भीष्म पर्व · अध्याय 55
अर्जुन द्वारा कौरव-सेना का संहार; दूसरे दिन का अन्त
दूसरे दिन तीसरे पहर धृष्टद्युम्न अश्वत्थामा, शल्य और कृप से लड़ता है; अभिमन्यु उसकी सहायता को आता है और दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण से द्वन्द्व करता है, तब दुर्योधन और अनेक राजा उसे घेर लेते हैं। पुत्र को बचाने अर्जुन दौड़ पड़ता है और भीष्म-द्रोण के नेतृत्व में सामने आए राजाओं के बीच ऐसा संहार करता है कि कौरव योद्धा चारों ओर भाग खड़े होते हैं और रणभूमि गिरे हुए शस्त्रों के ढेरों से भर जाती है। सेना को टूटती और सूर्य को अस्त होता देखकर भीष्म द्रोण से कहते हैं कि थके और डरे हुए सैनिक अब नहीं लड़ेंगे, और युद्ध रोक देते हैं; पाण्डव विजय-घोष करते हुए शिविर लौटते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.55.1)
ततोऽपराह्णभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि भारत । रथनागाश्वपत्तीनां सादिनां च महाक्षये ॥
tato'parāhṇabhūyiṣṭhe tasminnahani bhārata | rathanāgāśvapattīnāṃ sādināṃ ca mahākṣaye
हे भारत, उस दिन जब तीसरा पहर बहुत ढल चुका था, रथों, हाथियों, घोड़ों, पैदलों और घुड़सवारों के उस महासंहार में
श्लोक 2 (6.55.2)
द्रोणपुत्रेण शल्येन कृपेण च महात्मना । समसज्जत पाञ्चाल्यस्त्रिभिरैतैर्महारथैः ॥
droṇaputreṇa śalyena kṛpeṇa ca mahātmanā | samasajjata pāñcālyastribhiraitairmahārathaiḥ
पाञ्चालराजकुमार (धृष्टद्युम्न) इन तीन महारथियों से भिड़ गया: द्रोणपुत्र, शल्य और महात्मा कृप।
श्लोक 3 (6.55.3)
स लोकविदितानश्वान्निजघान महाबलः । द्रौणेः पाञ्चालदायादः शितैर्दशभिराशुगैः ॥
sa lokaviditānaśvānnijaghāna mahābalaḥ | drauṇeḥ pāñcāladāyādaḥ śitairdaśabhirāśugaiḥ
उस महाबली पाञ्चाल-वंशज ने दस तीखे, वेगवान बाणों से द्रोणपुत्र के जगत्-प्रसिद्ध घोड़ों को मार डाला।
श्लोक 4 (6.55.4)
ततः शल्यरथं तूर्णमास्थाय हतवाहनः । द्रौणिः पाञ्चालदायादमभ्यवर्षदथेषुभिः ॥
tataḥ śalyarathaṃ tūrṇamāsthāya hatavāhanaḥ | drauṇiḥ pāñcāladāyādamabhyavarṣadatheṣubhiḥ
तब घोड़ों के मारे जाने पर द्रोणपुत्र तुरन्त शल्य के रथ पर चढ़ गया और पाञ्चाल-वंशज पर बाणों की वर्षा करने लगा।
श्लोक 5 (6.55.5)
धृष्टद्युम्नं तु संयुक्तं द्रौणिना वीक्ष्य भारत । सौभद्रोऽभ्यपतत्तूर्णं विकिरन्निशिताञ्शरान् ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ tu saṃyuktaṃ drauṇinā vīkṣya bhārata | saubhadro'bhyapatattūrṇaṃ vikiranniśitāñśarān
हे भारत, धृष्टद्युम्न को द्रोणपुत्र से उलझा देखकर सुभद्रा-पुत्र (अभिमन्यु) तीखे बाण बरसाता हुआ तेज़ी से वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 6 (6.55.6)
स शल्यं पञ्चविंशत्या कृपं च नवभिः शरैः । अश्वत्थामानमष्टाभिर्विव्याध पुरुषर्षभः ॥
sa śalyaṃ pañcaviṃśatyā kṛpaṃ ca navabhiḥ śaraiḥ | aśvatthāmānamaṣṭābhirvivyādha puruṣarṣabhaḥ
उस पुरुषश्रेष्ठ ने शल्य को पच्चीस, कृप को नौ और अश्वत्थामा को आठ बाणों से बींध दिया।
श्लोक 7 (6.55.7)
आर्जुनिं तु ततस्तूर्णं द्रौणिर्विव्याध पत्रिणा । शल्योऽथ दशभिश्चैव कृपश्च निशितैस्त्रिभिः ॥
ārjuniṃ tu tatastūrṇaṃ drauṇirvivyādha patriṇā | śalyo'tha daśabhiścaiva kṛpaśca niśitaistribhiḥ
तब द्रोणपुत्र ने तुरन्त एक पंखदार बाण से अर्जुन-पुत्र को बींधा, शल्य ने दस बाणों से और कृप ने तीन तीखे बाणों से।
श्लोक 8 (6.55.8)
लक्ष्मणस्तव पौत्रस्तु सौभद्रं समवस्थितम् । अभ्यवर्तत संहृष्टस्ततो युद्धमवर्तत ॥
lakṣmaṇastava pautrastu saubhadraṃ samavasthitam | abhyavartata saṃhṛṣṭastato yuddhamavartata
आपका पौत्र लक्ष्मण डटकर खड़े सुभद्रा-पुत्र की ओर हर्ष से बढ़ा, और तब उन दोनों का युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 9 (6.55.9)
दौर्योधनिः सुसंक्रुद्धः सौभद्रं परवीरहा । विव्याध समरे राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥
dauryodhaniḥ susaṃkruddhaḥ saubhadraṃ paravīrahā | vivyādha samare rājaṃstadadbhutamivābhavat
हे राजन्, शत्रुवीरों का संहार करने वाले दुर्योधन-पुत्र ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर रण में सुभद्रा-पुत्र को बींध दिया; वह एक अद्भुत-सा दृश्य था।
श्लोक 10 (6.55.10)
अभिमन्युः सुसंक्रुद्धो भ्रातरं भरतर्षभ । शरैः पञ्चाशतै राजन्क्षिप्रहस्तोऽभ्यविध्यत ॥
abhimanyuḥ susaṃkruddho bhrātaraṃ bharatarṣabha | śaraiḥ pañcāśatai rājankṣiprahasto'bhyavidhyata
हे भरतश्रेष्ठ, हे राजन्, तब अत्यन्त क्रुद्ध, फुर्तीले हाथों वाले अभिमन्यु ने अपने भाई को पचास बाणों से बींध डाला।
श्लोक 11 (6.55.11)
लक्ष्मणोऽपि पुनस्तस्य धनुश्चिच्छेद पत्रिणा । मुष्टिदेशे महाराज ततस्ते चुक्रुशुर्जनाः ॥
lakṣmaṇo'pi punastasya dhanuściccheda patriṇā | muṣṭideśe mahārāja tataste cukruśurjanāḥ
महाराज, लक्ष्मण ने भी फिर एक पंखदार बाण से उसका धनुष मूठ के पास से काट दिया; इस पर लोग चिल्ला उठे।
श्लोक 12 (6.55.12)
तद्विहाय धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा । अन्यदादत्तवांश्चित्रं कार्मुकं वेगवत्तरम् ॥
tadvihāya dhanuśchinnaṃ saubhadraḥ paravīrahā | anyadādattavāṃścitraṃ kārmukaṃ vegavattaram
टूटे धनुष को छोड़कर शत्रुवीरों का संहार करने वाले सुभद्रा-पुत्र ने दूसरा, और भी वेगवान, चमकीला धनुष उठा लिया।
श्लोक 13 (6.55.13)
तौ तत्र समरे युक्तौ कृतप्रतिकृतैषिणौ । अन्योन्यं विशिखैस्तीक्ष्णैर्जघ्नतुः पुरुषर्षभौ ॥
tau tatra samare yuktau kṛtapratikṛtaiṣiṇau | anyonyaṃ viśikhaistīkṣṇairjaghnatuḥ puruṣarṣabhau
रण में भिड़े वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ, एक-दूसरे के वार का बदला चुकाने को उत्सुक, तीखे बाणों से परस्पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 14 (6.55.14)
ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा पुत्रं महारथम् । पीडितं तव पौत्रेण प्रायात्तत्र प्रजेश्वरः ॥
tato duryodhano rājā dṛṣṭvā putraṃ mahāratham | pīḍitaṃ tava pautreṇa prāyāttatra prajeśvaraḥ
तब प्रजापालक राजा दुर्योधन अपने महारथी पुत्र को आपके पौत्र से पीड़ित देखकर वहाँ जा पहुँचा।
श्लोक 15 (6.55.15)
सन्निवृत्ते तव सुते सर्व एव जनाधिपाः । आर्जुनिं रथवंशेन समन्तात्पर्यवारयन् ॥
sannivṛtte tava sute sarva eva janādhipāḥ | ārjuniṃ rathavaṃśena samantātparyavārayan
आपके पुत्र के वहाँ लौट आने पर सभी राजाओं ने रथों की पंक्ति से अर्जुन-पुत्र को चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 16 (6.55.16)
स तैः परिवृतः शूरैः शूरो युधि सुदुर्जयैः । न स्म प्रव्यथते राजन्कृष्णतुल्यपराक्रमः ॥
sa taiḥ parivṛtaḥ śūraiḥ śūro yudhi sudurjayaiḥ | na sma pravyathate rājankṛṣṇatulyaparākramaḥ
हे राजन्, युद्ध में दुर्जय उन वीरों से घिरकर भी श्रीकृष्ण के समान पराक्रमी वह वीर तनिक भी विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 17 (6.55.17)
सौभद्रमथ संसक्तं दृष्ट्वा तत्र धनंजयः । अभिदुद्राव वेगेन त्रातुकामः स्वमात्मजम् ॥
saubhadramatha saṃsaktaṃ dṛṣṭvā tatra dhanaṃjayaḥ | abhidudrāva vegena trātukāmaḥ svamātmajam
तब सुभद्रा-पुत्र को वहाँ घिरा देखकर धनञ्जय अपने पुत्र की रक्षा के लिए वेग से दौड़ पड़ा।
श्लोक 18 (6.55.18)
ततः सरथनागाश्वा भीष्मद्रोणपुरोगमाः । अभ्यवर्तन्त राजानः सहिताः सव्यसाचिनम् ॥
tataḥ sarathanāgāśvā bhīṣmadroṇapurogamāḥ | abhyavartanta rājānaḥ sahitāḥ savyasācinam
तब भीष्म और द्रोण को आगे करके रथों, हाथियों और घोड़ों सहित राजा एक साथ सव्यसाची (अर्जुन) पर टूट पड़े।
श्लोक 19 (6.55.19)
उद्धूतं सहसा भौमं नागाश्वरथपत्तिभिः । दिवाकररथं प्राप्य रजस्तीव्रमदृश्यत ॥
uddhūtaṃ sahasā bhaumaṃ nāgāśvarathapattibhiḥ | divākararathaṃ prāpya rajastīvramadṛśyata
हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों से सहसा उड़ी धरती की घनी धूल सूर्य के रथ तक पहुँचती दिखाई दी।
श्लोक 20 (6.55.20)
तानि नागसहस्राणि भूमिपालशतानि च । तस्य बाणपथं प्राप्य नाभ्यवर्तन्त सर्वशः ॥
tāni nāgasahasrāṇi bhūmipālaśatāni ca | tasya bāṇapathaṃ prāpya nābhyavartanta sarvaśaḥ
वे हज़ारों हाथी और सैकड़ों राजा उसके बाणों की पहुँच में आते ही आगे बिल्कुल न बढ़ सके।
श्लोक 21 (6.55.21)
प्रणेदुः सर्वभूतानि बभूवुस्तिमिरा दिशः । कुरूणां चानयस्तीव्रः समदृश्यत दारुणः ॥
praṇeduḥ sarvabhūtāni babhūvustimirā diśaḥ | kurūṇāṃ cānayastīvraḥ samadṛśyata dāruṇaḥ
सभी प्राणी चीत्कार करने लगे, दिशाएँ अन्धकारमय हो गईं, और कौरवों का भयंकर, दारुण अनर्थ सामने दिखाई देने लगा।
श्लोक 22 (6.55.22)
नाप्यन्तरिक्षं न दिशो न भूमिर्न च भास्करः । प्रजज्ञे भरतश्रेष्ठ शस्त्रसङ्घैः किरीटिनः ॥
nāpyantarikṣaṃ na diśo na bhūmirna ca bhāskaraḥ | prajajñe bharataśreṣṭha śastrasaṅghaiḥ kirīṭinaḥ
हे भरतश्रेष्ठ, किरीटधारी (अर्जुन) के शस्त्र-समूहों के कारण न आकाश दिखाई देता था, न दिशाएँ, न पृथ्वी और न सूर्य।
श्लोक 23 (6.55.23)
सादिता रथनागाश्च हताश्वा रथिनो रणे । विप्रद्रुतरथाः केचिद्दृश्यन्ते रथयूथपाः ॥
sāditā rathanāgāśca hatāśvā rathino raṇe | vipradrutarathāḥ keciddṛśyante rathayūthapāḥ
रथ और हाथी गिरा दिए गए, रण में रथियों के घोड़े मारे गए, और कुछ रथ-यूथपति अपने रथों में भागते दिखाई दिए।
श्लोक 24 (6.55.24)
विरथा रथिनश्चान्ये धावमानाः समन्ततः । तत्रतत्रैव दृश्यन्ते सायुधाः साङ्गदैर्भुजैः ॥
virathā rathinaścānye dhāvamānāḥ samantataḥ | tatratatraiva dṛśyante sāyudhāḥ sāṅgadairbhujaiḥ
कुछ अन्य रथी, रथहीन होकर, बाजूबन्द-सजी भुजाओं में शस्त्र लिए जहाँ-तहाँ चारों ओर दौड़ते दिखाई दिए।
श्लोक 25 (6.55.25)
हयारोहा हयांस्त्यक्त्वा गजारोहाश्च दन्तिनः । अर्जुनस्य भयाद्राजन्समन्ताद्विप्रदुद्रुवुः ॥
hayārohā hayāṃstyaktvā gajārohāśca dantinaḥ | arjunasya bhayādrājansamantādvipradudruvuḥ
हे राजन्, अर्जुन के भय से घुड़सवार घोड़ों को और गजारोही हाथियों को छोड़कर चारों ओर भाग खड़े हुए।
श्लोक 26 (6.55.26)
रथेभ्यश्च गजेभ्यश्च हयेभ्यश्च नराधिपाः । पतिताः पात्यमानाश्च दृश्यन्तेऽर्जुनसायकैः ॥
rathebhyaśca gajebhyaśca hayebhyaśca narādhipāḥ | patitāḥ pātyamānāśca dṛśyante'rjunasāyakaiḥ
अर्जुन के बाणों से राजा रथों, हाथियों और घोड़ों से गिरे हुए और गिरते हुए दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 27 (6.55.27)
सगदानुद्यतान्बाहून्सखड्गांश्च विशांपते । सप्रासांश्च सतूणीरान्सशरान्सशरासनान् ॥
sagadānudyatānbāhūnsakhaḍgāṃśca viśāṃpate | saprāsāṃśca satūṇīrānsaśarānsaśarāsanān
हे प्रजानाथ, गदाएँ, तलवारें, भाले, तूणीर, बाण और धनुष थामे उठी हुई भुजाओं को,
श्लोक 28 (6.55.28)
साङ्कुशान्सपताकांश्च तत्रतत्रार्जुनो नृणाम् । निचकर्त शरैरुग्रै रौद्रं वपुरधारयत् ॥
sāṅkuśānsapatākāṃśca tatratatrārjuno nṛṇām | nicakarta śarairugrai raudraṃ vapuradhārayat
और अंकुश तथा पताकाएँ थामी भुजाओं को भी अर्जुन ने जहाँ-तहाँ अपने उग्र बाणों से मनुष्यों के शरीर से काट डाला; उसने रौद्र रूप धारण कर लिया।
श्लोक 29 (6.55.29)
परिघाणां प्रदीप्तानां मुद्गराणां च मारिष । प्रासानां भिन्दिपालानां निस्त्रिंशानां च संयुगे ॥
parighāṇāṃ pradīptānāṃ mudgarāṇāṃ ca māriṣa | prāsānāṃ bhindipālānāṃ nistriṃśānāṃ ca saṃyuge
हे मान्यवर, रण में चमकते परिघों और मुद्गरों के, भालों, भिन्दिपालों और तलवारों के,
श्लोक 30 (6.55.30)
परश्वथानां तीक्ष्णानां तोमराणां च भारत । वर्मणां चापविद्धानां काञ्चनानां च भूमिप ॥
paraśvathānāṃ tīkṣṇānāṃ tomarāṇāṃ ca bhārata | varmaṇāṃ cāpaviddhānāṃ kāñcanānāṃ ca bhūmipa
हे भारत, तीखे फरसों और तोमरों के, हे भूपाल, फेंके हुए कवचों और स्वर्ण-आभूषणों के,
श्लोक 31 (6.55.31)
ध्वजानां चर्मणां चैव व्यजनानां च सर्वशः । छत्राणां हेमदण्डानां चामराणां च भारत ॥
dhvajānāṃ carmaṇāṃ caiva vyajanānāṃ ca sarvaśaḥ | chatrāṇāṃ hemadaṇḍānāṃ cāmarāṇāṃ ca bhārata
हे भारत, सब ओर ध्वजों, ढालों और पंखों के, सोने की डण्डियों वाले छत्रों और चँवरों के,
श्लोक 32 (6.55.32)
प्रतोदानां च योक्त्राणां कशानां चैव मारिष । राशयः स्मात्र दृश्यन्ते विनिकीर्णा रणक्षितौ ॥
pratodānāṃ ca yoktrāṇāṃ kaśānāṃ caiva māriṣa | rāśayaḥ smātra dṛśyante vinikīrṇā raṇakṣitau
हे मान्यवर, चाबुकों, जोतों और कोड़ों के, इन सबके ढेर वहाँ रणभूमि में बिखरे दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 33 (6.55.33)
नासीत्तत्र पुमान्कश्चित्तव सैन्यस्य भारत । योऽर्जुनं समरे शूरं प्रत्युद्यायात्कथंचन ॥
nāsīttatra pumānkaścittava sainyasya bhārata | yo'rjunaṃ samare śūraṃ pratyudyāyātkathaṃcana
हे भारत, आपकी सेना में वहाँ एक भी ऐसा पुरुष नहीं था जो किसी प्रकार भी युद्ध में वीर अर्जुन का सामना करने आगे बढ़ सके।
श्लोक 34 (6.55.34)
यो यो हि समरे पार्थं प्रत्युद्याति विशांपते । स सङ्ख्ये विशिखैस्तीक्ष्णैः परलोकाय नीयते ॥
yo yo hi samare pārthaṃ pratyudyāti viśāṃpate | sa saṅkhye viśikhaistīkṣṇaiḥ paralokāya nīyate
हे प्रजानाथ, जो-जो युद्ध में पार्थ के सामने जाता, वह उस रण में उसके तीखे बाणों से परलोक पहुँचा दिया जाता।
श्लोक 35 (6.55.35)
तेषु विद्रवमाणेषु तव योधेषु सर्वशः । अर्जुनो वासुदेवश्च दध्मतुर्वारिजोत्तमौ ॥
teṣu vidravamāṇeṣu tava yodheṣu sarvaśaḥ | arjuno vāsudevaśca dadhmaturvārijottamau
जब आपके योद्धा चारों ओर भाग रहे थे, तब अर्जुन और वासुदेव ने अपने श्रेष्ठ शंख बजाए।
श्लोक 36 (6.55.36)
तत्प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा पिता देवव्रतस्तव । अब्रवीत्समरे शूरं भारद्वाजं स्मयन्निव ॥
tatprabhagnaṃ balaṃ dṛṣṭvā pitā devavratastava | abravītsamare śūraṃ bhāradvājaṃ smayanniva
उस सेना को छिन्न-भिन्न देखकर आपके पिता देवव्रत (भीष्म) ने मानो मुस्कराते हुए रण में वीर भरद्वाज-पुत्र (द्रोण) से कहा।
भीष्म उवाच
श्लोक 37 (6.55.37)
एष पाण्डुसुतो वीर कृष्णेन सहितो बली । तथा करोति सैन्यानि यथा कुर्याद्धनञ्जयः ॥
eṣa pāṇḍusuto vīra kṛṣṇena sahito balī | tathā karoti sainyāni yathā kuryāddhanañjayaḥ
"हे वीर, कृष्ण के साथ यह बलवान पाण्डु-पुत्र हमारी सेनाओं के साथ वैसा ही कर रहा है जैसा धनञ्जय, अर्थात् अग्नि, करता है।
श्लोक 38 (6.55.38)
न ह्येष समरे शक्यो विजेतुं हि कथंचन । यथास्य दृश्यते रूपं कालान्तकयमोपमम् ॥
na hyeṣa samare śakyo vijetuṃ hi kathaṃcana | yathāsya dṛśyate rūpaṃ kālāntakayamopamam
युद्ध में इसे किसी प्रकार जीता नहीं जा सकता, क्योंकि इसका रूप प्रलयकाल के अन्तक यम जैसा दिखाई दे रहा है।
श्लोक 39 (6.55.39)
न निवर्तयितुं चापि शक्येयं महती चमूः । अन्योन्यप्रेक्षया पश्य द्रवतीयं वरूथिनी ॥
na nivartayituṃ cāpi śakyeyaṃ mahatī camūḥ | anyonyaprekṣayā paśya dravatīyaṃ varūthinī
यह विशाल सेना लौटाई भी नहीं जा सकती। देखो, एक-दूसरे को देख-देखकर यह सेना भागी जा रही है।
श्लोक 40 (6.55.40)
एष चास्तं गिरिश्रेष्ठं भानुमान्प्रतिपद्यते । चक्षूंषि सर्वलोकस्य संहरन्निव सर्वथा ॥
eṣa cāstaṃ giriśreṣṭhaṃ bhānumānpratipadyate | cakṣūṃṣi sarvalokasya saṃharanniva sarvathā
और यह सूर्य अस्ताचल, पर्वतों में श्रेष्ठ, पर पहुँच रहा है, मानो सारे संसार की आँखों को पूरी तरह समेट रहा हो।
श्लोक 41 (6.55.41)
तत्रावहारं संप्राप्तं मन्येऽहं पुरुषर्षभ । श्रान्ता भीताश्च नो योधा न योत्स्यन्ति कथंचन ॥
tatrāvahāraṃ saṃprāptaṃ manye'haṃ puruṣarṣabha | śrāntā bhītāśca no yodhā na yotsyanti kathaṃcana
इसलिए हे पुरुषश्रेष्ठ, मुझे लगता है कि युद्ध रोकने का समय आ गया है। हमारे योद्धा थके और डरे हुए हैं; वे अब किसी तरह नहीं लड़ेंगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 42 (6.55.42)
एवमुक्त्वा ततो भीष्मो द्रोणमाचार्यसत्तमम् । अवहारमथो चक्रे तावकानां महारथः ॥
evamuktvā tato bhīṣmo droṇamācāryasattamam | avahāramatho cakre tāvakānāṃ mahārathaḥ
आचार्यश्रेष्ठ द्रोण से ऐसा कहकर महारथी भीष्म ने आपकी सेनाओं को युद्ध से लौटा लिया।
श्लोक 43 (6.55.43)
ततः सरथनागाश्वा जयं प्राप्य ससोमकाः । पाञ्चालाः पाण्डवाश्चैव प्रणेदुश्च पुनः पुनः ॥
tataḥ sarathanāgāśvā jayaṃ prāpya sasomakāḥ | pāñcālāḥ pāṇḍavāścaiva praṇeduśca punaḥ punaḥ
तब विजय पाकर रथों, हाथियों और घोड़ों सहित पाञ्चाल और पाण्डव, सोमकों के साथ, बार-बार गर्जना करने लगे।
श्लोक 44 (6.55.44)
प्रययुः शिबिरायैव धनञ्जयपुरस्कृताः । वादित्रघोषैः संहृष्टाः प्रणद्यन्तो महारथाः ॥
prayayuḥ śibirāyaiva dhanañjayapuraskṛtāḥ | vāditraghoṣaiḥ saṃhṛṣṭāḥ praṇadyanto mahārathāḥ
धनञ्जय को आगे करके वे महारथी बाजों के घोष के बीच हर्ष से गरजते हुए अपने शिविर को लौट गए।
श्लोक 45 (6.55.45)
ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत । अस्तं गच्छति सूर्येऽभूत्सन्ध्याकाले च वर्तति ॥
tato'vahāraḥ sainyānāṃ tava teṣāṃ ca bhārata | astaṃ gacchati sūrye'bhūtsandhyākāle ca vartati
हे भारत, तब सूर्य के अस्त होते और सन्ध्या के आते-आते आपकी और उनकी सेनाएँ युद्ध से लौट गईं।