द्रोण पर्व · अध्याय 105
सञ्जय द्वारा योद्धाओं की ध्वजाओं का वर्णन
धृतराष्ट्र सञ्जय से पाण्डवों और अपने पक्ष की ध्वजाओं का वर्णन करने को कहते हैं। सञ्जय चिह्न गिनाते हैं: अर्जुन का वानर, द्रोणपुत्र की सिंह-पूँछ, कर्ण की सोने की हाथी-रस्सी, कृप का बैल, वृषसेन का मोर, शल्य की हल-रेखा, जयद्रथ का चाँदी का वराह, भूरिश्रवा का यज्ञ-स्तम्भ, शल का हाथी और दुर्योधन का मणिमय हाथी। ऐसी नौ ध्वजाओं ने कौरव सेना को प्रकाशित किया और दसवीं अर्जुन का महावानर था। फिर कौरव योद्धा अर्जुन के विरुद्ध धनुष उठाकर उसे बाणों से ढक देते हैं, और उसकी सेना में बड़ा कोलाहल उठता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.105.1)
ध्वजान्बहुविधाकारान्भ्राजमानानतिश्रिया । पार्थानां मामकानां च तान्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
dhvajānbahuvidhākārānbhrājamānānatiśriyā | pārthānāṃ māmakānāṃ ca tānmamācakṣva sañjaya
"सञ्जय! पार्थों और मेरे पक्ष की, अनेक रूपों वाली और अत्यन्त शोभा से दीप्त ध्वजाओं का मुझे वर्णन करो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 2 (7.105.2)
ध्वजान्बहुविधाकाराञ्शृणु तेषां महात्मनाम् । रूपतो वर्णतश्चैव नामतश्च निबोध मे ॥
dhvajānbahuvidhākārāñśṛṇu teṣāṃ mahātmanām | rūpato varṇataścaiva nāmataśca nibodha me
उन महापुरुषों की अनेक आकार वाली ध्वजाओं के विषय में सुनिए; उनके रूप, रंग और नाम मुझसे जान लीजिए।
श्लोक 3 (7.105.3)
तेषां तु रथमुख्यानां रथेषु विविधा ध्वजाः । प्रत्यदृश्यन्त राजेन्द्र ज्वलिता इव पावकाः ॥
teṣāṃ tu rathamukhyānāṃ ratheṣu vividhā dhvajāḥ | pratyadṛśyanta rājendra jvalitā iva pāvakāḥ
हे राजेन्द्र! उन श्रेष्ठ रथियों के रथों पर नाना प्रकार की ध्वजाएँ जलती हुई अग्नियों जैसी दिखाई देती थीं।
श्लोक 4 (7.105.4)
काञ्चनाः काञ्चनापीडाः काञ्चनस्रगलङ्कृताः । काञ्चनानीव शृङ्गाणि काञ्चनस्य महागिरेः ॥
kāñcanāḥ kāñcanāpīḍāḥ kāñcanasragalaṅkṛtāḥ | kāñcanānīva śṛṅgāṇi kāñcanasya mahāgireḥ
वे सोने की थीं, उनके शिखर सोने के थे और वे सोने की मालाओं से सजी थीं, मानो किसी विशाल स्वर्णपर्वत के सोने के शिखर हों।
श्लोक 5 (7.105.5)
अनेकवर्णा विविधा ध्वजाः परमशोभनाः । ते ध्वजाः संवृतास्तेषां पताकाभिः समन्ततः । नानावर्णविरागाभिः शुशुभुः सर्वतो वृताः ॥
anekavarṇā vividhā dhvajāḥ paramaśobhanāḥ | te dhvajāḥ saṃvṛtāsteṣāṃ patākābhiḥ samantataḥ | nānāvarṇavirāgābhiḥ śuśubhuḥ sarvato vṛtāḥ
अनेक रंगों और प्रकारों की, अत्यन्त सुन्दर ध्वजाएँ; वे ध्वजाएँ चारों ओर से नाना रंगों की पताकाओं से घिरी हुई, सब ओर से आवृत होकर शोभित हो रही थीं।
श्लोक 6 (7.105.6)
पताकाश्च ततस्तास्तु श्वसनेन समीरिताः । नृत्यमाना व्यदृश्यन्त रङ्गमध्ये विलासिकाः ॥
patākāśca tatastāstu śvasanena samīritāḥ | nṛtyamānā vyadṛśyanta raṅgamadhye vilāsikāḥ
और वे पताकाएँ वायु से हिलती हुई रंगमञ्च के बीच नृत्य करती हुई विलासिनी नर्तकियों जैसी दिखाई देती थीं।
श्लोक 7 (7.105.7)
इन्द्रायुधसवर्णाभाः पताका भरतर्षभ । दोधूयमाना रथिनां शोभयन्ति महारथान् ॥
indrāyudhasavarṇābhāḥ patākā bharatarṣabha | dodhūyamānā rathināṃ śobhayanti mahārathān
हे भरतश्रेष्ठ! इन्द्रधनुष जैसी आभा वाली पताकाएँ फहराती हुई रथों पर बैठे महारथियों को सुशोभित कर रही थीं।
श्लोक 8 (7.105.8)
सिंहलाङ्गूल उग्रास्यो ध्वजो वानरलक्षणः । धनञ्जयस्य सङ्ग्रामे प्रत्यदृश्यत भारत ॥
siṃhalāṅgūla ugrāsyo dhvajo vānaralakṣaṇaḥ | dhanañjayasya saṅgrāme pratyadṛśyata bhārata
हे भारत! संग्राम में धनञ्जय की वह ध्वजा दिखाई दी, जिस पर वानर का चिह्न था, जिसकी पूँछ सिंह जैसी और मुख भयंकर था।
श्लोक 9 (7.105.9)
स वानरध्वजो राजन्पताकाभिरलङ्कृतः । त्रासयामास तत्सैन्यं ध्वजो गाण्डीवधन्वनः ॥
sa vānaradhvajo rājanpatākābhiralaṅkṛtaḥ | trāsayāmāsa tatsainyaṃ dhvajo gāṇḍīvadhanvanaḥ
हे राजन्! पताकाओं से सजी गाण्डीवधारी की वह वानरध्वजा आपकी सेना को भयभीत कर रही थी।
श्लोक 10 (7.105.10)
तथैव सिंहलाङ्गूलं द्रोणपुत्रस्य भारत । ध्वजाग्रं समपश्याम बालसूर्यसमप्रभम् ॥
tathaiva siṃhalāṅgūlaṃ droṇaputrasya bhārata | dhvajāgraṃ samapaśyāma bālasūryasamaprabham
और हे भारत! उसी प्रकार हमने द्रोणपुत्र की ध्वजा के शिखर पर बाल सूर्य जैसी प्रभा वाली सिंह की पूँछ देखी।
श्लोक 11 (7.105.11)
काञ्चनं पवनोद्धूतं शक्रध्वजसमप्रभम् । नन्दनं कौरवेन्द्राणां द्रौणेर्लक्ष्म समुच्छ्रितम् ॥
kāñcanaṃ pavanoddhūtaṃ śakradhvajasamaprabham | nandanaṃ kauravendrāṇāṃ drauṇerlakṣma samucchritam
सोने की, वायु से हिलती हुई, इन्द्र की ध्वजा के समान प्रभा वाली, कौरव राजाओं को आनन्द देने वाली द्रोणपुत्र की वह ऊँची ध्वजा थी।
श्लोक 12 (7.105.12)
हस्तिकक्ष्या पुनर्हैमी बभूवाधिरथेर्ध्वजः । आहवे खं महाराज ददृशे पूरयन्निव ॥
hastikakṣyā punarhaimī babhūvādhiratherdhvajaḥ | āhave khaṃ mahārāja dadṛśe pūrayanniva
अधिरथपुत्र (कर्ण) की ध्वजा सोने की हाथी की रस्सी थी; हे महाराज! युद्ध में वह मानो आकाश को भरती हुई दिखाई दी।
श्लोक 13 (7.105.13)
पताकी काञ्चनः स्रग्वी ध्वजः कर्णस्य संयुगे । नृत्यतीव रथोपस्थे श्वसनेन समीरितः ॥
patākī kāñcanaḥ sragvī dhvajaḥ karṇasya saṃyuge | nṛtyatīva rathopasthe śvasanena samīritaḥ
युद्ध में कर्ण की स्वर्णमयी, पताका और माला से युक्त ध्वजा वायु से हिलती हुई रथ के बैठने के स्थान पर मानो नाच रही थी।
श्लोक 14 (7.105.14)
आचार्यस्य तु पाण्डूनां ब्राह्मणस्य तपस्विनः । गोवृषो गौतमस्यासीत्कृपस्य सुपरिष्कृतः ॥
ācāryasya tu pāṇḍūnāṃ brāhmaṇasya tapasvinaḥ | govṛṣo gautamasyāsītkṛpasya supariṣkṛtaḥ
पाण्डवों के आचार्य, तपस्वी ब्राह्मण गौतम कृप की ध्वजा सुन्दर ढंग से सजा हुआ बैल थी।
श्लोक 15 (7.105.15)
स तेन भ्राजते राजन्गोवृषेण महारथः । त्रिपुरघ्नरथो यद्वद्गोवृषेण विराजता ॥
sa tena bhrājate rājangovṛṣeṇa mahārathaḥ | tripuraghnaratho yadvadgovṛṣeṇa virājatā
हे राजन्! उस बैल से वह महारथी वैसे ही शोभित होता था जैसे त्रिपुरारि का रथ चमकते बैल से शोभित हुआ था।
श्लोक 16 (7.105.16)
मयूरो वृषसेनस्य काञ्चनो मणिरत्नवान् । व्याहरिष्यन्निवातिष्ठत्सेनाग्रमुपशोभयन् ॥
mayūro vṛṣasenasya kāñcano maṇiratnavān | vyāhariṣyannivātiṣṭhatsenāgramupaśobhayan
वृषसेन की ध्वजा मणियों और रत्नों से जड़ा सोने का मोर थी; वह मानो बोलने को उद्यत-सी खड़ी होकर सेना के अग्रभाग की शोभा बढ़ा रही थी।
श्लोक 17 (7.105.17)
तेन तस्य रथो भाति मयूरेण महात्मनः । यथा स्कन्दस्य राजेन्द्र मयूरेण विराजता ॥
tena tasya ratho bhāti mayūreṇa mahātmanaḥ | yathā skandasya rājendra mayūreṇa virājatā
हे राजेन्द्र! उस मोर से उस महात्मा का रथ वैसे ही शोभित होता था जैसे स्कन्द का रथ अपने तेजस्वी मोर से।
श्लोक 18 (7.105.18)
मद्रराजस्य शल्यस्य ध्वजाग्रेऽग्निशिखामिव । सौवर्णीं प्रतिपश्याम सीतामप्रतिमां शुभाम् ॥
madrarājasya śalyasya dhvajāgre'gniśikhāmiva | sauvarṇīṃ pratipaśyāma sītāmapratimāṃ śubhām
मद्रराज शल्य की ध्वजा के शिखर पर हमने अग्निशिखा जैसी, सोने की, अनुपम और सुन्दर हल-रेखा (सीता) देखी।
श्लोक 19 (7.105.19)
सा सीता भ्राजते तस्य रथमास्थाय मारिष । सर्वबीजविरूढेव यथा सीता श्रिया वृता ॥
sā sītā bhrājate tasya rathamāsthāya māriṣa | sarvabījavirūḍheva yathā sītā śriyā vṛtā
हे माननीय! उसके रथ पर वह हल-रेखा वैसे ही चमकती है जैसे सब बीज उग आने पर शोभा से आवृत खेत की हल-रेखा।
श्लोक 20 (7.105.20)
वराहः सिन्धुराजस्य राजतोऽभिविराजते । ध्वजाग्रे लोहिताङ्गाभो हेमजालपरिष्कृतः ॥
varāhaḥ sindhurājasya rājato'bhivirājate | dhvajāgre lohitāṅgābho hemajālapariṣkṛtaḥ
सिन्धुराज की ध्वजा के शिखर पर चाँदी का वराह चमकता है, जिसके अंगों की आभा लाल है और जो सोने की जाली से सजा है।
श्लोक 21 (7.105.21)
शुशुभे केतुना तेन राजतेन जयद्रथः । यथा देवासुरे युद्धे पुरा पूषा स्म शोभते ॥
śuśubhe ketunā tena rājatena jayadrathaḥ | yathā devāsure yuddhe purā pūṣā sma śobhate
उस चाँदी की ध्वजा से जयद्रथ वैसे ही शोभित हुआ जैसे प्राचीन काल में देवासुर-युद्ध में पूषा शोभित हुए थे।
श्लोक 22 (7.105.22)
सौमदत्तेः पुनर्यूपो यज्ञशीलस्य धीमतः । ध्वजः सूर्य इवाभाति सोमश्चात्र प्रदृश्यते ॥
saumadatteḥ punaryūpo yajñaśīlasya dhīmataḥ | dhvajaḥ sūrya ivābhāti somaścātra pradṛśyate
फिर यज्ञशील, बुद्धिमान सौमदत्ति की ध्वजा यज्ञ-स्तम्भ थी; वह सूर्य की भाँति चमकती है और उस पर चन्द्रमा भी दिखाई देता है।
श्लोक 23 (7.105.23)
स यूपः काञ्चनो राजन्सौमदत्तेर्विराजते । राजसूये मखश्रेष्ठे यथा यूपः समुच्छ्रितः ॥
sa yūpaḥ kāñcano rājansaumadattervirājate | rājasūye makhaśreṣṭhe yathā yūpaḥ samucchritaḥ
हे राजन्! सौमदत्ति का वह सोने का स्तम्भ वैसे ही शोभित है जैसे यज्ञों में श्रेष्ठ राजसूय में खड़ा किया गया यज्ञ-स्तम्भ।
श्लोक 24 (7.105.24)
शलस्य तु महाराज राजतो द्विरदो महान् । केतुः काञ्चनचित्राङ्गैर्मयूरैरुपशोभितः ॥
śalasya tu mahārāja rājato dvirado mahān | ketuḥ kāñcanacitrāṅgairmayūrairupaśobhitaḥ
हे महाराज! शल की ध्वजा चाँदी का विशाल हाथी थी, जो सोने के रंग-बिरंगे अंगों वाले मोरों से सजी थी।
श्लोक 25 (7.105.25)
स केतुः शोभयामास सैन्यं ते भरतर्षभ । यथा श्वेतो महानागो देवराजचमूं तथा ॥
sa ketuḥ śobhayāmāsa sainyaṃ te bharatarṣabha | yathā śveto mahānāgo devarājacamūṃ tathā
हे भरतश्रेष्ठ! वह ध्वजा आपकी सेना को वैसे ही सुशोभित करती थी जैसे विशाल श्वेत हाथी देवराज की सेना को।
श्लोक 26 (7.105.26)
नागो मणिमयो राज्ञो ध्वजः कनकसंवृतः । किङ्किणीशतसंह्रादो भ्राजंश्चित्रो रथोत्तमे ॥
nāgo maṇimayo rājño dhvajaḥ kanakasaṃvṛtaḥ | kiṅkiṇīśatasaṃhrādo bhrājaṃścitro rathottame
राजा की ध्वजा सोने से मढ़ा मणिमय हाथी थी, जिस पर सैकड़ों छोटी घण्टियों की झंकार थी; उसके उत्तम रथ पर वह चमकती और विचित्र दिखती थी।
श्लोक 27 (7.105.27)
व्यभ्राजत भृशं राजन्पुत्रस्तव विशाम्पते । ध्वजेन महता सङ्ख्ये कुरूणामृषभस्तदा ॥
vyabhrājata bhṛśaṃ rājanputrastava viśāmpate | dhvajena mahatā saṅkhye kurūṇāmṛṣabhastadā
हे राजन्, हे प्रजापति! उस विशाल ध्वजा से कुरुओं के वृषभ आपके पुत्र उस समय युद्ध में अत्यन्त शोभित हुए।
श्लोक 28 (7.105.28)
नवैते तव वाहिन्यामुच्छ्रिताः परमध्वजाः । व्यदीपयंस्ते पृतनां युगान्तादित्यसन्निभाः ॥
navaite tava vāhinyāmucchritāḥ paramadhvajāḥ | vyadīpayaṃste pṛtanāṃ yugāntādityasannibhāḥ
आपकी सेना में ये नौ श्रेष्ठ ध्वजाएँ ऊँची उठी थीं; वे युगान्त के सूर्यों जैसी होकर सेना को प्रकाशित कर रही थीं।
श्लोक 29 (7.105.29)
दशमस्त्वर्जुनस्यासीदेक एव महाकपिः । अदीप्यतार्जुनो येन हिमवानिव शम्भुना ॥
daśamastvarjunasyāsīdeka eva mahākapiḥ | adīpyatārjuno yena himavāniva śambhunā
दसवीं अर्जुन की थी, अकेला वह महान वानर, जिससे अर्जुन वैसे ही दीप्त हो रहा था जैसे शम्भु से हिमालय।
श्लोक 30 (7.105.30)
ततश्चित्राणि शुभ्राणि सुमहान्ति महारथाः । कार्मुकाण्याददुस्तूर्णमर्जुनार्थे परन्तपाः ॥
tataścitrāṇi śubhrāṇi sumahānti mahārathāḥ | kārmukāṇyādadustūrṇamarjunārthe parantapāḥ
तब शत्रुओं को तपाने वाले महारथियों ने अर्जुन के विरुद्ध शीघ्र ही अपने चमकीले, सुन्दर और बहुत बड़े धनुष उठा लिए।
श्लोक 31 (7.105.31)
तथैव धनुरायच्छत्पार्थः शत्रुविनाशनः । गाण्डीवं दिव्यकर्मा तद्राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥
tathaiva dhanurāyacchatpārthaḥ śatruvināśanaḥ | gāṇḍīvaṃ divyakarmā tadrājandurmantrite tava
उसी प्रकार शत्रुनाशक, दिव्य कर्म करने वाले पार्थ ने गाण्डीव धनुष तान लिया; हे राजन्, यह आपकी बुरी मन्त्रणा का फल था।
श्लोक 32 (7.105.32)
तवापराधाद्राजानो निहता बहुशो युधि । नानादिग्भ्यः समाहूताः सहयाः सरथद्विपाः ॥
tavāparādhādrājāno nihatā bahuśo yudhi | nānādigbhyaḥ samāhūtāḥ sahayāḥ sarathadvipāḥ
आपके ही अपराध से अनेक दिशाओं से बुलाए गए राजा अपने घोड़ों, रथों और हाथियों सहित युद्ध में बार-बार मारे गए।
श्लोक 33 (7.105.33)
तेषामासीद्व्यतिक्षेपो गर्जतामितरेतरम् । दुर्योधनमुखानां च पाण्डूनामृषभस्य च ॥
teṣāmāsīdvyatikṣepo garjatāmitaretaram | duryodhanamukhānāṃ ca pāṇḍūnāmṛṣabhasya ca
दुर्योधन को आगे रखने वालों और पाण्डवों के वृषभ के बीच, गरजते हुए उन सब में, परस्पर भिड़न्त हुई।
श्लोक 34 (7.105.34)
तत्राद्भुतं परं चक्रे कौन्तेयः कृष्णसारथिः । यदेको बहुभिः सार्धं समागच्छदभीतवत् ॥
tatrādbhutaṃ paraṃ cakre kaunteyaḥ kṛṣṇasārathiḥ | yadeko bahubhiḥ sārdhaṃ samāgacchadabhītavat
वहाँ कृष्ण को सारथि बनाए हुए कुन्तीपुत्र ने परम अद्भुत कार्य किया: वह अकेला निर्भय होकर बहुतों से एक साथ भिड़ गया।
श्लोक 35 (7.105.35)
अशोभत महाबाहुर्गाण्डीवं विक्षिपन्धनुः । जिगीषुस्तान्नरव्याघ्रो जिघांसुश्च जयद्रथम् ॥
aśobhata mahābāhurgāṇḍīvaṃ vikṣipandhanuḥ | jigīṣustānnaravyāghro jighāṃsuśca jayadratham
गाण्डीव धनुष खींचता हुआ वह महाबाहु नरव्याघ्र उन्हें जीतने की और जयद्रथ को मारने की इच्छा से शोभित हो रहा था।
श्लोक 36 (7.105.36)
तत्रार्जुनो नरव्याघ्रः शरैर्मुक्तैः सहस्रशः । अदृश्यांस्तावकान्योधान्प्रचक्रे शत्रुतापनः ॥
tatrārjuno naravyāghraḥ śarairmuktaiḥ sahasraśaḥ | adṛśyāṃstāvakānyodhānpracakre śatrutāpanaḥ
वहाँ शत्रुओं को तपाने वाले नरव्याघ्र अर्जुन ने छोड़े हुए हजारों बाणों से आपके योद्धाओं को अदृश्य कर दिया।
श्लोक 37 (7.105.37)
ततस्तेऽपि नरव्याघ्राः पार्थं सर्वे महारथाः । अदृश्यं समरे चक्रुः सायकौघैः समन्ततः ॥
tataste'pi naravyāghrāḥ pārthaṃ sarve mahārathāḥ | adṛśyaṃ samare cakruḥ sāyakaughaiḥ samantataḥ
तब उन सब नरव्याघ्र महारथियों ने भी युद्ध में चारों ओर से बाणों की बाढ़ से पार्थ को अदृश्य कर दिया।
श्लोक 38 (7.105.38)
संवृते नरसिंहैस्तु कुरूणामृषभेऽर्जुने । महानासीत्समुद्भूतस्तस्य सैन्यस्य निःस्वनः ॥
saṃvṛte narasiṃhaistu kurūṇāmṛṣabhe'rjune | mahānāsītsamudbhūtastasya sainyasya niḥsvanaḥ
जब कुरुओं के वृषभ अर्जुन को उन सिंह-जैसे पुरुषों ने इस प्रकार ढक दिया, तब उसकी सेना में बड़ा कोलाहल उठा।