भीष्म पर्व · अध्याय 65
धृतराष्ट्र का प्रश्न और ब्रह्मा द्वारा विष्णु की स्तुति
पुत्रों की पराजय से व्याकुल धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि पाण्डव अवध्य क्यों हैं। संजय उत्तर देते हैं कि पाण्डव धर्म से युद्ध करते हैं, जबकि उनके पुत्रों ने पाण्डवों के साथ अन्याय किया और हर चेतावनी की उपेक्षा की; फिर वे बताते हैं कि रात के समय शोकाकुल दुर्योधन ने यही प्रश्न भीष्म से किया था। भीष्म सन्धि का अपना आग्रह दोहराकर कहते हैं कि जब तक शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्ण पाण्डवों की रक्षा कर रहे हैं, उन्हें कोई नहीं जीत सकता, और एक प्राचीन कथा आरम्भ करते हैं: गन्धमादन पर्वत पर ब्रह्मा ने आकाश में एक प्रज्वलित विमान देखा, लम्बी स्तुति से परमेश्वर वासुदेव का गुणगान किया और प्रार्थना की कि वे अपने को विभक्त करके असुरों के वध और धर्म की स्थापना के लिए यदुवंश में मनुष्य रूप में जन्म लें।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (6.65.1)
भयं मे सुमहज्जातं विस्मयश्चैव सञ्जय । श्रुत्वा पाण्डुकुमाराणां कर्म देवैः सुदुष्करम् ॥
bhayaṃ me sumahajjātaṃ vismayaścaiva sañjaya | śrutvā pāṇḍukumārāṇāṃ karma devaiḥ suduṣkaram
संजय, देवताओं के लिए भी दुष्कर पाण्डुपुत्रों के पराक्रम को सुनकर मेरे मन में बड़ा भय उत्पन्न हुआ है और विस्मय भी।
श्लोक 2 (6.65.2)
पुत्राणां च पराभवं श्रुत्वा सञ्जय सर्वशः । चिन्ता मे महती सूत भविष्यति कथं त्विति ॥
putrāṇāṃ ca parābhavaṃ śrutvā sañjaya sarvaśaḥ | cintā me mahatī sūta bhaviṣyati kathaṃ tviti
संजय, अपने पुत्रों की सब ओर से पराजय सुनकर, हे सूत, मुझे बड़ी चिन्ता हो रही है कि आगे क्या होगा।
श्लोक 3 (6.65.3)
ध्रुवं विदुरवाक्यानि धक्ष्यन्ति हृदयं मम । तथा हि दृश्यते सर्वं दैवयोगेन सञ्जय ॥
dhruvaṃ viduravākyāni dhakṣyanti hṛdayaṃ mama | tathā hi dṛśyate sarvaṃ daivayogena sañjaya
निश्चय ही विदुर के वचन मेरे हृदय को जलाएँगे; क्योंकि संजय, दैव के योग से सब कुछ वैसा ही होता दिखाई दे रहा है,
श्लोक 4 (6.65.4)
यत्र भीष्ममुखान्सर्वाञ्शस्त्रज्ञान्योधसत्तमान् । पाण्डवानामनीकेषु योधयन्ति प्रहारिणः ॥
yatra bhīṣmamukhānsarvāñśastrajñānyodhasattamān | pāṇḍavānāmanīkeṣu yodhayanti prahāriṇaḥ
जब पाण्डवों की सेनाओं में वे प्रहार करने वाले योद्धा भीष्म आदि हमारे सभी शस्त्रज्ञ श्रेष्ठ योद्धाओं से युद्ध कर रहे हैं।
श्लोक 5 (6.65.5)
केनावध्या महात्मानः पाण्डुपुत्रा महाबलाः । केन दत्तवरास्तात किं वा ज्ञानं विदन्ति ते ॥
kenāvadhyā mahātmānaḥ pāṇḍuputrā mahābalāḥ | kena dattavarāstāta kiṃ vā jñānaṃ vidanti te
तात, महाबली महात्मा पाण्डुपुत्र किस कारण अवध्य हैं? किसने उन्हें वर दिया है, अथवा वे कौन-सा ज्ञान जानते हैं,
श्लोक 6 (6.65.6)
येन क्षयं न गच्छन्ति दिवि तारागणा इव । पुनःपुनर्न मृष्यामि हतं सैन्यं तु पाण्डवैः ॥
yena kṣayaṃ na gacchanti divi tārāgaṇā iva | punaḥpunarna mṛṣyāmi hataṃ sainyaṃ tu pāṇḍavaiḥ
जिसके कारण आकाश के तारागणों की भाँति उनका क्षय नहीं होता? पाण्डवों द्वारा मेरी सेना का बार-बार मारा जाना मुझसे सहा नहीं जाता।
श्लोक 7 (6.65.7)
मय्येव दण्डः पतति दैवात्परमदारुणः । यथाऽवध्याः पाण्डुसुता यथा वध्याश्च मे सुताः ॥
mayyeva daṇḍaḥ patati daivātparamadāruṇaḥ | yathā'vadhyāḥ pāṇḍusutā yathā vadhyāśca me sutāḥ
दैव का अत्यन्त भयंकर दण्ड मुझ पर ही गिर रहा है। पाण्डुपुत्र किस प्रकार अवध्य हैं और मेरे पुत्र किस प्रकार मारे जा रहे हैं?
श्लोक 8 (6.65.8)
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन सञ्जय । न हि पारं प्रपश्यामि दुःखस्यास्य कथंचन ॥
etanme sarvamācakṣva yāthātathyena sañjaya | na hi pāraṃ prapaśyāmi duḥkhasyāsya kathaṃcana
संजय, यह सब मुझे ठीक-ठीक बताओ। मुझे इस दुःख का कोई पार दिखाई नहीं देता,
श्लोक 9 (6.65.9)
समुद्रस्येव महतो भुजाभ्यां प्रतरन्नरः । पुत्राणां व्यसनं मन्ये ध्रुवं प्राप्तं सुदारुणम् ॥
samudrasyeva mahato bhujābhyāṃ pratarannaraḥ | putrāṇāṃ vyasanaṃ manye dhruvaṃ prāptaṃ sudāruṇam
जैसे कोई मनुष्य भुजाओं से महासागर को तैरकर पार करना चाहे। मुझे लगता है कि मेरे पुत्रों पर निश्चय ही अत्यन्त भयानक विपत्ति आ पड़ी है।
श्लोक 10 (6.65.10)
घातयिष्यति मे सर्वान्पुत्रान्भीमो न संशयः । न हि पश्यामि तं वीरं यो मे रक्षेत्सुतान्रणे ॥
ghātayiṣyati me sarvānputrānbhīmo na saṃśayaḥ | na hi paśyāmi taṃ vīraṃ yo me rakṣetsutānraṇe
भीम मेरे सभी पुत्रों को मार डालेगा, इसमें संदेह नहीं। मुझे ऐसा कोई वीर नहीं दिखता जो रण में मेरे पुत्रों की रक्षा कर सके।
श्लोक 11 (6.65.11)
ध्रुवं विनाशः संप्राप्तः पुत्राणां मम सञ्जय । तस्मान्मे कारणं सूत शक्तिं चैव विशेषतः ॥
dhruvaṃ vināśaḥ saṃprāptaḥ putrāṇāṃ mama sañjaya | tasmānme kāraṇaṃ sūta śaktiṃ caiva viśeṣataḥ
संजय, निश्चय ही मेरे पुत्रों का विनाश आ पहुँचा है। इसलिए हे सूत, इसका कारण और विशेष रूप से उनकी शक्ति—
श्लोक 12 (6.65.12)
पृच्छतो वै यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमर्हसि । दुर्योधनश्च यच्चक्रे दृष्ट्वा स्वान्विमुखान्रणे ॥
pṛcchato vai yathātattvaṃ sarvamākhyātumarhasi | duryodhanaśca yaccakre dṛṣṭvā svānvimukhānraṇe
मेरे पूछने पर तुम सब कुछ यथार्थ रूप से बताओ। और अपने योद्धाओं को रण से विमुख देखकर दुर्योधन ने क्या किया?
श्लोक 13 (6.65.13)
भीष्मद्रोणौ कृपश्चैव सौबलश्च जयद्रथः । द्रौणिर्वापि महेष्वासो विकर्णो वा महाबलः ॥
bhīṣmadroṇau kṛpaścaiva saubalaśca jayadrathaḥ | drauṇirvāpi maheṣvāso vikarṇo vā mahābalaḥ
भीष्म और द्रोण, कृप, सुबलपुत्र शकुनि और जयद्रथ, महाधनुर्धर अश्वत्थामा अथवा महाबली विकर्ण—
श्लोक 14 (6.65.14)
निश्चयो वापि कस्तेषां तदा ह्यासीन्महात्मनाम् । विमुखेषु महाप्राज्ञ मम पुत्रेषु सञ्जय ॥
niścayo vāpi kasteṣāṃ tadā hyāsīnmahātmanām | vimukheṣu mahāprājña mama putreṣu sañjaya
हे महाप्राज्ञ संजय, जब मेरे पुत्र विमुख हो गए तब उन महात्माओं ने क्या निश्चय किया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 15 (6.65.15)
शृणु राजन्नवहितः श्रुत्वा चैवावधारय । नैव मन्त्रकृतं किंचिन्नैव मायां तथाविधाम् ॥
śṛṇu rājannavahitaḥ śrutvā caivāvadhāraya | naiva mantrakṛtaṃ kiṃcinnaiva māyāṃ tathāvidhām
राजन्, सावधान होकर सुनिए और सुनकर मन में धारण कीजिए। पाण्डव न कोई मन्त्र-प्रयोग करते हैं, न वैसी कोई माया,
श्लोक 16 (6.65.16)
न वै विभीषिकां कांचिद्राजन्कुर्वन्ति पाण्डवाः । युध्यन्ति ते यथान्यायं शक्तिमन्तश्च संयुगे ॥
na vai vibhīṣikāṃ kāṃcidrājankurvanti pāṇḍavāḥ | yudhyanti te yathānyāyaṃ śaktimantaśca saṃyuge
और राजन्, न ही भय उपजाने वाला कोई छल करते हैं। वे न्याय के अनुसार युद्ध करते हैं और संग्राम में शक्तिशाली हैं।
श्लोक 17 (6.65.17)
धर्मेण सर्वकार्याणि जीवितादीनि भारत । आरभन्ते सदा पार्थाः प्रार्थयाना महद्यशः ॥
dharmeṇa sarvakāryāṇi jīvitādīni bhārata | ārabhante sadā pārthāḥ prārthayānā mahadyaśaḥ
हे भारत, कुन्तीपुत्र महान् यश की कामना करते हुए जीविका आदि अपने सभी कार्य सदा धर्म के अनुसार ही आरम्भ करते हैं।
श्लोक 18 (6.65.18)
न ते युद्धान्निवर्तन्ते धर्मोपेता महाबलाः । श्रिया परमया युक्ता यतो धर्मस्ततो जयः ॥
na te yuddhānnivartante dharmopetā mahābalāḥ | śriyā paramayā yuktā yato dharmastato jayaḥ
धर्म से युक्त वे महाबली युद्ध से पीछे नहीं हटते; वे परम श्री से सम्पन्न हैं। जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
श्लोक 19 (6.65.19)
तेनावध्या रणे पार्था जययुक्ताश्च पार्थिव । तव पुत्रा दुरात्मानः पापेष्वभिरताः सदा ॥
tenāvadhyā raṇe pārthā jayayuktāśca pārthiva | tava putrā durātmānaḥ pāpeṣvabhiratāḥ sadā
इसी कारण, हे पृथ्वीपति, कुन्तीपुत्र रण में अवध्य और विजयी हैं। आपके पुत्र दुष्टात्मा हैं, सदा पापों में रत रहते हैं,
श्लोक 20 (6.65.20)
निष्ठुरा हीनकर्माणस्तेन हीयन्ति संयुगे । सुबहूनि नृशंसानि पुत्रैस्तव जनेश्वर ॥
niṣṭhurā hīnakarmāṇastena hīyanti saṃyuge | subahūni nṛśaṃsāni putraistava janeśvara
कठोर और नीच कर्म करने वाले हैं; इसी से वे युद्ध में हार रहे हैं। हे जनेश्वर, आपके पुत्रों ने
श्लोक 21 (6.65.21)
निकृतानीह पाण्डूनां नीचैरिव यथा नरैः । सर्वं च तदनादृत्य पुत्राणां तव किल्बिषम् ॥
nikṛtānīha pāṇḍūnāṃ nīcairiva yathā naraiḥ | sarvaṃ ca tadanādṛtya putrāṇāṃ tava kilbiṣam
नीच मनुष्यों की भाँति पाण्डवों के साथ बहुत-से क्रूर अपकार किए हैं। आपके पुत्रों के उस सारे अपराध की उपेक्षा करके
श्लोक 22 (6.65.22)
धर्ममूलाः सदैवासन्पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज । न चैतान्बहुमन्यन्ते पुत्रास्तव विशांपते ॥
dharmamūlāḥ sadaivāsanpāṇḍavāḥ pāṇḍupūrvaja | na caitānbahumanyante putrāstava viśāṃpate
हे पाण्डु के बड़े भाई, पाण्डव सदा धर्म को ही मूल मानकर चलते रहे; फिर भी हे प्रजानाथ, आपके पुत्र उनका आदर नहीं करते।
श्लोक 23 (6.65.23)
तस्य पापस्य सततं क्रियमाणस्य कर्मणः । सांप्रतं सुमहद्धोरं फलं प्राप्तं जनेश्वर ॥
tasya pāpasya satataṃ kriyamāṇasya karmaṇaḥ | sāṃprataṃ sumahaddhoraṃ phalaṃ prāptaṃ janeśvara
हे जनेश्वर, निरन्तर किए जाते रहे उस पापकर्म का अत्यन्त घोर फल अब सामने आ गया है।
श्लोक 24 (6.65.24)
स त्वं भुङ्क्ष्व महाराज सपुत्रः ससुहृज्जनः । नावबुध्यसि यद्राजन्वार्यमाणः सुहृज्जनैः ॥
sa tvaṃ bhuṅkṣva mahārāja saputraḥ sasuhṛjjanaḥ | nāvabudhyasi yadrājanvāryamāṇaḥ suhṛjjanaiḥ
महाराज, अब आप अपने पुत्रों और सुहृदों सहित उसे भोगिए; राजन्, सुहृदों के रोकने पर भी आप नहीं समझे,
श्लोक 25 (6.65.25)
विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना । तथा मया चाप्यसकृद्वार्यमाणो न बुध्यसे ॥
vidureṇātha bhīṣmeṇa droṇena ca mahātmanā | tathā mayā cāpyasakṛdvāryamāṇo na budhyase
विदुर, भीष्म और महात्मा द्रोण ने आपको रोका। मैंने भी बार-बार रोका, फिर भी आप नहीं समझे
श्लोक 26 (6.65.26)
वाक्यं हितं च पथ्यं च मर्त्यः पथ्यमिवौषधम् । पुत्राणां मतमास्थाय जितान्मन्यसि पाण्डवान् ॥
vākyaṃ hitaṃ ca pathyaṃ ca martyaḥ pathyamivauṣadham | putrāṇāṃ matamāsthāya jitānmanyasi pāṇḍavān
उस हितकर और पथ्य वचन को, जैसे मरणासन्न मनुष्य पथ्य औषधि को नहीं लेता। अपने पुत्रों के मत को अपनाकर आपने पाण्डवों को पराजित मान लिया।
श्लोक 27 (6.65.27)
शृणु भूयो यथातत्त्वं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । कारणं भरतश्रेष्ठ पाण्डवानां जयं प्रति ॥
śṛṇu bhūyo yathātattvaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi | kāraṇaṃ bharataśreṣṭha pāṇḍavānāṃ jayaṃ prati
हे भरतश्रेष्ठ, आप मुझसे जो पूछ रहे हैं—पाण्डवों की विजय का कारण—उसे फिर यथार्थ रूप से सुनिए।
श्लोक 28 (6.65.28)
तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाश्रुतमरिन्दम । दुर्योधनेन संपृष्ट एतमर्थं पितामहः ॥
tatte'haṃ kathayiṣyāmi yathāśrutamarindama | duryodhanena saṃpṛṣṭa etamarthaṃ pitāmahaḥ
हे शत्रुदमन, मैंने जैसा सुना है, वैसा ही आपको बताऊँगा। इसी विषय में दुर्योधन ने पितामह से प्रश्न किया था।
श्लोक 29 (6.65.29)
दृष्ट्वा भ्रातॄन्रणे सर्वान्निर्जितांस्तु महारथान् । शोकसंमूढहृदयो निशाकाले स्म कौरवः ॥
dṛṣṭvā bhrātṝnraṇe sarvānnirjitāṃstu mahārathān | śokasaṃmūḍhahṛdayo niśākāle sma kauravaḥ
रण में अपने सभी महारथी भाइयों को पराजित देखकर शोक से मूढ़ हृदय वाला वह कौरव रात्रि के समय
श्लोक 30 (6.65.30)
पितामहं महाप्राज्ञं विनयेनोपगम्य ह । यदब्रवीत्सुतस्तेऽसौ तन्मे शृणु जनेश्वर ॥
pitāmahaṃ mahāprājñaṃ vinayenopagamya ha | yadabravītsutaste'sau tanme śṛṇu janeśvara
विनयपूर्वक महाप्राज्ञ पितामह के पास गया। हे जनेश्वर, आपके उस पुत्र ने जो कहा, वह मुझसे सुनिए।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 31 (6.65.31)
भवान्द्रोणश्च कर्णश्च कृपो द्रौणिस्तथैव च । कृतवर्मा च हार्दिक्यः काम्भोजश्च सुदक्षिणः ॥
bhavāndroṇaśca karṇaśca kṛpo drauṇistathaiva ca | kṛtavarmā ca hārdikyaḥ kāmbhojaśca sudakṣiṇaḥ
आप, द्रोण, कर्ण, कृप तथा अश्वत्थामा, हृदिकपुत्र कृतवर्मा और काम्बोजराज सुदक्षिण,
श्लोक 32 (6.65.32)
भूरिश्रवा विकर्णश्च भगदत्तश्च वीर्यवान् । महारथाः समाख्याताः कुलपुत्रास्तनुत्यजः ॥
bhūriśravā vikarṇaśca bhagadattaśca vīryavān | mahārathāḥ samākhyātāḥ kulaputrāstanutyajaḥ
भूरिश्रवा, विकर्ण और पराक्रमी भगदत्त—ये सब प्रसिद्ध महारथी, कुलीन और प्राण त्यागने को तत्पर हैं।
श्लोक 33 (6.65.33)
त्रयाणामपि लोकानां पर्याप्ता इति मे मतिः । पाण्डवानां समस्ताश्च न तिष्ठन्ति पराक्रमे ॥
trayāṇāmapi lokānāṃ paryāptā iti me matiḥ | pāṇḍavānāṃ samastāśca na tiṣṭhanti parākrame
मेरे विचार से आप सब तीनों लोकों के लिए भी पर्याप्त हैं; और सारे पाण्डव मिलकर भी आपके पराक्रम के आगे नहीं टिक सकते।
श्लोक 34 (6.65.34)
तत्र मे संशयो जातस्तत्त्वमाचक्ष्व पृच्छतः । यं समाश्रित्य कौन्तेया जयन्त्यस्मान्क्षणेक्षणे ॥
tatra me saṃśayo jātastattvamācakṣva pṛcchataḥ | yaṃ samāśritya kaunteyā jayantyasmānkṣaṇekṣaṇe
इसलिए मेरे मन में संशय उत्पन्न हुआ है; मेरे पूछने पर सत्य बताइए—किसका आश्रय लेकर कुन्तीपुत्र हमें क्षण-क्षण में जीत रहे हैं?
भीष्म उवाच
श्लोक 35 (6.65.35)
शृणु राजन्वचो मह्यं यथा वक्ष्यामि कौरव । बहुशश्च मयोक्तोऽसि न च मे तत्त्वया कृतम् ॥
śṛṇu rājanvaco mahyaṃ yathā vakṣyāmi kaurava | bahuśaśca mayokto'si na ca me tattvayā kṛtam
राजन्, हे कौरव, मैं जो कहता हूँ, मेरी वह बात सुनो। मैंने तुमसे बहुत बार कहा, पर तुमने मेरा कहा नहीं किया।
श्लोक 36 (6.65.36)
क्रियतां पाण्डवैः सार्धं शमो भरतसत्तम । एतत्क्षेममहं मन्ये पृथिव्यास्तव वा विभो ॥
kriyatāṃ pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ śamo bharatasattama | etatkṣemamahaṃ manye pṛthivyāstava vā vibho
हे भरतश्रेष्ठ, पाण्डवों के साथ सन्धि कर लो। प्रभो, मैं इसी में पृथ्वी का और तुम्हारा कल्याण मानता हूँ।
श्लोक 37 (6.65.37)
भुङ्क्ष्वेमां पृथिवीं राजन्भ्रातृभिः सहितः सुखी । दुर्हृदस्तापयन्सर्वान्नन्दयंश्चापि बान्धवान् ॥
bhuṅkṣvemāṃ pṛthivīṃ rājanbhrātṛbhiḥ sahitaḥ sukhī | durhṛdastāpayansarvānnandayaṃścāpi bāndhavān
राजन्, अपने भाइयों के साथ सुखपूर्वक इस पृथ्वी का भोग करो, सब बुरा चाहने वालों को संतप्त करते हुए और बन्धु-बान्धवों को आनन्द देते हुए।
श्लोक 38 (6.65.38)
न च मे क्रोशतस्तात श्रुतवानसि वै पुरा । तदिदं समनुप्राप्तं यत्पाण्डूनवमन्यसे ॥
na ca me krośatastāta śrutavānasi vai purā | tadidaṃ samanuprāptaṃ yatpāṇḍūnavamanyase
तात, मैं पुकार-पुकारकर कहता रहा, पर तुमने पहले मेरी बात नहीं सुनी। तुम जो पाण्डवों का अपमान करते हो, उसी का यह फल सामने आया है।
श्लोक 39 (6.65.39)
यश्च हेतुरवध्यत्वे तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तं शृणुष्व महाबाहो मम कीर्तयतः प्रभो ॥
yaśca heturavadhyatve teṣāmakliṣṭakarmaṇām | taṃ śṛṇuṣva mahābāho mama kīrtayataḥ prabho
और अनथक पराक्रम करने वाले उन पाण्डवों के अवध्य होने का जो कारण है, हे महाबाहो, प्रभो, मेरे मुख से उसका वर्णन सुनो।
श्लोक 40 (6.65.40)
नास्ति लोकेषु तद्भूतं भविता नो भविष्यति । यो जयेत्पाण्डवान्सर्वान्पालिताञ्छार्ङ्गधन्वना ॥
nāsti lokeṣu tadbhūtaṃ bhavitā no bhaviṣyati | yo jayetpāṇḍavānsarvānpālitāñchārṅgadhanvanā
लोकों में ऐसा कोई प्राणी न है, न था, न होगा, जो शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित सभी पाण्डवों को जीत सके।
श्लोक 41 (6.65.41)
यत्तु मे कथितं तात मुनिभिर्भावितात्मभिः । पुराणगीतं धर्मज्ञ तच्छृणुष्व यथातथम् ॥
yattu me kathitaṃ tāta munibhirbhāvitātmabhiḥ | purāṇagītaṃ dharmajña tacchṛṇuṣva yathātatham
तात, हे धर्मज्ञ, शुद्ध अन्तःकरण वाले मुनियों ने मुझे जो पुराण-कथा सुनाई थी, उसे यथावत् सुनो।
श्लोक 42 (6.65.42)
पुरा किल सुराः सर्वे ऋषयश्च समागताः । पितामहमुपासेदुः पर्वते गन्धमादने ॥
purā kila surāḥ sarve ṛṣayaśca samāgatāḥ | pitāmahamupāseduḥ parvate gandhamādane
कहते हैं, पूर्वकाल में सभी देवता और ऋषि एकत्र होकर गन्धमादन पर्वत पर पितामह ब्रह्मा की सेवा में बैठे थे।
श्लोक 43 (6.65.43)
तेषां मध्ये समासीनः प्रजापतिरपश्यत । विमानं प्रज्वलद्भासा स्थितं प्रवरमम्बरे ॥
teṣāṃ madhye samāsīnaḥ prajāpatirapaśyata | vimānaṃ prajvaladbhāsā sthitaṃ pravaramambare
उनके बीच बैठे प्रजापति ने आकाश में स्थित एक श्रेष्ठ विमान देखा, जो प्रभा से प्रज्वलित हो रहा था।
श्लोक 44 (6.65.44)
ध्यानेनावेद्य तद्ब्रह्मा कृत्वा च नियतोऽञ्जलिम् । नमश्चकार हृष्टात्मा पुरुषं परमेश्वरम् ॥
dhyānenāvedya tadbrahmā kṛtvā ca niyato'ñjalim | namaścakāra hṛṣṭātmā puruṣaṃ parameśvaram
ध्यान से उसे जानकर संयमी ब्रह्मा ने हाथ जोड़े और प्रसन्नचित्त होकर परम पुरुष परमेश्वर को प्रणाम किया।
श्लोक 45 (6.65.45)
ऋषयस्त्वथ देवाश्च दृष्ट्वा ब्रह्माणमुत्थितम् । स्थिताः प्राञ्जलयः सर्वे पश्यन्तो महदद्भुतम् ॥
ṛṣayastvatha devāśca dṛṣṭvā brahmāṇamutthitam | sthitāḥ prāñjalayaḥ sarve paśyanto mahadadbhutam
तब ऋषि और देवता ब्रह्मा को उठा हुआ देखकर सब हाथ जोड़कर खड़े हो गए और उस महान् आश्चर्य को देखने लगे।
श्लोक 46 (6.65.46)
यथावच्च तमभ्यर्च्य ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः । जगाद जगतः स्रष्टा परं परमधर्मवित् ॥
yathāvacca tamabhyarcya brahmā brahmavidāṃ varaḥ | jagāda jagataḥ sraṣṭā paraṃ paramadharmavit
उनकी विधिवत् पूजा करके ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, जगत् के स्रष्टा और परम धर्मज्ञ ब्रह्मा ने उन परम पुरुष से कहा—
पितामह उवाच
श्लोक 47 (6.65.47)
विश्वावसुर्विश्वमूर्तिर्हि विश्वे । विष्वक्सेनो विश्वकर्मा वशी च । विश्वेश्वरो वासुदेवोऽसि तस्मा- । द्योगात्मानं देवतं त्वामुपैमि ॥
viśvāvasurviśvamūrtirhi viśve | viṣvakseno viśvakarmā vaśī ca | viśveśvaro vāsudevo'si tasmā- | dyogātmānaṃ devataṃ tvāmupaimi
'आप विश्वावसु हैं, समस्त विश्व में विश्वमूर्ति हैं; आप विष्वक्सेन, विश्वकर्मा और सबको वश में रखने वाले हैं; आप विश्वेश्वर वासुदेव हैं। इसलिए मैं योगस्वरूप आप देवता की शरण में आता हूँ।
श्लोक 48 (6.65.48)
जय विश्वमहादेव जय लोकहिते रत । जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर ॥
jaya viśvamahādeva jaya lokahite rata | jaya yogīśvara vibho jaya yogaparāvara
हे विश्वरूप महादेव, आपकी जय हो! लोकहित में रत, आपकी जय हो! हे योगेश्वर, हे विभो, आपकी जय हो! हे योग के पर और अपर स्वरूप, आपकी जय हो!
श्लोक 49 (6.65.49)
पद्मगर्भविशालाक्ष जय लोकेश्वरेश्वर । भूतभव्यभवन्नाथ जय सौम्यात्मजात्मज ॥
padmagarbhaviśālākṣa jaya lokeśvareśvara | bhūtabhavyabhavannātha jaya saumyātmajātmaja
हे पद्मगर्भ, विशाललोचन, लोकेश्वरों के ईश्वर, आपकी जय हो! हे भूत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी, सौम्य पुत्रों वाले (ब्रह्मा) के जनक, आपकी जय हो!
श्लोक 50 (6.65.50)
असङ्ख्येयगुणाधार जय सर्वपरायण । नारायण सुदुष्पार जय शार्ङ्गधनुर्धर ॥
asaṅkhyeyaguṇādhāra jaya sarvaparāyaṇa | nārāyaṇa suduṣpāra jaya śārṅgadhanurdhara
हे असंख्य गुणों के आधार, सबके परम आश्रय, आपकी जय हो! हे दुर्लङ्घ्य नारायण, शार्ङ्गधनुषधारी, आपकी जय हो!
श्लोक 51 (6.65.51)
जय सर्वगुणोपेत विश्वमूर्ते निरामय । विश्वेश्वर महाबाहो जय लोकार्थतत्पर ॥
jaya sarvaguṇopeta viśvamūrte nirāmaya | viśveśvara mahābāho jaya lokārthatatpara
हे सर्वगुणसम्पन्न, विश्वमूर्ति, निरामय, आपकी जय हो! हे विश्वेश्वर, महाबाहु, लोककल्याण में तत्पर, आपकी जय हो!
श्लोक 52 (6.65.52)
महोरगवराहाद्य हरिकेश विभो जय । हरिवासदिशामीश विश्ववासामिताव्यय ॥
mahoragavarāhādya harikeśa vibho jaya | harivāsadiśāmīśa viśvavāsāmitāvyaya
हे महानाग, आदिवराह, हरिकेश, विभो, आपकी जय हो! हे पीताम्बरधारी, दिशाओं के स्वामी, विश्व के निवास, अप्रमेय और अविनाशी!
श्लोक 53 (6.65.53)
व्यक्ताव्यक्तामितस्थान नियतेन्द्रिय सत्क्रिय । असङ्ख्येयात्मभावज्ञ जय गम्भीर कामद ॥
vyaktāvyaktāmitasthāna niyatendriya satkriya | asaṅkhyeyātmabhāvajña jaya gambhīra kāmada
हे व्यक्त और अव्यक्त, अपरिमित धाम वाले, जितेन्द्रिय, सत्कर्म करने वाले! हे असंख्य आत्माओं के भावों को जानने वाले, गम्भीर, कामनाएँ पूर्ण करने वाले, आपकी जय हो!
श्लोक 54 (6.65.54)
अनन्त विदित ब्रह्मन्नित्यभूतविभावन । कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजयावह ॥
ananta vidita brahmannityabhūtavibhāvana | kṛtakārya kṛtaprajña dharmajña vijayāvaha
हे अनन्त, हे विदित, हे ब्रह्म, प्राणियों के नित्य पालक! हे कृतकृत्य, पूर्णप्रज्ञ, धर्मज्ञ, विजय दिलाने वाले!
श्लोक 55 (6.65.55)
गुह्यात्मन्सर्वयोगात्मन्स्फुटसंभूतसंभव । भूताद्य लोकतत्त्वेश जय भूतविभावन ॥
guhyātmansarvayogātmansphuṭasaṃbhūtasaṃbhava | bhūtādya lokatattveśa jaya bhūtavibhāvana
हे गुह्यात्मा, सम्पूर्ण योग के आत्मा, प्रकट रूप से उत्पन्न सब पदार्थों के उद्गम! हे भूतों के आदि, लोकतत्त्वों के ईश्वर, प्राणियों के पालक, आपकी जय हो!
श्लोक 56 (6.65.56)
आत्मयोने महाभाग कल्पसंक्षेपतत्पर । उद्भावनमनोभाव जय ब्रह्म जयप्रिय ॥
ātmayone mahābhāga kalpasaṃkṣepatatpara | udbhāvanamanobhāva jaya brahma jayapriya
हे स्वयम्भू, महाभाग, कल्प के अन्त में संहार में तत्पर! हे संकल्पमात्र से सृष्टि प्रकट करने वाले, हे ब्रह्म, विजयप्रिय, आपकी जय हो!
श्लोक 57 (6.65.57)
निसर्गसर्गनिरत कामेश परमेश्वर । अमृतोद्भवसद्भाव मुक्तात्मन्विजयप्रद ॥
nisargasarganirata kāmeśa parameśvara | amṛtodbhavasadbhāva muktātmanvijayaprada
हे स्वभाव से ही सृष्टि में रत, कामनाओं के स्वामी, परमेश्वर! हे अमृत के उद्गम, सत्स्वरूप, मुक्तात्मा, विजय देने वाले!
श्लोक 58 (6.65.58)
प्रजापतिपते देव पद्मनाभ महाबल । आत्मभूतमहाभूत सत्त्वात्मञ्जय सर्वदा ॥
prajāpatipate deva padmanābha mahābala | ātmabhūtamahābhūta sattvātmañjaya sarvadā
हे प्रजापतियों के स्वामी, देव, पद्मनाभ, महाबली! हे स्वयम्भू, महाभूत, सत्त्वस्वरूप, सदा आपकी जय हो!
श्लोक 59 (6.65.59)
पादौ तव धरा देवी दिशो बाहुर्दिवं शिरः । मूर्तिस्तेऽहं सुराः कायश्चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी ॥
pādau tava dharā devī diśo bāhurdivaṃ śiraḥ | mūrtiste'haṃ surāḥ kāyaścandrādityau ca cakṣuṣī
देवी पृथ्वी आपके चरण हैं, दिशाएँ भुजाएँ और द्युलोक सिर; मैं आपकी मूर्ति हूँ, देवता आपका शरीर हैं और चन्द्रमा तथा सूर्य आपके दोनों नेत्र।
श्लोक 60 (6.65.60)
बलं तपश्च सत्यं च कर्म धर्मात्मकं तव । तेजोऽग्निः पवनः श्वास आपस्ते स्वेदसंभवाः ॥
balaṃ tapaśca satyaṃ ca karma dharmātmakaṃ tava | tejo'gniḥ pavanaḥ śvāsa āpaste svedasaṃbhavāḥ
बल, तप, सत्य और धर्ममय कर्म आपके ही हैं; अग्नि आपका तेज है, वायु श्वास, और जल आपके स्वेद से उत्पन्न हुआ है।
श्लोक 61 (6.65.61)
अश्विनौ श्रवणौ नित्यं देवी जिह्वा सरस्वती । वेदाः संस्कारनिष्ठा हि त्वयीदं जगदाश्रितम् ॥
aśvinau śravaṇau nityaṃ devī jihvā sarasvatī | vedāḥ saṃskāraniṣṭhā hi tvayīdaṃ jagadāśritam
दोनों अश्विनीकुमार सदा आपके कान हैं, देवी सरस्वती जिह्वा; वेद आपके संस्कारों में प्रतिष्ठित हैं; यह सारा जगत् आप पर ही आश्रित है।
श्लोक 62 (6.65.62)
न सङ्ख्यानं परीमाणं न तेजो न पराक्रमम् । न बलं योगयोगीश जानीमस्ते परंतप ॥
na saṅkhyānaṃ parīmāṇaṃ na tejo na parākramam | na balaṃ yogayogīśa jānīmaste paraṃtapa
हे योग और योगियों के ईश्वर, हे परन्तप, हम न आपकी संख्या जानते हैं, न परिमाण, न तेज, न पराक्रम, न बल।
श्लोक 63 (6.65.63)
त्वद्भक्तिनिरता देव नियमैस्त्वां समाश्रिताः । अर्चयामः सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम् ॥
tvadbhaktiniratā deva niyamaistvāṃ samāśritāḥ | arcayāmaḥ sadā viṣṇo parameśaṃ maheśvaram
हे देव, आपकी भक्ति में लीन होकर और नियमों द्वारा आपका आश्रय लेकर हम सदा आप परमेश्वर, महेश्वर विष्णु की पूजा करते हैं।
श्लोक 64 (6.65.64)
ऋषयो देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । पिशाचा मानुषाश्चैव मृगपक्षिसरीसृपाः ॥
ṛṣayo devagandharvā yakṣarākṣasapannagāḥ | piśācā mānuṣāścaiva mṛgapakṣisarīsṛpāḥ
ऋषि, देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग, पिशाच, मनुष्य, पशु, पक्षी और रेंगने वाले जीव—
श्लोक 65 (6.65.65)
एवमादि मया सृष्टं पृथिव्यां त्वत्प्रसादजम् । पद्मनाभ विशालाक्ष कृष्ण दुःस्वप्ननाशन ॥
evamādi mayā sṛṣṭaṃ pṛthivyāṃ tvatprasādajam | padmanābha viśālākṣa kṛṣṇa duḥsvapnanāśana
ये सब और इनके अतिरिक्त भी जो कुछ है, उसे मैंने आपकी कृपा से पृथ्वी पर रचा है, हे पद्मनाभ, विशाललोचन, दुःस्वप्नों का नाश करने वाले कृष्ण।
श्लोक 66 (6.65.66)
त्वं गतिः सर्वभूतानां त्वं नेता त्वं जगद्गुरुः । त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विबुधाः सदा ॥
tvaṃ gatiḥ sarvabhūtānāṃ tvaṃ netā tvaṃ jagadguruḥ | tvatprasādena deveśa sukhino vibudhāḥ sadā
आप सब प्राणियों की गति हैं, आप ही नायक हैं, आप ही जगद्गुरु हैं। हे देवेश, आपकी कृपा से देवता सदा सुखी रहते हैं।
श्लोक 67 (6.65.67)
पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादात्सदाऽभवत् । तस्माद्भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धनः ॥
pṛthivī nirbhayā deva tvatprasādātsadā'bhavat | tasmādbhava viśālākṣa yaduvaṃśavivardhanaḥ
हे देव, आपकी कृपा से पृथ्वी सदा निर्भय रही है। इसलिए हे विशाललोचन, आप यदुवंश की वृद्धि करने वाले बनकर जन्म लीजिए,
श्लोक 68 (6.65.68)
धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां च वधाय च । जगतो धारणार्थाय विज्ञाप्यं कुरु मे विभो ॥
dharmasaṃsthāpanārthāya daityānāṃ ca vadhāya ca | jagato dhāraṇārthāya vijñāpyaṃ kuru me vibho
धर्म की स्थापना के लिए, दैत्यों के वध के लिए और जगत् को धारण करने के लिए। हे विभो, मेरी यह प्रार्थना पूरी कीजिए।
श्लोक 69 (6.65.69)
यत्तत्परमकं गुह्यं त्वत्प्रसादादिदं विभो । वासुदेव तदेतत्ते मयोद्गीतं यथातथम् ॥
yattatparamakaṃ guhyaṃ tvatprasādādidaṃ vibho | vāsudeva tadetatte mayodgītaṃ yathātatham
हे विभो वासुदेव, आपकी कृपा से जो वह परम गुह्य तत्त्व मुझे ज्ञात है, उसे मैंने आपके सामने यथावत् गाया है।
श्लोक 70 (6.65.70)
सृष्ट्वा संकर्षणं देवं स्वयमात्मानमात्मना । कृष्ण त्वमात्मनास्राक्षीः प्रद्युम्नं चात्मसंभवम् ॥
sṛṣṭvā saṃkarṣaṇaṃ devaṃ svayamātmānamātmanā | kṛṣṇa tvamātmanāsrākṣīḥ pradyumnaṃ cātmasaṃbhavam
हे कृष्ण, आपने स्वयं अपने से अपने ही स्वरूप देव संकर्षण को रचकर, अपने से ही अपने से उत्पन्न प्रद्युम्न को प्रकट किया।
श्लोक 71 (6.65.71)
प्रद्युम्नादनिरुद्धं त्वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम् । अनिरुद्धोऽसृजन्मां वै ब्रह्माणं लोकधारिणम् ॥
pradyumnādaniruddhaṃ tvaṃ yaṃ vidurviṣṇumavyayam | aniruddho'sṛjanmāṃ vai brahmāṇaṃ lokadhāriṇam
प्रद्युम्न से आपने अनिरुद्ध को प्रकट किया, जिन्हें अविनाशी विष्णु कहा जाता है; और अनिरुद्ध ने मुझ लोकधारी ब्रह्मा को रचा।
श्लोक 72 (6.65.72)
वासुदेवमयः सोऽहं त्वयैवास्मि विनिर्मितः । तस्माद्याचामि लोकेश चतुरात्मानमात्मना । विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुषतां विभो ॥
vāsudevamayaḥ so'haṃ tvayaivāsmi vinirmitaḥ | tasmādyācāmi lokeśa caturātmānamātmanā | vibhajya bhāgaśo''tmānaṃ vraja mānuṣatāṃ vibho
इस प्रकार मैं वासुदेवमय हूँ, आपके द्वारा ही निर्मित हूँ। इसलिए हे लोकेश, अपने में चतुर्व्यूह रूप वाले आपसे मैं याचना करता हूँ—हे विभो, अपने को अंशों में विभक्त करके मनुष्य रूप धारण कीजिए।
श्लोक 73 (6.65.73)
तत्रासुरवधं कृत्वा सर्वलोकसुखाय वै । धर्मं प्राप्य यशः प्राप्य योगं प्राप्स्यसि तत्त्वतः ॥
tatrāsuravadhaṃ kṛtvā sarvalokasukhāya vai | dharmaṃ prāpya yaśaḥ prāpya yogaṃ prāpsyasi tattvataḥ
वहाँ सब लोकों के सुख के लिए असुरों का वध करके, धर्म और यश प्राप्त करके, आप तत्त्वतः योग को प्राप्त होंगे।
श्लोक 74 (6.65.74)
त्वां हि ब्रह्मर्षयो लोके देवाश्चामितविक्रम । तैस्तैर्हि नामभिर्युक्ता गायन्ति परमात्मकम् ॥
tvāṃ hi brahmarṣayo loke devāścāmitavikrama | taistairhi nāmabhiryuktā gāyanti paramātmakam
हे अमितविक्रम, संसार में ब्रह्मर्षि और देवता भिन्न-भिन्न नामों से आपका परमात्मा के रूप में गान करते हैं।
श्लोक 75 (6.65.75)
स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसङ्घाः । कृत्वाश्रयं त्वां वरदं सुबाहो । अनादिमध्यान्तमपारयोगं । लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्राः ॥
sthitāśca sarve tvayi bhūtasaṅghāḥ | kṛtvāśrayaṃ tvāṃ varadaṃ subāho | anādimadhyāntamapārayogaṃ | lokasya setuṃ pravadanti viprāḥ
हे सुबाहो, सब प्राणि-समुदाय वरदाता आपको आश्रय बनाकर आपमें ही स्थित हैं; ब्राह्मण आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अपार योग वाला और लोक का सेतु कहते हैं।'