भीष्म पर्व · अध्याय 70
पाँचवें दिन के पूर्वाह्न का संहार
पाँचवें दिन के पूर्वाह्न में भीष्म कौरवों को भीम के भय से बचाने के लिए प्रचण्ड युद्ध करते हैं, और राजाओं का यह युद्ध व्यापक संहार में बदल जाता है। संजय हाथियों, घोड़ों, भेरियों और शंखों के कोलाहल का, पत्थरों की वर्षा की तरह गिरते सिरों का, अंगों और आभूषणों से पटी धरती का, सवारहीन घोड़ों और अंकुशहीन हाथियों के भटकने का और योद्धाओं के मल्लयुद्ध का वर्णन करते हैं। अन्त में दुर्योधन कलिंगों के साथ भीष्म को आगे करके बढ़ता है और भीम को घेरे हुए पाण्डव भीष्म पर टूट पड़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.70.1)
अकरोत्तुमुलं युद्धं भीष्मः शान्तनवस्तदा । भीमसेनभयादिच्छन्पुत्रांस्तारयितुं तव ॥
akarottumulaṃ yuddhaṃ bhīṣmaḥ śāntanavastadā | bhīmasenabhayādicchanputrāṃstārayituṃ tava
तब शान्तनुनन्दन भीष्म ने भीमसेन के भय से आपके पुत्रों को उबारने की इच्छा से घमासान युद्ध किया।
श्लोक 2 (6.70.2)
पूर्वाह्णे तन्महारौद्रं राज्ञां युद्धमवर्तत । कुरूणां पाण्डवानां च मुख्यशूरविनाशनम् ॥
pūrvāhṇe tanmahāraudraṃ rājñāṃ yuddhamavartata | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca mukhyaśūravināśanam
पूर्वाह्न में कौरवों और पाण्डवों के राजाओं का वह अत्यन्त भयानक युद्ध चलता रहा, जिसमें प्रमुख शूरवीरों का विनाश हो रहा था।
श्लोक 3 (6.70.3)
तस्मिन्नाकुलसंग्रामे वर्तमाने महाभये । अभवत्तुमुलः शब्दः संस्पृशन्गगनं महत् ॥
tasminnākulasaṃgrāme vartamāne mahābhaye | abhavattumulaḥ śabdaḥ saṃspṛśangaganaṃ mahat
उस अस्त-व्यस्त और महाभयंकर संग्राम के चलते हुए ऐसा तुमुल कोलाहल उठा, जो मानो आकाश को छू रहा था।
श्लोक 4 (6.70.4)
नदद्भिश्च महानागैर्हेषमाणैश्च वाजिभिः । भेरीशङ्खनिनादैश्च तुमुलं समपद्यत ॥
nadadbhiśca mahānāgairheṣamāṇaiśca vājibhiḥ | bherīśaṅkhaninādaiśca tumulaṃ samapadyata
चिंघाड़ते हुए बड़े-बड़े हाथियों, हिनहिनाते घोड़ों और भेरी-शंखों की ध्वनि से भयंकर कोलाहल मच गया।
श्लोक 5 (6.70.5)
युयुत्सवस्ते विक्रान्ता विजयाय महाबलाः । अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोष्ठिष्विव महर्षभाः ॥
yuyutsavaste vikrāntā vijayāya mahābalāḥ | anyonyamabhigarjanto goṣṭhiṣviva maharṣabhāḥ
युद्ध के इच्छुक, विजय के लिए उत्सुक वे पराक्रमी महाबली योद्धा गोशालाओं में बड़े साँडों की तरह एक-दूसरे पर गरज रहे थे।
श्लोक 6 (6.70.6)
शिरसां पात्यमानानां समरे निशितैः शरैः । अश्मवृष्टिरिवाकाशे बभूव भरतर्षभ ॥
śirasāṃ pātyamānānāṃ samare niśitaiḥ śaraiḥ | aśmavṛṣṭirivākāśe babhūva bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, युद्ध में तीखे बाणों से कटकर गिरते सिर ऐसे लग रहे थे मानो आकाश से पत्थरों की वर्षा हो रही हो।
श्लोक 7 (6.70.7)
कुण्डलोष्णीषधारीणि जातरूपोज्ज्वलानि च । पतितानि स्म दृश्यन्ते शिरांसि भरतर्षभ ॥
kuṇḍaloṣṇīṣadhārīṇi jātarūpojjvalāni ca | patitāni sma dṛśyante śirāṃsi bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, कुण्डल और पगड़ी धारण किए, सोने से चमकते सिर धरती पर गिरे दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 8 (6.70.8)
विशिखोन्मथितैर्गात्रैर्बाहुभिश्च सकार्मुकैः । सहस्ताभरणैश्चान्यैरभवच्छादिता मही ॥
viśikhonmathitairgātrairbāhubhiśca sakārmukaiḥ | sahastābharaṇaiścānyairabhavacchāditā mahī
बाणों से कुचले हुए अंगों से, धनुष थामे भुजाओं से और हाथों के आभूषणों सहित दूसरी भुजाओं से धरती ढक गई—
श्लोक 9 (6.70.9)
कवचोपहितैर्गात्रैर्हस्तैश्च समलङ्कृतैः । मुखैश्च चन्द्रसंकाशै रक्तान्तनयनैः शुभैः ॥
kavacopahitairgātrairhastaiśca samalaṅkṛtaiḥ | mukhaiśca candrasaṃkāśai raktāntanayanaiḥ śubhaiḥ
कवचों से ढके शरीरों से, अलंकृत हाथों से, और लाल कोरों वाले नेत्रों से युक्त चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखों से;
श्लोक 10 (6.70.10)
गजवाजिमनुष्याणां सर्वगात्रैश्च भूपते । आसीत्सर्वा समास्तीर्णा मुहूर्तेन वसुंधरा ॥
gajavājimanuṣyāṇāṃ sarvagātraiśca bhūpate | āsītsarvā samāstīrṇā muhūrtena vasuṃdharā
राजन्, हाथियों, घोड़ों और मनुष्यों के सब प्रकार के अंगों से क्षण भर में सारी पृथ्वी पट गई।
श्लोक 11 (6.70.11)
रजोमेघैश्च तुमुलैः शस्त्रविद्युत्प्रकाशिभिः । आयुधानां च निर्घोषः स्तनयित्नुसमोऽभवत् ॥
rajomeghaiśca tumulaiḥ śastravidyutprakāśibhiḥ | āyudhānāṃ ca nirghoṣaḥ stanayitnusamo'bhavat
शस्त्रों की बिजली से चमकते धूल के घने बादलों के बीच अस्त्र-शस्त्रों की झनकार मेघ-गर्जन के समान हो रही थी।
श्लोक 12 (6.70.12)
स संप्रहारस्तुमुलः कटुकः शोणितोदकः । प्रावर्तत कुरूणां च पाण्डवानां च भारत ॥
sa saṃprahārastumulaḥ kaṭukaḥ śoṇitodakaḥ | prāvartata kurūṇāṃ ca pāṇḍavānāṃ ca bhārata
हे भारत, कौरवों और पाण्डवों के बीच वह भीषण और कटु संग्राम चलता रहा, जिसमें रक्त जल की तरह बह रहा था।
श्लोक 13 (6.70.13)
तस्मिन्महाभये घोरे तुमुले रोमहर्षणे । ववृषुः शरवर्षाणि क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥
tasminmahābhaye ghore tumule romaharṣaṇe | vavṛṣuḥ śaravarṣāṇi kṣatriyā yuddhadurmadāḥ
उस महाभयानक, घोर और रोमांचकारी संग्राम में युद्धोन्मत्त क्षत्रिय बाणों की वर्षा करने लगे।
श्लोक 14 (6.70.14)
आक्रोशन्कुञ्जरास्तत्र शरवर्षप्रतापिताः । तावकानां परेषां च संयुगे भरतर्षभ ॥
ākrośankuñjarāstatra śaravarṣapratāpitāḥ | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca saṃyuge bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, वहाँ युद्ध में आपके और शत्रुओं के हाथी बाणों की वर्षा से संतप्त होकर चिंघाड़ने लगे।
श्लोक 15 (6.70.15)
संरब्धानां च वीराणां धीराणाममितौजसाम् । धनुर्ज्यातलशब्देन न प्राज्ञायत किंचन ॥
saṃrabdhānāṃ ca vīrāṇāṃ dhīrāṇāmamitaujasām | dhanurjyātalaśabdena na prājñāyata kiṃcana
उन क्रुद्ध, धीर और अपार बलशाली वीरों के धनुष की डोरी के तल पर टकराने के शब्द में कुछ भी पहचाना नहीं जा रहा था।
श्लोक 16 (6.70.16)
उत्थितेषु कबन्धेषु सर्वतः शोणितोदके । समरे पर्यधावन्त नृपा रिपुवधोद्यताः ॥
utthiteṣu kabandheṣu sarvataḥ śoṇitodake | samare paryadhāvanta nṛpā ripuvadhodyatāḥ
जब रक्त से भीगी रणभूमि में चारों ओर कबन्ध (धड़) उठ खड़े हुए, तब शत्रुओं के वध को उद्यत राजा युद्धभूमि में इधर-उधर दौड़ने लगे।
श्लोक 17 (6.70.17)
शरशक्तिगदाभिस्ते खड्गैश्चामिततेजसः । निजघ्नुः समरेऽन्योन्यं शूराः परिघबाहवः ॥
śaraśaktigadābhiste khaḍgaiścāmitatejasaḥ | nijaghnuḥ samare'nyonyaṃ śūrāḥ parighabāhavaḥ
परिघ जैसी भुजाओं वाले वे अपार तेजस्वी शूरवीर बाणों, शक्तियों, गदाओं और तलवारों से युद्ध में एक-दूसरे को मारने लगे।
श्लोक 18 (6.70.18)
बभ्रमुः कुञ्जराश्चात्र शरैर्विद्धा निरङ्कुशाः । अश्वाश्च पर्यधावन्त हतारोहा दिशो दश ॥
babhramuḥ kuñjarāścātra śarairviddhā niraṅkuśāḥ | aśvāśca paryadhāvanta hatārohā diśo daśa
बाणों से बिंधे हाथी अंकुश से मुक्त होकर वहाँ भटकने लगे, और जिनके सवार मारे गए थे वे घोड़े दसों दिशाओं में दौड़ने लगे।
श्लोक 19 (6.70.19)
उत्पत्य निपतन्त्यन्ये शरघातप्रपीडिताः । तावकानां परेषां च योधा भरतसत्तम ॥
utpatya nipatantyanye śaraghātaprapīḍitāḥ | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca yodhā bharatasattama
भरतसत्तम, आपके और शत्रुओं के दूसरे योद्धा बाणों के आघात से पीड़ित होकर उछलते और गिर पड़ते थे।
श्लोक 20 (6.70.20)
वाहानामुत्तमाङ्गानां कार्मुकाणां च भारत । गदानां परिघाणां च हस्तानां चोरुभिः सह ॥
vāhānāmuttamāṅgānāṃ kārmukāṇāṃ ca bhārata | gadānāṃ parighāṇāṃ ca hastānāṃ corubhiḥ saha
हे भारत, घोड़ों, सिरों, धनुषों, गदाओं, परिघों, हाथों और जाँघों के,—
श्लोक 21 (6.70.21)
पादानां भूषणानां च केयूराणां च सङ्घशः । राशयस्तत्र दृश्यन्ते भीष्मभीमसमागमे ॥
pādānāṃ bhūṣaṇānāṃ ca keyūrāṇāṃ ca saṅghaśaḥ | rāśayastatra dṛśyante bhīṣmabhīmasamāgame
पैरों, आभूषणों और बाजूबंदों के ढेर के ढेर वहाँ दिखाई देते थे, जहाँ भीष्म और भीम का आमना-सामना हुआ था।
श्लोक 22 (6.70.22)
अश्वानां कुञ्जराणां च रथानां चानिवर्तिनाम् । सङ्घाताः स्म प्रदृश्यन्ते तत्रतत्र विशांपते ॥
aśvānāṃ kuñjarāṇāṃ ca rathānāṃ cānivartinām | saṅghātāḥ sma pradṛśyante tatratatra viśāṃpate
प्रजानाथ, पीठ न दिखाने वाले घोड़ों, हाथियों और रथों के ढेर जहाँ-तहाँ दिखाई देते थे।
श्लोक 23 (6.70.23)
गदाभिरसिभिः प्रासैर्बाणैश्च नतपर्वभिः । जघ्नुः परस्परं तत्र क्षत्रियाः काल आगते ॥
gadābhirasibhiḥ prāsairbāṇaiśca nataparvabhiḥ | jaghnuḥ parasparaṃ tatra kṣatriyāḥ kāla āgate
काल के आ पहुँचने पर वहाँ क्षत्रिय गदाओं, तलवारों, प्रासों और झुकी गाँठों वाले बाणों से एक-दूसरे को मारने लगे।
श्लोक 24 (6.70.24)
अपरे बाहुभिर्वीरा नियुद्धकुशला युधि । बहुधा समसञ्जन्त आयसैः परिघैरिव ॥
apare bāhubhirvīrā niyuddhakuśalā yudhi | bahudhā samasañjanta āyasaiḥ parighairiva
मल्लयुद्ध में कुशल दूसरे वीर लोहे के परिघों जैसी अपनी भुजाओं से अनेक प्रकार से भिड़ गए।
श्लोक 25 (6.70.25)
मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव तलैश्चैव विशांपते । अन्योन्यं जघ्निरे वीरास्तावकाः पाण्डवैः सह ॥
muṣṭibhirjānubhiścaiva talaiścaiva viśāṃpate | anyonyaṃ jaghnire vīrāstāvakāḥ pāṇḍavaiḥ saha
प्रजानाथ, आपके वीर और पाण्डव मुक्कों, घुटनों और थप्पड़ों से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 26 (6.70.26)
पतितैः पात्यमानैश्च विचेष्टद्भिश्च भूतले । घोरमायोधनं जज्ञे तत्रतत्र जनेश्वर ॥
patitaiḥ pātyamānaiśca viceṣṭadbhiśca bhūtale | ghoramāyodhanaṃ jajñe tatratatra janeśvara
जनेश्वर, गिरे हुए, गिराए जाते हुए और धरती पर छटपटाते योद्धाओं से वह रणभूमि जगह-जगह भयानक हो गई।
श्लोक 27 (6.70.27)
विरथा रथिनश्चात्र निस्त्रिंशवरधारिणः । अन्योन्यमभिधावन्तः परस्परवधैषिणः ॥
virathā rathinaścātra nistriṃśavaradhāriṇaḥ | anyonyamabhidhāvantaḥ parasparavadhaiṣiṇaḥ
रथहीन हुए रथी उत्तम तलवारें लिए, एक-दूसरे के वध की इच्छा से, परस्पर झपट रहे थे।
श्लोक 28 (6.70.28)
ततो दुर्योधनो राजा कलिङ्गैर्बहुभिर्वृतः । पुरस्कृत्य रणे भीष्मं पाण्डवानभ्यवर्तत ॥
tato duryodhano rājā kaliṅgairbahubhirvṛtaḥ | puraskṛtya raṇe bhīṣmaṃ pāṇḍavānabhyavartata
तब राजा दुर्योधन बहुत-से कलिंगों से घिरा हुआ, भीष्म को आगे करके युद्ध में पाण्डवों पर चढ़ आया।
श्लोक 29 (6.70.29)
तथैव पाण्डवाः सर्वे परिवार्य वृकोदरम् । भीष्ममभ्यद्रवन्क्रुद्धास्ततो युद्धमवर्तत ॥
tathaiva pāṇḍavāḥ sarve parivārya vṛkodaram | bhīṣmamabhyadravankruddhāstato yuddhamavartata
उसी प्रकार सब पाण्डव वृकोदर (भीम) को घेरकर क्रोधपूर्वक भीष्म पर टूट पड़े; और तब युद्ध छिड़ गया।