भीष्म पर्व · अध्याय 71
अर्जुन का आक्रमण और धूल में द्वन्द्वयुद्ध
अर्जुन भीष्म पर धावा करते हैं, और उनके वानरध्वज रथ को देखकर तथा गाण्डीव की गर्जना सुनकर कौरव सैनिक भयभीत हो भीष्म की शरण में छिपने लगते हैं। कौरव-पक्ष के राजा शकुनि को घेरकर पाण्डवों पर आक्रमण करते हैं, पाण्डव धृष्टद्युम्न के नेतृत्व में प्रत्युत्तर देते हैं, और योद्धा जोड़ियों में भिड़ जाते हैं: भीष्म अर्जुन से, जयद्रथ भीम से, शल्य युधिष्ठिर से, द्रोण द्रुपद, सात्यकि और चेकितान से, तथा अन्य। निरभ्र आकाश में बिजली, उल्काएँ और धूल की आँधी रणभूमि को ढक लेती हैं, और संजय टूटे रथों, खाली रथ खींचते घोड़ों और रथों को कुचलते तथा रथियों को उछालते हाथियों का वर्णन करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.71.1)
दृष्ट्वा भीष्मेण संसक्तान्भ्रातॄनन्यांश्च पार्थिवान् । समभ्यधावद्गाङ्गेयमुद्यतास्त्रो धनञ्जयः ॥
dṛṣṭvā bhīṣmeṇa saṃsaktānbhrātṝnanyāṃśca pārthivān | samabhyadhāvadgāṅgeyamudyatāstro dhanañjayaḥ
अपने भाइयों और अन्य राजाओं को भीष्म से भिड़ा हुआ देखकर धनंजय अस्त्र उठाए गंगानन्दन भीष्म पर टूट पड़े।
श्लोक 2 (6.71.2)
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं धनुषो गाण्डिवस्य च । ध्वजं च दृष्ट्वा पार्थस्य सर्वान्नो भयमाविशत् ॥
pāñcajanyasya nirghoṣaṃ dhanuṣo gāṇḍivasya ca | dhvajaṃ ca dṛṣṭvā pārthasya sarvānno bhayamāviśat
पांचजन्य शंख का नाद और गाण्डीव धनुष की टंकार सुनकर तथा अर्जुन की ध्वजा देखकर हम सबके मन में भय समा गया।
श्लोक 3 (6.71.3)
सिंहलाङ्गूलमाकाशे ज्वलन्तमिव पर्वतम् । असञ्जमानं वृक्षेषु धूमकेतुमिवोत्थितम् ॥
siṃhalāṅgūlamākāśe jvalantamiva parvatam | asañjamānaṃ vṛkṣeṣu dhūmaketumivotthitam
आकाश में जलते हुए पर्वत के समान, सिंह की पूँछ के चिह्न वाली, वृक्षों में न अटकने वाली, धूमकेतु की भाँति ऊपर उठी हुई,—
श्लोक 4 (6.71.4)
बहुवर्णं विचित्रं च दिव्यं वानरलक्षणम् । अपश्याम महाराज ध्वजं गाण्डीवधन्वनः ॥
bahuvarṇaṃ vicitraṃ ca divyaṃ vānaralakṣaṇam | apaśyāma mahārāja dhvajaṃ gāṇḍīvadhanvanaḥ
महाराज, अनेक रंगों वाली, विचित्र और दिव्य, वानर के चिह्न से युक्त— ऐसी गाण्डीवधारी अर्जुन की ध्वजा हमने देखी।
श्लोक 5 (6.71.5)
सुवर्णपृष्ठं गाण्डीवं रणे द्रक्ष्यामि भारत । विद्युतं मेघमध्यस्थां भ्राजमानामिवाम्बरे । ददृशुर्गाण्डिवं योधा रुक्मपृष्ठं महामृधे ॥
suvarṇapṛṣṭhaṃ gāṇḍīvaṃ raṇe drakṣyāmi bhārata | vidyutaṃ meghamadhyasthāṃ bhrājamānāmivāmbare | dadṛśurgāṇḍivaṃ yodhā rukmapṛṣṭhaṃ mahāmṛdhe
हे भारत, उस युद्ध में सुनहरी पीठ वाला वह गाण्डीव मुझे देखना ही था। बादलों के बीच आकाश में चमकती बिजली के समान, योद्धाओं ने उस महायुद्ध में स्वर्णपृष्ठ गाण्डीव को देखा।
श्लोक 6 (6.71.6)
आशुश्रुम भृशं चास्य शक्रस्येवाभिगर्जतः । सुघोरं तलयोः शब्दं निघ्नतस्तव वाहिनीम् ॥
āśuśruma bhṛśaṃ cāsya śakrasyevābhigarjataḥ | sughoraṃ talayoḥ śabdaṃ nighnatastava vāhinīm
इन्द्र के समान गर्जते हुए और आपकी सेना का संहार करते हुए अर्जुन की हथेलियों (के धनुष-डोरी पर पड़ने) का अत्यन्त भयंकर शब्द भी हमने सुना।
श्लोक 7 (6.71.7)
चण्डवातो यथा मेघः सविद्युत्स्तनयित्नुमान् । दिशः संप्लावयन्सर्वाः शरवर्षैः समन्ततः ॥
caṇḍavāto yathā meghaḥ savidyutstanayitnumān | diśaḥ saṃplāvayansarvāḥ śaravarṣaiḥ samantataḥ
प्रचण्ड वायु से प्रेरित, बिजली और गर्जन से युक्त मेघ के समान, बाणों की वर्षा से सारी दिशाओं को चारों ओर से भरते हुए,—
श्लोक 8 (6.71.8)
समभ्यधावद्गाङ्गेयं भैरवास्त्रो धनञ्जयः । दिशं प्राचीं प्रतीचीं च न जानीमोऽस्त्रमोहिताः ॥
samabhyadhāvadgāṅgeyaṃ bhairavāstro dhanañjayaḥ | diśaṃ prācīṃ pratīcīṃ ca na jānīmo'stramohitāḥ
भयंकर अस्त्रों वाले धनंजय गंगानन्दन पर टूट पड़े। उनके अस्त्रों से मोहित होकर हम पूर्व और पश्चिम दिशा तक नहीं पहचान पा रहे थे।
श्लोक 9 (6.71.9)
कान्दिग्भूताः श्रान्तपत्रा हताश्वा हतचेतसः । अन्योन्यमभिसंश्लिष्य योधास्ते भरतर्षभ ॥
kāndigbhūtāḥ śrāntapatrā hatāśvā hatacetasaḥ | anyonyamabhisaṃśliṣya yodhāste bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, किंकर्तव्यविमूढ़, थके वाहनों वाले, मरे घोड़ों वाले और बुद्धि खो बैठे वे योद्धा एक-दूसरे से चिपटकर—
श्लोक 10 (6.71.10)
भीष्ममेवाभ्यलीयन्त सह सर्वैस्तवात्मजैः । तेषामार्तायनमभूद्भीष्मः शान्तनवो रणे ॥
bhīṣmamevābhyalīyanta saha sarvaistavātmajaiḥ | teṣāmārtāyanamabhūdbhīṣmaḥ śāntanavo raṇe
आपके सब पुत्रों के साथ भीष्म की ही शरण में जा छिपे। उस युद्ध में शान्तनुनन्दन भीष्म ही उन दुखियों के आश्रय बने।
श्लोक 11 (6.71.11)
समुत्पतन्ति वित्रस्ता रथेभ्यो रथिनस्तथा । सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चापि पदातयः ॥
samutpatanti vitrastā rathebhyo rathinastathā | sādinaścāśvapṛṣṭhebhyo bhūmau cāpi padātayaḥ
भयभीत रथी रथों से कूद पड़ते थे, घुड़सवार घोड़ों की पीठ से, और पैदल सैनिक भी धरती पर गिर पड़ते थे।
श्लोक 12 (6.71.12)
श्रुत्वा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः । सर्वसैन्यानि भीतानि व्यवालीयन्त भारत ॥
śrutvā gāṇḍīvanirghoṣaṃ visphūrjitamivāśaneḥ | sarvasainyāni bhītāni vyavālīyanta bhārata
हे भारत, वज्र की कड़क के समान गाण्डीव का घोष सुनकर सारी सेनाएँ डरकर दुबक गईं।
श्लोक 13 (6.71.13)
अथ काम्बोजजैरश्वैर्महद्भिः शीघ्रगामिभिः । गोपानां बहुसाहस्रैर्बलैर्गोपायनैर्वृतः ॥
atha kāmbojajairaśvairmahadbhiḥ śīghragāmibhiḥ | gopānāṃ bahusāhasrairbalairgopāyanairvṛtaḥ
तब काम्बोज देश में उत्पन्न विशाल और तेज़ दौड़ने वाले घोड़ों से, और कई हज़ार ग्वालों की सेना वाले गोपायनों से घिरे हुए,—
श्लोक 14 (6.71.14)
मद्रसौवीरगान्धारैस्त्रैगर्तैश्च विशांपते । सर्वकालिङ्गमुख्यैश्च कलिङ्गाधिपतिर्वृतः ॥
madrasauvīragāndhāraistraigartaiśca viśāṃpate | sarvakāliṅgamukhyaiśca kaliṅgādhipatirvṛtaḥ
प्रजानाथ, मद्र, सौवीर, गान्धार और त्रिगर्त योद्धाओं से तथा सब प्रमुख कलिंगों से घिरा हुआ कलिंगराज;
श्लोक 15 (6.71.15)
नानानरगणौघैश्च दुःशासनपुरःसरः । जयद्रथश्च नृपतिः सहितः सर्वराजभिः ॥
nānānaragaṇaughaiśca duḥśāsanapuraḥsaraḥ | jayadrathaśca nṛpatiḥ sahitaḥ sarvarājabhiḥ
नाना प्रकार के मनुष्यों के समूहों के आगे चलने वाला दुःशासन, और सब राजाओं के साथ राजा जयद्रथ;
श्लोक 16 (6.71.16)
हयारोहवराश्चैव तव पुत्रेण चोदिताः । चतुर्दशसहस्राणि सौबलं पर्यवारयन् ॥
hayārohavarāścaiva tava putreṇa coditāḥ | caturdaśasahasrāṇi saubalaṃ paryavārayan
और आपके पुत्र की प्रेरणा से चौदह हज़ार श्रेष्ठ घुड़सवार— इन सबने सुबलपुत्र शकुनि को घेर लिया।
श्लोक 17 (6.71.17)
ततस्ते सहिताः सर्वे विभक्तरथवाहनाः । अर्जुनं समरे जघ्नुस्तावका भरतर्षभ ॥
tataste sahitāḥ sarve vibhaktarathavāhanāḥ | arjunaṃ samare jaghnustāvakā bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, तब आपके वे सब योद्धा अपने रथों और वाहनों को टुकड़ियों में बाँटकर एक साथ युद्ध में अर्जुन पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 18 (6.71.18)
चेदिकाशिपदातैश्च रथैः पाञ्चालसृञ्जयैः । पाण्डवाः सहिताः सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । तावकान्समरे जघ्नुर्धर्मपुत्रेण चोदिताः ॥
cedikāśipadātaiśca rathaiḥ pāñcālasṛñjayaiḥ | pāṇḍavāḥ sahitāḥ sarve dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ | tāvakānsamare jaghnurdharmaputreṇa coditāḥ
चेदि और काशी के पैदल सैनिकों तथा पांचाल और सृंजयों के रथों के साथ, धृष्टद्युम्न के नेतृत्व में सब पाण्डव एक साथ, धर्मपुत्र युधिष्ठिर की प्रेरणा से, युद्ध में आपके सैनिकों पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 19 (6.71.19)
रथिभिर्वारणैरश्वैः पादातैश्च समीरितम् । घोरमायोधनं चक्रे महाभ्रसदृशं रजः ॥
rathibhirvāraṇairaśvaiḥ pādātaiśca samīritam | ghoramāyodhanaṃ cakre mahābhrasadṛśaṃ rajaḥ
रथियों, हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकों द्वारा उड़ाई गई धूल से उस भयानक युद्ध ने महामेघ के समान धूल का बादल खड़ा कर दिया।
श्लोक 20 (6.71.20)
तोमरप्रासनाराचगजाश्वरथयोधिनाम् । बलेन महता भीष्मः समसञ्जत्किरीटिना ॥
tomaraprāsanārācagajāśvarathayodhinām | balena mahatā bhīṣmaḥ samasañjatkirīṭinā
तोमर, प्रास और नाराच लेकर हाथियों, घोड़ों और रथों से लड़ने वाले योद्धाओं की विशाल सेना के साथ भीष्म किरीटधारी अर्जुन से भिड़ गए।
श्लोक 21 (6.71.21)
आवन्त्यः काशिराजेन भीमसेनेन सैन्धवः । अजातशत्रुर्मद्राणामृषभेण यशस्विना ॥
āvantyaḥ kāśirājena bhīmasenena saindhavaḥ | ajātaśatrurmadrāṇāmṛṣabheṇa yaśasvinā
अवन्तिराज काशिराज से भिड़ा, सिन्धुराज जयद्रथ भीमसेन से; और अजातशत्रु युधिष्ठिर मद्रों के यशस्वी श्रेष्ठ—
श्लोक 22 (6.71.22)
सहपुत्रः सहामात्यः शल्येन समसञ्जत । विकर्णः सहदेवेन चित्रसेनः शिखण्डिना ॥
sahaputraḥ sahāmātyaḥ śalyena samasañjata | vikarṇaḥ sahadevena citrasenaḥ śikhaṇḍinā
शल्य से, अपने पुत्रों और मन्त्रियों सहित, भिड़ गए। विकर्ण सहदेव से भिड़ा और चित्रसेन शिखण्डी से।
श्लोक 23 (6.71.23)
मत्स्या दुर्योधनं जग्मुः शकुनिं च विशांपते । द्रुपदश्चेकितानश्च सात्यकिश्च महारथः ॥
matsyā duryodhanaṃ jagmuḥ śakuniṃ ca viśāṃpate | drupadaścekitānaśca sātyakiśca mahārathaḥ
प्रजानाथ, मत्स्य योद्धा दुर्योधन और शकुनि पर चढ़ गए। द्रुपद, चेकितान और महारथी सात्यकि—
श्लोक 24 (6.71.24)
द्रोणेन समसञ्जन्त सपुत्रेण महात्मना । कृपश्च कृतवर्मा च धृष्टद्युम्नमभिद्रुतौ ॥
droṇena samasañjanta saputreṇa mahātmanā | kṛpaśca kṛtavarmā ca dhṛṣṭadyumnamabhidrutau
पुत्र सहित महात्मा द्रोण से भिड़ गए; और कृप तथा कृतवर्मा धृष्टद्युम्न पर टूट पड़े।
श्लोक 25 (6.71.25)
एवं प्रव्रजिताश्वानि भ्रान्तनागरथानि च । सैन्यानि समसञ्जन्त प्रयुद्धानि समन्ततः ॥
evaṃ pravrajitāśvāni bhrāntanāgarathāni ca | sainyāni samasañjanta prayuddhāni samantataḥ
इस प्रकार दौड़ते घोड़ों और चक्कर काटते हाथियों तथा रथों वाली सेनाएँ चारों ओर परस्पर भिड़कर युद्ध करने लगीं।
श्लोक 26 (6.71.26)
निरभ्रे विद्युतस्तीव्रा दिशश्च रजसा वृताः । प्रादुरासन्महोत्काश्च सनिर्घाता विशांपते ॥
nirabhre vidyutastīvrā diśaśca rajasā vṛtāḥ | prādurāsanmahotkāśca sanirghātā viśāṃpate
प्रजानाथ, बादलरहित आकाश में तीव्र बिजलियाँ चमकने लगीं, दिशाएँ धूल से ढक गईं, और गड़गड़ाहट के साथ बड़ी-बड़ी उल्काएँ प्रकट हुईं।
श्लोक 27 (6.71.27)
प्रादुर्भूतो महावातः पांसुवर्षं पपात च । नभस्यन्तर्दधे सूर्यः सैन्येन रजसा वृतः ॥
prādurbhūto mahāvātaḥ pāṃsuvarṣaṃ papāta ca | nabhasyantardadhe sūryaḥ sainyena rajasā vṛtaḥ
प्रचण्ड आँधी उठी और धूल की वर्षा होने लगी; सेना की उड़ाई धूल से ढककर सूर्य आकाश में छिप गया।
श्लोक 28 (6.71.28)
प्रमोहः सर्वसत्वानामतीव समपद्यत । रजसा चाभिभूतानामस्त्रजालैश्च तुद्यताम् ॥
pramohaḥ sarvasatvānāmatīva samapadyata | rajasā cābhibhūtānāmastrajālaiśca tudyatām
धूल से अभिभूत और अस्त्रों के जाल से पीड़ित सभी प्राणियों पर गहरी मूर्छा-सी छा गई।
श्लोक 29 (6.71.29)
वीरबाहुविसृष्टानां सर्वावरणभेदिनाम् । संघातः शरजालानां तुमुलः समपद्यत ॥
vīrabāhuvisṛṣṭānāṃ sarvāvaraṇabhedinām | saṃghātaḥ śarajālānāṃ tumulaḥ samapadyata
वीरों की भुजाओं से छोड़े गए, सब प्रकार के कवचों को भेदने वाले बाण-समूहों का तुमुल संघात होने लगा।
श्लोक 30 (6.71.30)
प्रकाशं चक्रुराकाशमुद्यतानि भुजोत्तमैः । नक्षत्रविमलाभानि शस्त्राणि भरतर्षभ ॥
prakāśaṃ cakrurākāśamudyatāni bhujottamaiḥ | nakṣatravimalābhāni śastrāṇi bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, उत्तम भुजाओं में उठे, नक्षत्रों के समान निर्मल कान्ति वाले शस्त्रों ने आकाश को प्रकाशित कर दिया।
श्लोक 31 (6.71.31)
आर्षभाणि विचित्राणि रुक्मजालावृतानि च । संपेतुर्दिक्षु सर्वासु चर्माणि भरतर्षभ ॥
ārṣabhāṇi vicitrāṇi rukmajālāvṛtāni ca | saṃpeturdikṣu sarvāsu carmāṇi bharatarṣabha
भरतश्रेष्ठ, बैल के चमड़े की बनी, रंग-बिरंगी और सोने की जाली से मढ़ी ढालें सब दिशाओं में गिरने लगीं।
श्लोक 32 (6.71.32)
सूर्यवर्णैश्च निस्त्रिंशैः पात्यमानानि सर्वशः । दिक्षु सर्वास्वदृश्यन्त शरीराणि शिरांसि च ॥
sūryavarṇaiśca nistriṃśaiḥ pātyamānāni sarvaśaḥ | dikṣu sarvāsvadṛśyanta śarīrāṇi śirāṃsi ca
सूर्य के समान चमकती तलवारों से सब ओर कटकर गिरते शरीर और सिर सारी दिशाओं में दिखाई देने लगे।
श्लोक 33 (6.71.33)
भग्नचक्राक्षनीडाश्च निपातितमहाध्वजाः । हताश्वाः पृथिवीं जग्मुस्तत्रतत्र महारथाः ॥
bhagnacakrākṣanīḍāśca nipātitamahādhvajāḥ | hatāśvāḥ pṛthivīṃ jagmustatratatra mahārathāḥ
जिनके पहिए, धुरे और बैठकें टूट गई थीं, बड़े-बड़े ध्वज गिरा दिए गए थे और घोड़े मारे गए थे, ऐसे महारथी जहाँ-तहाँ धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 34 (6.71.34)
परिपेतुर्हयाश्चात्र केचिच्छस्त्रकृतव्रणाः । रथान्विपरिकर्षन्तो हतेषु रथयोधिषु ॥
paripeturhayāścātra kecicchastrakṛtavraṇāḥ | rathānviparikarṣanto hateṣu rathayodhiṣu
रथ के योद्धाओं के मारे जाने पर कुछ घोड़े शस्त्रों के घाव लिए रथों को घसीटते हुए वहाँ इधर-उधर दौड़ने लगे।
श्लोक 35 (6.71.35)
शराहता भिन्नदेहा बद्धयोक्रा हयोत्तमाः । युगानि पर्यकर्षन्त तत्रतत्र स्म भारत ॥
śarāhatā bhinnadehā baddhayokrā hayottamāḥ | yugāni paryakarṣanta tatratatra sma bhārata
हे भारत, बाणों से आहत, क्षत-विक्षत शरीर वाले, जुतों से बँधे उत्तम घोड़े जहाँ-तहाँ जुओं को घसीट रहे थे।
श्लोक 36 (6.71.36)
अदृश्यन्त ससूताश्च साश्वाः सरथयोधिनः । एकेन बलिना राजन्वारणेन विमर्दिताः ॥
adṛśyanta sasūtāśca sāśvāḥ sarathayodhinaḥ | ekena balinā rājanvāraṇena vimarditāḥ
राजन्, सारथियों, घोड़ों और रथयोद्धाओं सहित रथ एक ही बलवान हाथी द्वारा रौंदे हुए दिखाई देते थे।
श्लोक 37 (6.71.37)
गन्धहस्तिमदस्रावमाघ्राय बहवो रणे । सन्निपाते बलौघानां गजैर्ममृदिरे गजाः ॥
gandhahastimadasrāvamāghrāya bahavo raṇe | sannipāte balaughānāṃ gajairmamṛdire gajāḥ
युद्ध में मदमत्त गन्धहस्तियों के मदजल की गन्ध सूँघकर, सेनाओं की भिड़न्त में बहुत-से हाथी हाथियों द्वारा कुचल दिए गए।
श्लोक 38 (6.71.38)
सतोमरैर्महामात्रैर्निपतद्भिर्गतासुभिः । बभूवायोधनं छन्नं नाराचाभिहतैर्गजैः ॥
satomarairmahāmātrairnipatadbhirgatāsubhiḥ | babhūvāyodhanaṃ channaṃ nārācābhihatairgajaiḥ
नाराचों से मारे गए हाथियों और तोमर लिए गिरते हुए प्राणहीन महावतों से रणभूमि पट गई।
श्लोक 39 (6.71.39)
सन्निपाते बलौघानां प्रेषितैर्वरवारणैः । निपेतुर्युधि संभग्नाः सयोधाः सध्वजा गजाः ॥
sannipāte balaughānāṃ preṣitairvaravāraṇaiḥ | nipeturyudhi saṃbhagnāḥ sayodhāḥ sadhvajā gajāḥ
सेनाओं की भिड़न्त में, सामने भेजे गए श्रेष्ठ हाथियों की चोट से, योद्धाओं और ध्वजों सहित हाथी टूट-फूटकर युद्ध में गिर पड़े।
श्लोक 40 (6.71.40)
नागराजोपमैर्हस्तैर्नागैराक्षिप्य संयुगे । व्यदृश्यन्त महाराज संभग्ना रथकूबराः ॥
nāgarājopamairhastairnāgairākṣipya saṃyuge | vyadṛśyanta mahārāja saṃbhagnā rathakūbarāḥ
महाराज, नागराज के समान सूँड़ों वाले हाथियों द्वारा पकड़कर फेंके गए, टूटे हुए रथों के कूबर (धुरी-दण्ड) युद्ध में दिखाई देते थे।
श्लोक 41 (6.71.41)
विशीर्णरथसङ्घाश्च केशेष्वाक्षिप्य दन्तिभिः । द्रुमशाखा इवाविध्य निष्पिष्टा रथिनो रणे ॥
viśīrṇarathasaṅghāśca keśeṣvākṣipya dantibhiḥ | drumaśākhā ivāvidhya niṣpiṣṭā rathino raṇe
जिनके रथ-समूह छिन्न-भिन्न हो गए थे, उन रथियों को दाँतों वाले हाथियों ने बाल पकड़कर पेड़ की डालियों की तरह घुमाया और युद्ध में पीस डाला।
श्लोक 42 (6.71.42)
रथेषु च रथान्युद्धे संसक्तान्वरवारणाः । विकर्षन्तो दिशः सर्वाः संपेतुः सर्वशब्दगाः ॥
ratheṣu ca rathānyuddhe saṃsaktānvaravāraṇāḥ | vikarṣanto diśaḥ sarvāḥ saṃpetuḥ sarvaśabdagāḥ
युद्ध में एक-दूसरे से उलझे रथों को घसीटते हुए श्रेष्ठ हाथी हर शब्द की ओर दौड़ते हुए सब दिशाओं में झपट पड़े।
श्लोक 43 (6.71.43)
तेषां तथा कर्षतां तु गजानां रूपमाबभौ । सरःसु नलिनीजालं विषक्तमिव कर्षताम् ॥
teṣāṃ tathā karṣatāṃ tu gajānāṃ rūpamābabhau | saraḥsu nalinījālaṃ viṣaktamiva karṣatām
इस प्रकार रथों को घसीटते उन हाथियों का रूप ऐसा लगता था, मानो सरोवरों में उलझे कमल-नालों के समूह को खींचते हाथी हों।
श्लोक 44 (6.71.44)
एवं संछादितं तत्र बभूवायोधनं महत् । सादिभिश्च पदातैश्च सध्वजैश्च महारथैः ॥
evaṃ saṃchāditaṃ tatra babhūvāyodhanaṃ mahat | sādibhiśca padātaiśca sadhvajaiśca mahārathaiḥ
इस प्रकार वह विशाल रणभूमि घुड़सवारों, पैदल सैनिकों और ध्वजों वाले महारथियों से ढक गई।