Skip to main content

द्रोण पर्व · अध्याय 3

शरशय्या पर पड़े भीष्म के पास कर्ण

शरशय्या पर पड़े भीष्म को देखकर कर्ण रथ से कूद पड़ता है और पैदल उनके पास जाकर अपना परिचय देता है तथा एक स्नेहभरी वाणी और दृष्टि की याचना करता है। वह भीष्म की बुद्धि को कौरवों का एकमात्र सहारा बताता है, गाण्डीव और कृष्ण के कारण फैलने वाले भय की भविष्यवाणी करता है, अर्जुन के दिव्य कर्मों का स्मरण करता है और भीष्म की अनुमति से उसे मारने का संकल्प व्यक्त करता है।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.3.1)

शरतल्पे महात्मानं शयानममितौजसम् । महावातसमूहेन समुद्रमिव शोषितम् ॥

śaratalpe mahātmānaṃ śayānamamitaujasam | mahāvātasamūhena samudramiva śoṣitam

शरशय्या पर पड़े हुए अपार तेज वाले महात्मा, जो प्रचण्ड वायुओं के समूह से सुखाए गए समुद्र के समान थे —

श्लोक 2 (7.3.2)

दृष्ट्वा पितामहं भीष्मं सर्वक्षत्रान्तकं गुरुम् । दिव्यैरस्त्रैर्महेष्वासं पातितं सव्यसाचिना । जयाशा तव पुत्राणां संभग्ना शर्म वर्म च ॥

dṛṣṭvā pitāmahaṃ bhīṣmaṃ sarvakṣatrāntakaṃ gurum | divyairastrairmaheṣvāsaṃ pātitaṃ savyasācinā | jayāśā tava putrāṇāṃ saṃbhagnā śarma varma ca

सब क्षत्रियों के संहारक, गुरु, महाधनुर्धर पितामह भीष्म को सव्यसाची के दिव्य अस्त्रों से गिरा हुआ देखकर आपके पुत्रों की विजय की आशा, उनका आश्रय और उनका कवच टूट गया।

श्लोक 3 (7.3.3)

अपाराणामिव द्वीपमगाधे गाधमिच्छताम् । स्रोतसा यामुनेनेव शरौघेण परिप्लुतम् ॥

apārāṇāmiva dvīpamagādhe gādhamicchatām | srotasā yāmuneneva śaraugheṇa pariplutam

जो उन लोगों के लिए द्वीप के समान थे जिनका कोई किनारा नहीं, और गहरे जल में थाह चाहने वालों के लिए थाह के समान, पर अब यमुना की धारा की तरह बाणों की बाढ़ में डूबे हुए थे —

श्लोक 4 (7.3.4)

महान्तमिव मैनाकमहार्यं भुवि पातितम् । नभश्च्युतमिवादित्यं शक्रस्येवामृतं हृतम् ॥

mahāntamiva mainākamahāryaṃ bhuvi pātitam | nabhaścyutamivādityaṃ śakrasyevāmṛtaṃ hṛtam

विशाल, अचल मैनाक पर्वत के समान भूमि पर गिरे हुए; आकाश से गिरे सूर्य के समान; और इन्द्र के हर लिए गए अमृत के समान —

श्लोक 5 (7.3.5)

शतक्रतुमिवाचिन्त्यं पुरा वृत्रेण निर्जितम् । मोहनं सर्वसैन्यस्य युधि भीष्मं निपातितम् ॥

śatakratumivācintyaṃ purā vṛtreṇa nirjitam | mohanaṃ sarvasainyasya yudhi bhīṣmaṃ nipātitam

अचिन्त्य, समस्त सेना को मोह में डालने वाला भीष्म का युद्ध में यह पतन ऐसा था, जैसे प्राचीन काल में वृत्र के द्वारा पराजित इन्द्र का —

श्लोक 6 (7.3.6)

ककुदं सर्वसैन्यानां लक्ष्म सर्वधनुष्मताम् । धनंजयशरैर्व्याप्तं पितरं ते महाव्रतम् ॥

kakudaṃ sarvasainyānāṃ lakṣma sarvadhanuṣmatām | dhanaṃjayaśarairvyāptaṃ pitaraṃ te mahāvratam

समस्त सेनाओं के शिखर, सब धनुर्धारियों के चिह्न, धनंजय के बाणों से बिंधे हुए आपके पिता महाव्रत भीष्म —

श्लोक 7 (7.3.7)

तं वीरशयने वीरं शयानं पुरुषर्षभम् । भीष्ममाधिरथिर्दृष्ट्वा भरतानां पितामहम् ॥

taṃ vīraśayane vīraṃ śayānaṃ puruṣarṣabham | bhīṣmamādhirathirdṛṣṭvā bharatānāṃ pitāmaham

उन वीर, पुरुषश्रेष्ठ, भरतों के पितामह भीष्म को वीर-शय्या पर लेटा हुआ देखकर अधिरथ-पुत्र कर्ण —

श्लोक 8 (7.3.8)

प्रस्कन्द्य स रथात्तूर्णं शोकमोहपरिप्लुतः । पद्भ्यामेव जगामार्तो बाष्पव्याकुललोचनः । अभिवाद्याञ्जलिं बद्ध्वा वन्दमानोऽभ्यभाषत ॥

praskandya sa rathāttūrṇaṃ śokamohapariplutaḥ | padbhyāmeva jagāmārto bāṣpavyākulalocanaḥ | abhivādyāñjaliṃ baddhvā vandamāno'bhyabhāṣata

शोक और मोह में डूबा हुआ रथ से तुरन्त कूद पड़ा और पीड़ित होकर, आँसुओं से भरी आँखों के साथ पैदल ही गया; और हाथ जोड़कर प्रणाम करके, वन्दना करते हुए बोला:

कर्ण उवाच

श्लोक 9 (7.3.9)

कर्णोऽहमस्मि भद्रं ते वद मामभि भारत । पुण्यया क्षेमया वाचा चक्षुषा चावलोकय ॥

karṇo'hamasmi bhadraṃ te vada māmabhi bhārata | puṇyayā kṣemayā vācā cakṣuṣā cāvalokaya

"मैं कर्ण हूँ — आपका कल्याण हो! हे भारत! मुझसे बोलिए; पुण्यमयी, कल्याणमयी वाणी और दृष्टि से मुझे देखिए।

श्लोक 10 (7.3.10)

न नूनं सुकृतस्येह फलं कश्चित्समश्नुते । यत्र धर्मपरो वृद्धः शेते भुवि भवानिह ॥

na nūnaṃ sukṛtasyeha phalaṃ kaścitsamaśnute | yatra dharmaparo vṛddhaḥ śete bhuvi bhavāniha

निश्चय ही इस लोक में कोई भी सत्कर्म का फल नहीं पाता, जब आप जैसे धर्मपरायण वृद्ध यहाँ भूमि पर पड़े हैं।

श्लोक 11 (7.3.11)

कोशसञ्चयने मन्त्रे व्यूहे प्रहरणेषु च । नाहमन्यं प्रपश्यामि कुरूणां कुरुपुङ्गव ॥

kośasañcayane mantre vyūhe praharaṇeṣu ca | nāhamanyaṃ prapaśyāmi kurūṇāṃ kurupuṅgava

हे कुरुश्रेष्ठ! कोश के संचय में, मन्त्रणा में, व्यूह-रचना में और शस्त्र-प्रयोग में कौरवों में आपके सिवा मैं किसी और को नहीं देखता।

श्लोक 12 (7.3.12)

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो यः कुरूंस्तारयेद्भयात् । योधांस्त्वमप्लवे हित्वा पितुलोकं गमिष्यसि ॥

buddhyā viśuddhayā yukto yaḥ kurūṃstārayedbhayāt | yodhāṃstvamaplave hitvā pitulokaṃ gamiṣyasi

शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर कुरुओं को भय से कौन पार उतारेगा? योद्धाओं को बिना नाव के छोड़कर आप पितृलोक चले जाएँगे।

श्लोक 13 (7.3.13)

अद्यप्रभृति सङ्क्रुद्धा व्याघ्रा इव मृगक्षयम् । पाण्डवा भरतश्रेष्ठ करिष्यन्ति कुरुक्षयम् ॥

adyaprabhṛti saṅkruddhā vyāghrā iva mṛgakṣayam | pāṇḍavā bharataśreṣṭha kariṣyanti kurukṣayam

हे भरतश्रेष्ठ! आज से क्रुद्ध पाण्डव मृगों पर टूटते बाघों की तरह कुरुओं का विनाश करेंगे।

श्लोक 14 (7.3.14)

अद्य गाण्डीवघोषेण वीर्यज्ञाः सव्यसाचिनः । कुरवः सन्त्रसिष्यन्ति वज्रघोषादिवासुराः ॥

adya gāṇḍīvaghoṣeṇa vīryajñāḥ savyasācinaḥ | kuravaḥ santrasiṣyanti vajraghoṣādivāsurāḥ

आज सव्यसाची के पराक्रम को जानने वाले कौरव गाण्डीव की टंकार से वैसे ही काँप उठेंगे, जैसे वज्र की गड़गड़ाहट से असुर काँपे थे।

श्लोक 15 (7.3.15)

अद्य गाण्डीवमुक्तानामशनीनामिव स्वनः । त्रासयिष्यति बाणानां कुरूनन्यांश्च पार्थिवान् ॥

adya gāṇḍīvamuktānāmaśanīnāmiva svanaḥ | trāsayiṣyati bāṇānāṃ kurūnanyāṃśca pārthivān

आज गाण्डीव से छूटे बाणों की गर्जना, वज्रों की गड़गड़ाहट की तरह, कौरवों और अन्य राजाओं को भयभीत करेगी।

श्लोक 16 (7.3.16)

समिद्धोऽग्निर्यथा वीर महाज्वालो द्रुमान्दहेत् । धार्तराष्ट्रान्प्रधक्ष्यन्ति तथा बाणाः किरीटिनः ॥

samiddho'gniryathā vīra mahājvālo drumāndahet | dhārtarāṣṭrānpradhakṣyanti tathā bāṇāḥ kirīṭinaḥ

हे वीर! जैसे प्रचण्ड ज्वालाओं वाली दहकती आग वृक्षों को जला दे, वैसे ही किरीटधारी अर्जुन के बाण धृतराष्ट्र के पुत्रों को जला डालेंगे।

श्लोक 17 (7.3.17)

येन येन प्रसरतो वाय्वग्नी सहितौ वने । तेन तेन प्रदहतो भूरिगुल्मतृणद्रुमान् ॥

yena yena prasarato vāyvagnī sahitau vane | tena tena pradahato bhūrigulmatṛṇadrumān

जहाँ-जहाँ वायु और अग्नि साथ मिलकर वन में फैलते हैं, वहाँ-वहाँ वे घनी झाड़ियों, घास और वृक्षों को जला डालते हैं।

श्लोक 18 (7.3.18)

यादृशोऽग्निः समुद्भूतस्तादृक्पार्थो न संशयः । यथा वायुर्नरव्याघ्र तथा कृष्णो न संशयः ॥

yādṛśo'gniḥ samudbhūtastādṛkpārtho na saṃśayaḥ | yathā vāyurnaravyāghra tathā kṛṣṇo na saṃśayaḥ

जैसी प्रज्वलित अग्नि होती है, वैसे ही पार्थ हैं, इसमें संशय नहीं; और हे नरव्याघ्र! जैसी वायु होती है, वैसे ही कृष्ण हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 19 (7.3.19)

नदतः पाञ्चजन्यस्य रसतो गाण्डिवस्य च । श्रुत्वा सर्वाणि सैन्यानि त्रासं यास्यन्ति भारत ॥

nadataḥ pāñcajanyasya rasato gāṇḍivasya ca | śrutvā sarvāṇi sainyāni trāsaṃ yāsyanti bhārata

पाञ्चजन्य की गर्जना और गाण्डीव की टंकार सुनकर, हे भारत! सारी सेनाएँ भय से काँप उठेंगी।

श्लोक 20 (7.3.20)

कपिध्वजस्योत्पततो रथस्यामित्रकर्शिनः । शब्दं सोढुं न शक्ष्यन्ति त्वामृते वीर पार्थिवाः ॥

kapidhvajasyotpatato rathasyāmitrakarśinaḥ | śabdaṃ soḍhuṃ na śakṣyanti tvāmṛte vīra pārthivāḥ

जब शत्रुओं के संहारक अर्जुन का कपिध्वज रथ उछलकर आगे बढ़ेगा, तब हे वीर! आपके सिवा कोई राजा उसका शब्द सहन नहीं कर सकेगा।

श्लोक 21 (7.3.21)

को ह्यर्जुनं योधयितुं त्वदन्यः पार्थिवोऽर्हति । यस्य दिव्यानि कर्माणि प्रवदन्ति मनीषिणः ॥

ko hyarjunaṃ yodhayituṃ tvadanyaḥ pārthivo'rhati | yasya divyāni karmāṇi pravadanti manīṣiṇaḥ

आपके सिवा दूसरा कौन राजा अर्जुन से युद्ध करने योग्य है, जिसके दिव्य कर्मों का ज्ञानी लोग वर्णन करते हैं?

श्लोक 22 (7.3.22)

अमानुषैश्च संग्रामं त्र्यम्बकेण महात्मना । तस्माच्चैव वरं प्राप्तो दुष्प्रापश्चाकृतात्मभिः ॥

amānuṣaiśca saṃgrāmaṃ tryambakeṇa mahātmanā | tasmāccaiva varaṃ prāpto duṣprāpaścākṛtātmabhiḥ

उसने अमानवीय प्राणियों से और महात्मा त्र्यम्बक (शिव) से भी युद्ध किया और उनसे वह वरदान पाया, जो असंस्कृत आत्मा वालों के लिए दुर्लभ है।

श्लोक 23 (7.3.23)

कोऽन्यः शक्तो रणे जेतुं पूर्वं यो न जितस्त्वया । जितो येन रणे रामो भवता वीर्यशालिना ॥

ko'nyaḥ śakto raṇe jetuṃ pūrvaṃ yo na jitastvayā | jito yena raṇe rāmo bhavatā vīryaśālinā

रण में उसे और कौन जीत सकता है, जिसे पहले आपने नहीं जीता था? आप वही पराक्रमी हैं, जिनके द्वारा रण में परशुराम जीते गए थे।

श्लोक 24 (7.3.24)

क्षत्रियान्तकरो घोरो देवदानवदर्पहा । सोऽप्यद्याभिहतः शेते शरैः प्रोतः शिखण्डिना ॥

kṣatriyāntakaro ghoro devadānavadarpahā | so'pyadyābhihataḥ śete śaraiḥ protaḥ śikhaṇḍinā

क्षत्रियों का संहार करने वाले, भयंकर, देव-दानवों का दर्प चूर करने वाले वे ही आज शिखण्डी के बाणों से बिंधकर, घायल होकर पड़े हैं।

श्लोक 25 (7.3.25)

तमद्याहं पाण्डवं युद्धशौण्डममृष्यमाणो भवता चानुशिष्टः । आशीविषं दृष्टिहरं सुघोरं शूरं शक्ष्याम्यस्त्रबलान्निहन्तुम् ॥

tamadyāhaṃ pāṇḍavaṃ yuddhaśauṇḍamamṛṣyamāṇo bhavatā cānuśiṣṭaḥ | āśīviṣaṃ dṛṣṭiharaṃ sughoraṃ śūraṃ śakṣyāmyastrabalānnihantum

उसे सहन न करता हुआ और आपके आदेश से युक्त होकर आज मैं उस पाण्डव को, जो युद्ध में मतवाला है, दृष्टि हर लेने वाला विषैला सर्प है और अत्यन्त भयंकर शूर है, अपने अस्त्र-बल से मार सकूँगा।"

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4