भीष्म पर्व · अध्याय 57
तीसरे दिन का घमासान युद्ध
व्यूह रचे जाने के बाद अर्जुन कौरवों की रथ-सेना का संहार करता है, और धृतराष्ट्र के पुत्र मृत्यु को ही लौटने का एकमात्र मार्ग मानकर डटकर लड़ते हैं और पाण्डव-सेना को बार-बार तोड़ते हैं। धूल में कोई पक्ष पहचाना नहीं जाता; रथी, गजारोही, घुड़सवार और पैदल एक-दूसरे को गिराते हैं, यहाँ तक कि शस्त्रों और शवों से पटी धरती मांस और रक्त का कीचड़ बन जाती है। भीष्म, द्रोण और उनके साथी पाण्डव-सेनाओं को तितर-बितर करते हैं, तो भीम, घटोत्कच, सात्यकि और अन्य वीर कौरवों को भगाते हैं; फिर दुर्योधन हज़ार रथों के साथ घटोत्कच पर चढ़ आता है और युद्ध फिर भड़क उठता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.57.1)
ततो व्यूढेष्वनीकेषु तावकेषु परेषु च । धनञ्जयो रथानीकमवधीत्तव भारत ॥
tato vyūḍheṣvanīkeṣu tāvakeṣu pareṣu ca | dhanañjayo rathānīkamavadhīttava bhārata
हे भारत, तब आपकी और शत्रु की सेनाओं के व्यूह रच लिए जाने पर धनञ्जय ने आपकी रथ-सेना का संहार किया,
श्लोक 2 (6.57.2)
शरैरतिरथो युद्धे दारयन्रथयूथपान् । ते वध्यमानाः पार्थेन कालेनेव युगक्षये ॥
śarairatiratho yuddhe dārayanrathayūthapān | te vadhyamānāḥ pārthena kāleneva yugakṣaye
वह अतिरथी युद्ध में अपने बाणों से रथ-यूथपतियों को चीरता जा रहा था। युगान्त के काल के समान पार्थ के हाथों मारे जाते हुए
श्लोक 3 (6.57.3)
धार्तराष्ट्रा रणे यत्नात्पाण्डवान्प्रत्ययोधयन् । प्रार्थयाना यशो दीप्तं मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥
dhārtarāṣṭrā raṇe yatnātpāṇḍavānpratyayodhayan | prārthayānā yaśo dīptaṃ mṛtyuṃ kṛtvā nivartanam
धृतराष्ट्र के पुत्र रण में पूरे प्रयत्न से पाण्डवों से लड़ने लगे; वे उज्ज्वल यश चाहते थे और मृत्यु को ही अपने लौटने का एकमात्र मार्ग बना चुके थे।
श्लोक 4 (6.57.4)
एकाग्रमनसो भूत्वा पाण्डवानां वरूथिनीम् । बभञ्जुर्बहुशो राजंस्ते चासञ्जन्त संयुगे ॥
ekāgramanaso bhūtvā pāṇḍavānāṃ varūthinīm | babhañjurbahuśo rājaṃste cāsañjanta saṃyuge
हे राजन्, एकाग्र मन से उन्होंने पाण्डवों की सेना को बार-बार तोड़ा, और वे युद्ध में डटे रहे।
श्लोक 5 (6.57.5)
द्रवद्भिरथभग्नैश्च परिवर्तद्भिरेव च । पाण्डवैः कौरवेयैश्च न प्रज्ञायत किंचन ॥
dravadbhirathabhagnaiśca parivartadbhireva ca | pāṇḍavaiḥ kauraveyaiśca na prajñāyata kiṃcana
भागते, टूटते और इधर-उधर पलटते पाण्डवों और कौरवों के बीच कुछ भी पहचाना नहीं जा पा रहा था।
श्लोक 6 (6.57.6)
उदतिष्ठद्रजो भौमं छादयानं दिवाकरम् । न दिशः प्रदिशो वापि जज्ञिरेऽत्र समागताः ॥
udatiṣṭhadrajo bhaumaṃ chādayānaṃ divākaram | na diśaḥ pradiśo vāpi jajñire'tra samāgatāḥ
धरती से उठी धूल ने सूर्य को ढक लिया; वहाँ जुटे योद्धा न दिशाएँ पहचान पा रहे थे, न उपदिशाएँ।
श्लोक 7 (6.57.7)
अनुमानेन संज्ञाभिर्नामगोत्रैश्च संयुगे । अवर्तत तदा युद्धं तत्र तत्र विशांपते ॥
anumānena saṃjñābhirnāmagotraiśca saṃyuge | avartata tadā yuddhaṃ tatra tatra viśāṃpate
हे प्रजानाथ, तब वहाँ जहाँ-तहाँ अनुमान से, संकेतों से और नाम-गोत्र पुकारकर युद्ध चलता रहा।
श्लोक 8 (6.57.8)
न व्यूहो भिद्यते तत्र कौरवाणां कथञ्चन । रक्षितः सत्यसन्धेन भारद्वाजेन संयुगे ॥
na vyūho bhidyate tatra kauravāṇāṃ kathañcana | rakṣitaḥ satyasandhena bhāradvājena saṃyuge
सत्यप्रतिज्ञ भरद्वाज-पुत्र (द्रोण) द्वारा युद्ध में रक्षित कौरवों का व्यूह कहीं भी टूटा नहीं।
श्लोक 9 (6.57.9)
तथैव पाण्डवानां च रक्षितः सव्यसाचिना । नाभिद्यत महाव्यूहो भीमेन च सुरक्षितः ॥
tathaiva pāṇḍavānāṃ ca rakṣitaḥ savyasācinā | nābhidyata mahāvyūho bhīmena ca surakṣitaḥ
इसी प्रकार सव्यसाची द्वारा रक्षित और भीम द्वारा भली-भाँति सुरक्षित पाण्डवों का महाव्यूह भी नहीं टूटा।
श्लोक 10 (6.57.10)
सेनाग्रादपि निष्पत्य प्रायुध्यंस्तत्र मानवाः । उभयोः सेनयो राजन्व्यतिषक्तरथद्विपाः ॥
senāgrādapi niṣpatya prāyudhyaṃstatra mānavāḥ | ubhayoḥ senayo rājanvyatiṣaktarathadvipāḥ
हे राजन्, सेनाओं के अग्रभाग से निकल-निकलकर वहाँ लोग लड़ने लगे; दोनों सेनाओं के रथ और हाथी आपस में उलझ गए।
श्लोक 11 (6.57.11)
हयारोहैर्हयारोहाः पात्यन्ते स्म महाहवे । ऋष्टिभिर्विमलाभिश्च प्रासैरपि च संयुगे ॥
hayārohairhayārohāḥ pātyante sma mahāhave | ṛṣṭibhirvimalābhiśca prāsairapi ca saṃyuge
उस महायुद्ध में घुड़सवार घुड़सवारों द्वारा चमकती ऋष्टियों और भालों से गिराए जा रहे थे।
श्लोक 12 (6.57.12)
रथी रथिनमासाद्य शरैः कनकभूषणैः । पातयामास समरे तस्मिन्नतिभयंकरे ॥
rathī rathinamāsādya śaraiḥ kanakabhūṣaṇaiḥ | pātayāmāsa samare tasminnatibhayaṃkare
उस अत्यन्त भयानक युद्ध में रथी रथी से भिड़कर सोने से सजे बाणों द्वारा उसे गिरा देता था।
श्लोक 13 (6.57.13)
गजारोहा गजारोहान्नाराचशरतोमरैः । संसक्तान्पातयामासुस्तव तेषां च सर्वशः ॥
gajārohā gajārohānnārācaśaratomaraiḥ | saṃsaktānpātayāmāsustava teṣāṃ ca sarvaśaḥ
गजारोहियों ने भिड़े हुए गजारोहियों को नाराचों, बाणों और तोमरों से गिरा दिया; आपकी और उनकी सेना में सब ओर यही हुआ।
श्लोक 14 (6.57.14)
कश्चिदुत्पत्य समरे वरवारणमास्थितः । केशपक्षे परामृश्य जहार समरे शिरः ॥
kaścidutpatya samare varavāraṇamāsthitaḥ | keśapakṣe parāmṛśya jahāra samare śiraḥ
किसी योद्धा ने रण में उछलकर एक श्रेष्ठ हाथी पर चढ़कर शत्रु के बाल पकड़े और युद्ध में उसका सिर काट लिया।
श्लोक 15 (6.57.15)
अन्ये द्विरददन्ताग्रनिर्भिन्नहृदया रणे । वेमुश्च रुधिरं वीरा निःश्वसन्तः समन्ततः ॥
anye dviradadantāgranirbhinnahṛdayā raṇe | vemuśca rudhiraṃ vīrā niḥśvasantaḥ samantataḥ
दूसरे वीरों के हृदय हाथियों के दाँतों की नोकों से विदीर्ण हो गए; वे चारों ओर हाँफते हुए रक्त उगलने लगे।
श्लोक 16 (6.57.16)
कश्चित्करिविषाणस्थो वीरो रणविशारदः । प्रावेपच्छक्तिनिर्भिन्नो गजशिक्षास्त्रवेदिना ॥
kaścitkariviṣāṇastho vīro raṇaviśāradaḥ | prāvepacchaktinirbhinno gajaśikṣāstravedinā
हाथी के दाँत पर टिका एक युद्धकुशल वीर, गज-शिक्षा और अस्त्रविद्या के ज्ञाता किसी योद्धा की शक्ति से बिंधकर काँप उठा।
श्लोक 17 (6.57.17)
पत्तिसङ्घा रणे पत्तीन्भिन्दिपालपरश्वथैः । न्यपातयन्त संहृष्टाः परस्परकृतागसः ॥
pattisaṅghā raṇe pattīnbhindipālaparaśvathaiḥ | nyapātayanta saṃhṛṣṭāḥ parasparakṛtāgasaḥ
पैदल सैनिकों के दल रण में हर्ष से भरकर भिन्दिपालों और फरसों से पैदलों को गिराने लगे; दोनों पक्ष एक-दूसरे के अपराधी थे।
श्लोक 18 (6.57.18)
रथी च समरे राजन्नासाद्य गजयूथपम् । स गजं पातयामास गजी च रथिनां वरम् ॥
rathī ca samare rājannāsādya gajayūthapam | sa gajaṃ pātayāmāsa gajī ca rathināṃ varam
हे राजन्, कोई रथी किसी गज-यूथपति से भिड़कर उसे हाथी समेत गिरा देता, और कोई गजयोद्धा श्रेष्ठ रथी को गिरा देता।
श्लोक 19 (6.57.19)
रथिनं च हयारोहः प्रासेन भरतर्षभ । पातयामास समरे रथी च हयसादिनम् ॥
rathinaṃ ca hayārohaḥ prāsena bharatarṣabha | pātayāmāsa samare rathī ca hayasādinam
हे भरतश्रेष्ठ, कोई घुड़सवार भाले से रथी को रण में गिरा देता, और कोई रथी घुड़सवार को।
श्लोक 20 (6.57.20)
पदाती रथिनं सङ्ख्ये रथी चापि पदातिनम् । न्यपातयच्छितैः शस्त्रैः सेनयोरुभयोरपि ॥
padātī rathinaṃ saṅkhye rathī cāpi padātinam | nyapātayacchitaiḥ śastraiḥ senayorubhayorapi
दोनों सेनाओं में पैदल रथी को और रथी पैदल को तीखे शस्त्रों से रण में गिरा देता था।
श्लोक 21 (6.57.21)
गजारोहा हयारोहान्पातयांचक्रिरे तदा । हयारोहा गजस्थांश्च तदद्भुतमिवाभवत् ॥
gajārohā hayārohānpātayāṃcakrire tadā | hayārohā gajasthāṃśca tadadbhutamivābhavat
तब गजारोहियों ने घुड़सवारों को और घुड़सवारों ने हाथियों पर सवार योद्धाओं को गिराया; वह एक अद्भुत-सा दृश्य था।
श्लोक 22 (6.57.22)
गजारोहवरैश्चापि तत्रतत्र पदातयः । पातिताः समदृश्यन्त तैश्चापि गजयोधिनः ॥
gajārohavaraiścāpi tatratatra padātayaḥ | pātitāḥ samadṛśyanta taiścāpi gajayodhinaḥ
जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ गजारोहियों द्वारा गिराए गए पैदल दिखाई दे रहे थे, और पैदलों द्वारा गिराए गए गजयोद्धा भी।
श्लोक 23 (6.57.23)
पत्तिसङ्घा हयारोहैः सादिसङ्घाश्च पत्तिभिः । पात्यमाना व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥
pattisaṅghā hayārohaiḥ sādisaṅghāśca pattibhiḥ | pātyamānā vyadṛśyanta śataśo'tha sahasraśaḥ
घुड़सवारों द्वारा पैदलों के दल और पैदलों द्वारा घुड़सवारों के दल सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में गिराए जाते दिखाई दिए।
श्लोक 24 (6.57.24)
ध्वजैस्तत्रापविद्धैश्च कार्मुकैस्तोमरैस्तथा । प्रासैस्तथा गदाभिश्च परिघैः कम्पनैस्तथा ॥
dhvajaistatrāpaviddhaiśca kārmukaistomaraistathā | prāsaistathā gadābhiśca parighaiḥ kampanaistathā
वहाँ गिरे हुए ध्वजों, धनुषों, तोमरों, भालों, गदाओं, परिघों और कम्पनों से,
श्लोक 25 (6.57.25)
शक्तिभिः कवचैश्चित्रैः कणपैरङ्कुशैरपि । निस्त्रिंशैर्विमलैश्चापि स्वर्णपुङ्खैः शरैस्तथा ॥
śaktibhiḥ kavacaiścitraiḥ kaṇapairaṅkuśairapi | nistriṃśairvimalaiścāpi svarṇapuṅkhaiḥ śaraistathā
शक्तियों, रंग-बिरंगे कवचों, कणपों और अंकुशों से, चमकती तलवारों और सोने के पंखों वाले बाणों से,
श्लोक 26 (6.57.26)
परिस्तोमैः कुथाभिश्च कम्बलैश्च महाधनैः । भूर्भाति भरतश्रेष्ठ स्रग्दामैरिव चित्रिता ॥
paristomaiḥ kuthābhiśca kambalaiśca mahādhanaiḥ | bhūrbhāti bharataśreṣṭha sragdāmairiva citritā
हाथियों की झूलों, ओढ़नियों और बहुमूल्य कम्बलों से, हे भरतश्रेष्ठ, धरती ऐसी शोभा पा रही थी मानो मालाओं से सजी हो।
श्लोक 27 (6.57.27)
नराश्वकायैः पतितैर्दन्तिभिश्च महाहवे । अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥
narāśvakāyaiḥ patitairdantibhiśca mahāhave | agamyarūpā pṛthivī māṃsaśoṇitakardamā
उस महायुद्ध में गिरे मनुष्यों और घोड़ों के शरीरों तथा हाथियों से धरती अगम्य हो गई, मांस और रक्त का कीचड़ बन गई।
श्लोक 28 (6.57.28)
प्रशशाम रजो भौमं व्युक्षितं रणशोणितैः । दिशश्च विमलाः सर्वाः संबभूवुर्जनेश्वर ॥
praśaśāma rajo bhaumaṃ vyukṣitaṃ raṇaśoṇitaiḥ | diśaśca vimalāḥ sarvāḥ saṃbabhūvurjaneśvara
हे जनेश्वर, युद्ध के रक्त से भीगकर धरती की धूल बैठ गई और सारी दिशाएँ स्वच्छ हो गईं।
श्लोक 29 (6.57.29)
उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः । चिह्नभूतानि जगतो विनाशार्थाय भारत ॥
utthitānyagaṇeyāni kabandhāni samantataḥ | cihnabhūtāni jagato vināśārthāya bhārata
हे भारत, चारों ओर अनगिनत कबन्ध उठ खड़े हुए, मानो संसार के विनाश के सूचक चिह्न हों।
श्लोक 30 (6.57.30)
तस्मिन्युद्धे महारौद्रे वर्तमाने सुदारुणे । प्रत्यदृश्यन्त रथिनो धावमानाः समन्ततः ॥
tasminyuddhe mahāraudre vartamāne sudāruṇe | pratyadṛśyanta rathino dhāvamānāḥ samantataḥ
उस अत्यन्त भयंकर, दारुण युद्ध के चलते रथी चारों ओर दौड़ते दिखाई दिए।
श्लोक 31 (6.57.31)
ततो भीष्मश्च द्रोणश्च सैन्धवश्च जयद्रथः । पुरुमित्रो जयो भोजः शल्यश्चापि ससौबलः ॥
tato bhīṣmaśca droṇaśca saindhavaśca jayadrathaḥ | purumitro jayo bhojaḥ śalyaścāpi sasaubalaḥ
तब भीष्म और द्रोण, सिन्धुराज जयद्रथ, पुरुमित्र, जय, भोज, और सौबल (शकुनि) सहित शल्य,
श्लोक 32 (6.57.32)
एते समरदुर्धर्षाः सिंहतुल्यपराक्रमाः । पाण्डवानामनीकानि बभञ्जुःस्म पुनःपुनः ॥
ete samaradurdharṣāḥ siṃhatulyaparākramāḥ | pāṇḍavānāmanīkāni babhañjuḥsma punaḥpunaḥ
युद्ध में दुर्जय और सिंह के समान पराक्रमी इन वीरों ने पाण्डवों की सेनाओं को बार-बार तोड़ा।
श्लोक 33 (6.57.33)
तथैव भीमसेनोऽपि राक्षसश्च घटोत्कचः । सात्यकिश्चेकितानश्च द्रौपदेयाश्च भारत ॥
tathaiva bhīmaseno'pi rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ | sātyakiścekitānaśca draupadeyāśca bhārata
हे भारत, इसी प्रकार भीमसेन, राक्षस घटोत्कच, सात्यकि, चेकितान और द्रौपदी के पुत्रों ने
श्लोक 34 (6.57.34)
तावकांस्तव पुत्रांश्च सहितान्सर्वराजभिः । द्रावयामासुराजौ ते त्रिदशा दानवानिव ॥
tāvakāṃstava putrāṃśca sahitānsarvarājabhiḥ | drāvayāmāsurājau te tridaśā dānavāniva
सभी राजाओं सहित आपके सैनिकों और आपके पुत्रों को रण में वैसे ही भगा दिया जैसे देवताओं ने दानवों को भगाया था।
श्लोक 35 (6.57.35)
तथा ते समरेऽन्योन्यं निघ्नन्तः क्षत्रियर्षभाः । रक्तोक्षिता घोररूपा विरेजुर्दानवा इव ॥
tathā te samare'nyonyaṃ nighnantaḥ kṣatriyarṣabhāḥ | raktokṣitā ghorarūpā virejurdānavā iva
इस प्रकार युद्ध में एक-दूसरे को मारते वे क्षत्रियश्रेष्ठ रक्त से लथपथ और भयानक रूप वाले होकर दानवों की तरह दमक रहे थे।
श्लोक 36 (6.57.36)
विनिर्जित्य रिपून्वीराः सेनयोरुभयोरपि । व्यदृश्यन्त महामात्रा ग्रहा इव नभस्तले ॥
vinirjitya ripūnvīrāḥ senayorubhayorapi | vyadṛśyanta mahāmātrā grahā iva nabhastale
शत्रुओं को जीतकर दोनों सेनाओं के प्रमुख वीर आकाश में ग्रहों की तरह दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 37 (6.57.37)
ततो रथसहस्रेण पुत्रो दुर्योधनस्तव । अभ्ययात्पाण्डवं युद्धे राक्षसं च घटोत्कचम् ॥
tato rathasahasreṇa putro duryodhanastava | abhyayātpāṇḍavaṃ yuddhe rākṣasaṃ ca ghaṭotkacam
तब आपका पुत्र दुर्योधन हज़ार रथों के साथ युद्ध में पाण्डु-पुत्र और राक्षस घटोत्कच पर चढ़ आया।
श्लोक 38 (6.57.38)
तथैव पाण्डवाः सर्वे महत्या सेनया सह । द्रोणभीष्मौ रणे यत्तौ प्रत्युद्ययुररिन्दमौ ॥
tathaiva pāṇḍavāḥ sarve mahatyā senayā saha | droṇabhīṣmau raṇe yattau pratyudyayurarindamau
इसी प्रकार सभी पाण्डव विशाल सेना के साथ रण में सन्नद्ध खड़े शत्रुदमन द्रोण और भीष्म का सामना करने बढ़े।
श्लोक 39 (6.57.39)
किरीटी च ययौ क्रुद्धः समन्तात्पार्थिवोत्तमान् । आर्जुनिः सात्यकिश्चैव ययतुः सौबलं बलम् ॥
kirīṭī ca yayau kruddhaḥ samantātpārthivottamān | ārjuniḥ sātyakiścaiva yayatuḥ saubalaṃ balam
किरीटी (अर्जुन) क्रोध में भरकर चारों ओर के श्रेष्ठ राजाओं पर टूट पड़ा, और अर्जुन-पुत्र तथा सात्यकि सुबल-पुत्र की सेना पर चढ़ गए।
श्लोक 40 (6.57.40)
ततः प्रववृते भूयः संग्रामो रोमहर्षणः । तावकानां परेषां च समरे विजयैषिणाम् ॥
tataḥ pravavṛte bhūyaḥ saṃgrāmo romaharṣaṇaḥ | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca samare vijayaiṣiṇām
तब विजय की इच्छा रखने वाले आपके और शत्रु-पक्ष के योद्धाओं के बीच फिर से रोंगटे खड़े कर देने वाला संग्राम छिड़ गया।