ॥
kecidagrāsinā chinnāḥ pāṇḍavena mahātmanā | vinedurbhinnamarmāṇo nipetuśca gatāsavaḥ
कुछ योद्धा महात्मा पाण्डुपुत्र की तलवार की नोक से कटकर, मर्मस्थान बिंध जाने से चीख उठे और प्राणहीन होकर गिर पड़े।
श्लोक 52 (6.54.52)
छिन्नदन्ताग्रहस्ताश्च भिन्नकुम्भास्तथाऽपरे । वियोधाः स्वान्यनीकानि जघ्नुर्भारत वारणाः ॥
chinnadantāgrahastāśca bhinnakumbhāstathā'pare | viyodhāḥ svānyanīkāni jaghnurbhārata vāraṇāḥ
हे भारत, दूसरे हाथी, जिनके दाँतों के अगले भाग और सूँड़ें कट गई थीं और कुम्भस्थल फट गए थे, सवारों से रहित होकर अपनी ही सेनाओं को मारने लगे
श्लोक 53 (6.54.53)
निपेतुरुर्व्यां च तथा विनदन्तो महारवान् । छिन्नांश्च तोमरान्राजन्महामात्रशिरांसि च ॥
nipetururvyāṃ ca tathā vinadanto mahāravān | chinnāṃśca tomarānrājanmahāmātraśirāṃsi ca
और ज़ोर से चिंघाड़ते हुए धरती पर गिर पड़े। हे राजन्, कटे हुए तोमर और महावतों के सिर,
श्लोक 54 (6.54.54)
परिस्तोमान्विचित्रांश्च कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः । ग्रैवेयाण्यथ शक्तीश्च पताकाः कणपांस्तथा ॥
paristomānvicitrāṃśca kakṣyāśca kanakojjvalāḥ | graiveyāṇyatha śaktīśca patākāḥ kaṇapāṃstathā
रंग-बिरंगी झूलें, सोने से चमकती कमरबन्दें, कण्ठहार, शक्तियाँ, पताकाएँ और मुद्गर,
श्लोक 55 (6.54.55)
तूणीरानथ यन्त्राणि विचित्राणि धनूंषि च । भिन्दिपालानि शुभ्राणि तोत्राणि चाङ्कुशैः सह ॥
tūṇīrānatha yantrāṇi vicitrāṇi dhanūṃṣi ca | bhindipālāni śubhrāṇi totrāṇi cāṅkuśaiḥ saha
तरकस, यन्त्र और विचित्र धनुष, चमकते भिन्दिपाल, चाबुक और अंकुश,
श्लोक 56 (6.54.56)
घण्टाश्च विविधा राजन्हेमगर्भान्त्सरूनपि । पततः पातितांश्चैव पश्यामः सह सादिभिः ॥
ghaṇṭāśca vividhā rājanhemagarbhāntsarūnapi | patataḥ pātitāṃścaiva paśyāmaḥ saha sādibhiḥ
और हे राजन्, अनेक प्रकार के घण्टे तथा स्वर्णजटित तलवारों की मूठें — इन सबको हमने सवारों सहित गिरते और गिरे हुए देखा।
श्लोक 57 (6.54.57)
छिन्नगात्रावरकरैर्निहतैश्चापि वारणैः । आसीद्भूमिः समास्तीर्णा पतितैर्भूधरैरिव ॥
chinnagātrāvarakarairnihataiścāpi vāraṇaiḥ | āsīdbhūmiḥ samāstīrṇā patitairbhūdharairiva
जिनके अगले-पिछले अंग और सूँड़ें कट गई थीं, ऐसे मरे हुए हाथियों से धरती ऐसी पट गई मानो गिरे हुए पर्वतों से ढकी हो।
श्लोक 58 (6.54.58)
विमृद्यैवं महानागान्ममर्दाश्वान्महाबलः । अश्वारोहवरांश्चैव पातयामास संयुगे ॥
vimṛdyaivaṃ mahānāgānmamardāśvānmahābalaḥ | aśvārohavarāṃścaiva pātayāmāsa saṃyuge
इस प्रकार बड़े-बड़े हाथियों को रौंदकर उस महाबली ने घोड़ों को भी कुचल डाला और युद्ध में श्रेष्ठ घुड़सवारों को मार गिराया।
श्लोक 59 (6.54.59)
तद्धोरमभवद्युद्धं तस्य तेषां च भारत । खलीनान्यथ योक्त्राणि कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः ॥
taddhoramabhavadyuddhaṃ tasya teṣāṃ ca bhārata | khalīnānyatha yoktrāṇi kakṣyāśca kanakojjvalāḥ
हे भारत, उनके और उन योद्धाओं के बीच वह युद्ध बड़ा भयंकर हुआ। लगामें, जोतें, सोने से चमकती कमरबन्दें,
श्लोक 60 (6.54.60)
परिस्तोमाश्च प्रासाश्च ऋष्टयश्च महाधनाः । कवचान्यथ चर्माणि चित्राण्यास्तरणानि च ॥
paristomāśca prāsāśca ṛṣṭayaśca mahādhanāḥ | kavacānyatha carmāṇi citrāṇyāstaraṇāni ca
झूलें, प्रास और बहुमूल्य ऋष्टियाँ, कवच, ढालें और रंग-बिरंगे बिछावन
श्लोक 61 (6.54.61)
तत्रतत्रापविद्धानि व्यदृश्यन्त महाहवे । प्रासैर्यन्त्रैर्विचित्रैश्च शस्त्रैश्च विमलैस्तथा ॥
tatratatrāpaviddhāni vyadṛśyanta mahāhave | prāsairyantrairvicitraiśca śastraiśca vimalaistathā
उस महायुद्ध में जहाँ-तहाँ बिखरे दिखाई दे रहे थे। प्रासों, विचित्र यन्त्रों और चमकते शस्त्रों से
श्लोक 62 (6.54.62)
स चक्रे वसुधां कीर्णां शबलैः कुसुमैरिव । आप्लुत्य रथिनः कांश्चित्परामृश्य महाबलः ॥
sa cakre vasudhāṃ kīrṇāṃ śabalaiḥ kusumairiva | āplutya rathinaḥ kāṃścitparāmṛśya mahābalaḥ
उन्होंने धरती को मानो रंग-बिरंगे फूलों से पाट दिया। उस महाबली ने उछलकर कुछ रथियों को पकड़ लिया
श्लोक 63 (6.54.63)
पातयामास खड्गेन सध्वजानपि पाण्डवः । मुहुरुत्पततो दिक्षु धावतश्च यशस्विनः ॥
pātayāmāsa khaḍgena sadhvajānapi pāṇḍavaḥ | muhurutpatato dikṣu dhāvataśca yaśasvinaḥ
और पाण्डुपुत्र ने उन्हें ध्वजाओं सहित तलवार से मार गिराया। वह यशस्वी बार-बार उछलता, सब दिशाओं में दौड़ता
श्लोक 64 (6.54.64)
मार्गांश्च चरतश्चित्रं व्यस्मयन्त रणे जनाः । स जघान पदा कांश्चिद्व्याक्षिप्यान्यानपोथयत् ॥
mārgāṃśca carataścitraṃ vyasmayanta raṇe janāḥ | sa jaghāna padā kāṃścidvyākṣipyānyānapothayat
और अद्भुत पैंतरे चलता था, यह देखकर रण में लोग चकित रह गए। कुछ को उन्होंने पैर से मार डाला, कुछ को उठाकर पटककर कुचल दिया;
श्लोक 65 (6.54.65)
खड्गेनान्यांश्च चिच्छेद नादेनान्यांश्च भीषयन् । ऊरुवेगेन चाप्यन्यान्पातयामास भूतले ॥
khaḍgenānyāṃśca ciccheda nādenānyāṃśca bhīṣayan | ūruvegena cāpyanyānpātayāmāsa bhūtale
औरों को तलवार से काट डाला, कुछ को अपनी गर्जना से डरा दिया, और कुछ को जाँघों के वेग से धरती पर गिरा दिया।
श्लोक 66 (6.54.66)
अपरे चैनमालोक्य भयात्पञ्चत्वमागताः । एवं सा बहुला सेना कलिङ्गानां तरस्विनाम् ॥
apare cainamālokya bhayātpañcatvamāgatāḥ | evaṃ sā bahulā senā kaliṅgānāṃ tarasvinām
कुछ तो उन्हें देखते ही भय से मृत्यु को प्राप्त हो गए। इस प्रकार वेगशाली कलिङ्गों की वह विशाल सेना
श्लोक 67 (6.54.67)
परिवार्य रणे भीष्मं भीमसेनमुपाद्रवत् । ततः कालिङ्गसैन्यानां प्रमुखे भरतर्षभ ॥
parivārya raṇe bhīṣmaṃ bhīmasenamupādravat | tataḥ kāliṅgasainyānāṃ pramukhe bharatarṣabha
रण में भीष्म को घेरे में लेकर भीमसेन पर टूट पड़ी। तब हे भरतश्रेष्ठ, कलिङ्ग सेना के अग्रभाग में
श्लोक 68 (6.54.68)
श्रुतायुषमभिप्रेक्ष्य भीमसेनः समभ्ययात् । तमायान्तमभिप्रेक्ष्य कालिङ्गो नवभिः शरैः ॥
śrutāyuṣamabhiprekṣya bhīmasenaḥ samabhyayāt | tamāyāntamabhiprekṣya kāliṅgo navabhiḥ śaraiḥ
श्रुतायु को देखकर भीमसेन उसकी ओर बढ़े। उन्हें आते देख कलिङ्गराज ने नौ बाणों से
श्लोक 69 (6.54.69)
भीमसेनममेयात्मा प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे । कलिङ्गबाणाभिहतस्तोत्रार्दित इव द्विपः ॥
bhīmasenamameyātmā pratyavidhyatstanāntare | kaliṅgabāṇābhihatastotrārdita iva dvipaḥ
उस अपार साहस वाले ने भीमसेन की छाती पर प्रहार किया। कलिङ्गराज के बाणों से आहत होकर, अंकुश से पीड़ित हाथी की भाँति,
श्लोक 70 (6.54.70)
भीमसेनः प्रजज्वाल क्रोधेनाग्निरिवैधितः । अथाशोकः समादाय रथं हेमपरिष्कृतम् ॥
bhīmasenaḥ prajajvāla krodhenāgnirivaidhitaḥ | athāśokaḥ samādāya rathaṃ hemapariṣkṛtam
भीमसेन क्रोध से प्रज्वलित अग्नि की भाँति धधक उठे। तब सारथि अशोक (विशोक) सोने से सजा रथ लेकर आया
श्लोक 71 (6.54.71)
भीमं संपादयामास रथेन रथसारथिः । तमारुह्य रथं तूर्णं कौन्तेयः शत्रुसूदनः ॥
bhīmaṃ saṃpādayāmāsa rathena rathasārathiḥ | tamāruhya rathaṃ tūrṇaṃ kaunteyaḥ śatrusūdanaḥ
और उसने भीम को वह रथ प्रदान किया। उस रथ पर तुरन्त चढ़कर शत्रुसूदन कुन्तीपुत्र
श्लोक 72 (6.54.72)
कलिङ्गमभिदुद्राव तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । ततः श्रुतायुर्बलवान्भीमाय निशिताञ्शरान् ॥
kaliṅgamabhidudrāva tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt | tataḥ śrutāyurbalavānbhīmāya niśitāñśarān
"ठहर, ठहर!" कहते हुए कलिङ्गराज पर झपटे। तब बलवान् श्रुतायु ने क्रुद्ध होकर भीम पर तीखे बाण
श्लोक 73 (6.54.73)
प्रेषयामास संक्रुद्धो दर्शयन्पाणिलाघवम् । स कार्मुकवरोत्सृष्टैर्नवभिर्निशितैः शरैः ॥
preṣayāmāsa saṃkruddho darśayanpāṇilāghavam | sa kārmukavarotsṛṣṭairnavabhirniśitaiḥ śaraiḥ
अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए छोड़े। श्रेष्ठ धनुष से छूटे उन नौ तीखे बाणों से
श्लोक 74 (6.54.74)
समाहतो महाराज कलिङ्गेन महात्मना । संचुक्रुशे भृशं भीमो दण्डाहत इवोरगः ॥
samāhato mahārāja kaliṅgena mahātmanā | saṃcukruśe bhṛśaṃ bhīmo daṇḍāhata ivoragaḥ
हे महाराज, महात्मा कलिङ्गराज के प्रहार से आहत भीम डण्डे से मारे गए साँप की तरह ज़ोर से चीत्कार कर उठे।
श्लोक 75 (6.54.75)
क्रुद्धश्च चापमायम्य बलवद्बलिनां वरः । कलिङ्गमवधीत्पार्थो भीमः सप्तभिरायसैः ॥
kruddhaśca cāpamāyamya balavadbalināṃ varaḥ | kaliṅgamavadhītpārtho bhīmaḥ saptabhirāyasaiḥ
क्रोध में भरकर बलवानों में श्रेष्ठ पृथापुत्र भीम ने बलपूर्वक धनुष खींचा और सात लोहे के बाणों से कलिङ्गराज का वध कर दिया।
श्लोक 76 (6.54.76)
क्षुराभ्यां चक्ररक्षौ च कलिङ्गस्य महाबलौ । सत्यदेवं च सत्यं च प्राहिणोद्यमसादनम् ॥
kṣurābhyāṃ cakrarakṣau ca kaliṅgasya mahābalau | satyadevaṃ ca satyaṃ ca prāhiṇodyamasādanam
दो क्षुर बाणों से उन्होंने कलिङ्गराज के दो महाबली चक्ररक्षकों, सत्यदेव और सत्य, को यमलोक भेज दिया।
श्लोक 77 (6.54.77)
ततः पुनरमेयात्मा नाराचैर्निशितैस्त्रिभिः । केतुमन्तं रणे भीमोऽगमयद्यमसादनम् ॥
tataḥ punarameyātmā nārācairniśitaistribhiḥ | ketumantaṃ raṇe bhīmo'gamayadyamasādanam
फिर अपार साहस वाले भीम ने तीन तीखे नाराचों से रण में केतुमान् को यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 78 (6.54.78)
ततः कलिङ्गाः सन्नद्धा भीमसेनममर्षणम् । अनीकैर्बहुसाहस्रैः क्षत्रियाः समवारयन् ॥
tataḥ kaliṅgāḥ sannaddhā bhīmasenamamarṣaṇam | anīkairbahusāhasraiḥ kṣatriyāḥ samavārayan
तब कवच धारण किए कलिङ्ग क्षत्रियों ने कई हज़ार की टुकड़ियों से असहिष्णु भीमसेन को घेर लिया।
श्लोक 79 (6.54.79)
ततः शक्तिगदाखड्गतोमरर्ष्टिपरश्वथैः । कलिङ्गाश्च ततो राजन्भीमसेनमवाकिरन् ॥
tataḥ śaktigadākhaḍgatomararṣṭiparaśvathaiḥ | kaliṅgāśca tato rājanbhīmasenamavākiran
तब हे राजन्, कलिङ्गों ने भीमसेन पर शक्तियों, गदाओं, तलवारों, तोमरों, ऋष्टियों और फरसों की वर्षा कर दी।
श्लोक 80 (6.54.80)
संनिवार्य स तां घोरां शरवृष्टिं समुत्थिताम् । गदामादाय तरसा संनिपत्य महाबलः ॥
saṃnivārya sa tāṃ ghorāṃ śaravṛṣṭiṃ samutthitām | gadāmādāya tarasā saṃnipatya mahābalaḥ
उठी हुई उस भयानक बाणवर्षा को रोककर, वेग से गदा उठाकर और शत्रुओं पर टूटकर उस महाबली
श्लोक 81 (6.54.81)
भीमः सप्तशतान्वीराननयद्यमसादनम् । पुनश्चैव द्विसाहस्रान्कलिङ्गानरिमर्दनः ॥
bhīmaḥ saptaśatānvīrānanayadyamasādanam | punaścaiva dvisāhasrānkaliṅgānarimardanaḥ
भीम ने सात सौ वीरों को यमलोक भेज दिया; और फिर उस शत्रुमर्दन ने दो हज़ार कलिङ्गों को
श्लोक 82 (6.54.82)
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय तदद्भुतमिवाभवत् । एवं स तान्यनीकानि कलिङ्गानां पुनःपुनः ॥
prāhiṇonmṛtyulokāya tadadbhutamivābhavat | evaṃ sa tānyanīkāni kaliṅgānāṃ punaḥpunaḥ
मृत्युलोक पहुँचा दिया — यह एक अचम्भा-सा था। इस प्रकार बार-बार कलिङ्गों की सेनाओं को
श्लोक 83 (6.54.83)
बिभेद समरे तूर्णं प्रेक्ष्य भीष्मं महारथम् । हतारोहाश्च मातङ्गाः पाण्डवेन कृता रणे ॥
bibheda samare tūrṇaṃ prekṣya bhīṣmaṃ mahāratham | hatārohāśca mātaṅgāḥ pāṇḍavena kṛtā raṇe
वे महारथी भीष्म की ओर देखते हुए रण में तेज़ी से तोड़ते रहे। पाण्डुपुत्र द्वारा रण में जिनके सवार मार दिए गए थे, वे हाथी
श्लोक 84 (6.54.84)
विप्रजग्मुरनीकेषु मेघा वातहता इव । मृद्नन्तः स्वान्यनीकानि विनदन्तः शरातुराः ॥
viprajagmuranīkeṣu meghā vātahatā iva | mṛdnantaḥ svānyanīkāni vinadantaḥ śarāturāḥ
हवा से उड़ाए बादलों की तरह सेनाओं के बीच भागने लगे; बाणों से पीड़ित होकर चिंघाड़ते हुए वे अपनी ही सेनाओं को रौंद रहे थे।
श्लोक 85 (6.54.85)
ततो भीमो महाबाहुः खड्गहस्तो महाभुजः । संप्रहृष्टो महाघोषं शङ्खं प्राध्मापयद्बली ॥
tato bhīmo mahābāhuḥ khaḍgahasto mahābhujaḥ | saṃprahṛṣṭo mahāghoṣaṃ śaṅkhaṃ prādhmāpayadbalī
तब हाथ में तलवार लिए, लम्बी भुजाओं वाले उस बलवान् महाबाहु भीम ने हर्ष से भरकर ऊँचे स्वर वाला शंख बजाया।
श्लोक 86 (6.54.86)
सर्वकालिङ्गसैन्यानां मनांसि समकम्पयत् । मोहश्चापि कलिङ्गानामाविवेश परंतप ॥
sarvakāliṅgasainyānāṃ manāṃsi samakampayat | mohaścāpi kaliṅgānāmāviveśa paraṃtapa
उन्होंने कलिङ्गों की सारी सेनाओं के मन कँपा दिए, और हे परन्तप, कलिङ्गों पर मोह छा गया।
श्लोक 87 (6.54.87)
प्राकम्पन्त च सैन्यानि वाहनानि च सर्वशः । भीमेन समरे राजन्गजेन्द्रेणेव सर्वशः ॥
prākampanta ca sainyāni vāhanāni ca sarvaśaḥ | bhīmena samare rājangajendreṇeva sarvaśaḥ
हे राजन्, सेनाएँ और वाहन सब ओर काँप उठे, जब भीम गजराज की भाँति रण में चारों ओर
श्लोक 88 (6.54.88)
मार्गान्बहून्विचरता धावता च ततस्ततः । मुहुरुत्पतता चैव संमोहः समपद्यत ॥
mārgānbahūnvicaratā dhāvatā ca tatastataḥ | muhurutpatatā caiva saṃmohaḥ samapadyata
अनेक मार्गों पर विचरते, इधर-उधर दौड़ते और बार-बार उछलते रहे — तब सब ओर घबराहट फैल गई।
श्लोक 89 (6.54.89)
भीमसेनभयत्रस्तं सैन्यं च समकम्पत । क्षोभ्यमाणमसंबाधं ग्राहेणेव महत्सरः ॥
bhīmasenabhayatrastaṃ sainyaṃ ca samakampata | kṣobhyamāṇamasaṃbādhaṃ grāheṇeva mahatsaraḥ
भीमसेन के भय से त्रस्त वह सेना ऐसे काँप उठी जैसे मगरमच्छ के मथने से कोई विशाल, खुला सरोवर डोल उठता है।
श्लोक 90 (6.54.90)
त्रासितेषु च सर्वेषु भीमेनाद्भुतकर्मणा । पुनरावर्तमानेषु विद्रवत्सु च सङ्घशः ॥
trāsiteṣu ca sarveṣu bhīmenādbhutakarmaṇā | punarāvartamāneṣu vidravatsu ca saṅghaśaḥ
जब अद्भुत कर्म वाले भीम से सब भयभीत हो गए और लौटते तथा झुण्ड के झुण्ड भागने लगे —
श्लोक 91 (6.54.91)
सर्वकालिङ्गयोधेषु पाण्डूनां ध्वजिनीपतिः । अब्रवीत्स्वान्यनीकानि युध्यध्वमिति पार्षतः ॥
sarvakāliṅgayodheṣu pāṇḍūnāṃ dhvajinīpatiḥ | abravītsvānyanīkāni yudhyadhvamiti pārṣataḥ
कलिङ्गों के सारे योद्धा — तब पाण्डवों के सेनापति पार्षत (धृष्टद्युम्न) ने अपनी सेनाओं से कहा, "युद्ध करो!"
श्लोक 92 (6.54.92)
सेनापतिवचः श्रुत्वा शिखण्डिप्रमुखा गणाः । भीममेवाभ्यवर्तन्त रथानीकैः प्रहारिभिः ॥
senāpativacaḥ śrutvā śikhaṇḍipramukhā gaṇāḥ | bhīmamevābhyavartanta rathānīkaiḥ prahāribhiḥ
सेनापति के वचन सुनकर शिखण्डी आदि के दल प्रहार करने को आतुर रथसेनाओं के साथ भीम की ही ओर बढ़े।
श्लोक 93 (6.54.93)
धर्मराजश्च तान्सर्वानुपजग्राह पाण्डवः । महता मेघवर्णेन नागानीकेन पृष्ठतः ॥
dharmarājaśca tānsarvānupajagrāha pāṇḍavaḥ | mahatā meghavarṇena nāgānīkena pṛṣṭhataḥ
और पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने मेघ के रंग वाली विशाल गजसेना के साथ पीछे से उन सबको सहारा दिया।
श्लोक 94 (6.54.94)
एवं संनोद्य सर्वाणि स्वान्यनीकानि पार्षतः । भीमसेनस्य जग्राह पार्ष्णिं सत्पुरुषैर्वृतः ॥
evaṃ saṃnodya sarvāṇi svānyanīkāni pārṣataḥ | bhīmasenasya jagrāha pārṣṇiṃ satpuruṣairvṛtaḥ
इस प्रकार अपनी सारी सेनाओं को प्रेरित करके सत्पुरुषों से घिरे पार्षत ने भीमसेन के पृष्ठभाग की रक्षा का भार सँभाला।
श्लोक 95 (6.54.95)
न हि पञ्चालराजस्य लोके कश्चन विद्यते । भीमसात्यकयोरन्यः प्राणेभ्यः प्रियकृत्तमः ॥
na hi pañcālarājasya loke kaścana vidyate | bhīmasātyakayoranyaḥ prāṇebhyaḥ priyakṛttamaḥ
क्योंकि पाञ्चालराज को संसार में भीम और सात्यकि के सिवा कोई ऐसा नहीं, जो उन्हें प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हो।
श्लोक 96 (6.54.96)
सोऽपश्यच्च कलिङ्गेषु चरन्तमरिसूदनः । भीमसेनं महाबाहुं पार्षतः परवीरहा ॥
so'paśyacca kaliṅgeṣu carantamarisūdanaḥ | bhīmasenaṃ mahābāhuṃ pārṣataḥ paravīrahā
शत्रुओं का संहार करने वाले, शत्रुवीरों के घातक पार्षत ने महाबाहु भीमसेन को कलिङ्गों के बीच विचरते देखा।
श्लोक 97 (6.54.97)
ननर्द बहुधा राजन्हृष्टश्चासीत्परंतपः । शङ्खं दध्मौ च समरे सिंहनादं ननाद च ॥
nanarda bahudhā rājanhṛṣṭaścāsītparaṃtapaḥ | śaṅkhaṃ dadhmau ca samare siṃhanādaṃ nanāda ca
हे राजन्, वह परन्तप हर्षित होकर बार-बार गरजा; उसने रण में शंख बजाया और सिंहनाद किया।
श्लोक 98 (6.54.98)
स च पारावताश्वस्य रथे हेमपरिष्कृते । कोविदारध्वजं दृष्ट्वा भीमसेनः समाश्वसत् ॥
sa ca pārāvatāśvasya rathe hemapariṣkṛte | kovidāradhvajaṃ dṛṣṭvā bhīmasenaḥ samāśvasat
और कबूतर के रंग वाले घोड़ों से जुते, सोने से सजे रथ पर कोविदार-ध्वज देखकर भीमसेन को ढाढ़स बँधा।
श्लोक 99 (6.54.99)
धृष्टद्युम्नस्तु तं दृष्ट्वा कलिङ्गैः समभिद्रुतम् । भीमसेनममेयात्मा त्राणायाजौ समभ्ययात् ॥
dhṛṣṭadyumnastu taṃ dṛṣṭvā kaliṅgaiḥ samabhidrutam | bhīmasenamameyātmā trāṇāyājau samabhyayāt
भीमसेन को कलिङ्गों से घिरा देखकर अपार साहस वाला धृष्टद्युम्न युद्ध में उनकी रक्षा के लिए आ पहुँचा।
श्लोक 100 (6.54.100)
तौ दूरात्सात्यकिं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नवृकोदरौ । कलिङ्गान्समरे वीरौ योधयेतां मनस्विनौ ॥
tau dūrātsātyakiṃ dṛṣṭvā dhṛṣṭadyumnavṛkodarau | kaliṅgānsamare vīrau yodhayetāṃ manasvinau
सात्यकि को दूर से देखकर वे दोनों मनस्वी वीर, धृष्टद्युम्न और वृकोदर, रण में कलिङ्गों से लड़ते रहे।
श्लोक 101 (6.54.101)
स तत्र गत्वा शैनेयो जवेन जयतां वरः । पार्थपार्षतयोः पार्ष्णिं जग्राह पुरुषर्षभः ॥
sa tatra gatvā śaineyo javena jayatāṃ varaḥ | pārthapārṣatayoḥ pārṣṇiṃ jagrāha puruṣarṣabhaḥ
विजेताओं में श्रेष्ठ, पुरुषश्रेष्ठ शिनि के पौत्र ने वेग से वहाँ पहुँचकर पृथापुत्र और पार्षत के पृष्ठभाग की रक्षा की।
श्लोक 102 (6.54.102)
स कृत्वा दारुणं कर्म प्रगृहीतशरासनः । आस्थितो रौद्रमात्मानं कलिङ्गानन्ववैक्षत ॥
sa kṛtvā dāruṇaṃ karma pragṛhītaśarāsanaḥ | āsthito raudramātmānaṃ kaliṅgānanvavaikṣata
भयंकर कर्म करके, हाथ में धनुष लिए और रौद्र रूप धारण किए उसने कलिङ्गों की ओर दृष्टि डाली।
श्लोक 103 (6.54.103)
कलिङ्गप्रभवां चैव मांसशोणितकर्दमाम् । रुधिरस्यन्दिनीं तत्र भीमः प्रावर्तयन्नदीम् ॥
kaliṅgaprabhavāṃ caiva māṃsaśoṇitakardamām | rudhirasyandinīṃ tatra bhīmaḥ prāvartayannadīm
और वहाँ भीम ने कलिङ्गों से उत्पन्न, मांस और रक्त के कीचड़ वाली, रक्त बहाती एक नदी बहा दी।
श्लोक 104 (6.54.104)
अन्तरेण कलिङ्गानां पाण्डवानां च वाहिनीम् । तां संततार दुस्तारां भीमसेनो महाबलः ॥
antareṇa kaliṅgānāṃ pāṇḍavānāṃ ca vāhinīm | tāṃ saṃtatāra dustārāṃ bhīmaseno mahābalaḥ
कलिङ्गों और पाण्डवों की सेनाओं के बीच बहती उस दुस्तर नदी को महाबली भीमसेन पार कर गए।
श्लोक 105 (6.54.105)
भीमसेनं तथा दृष्ट्वा प्राक्रोशंस्तावका नृप । कालोऽयं भीमरूपेण कलिङ्गैः सह युध्यते ॥
bhīmasenaṃ tathā dṛṣṭvā prākrośaṃstāvakā nṛpa | kālo'yaṃ bhīmarūpeṇa kaliṅgaiḥ saha yudhyate
भीमसेन को ऐसा देखकर, हे राजन्, आपके योद्धा चिल्ला उठे, "यह तो भीम के रूप में स्वयं काल कलिङ्गों से लड़ रहा है!"
श्लोक 106 (6.54.106)
ततः शान्तनवो भीष्मः श्रुत्वा तं निनदं रणे । अभ्ययात्त्वरितो भीमं व्यूढानीकः समंततः ॥
tataḥ śāntanavo bhīṣmaḥ śrutvā taṃ ninadaṃ raṇe | abhyayāttvarito bhīmaṃ vyūḍhānīkaḥ samaṃtataḥ
तब शान्तनुपुत्र भीष्म रण में वह कोलाहल सुनकर चारों ओर व्यूहबद्ध सेना के साथ शीघ्रता से भीम की ओर बढ़े।
श्लोक 107 (6.54.107)
तं सात्यकिर्भीमसेनो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । अभ्यद्रवन्त भीष्मस्य रथं हेमपरिष्कृतम् ॥
taṃ sātyakirbhīmaseno dhṛṣṭadyumnaśca pārṣataḥ | abhyadravanta bhīṣmasya rathaṃ hemapariṣkṛtam
सात्यकि, भीमसेन और पार्षत धृष्टद्युम्न भीष्म के सोने से सजे रथ पर टूट पड़े।
श्लोक 108 (6.54.108)
परिवार्य तु ते सर्वे गाङ्गेयं तरसा रणे । त्रिभिस्त्रिभिः शरैर्घोरैर्भीष्ममानर्च्छुरोजसा ॥
parivārya tu te sarve gāṅgeyaṃ tarasā raṇe | tribhistribhiḥ śarairghorairbhīṣmamānarcchurojasā
उन सबने रण में वेग से गङ्गापुत्र को घेरकर तीन-तीन भयंकर बाणों से ओजपूर्वक भीष्म पर प्रहार किया।
श्लोक 109 (6.54.109)
प्रत्यविध्यत तान्सर्वान्पिता देवव्रतस्तव । यतमानान्महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥
pratyavidhyata tānsarvānpitā devavratastava | yatamānānmaheṣvāsāṃstribhistribhirajihmagaiḥ
आपके पिता देवव्रत ने भी उन सब प्रयत्नशील महाधनुर्धरों को तीन-तीन सीधे जाने वाले बाणों से बेध डाला।
श्लोक 110 (6.54.110)
ततः शरसहस्रेण सन्निवार्य महारथान् । हयान्काञ्चनसन्नाहान्भीमस्य न्यहनच्छरैः ॥
tataḥ śarasahasreṇa sannivārya mahārathān | hayānkāñcanasannāhānbhīmasya nyahanaccharaiḥ
फिर हज़ार बाणों से उन महारथियों को रोककर उन्होंने अपने बाणों से भीम के सोने के कवच वाले घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 111 (6.54.111)
हताश्वे स रथे तिष्ठन्भीमसेनः प्रतापवान् । शक्तिं चिक्षेप तरसा गाङ्गेयस्य रथं प्रति ॥
hatāśve sa rathe tiṣṭhanbhīmasenaḥ pratāpavān | śaktiṃ cikṣepa tarasā gāṅgeyasya rathaṃ prati
मरे घोड़ों वाले रथ पर खड़े प्रतापी भीमसेन ने वेग से गङ्गापुत्र के रथ की ओर शक्ति फेंकी।
श्लोक 112 (6.54.112)
अप्राप्तामथ तां शक्तिं पिता देवव्रतस्तव । त्रिधा चिच्छेद समरे सा पृथिव्यामशीर्यत ॥
aprāptāmatha tāṃ śaktiṃ pitā devavratastava | tridhā ciccheda samare sā pṛthivyāmaśīryata
उस शक्ति के पहुँचने से पहले ही आपके पिता देवव्रत ने रण में उसके तीन टुकड़े कर दिए और वह बिखरकर धरती पर गिर पड़ी।
श्लोक 113 (6.54.113)
ततः शैक्यायसीं गुर्वीं प्रगृह्य बलवान्गदाम् । भीमसेनस्ततस्तूर्णं पुप्लुवे मनुजर्षभ ॥
tataḥ śaikyāyasīṃ gurvīṃ pragṛhya balavāngadām | bhīmasenastatastūrṇaṃ pupluve manujarṣabha
हे नरश्रेष्ठ, तब बलवान् भीमसेन शैक्य लोहे की भारी गदा उठाकर तुरन्त आगे कूद पड़े।
श्लोक 114 (6.54.114)
सात्यकोऽपि ततस्तूर्णं भीमस्य प्रियकाम्यया । गाङ्गेयसारथिं तूर्णं पातयामास सायकैः ॥
sātyako'pi tatastūrṇaṃ bhīmasya priyakāmyayā | gāṅgeyasārathiṃ tūrṇaṃ pātayāmāsa sāyakaiḥ
सात्यकि ने भी भीम का प्रिय करने की इच्छा से तुरन्त अपने बाणों से गङ्गापुत्र के सारथि को मार गिराया।
श्लोक 115 (6.54.115)
भीष्मस्तु निहते तस्मिन्सारथौ रथिनां वरः । वातायमानैस्तैरश्वैरपनीतो रणाजिरात् ॥
bhīṣmastu nihate tasminsārathau rathināṃ varaḥ | vātāyamānaistairaśvairapanīto raṇājirāt
सारथि के मारे जाने पर रथियों में श्रेष्ठ भीष्म को उनके बेकाबू होकर इधर-उधर भागते घोड़े रणभूमि से दूर ले गए।
श्लोक 116 (6.54.116)
भीमसेनस्ततो राजन्नपयाते महाव्रते । प्रजज्वाल यथा वह्निर्दहन्कक्षमिवैधितः ॥
bhīmasenastato rājannapayāte mahāvrate | prajajvāla yathā vahnirdahankakṣamivaidhitaḥ
हे राजन्, उन महाव्रती के चले जाने पर भीमसेन सूखे घास-फूस को जलाती बढ़ी हुई आग की भाँति धधक उठे।
श्लोक 117 (6.54.117)
स हत्वा सर्वकालिङ्गान्सेनामध्ये व्यतिष्ठत । नैनमभ्युत्सहन्केचित्तावका भरतर्षभ ॥
sa hatvā sarvakāliṅgānsenāmadhye vyatiṣṭhata | nainamabhyutsahankecittāvakā bharatarṣabha
सारे कलिङ्गों को मारकर वे सेना के बीच खड़े हो गए; हे भरतश्रेष्ठ, आपके पक्ष का कोई भी योद्धा उनके सामने आने का साहस न कर सका।
श्लोक 118 (6.54.118)
धृष्टद्युम्नस्तमारोप्य स्वरथे रथिनां वरः । पश्यतां सर्वसैन्यानामपोवाह यशस्विनम् ॥
dhṛṣṭadyumnastamāropya svarathe rathināṃ varaḥ | paśyatāṃ sarvasainyānāmapovāha yaśasvinam
रथियों में श्रेष्ठ धृष्टद्युम्न उस यशस्वी को अपने रथ पर चढ़ाकर सारी सेनाओं के देखते-देखते वहाँ से ले गया।
श्लोक 119 (6.54.119)
संपूज्यमानः पाञ्चाल्यैर्मत्स्यैश्च भरतर्षभ । धृष्टद्युम्नं परिष्वज्य समेयादथ सात्यकिम् ॥
saṃpūjyamānaḥ pāñcālyairmatsyaiśca bharatarṣabha | dhṛṣṭadyumnaṃ pariṣvajya sameyādatha sātyakim
हे भरतश्रेष्ठ, पाञ्चालों और मत्स्यों से सम्मानित होकर उन्होंने धृष्टद्युम्न को गले लगाया और फिर सात्यकि से मिले।
श्लोक 120 (6.54.120)
अथाब्रवीद्भीमसेनं सात्यकिः सत्यविक्रमः । प्रहर्षयन्यदुव्याघ्रो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ॥
athābravīdbhīmasenaṃ sātyakiḥ satyavikramaḥ | praharṣayanyaduvyāghro dhṛṣṭadyumnasya paśyataḥ
तब सच्चे पराक्रम वाले, यदुवंश के सिंह सात्यकि ने धृष्टद्युम्न के सामने भीमसेन को हर्षित करते हुए कहा:
सात्यकिरुवाच
श्लोक 121 (6.54.121)
दिष्ट्या कालिङ्गराजश्च राजपुत्रश्च केतुमान् । शक्रदेवश्च कालिङ्गः कलिङ्गाश्च मृधे हताः ॥
diṣṭyā kāliṅgarājaśca rājaputraśca ketumān | śakradevaśca kāliṅgaḥ kaliṅgāśca mṛdhe hatāḥ
"सौभाग्य से कलिङ्गराज, राजकुमार केतुमान्, कलिङ्ग का शक्रदेव और कलिङ्ग योद्धा युद्ध में मारे गए।
श्लोक 122 (6.54.122)
स्वबाहुबलवीर्येण नागाश्वरथसंकुलः । महापुरुषभूयिष्ठो धीरयोधनिषेवितः ॥
svabāhubalavīryeṇa nāgāśvarathasaṃkulaḥ | mahāpuruṣabhūyiṣṭho dhīrayodhaniṣevitaḥ
अपनी भुजाओं के बल और पराक्रम से, हाथियों, घोड़ों और रथों से भरा, महापुरुषों से युक्त और धीर योद्धाओं से सेवित कलिङ्गों का वह महाव्यूह
सञ्जय उवाच
श्लोक 123 (6.54.123)
महाव्यूहः कलिङ्गानामेकेन मृदितस्त्वया । एवमुक्त्वा शिनेर्नप्ता दीर्घबाहुररिन्दम । रथाद्रथमभिद्रुत्य पर्यष्वजत पाण्डवम् ॥
mahāvyūhaḥ kaliṅgānāmekena mṛditastvayā | evamuktvā śinernaptā dīrghabāhurarindama | rathādrathamabhidrutya paryaṣvajata pāṇḍavam
तुमने अकेले ही रौंद डाला है।" हे शत्रुदमन, ऐसा कहकर शिनि के दीर्घबाहु पौत्र ने अपने रथ से उनके रथ पर जाकर पाण्डुपुत्र को गले लगा लिया।
श्लोक 124 (6.54.124)
ततः स्वरथमास्थाय पुनरेव महारथः । तावकानवधीत्क्रुद्धो भीमस्य बलमादधत् ॥
tataḥ svarathamāsthāya punareva mahārathaḥ | tāvakānavadhītkruddho bhīmasya balamādadhat
तब वह महारथी फिर से अपने रथ पर चढ़कर क्रोधपूर्वक आपके योद्धाओं का वध करने लगा और भीम का बल बढ़ाने लगा।