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भीष्म पर्व · अध्याय 67

वासुदेव की महिमा और युधिष्ठिर का श्रीकृष्ण की शरण लेना

दुर्योधन वासुदेव की उत्पत्ति और प्रतिष्ठा के विषय में पूछता है। भीष्म परशुराम, नारद, व्यास, असित देवल, वालखिल्यों और मार्कण्डेय का प्रमाण देकर उन्हें सम्पूर्ण सृष्टि का मूल बताते हैं: उन्होंने जल, वायु और तेज रचे, जल पर शयन किया, अग्नि, वायु, सरस्वती और वेदों को प्रकट किया, संकर्षण और शेष को रचा, मधु असुर का वध करके मधुसूदन कहलाए, वराह, नृसिंह और त्रिविक्रम के रूप में पूजे जाते हैं और अपने शरीर से चारों वर्णों को उत्पन्न किया। जो केशव की उपासना करता या उनकी शरण लेता है, वह कभी मोहित नहीं होता और संकट में रक्षित रहता है; यह जानकर युधिष्ठिर ने पूरे मन से उनकी शरण ली है।

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दुर्योधन उवाच

श्लोक 1 (6.67.1)

वासुदेवो महद्भूतं सर्वलोकेषु कथ्यते । तस्यागमं प्रतिष्ठां च ज्ञातुमिच्छे पितामह ॥

vāsudevo mahadbhūtaṃ sarvalokeṣu kathyate | tasyāgamaṃ pratiṣṭhāṃ ca jñātumicche pitāmaha

पितामह, सब लोकों में वासुदेव को महान् सत्ता कहा जाता है। मैं उनकी उत्पत्ति और उनकी प्रतिष्ठा जानना चाहता हूँ।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (6.67.2)

वासुदेवो महद्भूतं सर्वदैवतदैवतम् । न परं पुण्डरीकाक्षाद्दृश्यते भरतर्षभ ॥

vāsudevo mahadbhūtaṃ sarvadaivatadaivatam | na paraṃ puṇḍarīkākṣāddṛśyate bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, वासुदेव महान् सत्ता हैं, सब देवताओं के भी देवता हैं। कमलनयन से बढ़कर कुछ भी दिखाई नहीं देता।

श्लोक 3 (6.67.3)

श्रुतं मे तात रामस्य जामदग्न्यस्य जल्पतः । नारदस्य च देवर्षेः कृष्णद्वैपायनस्य च । असितो देवलश्चापि वालखिल्यास्तपोधनाः ॥

śrutaṃ me tāta rāmasya jāmadagnyasya jalpataḥ | nāradasya ca devarṣeḥ kṛṣṇadvaipāyanasya ca | asito devalaścāpi vālakhilyāstapodhanāḥ

तात, मैंने यह जमदग्निपुत्र परशुराम के मुख से, देवर्षि नारद और कृष्णद्वैपायन से सुना है; असित देवल और तपस्वी वालखिल्य भी,

श्लोक 4 (6.67.4)

मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयत्यद्भुतं महत् । सर्वभूतादिभूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः ॥

mārkaṇḍeyaśca govinde kathayatyadbhutaṃ mahat | sarvabhūtādibhūtātmā mahātmā puruṣottamaḥ

और मार्कण्डेय गोविन्द के विषय में महान् आश्चर्यमय बातें कहते हैं। सब भूतों के आदिभूत आत्मा, महात्मा पुरुषोत्तम ने

श्लोक 5 (6.67.5)

आपो वायुश्च तेजश्च त्रयमेतदकल्पयत् । स सृष्ट्वा पृथिवीं देवीं सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ॥

āpo vāyuśca tejaśca trayametadakalpayat | sa sṛṣṭvā pṛthivīṃ devīṃ sarvalokeśvaraḥ prabhuḥ

जल, वायु और तेज—इन तीनों की रचना की। फिर देवी पृथ्वी को रचकर सब लोकों के ईश्वर प्रभु

श्लोक 6 (6.67.6)

अप्सु वै शयनं चक्रे महात्मा पुरुषोत्तमः । सर्वदेवमयो देवः शयानः शयने सुखम् ॥

apsu vai śayanaṃ cakre mahātmā puruṣottamaḥ | sarvadevamayo devaḥ śayānaḥ śayane sukham

महात्मा पुरुषोत्तम ने जल में शयन किया; सर्वदेवमय वे देव वहाँ शय्या पर सुखपूर्वक लेटे रहे।

श्लोक 7 (6.67.7)

मुखतः सोऽग्निमसृजत्प्राणाद्वायुमथापि च । सरस्वतीं च वेदांश्च मनसः ससृजेऽच्युतः ॥

mukhataḥ so'gnimasṛjatprāṇādvāyumathāpi ca | sarasvatīṃ ca vedāṃśca manasaḥ sasṛje'cyutaḥ

उन्होंने मुख से अग्नि को और प्राण से वायु को उत्पन्न किया; और अच्युत ने मन से सरस्वती और वेदों की रचना की।

श्लोक 8 (6.67.8)

एष लोकान्ससर्जादौ देवांश्च ऋषिभिः सह । अमृतं चैव मृत्युं च प्रजानां प्रभवाप्ययौ ॥

eṣa lokānsasarjādau devāṃśca ṛṣibhiḥ saha | amṛtaṃ caiva mṛtyuṃ ca prajānāṃ prabhavāpyayau

उन्होंने आदि में लोकों की और ऋषियों सहित देवताओं की रचना की, अमृत और मृत्यु की भी; वे ही प्रजाओं की उत्पत्ति और प्रलय के कारण हैं।

श्लोक 9 (6.67.9)

एष धर्मश्च धर्मज्ञो वरदः सर्वकामदः । एष कर्ता च कार्यं च आदेरादिः स्वयं प्रभुः ॥

eṣa dharmaśca dharmajño varadaḥ sarvakāmadaḥ | eṣa kartā ca kāryaṃ ca āderādiḥ svayaṃ prabhuḥ

वे ही धर्म और धर्मज्ञ हैं, वरदाता और सब कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं; वे ही कर्ता और कार्य हैं, आदि के भी आदि और स्वयं प्रभु हैं।

श्लोक 10 (6.67.10)

भूतं भव्यं भविष्यच्च पूर्वमेतदकल्पयत् । उभे सन्ध्ये दिवः खं च नियमांश्च जनार्दनः ॥

bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyacca pūrvametadakalpayat | ubhe sandhye divaḥ khaṃ ca niyamāṃśca janārdanaḥ

जनार्दन ने सबसे पहले भूत, वर्तमान और भविष्य की रचना की; दोनों सन्ध्याएँ, द्युलोक, आकाश और नियम भी उन्होंने ही बनाए।

श्लोक 11 (6.67.11)

ऋषींश्चैव हि गोविन्दस्तपश्चैवाभ्यकल्पयत् । स्रष्टारं जगतश्चापि महात्मा प्रभुरव्ययः ॥

ṛṣīṃścaiva hi govindastapaścaivābhyakalpayat | sraṣṭāraṃ jagataścāpi mahātmā prabhuravyayaḥ

गोविन्द ने ऋषियों और तप की भी रचना की; उन महात्मा अविनाशी प्रभु ने जगत् के स्रष्टा को भी रचा।

श्लोक 12 (6.67.12)

अग्रजं सर्वभूतानां संकर्षणमकल्पयत् । शेषं चाकल्पयद्देवमनन्तमिति तं विदुः ॥

agrajaṃ sarvabhūtānāṃ saṃkarṣaṇamakalpayat | śeṣaṃ cākalpayaddevamanantamiti taṃ viduḥ

उन्होंने सब प्राणियों में अग्रज संकर्षण को रचा; और देव शेष को रचा, जिन्हें अनन्त कहा जाता है,

श्लोक 13 (6.67.13)

यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम् । ध्यानयोगेन विप्राश्च तं विदन्ति महौजसम् । कर्णस्रोतोभवं चापि मधुं नाम महासुरम् ॥

yo dhārayati bhūtāni dharāṃ cemāṃ saparvatām | dhyānayogena viprāśca taṃ vidanti mahaujasam | karṇasrotobhavaṃ cāpi madhuṃ nāma mahāsuram

जो सब प्राणियों को और पर्वतों सहित इस पृथ्वी को धारण करते हैं; ब्राह्मण ध्यानयोग से उन्हें महान् ओजस्वी के रूप में जानते हैं। कान के मैल से उत्पन्न मधु नामक महान् असुर को,

श्लोक 14 (6.67.14)

तमुग्रमुग्रकर्माणमुग्रां बुद्धिं समास्थितम् । हरन्तं ब्रह्मणो वेदाञ्जघान ब्रह्मणः पिता । ब्रह्मणोऽपचितिं कुर्वन्महात्मा पुरुषोत्तमः ॥

tamugramugrakarmāṇamugrāṃ buddhiṃ samāsthitam | harantaṃ brahmaṇo vedāñjaghāna brahmaṇaḥ pitā | brahmaṇo'pacitiṃ kurvanmahātmā puruṣottamaḥ

उस उग्र, उग्र कर्म करने वाले, उग्र बुद्धि अपनाए हुए असुर को, जो ब्रह्मा के वेदों को हर रहा था, ब्रह्मा के पिता महात्मा पुरुषोत्तम ने ब्रह्मा का सम्मान करते हुए मार डाला।

श्लोक 15 (6.67.15)

तस्य तात वधादेव देवदानवमानवाः । मधुसूदनमित्याहुर्ऋषयश्च जनार्दनम् ॥

tasya tāta vadhādeva devadānavamānavāḥ | madhusūdanamityāhurṛṣayaśca janārdanam

तात, उसी वध के कारण देवता, दानव, मनुष्य और ऋषि जनार्दन को मधुसूदन कहते हैं,

श्लोक 16 (6.67.16)

वराहं नारसिंहं च त्रिविक्रममिति प्रभुम् । एष धाता विधाता च सर्वेषां प्राणिनां हरिः ॥

varāhaṃ nārasiṃhaṃ ca trivikramamiti prabhum | eṣa dhātā vidhātā ca sarveṣāṃ prāṇināṃ hariḥ

और उन प्रभु को वराह, नृसिंह और त्रिविक्रम भी कहते हैं। वे हरि ही सब प्राणियों के धाता और विधाता हैं।

श्लोक 17 (6.67.17)

परं हि पुण्डरीकाक्षान्न भूतं न भविष्यति । मुखतः सोऽसृजद्विप्रान्बाहुभ्यां क्षत्रियांस्तथा ॥

paraṃ hi puṇḍarīkākṣānna bhūtaṃ na bhaviṣyati | mukhataḥ so'sṛjadviprānbāhubhyāṃ kṣatriyāṃstathā

कमलनयन से श्रेष्ठ न कोई हुआ है, न होगा। उन्होंने मुख से ब्राह्मणों को, भुजाओं से क्षत्रियों को,

श्लोक 18 (6.67.18)

वैश्यांश्चाप्यूरुतो राजञ्शूद्रान्पद्भ्यां तथैव च । तपसा नियतं देवं निधानं सर्वदेहिनाम् ॥

vaiśyāṃścāpyūruto rājañśūdrānpadbhyāṃ tathaiva ca | tapasā niyataṃ devaṃ nidhānaṃ sarvadehinām

जंघाओं से वैश्यों को और राजन्, चरणों से शूद्रों को उत्पन्न किया। तप में स्थित उन देव को, जो सब देहधारियों के निधान हैं,

श्लोक 19 (6.67.19)

ब्रह्मभूतममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च । योगभूतं परिचरन्केशवं महदाप्नुयात् ॥

brahmabhūtamamāvāsyāṃ paurṇamāsyāṃ tathaiva ca | yogabhūtaṃ paricarankeśavaṃ mahadāpnuyāt

जो ब्रह्मस्वरूप, योगस्वरूप केशव की अमावस्या और पूर्णिमा को सेवा करता है, वह महान् फल पाता है।

श्लोक 20 (6.67.20)

केशवः परमं तेजः सर्वलोकपितामहः । एवमाहुर्हृषीकेशं मुनयो वै नराधिप ॥

keśavaḥ paramaṃ tejaḥ sarvalokapitāmahaḥ | evamāhurhṛṣīkeśaṃ munayo vai narādhipa

हे नराधिप, केशव परम तेज हैं, सब लोकों के पितामह हैं—मुनि हृषीकेश का ऐसा ही वर्णन करते हैं।

श्लोक 21 (6.67.21)

एवमेनं विजानीहि आचार्यं पितरं गुरुम् । कृष्णो यस्य प्रसीदेत लोकास्तेनाक्षया जिताः ॥

evamenaṃ vijānīhi ācāryaṃ pitaraṃ gurum | kṛṣṇo yasya prasīdeta lokāstenākṣayā jitāḥ

उन्हें इसी प्रकार आचार्य, पिता और गुरु जानो। जिस पर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो जाएँ, उसने अक्षय लोकों को जीत लिया।

श्लोक 22 (6.67.22)

यश्चैवैनं भयस्थाने केशवं शरणं व्रजेत् । सदा नरः पठंश्चेदं स्वस्तिमान्स सुखी भवेत् ॥

yaścaivainaṃ bhayasthāne keśavaṃ śaraṇaṃ vrajet | sadā naraḥ paṭhaṃścedaṃ svastimānsa sukhī bhavet

जो भय के समय इन केशव की शरण में जाता है, और जो मनुष्य सदा इसका पाठ करता है, वह कल्याण से युक्त और सुखी होता है।

श्लोक 23 (6.67.23)

ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः । भये महति मग्नांश्च पाति नित्यं जनार्दनः ॥

ye ca kṛṣṇaṃ prapadyante te na muhyanti mānavāḥ | bhaye mahati magnāṃśca pāti nityaṃ janārdanaḥ

जो मनुष्य श्रीकृष्ण की शरण लेते हैं, वे मोहित नहीं होते। महान् भय में डूबे हुए लोगों की जनार्दन सदा रक्षा करते हैं।

श्लोक 24 (6.67.24)

स तं युधिष्ठिरो ज्ञात्वा याथातथ्येन भारत । सर्वात्मना महात्मानं केशवं जगदीश्वरम् । प्रपन्नः शरणं राजन्योगानां प्रभुमीश्वरम् ॥

sa taṃ yudhiṣṭhiro jñātvā yāthātathyena bhārata | sarvātmanā mahātmānaṃ keśavaṃ jagadīśvaram | prapannaḥ śaraṇaṃ rājanyogānāṃ prabhumīśvaram

हे भारत, युधिष्ठिर ने उन्हें यथार्थ रूप से जानकर, हे राजन्, पूरे मन से उन महात्मा केशव की शरण ली है, जो जगदीश्वर और योगों के प्रभु तथा ईश्वर हैं।

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