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भीष्म पर्व · अध्याय 58

दुर्योधन का भीष्म को उलाहना

तीसरे दिन राजा हज़ारों रथों और शस्त्रों की वर्षा से अर्जुन को घेर लेते हैं, जिसे वह देवताओं और अन्य प्राणियों की वाहवाही के बीच रोक देता है; उधर सौबलों द्वारा रथ काट दिए जाने पर सात्यकि अभिमन्यु के रथ पर चढ़ जाते हैं और दोनों मिलकर शकुनि की सेना को खदेड़ देते हैं। भीम दुर्योधन को बाण मारकर मूर्च्छित कर देते हैं और कौरव-सेना टूट जाती है; भीष्म और द्रोण भगदड़ नहीं रोक पाते, जब तक दुर्योधन होश में आकर सेना को लौटा नहीं लाता। फिर दुर्योधन भीष्म पर पाण्डवों का पक्ष लेने का आरोप लगाता है, और भीष्म क्रोध में हँसते हुए उस दिन अकेले ही पाण्डवों को रोकने की प्रतिज्ञा करते हैं, जिस पर दोनों पक्ष शंख और नगाड़े बजाते हैं।

अध्याय 57अध्याय-सूचीअध्याय 59

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (6.58.1)

ततस्ते पार्थिवाः क्रुद्धाः फल्गुनं वीक्ष्य संयुगे । रथैरनेकसाहस्रैः समन्तात्पर्यवारयन् ॥

tataste pārthivāḥ kruddhāḥ phalgunaṃ vīkṣya saṃyuge | rathairanekasāhasraiḥ samantātparyavārayan

तब युद्ध में फाल्गुन (अर्जुन) को देखकर क्रोध से भरे राजाओं ने हज़ारों रथों से उसे चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 2 (6.58.2)

अथैनं रथवृन्देन कोष्ठकीकृत्य भारत । शरैः सुबहुसाहस्रैः समन्तादभ्यवारयन् ॥

athainaṃ rathavṛndena koṣṭhakīkṛtya bhārata | śaraiḥ subahusāhasraiḥ samantādabhyavārayan

हे भारत, रथों के समूह से उसे बाड़े की तरह घेरकर उन्होंने चारों ओर से हज़ारों बाणों की वर्षा कर दी।

श्लोक 3 (6.58.3)

शक्तीश्च विमलास्तीक्ष्णा गदाश्च परिघैः सह । प्रासान्परश्वथांश्चैव मुद्गरान्मुसलानपि ॥

śaktīśca vimalāstīkṣṇā gadāśca parighaiḥ saha | prāsānparaśvathāṃścaiva mudgarānmusalānapi

चमचमाती तीखी शक्तियाँ, परिघों के साथ गदाएँ, प्रास, फरसे, मुद्गर और मूसल भी

श्लोक 4 (6.58.4)

चिक्षिपुः समरे क्रुद्धाः फल्गुनस्य रथं प्रति । शस्त्राणामथ तां वृष्टिं शलभानामिवायतिम् ॥

cikṣipuḥ samare kruddhāḥ phalgunasya rathaṃ prati | śastrāṇāmatha tāṃ vṛṣṭiṃ śalabhānāmivāyatim

वे क्रोध में भरकर युद्ध में फाल्गुन के रथ पर फेंकने लगे। टिड्डियों के दल की तरह बढ़ी आती शस्त्रों की उस वर्षा को

श्लोक 5 (6.58.5)

रुरोध सर्वतः पार्थः शरैः कनकभूषणैः । तत्र तल्लाघवं दृष्ट्वा बीभत्सोरतिमानुषम् ॥

rurodha sarvataḥ pārthaḥ śaraiḥ kanakabhūṣaṇaiḥ | tatra tallāghavaṃ dṛṣṭvā bībhatsoratimānuṣam

पार्थ ने सोने से सजे बाणों से चारों ओर रोक दिया। वहाँ बीभत्सु (अर्जुन) की वह अलौकिक फुर्ती देखकर

श्लोक 6 (6.58.6)

देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः । साधुसाध्विति राजेन्द्र फल्गुनं प्रत्यपूजयन् ॥

devadānavagandharvāḥ piśācoragarākṣasāḥ | sādhusādhviti rājendra phalgunaṃ pratyapūjayan

हे राजेन्द्र, देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग और राक्षस "साधु, साधु" कहकर फाल्गुन की प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 7 (6.58.7)

सात्यकिश्चाभिमन्युश्च महत्या सेनया वृतौ । गान्धारान्समरे शूराञ्जग्मतुः सहसौबलान् ॥

sātyakiścābhimanyuśca mahatyā senayā vṛtau | gāndhārānsamare śūrāñjagmatuḥ sahasaubalān

विशाल सेना से घिरे सात्यकि और अभिमन्यु युद्ध में शूरवीर गान्धारों और उनके साथ के सौबलों पर चढ़ गए।

श्लोक 8 (6.58.8)

तत्र सौबलकाः क्रुद्धा वार्ष्णेयस्य रथोत्तमम् । तिलशश्चिच्छिदुः क्रोधाच्छस्त्रैर्नानाविधैर्युधि ॥

tatra saubalakāḥ kruddhā vārṣṇeyasya rathottamam | tilaśaścicchiduḥ krodhācchastrairnānāvidhairyudhi

वहाँ क्रुद्ध सौबलों ने युद्ध में तरह-तरह के शस्त्रों से वार्ष्णेय (सात्यकि) के उत्तम रथ को तिल-तिल करके काट डाला।

श्लोक 9 (6.58.9)

सात्यकिस्तु रथं त्यक्त्वा वर्तमाने भयावहे । अभिमन्यो रथं तूर्णमारुरोह परंतपः ॥

sātyakistu rathaṃ tyaktvā vartamāne bhayāvahe | abhimanyo rathaṃ tūrṇamāruroha paraṃtapaḥ

उस भयंकर संग्राम के चलते शत्रुओं को तपाने वाले सात्यकि अपना रथ छोड़कर तुरन्त अभिमन्यु के रथ पर चढ़ गए।

श्लोक 10 (6.58.10)

तावेकरथसंयुक्तौ सौबलेयस्य वाहिनीम् । व्यधमेतां शितैस्तूर्णं शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

tāvekarathasaṃyuktau saubaleyasya vāhinīm | vyadhametāṃ śitaistūrṇaṃ śaraiḥ sannataparvabhiḥ

एक ही रथ पर सवार उन दोनों ने झुकी गाँठों वाले तीखे बाणों से सुबल-पुत्र (शकुनि) की सेना को शीघ्र ही तितर-बितर कर दिया।

श्लोक 11 (6.58.11)

द्रोणभीष्मौ रणे यत्तौ धर्मराजस्य वाहिनीम् । नाशयेतां शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ॥

droṇabhīṣmau raṇe yattau dharmarājasya vāhinīm | nāśayetāṃ śaraistīkṣṇaiḥ kaṅkapatraparicchadaiḥ

उधर युद्ध में सावधान भीष्म और द्रोण कंक-पंख लगे तीखे बाणों से धर्मराज की सेना का संहार कर रहे थे।

श्लोक 12 (6.58.12)

ततो धर्मसुतो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । मिषतां सर्वसैन्यानां द्रोणानीकमुपाद्रवन् ॥

tato dharmasuto rājā mādrīputrau ca pāṇḍavau | miṣatāṃ sarvasainyānāṃ droṇānīkamupādravan

तब धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर और माद्री के दोनों पुत्र पाण्डव सारी सेनाओं के देखते-देखते द्रोण की सेना पर टूट पड़े।

श्लोक 13 (6.58.13)

तत्रासीत्सुमहद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । यथा देवासुरं युद्धं पूर्वमासीत्सुदारुणम् ॥

tatrāsītsumahadyuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | yathā devāsuraṃ yuddhaṃ pūrvamāsītsudāruṇam

वहाँ बड़ा भारी, घमासान और रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध हुआ, वैसा ही भीषण जैसा पूर्वकाल में देवताओं और असुरों का युद्ध हुआ था।

श्लोक 14 (6.58.14)

कुर्वाणौ सुमहत्कर्म भीमसेनघटोत्कचौ । दुर्योधनस्ततोऽभ्येत्य तावुभावप्यवारयत् ॥

kurvāṇau sumahatkarma bhīmasenaghaṭotkacau | duryodhanastato'bhyetya tāvubhāvapyavārayat

भीमसेन और घटोत्कच बड़े पराक्रम के काम कर रहे थे; तब दुर्योधन ने आगे बढ़कर उन दोनों को रोका।

श्लोक 15 (6.58.15)

तत्राद्भुतमपश्याम हैडिम्बस्य पराक्रमम् । अतीत्य पितरं युद्धे यदयुध्यत भारत ॥

tatrādbhutamapaśyāma haiḍimbasya parākramam | atītya pitaraṃ yuddhe yadayudhyata bhārata

हे भारत, वहाँ हमने हिडिम्बा-पुत्र (घटोत्कच) का अद्भुत पराक्रम देखा: उस युद्ध में वह अपने पिता से भी बढ़कर लड़ा।

श्लोक 16 (6.58.16)

भीमसेनस्तु संक्रुद्धो दुर्योधनममर्षणम् । हृद्यविध्यत्पृषत्केन प्रहसन्निव पाण्डवः ॥

bhīmasenastu saṃkruddho duryodhanamamarṣaṇam | hṛdyavidhyatpṛṣatkena prahasanniva pāṇḍavaḥ

तब क्रोध से भरे पाण्डुपुत्र भीमसेन ने मानो हँसते हुए असहनशील दुर्योधन की छाती में बाण मारा।

श्लोक 17 (6.58.17)

ततो दुर्योधनो राजा प्रहारवरपीडितः । निषसाद रथोपस्थे कश्मलं च जगाम ह ॥

tato duryodhano rājā prahāravarapīḍitaḥ | niṣasāda rathopasthe kaśmalaṃ ca jagāma ha

तब उस प्रचण्ड प्रहार से पीड़ित राजा दुर्योधन रथ के पिछले भाग में बैठ गया और मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 18 (6.58.18)

तं विसंज्ञं विदित्वा तु त्वरमाणोऽस्य सारथिः । अपोवाह रणाद्राजंस्ततः सैन्यमभज्यत ॥

taṃ visaṃjñaṃ viditvā tu tvaramāṇo'sya sārathiḥ | apovāha raṇādrājaṃstataḥ sainyamabhajyata

हे राजन्, उसे अचेत जानकर उसका सारथी शीघ्रता से उसे रणभूमि से दूर ले गया; तब सेना टूटकर बिखर गई।

श्लोक 19 (6.58.19)

ततस्तां कौरवीं सेनां द्रवमाणां समन्ततः । निघ्नन्भीमः शरैस्तीक्ष्णैरनुवव्राज पृष्ठतः ॥

tatastāṃ kauravīṃ senāṃ dravamāṇāṃ samantataḥ | nighnanbhīmaḥ śaraistīkṣṇairanuvavrāja pṛṣṭhataḥ

तब चारों ओर भागती उस कौरव-सेना का भीम पीछे से पीछा करते हुए तीखे बाणों से उसे मारते चले।

श्लोक 20 (6.58.20)

पार्षतश्च रथश्रेष्ठो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः । द्रोणस्य पश्यतः सैन्यं गाङ्गेयस्य च पश्यतः ॥

pārṣataśca rathaśreṣṭho dharmaputraśca pāṇḍavaḥ | droṇasya paśyataḥ sainyaṃ gāṅgeyasya ca paśyataḥ

और रथियों में श्रेष्ठ पार्षत (धृष्टद्युम्न) तथा धर्मपुत्र पाण्डव (युधिष्ठिर) ने द्रोण के देखते और गंगापुत्र (भीष्म) के देखते

श्लोक 21 (6.58.21)

जघ्नतुर्विशिखैस्तीक्ष्णैः परानीकविनाशनैः । द्रवमाणं तु तत्सैन्यं तव पुत्रस्य संयुगे ॥

jaghnaturviśikhaistīkṣṇaiḥ parānīkavināśanaiḥ | dravamāṇaṃ tu tatsainyaṃ tava putrasya saṃyuge

शत्रु-सेनाओं का नाश करने वाले तीखे बाणों से उस सेना को मारा। युद्ध में भागती हुई आपके पुत्र की उस सेना को

श्लोक 22 (6.58.22)

नाशक्नुतां वारयितुं भीष्मद्रोणौ महारथौ । वार्यमाणं च भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ॥

nāśaknutāṃ vārayituṃ bhīṣmadroṇau mahārathau | vāryamāṇaṃ ca bhīṣmeṇa droṇena ca mahātmanā

महारथी भीष्म और द्रोण रोक न सके। भीष्म और महात्मा द्रोण के रोकने पर भी

श्लोक 23 (6.58.23)

विद्रवत्येव तत्सैन्यं पश्यतोर्द्रोणभीष्मयोः । ततो रथसहस्रेषु विद्रवत्सु ततस्ततः ॥

vidravatyeva tatsainyaṃ paśyatordroṇabhīṣmayoḥ | tato rathasahasreṣu vidravatsu tatastataḥ

वह सेना द्रोण और भीष्म के देखते-देखते भागती ही रही। तब जब हज़ारों रथ इधर-उधर भाग रहे थे,

श्लोक 24 (6.58.24)

तावास्थितावेकरथं सौभद्रशिनिपुङ्गवौ । सौबलीं समरे सेनां शातयेतां समन्ततः ॥

tāvāsthitāvekarathaṃ saubhadraśinipuṅgavau | saubalīṃ samare senāṃ śātayetāṃ samantataḥ

एक ही रथ पर बैठे सुभद्रा-पुत्र (अभिमन्यु) और शिनिवंश-श्रेष्ठ (सात्यकि) युद्ध में सुबल की सेना को चारों ओर से काटने लगे।

श्लोक 25 (6.58.25)

शुशुभाते तदा तौ तु शैनेयकुरुपुङ्गवौ । अमावास्यां गतौ यद्वत्सोमसूर्यौ नभस्तले ॥

śuśubhāte tadā tau tu śaineyakurupuṅgavau | amāvāsyāṃ gatau yadvatsomasūryau nabhastale

उस समय शिनि-वंशी (सात्यकि) और कुरु-श्रेष्ठ (अभिमन्यु) दोनों ऐसे शोभा पा रहे थे जैसे अमावस्या के दिन आकाश में एक साथ आए चन्द्रमा और सूर्य।

श्लोक 26 (6.58.26)

अर्जुनस्तु ततः क्रुद्धस्तव सैन्यं विशांपते । ववर्ष शरवर्षेण धाराभिरिव तोयदः ॥

arjunastu tataḥ kruddhastava sainyaṃ viśāṃpate | vavarṣa śaravarṣeṇa dhārābhiriva toyadaḥ

हे प्रजानाथ, तब क्रोध में भरे अर्जुन ने आपकी सेना पर बाणों की ऐसी झड़ी लगा दी जैसे बादल जलधाराएँ बरसाता है।

श्लोक 27 (6.58.27)

वध्यमानं ततस्तत्र शरैः पार्थस्य संयुगे । दुद्राव कौरवं सैन्यं विषादभयकम्पितम् ॥

vadhyamānaṃ tatastatra śaraiḥ pārthasya saṃyuge | dudrāva kauravaṃ sainyaṃ viṣādabhayakampitam

युद्ध में वहाँ पार्थ के बाणों से मारी जाती कौरव-सेना विषाद और भय से काँपती हुई भाग चली।

श्लोक 28 (6.58.28)

द्रवतस्तान्समालक्ष्य भीष्मद्रोणौ महारथौ । न्यवारयेतां संरब्धौ दुर्योधनहितैषिणौ ॥

dravatastānsamālakṣya bhīṣmadroṇau mahārathau | nyavārayetāṃ saṃrabdhau duryodhanahitaiṣiṇau

उन्हें भागते देखकर दुर्योधन के हितैषी महारथी भीष्म और द्रोण ने उत्तेजित होकर उन्हें रोका।

श्लोक 29 (6.58.29)

ततो दुर्योधनो राजा समाश्वस्य विशांपते । न्यवर्तयत तत्सैन्यं द्रवमाणं समन्ततः ॥

tato duryodhano rājā samāśvasya viśāṃpate | nyavartayata tatsainyaṃ dravamāṇaṃ samantataḥ

हे प्रजानाथ, तब होश में आकर राजा दुर्योधन ने चारों ओर भागती उस सेना को लौटाया।

श्लोक 30 (6.58.30)

यत्र यत्र हि पुत्रं ते ये ये पश्यन्ति भारत । तत्र तत्र न्यवर्तन्त क्षत्रियाणां महारथाः ॥

yatra yatra hi putraṃ te ye ye paśyanti bhārata | tatra tatra nyavartanta kṣatriyāṇāṃ mahārathāḥ

हे भारत, जहाँ-जहाँ जिन-जिन क्षत्रिय महारथियों ने आपके पुत्र को देखा, वहीं-वहीं वे लौट पड़े।

श्लोक 31 (6.58.31)

तान्निवृत्तान्समीक्ष्यैव ततोऽन्येऽपीतरे जनाः । अन्योन्यस्पर्धया राजँल्लज्जया चावतस्थिरे ॥

tānnivṛttānsamīkṣyaiva tato'nye'pītare janāḥ | anyonyaspardhayā rājam̐llajjayā cāvatasthire

हे राजन्, उन्हें लौटते देखकर दूसरे लोग भी आपस की होड़ और लज्जा के कारण डटकर खड़े हो गए।

श्लोक 32 (6.58.32)

पुनरावर्ततां तेषां वेग आसीद्विशांपते । पूर्यतः सागरस्येव चन्द्रस्योदयनं प्रति ॥

punarāvartatāṃ teṣāṃ vega āsīdviśāṃpate | pūryataḥ sāgarasyeva candrasyodayanaṃ prati

हे प्रजानाथ, फिर लौटते हुए उनका वेग ऐसा था जैसे चन्द्रोदय के समय उमड़ते सागर का।

श्लोक 33 (6.58.33)

सन्निवृत्तांस्ततस्तांस्तु दृष्ट्वा राजा सुयोधनः । अब्रवीत्त्वरितो गत्वा भीष्मं शान्तनवं वचः ॥

sannivṛttāṃstatastāṃstu dṛṣṭvā rājā suyodhanaḥ | abravīttvarito gatvā bhīṣmaṃ śāntanavaṃ vacaḥ

तब उन्हें लौटा हुआ देखकर राजा सुयोधन (दुर्योधन) शीघ्रता से शान्तनु-पुत्र भीष्म के पास गया और यह वचन बोला।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 34 (6.58.34)

पितामह निबोधेदं यत्त्वां वक्ष्यामि भारत । नानुरूपमहं मन्ये त्वयि जीवति कौरव ॥

pitāmaha nibodhedaṃ yattvāṃ vakṣyāmi bhārata | nānurūpamahaṃ manye tvayi jīvati kaurava

"पितामह, हे भारत, जो मैं आपसे कहूँगा उसे सुनिए। हे कौरव, मैं इसे उचित नहीं मानता कि आपके जीते जी,

श्लोक 35 (6.58.35)

द्रोणे चास्त्रविदां श्रेष्ठे सपुत्रे ससुहृज्जने । कृपे चैव महेष्वासे द्रवते यद्वरूथिनी ॥

droṇe cāstravidāṃ śreṣṭhe saputre sasuhṛjjane | kṛpe caiva maheṣvāse dravate yadvarūthinī

और अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण अपने पुत्र और मित्रों सहित तथा महाधनुर्धर कृप भी यहाँ रहते हुए, यह सेना भागे।

श्लोक 36 (6.58.36)

न पाण्डवान्प्रतिबलांस्तव मन्ये कथंचन । तथा द्रोणस्य सङ्ग्रामे द्रौणेश्चैव कृपस्य च ॥

na pāṇḍavānpratibalāṃstava manye kathaṃcana | tathā droṇasya saṅgrāme drauṇeścaiva kṛpasya ca

मैं पाण्डवों को किसी प्रकार भी आपके बराबर नहीं मानता, न ही युद्ध में द्रोण, द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) और कृप के बराबर।

श्लोक 37 (6.58.37)

अनुग्राह्याः पाण्डुसुतास्तव नूनं पितामह । यथेमां क्षमसे वीर वध्यमानां वरूथिनीम् ॥

anugrāhyāḥ pāṇḍusutāstava nūnaṃ pitāmaha | yathemāṃ kṣamase vīra vadhyamānāṃ varūthinīm

पितामह, निश्चय ही पाण्डुपुत्र आपके कृपापात्र हैं, क्योंकि हे वीर, आप इस सेना को कटते हुए सह रहे हैं।

श्लोक 38 (6.58.38)

सोऽस्मि वाच्यस्त्वया राजन्पूर्वमेव समागमे । न योत्स्ये पाण्डवान्सङ्ख्ये नापि पार्षतसात्यकी ॥

so'smi vācyastvayā rājanpūrvameva samāgame | na yotsye pāṇḍavānsaṅkhye nāpi pārṣatasātyakī

हे राजन्, आपको पहले ही, जब हम मिले थे, मुझसे कह देना चाहिए था कि "मैं युद्ध में पाण्डवों से नहीं लड़ूँगा, न पार्षत (धृष्टद्युम्न) से और न सात्यकि से।"

श्लोक 39 (6.58.39)

श्रुत्वा तु वचनं तुभ्यमाचार्यस्य कृपस्य च । कर्णेन सहितः कृत्यं चिन्तयानस्तदैव हि ॥

śrutvā tu vacanaṃ tubhyamācāryasya kṛpasya ca | karṇena sahitaḥ kṛtyaṃ cintayānastadaiva hi

आपकी और आचार्य (द्रोण) तथा कृप की वह बात सुनकर मैं उसी समय कर्ण के साथ विचार करता कि क्या करना है।

श्लोक 40 (6.58.40)

यदि नाहं परित्याज्यो युवाभ्यामिह संयुगे । विक्रमेणानुरूपेण युध्येतां पुरुषर्षभौ ॥

yadi nāhaṃ parityājyo yuvābhyāmiha saṃyuge | vikrameṇānurūpeṇa yudhyetāṃ puruṣarṣabhau

यदि आप दोनों इस युद्ध में मेरा त्याग नहीं करना चाहते, तो हे पुरुषश्रेष्ठो, अपने अनुरूप पराक्रम से लड़िए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 41 (6.58.41)

एतच्छ्रुत्वा वचो भीष्मः प्रहसन्वै मुहुर्मुहुः । अब्रवीत्तनयं तुभ्यं क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी ॥

etacchrutvā vaco bhīṣmaḥ prahasanvai muhurmuhuḥ | abravīttanayaṃ tubhyaṃ krodhādudvṛtya cakṣuṣī

यह वचन सुनकर भीष्म बार-बार हँसे और फिर क्रोध से आँखें घुमाकर आपके पुत्र से बोले।

भीष्म उवाच

श्लोक 42 (6.58.42)

बहुशोऽसि मया राजंस्तथ्यमुक्तो हितं वचः । अजेयाः पाण्डवा युद्धे देवैरपि सवासवैः ॥

bahuśo'si mayā rājaṃstathyamukto hitaṃ vacaḥ | ajeyāḥ pāṇḍavā yuddhe devairapi savāsavaiḥ

"हे राजन्, मैंने तुमसे अनेक बार सच्ची और हित की बात कही है कि पाण्डवों को युद्ध में इन्द्र सहित देवता भी नहीं जीत सकते।

श्लोक 43 (6.58.43)

यत्तु शक्यं मया कर्तुं वृद्धेनाद्य गतायुषा । करिष्यामि यथाशक्ति पश्येदानीं सबान्धवः ॥

yattu śakyaṃ mayā kartuṃ vṛddhenādya gatāyuṣā | kariṣyāmi yathāśakti paśyedānīṃ sabāndhavaḥ

पर आज मुझ बूढ़े, ढलती आयु वाले से जो हो सकता है, वह मैं अपनी पूरी शक्ति से करूँगा। अब तुम अपने बन्धुओं सहित देखो।

श्लोक 44 (6.58.44)

अद्य पाण्डुसुतानेकः ससैन्यान्सह बन्धुभिः । सोऽहं निवारयिष्यामि सर्वलोकस्य पश्यतः ॥

adya pāṇḍusutānekaḥ sasainyānsaha bandhubhiḥ | so'haṃ nivārayiṣyāmi sarvalokasya paśyataḥ

आज मैं अकेला ही सारे संसार के देखते-देखते सेनाओं और बन्धुओं सहित पाण्डुपुत्रों को रोक दूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 45 (6.58.45)

एवमुक्ते तु भीष्मेण पुत्रास्तव जनेश्वर । दध्मुः शङ्खान्मुदा युक्ता भेरीः संजघ्निरे भृशम् ॥

evamukte tu bhīṣmeṇa putrāstava janeśvara | dadhmuḥ śaṅkhānmudā yuktā bherīḥ saṃjaghnire bhṛśam

हे जनेश्वर, भीष्म के ऐसा कहने पर आपके पुत्रों ने प्रसन्न होकर शंख बजाए और ज़ोर-ज़ोर से नगाड़े पीटे।

श्लोक 46 (6.58.46)

पाण्डवा हि ततो राजञ्श्रुत्वा तं निनदं महत् । दध्मुः शङ्खांश्च भेरीश्च मुरजांश्चाप्यनादयन् ॥

pāṇḍavā hi tato rājañśrutvā taṃ ninadaṃ mahat | dadhmuḥ śaṅkhāṃśca bherīśca murajāṃścāpyanādayan

हे राजन्, उस महान् नाद को सुनकर पाण्डवों ने भी शंख बजाए और नगाड़े तथा मृदंग बजाए।

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