भीष्म पर्व · अध्याय 66
ब्रह्मा द्वारा देवताओं को वासुदेव का परिचय
भीष्म कथा आगे बढ़ाते हैं। भगवान् ब्रह्मा से कहते हैं कि उनकी इच्छा पूरी होगी और अन्तर्धान हो जाते हैं। विस्मित देवता, ऋषि और गन्धर्व पूछते हैं कि उन्होंने किसकी स्तुति की, तो ब्रह्मा बताते हैं कि वे परम पुरुष हैं, जो उनकी प्रार्थना पर मनुष्यों में जन्मे असुरों के विनाश के लिए नर के साथ वासुदेव के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेंगे; और चेतावनी देते हैं कि जो उन्हें केवल मनुष्य मानकर उनका अनादर करता है, वह घोर अन्धकार में डूबता है। परशुराम, मार्कण्डेय, व्यास और नारद से यह कथा सुन चुके भीष्म दुर्योधन को नर-नारायण स्वरूप अर्जुन और श्रीकृष्ण से द्वेष करने के लिए धिक्कारते हैं और घोषणा करते हैं कि पाण्डव वासुदेव द्वारा रक्षित हैं: जहाँ कृष्ण हैं वहाँ धर्म है, और जहाँ धर्म है वहाँ विजय है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (6.66.1)
ततः स भगवान्देवो लोकानामीश्वरेश्वरः । ब्रह्माणं प्रत्युवाचेदं स्निग्धगम्भीरया गिरा ॥
tataḥ sa bhagavāndevo lokānāmīśvareśvaraḥ | brahmāṇaṃ pratyuvācedaṃ snigdhagambhīrayā girā
तब लोकेश्वरों के भी ईश्वर उन भगवान् देव ने स्नेहपूर्ण गम्भीर वाणी में ब्रह्मा को उत्तर दिया—
श्लोक 2 (6.66.2)
विदितं तात योगान्मे सर्वमेतत्तवेप्सितम् । तथा तद्भवितेत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥
viditaṃ tāta yogānme sarvametattavepsitam | tathā tadbhavitetyuktvā tatraivāntaradhīyata
'तात, योगबल से मैं तुम्हारा सारा अभीष्ट जान गया हूँ; वैसा ही होगा।' यह कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 3 (6.66.3)
ततो देवर्षिगन्धर्वा विस्मयं परमं गताः । कौतूहलपराः सर्वे पितामहमथाब्रुवन् ॥
tato devarṣigandharvā vismayaṃ paramaṃ gatāḥ | kautūhalaparāḥ sarve pitāmahamathābruvan
तब देवता, देवर्षि और गन्धर्व परम विस्मय में पड़ गए और कौतूहल से भरकर सबने पितामह से कहा—
देवर्षिगन्धर्वा ऊचुः
श्लोक 4 (6.66.4)
कोन्वयं यो भगवता प्रणम्य विनयाद्विभो । वाग्भिः स्तुतो वरिष्ठाभिः श्रोतुमिच्छाम तं वयम् ॥
konvayaṃ yo bhagavatā praṇamya vinayādvibho | vāgbhiḥ stuto variṣṭhābhiḥ śrotumicchāma taṃ vayam
हे प्रभो, यह कौन है, जिसे आप भगवान् ने विनयपूर्वक प्रणाम किया और श्रेष्ठ वचनों से जिसकी स्तुति की? हम उसके विषय में सुनना चाहते हैं।
भीष्म उवाच
श्लोक 5 (6.66.5)
एवमुक्तस्तु भगवान्प्रत्युवाच पितामहः । देवब्रह्मर्षिगन्धर्वान्सर्वान्मधुरया गिरा ॥
evamuktastu bhagavānpratyuvāca pitāmahaḥ | devabrahmarṣigandharvānsarvānmadhurayā girā
उनके ऐसा कहने पर भगवान् पितामह ने सब देवताओं, ब्रह्मर्षियों और गन्धर्वों को मधुर वाणी में उत्तर दिया—
पितामह उवाच
श्लोक 6 (6.66.6)
यत्तत्परं भविष्यं च भवितव्यं च यत्परम् । भूतात्मा च प्रभुश्चैव ब्रह्म यच्च परं पदम् ॥
yattatparaṃ bhaviṣyaṃ ca bhavitavyaṃ ca yatparam | bhūtātmā ca prabhuścaiva brahma yacca paraṃ padam
'जो वह परम तत्त्व है, जो भविष्य है और जो होने वाला परम है; जो भूतों का आत्मा और प्रभु है, जो ब्रह्म और परम पद है—
श्लोक 7 (6.66.7)
तेनास्मि कृतसंवादः प्रसन्नेन सुरर्षभाः । जगतोऽनुग्रहार्थाय याचितो मे जगत्पतिः ॥
tenāsmi kṛtasaṃvādaḥ prasannena surarṣabhāḥ | jagato'nugrahārthāya yācito me jagatpatiḥ
हे श्रेष्ठ देवताओ, प्रसन्न हुए उन्हीं से मैंने संवाद किया है। जगत् पर अनुग्रह के लिए मैंने उन जगत्पति से याचना की कि—
श्लोक 8 (6.66.8)
मानुषं लोकमातिष्ठ वासुदेव इति श्रुतः । असुराणां वधार्थाय संभवस्व महीतले ॥
mānuṣaṃ lokamātiṣṭha vāsudeva iti śrutaḥ | asurāṇāṃ vadhārthāya saṃbhavasva mahītale
“आप वासुदेव नाम से प्रसिद्ध होकर मनुष्यलोक में रहिए; असुरों के वध के लिए पृथ्वी पर जन्म लीजिए।”
श्लोक 9 (6.66.9)
संग्रामे निहता ये ते दैत्यदानवराक्षसाः । त इमे नृषु संभूता घोररूपा महाबलाः ॥
saṃgrāme nihatā ye te daityadānavarākṣasāḥ | ta ime nṛṣu saṃbhūtā ghorarūpā mahābalāḥ
संग्राम में जो दैत्य, दानव और राक्षस मारे गए थे, वे ही भयंकर रूप वाले महाबली होकर मनुष्यों में उत्पन्न हुए हैं।
श्लोक 10 (6.66.10)
तेषां वधार्थं भगवान्नरेण सहितो वशी । मानुषीं योनिमास्थाय चरिष्यति महीतले ॥
teṣāṃ vadhārthaṃ bhagavānnareṇa sahito vaśī | mānuṣīṃ yonimāsthāya cariṣyati mahītale
उनके वध के लिए जितेन्द्रिय भगवान् नर के साथ मनुष्य-योनि में जन्म लेकर पृथ्वी पर विचरेंगे।
श्लोक 11 (6.66.11)
नरनारायणौ यौ तौ पुराणावृषिसत्तमौ । सहितौ मानुषे लोके संभूतावमितद्युती ॥
naranārāyaṇau yau tau purāṇāvṛṣisattamau | sahitau mānuṣe loke saṃbhūtāvamitadyutī
नर और नारायण नामक जो दो पुरातन श्रेष्ठ ऋषि हैं, वे दोनों अमित तेजस्वी साथ-साथ मनुष्यलोक में उत्पन्न हुए हैं।
श्लोक 12 (6.66.12)
अजेयौ समरे यत्तौ सहितैरमरैरपि । मूढास्त्वेतौ न जानन्ति नरनारायणावृषी ॥
ajeyau samare yattau sahitairamarairapi | mūḍhāstvetau na jānanti naranārāyaṇāvṛṣī
युद्ध में तत्पर होने पर वे दोनों सब देवताओं के मिलकर आने पर भी अजेय हैं। परन्तु मूढ़ लोग इन्हें नर-नारायण ऋषि के रूप में नहीं जानते।
श्लोक 13 (6.66.13)
तस्याहमग्रजः पुत्रः सर्वस्य जगतः प्रभुः । वासुदेवोऽर्चनीयो वः सर्वलोकमहेश्वरः ॥
tasyāhamagrajaḥ putraḥ sarvasya jagataḥ prabhuḥ | vāsudevo'rcanīyo vaḥ sarvalokamaheśvaraḥ
मैं उनका ज्येष्ठ पुत्र और सम्पूर्ण जगत् का स्वामी हूँ। सब लोकों के महेश्वर वासुदेव तुम्हारे पूजनीय हैं।
श्लोक 14 (6.66.14)
तथा मनुष्योऽयमिति कदाचित्सुरसत्तमाः । नावज्ञेयो महावीर्यः शङ्खचक्रगदाधरः ॥
tathā manuṣyo'yamiti kadācitsurasattamāḥ | nāvajñeyo mahāvīryaḥ śaṅkhacakragadādharaḥ
इसलिए हे श्रेष्ठ देवताओ, 'यह मनुष्य है' ऐसा मानकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले उन महापराक्रमी का कभी अनादर नहीं करना चाहिए।
श्लोक 15 (6.66.15)
एतत्परमकं गुह्यमेतत्परमकं पदम् । एतत्परमकं ब्रह्म एतत्परमकं यशः ॥
etatparamakaṃ guhyametatparamakaṃ padam | etatparamakaṃ brahma etatparamakaṃ yaśaḥ
वे ही परम गुह्य हैं, वे ही परम पद हैं; वे ही परम ब्रह्म हैं, वे ही परम यश हैं।
श्लोक 16 (6.66.16)
एतदक्षरमव्यक्तमेतद्वै शाश्वतं महः । यत्तत्पुरुषसंज्ञं वै गीयते ज्ञायते न च ॥
etadakṣaramavyaktametadvai śāśvataṃ mahaḥ | yattatpuruṣasaṃjñaṃ vai gīyate jñāyate na ca
वे ही अक्षर, अव्यक्त और शाश्वत ज्योति हैं; जिन्हें पुरुष कहा जाता है, जिनका गान होता है पर जो जाने नहीं जाते, वे यही हैं।
श्लोक 17 (6.66.17)
एतत्परमकं तेज एतत्परमकं सुखम् । एतत्परमकं सत्यं कीर्तितं विश्वकर्मणा ॥
etatparamakaṃ teja etatparamakaṃ sukham | etatparamakaṃ satyaṃ kīrtitaṃ viśvakarmaṇā
वे ही परम तेज हैं, वे ही परम सुख हैं; वे ही विश्वकर्मा द्वारा वर्णित परम सत्य हैं।
श्लोक 18 (6.66.18)
तस्मात्सेन्द्रैः सुरैः सर्वैर्लोकैश्चामितविक्रमः । नावज्ञेयो वासुदेवो मानुषोऽयमिति प्रभुः ॥
tasmātsendraiḥ suraiḥ sarvairlokaiścāmitavikramaḥ | nāvajñeyo vāsudevo mānuṣo'yamiti prabhuḥ
इसलिए इन्द्र सहित सब देवताओं और सब लोकों को अमित पराक्रमी प्रभु वासुदेव का 'यह मनुष्य है' ऐसा मानकर अनादर नहीं करना चाहिए।
श्लोक 19 (6.66.19)
यश्च मानुषमात्रोऽयमिति ब्रूयात्स मन्दधीः । हृषीकेशमवज्ञानात्तमाहुः पुरुषाधमम् ॥
yaśca mānuṣamātro'yamiti brūyātsa mandadhīḥ | hṛṣīkeśamavajñānāttamāhuḥ puruṣādhamam
और जो यह कहे कि 'यह केवल मनुष्य है', वह मन्दबुद्धि है; हृषीकेश का अनादर करने के कारण उसे अधम पुरुष कहा जाता है।
श्लोक 20 (6.66.20)
योगिनं तं महात्मानं प्रविष्टं मानुषीं तनुम् । अवमन्येद्वासुदेवं तमाहुस्तामसं जनाः ॥
yoginaṃ taṃ mahātmānaṃ praviṣṭaṃ mānuṣīṃ tanum | avamanyedvāsudevaṃ tamāhustāmasaṃ janāḥ
जो मनुष्य-शरीर में प्रविष्ट उन महात्मा योगी वासुदेव की अवहेलना करता है, उसे लोग तामस कहते हैं।
श्लोक 21 (6.66.21)
देवं चराचरात्मानं श्रीवत्साङ्कं सुवर्चसम् । पद्मनाभं न जानाति तमाहुस्तामसं बुधाः ॥
devaṃ carācarātmānaṃ śrīvatsāṅkaṃ suvarcasam | padmanābhaṃ na jānāti tamāhustāmasaṃ budhāḥ
जो चराचर के आत्मा, श्रीवत्स-चिह्न से युक्त, परम तेजस्वी पद्मनाभ देव को नहीं जानता, उसे ज्ञानी लोग तामस कहते हैं।
श्लोक 22 (6.66.22)
किरीटकौस्तुभधरं मित्राणामभयंकरम् । अवजानन्महात्मानं घोरे तमसि मज्जति ॥
kirīṭakaustubhadharaṃ mitrāṇāmabhayaṃkaram | avajānanmahātmānaṃ ghore tamasi majjati
किरीट और कौस्तुभ धारण करने वाले, मित्रों को अभय देने वाले उन महात्मा का जो अनादर करता है, वह घोर अन्धकार में डूब जाता है।
श्लोक 23 (6.66.23)
एवं विदित्वा तत्त्वार्थं लोकानामीश्वरेश्वरः । वासुदेवो नमस्कार्यः सर्वलोकैः सुरोत्तमाः । तस्याहमात्मजो ब्रह्मा सर्वस्य जगतः पतिः ॥
evaṃ viditvā tattvārthaṃ lokānāmīśvareśvaraḥ | vāsudevo namaskāryaḥ sarvalokaiḥ surottamāḥ | tasyāhamātmajo brahmā sarvasya jagataḥ patiḥ
हे श्रेष्ठ देवताओ, इस तत्त्व को जानकर लोकेश्वरों के ईश्वर वासुदेव को सब लोकों को नमस्कार करना चाहिए। सम्पूर्ण जगत् का स्वामी मैं ब्रह्मा उन्हीं का पुत्र हूँ।'
भीष्म उवाच
श्लोक 24 (6.66.24)
एवमुक्त्वा स भगवान्देवान्सर्षिगणान्पुरा । विसृज्य सर्वभूतानि जगाम भवनं स्वकम् ॥
evamuktvā sa bhagavāndevānsarṣigaṇānpurā | visṛjya sarvabhūtāni jagāma bhavanaṃ svakam
पूर्वकाल में ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा ऋषिगणों सहित देवताओं को और सब प्राणियों को विदा करके अपने धाम को चले गए।
श्लोक 25 (6.66.25)
ततो देवाः सगन्धर्वा मुनयोऽप्सरसोऽपि च । कथां तां ब्रह्मणा गीतां श्रुत्वा प्रीता दिवं ययुः ॥
tato devāḥ sagandharvā munayo'psaraso'pi ca | kathāṃ tāṃ brahmaṇā gītāṃ śrutvā prītā divaṃ yayuḥ
तब गन्धर्वों सहित देवता, मुनि और अप्सराएँ भी ब्रह्मा द्वारा कही गई उस कथा को सुनकर प्रसन्न होकर स्वर्ग को चले गए।
श्लोक 26 (6.66.26)
एतच्छ्रुतं मया तात ऋषीणां भावितात्मनाम् । वासुदेवं कथयतां समवाये पुरातनम् ॥
etacchrutaṃ mayā tāta ṛṣīṇāṃ bhāvitātmanām | vāsudevaṃ kathayatāṃ samavāye purātanam
तात, यह पुरातन कथा मैंने शुद्धात्मा ऋषियों से सुनी थी, जब वे अपनी सभा में वासुदेव का वर्णन कर रहे थे।
श्लोक 27 (6.66.27)
रामस्य जामदग्न्यस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः । व्यासनारदयोश्चापि सकाशाद्भरतर्षभ ॥
rāmasya jāmadagnyasya mārkaṇḍeyasya dhīmataḥ | vyāsanāradayoścāpi sakāśādbharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, मैंने इसे जमदग्निपुत्र परशुराम, बुद्धिमान् मार्कण्डेय तथा व्यास और नारद से भी सुना है।
श्लोक 28 (6.66.28)
एतमर्थं च विज्ञाय श्रुत्वा च प्रभुमव्ययम् । वासुदेवं महात्मानं लोकानामीश्वरेश्वरम् ॥
etamarthaṃ ca vijñāya śrutvā ca prabhumavyayam | vāsudevaṃ mahātmānaṃ lokānāmīśvareśvaram
इस विषय को जानकर और अविनाशी प्रभु, लोकेश्वरों के ईश्वर महात्मा वासुदेव के बारे में सुनकर—
श्लोक 29 (6.66.29)
यस्य चैवात्मजो ब्रह्मा सर्वस्य जगतः पिता । कथं न वासुदेवोऽयमर्च्यश्चेज्यश्च मानवैः ॥
yasya caivātmajo brahmā sarvasya jagataḥ pitā | kathaṃ na vāsudevo'yamarcyaścejyaśca mānavaiḥ
जिनके पुत्र सम्पूर्ण जगत् के पिता ब्रह्मा हैं, वे वासुदेव मनुष्यों द्वारा क्यों न पूज्य और आराध्य हों?
श्लोक 30 (6.66.30)
वारितोऽसि मया तात मुनिभिर्वेदपारगैः । मा गच्छ संयुगं तेन वासुदेवेन धन्विना ॥
vārito'si mayā tāta munibhirvedapāragaiḥ | mā gaccha saṃyugaṃ tena vāsudevena dhanvinā
तात, मैंने और वेदों के पारगामी मुनियों ने तुम्हें रोका था—'उस धनुर्धर वासुदेव से युद्ध मत करो,
श्लोक 31 (6.66.31)
मा पाण्डवैः सार्धमिति तत्त्वं मोहान्न बुध्यसे । मन्ये त्वां राक्षसं क्रूरं तथा चासि तमोवृतः ॥
mā pāṇḍavaiḥ sārdhamiti tattvaṃ mohānna budhyase | manye tvāṃ rākṣasaṃ krūraṃ tathā cāsi tamovṛtaḥ
'और न पाण्डवों से।' पर तुम मोहवश इस तत्त्व को नहीं समझते। मैं तुम्हें क्रूर राक्षस मानता हूँ, और तुम अन्धकार से घिरे हुए हो,
श्लोक 32 (6.66.32)
यस्माद्द्विषसि गोविन्दं पाण्डवं तं धनञ्जयम् । नरनारायणौ देवौ कोऽन्यो द्विष्याद्धि मानवः ॥
yasmāddviṣasi govindaṃ pāṇḍavaṃ taṃ dhanañjayam | naranārāyaṇau devau ko'nyo dviṣyāddhi mānavaḥ
क्योंकि तुम गोविन्द से और उस पाण्डुपुत्र धनंजय से द्वेष करते हो, जो नर और नारायण दोनों देव हैं। दूसरा कौन मनुष्य उनसे द्वेष करेगा?
श्लोक 33 (6.66.33)
तस्माद्ब्रवीमि ते राजन्नेष वै शाश्वतोऽव्ययः । सर्वलोकमयो नित्यः शास्ता धाता धरो ध्रुवः ॥
tasmādbravīmi te rājanneṣa vai śāśvato'vyayaḥ | sarvalokamayo nityaḥ śāstā dhātā dharo dhruvaḥ
इसलिए राजन्, मैं तुमसे कहता हूँ—ये सनातन, अविनाशी, सर्वलोकमय, नित्य, शासक, धाता, धारण करने वाले और ध्रुव हैं।
श्लोक 34 (6.66.34)
यो धारयति लोकांस्त्रींश्चराचरगुरुः प्रभुः । योद्धा जयश्च जेता च सर्वप्रकृतिरीश्वरः ॥
yo dhārayati lokāṃstrīṃścarācaraguruḥ prabhuḥ | yoddhā jayaśca jetā ca sarvaprakṛtirīśvaraḥ
जो तीनों लोकों को धारण करते हैं, चराचर के गुरु और प्रभु हैं, वही योद्धा, विजय और विजेता हैं, सम्पूर्ण प्रकृति के मूल और ईश्वर हैं।
श्लोक 35 (6.66.35)
राजन्सर्वमयो ह्येष तमोरागविवर्जितः । यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ॥
rājansarvamayo hyeṣa tamorāgavivarjitaḥ | yataḥ kṛṣṇastato dharmo yato dharmastato jayaḥ
राजन्, ये सर्वमय हैं, तमोगुण और रजोगुण से रहित हैं। जहाँ कृष्ण हैं वहाँ धर्म है, और जहाँ धर्म है वहाँ विजय है।
श्लोक 36 (6.66.36)
तस्य माहात्म्ययोगेन योगेनात्ममयेन च । धृताः पाण्डुसुता राजञ्जयश्चैषां भविष्यति ॥
tasya māhātmyayogena yogenātmamayena ca | dhṛtāḥ pāṇḍusutā rājañjayaścaiṣāṃ bhaviṣyati
राजन्, उनकी महिमा के योग से और उनके आत्मस्वरूप योग से पाण्डुपुत्र सुरक्षित हैं, और विजय उन्हीं की होगी।
श्लोक 37 (6.66.37)
श्रेयोयुक्तां सदा बुद्धिं पाण्डवानां दधाति यः । बलं चैव रणे नित्यं भयेभ्यश्चैव रक्षति ॥
śreyoyuktāṃ sadā buddhiṃ pāṇḍavānāṃ dadhāti yaḥ | balaṃ caiva raṇe nityaṃ bhayebhyaścaiva rakṣati
वे पाण्डवों को सदा कल्याणकारी बुद्धि देते हैं, रण में बल देते हैं और सदा भयों से उनकी रक्षा करते हैं।
श्लोक 38 (6.66.38)
स एष शाश्वतो देवः सर्वगुह्यमयः शिवः । वासुदेव इति ज्ञेयो यन्मां पृच्छसि भारत ॥
sa eṣa śāśvato devaḥ sarvaguhyamayaḥ śivaḥ | vāsudeva iti jñeyo yanmāṃ pṛcchasi bhārata
हे भारत, तुम जिनके विषय में मुझसे पूछ रहे हो, वे ये ही सनातन देव, सर्वगुह्यमय, कल्याणस्वरूप वासुदेव हैं—ऐसा जानो।
श्लोक 39 (6.66.39)
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्च कृतलक्षणैः । सेव्यतेऽभ्यर्च्यते चैव नित्ययुक्तैः स्वकर्मभिः ॥
brāhmaṇaiḥ kṣatriyairvaiśyaiḥ śūdraiśca kṛtalakṣaṇaiḥ | sevyate'bhyarcyate caiva nityayuktaiḥ svakarmabhiḥ
अपने-अपने गुणों से प्रसिद्ध ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नित्य अपने-अपने कर्मों में लगे रहकर उनकी सेवा और पूजा करते हैं।
श्लोक 40 (6.66.40)
द्वापरस्य युगस्यान्ते आदौ कलियुगस्य च । सात्वतं विधिमास्थाय गीतः संकर्षणेन वै ॥
dvāparasya yugasyānte ādau kaliyugasya ca | sātvataṃ vidhimāsthāya gītaḥ saṃkarṣaṇena vai
द्वापर युग के अन्त और कलियुग के आरम्भ में संकर्षण ने सात्वत विधि का आश्रय लेकर उनका गान किया है।
श्लोक 41 (6.66.41)
स एष सर्वं सुरमर्त्यलोकं । समुद्रकक्ष्यान्तरितां पुरीं च । युगेयुगे मानुषं चैव वासं । पुनःपुनः सृजते वासुदेवः ॥
sa eṣa sarvaṃ suramartyalokaṃ | samudrakakṣyāntaritāṃ purīṃ ca | yugeyuge mānuṣaṃ caiva vāsaṃ | punaḥpunaḥ sṛjate vāsudevaḥ
वे ही वासुदेव युग-युग में बार-बार देवताओं और मनुष्यों के सम्पूर्ण लोक की, समुद्र की करधनी से घिरी नगरी द्वारका की और मनुष्यों के बीच अपने निवास की रचना करते हैं।