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द्रोण पर्व · अध्याय 4

भीष्म द्वारा कर्ण को कौरवों का नेतृत्व सौंपना

कर्ण के वचनों से प्रसन्न होकर भीष्म उसे मित्रों का आधार बताते हैं और दुर्योधन के लिए उसके द्वारा जीते गए काम्भोज, गान्धार, किरात तथा अन्य अनेक जनों का स्मरण कराते हैं। वे कर्ण को आशीर्वाद देकर कहते हैं कि वह दुर्योधन की तरह कुरु-सेना की रक्षा करे और पाण्डवों से पूरे मन से युद्ध करे। कर्ण उनके चरणों में प्रणाम करके रणभूमि में जाता है, सेना का व्यूह दृढ़ करता है और कौरव हुँकारों तथा धनुष की टंकारों से उसका स्वागत करते हैं।

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.4.1)

तस्य लालप्यमानस्य कुरुवृद्धः पितामहः । देशकालोचितं वाक्यमब्रवीत्प्रीतमानसः ॥

tasya lālapyamānasya kuruvṛddhaḥ pitāmahaḥ | deśakālocitaṃ vākyamabravītprītamānasaḥ

उसके इस प्रकार करुण वचन कहने पर कुरुओं के वृद्ध पितामह ने प्रसन्न मन से, देश और काल के अनुकूल वचन कहे।

भीष्म उवाच

श्लोक 2 (7.4.2)

समुद्र इव सिन्धूनां ज्योतिषामिव भास्करः । सत्यस्य च यथा सन्तो बीजानामिव चोर्वरा ॥

samudra iva sindhūnāṃ jyotiṣāmiva bhāskaraḥ | satyasya ca yathā santo bījānāmiva corvarā

जैसे नदियों के लिए समुद्र है, ज्योतियों में सूर्य है, सत्य के लिए सज्जन हैं और बीजों के लिए उपजाऊ भूमि है,

श्लोक 3 (7.4.3)

पर्जन्य इव भूतानां प्रतिष्ठा सुहृदां भवान् । बान्धवास्त्वाऽनुजीवन्तु स्वादुवृक्षमिवाण्डजाः ॥

parjanya iva bhūtānāṃ pratiṣṭhā suhṛdāṃ bhavān | bāndhavāstvā'nujīvantu svāduvṛkṣamivāṇḍajāḥ

जैसे मेघ प्राणियों का आधार है, वैसे ही तुम अपने मित्रों के आधार हो; तुम्हारे बन्धु तुम्हारे सहारे वैसे ही जीवित रहें, जैसे मीठे फलों वाले वृक्ष के सहारे पक्षी रहते हैं।

श्लोक 4 (7.4.4)

मानहा भव शत्रूणां मित्राणां नन्दिवर्धनः । कौरवाणां भव गतिर्यथा विष्णुर्दिवौकसाम् ॥

mānahā bhava śatrūṇāṃ mitrāṇāṃ nandivardhanaḥ | kauravāṇāṃ bhava gatiryathā viṣṇurdivaukasām

शत्रुओं के अभिमान का नाश करने वाले और मित्रों का आनन्द बढ़ाने वाले बनो; कौरवों के आश्रय बनो, जैसे विष्णु देवताओं के आश्रय हैं।

श्लोक 5 (7.4.5)

स्वबाहुबलवीर्येण धार्तराष्ट्रप्रियैषिणा । कर्ण राजपुरं गत्वा काम्भोजा निर्जितास्त्वया ॥

svabāhubalavīryeṇa dhārtarāṣṭrapriyaiṣiṇā | karṇa rājapuraṃ gatvā kāmbhojā nirjitāstvayā

कर्ण! धृतराष्ट्र-पुत्र का हित चाहते हुए तुम अपनी भुजाओं के बल और वीर्य से राजपुर जाकर काम्भोजों को जीत चुके हो।

श्लोक 6 (7.4.6)

गिरिव्रजगताश्चापि नग्नजित्प्रमुखा नृपाः । अम्बष्ठाश्च विदेहाश्च गान्धाराश्च जितास्त्वया ॥

girivrajagatāścāpi nagnajitpramukhā nṛpāḥ | ambaṣṭhāśca videhāśca gāndhārāśca jitāstvayā

गिरिव्रज गए हुए नग्नजित् आदि राजाओं को, तथा अम्बष्ठों, विदेहों और गान्धारों को भी तुमने जीता।

श्लोक 7 (7.4.7)

हिमवद्दुर्गनिलयाः किराता रणकर्कशाः । दुर्योधनस्य वशगास्त्वया कर्ण पुरा कृताः ॥

himavaddurganilayāḥ kirātā raṇakarkaśāḥ | duryodhanasya vaśagāstvayā karṇa purā kṛtāḥ

हिमालय के दुर्गम स्थानों में बसने वाले, युद्ध में कठोर किरातों को तुमने, कर्ण, बहुत पहले दुर्योधन के अधीन कर दिया था।

श्लोक 8 (7.4.8)

उत्कला मेकलाः पौण्ड्राः कलिङ्गान्ध्राश्च संयुगे । निषादाश्च त्रिगर्ताश्च बाह्लीकाश्च जितास्त्वया ॥

utkalā mekalāḥ pauṇḍrāḥ kaliṅgāndhrāśca saṃyuge | niṣādāśca trigartāśca bāhlīkāśca jitāstvayā

उत्कल, मेकल, पौण्ड्र, कलिंग, आन्ध्र, निषाद, त्रिगर्त और बाह्लीक — इन सबको तुमने युद्ध में जीता।

श्लोक 9 (7.4.9)

तत्रतत्र च संग्रामे दुर्योधनहितैषिणा । बहवश्च जिताः कर्ण त्वया वीरा महौजसा ॥

tatratatra ca saṃgrāme duryodhanahitaiṣiṇā | bahavaśca jitāḥ karṇa tvayā vīrā mahaujasā

और स्थान-स्थान के संग्रामों में, कर्ण, दुर्योधन का हित चाहते हुए तुमने महान् ओज से बहुत-से वीरों को जीता।

श्लोक 10 (7.4.10)

यथा दुर्योधनस्तात सज्ञातिकुलबान्धवः । तथा त्वमपि सर्वेषां कौरवाणां गतिर्भव ॥

yathā duryodhanastāta sajñātikulabāndhavaḥ | tathā tvamapi sarveṣāṃ kauravāṇāṃ gatirbhava

वत्स! जैसे जाति-बन्धुओं, कुल और सम्बन्धियों सहित दुर्योधन सबका आश्रय है, वैसे ही तुम भी सब कौरवों के आश्रय बनो।

श्लोक 11 (7.4.11)

शिवेनाभिवदामि त्वां गच्छ युध्यस्व शत्रुभिः । अनुशास्य कुरून्सर्वान्धत्स्व दुर्योधने जयम् ॥

śivenābhivadāmi tvāṃ gaccha yudhyasva śatrubhiḥ | anuśāsya kurūnsarvāndhatsva duryodhane jayam

मैं कल्याण की कामना से तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ: जाओ, शत्रुओं से युद्ध करो। सब कौरवों को निर्देश देकर दुर्योधन को विजय दिलाओ।

श्लोक 12 (7.4.12)

भवान्पौत्रसमोऽस्माकं यथा दुर्योधनस्तथा । तवापि धर्मतः सर्वे यथा तस्य वयं तथा ॥

bhavānpautrasamo'smākaṃ yathā duryodhanastathā | tavāpi dharmataḥ sarve yathā tasya vayaṃ tathā

तुम हमारे लिए पौत्र के समान हो, जैसे दुर्योधन है; और धर्म की दृष्टि से हम सब जैसे उसके हैं, वैसे ही तुम्हारे भी हैं।

श्लोक 13 (7.4.13)

यौनात्सम्बन्धकाल्लोके विशिष्टं सङ्गतं सताम् । सद्भिः सङ्गममिच्छन्ति तस्मात्प्राज्ञाः परैरपि ॥

yaunātsambandhakālloke viśiṣṭaṃ saṅgataṃ satām | sadbhiḥ saṅgamamicchanti tasmātprājñāḥ parairapi

लोक में सज्जनों का संग जन्म या विवाह के सम्बन्ध से भी श्रेष्ठ माना गया है; इसीलिए बुद्धिमान् लोग पराए लोगों में भी सज्जनों का संग चाहते हैं।

श्लोक 14 (7.4.14)

स सत्यसङ्गरो भूत्वा ममेदमिति निश्चितः । कुरूणां पालय बलं यथा दुर्योधनस्तथा ॥

sa satyasaṅgaro bhūtvā mamedamiti niścitaḥ | kurūṇāṃ pālaya balaṃ yathā duryodhanastathā

अपनी प्रतिज्ञा के सच्चे होकर, "यह मेरा ही है" ऐसा दृढ़ निश्चय करके, दुर्योधन की ही भाँति कुरुओं की सेना की रक्षा करो।

श्लोक 15 (7.4.15)

यथा च कुरवो युद्धे योधयन्ति स्म पाण्डवान् । तथा कर्ण त्वया कार्यं दुर्योधनहितैषिणा ॥

yathā ca kuravo yuddhe yodhayanti sma pāṇḍavān | tathā karṇa tvayā kāryaṃ duryodhanahitaiṣiṇā

और जैसे कौरव युद्ध में पाण्डवों से लड़ते आए हैं, कर्ण, वैसे ही तुम्हें भी दुर्योधन का हित चाहते हुए करना चाहिए।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 16 (7.4.16)

निशम्य वचनं तस्य चरणावभिवाद्य च । ययौ वैकर्तनः कर्णस्तूर्णमायोधनं प्रति ॥

niśamya vacanaṃ tasya caraṇāvabhivādya ca | yayau vaikartanaḥ karṇastūrṇamāyodhanaṃ prati

उनके वचन सुनकर और उनके चरणों में प्रणाम करके वैकर्तन कर्ण शीघ्र ही रणभूमि की ओर चल पड़ा।

श्लोक 17 (7.4.17)

सोऽभिवीक्ष्य नरौघाणां स्थानमप्रतिमं महत् । व्यूढप्रहरणोरस्कं सैन्यं तत्समबृंहयत् ॥

so'bhivīkṣya naraughāṇāṃ sthānamapratimaṃ mahat | vyūḍhapraharaṇoraskaṃ sainyaṃ tatsamabṛṃhayat

उसने नर-समूहों के उस विशाल, अनुपम स्थान को देखा, और जिसके शस्त्र तने हुए और अग्रभाग व्यूह-बद्ध था, उस सेना को और दृढ़ कर दिया।

श्लोक 18 (7.4.18)

हृषिताः कुरवः सर्वे दुर्योधनपुरोगमाः । उपागतं महाबाहुं सर्वानीकपुरःसरम् ॥

hṛṣitāḥ kuravaḥ sarve duryodhanapurogamāḥ | upāgataṃ mahābāhuṃ sarvānīkapuraḥsaram

दुर्योधन के नेतृत्व में सब कौरव सभी सेना-दलों के आगे चलने वाले उस महाबाहु के आगमन से हर्षित हो उठे।

श्लोक 19 (7.4.19)

कर्णं दृष्ट्वा महात्मानं युद्धाय समुपस्थितम् । क्ष्वेडितास्फोटितरवैः सिंहनादरवैरपि । धनुःशब्दैश्च विविधैः कुरवः समपूजयन् ॥

karṇaṃ dṛṣṭvā mahātmānaṃ yuddhāya samupasthitam | kṣveḍitāsphoṭitaravaiḥ siṃhanādaravairapi | dhanuḥśabdaiśca vividhaiḥ kuravaḥ samapūjayan

महात्मा कर्ण को युद्ध के लिए आया देखकर कौरवों ने हुँकारों, भुजाओं की थपथपाहट, सिंहनादों और धनुषों की नाना प्रकार की टंकारों से उसका सम्मान किया।

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