द्रोण पर्व · अध्याय 2
कर्ण का शस्त्र-सज्जा कर रणभूमि की ओर प्रस्थान
भीष्म के गिरने का समाचार पाकर कर्ण बिखरी हुई कुरु-सेना के पास पहुँचता है और रथियों के सामने घोषणा करता है कि वह युद्ध जारी रखेगा — या तो पाण्डवों को जीतेगा या भीष्म के पीछे मृत्यु को प्राप्त होगा। वह कवच, धनुष, ध्वज, घोड़े और रथ मँगवाता है, मित्र के पक्ष को कभी न छोड़ने का संकल्प दोहराता है और ठाठ से उस रणभूमि की ओर चल पड़ता है जहाँ भीष्म पड़े हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.2.1)
हतं भीष्ममथाधिरथिर्विदित्वा । भिन्नां नावं वारिधावत्यगाधे । सोदर्यवद्व्यसनात्सूतपुत्रः । संतारयिष्यंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ॥
hataṃ bhīṣmamathādhirathirviditvā | bhinnāṃ nāvaṃ vāridhāvatyagādhe | sodaryavadvyasanātsūtaputraḥ | saṃtārayiṣyaṃstava putrasya senām
भीष्म के मारे जाने का समाचार जानकर अधिरथ-पुत्र सूतपुत्र कर्ण — जो गहरे सागर में टूटी नाव के समान आपके पुत्र की सेना को, भाई की तरह, संकट से पार उतारना चाहता था —
श्लोक 2 (7.2.2)
श्रुत्वा तु कर्णः पुरुषेन्द्रमच्युतं । निपातितं शान्तनवं महारथम् । अथोपयायात्सहसारिकर्षणो । धनुर्धराणां प्रवरस्तदा नृप ॥
śrutvā tu karṇaḥ puruṣendramacyutaṃ | nipātitaṃ śāntanavaṃ mahāratham | athopayāyātsahasārikarṣaṇo | dhanurdharāṇāṃ pravarastadā nṛpa
पुरुषों के इन्द्र, अडिग महारथी शान्तनु-पुत्र के गिराए जाने का समाचार सुनकर, हे राजन्, शत्रुओं को सताने वाला वह श्रेष्ठ धनुर्धर शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 3 (7.2.3)
हते तु रथसत्तमे परैर्निमज्जतीं नावमिवार्णवे कुरून् । पितेव पुत्रांस्त्वरितोऽभ्ययात्ततः सन्तारयिष्यंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ॥
hate tu rathasattame parairnimajjatīṃ nāvamivārṇave kurūn | piteva putrāṃstvarito'bhyayāttataḥ santārayiṣyaṃstava putrasya senām
रथियों में श्रेष्ठ भीष्म के शत्रुओं द्वारा मारे जाने पर, समुद्र में डूबती नाव के समान डूबते कुरुओं की ओर, आपके पुत्र की सेना को पार उतारने की इच्छा से, वह पिता की भाँति पुत्रों के पास दौड़ा चला आया।
श्लोक 4 (7.2.4)
सम्मृज्य दिव्यं धनुराततज्यं स रामदत्तं रिपुसङ्घहन्ता । बाणांश्च कालानलवायुकल्पानुल्लालयन्वाक्यमिदं बभाषे ॥
sammṛjya divyaṃ dhanurātatajyaṃ sa rāmadattaṃ ripusaṅghahantā | bāṇāṃśca kālānalavāyukalpānullālayanvākyamidaṃ babhāṣe
परशुराम के दिए हुए अपने दिव्य धनुष को पोंछकर और उसकी प्रत्यंचा चढ़ाकर, कालाग्नि और वायु के समान भयंकर बाणों को घुमाते हुए उस शत्रु-समूह के संहारक ने ये वचन कहे।
कर्ण उवाच
श्लोक 5 (7.2.5)
यस्मिन्धृतिर्बुद्धिपराक्रमौजः सत्यं स्मृतिर्वीरगुणाश्च सर्वे । अस्त्राणि दिव्यान्यथ संनतिह्रीः प्रिया च वागनसूया च भीष्मे ॥
yasmindhṛtirbuddhiparākramaujaḥ satyaṃ smṛtirvīraguṇāśca sarve | astrāṇi divyānyatha saṃnatihrīḥ priyā ca vāganasūyā ca bhīṣme
जिन भीष्म में धैर्य, बुद्धि, पराक्रम और ओज, सत्य, स्मृति और वीरों के सब गुण हैं; दिव्य अस्त्र, विनय और लज्जा, मधुर वाणी और द्वेष का अभाव है —
श्लोक 6 (7.2.6)
सदा कृतज्ञे द्विजशत्रुघातके सनातनं चन्द्रमसीव लक्ष्मीः । स चेत्प्रशान्तः परवीरहन्ता मन्ये हतानेव च सर्ववीरान् ॥
sadā kṛtajñe dvijaśatrughātake sanātanaṃ candramasīva lakṣmīḥ | sa cetpraśāntaḥ paravīrahantā manye hatāneva ca sarvavīrān
सदा कृतज्ञ और ब्राह्मणों के शत्रुओं का संहार करने वाले उनमें ये गुण चन्द्रमा की कान्ति के समान सनातन रूप से रहते हैं। यदि शत्रु-वीरों का संहार करने वाले वे ही शान्त हो गए, तो मैं सभी वीरों को मरा हुआ ही मानता हूँ।
श्लोक 7 (7.2.7)
नेह ध्रुवं किञ्चन जातु विद्यते। लोके ह्यस्मिन्कर्मणोऽनित्ययोगात् । सूर्योदये को हि विमुक्तसङ्शयो भावं कुर्वीतार्यमहाव्रते हते ॥
neha dhruvaṃ kiñcana jātu vidyate | loke hyasminkarmaṇo'nityayogāt | sūryodaye ko hi vimuktasaṅśayo bhāvaṃ kurvītāryamahāvrate hate
इस लोक में कभी कुछ भी स्थिर नहीं है, क्योंकि कर्मों का सम्बन्ध अनित्यता से जुड़ा है। आर्य महाव्रत (भीष्म) के मारे जाने पर सूर्योदय के समय कौन संशयरहित होकर कोई निश्चय कर सकता है?
श्लोक 8 (7.2.8)
वसुप्रभावे वसुवीर्यसंभवे गते वसूनेव वसुंधराधिपे । वसूनि पुत्रांश्च वसुंधरां तथा कुरूंश्च शोचध्वमिमां च वाहिनीम् ॥
vasuprabhāve vasuvīryasaṃbhave gate vasūneva vasuṃdharādhipe | vasūni putrāṃśca vasuṃdharāṃ tathā kurūṃśca śocadhvamimāṃ ca vāhinīm
जो वसुओं के प्रभाव वाले और वसुओं के तेज से उत्पन्न थे, वे पृथ्वी के स्वामी जब वसुओं के पास ही चले गए, तब धन, पुत्रों, पृथ्वी, कुरुओं और इस सेना के लिए शोक करो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 9 (7.2.9)
महाप्रभावे वरदे निपातिते लोकेश्वरे शास्तरि चामितौजसि । पराजितेषु भरतेषु दुर्मनाः कर्णो भृशं न्यश्वसदश्रु वर्तयन् ॥
mahāprabhāve varade nipātite lokeśvare śāstari cāmitaujasi | parājiteṣu bharateṣu durmanāḥ karṇo bhṛśaṃ nyaśvasadaśru vartayan
महाप्रभावशाली, वर देने वाले, लोकेश्वर, शासक और अपार ओज वाले भीष्म के गिरा दिए जाने तथा भरतों के पराजित हो जाने पर उदास कर्ण आँसू बहाते हुए लम्बी साँसें लेने लगा।
श्लोक 10 (7.2.10)
इदं च राधेयवचो निशम्य सुताश्च राजंस्तव सैनिकाश्च ह । परस्परं चुक्रुशुरार्तिजं मुहुस्तदाश्रु नेत्रैर्मुमुचुश्च शब्दवत् ॥
idaṃ ca rādheyavaco niśamya sutāśca rājaṃstava sainikāśca ha | parasparaṃ cukruśurārtijaṃ muhustadāśru netrairmumucuśca śabdavat
राधा-पुत्र के ये वचन सुनकर, राजन्, आपके पुत्र और आपके सैनिक पीड़ा से बार-बार एक-दूसरे को पुकारते हुए चीख उठे और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
श्लोक 11 (7.2.11)
प्रवर्तमाने तु पुनर्महाहवे विगाह्यमानासु चमूषु पार्थिवैः । अथाब्रवीद्धर्षकरं तदा वचो रथर्षभान्सर्वमहारथर्षभः ॥
pravartamāne tu punarmahāhave vigāhyamānāsu camūṣu pārthivaiḥ | athābravīddharṣakaraṃ tadā vaco ratharṣabhānsarvamahāratharṣabhaḥ
महायुद्ध के फिर आरम्भ होने पर, जब राजाओं द्वारा सेनाओं में घुसपैठ की जा रही थी, तब समस्त महारथियों में श्रेष्ठ कर्ण ने श्रेष्ठ रथियों से उत्साह बढ़ाने वाले वचन कहे।
कर्ण उवाच
श्लोक 12 (7.2.12)
जगत्यनित्ये सततं प्रधावति प्रचिन्तयन्नस्थिरमद्य लक्षये । भवत्सु तिष्ठत्स्विह पातितो मृधे गिरिप्रकाशः कुरुपुङ्गवः कथम् ॥
jagatyanitye satataṃ pradhāvati pracintayannasthiramadya lakṣaye | bhavatsu tiṣṭhatsviha pātito mṛdhe giriprakāśaḥ kurupuṅgavaḥ katham
इस अनित्य जगत् में सब कुछ निरन्तर दौड़ता रहता है; आज विचार करने पर मैं इसे अस्थिर ही देखता हूँ। तुम सबके यहाँ रहते हुए भी पर्वत के समान तेजस्वी वह कुरुश्रेष्ठ युद्ध में कैसे गिरा दिया गया?
श्लोक 13 (7.2.13)
निपातिते शान्तनवे महारथे दिवाकरे भूतलमास्थिते यथा । न पार्थिवाः सोढुमलं धनंजयं गिरिप्रवोढारमिवानिलं द्रुमाः ॥
nipātite śāntanave mahārathe divākare bhūtalamāsthite yathā | na pārthivāḥ soḍhumalaṃ dhanaṃjayaṃ giripravoḍhāramivānilaṃ drumāḥ
शान्तनु-पुत्र महारथी के गिर जाने पर — मानो सूर्य ही पृथ्वी पर आ गया हो — राजा लोग अर्जुन का सामना नहीं कर सकते, जैसे पर्वतों को उखाड़ देने वाली वायु के आगे वृक्ष नहीं टिकते।
श्लोक 14 (7.2.14)
हतप्रधानं त्विदमार्तरूपं परैर्हतोत्साहमनाथमद्य वै । मया कुरूणां परिपाल्यमाहवे बलं यथा तेन महात्मना तथा ॥
hatapradhānaṃ tvidamārtarūpaṃ parairhatotsāhamanāthamadya vai | mayā kurūṇāṃ paripālyamāhave balaṃ yathā tena mahātmanā tathā
अपने प्रधान को खोकर दुःखी, शत्रुओं द्वारा उत्साह तोड़ दी गई यह सेना आज अनाथ है। कुरुओं की इस सेना की रण में मुझे वैसे ही रक्षा करनी है, जैसे उन महात्मा ने की थी।
श्लोक 15 (7.2.15)
समाहिते चात्मनि भारमीदृशं जगत्तथाऽनित्यमिदं च लक्षये । निपातितं चाहवशौण्डमाहवे कथं नु कुर्यामहमीदृशे भयम् ॥
samāhite cātmani bhāramīdṛśaṃ jagattathā'nityamidaṃ ca lakṣaye | nipātitaṃ cāhavaśauṇḍamāhave kathaṃ nu kuryāmahamīdṛśe bhayam
ऐसा भार मुझ पर आ पड़ा है, और मैं यह भी देखता हूँ कि यह जगत् अनित्य है। युद्ध के प्रेमी के युद्ध में गिर जाने पर ऐसे संग्राम में मैं कैसे भय करूँ?
श्लोक 16 (7.2.16)
अहं तु तान्कुरुवृषभानजिह्मगैः प्रवेशयन्यमसदनं चरन्रणे । यशः परं जगति विभाव्य वर्तिता परैर्हतो भुवि शयिताथवा पुनः ॥
ahaṃ tu tānkuruvṛṣabhānajihmagaiḥ praveśayanyamasadanaṃ caranraṇe | yaśaḥ paraṃ jagati vibhāvya vartitā parairhato bhuvi śayitāthavā punaḥ
मैं रण में विचरते हुए सीधे जाने वाले बाणों से उन कुरुवंशी वीरों (पाण्डवों) को यमलोक भेजूँगा; और या तो जगत् में परम यश पाकर जीवित रहूँगा, या शत्रुओं के हाथों मारा जाकर भूमि पर सो जाऊँगा।
श्लोक 17 (7.2.17)
युधिष्ठिरो धृतिमतिसत्यसत्ववान् वृकोदरो गजशततुल्यविक्रमः । तथार्जुनस्त्रिदशवरात्मजो युवा न तद्बलं सुजयमिहामरैरपि ॥
yudhiṣṭhiro dhṛtimatisatyasatvavān vṛkodaro gajaśatatulyavikramaḥ | tathārjunastridaśavarātmajo yuvā na tadbalaṃ sujayamihāmarairapi
धैर्यवान्, बुद्धिमान्, सत्यनिष्ठ और बलशाली युधिष्ठिर; सौ हाथियों के समान पराक्रम वाले भीम; और देवश्रेष्ठ के तरुण पुत्र अर्जुन — जिस सेना में हैं, उसे देवता भी आसानी से नहीं जीत सकते।
श्लोक 18 (7.2.18)
यमौ रणे यत्र यमोपमौ बले ससात्यकिर्यत्र च देवकीसुतः । न तद्बलं कापुरुषोऽभ्युपेयिवान्निवर्तते मृत्युमुखादिवासुभृत् ॥
yamau raṇe yatra yamopamau bale sasātyakiryatra ca devakīsutaḥ | na tadbalaṃ kāpuruṣo'bhyupeyivānnivartate mṛtyumukhādivāsubhṛt
जहाँ रण में यम के समान बलवान् दोनों जुड़वाँ भाई हैं, जहाँ सात्यकि के साथ देवकी-पुत्र हैं, उस सेना के पास जाने वाला कायर वहाँ से वैसे ही नहीं लौटता, जैसे मृत्यु के मुख से कोई प्राणी नहीं लौटता।
श्लोक 19 (7.2.19)
तपोऽभ्युदीर्णं तपसैव बाध्यते बलं बलेनैव तथा मनस्विभिः । मनश्च मे शत्रुनिवारणे ध्रुवं स्वरक्षणे चाचलवद्व्यवस्थितम् ॥
tapo'bhyudīrṇaṃ tapasaiva bādhyate balaṃ balenaiva tathā manasvibhiḥ | manaśca me śatrunivāraṇe dhruvaṃ svarakṣaṇe cācalavadvyavasthitam
उग्र तप तप से ही दबता है, बल बल से ही, और वैसे ही मनस्वी लोगों से भी; और मेरा मन शत्रु को रोकने तथा अपनों की रक्षा करने में पर्वत की भाँति अटल स्थिर है।
श्लोक 20 (7.2.20)
एवं चैषां बाधमानः प्रभावं गत्वैवाहं ताञ्जयाम्यद्य सूत । मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं भग्ने सैन्ये यः समेयात्स मित्रम् ॥
evaṃ caiṣāṃ bādhamānaḥ prabhāvaṃ gatvaivāhaṃ tāñjayāmyadya sūta | mitradroho marṣaṇīyo na me'yaṃ bhagne sainye yaḥ sameyātsa mitram
इस प्रकार उनके प्रभाव को दबाते हुए, हे सूत, मैं आज जाकर उन्हें जीतूँगा। मित्र के साथ यह द्रोह मैं नहीं सह सकता; सेना के टूट जाने पर जो साथ आकर खड़ा हो, वही मित्र है।
श्लोक 21 (7.2.21)
कर्तास्म्येतत्सत्पुरुषार्यकर्म त्यक्त्वा प्राणाननुयास्यामि भीष्मम् । सर्वान्सङ्ख्ये शत्रुसङ्घान्हनिष्ये हतस्तैर्वा वीरलोकं प्रपत्स्ये ॥
kartāsmyetatsatpuruṣāryakarma tyaktvā prāṇānanuyāsyāmi bhīṣmam | sarvānsaṅkhye śatrusaṅghānhaniṣye hatastairvā vīralokaṃ prapatsye
मैं यह सज्जन और आर्य पुरुष के योग्य कार्य करूँगा; प्राण त्यागकर भीष्म का अनुगमन करूँगा। या तो युद्ध में शत्रुओं के सब दलों को मार डालूँगा, या उनके हाथों मारा जाकर वीरलोक को जाऊँगा।
श्लोक 22 (7.2.22)
संप्राक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे पराहते पौरुषे धार्तराष्ट्रे । मया कृत्यमिति जानामि सूत तस्माद्राज्ञस्त्वद्य शत्रून्विजेष्ये ॥
saṃprākruṣṭe ruditastrīkumāre parāhate pauruṣe dhārtarāṣṭre | mayā kṛtyamiti jānāmi sūta tasmādrājñastvadya śatrūnvijeṣye
स्त्रियों और बच्चों के रोने-चिल्लाने और धृतराष्ट्र-पुत्रों के पौरुष के आहत हो जाने पर, हे सूत, मैं जानता हूँ कि यह कार्य मेरा है; इसलिए आज राजा के लिए मैं शत्रुओं को जीतूँगा।
श्लोक 23 (7.2.23)
कुरून्रक्षन्पाण्डुपुत्राञ्जिघांसंस्त्यक्त्वा प्राणान्घोररूपे रणेऽस्मिन् । सर्वान्सङ्ख्ये शत्रुसङ्घान्निहत्य दास्याम्यहं धार्तराष्ट्राय राज्यम् ॥
kurūnrakṣanpāṇḍuputrāñjighāṃsaṃstyaktvā prāṇānghorarūpe raṇe'smin | sarvānsaṅkhye śatrusaṅghānnihatya dāsyāmyahaṃ dhārtarāṣṭrāya rājyam
कुरुओं की रक्षा करता हुआ, पाण्डु-पुत्रों को मारने की इच्छा से, इस घोर रण में प्राणों की बाजी लगाकर और युद्ध में शत्रुओं के सब दलों को नष्ट करके मैं धृतराष्ट्र-पुत्र को राज्य दूँगा।
श्लोक 24 (7.2.24)
निबध्यतां मे कवचं विचित्रं हैमं शुभ्रं मणिरत्नावभासि । शिरस्त्राणं चार्कसमानभासं धनुः शरांश्चाग्निविषाहिकल्पान् ॥
nibadhyatāṃ me kavacaṃ vicitraṃ haimaṃ śubhraṃ maṇiratnāvabhāsi | śirastrāṇaṃ cārkasamānabhāsaṃ dhanuḥ śarāṃścāgniviṣāhikalpān
मेरा विचित्र, स्वर्णमय, उज्ज्वल और मणि-रत्नों से जगमगाता कवच मुझे पहनाओ; सूर्य के समान चमकता शिरस्त्राण, धनुष, और अग्नि तथा विषैले सर्पों के समान बाण लाओ।
श्लोक 25 (7.2.25)
उपासङ्गान्षोडश योजयन्तु धनूंषि दिव्यानि तथाऽऽहरन्तु । असींश्च शक्तीश्च गदाश्च गुर्वीः शङ्खं च जाम्बूनदचित्रनालम् ॥
upāsaṅgānṣoḍaśa yojayantu dhanūṃṣi divyāni tathā''harantu | asīṃśca śaktīśca gadāśca gurvīḥ śaṅkhaṃ ca jāmbūnadacitranālam
सोलह तरकश लगाए जाएँ, दिव्य धनुष भी लाए जाएँ; साथ ही तलवारें, शक्तियाँ, भारी गदाएँ और जाम्बूनद सोने से सजा शंख भी लाया जाए।
श्लोक 26 (7.2.26)
इमां रौक्मीं नागकक्ष्यां विचित्रां ध्वजं जैत्रं दिव्यमिन्दीवराङ्कम् । श्लक्ष्णैर्वस्त्रैर्विप्रमृज्यानयन्तु चित्रां मालां चारुबद्धां सलाजाम् ॥
imāṃ raukmīṃ nāgakakṣyāṃ vicitrāṃ dhvajaṃ jaitraṃ divyamindīvarāṅkam | ślakṣṇairvastrairvipramṛjyānayantu citrāṃ mālāṃ cārubaddhāṃ salājām
यह स्वर्णमयी, रंग-बिरंगी हाथी की रस्सी और नीलकमल के समान आभा वाला मेरा दिव्य विजय-ध्वज कोमल वस्त्रों से पोंछकर लाया जाए, और सुन्दर ढंग से गूँथी हुई, लाजों से युक्त विचित्र माला भी लाई जाए।
श्लोक 27 (7.2.27)
अश्वानग्र्यान्पाण्डुराभ्रप्रकाशान् पुष्टान्स्नातान्मन्त्रपूताभिरद्भिः । तप्तैर्भाण्डैः काञ्चनैरभ्युपेतान् शीघ्राञ्शीघ्रं सूतपुत्रानयस्व ॥
aśvānagryānpāṇḍurābhraprakāśān puṣṭānsnātānmantrapūtābhiradbhiḥ | taptairbhāṇḍaiḥ kāñcanairabhyupetān śīghrāñśīghraṃ sūtaputrānayasva
हे सूत! बादलों के समान श्वेत आभा वाले, पुष्ट, मन्त्र-पूत जल से नहलाए हुए और तपाए हुए सोने के साज से सजे श्रेष्ठ, तेज़ घोड़े शीघ्र ले आओ।
श्लोक 28 (7.2.28)
रथं चाग्र्यं हेममालावनद्धं रत्नैश्चित्रं सूर्यचन्द्रप्रकाशैः । द्रव्यैर्युक्तं सम्प्रहारोपपन्नैर्वाहैर्युक्तं तूर्णमावर्तयस्व ॥
rathaṃ cāgryaṃ hemamālāvanaddhaṃ ratnaiścitraṃ sūryacandraprakāśaiḥ | dravyairyuktaṃ samprahāropapannairvāhairyuktaṃ tūrṇamāvartayasva
और सोने की जाली से ढका, चन्द्र-सूर्य के समान चमकते रत्नों से विचित्र, युद्ध की सब सामग्री से युक्त और घोड़ों से जुता हुआ उत्तम रथ शीघ्र ले आओ।
श्लोक 29 (7.2.29)
चित्राणि चापानि च वेगवन्ति ज्याश्चोत्तमाः सन्नहनोपपन्नाः । तूणांश्च पूर्णान्महतः शराणामासाद्य गात्रावरणानि चैव ॥
citrāṇi cāpāni ca vegavanti jyāścottamāḥ sannahanopapannāḥ | tūṇāṃśca pūrṇānmahataḥ śarāṇāmāsādya gātrāvaraṇāni caiva
रंग-बिरंगे, वेगवान् धनुष, सुदृढ़ और उत्तम डोरियाँ, बहुत-से बाणों से भरे तरकश और शरीर के कवच भी इकट्ठे करो।
श्लोक 30 (7.2.30)
प्रायात्रिकं चानयताशु सर्वं पूर्णं कान्त्या वीरकांस्यां च हैमम् । आनीय मालामवबध्य चाङ्गे प्रवादयन्त्वाशु जयाय भेरीः ॥
prāyātrikaṃ cānayatāśu sarvaṃ pūrṇaṃ kāntyā vīrakāṃsyāṃ ca haimam | ānīya mālāmavabadhya cāṅge pravādayantvāśu jayāya bherīḥ
प्रस्थान की सारी सामग्री शीघ्र लाओ — कान्ति से भरा सुनहरा पात्र और वीर-कांस्य; माला लाकर मेरे शरीर पर बाँध दो, और विजय के लिए शीघ्र भेरियाँ बजवाओ।
श्लोक 31 (7.2.31)
प्रयाहि सूताशु यतः किरीटी वृकोदरो धर्मसुतो यमौ च । तान्वा हनिष्यामि समेत्य सङ्ख्ये भीष्मो यथैष्यामि हतो द्विषद्भिः ॥
prayāhi sūtāśu yataḥ kirīṭī vṛkodaro dharmasuto yamau ca | tānvā haniṣyāmi sametya saṅkhye bhīṣmo yathaiṣyāmi hato dviṣadbhiḥ
हे सूत! शीघ्र वहाँ चलो जहाँ किरीटधारी अर्जुन, भीम, धर्मपुत्र युधिष्ठिर और दोनों जुड़वाँ भाई हैं। या तो मैं युद्ध में उनसे भिड़कर उन्हें मार डालूँगा, या शत्रुओं के हाथों मारा जाकर भीष्म के मार्ग से जाऊँगा।
श्लोक 32 (7.2.32)
यस्मिन्राजा सत्यधृतिर्युधिष्ठिरः समास्थितो भीमसेनार्जुनौ च । वासुदेवः सात्यकिः सृंजयाश्च मन्ये बलं तदजय्यं महीपैः ॥
yasminrājā satyadhṛtiryudhiṣṭhiraḥ samāsthito bhīmasenārjunau ca | vāsudevaḥ sātyakiḥ sṛṃjayāśca manye balaṃ tadajayyaṃ mahīpaiḥ
जहाँ सत्य में दृढ़ राजा युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन, वासुदेव, सात्यकि और सृंजय स्थित हैं, उस सेना को मैं राजाओं के लिए अजेय मानता हूँ।
श्लोक 33 (7.2.33)
तं चेन्मृत्युः सर्वहरोऽभिरक्षेत्सदाऽप्रमत्तः समरे किरीटिनम् । तथापि हन्तास्मि समेत्य सङ्ख्ये यास्यामि वा भीष्ममुखो यमाय ॥
taṃ cenmṛtyuḥ sarvaharo'bhirakṣetsadā'pramattaḥ samare kirīṭinam | tathāpi hantāsmi sametya saṅkhye yāsyāmi vā bhīṣmamukho yamāya
यदि सर्वहारी मृत्यु भी सदा सावधान रहकर रण में उस किरीटधारी की रक्षा करे, तब भी मैं युद्ध में उससे भिड़कर उसे मारूँगा, या भीष्म को आगे करके यमलोक चला जाऊँगा।
श्लोक 34 (7.2.34)
न त्वेवाहं न गमिष्यामि तेषां मध्ये शराणां तत्र चाहं ब्रवीमि । मित्रद्रुहो दुर्बलभक्तयो ये पापात्मानो न ममैते सहायाः ॥
na tvevāhaṃ na gamiṣyāmi teṣāṃ madhye śarāṇāṃ tatra cāhaṃ bravīmi | mitradruho durbalabhaktayo ye pāpātmāno na mamaite sahāyāḥ
मैं उनके बाणों के बीच जाने से कभी पीछे नहीं हटूँगा; और वहाँ मैं यह कहता हूँ — जो मित्रों से द्रोह करते हैं, जिनकी भक्ति दुर्बल है, जो पापात्मा हैं, वे मेरे साथी नहीं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 35 (7.2.35)
समृद्धिमन्तं रथमुत्तमं दृढं सकूबरं हेमपरिष्कृतं शुभम् । पताकिनं वातजवैर्हयोत्तमैर्युक्तं समास्थाय ययौ जयाय ॥
samṛddhimantaṃ rathamuttamaṃ dṛḍhaṃ sakūbaraṃ hemapariṣkṛtaṃ śubham | patākinaṃ vātajavairhayottamairyuktaṃ samāsthāya yayau jayāya
वह समृद्ध, सुदृढ़, उत्तम कूबर वाले, सोने से सजे, सुन्दर, ध्वजा से युक्त और वायु के समान वेगवान् श्रेष्ठ घोड़ों से जुते अपने उत्तम रथ पर चढ़कर विजय के लिए चल पड़ा।
श्लोक 36 (7.2.36)
सम्पूज्यमानः कुरुभिर्महात्मा रथर्षभो देवगणैर्यथेन्द्रः । ययौ तदायोधनमुग्रधन्वा यत्रावसानं भरतर्षभस्य ॥
sampūjyamānaḥ kurubhirmahātmā ratharṣabho devagaṇairyathendraḥ | yayau tadāyodhanamugradhanvā yatrāvasānaṃ bharatarṣabhasya
कुरुओं से सम्मानित, महात्मा, रथियों में श्रेष्ठ वह उग्र धनुर्धर, देवगणों से घिरे इन्द्र के समान, उस रणभूमि की ओर गया जहाँ भरतश्रेष्ठ (भीष्म) का अन्त हुआ था।
श्लोक 37 (7.2.37)
वरूथिना महता सध्वजेन सुवर्णमुक्तामणिरत्नमालिना । सदश्वयुक्तेन रथेन कर्णो मेघस्वनेनार्क इवामितौजाः ॥
varūthinā mahatā sadhvajena suvarṇamuktāmaṇiratnamālinā | sadaśvayuktena rathena karṇo meghasvanenārka ivāmitaujāḥ
बड़े आवरण और ध्वज वाले, सोने, मोती, मणि और रत्नों की मालाओं से सजे, उत्तम घोड़ों से जुते, मेघ के समान गर्जने वाले रथ पर अपार तेज वाला कर्ण सूर्य के समान चमक उठा।
श्लोक 38 (7.2.38)
हुताशनाभः स हुताशनप्रभे शुभः शुभे वै स्वरथे धनुर्धरः । स्थितो रराजाधिरथिर्महारथः स्वयं विमाने सुरराडिवास्थितः ॥
hutāśanābhaḥ sa hutāśanaprabhe śubhaḥ śubhe vai svarathe dhanurdharaḥ | sthito rarājādhirathirmahārathaḥ svayaṃ vimāne surarāḍivāsthitaḥ
अग्नि के समान दीप्तिमान्, शोभायमान धनुर्धर, अग्नि की-सी प्रभा वाले अपने सुन्दर रथ पर खड़ा महारथी अधिरथ-पुत्र ऐसा शोभित हुआ मानो देवराज इन्द्र स्वयं अपने विमान में बैठे हों।