भीष्म पर्व · अध्याय 68
भीष्म द्वारा ऋषियों की कृष्ण-स्तुति का वर्णन
भीष्म दुर्योधन को वह प्राचीन स्तुति सुनाते हैं, जिसमें नारद, मार्कण्डेय, भृगु, द्वैपायन, अंगिरा, देवल असित और सनत्कुमार आदि योगी श्रीकृष्ण को देवाधिदेव, सनातन पुरुष और धर्मनिष्ठ राजाओं की शरण कहकर स्तुति करते हैं। दुर्योधन के मन में केशव और पाण्डवों के प्रति आदर जागता है। भीष्म उसे बताते हैं कि कृष्ण और अर्जुन नारायण और नर हैं, पाण्डव अवध्य हैं, और उसे पाण्डवों से संधि करके भाइयों के साथ पृथ्वी भोगने का परामर्श देते हैं; फिर वे उसे विदा करते हैं और दुर्योधन रात बिताने अपने शिविर लौट जाता है।
भीष्म उवाच
श्लोक 1 (6.68.1)
स्तवं वै ब्रह्मसंयुक्तं शृणु कृष्णस्य भारत । ब्रह्मर्षिभिश्च देवैश्च यः पुरा कथितो भुवि ॥
stavaṃ vai brahmasaṃyuktaṃ śṛṇu kṛṣṇasya bhārata | brahmarṣibhiśca devaiśca yaḥ purā kathito bhuvi
हे भारत, श्रीकृष्ण की वह ब्रह्ममय स्तुति सुनो, जिसे प्राचीन काल में ब्रह्मर्षियों और देवताओं ने पृथ्वी पर कहा था।
श्लोक 2 (6.68.2)
साध्यानामपि देवानां देवदेवेश्वरः प्रभुः । लोकभावनभावज्ञ इति त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥
sādhyānāmapi devānāṃ devadeveśvaraḥ prabhuḥ | lokabhāvanabhāvajña iti tvāṃ nārado'bravīt
नारद ने तुम्हारे विषय में कहा था— 'तुम साध्य देवताओं के भी स्वामी, देवाधिदेवेश्वर प्रभु हो, और लोकों की रचना करने वालों के मन के भाव को जानते हो।'
श्लोक 3 (6.68.3)
भूतं भव्यं भविष्यच्च मार्कण्डेयोऽभ्युवाच ह । यज्ञं त्वां चैव यज्ञानां तपश्च तपसामपि ॥
bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyacca mārkaṇḍeyo'bhyuvāca ha | yajñaṃ tvāṃ caiva yajñānāṃ tapaśca tapasāmapi
मार्कण्डेय ने तुम्हें भूत, वर्तमान और भविष्य कहा। तुम यज्ञों के यज्ञ और तपों के तप हो;
श्लोक 4 (6.68.4)
देवानामपि देवं च त्वामाह भगवान्भृगुः । पुराणे चैव परमं विष्णो रूपं तवेति च ॥
devānāmapi devaṃ ca tvāmāha bhagavānbhṛguḥ | purāṇe caiva paramaṃ viṣṇo rūpaṃ taveti ca
और देवताओं के भी देवता हो— ऐसा भगवान् भृगु ने तुमसे कहा; और यह भी कहा कि हे विष्णु, पुराण में वर्णित परम रूप तुम्हारा ही है।
श्लोक 5 (6.68.5)
वासुदेवो वसूनां त्वं शक्रं स्थापयिता तथा । देवदेवोऽसि देवानामिति द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥
vāsudevo vasūnāṃ tvaṃ śakraṃ sthāpayitā tathā | devadevo'si devānāmiti dvaipāyano'bravīt
द्वैपायन (व्यास) ने कहा— 'वसुओं में तुम वासुदेव हो, इन्द्र को उसके पद पर स्थापित करने वाले तुम हो, और देवताओं में तुम देवाधिदेव हो।'
श्लोक 6 (6.68.6)
पूर्वे प्रजानिसर्गे च दक्षमाहुः प्रजापतिम् । स्रष्टारं सर्वभूतानामङ्गिरास्त्वां तथाऽब्रवीत् ॥
pūrve prajānisarge ca dakṣamāhuḥ prajāpatim | sraṣṭāraṃ sarvabhūtānāmaṅgirāstvāṃ tathā'bravīt
प्रजा की प्रथम सृष्टि के समय तुम्हें प्रजापति दक्ष कहा गया; और अंगिरा ने भी कहा कि तुम समस्त प्राणियों के स्रष्टा हो।
श्लोक 7 (6.68.7)
अव्यक्तं ते शरीरोत्थं व्यक्तं ते मनसि स्थितम् । देवास्त्वत्संभवाश्चैव देवलस्त्वसितोऽब्रवीत् ॥
avyaktaṃ te śarīrotthaṃ vyaktaṃ te manasi sthitam | devāstvatsaṃbhavāścaiva devalastvasito'bravīt
देवल असित ने कहा— 'अव्यक्त तुम्हारे शरीर से उत्पन्न होता है, व्यक्त तुम्हारे मन में स्थित है, और देवता भी तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं।'
श्लोक 8 (6.68.8)
शिरसा ते दिव्यं व्याप्तं बाहुभ्यां पृथिवी तथा । जठरं ते त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥
śirasā te divyaṃ vyāptaṃ bāhubhyāṃ pṛthivī tathā | jaṭharaṃ te trayo lokāḥ puruṣo'si sanātanaḥ
तुम्हारे सिर से स्वर्ग व्याप्त है और भुजाओं से पृथ्वी; तीनों लोक तुम्हारा उदर हैं। तुम सनातन पुरुष हो।
श्लोक 9 (6.68.9)
एवं त्वामभिजानन्ति तपसा भाविता नराः । आत्मदर्शनतृप्तानामृषीणां चासि सत्तमः ॥
evaṃ tvāmabhijānanti tapasā bhāvitā narāḥ | ātmadarśanatṛptānāmṛṣīṇāṃ cāsi sattamaḥ
तप से शुद्ध हुए मनुष्य तुम्हें इसी रूप में जानते हैं; और आत्मदर्शन से तृप्त ऋषियों में तुम सर्वश्रेष्ठ हो।
श्लोक 10 (6.68.10)
राजर्षीणामुदाराणामाहवेष्वनिवर्तिनाम् । सर्वधर्मप्रधानानां त्वं गतिर्मधुसूदन ॥
rājarṣīṇāmudārāṇāmāhaveṣvanivartinām | sarvadharmapradhānānāṃ tvaṃ gatirmadhusūdana
हे मधुसूदन, जो उदार राजर्षि युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाते और समस्त धर्मों को सर्वोपरि मानते हैं, उनकी गति तुम्हीं हो।
श्लोक 11 (6.68.11)
इति नित्यं योगविद्भिर्भगवान्पुरुषोत्तमः । सनत्कुमारप्रमुखैः स्तूयतेऽभ्यर्च्यते हरिः ॥
iti nityaṃ yogavidbhirbhagavānpuruṣottamaḥ | sanatkumārapramukhaiḥ stūyate'bhyarcyate hariḥ
इस प्रकार सनत्कुमार आदि योगवेत्ता पुरुषोत्तम भगवान् हरि की सदा स्तुति और पूजा करते हैं।
श्लोक 12 (6.68.12)
एष ते विस्तरस्तात संक्षेपश्च प्रकीर्तितः । केशवस्य यथा तत्त्वं सुप्रीतो भज केशवम् ॥
eṣa te vistarastāta saṃkṣepaśca prakīrtitaḥ | keśavasya yathā tattvaṃ suprīto bhaja keśavam
तात, केशव का जो यथार्थ स्वरूप है, वह मैंने तुम्हें विस्तार से भी और संक्षेप से भी कह दिया। प्रसन्न मन से केशव का भजन करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 13 (6.68.13)
पुण्यं श्रुत्वैतदाख्यानं महाराज सुतस्तव । केशवं बहुमेने स पाण्डवांश्च महारथान् ॥
puṇyaṃ śrutvaitadākhyānaṃ mahārāja sutastava | keśavaṃ bahumene sa pāṇḍavāṃśca mahārathān
महाराज, यह पवित्र आख्यान सुनकर आपके पुत्र ने केशव और महारथी पाण्डवों को बहुत सम्मान देना आरम्भ किया।
श्लोक 14 (6.68.14)
तमब्रवीन्महाराज भीष्मः शान्तनवः पुनः । माहात्म्यं ते श्रुतं राजन्केशवस्य महात्मनः ॥
tamabravīnmahārāja bhīṣmaḥ śāntanavaḥ punaḥ | māhātmyaṃ te śrutaṃ rājankeśavasya mahātmanaḥ
महाराज, तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने उससे फिर कहा— 'राजन्, तुमने महात्मा केशव की महिमा सुन ली;
भीष्म उवाच
श्लोक 15 (6.68.15)
नरस्य च यथातत्त्वं यन्मां त्वं पृच्छसे नृप । यदर्थं नृषु संभूतौ नरानारायणावृषी ॥
narasya ca yathātattvaṃ yanmāṃ tvaṃ pṛcchase nṛpa | yadarthaṃ nṛṣu saṃbhūtau narānārāyaṇāvṛṣī
और राजन्, तुमने मुझसे नर का जो यथार्थ पूछा था, वह भी सुन लिया— कि नर और नारायण ये दोनों ऋषि किस प्रयोजन से मनुष्यों में उत्पन्न हुए हैं;
श्लोक 16 (6.68.16)
अवध्यौ च यथा वीरौ संयुगेष्वपराजितौ । यथा च पाण्डवा राजन्नवध्या युधि कस्यचित् ॥
avadhyau ca yathā vīrau saṃyugeṣvaparājitau | yathā ca pāṇḍavā rājannavadhyā yudhi kasyacit
कि वे दोनों वीर किस प्रकार अवध्य हैं और युद्धों में कभी पराजित नहीं होते, और राजन्, पाण्डव भी युद्ध में किसी के द्वारा मारे नहीं जा सकते।
श्लोक 17 (6.68.17)
प्रीतिमान्हि दृढं कृष्णः पाण्डवेषु यशस्विषु । तस्माद्ब्रवीमि राजेन्द्र शमो भवतु पाण्डवैः ॥
prītimānhi dṛḍhaṃ kṛṣṇaḥ pāṇḍaveṣu yaśasviṣu | tasmādbravīmi rājendra śamo bhavatu pāṇḍavaiḥ
क्योंकि यशस्वी पाण्डवों पर कृष्ण का प्रेम अटल है। इसलिए हे राजेन्द्र, मैं कहता हूँ कि पाण्डवों से संधि हो जाए।
श्लोक 18 (6.68.18)
पृथिवीं भुङ्क्ष्व सहितो भ्रातृभिर्बलिभिर्वशी । नरानारायणौ देवाववज्ञाय नशिष्यसि ॥
pṛthivīṃ bhuṅkṣva sahito bhrātṛbhirbalibhirvaśī | narānārāyaṇau devāvavajñāya naśiṣyasi
अपने बलवान भाइयों के साथ मिलकर, संयम रखते हुए पृथ्वी का भोग करो। नर और नारायण देवताओं की अवहेलना करोगे तो नष्ट हो जाओगे।'
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (6.68.19)
एवमुक्त्वा तव पिता तूष्णीमासीद्विशांपते । व्यसर्जयच्च राजानं शयनं च विवेश ह ॥
evamuktvā tava pitā tūṣṇīmāsīdviśāṃpate | vyasarjayacca rājānaṃ śayanaṃ ca viveśa ha
प्रजानाथ, यह कहकर आपके पिता (भीष्म) मौन हो गए; उन्होंने राजा को विदा किया और स्वयं शय्या पर चले गए।
श्लोक 20 (6.68.20)
राजा च शिबिरं प्रायात्प्रणिपत्य महात्मने । शिश्ये च शयने शुभ्रे रात्रिं तां भरतर्षभ ॥
rājā ca śibiraṃ prāyātpraṇipatya mahātmane | śiśye ca śayane śubhre rātriṃ tāṃ bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, राजा दुर्योधन भी उन महात्मा को प्रणाम करके अपने शिविर को चला गया और उस रात उजली शय्या पर सोया।