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द्रोण पर्व · अध्याय 106

द्रोण का युधिष्ठिर को परास्त करना

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि अर्जुन जब जयद्रथ की ओर बढ़ रहा था, तब द्रोण के चारों ओर पाञ्चालों और कुरुओं ने क्या किया। सञ्जय अपराह्न के युद्ध का वर्णन करते हैं: योद्धा जोड़ों में भिड़ते हैं, जैसे बृहत्क्षत्र और क्षेमधूर्ति, धृष्टकेतु और वीरधन्वा, विकर्ण और नकुल, दुर्मुख और सहदेव। द्रोण और युधिष्ठिर का बाणों का द्वन्द्व होता है। द्रोण राजा का धनुष काट देते हैं, उसे बाणों की वर्षा में छिपा देते हैं, ब्रह्मास्त्र से उसकी शक्ति को भस्म कर देते हैं और फिर उसके घोड़े मार डालते हैं। निहत्थे युधिष्ठिर रथ से कूद पड़ते हैं, पाण्डवों की सेना चिल्ला उठती है कि राजा को पकड़ लिया गया, और वे सहदेव के रथ पर चढ़कर निकल जाते हैं।

अध्याय 105अध्याय-सूचीअध्याय 107

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.106.1)

अर्जुने सैन्धवं प्राप्ते भारद्वाजेन संवृताः । पाञ्चालाः कुरुभिः सार्धं किमकुर्वत सञ्जय ॥

arjune saindhavaṃ prāpte bhāradvājena saṃvṛtāḥ | pāñcālāḥ kurubhiḥ sārdhaṃ kimakurvata sañjaya

"सञ्जय! जब अर्जुन सैन्धव (जयद्रथ) के पास पहुँच गया और भरद्वाज के पुत्र द्रोण ने कुरुओं सहित पाञ्चालों को घेर लिया, तब उन्होंने क्या किया?"

सञ्जय उवाच

श्लोक 2 (7.106.2)

अपराह्णे महाराज सङ्ग्रामे रोमहर्षणे । पाञ्चालानां कुरूणां च द्रोणद्यूतमवर्तत ॥

aparāhṇe mahārāja saṅgrāme romaharṣaṇe | pāñcālānāṃ kurūṇāṃ ca droṇadyūtamavartata

हे महाराज! अपराह्न में रोंगटे खड़े कर देने वाले उस युद्ध में पाञ्चालों और कुरुओं के बीच द्रोण को दाँव पर रखकर जुए का-सा खेल चल पड़ा।

श्लोक 3 (7.106.3)

पाञ्चाला हि जिघांसन्तो द्रोणं संहृष्टचेतसः । अभ्यमुञ्चन्त गर्जन्तः शरवर्षाणि मारिष ॥

pāñcālā hi jighāṃsanto droṇaṃ saṃhṛṣṭacetasaḥ | abhyamuñcanta garjantaḥ śaravarṣāṇi māriṣa

द्रोण को मार डालने की इच्छा वाले पाञ्चाल प्रसन्न मन से गरजते हुए बाणों की वर्षा करने लगे, हे माननीय।

श्लोक 4 (7.106.4)

ततस्तु तुमुलस्तेषां सङ्ग्रामोऽवर्तताद्भुतः । पाञ्चालानां कुरूणां च घोरो देवासुरोपमः ॥

tatastu tumulasteṣāṃ saṅgrāmo'vartatādbhutaḥ | pāñcālānāṃ kurūṇāṃ ca ghoro devāsuropamaḥ

तब पाञ्चालों और कुरुओं के बीच देवासुर-संग्राम जैसा भयंकर, तुमुल और अद्भुत युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 5 (7.106.5)

सर्वे द्रोणरथं प्राप्य पाञ्चालाः पाण्डवैः सह । तदनीकं बिभित्सन्तो महास्त्राणि व्यदर्शयन् ॥

sarve droṇarathaṃ prāpya pāñcālāḥ pāṇḍavaiḥ saha | tadanīkaṃ bibhitsanto mahāstrāṇi vyadarśayan

सब पाञ्चालों ने पाण्डवों के साथ द्रोण के रथ के पास पहुँचकर उसकी सेना को तोड़ने की इच्छा से अपने बड़े-बड़े अस्त्र दिखाए।

श्लोक 6 (7.106.6)

द्रोणस्य रथपर्यन्तं रथिनो रथमास्थिताः । कम्पयन्तोऽभ्यवर्तन्त वेगमास्थाय मध्यमम् ॥

droṇasya rathaparyantaṃ rathino rathamāsthitāḥ | kampayanto'bhyavartanta vegamāsthāya madhyamam

द्रोण के रथ के चारों ओर अपने रथों में स्थित रथी पृथ्वी को कँपाते हुए मध्यम वेग से उन पर टूट पड़े।

श्लोक 7 (7.106.7)

तमभ्ययाद्बृहत्क्षत्रः केकयानां महारथः । विमुञ्चन्निशितान्बाणान्महेन्द्राशनिसन्निभान् ॥

tamabhyayādbṛhatkṣatraḥ kekayānāṃ mahārathaḥ | vimuñcanniśitānbāṇānmahendrāśanisannibhān

केकयों के महारथी बृहत्क्षत्र महेन्द्र के वज्र जैसे तीखे बाण छोड़ता हुआ उनकी ओर बढ़ा।

श्लोक 8 (7.106.8)

तं तु प्रत्युद्ययौ शीघ्रं क्षेमधूर्तिर्महायशाः । विमुञ्चन्निशितान्बाणाञ्शतशोऽथ सहस्रशः ॥

taṃ tu pratyudyayau śīghraṃ kṣemadhūrtirmahāyaśāḥ | vimuñcanniśitānbāṇāñśataśo'tha sahasraśaḥ

महायशस्वी क्षेमधूर्ति सैकड़ों और हजारों तीखे बाण छोड़ता हुआ शीघ्र ही उसके सामने आ गया।

श्लोक 9 (7.106.9)

धृष्टकेतुश्च चेदीनामृषभोऽतिबलोदितः । त्वरितोऽभ्यद्रवद्द्रोणं महेन्द्रमिव शम्बरः ॥

dhṛṣṭaketuśca cedīnāmṛṣabho'tibaloditaḥ | tvarito'bhyadravaddroṇaṃ mahendramiva śambaraḥ

और चेदियों के वृषभ धृष्टकेतु ने अत्यन्त बल से भरकर शीघ्रता से द्रोण पर आक्रमण किया, जैसे महेन्द्र ने शम्बर पर किया था।

श्लोक 10 (7.106.10)

तमापतन्तं सहसा व्यादितास्यमिवान्तकम् । वीरधन्वा महेष्वासस्त्वरमाणः समभ्ययात् ॥

tamāpatantaṃ sahasā vyāditāsyamivāntakam | vīradhanvā maheṣvāsastvaramāṇaḥ samabhyayāt

जब वह मुँह फैलाए काल की भाँति सहसा द्रोण पर झपटा, तब महाधनुर्धर वीरधन्वा शीघ्रता से उसके सामने आ गया।

श्लोक 11 (7.106.11)

युधिष्ठिरं महाराजं जिगीषुं समवस्थितम् । सहानीकं ततो द्रोणो न्यवारयत वीर्यवान् ॥

yudhiṣṭhiraṃ mahārājaṃ jigīṣuṃ samavasthitam | sahānīkaṃ tato droṇo nyavārayata vīryavān

तब पराक्रमी द्रोण ने विजय की इच्छा से डटे हुए महाराज युधिष्ठिर को उनकी सेना सहित रोक दिया।

श्लोक 12 (7.106.12)

नकुलं कुशलं युद्धे पराक्रान्तं पराक्रमी । अभ्यगच्छत्समायान्तं विकर्णस्ते सुतः प्रभो ॥

nakulaṃ kuśalaṃ yuddhe parākrāntaṃ parākramī | abhyagacchatsamāyāntaṃ vikarṇaste sutaḥ prabho

हे प्रभो! आपका पुत्र विकर्ण, पराक्रमी होकर, युद्ध में कुशल और पराक्रमी नकुल के आते ही उसके सामने गया।

श्लोक 13 (7.106.13)

सहदेवं तथाऽऽयान्तं दुर्मुखः शत्रुकर्शनः । शरैरनेकसाहस्रैः समवाकिरदाशुगैः ॥

sahadevaṃ tathā''yāntaṃ durmukhaḥ śatrukarśanaḥ | śarairanekasāhasraiḥ samavākiradāśugaiḥ

शत्रुओं को सताने वाले दुर्मुख ने उसी प्रकार आते हुए सहदेव पर कई हजार शीघ्रगामी बाणों की वर्षा की।

श्लोक 14 (7.106.14)

सात्यकिं तु नरव्याघ्रं व्याघ्रदत्तस्त्ववारयत् । शरैः सुनिशितैस्तीक्ष्णैः कम्पयन्वै मुहुर्मुहुः ॥

sātyakiṃ tu naravyāghraṃ vyāghradattastvavārayat | śaraiḥ suniśitaistīkṣṇaiḥ kampayanvai muhurmuhuḥ

व्याघ्रदत्त ने नरव्याघ्र सात्यकि को अत्यन्त तीखे बाणों से बार-बार कँपाते हुए रोक दिया।

श्लोक 15 (7.106.15)

द्रौपदेयान्नरव्याघ्रान्मुञ्चतः सायकोत्तमान् । संरब्धान्रथिनः श्रेष्ठान्सौमदत्तिरवारयत् ॥

draupadeyānnaravyāghrānmuñcataḥ sāyakottamān | saṃrabdhānrathinaḥ śreṣṭhānsaumadattiravārayat

सौमदत्ति ने द्रौपदी के पुत्रों को रोक दिया, जो नरव्याघ्र और रथियों में श्रेष्ठ थे और क्रोध में भरकर उत्तम बाण छोड़ रहे थे।

श्लोक 16 (7.106.16)

भीमसेनं तदा क्रुद्धं भीमरूपो भयानकः । प्रत्यवारयदायान्तमार्ष्यशृङ्गिर्महाबलः ॥

bhīmasenaṃ tadā kruddhaṃ bhīmarūpo bhayānakaḥ | pratyavārayadāyāntamārṣyaśṛṅgirmahābalaḥ

तब क्रोधित भीमसेन को आते देख भयंकर रूप वाले, भयानक और महाबली आर्ष्यशृङ्गि (ऋष्यशृङ्ग के पुत्र) ने रोक लिया।

श्लोक 17 (7.106.17)

तयोः समभवद्युद्धं नरराक्षसयोर्मृधे । यादृगेव पुरावृत्तं रामरावणयोर्नृप ॥

tayoḥ samabhavadyuddhaṃ nararākṣasayormṛdhe | yādṛgeva purāvṛttaṃ rāmarāvaṇayornṛpa

हे राजन्! उन दोनों, मनुष्य और राक्षस, के बीच वैसा ही युद्ध हुआ जैसा प्राचीन काल में राम और रावण के बीच हुआ था।

श्लोक 18 (7.106.18)

ततो युधिष्ठिरो द्रोणं नवत्या नतपर्वणाम् । आजघ्ने भरतश्रेष्ठः सर्वमर्मसु भारत ॥

tato yudhiṣṭhiro droṇaṃ navatyā nataparvaṇām | ājaghne bharataśreṣṭhaḥ sarvamarmasu bhārata

तब भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने, हे भारत, द्रोण के सब मर्मस्थानों में नब्बे सीधी गाँठ वाले बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 19 (7.106.19)

तं द्रोणः पञ्चविंशत्या निजघान स्तनान्तरे । रोषितो भरतश्रेष्ठ कौन्तेयेन यशस्विना ॥

taṃ droṇaḥ pañcaviṃśatyā nijaghāna stanāntare | roṣito bharataśreṣṭha kaunteyena yaśasvinā

यशस्वी कुन्तीपुत्र से क्रुद्ध हुए द्रोण ने, हे भरतश्रेष्ठ, उसकी छाती के बीच में पच्चीस बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 20 (7.106.20)

अदृश्यं समरे चक्रे राजानं सायकोत्तमैः । साश्वसूतध्वजं द्रोणः पश्यतां सर्वधन्विनाम् ॥

adṛśyaṃ samare cakre rājānaṃ sāyakottamaiḥ | sāśvasūtadhvajaṃ droṇaḥ paśyatāṃ sarvadhanvinām

द्रोण ने सब धनुर्धरों के देखते-देखते उत्तम बाणों से राजा को घोड़ों, सारथि और ध्वज सहित युद्ध में अदृश्य कर दिया।

श्लोक 21 (7.106.21)

ताञ्शरान्द्रोणमुक्तांस्तु शरवर्षेण पाण्डवः । अवारयत धर्मात्मा दर्शयन्पाणिलाघवम् ॥

tāñśarāndroṇamuktāṃstu śaravarṣeṇa pāṇḍavaḥ | avārayata dharmātmā darśayanpāṇilāghavam

परन्तु धर्मात्मा पाण्डव ने अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए द्रोण के छोड़े हुए उन बाणों को बाणों की वर्षा से रोक दिया।

श्लोक 22 (7.106.22)

ततो द्रोणो भृशं क्रुद्धो धर्मराजस्य संयुगे । चिच्छेद समरे धन्वी धनुस्तस्य महात्मनः ॥

tato droṇo bhṛśaṃ kruddho dharmarājasya saṃyuge | ciccheda samare dhanvī dhanustasya mahātmanaḥ

तब अत्यन्त क्रुद्ध उस धनुर्धर द्रोण ने युद्ध में महात्मा धर्मराज का धनुष काट डाला।

श्लोक 23 (7.106.23)

अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महारथः । शरैरनेकसाहस्रैः पूरयामास सर्वतः ॥

athainaṃ chinnadhanvānaṃ tvaramāṇo mahārathaḥ | śarairanekasāhasraiḥ pūrayāmāsa sarvataḥ

फिर उस महारथी ने शीघ्रता से धनुषहीन हुए उन्हें सब ओर से कई हजार बाणों से भर दिया।

श्लोक 24 (7.106.24)

अदृश्यं वीक्ष्य राजानं भारद्वाजस्य सायकैः । सर्वभूतान्यमन्यन्त हतमेव युधिष्ठिरम् ॥

adṛśyaṃ vīkṣya rājānaṃ bhāradvājasya sāyakaiḥ | sarvabhūtānyamanyanta hatameva yudhiṣṭhiram

भरद्वाजपुत्र के बाणों से राजा को अदृश्य हुआ देखकर सब प्राणियों ने समझ लिया कि युधिष्ठिर मारे गए।

श्लोक 25 (7.106.25)

केचिच्चैनममन्यन्त तथैव विमुखीकृतम् । हृतो राजेति राजेन्द्र ब्राह्मणेन महात्मना ॥

keciccainamamanyanta tathaiva vimukhīkṛtam | hṛto rājeti rājendra brāhmaṇena mahātmanā

और कुछ ने, हे राजेन्द्र, यह भी मान लिया कि वे युद्ध से विमुख कर दिए गए हैं — "महात्मा ब्राह्मण द्रोण ने राजा को हर लिया।"

श्लोक 26 (7.106.26)

स कृच्छ्रं परमं प्राप्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः । त्यक्त्वा तत्कार्मुकं छिन्नं भारद्वाजेन संयुगे । आददेऽन्यद्धनुर्दिव्यं भारघ्नं वेगवत्तरम् ॥

sa kṛcchraṃ paramaṃ prāpto dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | tyaktvā tatkārmukaṃ chinnaṃ bhāradvājena saṃyuge | ādade'nyaddhanurdivyaṃ bhāraghnaṃ vegavattaram

धर्मराज युधिष्ठिर परम संकट में पड़ गए; युद्ध में भरद्वाजपुत्र द्वारा कटे हुए उस धनुष को छोड़कर उन्होंने दूसरा दिव्य धनुष लिया, जो भारी तनाव सहने वाला और अधिक वेगवान था।

श्लोक 27 (7.106.27)

ततस्तान्सायकांस्तत्र द्रोणनुन्नान्सहस्रशः । चिच्छेद समरे वीरस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tatastānsāyakāṃstatra droṇanunnānsahasraśaḥ | ciccheda samare vīrastadadbhutamivābhavat

फिर उस वीर ने द्रोण द्वारा चलाए हुए उन सब बाणों को हजारों की संख्या में काट डाला; वह मानो एक आश्चर्य-सा हुआ।

श्लोक 28 (7.106.28)

छित्त्वा तु ताञ्शरान्राजा क्रोधसंरक्तलोचनः । शक्तिं जग्राह समरे गिरीणामपि दारिणीम् । स्वर्णदण्डां महाघोरामष्टघण्टां भयावहाम् ॥

chittvā tu tāñśarānrājā krodhasaṃraktalocanaḥ | śaktiṃ jagrāha samare girīṇāmapi dāriṇīm | svarṇadaṇḍāṃ mahāghorāmaṣṭaghaṇṭāṃ bhayāvahām

उन बाणों को काटकर क्रोध से लाल आँखों वाले राजा ने युद्ध में एक ऐसी शक्ति ली जो पर्वतों को भी चीर देती थी, जिसकी डण्डी सोने की थी, जो अत्यन्त भयंकर थी और जिसमें आठ घण्टियाँ थीं।

श्लोक 29 (7.106.29)

समुत्क्षिप्य च तां हृष्टो ननाद बलवद्बली । नादेन सर्वभूतानि त्रासयन्निव भारत ॥

samutkṣipya ca tāṃ hṛṣṭo nanāda balavadbalī | nādena sarvabhūtāni trāsayanniva bhārata

उसे ऊपर उठाकर उस बलवान ने हर्ष से बड़े ज़ोर से गर्जना की, मानो उस नाद से सब प्राणियों को डरा रहा हो।

श्लोक 30 (7.106.30)

शक्तिं समुद्यतां दृष्ट्वा धर्मराजेन संयुगे । स्वस्ति द्रोणाय सहसा सर्वभूतान्यथाब्रुवन् ॥

śaktiṃ samudyatāṃ dṛṣṭvā dharmarājena saṃyuge | svasti droṇāya sahasā sarvabhūtānyathābruvan

धर्मराज द्वारा युद्ध में शक्ति उठाई हुई देखकर सब प्राणी सहसा बोल उठे, "द्रोण का कल्याण हो!"

श्लोक 31 (7.106.31)

सा राजभुजनिर्मुक्ता निर्मुक्तोरगसन्निभा । प्रज्वालयन्ती गगनं दिशः सप्रदिशस्तथा । द्रोणान्तिकमनुप्राप्ता दीप्तास्या पन्नगी यथा ॥

sā rājabhujanirmuktā nirmuktoragasannibhā | prajvālayantī gaganaṃ diśaḥ sapradiśastathā | droṇāntikamanuprāptā dīptāsyā pannagī yathā

राजा की भुजा से छूटी हुई, केंचुल छोड़े सर्प जैसी वह शक्ति आकाश, दिशाओं और उपदिशाओं को प्रज्वलित करती हुई, जलते मुख वाली सर्पिणी की भाँति द्रोण के पास पहुँची।

श्लोक 32 (7.106.32)

तामापतन्तीं सहसा दृष्ट्वा द्रोणो विशाम्पते । प्रादुश्चक्रे ततो ब्राह्ममस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥

tāmāpatantīṃ sahasā dṛṣṭvā droṇo viśāmpate | prāduścakre tato brāhmamastramastravidāṃ varaḥ

हे प्रजापति! उसे सहसा अपने ऊपर गिरती देखकर अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण ने तब ब्रह्मास्त्र प्रकट किया।

श्लोक 33 (7.106.33)

तदस्त्रं भस्मसात्कृत्वा तां शक्तिं घोरदर्शनाम् । जगाम स्यन्दनं तूर्णं पाण्डवस्य यशस्विनः ॥

tadastraṃ bhasmasātkṛtvā tāṃ śaktiṃ ghoradarśanām | jagāma syandanaṃ tūrṇaṃ pāṇḍavasya yaśasvinaḥ

उस अस्त्र ने उस भयंकर दिखने वाली शक्ति को भस्म करके यशस्वी पाण्डव के रथ की ओर तीव्र गति से प्रस्थान किया।

श्लोक 34 (7.106.34)

ततो युधिष्ठिरो राजा द्रोणास्त्रं तत्समुद्यतम् । अशामयन्महाप्राज्ञो ब्रह्मास्त्रेणैव मारिष ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā droṇāstraṃ tatsamudyatam | aśāmayanmahāprājño brahmāstreṇaiva māriṣa

तब महाप्राज्ञ राजा युधिष्ठिर ने, हे माननीय, द्रोण के उस उठे हुए अस्त्र को ब्रह्मास्त्र से ही शान्त कर दिया।

श्लोक 35 (7.106.35)

विद्ध्वा तं च रणे द्रोणं पञ्चभिर्नतपर्वभिः । क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन चिच्छेदास्य महद्धनुः ॥

viddhvā taṃ ca raṇe droṇaṃ pañcabhirnataparvabhiḥ | kṣurapreṇa sutīkṣṇena cicchedāsya mahaddhanuḥ

उन्होंने युद्ध में द्रोण को पाँच सीधी गाँठ वाले बाणों से बींधा और एक तीखे क्षुरप्र से उसका विशाल धनुष काट डाला।

श्लोक 36 (7.106.36)

तदपास्य धनुश्छिन्नं द्रोणः क्षत्रियमर्दनः । गदां चिक्षेप सहसा धर्मपुत्राय मारिष ॥

tadapāsya dhanuśchinnaṃ droṇaḥ kṣatriyamardanaḥ | gadāṃ cikṣepa sahasā dharmaputrāya māriṣa

उस कटे धनुष को फेंककर क्षत्रियों का संहार करने वाले द्रोण ने सहसा धर्मपुत्र पर गदा फेंकी, हे माननीय।

श्लोक 37 (7.106.37)

तामापतन्तीं सहसा गदां दृष्ट्वा युधिष्ठिरः । गदामेवाग्रहीत्क्रुद्धश्चिक्षेप च परन्तप ॥

tāmāpatantīṃ sahasā gadāṃ dṛṣṭvā yudhiṣṭhiraḥ | gadāmevāgrahītkruddhaścikṣepa ca parantapa

उस गदा को सहसा अपने ऊपर गिरती देखकर शत्रुतापन युधिष्ठिर ने क्रोध में भरकर स्वयं भी गदा उठाई और फेंकी।

श्लोक 38 (7.106.38)

ते गदे सहसा मुक्ते समासाद्य परस्परम् । सङ्घर्षात्पावकं मुक्त्वा समेयातां महीतले ॥

te gade sahasā mukte samāsādya parasparam | saṅgharṣātpāvakaṃ muktvā sameyātāṃ mahītale

सहसा फेंकी हुई वे दोनों गदाएँ परस्पर टकराईं और रगड़ से आग निकालती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ीं।

श्लोक 39 (7.106.39)

ततो द्रोणो भृशं क्रुद्धो धर्मराजस्य मारिष । चतुर्भिर्निशितैस्तीक्ष्णैर्हयाञ्जघ्ने शरोत्तमैः ॥

tato droṇo bhṛśaṃ kruddho dharmarājasya māriṣa | caturbhirniśitaistīkṣṇairhayāñjaghne śarottamaiḥ

तब अत्यन्त क्रुद्ध द्रोण ने, हे माननीय, चार तीखे, पैने और उत्तम बाणों से धर्मराज के घोड़े मार डाले।

श्लोक 40 (7.106.40)

चिच्छेदैकेन भल्लेन धनुश्चेन्द्रध्वजोपमम् । केतुमेकेन चिच्छेद पाण्डवं चार्दयत्त्रिभिः ॥

cicchedaikena bhallena dhanuścendradhvajopamam | ketumekena ciccheda pāṇḍavaṃ cārdayattribhiḥ

उसने एक भल्ल से उनका इन्द्रध्वज-जैसा धनुष काटा, एक से ध्वज काटा और तीन से पाण्डव को पीड़ित किया।

श्लोक 41 (7.106.41)

हताश्वात्तु रथात्तूर्णमवप्लुत्य युधिष्ठिरः । तस्थावूर्ध्वभुजो राजा व्यायुधो भरतर्षभ ॥

hatāśvāttu rathāttūrṇamavaplutya yudhiṣṭhiraḥ | tasthāvūrdhvabhujo rājā vyāyudho bharatarṣabha

घोड़ों के मारे जाने पर रथ से शीघ्र कूदकर राजा युधिष्ठिर, हे भरतश्रेष्ठ, भुजाएँ ऊपर उठाए निहत्थे खड़े रह गए।

श्लोक 42 (7.106.42)

विरथं तं समालोक्य व्यायुधं च विशेषतः । द्रोणो व्यमोहयच्छत्रून्सर्वसैन्यानि चाभिभो ॥

virathaṃ taṃ samālokya vyāyudhaṃ ca viśeṣataḥ | droṇo vyamohayacchatrūnsarvasainyāni cābhibho

उन्हें रथहीन और विशेषतः शस्त्रहीन देखकर द्रोण ने, हे प्रभो, शत्रुओं और सारी सेनाओं को मोहित कर दिया।

श्लोक 43 (7.106.43)

मुञ्चंश्चेषुगणांस्तीक्ष्णाँल्लघुहस्तो दृढव्रतः । अभिदुद्राव राजानं सिंहो मृगमिवोल्बणः ॥

muñcaṃśceṣugaṇāṃstīkṣṇām̐llaghuhasto dṛḍhavrataḥ | abhidudrāva rājānaṃ siṃho mṛgamivolbaṇaḥ

हल्के हाथ वाले, दृढ़ व्रती द्रोण तीखे बाणों के झुण्ड छोड़ते हुए राजा पर वैसे ही झपटे जैसे प्रचण्ड सिंह मृग पर।

श्लोक 44 (7.106.44)

तमभिद्रुतमालोक्य द्रोणेनामित्रघातिना । हाहेति सुमहाञ्शब्दः पाण्डूनां समजायत ॥

tamabhidrutamālokya droṇenāmitraghātinā | hāheti sumahāñśabdaḥ pāṇḍūnāṃ samajāyata

शत्रुघाती द्रोण द्वारा उन्हें पीछा किया जाता देखकर पाण्डवों में सहसा "हाय! हाय!" का शब्द उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 45 (7.106.45)

हृतो राजा हृतो राजा भारद्वाजेन मारिष । इत्यासीत्सुमहाञ्शब्दः पाण्डूसैन्यस्य सर्वतः ॥

hṛto rājā hṛto rājā bhāradvājena māriṣa | ityāsītsumahāñśabdaḥ pāṇḍūsainyasya sarvataḥ

"राजा को हर लिया गया! भरद्वाजपुत्र ने राजा को हर लिया!" — हे माननीय, इस प्रकार पाण्डवों की सेना में चारों ओर से बड़ा शोर उठा।

श्लोक 46 (7.106.46)

ततस्त्वरितमारुह्य सहदेवरथं नृपः । अपायाज्जवनैरश्वैः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

tatastvaritamāruhya sahadevarathaṃ nṛpaḥ | apāyājjavanairaśvaiḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ

तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर शीघ्रता से सहदेव के रथ पर चढ़कर तेज घोड़ों के साथ वहाँ से निकल गए।

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