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द्रोण पर्व · अध्याय 104

अर्जुन और आठ महारथियों का युद्ध

कौरव पक्ष के आठ महारथी (भूरिश्रवा, शल, कर्ण, वृषसेन, जयद्रथ, कृप, शल्य और द्रोणपुत्र) जयद्रथ की रक्षा के लिए सुन्दर रथों में आगे बढ़ते हैं। कृष्ण और अर्जुन पाञ्चजन्य और देवदत्त शंख बजाते हैं और कौरव वीर भी अपने शंख बजाकर उत्तर देते हैं, जिससे सारी सेना काँप उठती है। फिर दुर्योधन और वे आठ राजा पाण्डव को घेर लेते हैं, दोनों ओर से बाण बरसते हैं, और अर्जुन मुस्कुराते हुए उन सब को उत्तर देकर रोक देता है।

अध्याय 103अध्याय-सूचीअध्याय 105

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.104.1)

तावकास्त्वभिसम्प्रेक्ष्य वृष्ण्यन्धककुरूद्वहौ । सत्वरास्तौ जिघांसन्तस्तथैव विजयः परान् ॥

tāvakāstvabhisamprekṣya vṛṣṇyandhakakurūdvahau | satvarāstau jighāṃsantastathaiva vijayaḥ parān

वृष्णि, अन्धक और कुरुवंश के उन दोनों धुरन्धर वीरों को देखकर आपके योद्धा उन्हें मार डालने की इच्छा से शीघ्रता के साथ उन पर टूट पड़े; और विजय (अर्जुन) भी उसी प्रकार शत्रुओं को मार डालना चाहता था।

श्लोक 2 (7.104.2)

सुवर्णचित्रैर्वैयाघ्रैः स्वनवद्भिर्महारथैः । दीपयन्तो दिशः सर्वा ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥

suvarṇacitrairvaiyāghraiḥ svanavadbhirmahārathaiḥ | dīpayanto diśaḥ sarvā jvaladbhiriva pāvakaiḥ

सोने से चमकते और बाघ की खालों से ढके, गर्जना करते हुए बड़े-बड़े रथों से वे सब दिशाओं को मानो जलती हुई अग्नियों से प्रकाशित करने लगे,

श्लोक 3 (7.104.3)

रुक्मपुङ्खैश्च दुष्प्रेक्ष्यैः कार्मुकैः पृथिवीपते । कूजद्भिरतुलान्नादान्रोषितैरुरगैरिव ॥

rukmapuṅkhaiśca duṣprekṣyaiḥ kārmukaiḥ pṛthivīpate | kūjadbhiratulānnādānroṣitairuragairiva

और सोने के पंखों वाले बाणों से सजे, देखने में कठिन अपने धनुषों से, हे पृथ्वीपति, जो क्रोधित सर्पों की भाँति अनुपम टंकार कर रहे थे।

श्लोक 4 (7.104.4)

भूरिश्रवाः शलः कर्णो वृषसेनो जयद्रथः । कृपश्च मद्रराजश्च द्रोणिश्च रथिनां वरः ॥

bhūriśravāḥ śalaḥ karṇo vṛṣaseno jayadrathaḥ | kṛpaśca madrarājaśca droṇiśca rathināṃ varaḥ

भूरिश्रवा, शल, कर्ण, वृषसेन, जयद्रथ, कृप, मद्रराज शल्य और रथियों में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र —

श्लोक 5 (7.104.5)

ते पिबन्त इवाकाशमश्वैरष्टौ महारथाः । व्यराजयन्दश दिशो वैयाघ्रैर्हेमचन्द्रकैः ॥

te pibanta ivākāśamaśvairaṣṭau mahārathāḥ | vyarājayandaśa diśo vaiyāghrairhemacandrakaiḥ

वे आठ महारथी अपने घोड़ों से मानो आकाश को पी रहे थे, और बाघ की खालों तथा सोने के चन्द्राकार आभूषणों से दसों दिशाओं को सुशोभित कर रहे थे।

श्लोक 6 (7.104.6)

ते दंशिताः सुसंरब्धा रथैर्मेघौघनिःस्वनैः । समावृण्वन्दश दिशः पार्थस्य निशितैः शरैः ॥

te daṃśitāḥ susaṃrabdhā rathairmeghaughaniḥsvanaiḥ | samāvṛṇvandaśa diśaḥ pārthasya niśitaiḥ śaraiḥ

कवच पहने हुए और अत्यन्त क्रोध में भरे वे मेघसमूह की-सी गड़गड़ाहट वाले रथों से अपने तीखे बाणों द्वारा पार्थ के चारों ओर दसों दिशाओं को ढकने लगे।

श्लोक 7 (7.104.7)

कौलूतका हयाश्चित्रा वहन्तस्तान्महारथान् । व्यशोभन्त तदा शीघ्रा दीपयन्तो दिशो दश ॥

kaulūtakā hayāścitrā vahantastānmahārathān | vyaśobhanta tadā śīghrā dīpayanto diśo daśa

उन महारथियों को ढोने वाले कुलूतदेश के वे विचित्र, द्रुतगामी घोड़े उस समय दसों दिशाओं को चमकाते हुए शोभित हो रहे थे,

श्लोक 8 (7.104.8)

आजानेयैर्महावेगैर्नानादेशसमुत्थितैः । पार्वतीयैर्नदीजैश्च सैन्धवैश्च हयोत्तमैः ॥

ājāneyairmahāvegairnānādeśasamutthitaiḥ | pārvatīyairnadījaiśca saindhavaiśca hayottamaiḥ

और अनेक देशों से लाए गए, अत्यन्त वेगवान, उत्तम कुल के घोड़े भी, जो पर्वतीय, नदी-तट के और सिन्धु देश के थे, सर्वश्रेष्ठ अश्व थे।

श्लोक 9 (7.104.9)

कुरुयोधवरा राजंस्तव पुत्रं परीप्सवः । धनञ्जयरथं शीघ्रं सर्वतः समुपाद्रवन् ॥

kuruyodhavarā rājaṃstava putraṃ parīpsavaḥ | dhanañjayarathaṃ śīghraṃ sarvataḥ samupādravan

हे राजन्! कुरुओं के प्रमुख योद्धा आपके पुत्र की रक्षा करना चाहते हुए सब ओर से शीघ्र ही धनञ्जय के रथ पर टूट पड़े।

श्लोक 10 (7.104.10)

ते प्रगृह्य महाशङ्खान्दध्मुः पुरुषसत्तमाः । पूरयन्तो दिवं राजन्पृथिवीं च ससागराम् ॥

te pragṛhya mahāśaṅkhāndadhmuḥ puruṣasattamāḥ | pūrayanto divaṃ rājanpṛthivīṃ ca sasāgarām

उन पुरुषश्रेष्ठों ने अपने बड़े-बड़े शंख उठाकर बजाए, हे राजन्, और आकाश तथा समुद्रों सहित पृथ्वी को गुँजा दिया।

श्लोक 11 (7.104.11)

तथैव दध्मतुः शङ्खौ वासुदेवधनञ्जयौ । प्रवरौ सर्वदेवानां सर्वशङ्खवरौ भुवि ॥

tathaiva dadhmatuḥ śaṅkhau vāsudevadhanañjayau | pravarau sarvadevānāṃ sarvaśaṅkhavarau bhuvi

उसी प्रकार सब देवताओं में श्रेष्ठ वासुदेव और धनञ्जय ने भी अपने शंख बजाए, जो पृथ्वी के सब शंखों में उत्तम थे।

श्लोक 12 (7.104.12)

देवदत्तं च कौन्तेयः पाञ्चजन्यं च केशवः । शब्दस्तु देवदत्तस्य धनञ्जयसमीरितः ॥

devadattaṃ ca kaunteyaḥ pāñcajanyaṃ ca keśavaḥ | śabdastu devadattasya dhanañjayasamīritaḥ

कुन्तीपुत्र ने देवदत्त और केशव ने पाञ्चजन्य बजाया; और धनञ्जय द्वारा बजाए गए देवदत्त का नाद

श्लोक 13 (7.104.13)

पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिशश्चैव समावृणोत् । तथैव पाञ्चजन्योऽपि वासुदेवसमीरितः ॥

pṛthivīṃ cāntarikṣaṃ ca diśaścaiva samāvṛṇot | tathaiva pāñcajanyo'pi vāsudevasamīritaḥ

पृथ्वी, अन्तरिक्ष और दिशाओं में भर गया; और उसी प्रकार वासुदेव द्वारा बजाया गया पाञ्चजन्य भी

श्लोक 14 (7.104.14)

सर्वशब्दानतिक्रम्य पूरयामास रोदसी । तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे नादसङ्कुले ॥

sarvaśabdānatikramya pūrayāmāsa rodasī | tasmiṃstathā vartamāne dāruṇe nādasaṅkule

सब शब्दों को पार करके आकाश और पृथ्वी में छा गया। जब वह भयानक, कोलाहल से भरा नाद हो रहा था,

श्लोक 15 (7.104.15)

भीरूणां त्रासजनने शूराणां हर्षवर्धने । प्रवादितासु भेरीषु झर्झरेष्वानकेषु च ॥

bhīrūṇāṃ trāsajanane śūrāṇāṃ harṣavardhane | pravāditāsu bherīṣu jharjhareṣvānakeṣu ca

जो डरपोकों में भय और शूरों में हर्ष बढ़ाने वाला था, और भेरी, झर्झर तथा आनक बजाए जा रहे थे,

श्लोक 16 (7.104.16)

मृदङ्गेष्वपि राजेन्द्र वाद्यमानेष्वनेकशः । महारथसमाख्याता दुर्योधनहितैषिणः ॥

mṛdaṅgeṣvapi rājendra vādyamāneṣvanekaśaḥ | mahārathasamākhyātā duryodhanahitaiṣiṇaḥ

और हे राजेन्द्र, मृदङ्ग भी बार-बार बजाए जा रहे थे, तब दुर्योधन का हित चाहने वाले वे विख्यात महारथी,

श्लोक 17 (7.104.17)

अमृष्यमाणास्तं शब्दं क्रुद्धाः परमधन्विनः । कर्णादयो महेष्वासास्त्वत्सैन्यपरिरक्षिणः ॥

amṛṣyamāṇāstaṃ śabdaṃ kruddhāḥ paramadhanvinaḥ | karṇādayo maheṣvāsāstvatsainyaparirakṣiṇaḥ

उस शब्द को न सह पाने के कारण क्रोध में भरकर — कर्ण आदि वे महाधनुर्धर, जो आपकी सेना की रक्षा कर रहे थे —

श्लोक 18 (7.104.18)

अमर्षिता महाशङ्खान्दध्मुर्वीरा महारथाः । कृते प्रतिकरिष्यन्तः केशवस्यार्जुनस्य च ॥

amarṣitā mahāśaṅkhāndadhmurvīrā mahārathāḥ | kṛte pratikariṣyantaḥ keśavasyārjunasya ca

अमर्ष से भरे उन वीर महारथियों ने केशव और अर्जुन के किए का बदला चुकाने का निश्चय करके अपने बड़े शंख बजाए।

श्लोक 19 (7.104.19)

बभूव तव तत्सैन्यं शङ्खशब्दे समीरिते । उद्विग्नरथनागाश्वमस्वस्थमिव चाभिभो ॥

babhūva tava tatsainyaṃ śaṅkhaśabde samīrite | udvignarathanāgāśvamasvasthamiva cābhibho

शंखों का नाद उठने पर आपकी वह सेना विचलित हो गई; उसके रथ, हाथी और घोड़े घबरा उठे और हे प्रभो, वह अस्थिर-सी हो गई।

श्लोक 20 (7.104.20)

तत्प्रहृष्टजनाबाधं भेरीशङ्खनिनादितम् । बभूव भृशमुद्विग्नं निर्घातैरिव संवृतम् ॥

tatprahṛṣṭajanābādhaṃ bherīśaṅkhanināditam | babhūva bhṛśamudvignaṃ nirghātairiva saṃvṛtam

भेरियों और शंखों की ध्वनि से गूँजती हुई, प्रसन्न लोगों को भी पीड़ा देने वाली वह सेना अत्यन्त उद्विग्न हो उठी, मानो वज्रपातों से घिर गई हो।

श्लोक 21 (7.104.21)

स शब्दः सुमहान्राजन्दिशः सर्वा व्यनादयत् । त्रासयामास तत्सैन्यं युगान्त इव सम्भृतः ॥

sa śabdaḥ sumahānrājandiśaḥ sarvā vyanādayat | trāsayāmāsa tatsainyaṃ yugānta iva sambhṛtaḥ

हे राजन्! उस महान शब्द ने सब दिशाओं को गुँजा दिया और उस सेना को ऐसे भयभीत कर दिया मानो युग का अन्त आ गया हो।

श्लोक 22 (7.104.22)

ततो दुर्योधनोऽष्टौ च राजानस्ते महारथाः । जयद्रथस्य रक्षार्थं पाण्डवं पर्यवारयन् ॥

tato duryodhano'ṣṭau ca rājānaste mahārathāḥ | jayadrathasya rakṣārthaṃ pāṇḍavaṃ paryavārayan

तब दुर्योधन और वे आठ महारथी राजा जयद्रथ की रक्षा के लिए पाण्डव को घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 23 (7.104.23)

ततो द्रौणिस्त्रिसप्तत्या वासुदेवमताडयत् । अर्जुनं च त्रिभिर्भल्लैर्ध्वजमश्वांश्च पञ्चभिः ॥

tato drauṇistrisaptatyā vāsudevamatāḍayat | arjunaṃ ca tribhirbhallairdhvajamaśvāṃśca pañcabhiḥ

तब द्रोणपुत्र ने वासुदेव को तिहत्तर बाणों से घायल किया, अर्जुन को तीन भल्लों से, और उसके ध्वज तथा घोड़ों को पाँच बाणों से।

श्लोक 24 (7.104.24)

तमर्जुनः पृषत्कानां शतैः षड्भिरताडयत् । अत्यर्थमिव सङ्क्रुद्धः प्रतिविद्धे जनार्दने ॥

tamarjunaḥ pṛṣatkānāṃ śataiḥ ṣaḍbhiratāḍayat | atyarthamiva saṅkruddhaḥ pratividdhe janārdane

जनार्दन के घायल किए जाने पर मानो अत्यन्त क्रुद्ध हुए अर्जुन ने उसे छह सौ बाणों से मारा।

श्लोक 25 (7.104.25)

कर्णं च दशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं त्रिभिस्तथा । शल्यस्य सशरं चापं मुष्टौ चिच्छेद वीर्यवान् ॥

karṇaṃ ca daśabhirviddhvā vṛṣasenaṃ tribhistathā | śalyasya saśaraṃ cāpaṃ muṣṭau ciccheda vīryavān

कर्ण को दस और वृषसेन को तीन बाणों से बींधकर उस पराक्रमी ने शल्य के धनुष को, बाण सहित, मुट्ठी के स्थान पर काट डाला।

श्लोक 26 (7.104.26)

गृहीत्वा धनुरन्यत्तु शल्यो विव्याध पाण्डवम् । भूरिश्रवास्त्रिभिर्बाणैर्हेमपुङ्खैः शिलाशितैः ॥

gṛhītvā dhanuranyattu śalyo vivyādha pāṇḍavam | bhūriśravāstribhirbāṇairhemapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ

दूसरा धनुष लेकर शल्य ने पाण्डव को बींधा; और भूरिश्रवा ने पत्थर पर तेज किए हुए सोने के पंखों वाले तीन बाणों से।

श्लोक 27 (7.104.27)

कर्णो द्वात्रिंशता चैव वृषसेनश्च सप्तभिः । जयद्रथस्त्रिसप्तत्या कृपश्च दशभिः शरैः । मद्रराजश्च दशभिर्विव्यधुः फल्गुनं रणे ॥

karṇo dvātriṃśatā caiva vṛṣasenaśca saptabhiḥ | jayadrathastrisaptatyā kṛpaśca daśabhiḥ śaraiḥ | madrarājaśca daśabhirvivyadhuḥ phalgunaṃ raṇe

कर्ण ने बत्तीस, वृषसेन ने सात, जयद्रथ ने तिहत्तर, कृप ने दस बाणों से, और मद्रराज ने भी दस बाणों से युद्ध में फल्गुन को बींध दिया।

श्लोक 28 (7.104.28)

ततः शराणां षष्ट्या तु द्रौणिः पार्थमवाकिरत् । वासुदेवं च विंशत्या पुनः पार्थं च पञ्चभिः ॥

tataḥ śarāṇāṃ ṣaṣṭyā tu drauṇiḥ pārthamavākirat | vāsudevaṃ ca viṃśatyā punaḥ pārthaṃ ca pañcabhiḥ

तब द्रोणपुत्र ने पार्थ पर साठ बाणों की वर्षा की, वासुदेव को बीस से, और फिर पार्थ को पाँच बाणों से घायल किया।

श्लोक 29 (7.104.29)

प्रहसंस्तु नरव्याघ्रः श्वेताश्वः कृष्णसारथिः । प्रत्यविध्यत्स तान्सर्वान्दर्शयन्पाणिलाघवम् ॥

prahasaṃstu naravyāghraḥ śvetāśvaḥ kṛṣṇasārathiḥ | pratyavidhyatsa tānsarvāndarśayanpāṇilāghavam

हँसते हुए नरश्रेष्ठ श्वेताश्व अर्जुन ने, जिसके सारथि कृष्ण थे, अपने हाथ की फुर्ती दिखाते हुए उन सब को बदले में बाणों से मारा।

श्लोक 30 (7.104.30)

कर्णं द्वादशभिर्विद्ध्वा वृषसेनं त्रिभिः शरैः । शल्यस्य सशरं चापं मुष्टिदेशे व्यकृन्तत ॥

karṇaṃ dvādaśabhirviddhvā vṛṣasenaṃ tribhiḥ śaraiḥ | śalyasya saśaraṃ cāpaṃ muṣṭideśe vyakṛntata

कर्ण को बारह और वृषसेन को तीन बाणों से बींधकर उसने शल्य के धनुष को, बाण सहित, मुट्ठी के स्थान पर काट दिया।

श्लोक 31 (7.104.31)

सौमदत्तिं त्रिभिर्विद्ध्वा शल्यं च दशभिः शरैः । शितैरग्निशिखाकारैर्द्रौणिं विव्याध चाष्टभिः ॥

saumadattiṃ tribhirviddhvā śalyaṃ ca daśabhiḥ śaraiḥ | śitairagniśikhākārairdrauṇiṃ vivyādha cāṣṭabhiḥ

सौमदत्ति को तीन और शल्य को दस बाणों से बींधकर उसने अग्नि की लपटों जैसे तीखे आठ बाणों से द्रोणपुत्र को भी घायल किया।

श्लोक 32 (7.104.32)

गौतमं पञ्चविंशत्या सैन्धवं च शतेन ह । पुनर्द्रौणिं च सप्तत्या शराणां सोऽभ्यताडयत् ॥

gautamaṃ pañcaviṃśatyā saindhavaṃ ca śatena ha | punardrauṇiṃ ca saptatyā śarāṇāṃ so'bhyatāḍayat

गौतम (कृप) को उसने पच्चीस, सैन्धव (जयद्रथ) को सौ, और द्रोणपुत्र को फिर सत्तर बाणों से मारा।

श्लोक 33 (7.104.33)

भूरिश्रवास्तु सङ्क्रुद्धः प्रतोदं चिच्छिदे हरेः । अर्जुनं च त्रिसप्तत्या बाणानामाजघान ह ॥

bhūriśravāstu saṅkruddhaḥ pratodaṃ cicchide hareḥ | arjunaṃ ca trisaptatyā bāṇānāmājaghāna ha

पर भूरिश्रवा ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर हरि (कृष्ण) का चाबुक काट डाला और अर्जुन को तिहत्तर बाणों से मारा।

श्लोक 34 (7.104.34)

ततः शरशतैस्तीक्ष्णैस्तानरीन्श्वेतवाहनः । प्रत्यषेधद्द्रुतं क्रुद्धो महावातो घनानिव ॥

tataḥ śaraśataistīkṣṇaistānarīnśvetavāhanaḥ | pratyaṣedhaddrutaṃ kruddho mahāvāto ghanāniva

तब श्वेतवाहन अर्जुन ने क्रुद्ध होकर सैकड़ों तीखे बाणों से उन शत्रुओं को शीघ्र ही रोक दिया, जैसे प्रचण्ड वायु बादलों को रोक देती है।

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