भीष्म पर्व · अध्याय 75
मकर और क्रौञ्च व्यूह: छठे दिन का आरम्भ
छठे दिन की भोर में युधिष्ठिर धृष्टद्युम्न से मकर-व्यूह रचवाते हैं, और भीष्म उसके उत्तर में क्रौञ्च-व्यूह बनाते हैं; सञ्जय बताते हैं कि दोनों व्यूहों में कौन-सा प्रमुख योद्धा कहाँ खड़ा है। सेनाएँ भिड़ती हैं, हर अंग हर दूसरे अंग पर टूटता है, और दोनों पक्ष रात्रि के आकाश के समान शोभित होते हैं। भीम द्रोण के सारथि को मार डालता है, पर द्रोण स्वयं रथ हाँकते हुए पाण्डव-सेना को तितर-बितर कर देते हैं; सृञ्जय और केकय उनके तथा भीष्म के आगे भागते हैं, और भीम-अर्जुन कौरवों को रौंदते हैं। दोनों व्यूह टूट जाते हैं और दोनों पक्ष आमने-सामने लड़ते रहते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (6.75.1)
विहृत्य तु ततो राजन्सहिताः कुरुपाण्डवाः । व्यतीतायां तु शर्वर्यां पुनर्युद्धाय निर्ययुः ॥
vihṛtya tu tato rājansahitāḥ kurupāṇḍavāḥ | vyatītāyāṃ tu śarvaryāṃ punaryuddhāya niryayuḥ
हे राजन्, तब कौरव और पाण्डव साथ-साथ विश्राम करके, रात बीत जाने पर फिर से युद्ध के लिए निकल पड़े।
श्लोक 2 (6.75.2)
ततः शब्दो महानासीत्तव तेषां च भारत । युज्यतां रथमुख्यानां कल्प्यतां चैव दन्तिनाम् ॥
tataḥ śabdo mahānāsīttava teṣāṃ ca bhārata | yujyatāṃ rathamukhyānāṃ kalpyatāṃ caiva dantinām
हे भारत, तब आपकी और उनकी सेना में बड़ा कोलाहल उठा: 'श्रेष्ठ रथ जोते जाएँ! हाथी सजाए जाएँ!'
श्लोक 3 (6.75.3)
संनह्यतां पदातीनां हयानां चैव भारत । शङ्खदुन्दुभिनादश्च तुमुलः सर्वतोऽभवत् ॥
saṃnahyatāṃ padātīnāṃ hayānāṃ caiva bhārata | śaṅkhadundubhinādaśca tumulaḥ sarvato'bhavat
'पैदल सैनिक और घोड़े कवच धारण करें!' और चारों ओर शंखों और दुन्दुभियों का तुमुल नाद गूँज उठा।
श्लोक 4 (6.75.4)
ततो युधिष्ठिरो राजा धृष्टद्युम्नमभाषत । व्यूहं व्यूहस्व पाञ्चाल मकरं शत्रुनाशनम् ॥
tato yudhiṣṭhiro rājā dhṛṣṭadyumnamabhāṣata | vyūhaṃ vyūhasva pāñcāla makaraṃ śatrunāśanam
तब राजा युधिष्ठिर ने धृष्टद्युम्न से कहा, 'हे पाञ्चाल, शत्रुओं का नाश करने वाला मकर-व्यूह रचो।'
श्लोक 5 (6.75.5)
एवमुक्तस्तु पार्थेन धृष्टद्युम्नो महारथः । व्यादिदेश यथान्यायं रथिनो रथिनां वरः ॥
evamuktastu pārthena dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ | vyādideśa yathānyāyaṃ rathino rathināṃ varaḥ
पार्थ के ऐसा कहने पर रथियों में श्रेष्ठ महारथी धृष्टद्युम्न ने यथोचित रीति से रथियों को उनके स्थान बता दिए।
श्लोक 6 (6.75.6)
शिरोऽभूद्द्रुपदस्तस्य पाण्डवश्च धनञ्जयः । चक्षुषी सहदेवश्च नकुलश्च महारथः ॥
śiro'bhūddrupadastasya pāṇḍavaśca dhanañjayaḥ | cakṣuṣī sahadevaśca nakulaśca mahārathaḥ
उस व्यूह का सिर द्रुपद और पाण्डुपुत्र धनञ्जय बने; सहदेव और महारथी नकुल उसकी आँखें बने।
श्लोक 7 (6.75.7)
तुण्डमासीन्महाराज भीमसेनो महाबलः । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च राक्षसश्च घटोत्कचः ॥
tuṇḍamāsīnmahārāja bhīmaseno mahābalaḥ | saubhadro draupadeyāśca rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ
हे महाराज, उसकी थूथन महाबली भीमसेन था, और उसके साथ सुभद्रानन्दन, द्रौपदी के पुत्र तथा राक्षस घटोत्कच थे।
श्लोक 8 (6.75.8)
सात्यकिर्धर्मराजश्च व्यूहग्रीवां समास्थिताः । पृष्ठमासीन्महाराज विराटो वाहिनीपतिः ॥
sātyakirdharmarājaśca vyūhagrīvāṃ samāsthitāḥ | pṛṣṭhamāsīnmahārāja virāṭo vāhinīpatiḥ
सात्यकि और धर्मराज व्यूह की गर्दन पर डटे; हे महाराज, उसकी पीठ सेनापति विराट थे।
श्लोक 9 (6.75.9)
धृष्टद्युम्नो महाराज महत्या सेनया वृतः । केकया भ्रातरः पञ्च वामपार्श्वं समाश्रिताः ॥
dhṛṣṭadyumno mahārāja mahatyā senayā vṛtaḥ | kekayā bhrātaraḥ pañca vāmapārśvaṃ samāśritāḥ
हे महाराज, विशाल सेना से घिरे धृष्टद्युम्न भी वहीं थे; पाँचों केकय भाई बायें पार्श्व पर डटे थे।
श्लोक 10 (6.75.10)
धृष्टकेतुर्नरव्याघ्रश्चेकितानश्च वीर्यवान् । दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थितौ व्यूहस्य रक्षणे ॥
dhṛṣṭaketurnaravyāghraścekitānaśca vīryavān | dakṣiṇaṃ pakṣamāśritya sthitau vyūhasya rakṣaṇe
पुरुषसिंह धृष्टकेतु और पराक्रमी चेकितान दाहिने पक्ष पर व्यूह की रक्षा के लिए खड़े थे।
श्लोक 11 (6.75.11)
पादयोस्तु महाराज स्थितः श्रीमान्महारथः । कुन्तिभोजः शतानीको महत्या सेनया वृतः ॥
pādayostu mahārāja sthitaḥ śrīmānmahārathaḥ | kuntibhojaḥ śatānīko mahatyā senayā vṛtaḥ
हे महाराज, उसके पैरों पर श्रीमान् महारथी कुन्तिभोज और शतानीक विशाल सेना से घिरे खड़े थे।
श्लोक 12 (6.75.12)
शिखण्डी तु महेष्वासः सोमकैः संवृतो बली । इरावांश्च ततः पुच्छे मकरस्य व्यवस्थितौ ॥
śikhaṇḍī tu maheṣvāsaḥ somakaiḥ saṃvṛto balī | irāvāṃśca tataḥ pucche makarasya vyavasthitau
सोमकों से घिरा बलवान महाधनुर्धर शिखण्डी और इरावान् मकर की पूँछ पर तैनात थे।
श्लोक 13 (6.75.13)
एवमेतं महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः । सूर्योदये महाराज पुनर्युद्धाय दंशिताः ॥
evametaṃ mahāvyūhaṃ vyūhya bhārata pāṇḍavāḥ | sūryodaye mahārāja punaryuddhāya daṃśitāḥ
हे भारत, इस प्रकार यह महाव्यूह रचकर, हे महाराज, सूर्योदय के समय फिर युद्ध के लिए कवच धारण किए पाण्डव
श्लोक 14 (6.75.14)
कौरवानभ्ययुस्तूर्णं हस्त्यश्वरथपत्तिभिः । समुच्छ्रितैर्ध्वजैश्छत्रैः शस्त्रैश्च विमलैः शितैः ॥
kauravānabhyayustūrṇaṃ hastyaśvarathapattibhiḥ | samucchritairdhvajaiśchatraiḥ śastraiśca vimalaiḥ śitaiḥ
हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों के साथ, ऊँची ध्वजाओं और छत्रों तथा निर्मल, तीखे शस्त्रों से युक्त होकर तेज़ी से कौरवों पर चढ़ आए।
श्लोक 15 (6.75.15)
व्यूढं दृष्ट्वा तु तत्सैन्यं पिता देवव्रतस्तव । क्रौञ्चेन महता राजन्प्रत्यव्यूहत वाहिनीम् ॥
vyūḍhaṃ dṛṣṭvā tu tatsainyaṃ pitā devavratastava | krauñcena mahatā rājanpratyavyūhata vāhinīm
हे राजन्, उस सेना का व्यूह देखकर आपके पिता देवव्रत ने अपनी सेना को विशाल क्रौञ्च-व्यूह में रचकर उसके सामने खड़ा किया।
श्लोक 16 (6.75.16)
तस्य तुण्डे महेष्वासो भारद्वाजो व्यरोचत । अश्वत्थामा कृपश्चैव चक्षुरास्तां जनेश्वर ॥
tasya tuṇḍe maheṣvāso bhāradvājo vyarocata | aśvatthāmā kṛpaścaiva cakṣurāstāṃ janeśvara
उसकी चोंच पर महाधनुर्धर भरद्वाजपुत्र द्रोण शोभा पा रहे थे; हे जनेश्वर, अश्वत्थामा और कृप उसकी आँखें थे।
श्लोक 17 (6.75.17)
कृतवर्मा तु सहितः काम्भोजैरथ बाह्लिकैः । शिरस्यासीन्नरश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥
kṛtavarmā tu sahitaḥ kāmbhojairatha bāhlikaiḥ | śirasyāsīnnaraśreṣṭhaḥ śreṣṭhaḥ sarvadhanuṣmatām
नरश्रेष्ठ और सब धनुर्धरों में श्रेष्ठ कृतवर्मा काम्भोजों और बाह्लीकों के साथ उसके सिर पर था।
श्लोक 18 (6.75.18)
ग्रीवायां शूरसेनश्च तव पुत्रश्च मारिष । दुर्योधनो महाराज राजभिर्बहुभिर्वृतः ॥
grīvāyāṃ śūrasenaśca tava putraśca māriṣa | duryodhano mahārāja rājabhirbahubhirvṛtaḥ
हे मारिष, उसकी गर्दन पर शूरसेन और आपका पुत्र दुर्योधन थे; हे महाराज, दुर्योधन अनेक राजाओं से घिरा था।
श्लोक 19 (6.75.19)
प्राग्ज्योतिषस्तु सहितो मद्रसौवीरकेकयैः । उरस्यभून्नरश्रेष्ठ महत्या सेनया वृतः ॥
prāgjyotiṣastu sahito madrasauvīrakekayaiḥ | urasyabhūnnaraśreṣṭha mahatyā senayā vṛtaḥ
हे नरश्रेष्ठ, प्राग्ज्योतिष का राजा मद्रों, सौवीरों और केकयों के साथ, विशाल सेना से घिरा हुआ, उसकी छाती पर था।
श्लोक 20 (6.75.20)
पृष्ठे चास्तां महेष्वासावावन्त्यौ सपदानुगौ । स्वसेनया च सहितः सुशर्मा प्रस्थलाधिपः । वामं पक्षं समाश्रित्य दंशितः समवस्थितः ॥
pṛṣṭhe cāstāṃ maheṣvāsāvāvantyau sapadānugau | svasenayā ca sahitaḥ suśarmā prasthalādhipaḥ | vāmaṃ pakṣaṃ samāśritya daṃśitaḥ samavasthitaḥ
पीठ पर अवन्ती के दोनों महाधनुर्धर अपने अनुचरों के साथ खड़े थे; और प्रस्थल का स्वामी सुशर्मा अपनी सेना के साथ कवच धारण किए बायें पक्ष पर डटा था।
श्लोक 21 (6.75.21)
तुषारा यवनाश्चैव शकाश्च सह चूचुपैः । दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य भारत ॥
tuṣārā yavanāścaiva śakāśca saha cūcupaiḥ | dakṣiṇaṃ pakṣamāśritya sthitā vyūhasya bhārata
हे भारत, तुषार, यवन और शक, चूचुपों के साथ, व्यूह के दाहिने पक्ष पर स्थित थे।
श्लोक 22 (6.75.22)
श्रुतायुश्च शतायुश्च सौमदत्तिश्च मारिष । व्यूहस्य जघने तस्थू रक्षमाणाः परस्परम् ॥
śrutāyuśca śatāyuśca saumadattiśca māriṣa | vyūhasya jaghane tasthū rakṣamāṇāḥ parasparam
हे मारिष, श्रुतायु, शतायु और सोमदत्त-पुत्र एक-दूसरे की रक्षा करते हुए व्यूह के पिछले भाग में खड़े थे।
श्लोक 23 (6.75.23)
ततो युद्धाय संजग्मुः पाण्डवाः कौरवैः सह । सूर्योदये महाराज प्रावर्तत जनक्षयः ॥
tato yuddhāya saṃjagmuḥ pāṇḍavāḥ kauravaiḥ saha | sūryodaye mahārāja prāvartata janakṣayaḥ
तब पाण्डव कौरवों से युद्ध के लिए भिड़ गए, और हे महाराज, सूर्योदय होते ही जनसंहार आरम्भ हो गया।
श्लोक 24 (6.75.24)
प्रतीयू रथिनो नागान्नागाश्च रथिनो ययुः । हयारोहान्रथारोहा रथिनश्चापि सादिनः ॥
pratīyū rathino nāgānnāgāśca rathino yayuḥ | hayārohānrathārohā rathinaścāpi sādinaḥ
रथी हाथियों पर टूटे और हाथी रथियों पर; रथारोही अश्वारोहियों पर झपटे और रथी घुड़सवारों पर।
श्लोक 25 (6.75.25)
सादिनश्च हयान्राजन्रथिनश्च महारणे । हस्त्यारोहान्हयारोहा रथिनः सादिनस्तथा ॥
sādinaśca hayānrājanrathinaśca mahāraṇe | hastyārohānhayārohā rathinaḥ sādinastathā
हे राजन्, उस महासंग्राम में घुड़सवार और रथी घोड़ों पर टूटे; अश्वारोही गजारोहियों पर झपटे और रथी भी उसी प्रकार घुड़सवारों पर।
श्लोक 26 (6.75.26)
रथिनः पत्तिभिः सार्धं सादिनश्चापि पत्तिभिः । अन्योन्यं समरे राजन्प्रत्यधावन्नमर्षिताः ॥
rathinaḥ pattibhiḥ sārdhaṃ sādinaścāpi pattibhiḥ | anyonyaṃ samare rājanpratyadhāvannamarṣitāḥ
हे राजन्, रथी पैदलों से और घुड़सवार भी पैदलों से, एक-दूसरे को सहन न करते हुए, रणभूमि में आपस में भिड़ने दौड़े।
श्लोक 27 (6.75.27)
भीमसेनार्जुनयमैर्गुप्ता चान्यैर्महारथैः । शुशुभे पाण्डवी सेना नक्षत्रैरिव शर्वरी ॥
bhīmasenārjunayamairguptā cānyairmahārathaiḥ | śuśubhe pāṇḍavī senā nakṣatrairiva śarvarī
भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव और अन्य महारथियों से सुरक्षित पाण्डव-सेना नक्षत्रों से सजी रात्रि के समान शोभा पा रही थी।
श्लोक 28 (6.75.28)
तथा भीष्मकृपद्रोणशल्यदुर्योधनादिभिः । तवापि च बभौ सेना ग्रहैर्द्यौरिव संवृता ॥
tathā bhīṣmakṛpadroṇaśalyaduryodhanādibhiḥ | tavāpi ca babhau senā grahairdyauriva saṃvṛtā
इसी प्रकार भीष्म, कृप, द्रोण, शल्य, दुर्योधन आदि से युक्त आपकी सेना भी ग्रहों से भरे आकाश के समान शोभित हुई।
श्लोक 29 (6.75.29)
भीमसेनस्तु कौन्तेयो द्रोणं दृष्ट्वा पराक्रमी । अभ्ययाञ्जवनैरश्वैर्भारद्वाजस्य वाहिनीम् ॥
bhīmasenastu kaunteyo droṇaṃ dṛṣṭvā parākramī | abhyayāñjavanairaśvairbhāradvājasya vāhinīm
पराक्रमी कुन्तीपुत्र भीमसेन ने द्रोण को देखकर वेगवान घोड़ों के सहारे भरद्वाजपुत्र की सेना पर धावा बोल दिया।
श्लोक 30 (6.75.30)
द्रोणस्तु समरे क्रुद्धो भीमं नवभिरायसैः । विव्याध समरश्लाघी मर्माण्युद्दिष्य वीर्यवान् ॥
droṇastu samare kruddho bhīmaṃ navabhirāyasaiḥ | vivyādha samaraślāghī marmāṇyuddiṣya vīryavān
रण में गौरव पाने वाले पराक्रमी द्रोण ने युद्ध में क्रुद्ध होकर मर्मस्थलों को लक्ष्य करके नौ लौह-बाणों से भीम को बींध दिया।
श्लोक 31 (6.75.31)
दृढाहतस्ततो भीमो भारद्वाजस्य संयुगे । सारथिं प्रेषयामास यमस्य सदनं प्रति ॥
dṛḍhāhatastato bhīmo bhāradvājasya saṃyuge | sārathiṃ preṣayāmāsa yamasya sadanaṃ prati
गहरी चोट खाकर भीम ने तब उस संग्राम में भरद्वाजपुत्र के सारथि को यमलोक भेज दिया।
श्लोक 32 (6.75.32)
स संगृह्य स्वयं वाहान्भारद्वाजः प्रतापवान् । व्यधमत्पाण्डवीं सेनां तूलराशिमिवानलः ॥
sa saṃgṛhya svayaṃ vāhānbhāradvājaḥ pratāpavān | vyadhamatpāṇḍavīṃ senāṃ tūlarāśimivānalaḥ
प्रतापी भरद्वाजपुत्र ने स्वयं घोड़ों की रास सँभालकर पाण्डव-सेना को वैसे ही तितर-बितर कर दिया जैसे आग रुई के ढेर को।
श्लोक 33 (6.75.33)
ते वध्यमाना द्रोणेन भीष्मेण च नरोत्तमाः । सृञ्जयाः केकयैः सार्धं पलायनपराभवन् ॥
te vadhyamānā droṇena bhīṣmeṇa ca narottamāḥ | sṛñjayāḥ kekayaiḥ sārdhaṃ palāyanaparābhavan
द्रोण और भीष्म के हाथों मारे जाते हुए वे नरश्रेष्ठ सृञ्जय केकयों के साथ भाग खड़े हुए।
श्लोक 34 (6.75.34)
तथैव तावकं सैन्यं भीमार्जुनपरिक्षतम् । मुह्यते तत्रतत्रैव समदेव वराङ्गना ॥
tathaiva tāvakaṃ sainyaṃ bhīmārjunaparikṣatam | muhyate tatratatraiva samadeva varāṅganā
उसी प्रकार भीम और अर्जुन के प्रहारों से क्षत-विक्षत आपकी सेना जहाँ-तहाँ मद से विह्वल सुन्दरी के समान मोहित होकर डगमगाने लगी।
श्लोक 35 (6.75.35)
अभिद्येतां ततो व्यूहौ तस्मिन्वीरवरक्षये । आसीद्व्यतिकरो घोरस्तव तेषां च भारत ॥
abhidyetāṃ tato vyūhau tasminvīravarakṣaye | āsīdvyatikaro ghorastava teṣāṃ ca bhārata
तब श्रेष्ठ वीरों के उस संहार में दोनों व्यूह टूट गए, और हे भारत, आपकी तथा उनकी सेनाओं में भयानक घालमेल मच गया।
श्लोक 36 (6.75.36)
तदद्भुतमपश्याम तावकानां परैः सह । एकायनगताः सर्वे यदयुध्यन्त भारत ॥
tadadbhutamapaśyāma tāvakānāṃ paraiḥ saha | ekāyanagatāḥ sarve yadayudhyanta bhārata
हे भारत, हमने आपके योद्धाओं और शत्रुओं के बीच एक अद्भुत बात देखी: वे सब मानो एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित होकर लड़ रहे थे।
श्लोक 37 (6.75.37)
प्रतिसंवार्य चास्त्राणि तेऽन्योन्यस्य विशांपते । युयुधुः पाण्डवाश्चैव कौरवाश्च महाबलाः ॥
pratisaṃvārya cāstrāṇi te'nyonyasya viśāṃpate | yuyudhuḥ pāṇḍavāścaiva kauravāśca mahābalāḥ
हे प्रजानाथ, एक-दूसरे के अस्त्रों को रोकते हुए महाबली पाण्डव और कौरव युद्ध करते रहे।