Skip to main content

द्रोण पर्व · अध्याय 1

भीष्म के पतन के बाद कर्ण की पुकार

जनमेजय पूछते हैं कि भीष्म के मारे जाने पर धृतराष्ट्र ने क्या किया, और वैशम्पायन बताते हैं कि सञ्जय रात में हस्तिनापुर पहुँचे और शोकाकुल राजा ने उनसे प्रश्न किए। सञ्जय बताते हैं कि दोनों सेनाओं ने शरशय्या पर पड़े भीष्म को प्रणाम किया और फिर युद्ध में लौट गईं; नायकहीन कुरु-सेना कर्ण को पुकारने लगी, जिसने भीष्म के जीवित रहते युद्ध न करने की शपथ ली थी। अन्त में धृतराष्ट्र पूछते हैं कि क्या कर्ण ने वह कमी पूरी की।

अध्याय-सूचीअध्याय 2

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (7.1.1)

तमप्रतिमसत्वौजोबलवीर्यपराक्रमम् । हतं देवव्रतं श्रुत्वा पाञ्चाल्येन शिखण्डिना ॥

tamapratimasatvaujobalavīryaparākramam | hataṃ devavrataṃ śrutvā pāñcālyena śikhaṇḍinā

जिन देवव्रत (भीष्म) के साहस, ओज, बल, वीर्य और पराक्रम की कोई तुलना नहीं थी, उन्हें पांचाल शिखण्डी के हाथों मारा गया सुनकर —

श्लोक 2 (7.1.2)

धृतराष्ट्रस्ततो राजा शोकव्याकुललोचनः । किमचेष्टत विप्रर्षे हते पितरि वीर्यवान् ॥

dhṛtarāṣṭrastato rājā śokavyākulalocanaḥ | kimaceṣṭata viprarṣe hate pitari vīryavān

हे विप्रर्षि! पिता के मारे जाने पर शोक से व्याकुल हुए उन पराक्रमी राजा धृतराष्ट्र ने फिर क्या किया?

श्लोक 3 (7.1.3)

तस्य पुत्रो हि भगवान्भीष्मद्रोणमुखै रथैः । पराजित्य महेष्वासान्पाण्डवान् राज्यमिच्छति ॥

tasya putro hi bhagavānbhīṣmadroṇamukhai rathaiḥ | parājitya maheṣvāsānpāṇḍavān rājyamicchati

हे भगवन्! उनका पुत्र भीष्म और द्रोण के नेतृत्व वाले रथियों के द्वारा महाधनुर्धर पाण्डवों को हराकर राज्य पाना चाहता था।

श्लोक 4 (7.1.4)

तस्मिन्हते तु भगवन्केतौ सर्वधनुष्मताम् । यदचेष्टत कौरव्यस्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥

tasminhate tu bhagavanketau sarvadhanuṣmatām | yadaceṣṭata kauravyastanme brūhi tapodhana

हे तपोधन! समस्त धनुर्धारियों की ध्वजा-स्वरूप उन भीष्म के मारे जाने पर कुरुवंशी धृतराष्ट्र ने जो कुछ किया, वह मुझे बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (7.1.5)

निहतं पितरं श्रुत्वा धृतराष्ट्रो जनाधिपः । लेभे न शान्तिं कौरव्यश्चिन्ताशोकपरायणः ॥

nihataṃ pitaraṃ śrutvā dhṛtarāṣṭro janādhipaḥ | lebhe na śāntiṃ kauravyaścintāśokaparāyaṇaḥ

पिता के मारे जाने की बात सुनकर नरेश कौरव्य धृतराष्ट्र को चिन्ता और शोक में डूबे रहने के कारण शान्ति नहीं मिली।

श्लोक 6 (7.1.6)

तस्य चिन्तयतो दुःखमनिशं पार्थिवस्य तत् । आजगाम विशुद्धात्मा पुनर्गावल्गणिस्तदा ॥

tasya cintayato duḥkhamaniśaṃ pārthivasya tat | ājagāma viśuddhātmā punargāvalgaṇistadā

वे राजा अपने उस दुःख का निरन्तर चिन्तन कर ही रहे थे कि विशुद्ध हृदय वाले गवल्गण-पुत्र सञ्जय फिर उनके पास आ पहुँचे।

श्लोक 7 (7.1.7)

व्यासप्रसादाद्विज्ञाय सर्वं वृत्तान्तमुत्तमम् । सैनिकानां च सर्वेषां सेनयोरुभयोस्तदा ॥

vyāsaprasādādvijñāya sarvaṃ vṛttāntamuttamam | sainikānāṃ ca sarveṣāṃ senayorubhayostadā

व्यास की कृपा से उस समय दोनों सेनाओं के सभी सैनिकों का वह समस्त उत्तम वृत्तान्त जानकर —

श्लोक 8 (7.1.8)

शिबिरात्सञ्जयं प्राप्तं निशि नागाह्वयं पुरम् । आम्बिकेयो महाराज धृतराष्ट्रोऽन्वपृच्छत ॥

śibirātsañjayaṃ prāptaṃ niśi nāgāhvayaṃ puram | āmbikeyo mahārāja dhṛtarāṣṭro'nvapṛcchata

हे महाराज! रात में शिविर से नागाह्वय (हस्तिनापुर) नगर में आए हुए सञ्जय से अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र ने पूछा।

श्लोक 9 (7.1.9)

श्रुत्वा भीष्मस्य निधनमप्रहृष्टमना भृशम् । पुत्राणां जयमाकाङ्क्षन्विललापातुरो यथा ॥

śrutvā bhīṣmasya nidhanamaprahṛṣṭamanā bhṛśam | putrāṇāṃ jayamākāṅkṣanvilalāpāturo yathā

भीष्म की मृत्यु का समाचार सुनकर अत्यन्त खिन्न मन से, पुत्रों की विजय चाहते हुए, वे व्याकुल मनुष्य की भाँति विलाप करने लगे।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 10 (7.1.10)

संशोच्य तु महात्मानं भीष्मं भीमपराक्रमम् । किमकार्षुःपरं तात कुरवः कालचोदिताः ॥

saṃśocya tu mahātmānaṃ bhīṣmaṃ bhīmaparākramam | kimakārṣuḥparaṃ tāta kuravaḥ kālacoditāḥ

तात! भयंकर पराक्रम वाले महात्मा भीष्म के लिए शोक करने के बाद, काल से प्रेरित कौरवों ने आगे क्या किया?

श्लोक 11 (7.1.11)

तस्मिन्विनिहते शूरे दुराधर्षे महात्मनि । किं नु स्वित्कुरवोऽकार्षुर्निमग्नाः शोकसागरे ॥

tasminvinihate śūre durādharṣe mahātmani | kiṃ nu svitkuravo'kārṣurnimagnāḥ śokasāgare

उन दुर्धर्ष, शूर, महात्मा के मारे जाने पर शोक-सागर में डूबे हुए कौरवों ने क्या किया?

श्लोक 12 (7.1.12)

तदुदीर्णं महत्सैन्यं त्रैलोक्यस्यापि सञ्जय । भयमुत्पादयेत्तीव्रं पाण्डवानां महात्मनाम् ॥

tadudīrṇaṃ mahatsainyaṃ trailokyasyāpi sañjaya | bhayamutpādayettīvraṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām

सञ्जय! महात्मा पाण्डवों की वह उमड़ी हुई विशाल सेना तो तीनों लोकों में भी तीव्र भय उत्पन्न कर सकती थी।

श्लोक 13 (7.1.13)

को हि दौर्योधने सैन्ये पुमानासीन्महारथः । यं प्राप्य समरे वीरा न त्रस्यन्ति महाभये ॥

ko hi dauryodhane sainye pumānāsīnmahārathaḥ | yaṃ prāpya samare vīrā na trasyanti mahābhaye

दुर्योधन की सेना में ऐसा कौन महारथी था, जिसका आश्रय पाकर वीर पुरुष युद्ध में महाभय के समय भी नहीं डरते?

श्लोक 14 (7.1.14)

देवव्रते तु निहते कुरूणामृषभे तदा । किमकार्षुर्नृपतयस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

devavrate tu nihate kurūṇāmṛṣabhe tadā | kimakārṣurnṛpatayastanmamācakṣva sañjaya

सञ्जय! कुरुओं में श्रेष्ठ देवव्रत के मारे जाने पर राजाओं ने क्या किया, वह मुझे बताओ।

सञ्जय उवाच

श्लोक 15 (7.1.15)

शृणु राजन्नेकमना वचनं ब्रुवतो मम । यत्ते पुत्रास्तदाकार्षुर्हते देवव्रते मृधे ॥

śṛṇu rājannekamanā vacanaṃ bruvato mama | yatte putrāstadākārṣurhate devavrate mṛdhe

राजन्! एकाग्र मन से मेरी बात सुनिए। रण में देवव्रत के मारे जाने पर आपके पुत्रों ने जो किया, वह मैं कहता हूँ।

श्लोक 16 (7.1.16)

निहते तु तदा भीष्मे राजन्सत्यपराक्रमे । तावकाः पाण्डवेयाश्च प्राध्यायन्त पृथक्पृथक् ॥

nihate tu tadā bhīṣme rājansatyaparākrame | tāvakāḥ pāṇḍaveyāśca prādhyāyanta pṛthakpṛthak

राजन्! सत्य-पराक्रमी भीष्म के गिर जाने पर आपके पक्ष के लोग और पाण्डव, दोनों अलग-अलग गहरे चिन्तन में डूब गए।

श्लोक 17 (7.1.17)

विस्मिताश्च प्रहृष्टाश्च क्षत्रधर्मं निशम्य ते । स्वधर्मं निन्दमानास्ते प्रणिपत्य महात्मने ॥

vismitāśca prahṛṣṭāśca kṣatradharmaṃ niśamya te | svadharmaṃ nindamānāste praṇipatya mahātmane

वे विस्मित भी थे और हर्षित भी; क्षत्रिय-धर्म का विचार करते और अपने ही धर्म की निन्दा करते हुए उन्होंने उन महात्मा को प्रणाम किया,

श्लोक 18 (7.1.18)

शयनं कल्पयामासुर्भीष्मायामितकर्मणे । सोपधानं नरव्याघ्र शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

śayanaṃ kalpayāmāsurbhīṣmāyāmitakarmaṇe | sopadhānaṃ naravyāghra śaraiḥ sannataparvabhiḥ

और हे नरव्याघ्र! अपार कर्मों वाले भीष्म के लिए झुकी हुई गाँठों वाले बाणों की, सिरहाने सहित, शय्या बना दी।

श्लोक 19 (7.1.19)

विधाय रक्षां भीष्माय समाभाष्य परस्परम् । अनुमान्य च गाङ्गेयं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ॥

vidhāya rakṣāṃ bhīṣmāya samābhāṣya parasparam | anumānya ca gāṅgeyaṃ kṛtvā cāpi pradakṣiṇam

भीष्म की रक्षा का प्रबन्ध करके, आपस में बातचीत करके, गाङ्गेय की अनुमति लेकर और उनकी प्रदक्षिणा करके —

श्लोक 20 (7.1.20)

क्रोधसंरक्तनयनाः समवेत्य परस्परम् । पुनर्युद्धाय निर्जग्मुः क्षत्रियाः कालचोदिताः ॥

krodhasaṃraktanayanāḥ samavetya parasparam | punaryuddhāya nirjagmuḥ kṣatriyāḥ kālacoditāḥ

क्रोध से लाल आँखों वाले क्षत्रिय परस्पर मिलकर, काल की प्रेरणा से, फिर युद्ध के लिए निकल पड़े।

श्लोक 21 (7.1.21)

ततस्तूर्यनिनादैश्च भेरीणां निनदेन च । तावकानामनीकानि परेषां च विनिर्ययुः ॥

tatastūryaninādaiśca bherīṇāṃ ninadena ca | tāvakānāmanīkāni pareṣāṃ ca viniryayuḥ

तब तुरहियों के निनाद और भेरियों के घोष के साथ आपकी और शत्रुओं की सेनाएँ निकल पड़ीं।

श्लोक 22 (7.1.22)

व्यावृत्तेऽर्यम्णि राजेन्द्र पतिते जाह्नवीसुते । अमर्षवशमापन्नाः कालोपहतचेतसः ॥

vyāvṛtte'ryamṇi rājendra patite jāhnavīsute | amarṣavaśamāpannāḥ kālopahatacetasaḥ

राजेन्द्र! सूर्य के लौट आने पर और जाह्नवी-पुत्र के गिर जाने पर वे क्रोध के वश में आ गए थे और काल ने उनकी बुद्धि हर ली थी।

श्लोक 23 (7.1.23)

अनादृत्य वचः पथ्यं गाङ्गेयस्य महात्मनः । निर्ययुर्भरतश्रेष्ठाः शस्त्राण्यादाय सत्वराः ॥

anādṛtya vacaḥ pathyaṃ gāṅgeyasya mahātmanaḥ | niryayurbharataśreṣṭhāḥ śastrāṇyādāya satvarāḥ

महात्मा गाङ्गेय के हितकारी वचन की अवहेलना करके भरतश्रेष्ठ योद्धा शस्त्र उठाकर शीघ्रता से निकल पड़े।

श्लोक 24 (7.1.24)

मोहात्तव सपुत्रस्य वधाच्छान्तनवस्य च । कौरवा मृत्युनाऽऽहूताः सहिताः सर्वराजभिः ॥

mohāttava saputrasya vadhācchāntanavasya ca | kauravā mṛtyunā''hūtāḥ sahitāḥ sarvarājabhiḥ

आपके और आपके पुत्रों के मोह से तथा शान्तनु-पुत्र के वध से सब राजाओं सहित कौरवों को मृत्यु ने बुला लिया।

श्लोक 25 (7.1.25)

अजावय इवागोपा वने श्वापदसंकुले । कर्णकर्णेति चाक्रन्दञ्छेषा भारत पार्थिवाः । भृशमुद्विग्नमनसो हीना देवव्रतेन ते ॥

ajāvaya ivāgopā vane śvāpadasaṃkule | karṇakarṇeti cākrandañcheṣā bhārata pārthivāḥ | bhṛśamudvignamanaso hīnā devavratena te

हिंस्र पशुओं से भरे वन में बिना रखवाले की बकरियों और भेड़ों की तरह, देवव्रत से हीन हुए शेष राजा, हे भारत, अत्यन्त उद्विग्न मन से "कर्ण! कर्ण!" पुकारकर चिल्लाने लगे।

श्लोक 26 (7.1.26)

पतिते भरतश्रेष्ठे बभूव कुरुवाहिनी । द्यौरिवापेतनक्षत्रा हीनं खमिव वायुना ॥

patite bharataśreṣṭhe babhūva kuruvāhinī | dyaurivāpetanakṣatrā hīnaṃ khamiva vāyunā

भरतश्रेष्ठ के गिर जाने पर कुरु-सेना नक्षत्रहीन आकाश और वायुहीन अन्तरिक्ष के समान हो गई,

श्लोक 27 (7.1.27)

विपन्नसस्येव मही वाक्चैवासंस्कृता यथा । आसुरीव यथा सेना निगृहीते नृपे बलौ ॥

vipannasasyeva mahī vākcaivāsaṃskṛtā yathā | āsurīva yathā senā nigṛhīte nṛpe balau

फसल नष्ट हुई पृथ्वी के समान, संस्कारहीन वाणी के समान, और राजा बलि के बाँध लिए जाने पर असुरों की सेना के समान,

श्लोक 28 (7.1.28)

विधवेव वरारोहा शुष्कतोयेव निम्नगा । वृकैरिव वने रुद्धा पृषती हतयूथपा ॥

vidhaveva varārohā śuṣkatoyeva nimnagā | vṛkairiva vane ruddhā pṛṣatī hatayūthapā

विधवा सुन्दरी के समान, सूखे जल वाली नदी के समान, और झुण्ड के नायक के मारे जाने पर वन में भेड़ियों से घिरी हरिणी के समान,

श्लोक 29 (7.1.29)

शरभाऽऽहतसिंहेव महती गिरिकन्दरा । सा सेना भरतश्रेष्ठे पतिते जाह्नवीसुते ॥

śarabhā''hatasiṃheva mahatī girikandarā | sā senā bharataśreṣṭhe patite jāhnavīsute

शरभ के द्वारा सिंह के मार दिए जाने पर सूनी हुई विशाल पर्वत-गुफा के समान थी वह सेना, जब भरतश्रेष्ठ जाह्नवी-पुत्र गिर पड़े।

श्लोक 30 (7.1.30)

विष्वग्वाताहतिक्षुब्धा नौरिवासीन्महार्णवे । बलिभिः पाण्डवैर्वीरैर्लब्धलक्षैर्भृशार्दिता ॥

viṣvagvātāhatikṣubdhā naurivāsīnmahārṇave | balibhiḥ pāṇḍavairvīrairlabdhalakṣairbhṛśārditā

चारों ओर से बहती आँधी से झकझोरी हुई महासागर की नाव के समान वह सेना थी, जिसे लक्ष्य पा चुके बलवान् पाण्डव-वीर बुरी तरह पीड़ित कर रहे थे।

श्लोक 31 (7.1.31)

सा तदासीद्भृशं सेना व्याकुलाश्वरथद्विपा । विपन्नभूयिष्ठनरा कृपणा ध्वस्तमानसा ॥

sā tadāsīdbhṛśaṃ senā vyākulāśvarathadvipā | vipannabhūyiṣṭhanarā kṛpaṇā dhvastamānasā

उस समय वह सेना अत्यन्त व्याकुल थी; घोड़े, रथ और हाथी अस्त-व्यस्त थे, अधिकांश योद्धा मारे जा चुके थे, वह दीन और टूटे मन वाली हो गई थी।

श्लोक 32 (7.1.32)

तस्यां त्रस्ता नृपतयः सैनिकाश्च पृथग्विधाः । पाताल इव मज्जन्तो हीना देवव्रतेन ते ॥

tasyāṃ trastā nṛpatayaḥ sainikāśca pṛthagvidhāḥ | pātāla iva majjanto hīnā devavratena te

उसमें भयभीत राजा और नाना प्रकार के सैनिक, देवव्रत से रहित होकर, मानो पाताल में डूब रहे थे।

श्लोक 33 (7.1.33)

कर्णस्य कुरवोऽस्मार्षुः स हि देवव्रतोपमः । सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं रोचमानमिवातिथिम् ॥

karṇasya kuravo'smārṣuḥ sa hi devavratopamaḥ | sarvaśastrabhṛtāṃ śreṣṭhaṃ rocamānamivātithim

कौरवों को कर्ण का स्मरण हो आया, क्योंकि वह देवव्रत के समान था — समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ और सम्मानित अतिथि के समान दीप्तिमान्।

श्लोक 34 (7.1.34)

बन्धुमापद्गतस्येव तमेवोपागमन्मनः । चुक्रुशुः कर्णकर्णेति तत्र भारत पार्थिवाः ॥

bandhumāpadgatasyeva tamevopāgamanmanaḥ | cukruśuḥ karṇakarṇeti tatra bhārata pārthivāḥ

विपत्ति में पड़े मनुष्य का मन जैसे बन्धु की ओर जाता है, वैसे ही उनका मन उसी की ओर गया; और हे भारत! वहाँ राजा "कर्ण! कर्ण!" पुकार उठे।

श्लोक 35 (7.1.35)

राधेयं हितमस्माकं सूतपुत्रं तनुत्यजम् । स हि नायुध्यत तदा दशाहानि महायशाः ॥

rādheyaṃ hitamasmākaṃ sūtaputraṃ tanutyajam | sa hi nāyudhyata tadā daśāhāni mahāyaśāḥ

"राधा-पुत्र कर्ण, वह सूतपुत्र, जो प्राण देने को तत्पर रहता है, हमारा हितैषी है!" — क्योंकि उन दिनों वह महायशस्वी दस दिन तक युद्ध नहीं कर रहा था।

श्लोक 36 (7.1.36)

सामात्यबन्धुः कर्णो वै तमानयत माचिरम् । भीष्मेण हि महाबाहुः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥

sāmātyabandhuḥ karṇo vai tamānayata māciram | bhīṣmeṇa hi mahābāhuḥ sarvakṣatrasya paśyataḥ

"मन्त्रियों और बन्धुओं सहित कर्ण को शीघ्र ले आओ!" क्योंकि भीष्म ने समस्त क्षत्रियों के देखते —

श्लोक 37 (7.1.37)

रथेषु गण्यमानेषु बलविक्रमशालिषु । सङ्ख्यातोऽर्धरथः कर्णो द्विगुणः सन्नरर्षभः ॥

ratheṣu gaṇyamāneṣu balavikramaśāliṣu | saṅkhyāto'rdharathaḥ karṇo dviguṇaḥ sannararṣabhaḥ

बल और पराक्रम से सम्पन्न रथियों की गणना के समय उन महाबाहु पुरुषश्रेष्ठ कर्ण को, दुगुना सामर्थ्य होने पर भी, केवल अर्धरथ गिना था।

श्लोक 38 (7.1.38)

रथातिरथसङ्ख्यायां योऽग्रणीः शूरसम्मतः । सासुरानपि देवेशान्रणे यो योद्धुमुत्सहेत् ॥

rathātirathasaṅkhyāyāṃ yo'graṇīḥ śūrasammataḥ | sāsurānapi deveśānraṇe yo yoddhumutsahet

जो रथियों और अतिरथियों की गणना में अग्रणी था, शूरों का सम्मानित था और असुरों सहित देवेश्वरों से भी रण में लड़ने का साहस रखता था,

श्लोक 39 (7.1.39)

स तु तेनैव कोपेन राजन्गाङ्गेयमुक्तवान् । त्वयि जीवति कौरव्य नाहं योत्स्ये कदाचन ॥

sa tu tenaiva kopena rājangāṅgeyamuktavān | tvayi jīvati kauravya nāhaṃ yotsye kadācana

उसी क्रोध से उसने, राजन्, गाङ्गेय से कहा था — "कुरुनन्दन! तुम्हारे जीवित रहते मैं कभी युद्ध नहीं करूँगा।

कर्ण उवाच

श्लोक 40 (7.1.40)

त्वया तु पाण्डवेयेषु निहतेषु महामृधे । दुर्योधनमनुज्ञाप्य वनं यास्यामि कौरव ॥

tvayā tu pāṇḍaveyeṣu nihateṣu mahāmṛdhe | duryodhanamanujñāpya vanaṃ yāsyāmi kaurava

और जब तुम महायुद्ध में पाण्डवों को मार चुकोगे, तब हे कौरव! मैं दुर्योधन से आज्ञा लेकर वन को चला जाऊँगा।

श्लोक 41 (7.1.41)

हते वा त्वयि पार्थैस्तु युधि स्वर्गमुपेयुषि । हन्तास्म्येकरथेनैव कृत्स्नान् यान्मन्यसे रथान् ॥

hate vā tvayi pārthaistu yudhi svargamupeyuṣi | hantāsmyekarathenaiva kṛtsnān yānmanyase rathān

अथवा यदि पार्थों के हाथों युद्ध में मारे जाकर तुम स्वर्ग चले गए, तो तुम जिन सब रथियों को मानते हो, उन सबको मैं अकेले एक ही रथ से मार डालूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 42 (7.1.42)

एवमुक्त्वा महाबाहुर्दशाहान्येक एव स । नायुध्यत ततः कर्णः पुत्रस्य तव संमते ॥

evamuktvā mahābāhurdaśāhānyeka eva sa | nāyudhyata tataḥ karṇaḥ putrasya tava saṃmate

ऐसा कहकर महाबाहु कर्ण ने आपके पुत्र की सम्मति से दस दिन तक युद्ध नहीं किया।

श्लोक 43 (7.1.43)

भीष्मः समरविक्रान्तः पाण्डवेयस्य भारत । जघान समरे योधानसङ्ख्येयपराक्रमः ॥

bhīṣmaḥ samaravikrāntaḥ pāṇḍaveyasya bhārata | jaghāna samare yodhānasaṅkhyeyaparākramaḥ

इधर, हे भारत! रण में पराक्रमी भीष्म ने, असंख्य पराक्रम दिखाते हुए, पाण्डव-पक्ष के योद्धाओं को मार डाला।

श्लोक 44 (7.1.44)

तस्मिंस्तु निहते शूरे सत्यसन्धे महौजसि । त्वत्सुताः कर्णमस्मार्षुस्तर्तुकामा इव प्लवम् ॥

tasmiṃstu nihate śūre satyasandhe mahaujasi | tvatsutāḥ karṇamasmārṣustartukāmā iva plavam

उन शूर, सत्यप्रतिज्ञ, महातेजस्वी के मारे जाने पर आपके पुत्रों ने कर्ण को वैसे ही याद किया, जैसे नदी पार करने के इच्छुक लोग नाव को याद करते हैं।

श्लोक 45 (7.1.45)

तावकास्तव पुत्राश्च सहिताः सर्वराजभिः । हा कर्ण इति चाक्रन्दन्कालोऽयमिति अब्रुवन् ॥

tāvakāstava putrāśca sahitāḥ sarvarājabhiḥ | hā karṇa iti cākrandankālo'yamiti abruvan

आपके योद्धा और आपके पुत्र, सब राजाओं के साथ, "हा कर्ण!" कहकर चिल्लाए और बोले, "यही समय है!"

श्लोक 46 (7.1.46)

एवं ते स्म हि राधेयं सूतपुत्रं तनुत्यजम् । चुक्रुशुः सहिता योधास्तत्र तत्र महाबलाः ॥

evaṃ te sma hi rādheyaṃ sūtaputraṃ tanutyajam | cukruśuḥ sahitā yodhāstatra tatra mahābalāḥ

इस प्रकार वे महाबली योद्धा इकट्ठे होकर जहाँ-तहाँ प्राण देने को तत्पर सूतपुत्र राधेय को पुकारते रहे।

श्लोक 47 (7.1.47)

जामदग्न्याभ्यनुज्ञातमस्त्रे दुर्वारपौरुषम् । अगमन्नो मनः कर्णं बन्धुमात्ययिकेष्विव ॥

jāmadagnyābhyanujñātamastre durvārapauruṣam | agamanno manaḥ karṇaṃ bandhumātyayikeṣviva

जमदग्नि-पुत्र परशुराम से अस्त्र-विद्या में अनुमति पाए हुए, दुर्निवार पौरुष वाले कर्ण की ओर हमारा मन वैसे ही गया, जैसे प्राणघातक संकट में बन्धु की ओर जाता है।

श्लोक 48 (7.1.48)

स हि शक्तो रणे राजञ्स्त्रातुमस्मान्महाभयात् । त्रिदशानिव गोविन्दः सततं सुमहाभयात् ॥

sa hi śakto raṇe rājañstrātumasmānmahābhayāt | tridaśāniva govindaḥ satataṃ sumahābhayāt

राजन्! वह रण में हमें इस महाभय से वैसे ही बचा सकता है, जैसे गोविन्द सदा देवताओं को महाभय से बचाते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 49 (7.1.49)

तथा तु सञ्जयं कर्णं कीर्तयन्तं पुनः पुनः । आशीविषवदुच्छ्वस्य धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥

tathā tu sañjayaṃ karṇaṃ kīrtayantaṃ punaḥ punaḥ | āśīviṣavaducchvasya dhṛtarāṣṭro'bravīdidam

इस प्रकार बार-बार कर्ण का बखान करते हुए सञ्जय से धृतराष्ट्र ने विषैले सर्प की तरह फुफकारकर यह कहा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 50 (7.1.50)

यत्तद्वैकर्तनं कर्णमगमद्वो मनस्तदा । अप्यरक्षत्स राधेयः सूतपुत्रस्तनुत्यजः ॥

yattadvaikartanaṃ karṇamagamadvo manastadā | apyarakṣatsa rādheyaḥ sūtaputrastanutyajaḥ

जब उस समय तुम्हारा मन वैकर्तन कर्ण की ओर गया, तब क्या प्राणों की परवाह न करने वाले उस राधा-पुत्र सूतपुत्र ने तुम्हारी रक्षा की?

श्लोक 51 (7.1.51)

अपि तन्न मृषाकार्षीत्कच्चित्सत्यपराक्रमः । सम्भ्रान्तानां तदार्तानां त्रस्तानां त्राणमिच्छतां ॥

api tanna mṛṣākārṣītkaccitsatyaparākramaḥ | sambhrāntānāṃ tadārtānāṃ trastānāṃ trāṇamicchatāṃ

क्या सत्य-पराक्रमी उस वीर ने घबराए हुए, पीड़ित, भयभीत और रक्षा चाहने वालों के प्रति कहीं चूक तो नहीं की?

श्लोक 52 (7.1.52)

अपि तत्पूरयांचक्रे धनुर्धरवरो युधि । यत्तद्विनिहते भीष्मे कौरवाणामपाकृतम् ॥

api tatpūrayāṃcakre dhanurdharavaro yudhi | yattadvinihate bhīṣme kauravāṇāmapākṛtam

भीष्म के मारे जाने पर कौरवों की जो क्षति हुई थी, क्या उस श्रेष्ठ धनुर्धर ने युद्ध में उसे पूरा किया?

श्लोक 53 (7.1.53)

तत्खण्डं पूरयन्कर्णः परेषामादधद्भयम् । स हि वै पुरुषव्याघ्रो लोके सञ्जय कथ्यते ॥

tatkhaṇḍaṃ pūrayankarṇaḥ pareṣāmādadhadbhayam | sa hi vai puruṣavyāghro loke sañjaya kathyate

क्या कर्ण ने उस कमी को पूरा किया और शत्रुओं में भय उत्पन्न किया? सञ्जय! लोक में तो वह पुरुषों में व्याघ्र कहा जाता है।

श्लोक 54 (7.1.54)

आर्तानां बान्धवानां च क्रन्दतां च विशेषतः । परित्यज्य रणे प्राणांस्तत्त्राणार्थं च शर्म च । कृतवान्मम पुत्राणां जयाशां सफलामपि ॥

ārtānāṃ bāndhavānāṃ ca krandatāṃ ca viśeṣataḥ | parityajya raṇe prāṇāṃstattrāṇārthaṃ ca śarma ca | kṛtavānmama putrāṇāṃ jayāśāṃ saphalāmapi

पीड़ित और विशेषकर रोते-बिलखते बन्धुओं की रक्षा और कल्याण के लिए रण में प्राण त्यागकर क्या उसने मेरे पुत्रों की विजय की आशा को सफल किया?

अध्याय-सूचीअध्याय 2