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द्रोण पर्व · अध्याय 103

दुर्योधन के कवच पर अर्जुन के बाण निष्फल

दुर्योधन अर्जुन और कृष्ण को बेध देता है, पर अर्जुन के बाण उसके कवच से फिसलते जाते हैं। कृष्ण कारण पूछते हैं तो अर्जुन बताते हैं कि द्रोण ने दुर्योधन को दिव्य कवच का रहस्य सिखाया है, जिसे वे स्वयं भी जानते हैं; पर जब वे मानव अस्त्र का सन्धान करते हैं तो द्रोणपुत्र उनके बाणों को काट डालता है। फिर अर्जुन दुर्योधन के घोड़े, सारथी, धनुष और रथ नष्ट कर उसकी हथेलियाँ बेध देते हैं और वह भाग खड़ा होता है। सिन्धुराज के रक्षक दोनों को घेर लेते हैं, तब अर्जुन के धनुष और कृष्ण के शंख की ध्वनि से जगत् काँप उठता है।

अध्याय 102अध्याय-सूचीअध्याय 104

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.103.1)

एवमुक्त्वाऽर्जुनं राजा त्रिभिर्मर्मातिगैः शरैः । अभ्यविध्यन्महावेगैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥

evamuktvā'rjunaṃ rājā tribhirmarmātigaiḥ śaraiḥ | abhyavidhyanmahāvegaiścaturbhiścaturo hayān

अर्जुन से ऐसा कहकर राजा ने मर्मभेदी तीन बाणों से उन्हें बेधा और अत्यन्त वेगवान् चार बाणों से उनके चारों घोड़ों को।

श्लोक 2 (7.103.2)

वासुदेवं च दशभिः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे । प्रतोदं चास्य भल्लेन च्छित्त्वा भूमावपातयत् ॥

vāsudevaṃ ca daśabhiḥ pratyavidhyatstanāntare | pratodaṃ cāsya bhallena cchittvā bhūmāvapātayat

और दस बाणों से वासुदेव की छाती के बीच बेध दिया; फिर भल्ल से उनका चाबुक काटकर भूमि पर गिरा दिया।

श्लोक 3 (7.103.3)

तं चतुर्दशभिः पार्थश्चित्रपुङ्खैः शिलाशितैः । अविध्यत्तूर्णमव्यग्रस्ते चाभ्रश्यन्त वर्मणि ॥

taṃ caturdaśabhiḥ pārthaścitrapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | avidhyattūrṇamavyagraste cābhraśyanta varmaṇi

तब पार्थ ने अविचल रहकर शीघ्र चित्र-पंखों वाले, शिला पर तीखे किए हुए चौदह बाणों से उसे बेधा; पर वे उसके कवच से फिसल गए।

श्लोक 4 (7.103.4)

तेषां नैष्फल्यमालोक्य पुनर्नव च पञ्च च । प्राहिणोन्निशितान्बाणांस्ते चाभ्रश्यन्त वर्मणः ॥

teṣāṃ naiṣphalyamālokya punarnava ca pañca ca | prāhiṇonniśitānbāṇāṃste cābhraśyanta varmaṇaḥ

उन्हें निष्फल देखकर उन्होंने फिर नौ और पाँच तीखे बाण चलाए; वे भी कवच से फिसल गए।

श्लोक 5 (7.103.5)

अष्टाविंशांस्तु तान्बाणानस्तान्विप्रेक्ष्य निष्फलान् । अब्रवीत्परवीरघ्नः कृष्णोऽर्जुनमिदं वचः ॥

aṣṭāviṃśāṃstu tānbāṇānastānviprekṣya niṣphalān | abravītparavīraghnaḥ kṛṣṇo'rjunamidaṃ vacaḥ

उन अट्ठाईस बाणों को व्यर्थ गया देखकर शत्रुवीरों के संहारक कृष्ण ने अर्जुन से यह वचन कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 6 (7.103.6)

अदृष्टपूर्वं पश्यामि शिलानामिव सर्पणम् । त्वया सम्प्रेषिताः पार्थ नार्थं कुर्वन्ति पत्रिणः ॥

adṛṣṭapūrvaṃ paśyāmi śilānāmiva sarpaṇam | tvayā sampreṣitāḥ pārtha nārthaṃ kurvanti patriṇaḥ

"मैं ऐसा दृश्य देख रहा हूँ जो पहले कभी नहीं देखा—बाण मानो पत्थर पर फिसल रहे हों। हे पार्थ, तुम्हारे चलाए बाण कोई काम नहीं कर रहे।"

श्लोक 7 (7.103.7)

कच्चिद्गाण्डीवजः प्राणस्तथैव भरतर्षभ । मुष्टिश्च ते यथा पूर्वं भुजयोश्च बलं तव ॥

kaccidgāṇḍīvajaḥ prāṇastathaiva bharatarṣabha | muṣṭiśca te yathā pūrvaṃ bhujayośca balaṃ tava

"हे भरतश्रेष्ठ, क्या गाण्डीव से उपजा तुम्हारा पराक्रम पहले जैसा ही है? क्या तुम्हारी मुट्ठी की पकड़ और भुजाओं का बल पहले जैसा है?"

श्लोक 8 (7.103.8)

न वा कच्चिदयं कालः प्राप्तः स्यादद्य पश्चिमः । तव चैवास्य शत्रोश्च तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥

na vā kaccidayaṃ kālaḥ prāptaḥ syādadya paścimaḥ | tava caivāsya śatrośca tanmamācakṣva pṛcchataḥ

"कहीं आज तुम्हारे या इस शत्रु के लिए अन्तिम समय तो नहीं आ गया? मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ।"

श्लोक 9 (7.103.9)

विस्मयो मे महान्पार्थ तव दृष्ट्वा शरानिमान् । व्यर्थान्निपतितान्सङ्ख्ये दुर्योधनरथं प्रति ॥

vismayo me mahānpārtha tava dṛṣṭvā śarānimān | vyarthānnipatitānsaṅkhye duryodhanarathaṃ prati

"हे पार्थ, दुर्योधन के रथ की ओर गिरे तुम्हारे इन बाणों को युद्ध में व्यर्थ होते देखकर मुझे बड़ा विस्मय हो रहा है।"

श्लोक 10 (7.103.10)

वज्राशनिसमा घोराः परकायावभेदिनः । शराः कुर्वन्ति ते नार्थं पार्थ काऽद्य विडम्बना ॥

vajrāśanisamā ghorāḥ parakāyāvabhedinaḥ | śarāḥ kurvanti te nārthaṃ pārtha kā'dya viḍambanā

"वज्र और अशनि के समान भयंकर, शत्रु के शरीर को चीर देने वाले तुम्हारे बाण कुछ काम नहीं कर रहे—हे पार्थ, आज यह कैसा उपहास है?"

अर्जुन उवाच

श्लोक 11 (7.103.11)

द्रोणेन नियतं कृष्ण धार्तराष्ट्रे निदर्शितम् । अन्ते विहितमस्त्राणामेतत्कवचधारणम् ॥

droṇena niyataṃ kṛṣṇa dhārtarāṣṭre nidarśitam | ante vihitamastrāṇāmetatkavacadhāraṇam

"हे कृष्ण, द्रोण ने धृतराष्ट्र के पुत्र को यह निश्चित रूप से सिखाया है—अस्त्र-विद्या के अन्त में विहित यह कवच-धारण की विधि।"

श्लोक 12 (7.103.12)

अस्मिन्नन्तर्हितं कृष्ण त्रैलोक्यमपि वर्मणि । एको द्रोणो हि वेदैतदहं तस्माच्च सत्तमात् ॥

asminnantarhitaṃ kṛṣṇa trailokyamapi varmaṇi | eko droṇo hi vedaitadahaṃ tasmācca sattamāt

"हे कृष्ण, इस कवच में तीनों लोक मानो समाए हुए हैं। इसे अकेले द्रोण जानते हैं, और उन श्रेष्ठ पुरुष से मैं भी जानता हूँ।"

श्लोक 13 (7.103.13)

न शक्यमेतत्कवचं बाणैर्भेत्तुं कथञ्चन । अपि वज्रेण गोविन्द स्वयं मघवता युधि ॥

na śakyametatkavacaṃ bāṇairbhettuṃ kathañcana | api vajreṇa govinda svayaṃ maghavatā yudhi

"यह कवच बाणों से किसी प्रकार नहीं भेदा जा सकता; हे गोविन्द, युद्ध में स्वयं इन्द्र के वज्र से भी नहीं।"

श्लोक 14 (7.103.14)

जानंस्त्वमपि वै कृष्ण मां विमोहयसे कथम् । यद्वृत्तं त्रिषु लोकेषु यच्च केशव वर्तते ॥

jānaṃstvamapi vai kṛṣṇa māṃ vimohayase katham | yadvṛttaṃ triṣu lokeṣu yacca keśava vartate

"हे कृष्ण, आप तो यह जानते हुए भी मुझे क्यों मोहित करते हैं? हे केशव, तीनों लोकों में जो हो चुका है और जो हो रहा है,"

श्लोक 15 (7.103.15)

यथा भविष्यद्यच्चैव तत्सर्वं विदितं तव । न त्विदं वेद वै कश्चिद्यथा त्वं मधुसूदन ॥

yathā bhaviṣyadyaccaiva tatsarvaṃ viditaṃ tava | na tvidaṃ veda vai kaścidyathā tvaṃ madhusūdana

"तथा जो आगे होगा, वह सब आपको ज्ञात है। पर हे मधुसूदन, आप जैसा इसे कोई नहीं जानता।"

श्लोक 16 (7.103.16)

एष दुर्योधनः कृष्ण द्रोणेन विहितामिमाम् । तिष्ठत्यभीतवत्सङ्ख्ये बिभ्रत्कवचधारणाम् ॥

eṣa duryodhanaḥ kṛṣṇa droṇena vihitāmimām | tiṣṭhatyabhītavatsaṅkhye bibhratkavacadhāraṇām

"हे कृष्ण, यह दुर्योधन द्रोण के रचे इस कवच-बन्धन को धारण किए युद्ध में निर्भय-सा खड़ा है।"

श्लोक 17 (7.103.17)

यत्त्वत्र विहितं कार्यं नैष तद्वेत्ति माधव । स्त्रीवदेष बिभर्त्येतां युक्तां कवचधारणाम् ॥

yattvatra vihitaṃ kāryaṃ naiṣa tadvetti mādhava | strīvadeṣa bibhartyetāṃ yuktāṃ kavacadhāraṇām

"पर इस विषय में जो करना आवश्यक है, उसे यह नहीं जानता, हे माधव; यह तो स्त्री की भाँति दूसरे के लगाए इस कवच-बन्धन को पहने हुए है।"

श्लोक 18 (7.103.18)

पश्य बाह्वोश्च मे वीर्यं धनुषश्च जनार्दन । पराजयिष्ये कौरव्यं कवचेनापि रक्षितम् ॥

paśya bāhvośca me vīryaṃ dhanuṣaśca janārdana | parājayiṣye kauravyaṃ kavacenāpi rakṣitam

"हे जनार्दन, मेरी भुजाओं और धनुष का बल देखो; मैं कवच से रक्षित होने पर भी इस कौरव को परास्त करूँगा।"

श्लोक 19 (7.103.19)

इदमङ्गिरसे प्रादाद्देवेशो वर्म भास्वरम् । तस्माद्वृहस्पतिः प्राप ततः प्राप पुरन्दरः ॥

idamaṅgirase prādāddeveśo varma bhāsvaram | tasmādvṛhaspatiḥ prāpa tataḥ prāpa purandaraḥ

"देवताओं के स्वामी ने यह चमकता हुआ कवच अंगिरा को दिया; उनसे बृहस्पति को मिला, और उनसे पुरन्दर को।"

श्लोक 20 (7.103.20)

पुनर्ददौ सुरपतिर्मह्यं वर्म ससङ्ग्रहम् । दैवं यद्यस्य वर्मैतद्ब्रह्मणा वा स्वयं कृतम् । नैनं गोप्स्यति दुर्बुद्धिमद्य बाणहतं मया ॥

punardadau surapatirmahyaṃ varma sasaṅgraham | daivaṃ yadyasya varmaitadbrahmaṇā vā svayaṃ kṛtam | nainaṃ gopsyati durbuddhimadya bāṇahataṃ mayā

"फिर देवराज ने वह कवच उसकी विधि सहित मुझे दे दिया। चाहे इसका यह कवच दैवी हो या स्वयं ब्रह्मा का बनाया हुआ, आज मेरे बाणों से मारे गए इस दुर्बुद्धि की यह रक्षा नहीं करेगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 21 (7.103.21)

एवमुक्त्वाऽर्जुनो बाणानभिमन्त्र्य व्यकर्षयत् । मानवास्त्रेण मानार्हस्तीक्ष्णावरणभेदिना ॥

evamuktvā'rjuno bāṇānabhimantrya vyakarṣayat | mānavāstreṇa mānārhastīkṣṇāvaraṇabhedinā

ऐसा कहकर सम्माननीय अर्जुन ने बाणों को मन्त्र से अभिमन्त्रित करके धनुष खींचा—महीन-से-महीन आवरण को भेदने वाले मानव अस्त्र के साथ।

श्लोक 22 (7.103.22)

विकृष्यमाणांस्तेनैव धनुर्मध्यगताञ्छरान् । तानस्यास्त्रेण चिच्छेद द्रौणिः सर्वास्त्रघातिना ॥

vikṛṣyamāṇāṃstenaiva dhanurmadhyagatāñcharān | tānasyāstreṇa ciccheda drauṇiḥ sarvāstraghātinā

पर खिंचते समय, धनुष के बीच स्थित उन बाणों को द्रोणपुत्र ने समस्त अस्त्रों को नष्ट करने वाले अपने अस्त्र से काट डाला।

श्लोक 23 (7.103.23)

तान्निकृत्तानिषून्दृष्ट्वा दूरतो ब्रह्मवादिना । न्यवेदयत्केशवाय विस्मितः श्वेतवाहनः ॥

tānnikṛttāniṣūndṛṣṭvā dūrato brahmavādinā | nyavedayatkeśavāya vismitaḥ śvetavāhanaḥ

उन बाणों को दूर से ब्रह्मवादी द्वारा कटे देखकर श्वेतवाहन अर्जुन ने विस्मित होकर केशव से कहा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 24 (7.103.24)

नैतदस्त्रं मया शक्यं द्विः प्रयोक्तुं जनार्दन । अस्त्रं मामेव हन्याद्धि हन्याच्चापि बलं मम ॥

naitadastraṃ mayā śakyaṃ dviḥ prayoktuṃ janārdana | astraṃ māmeva hanyāddhi hanyāccāpi balaṃ mama

"हे जनार्दन, मैं इस अस्त्र का दो बार प्रयोग नहीं कर सकता; यह अस्त्र मुझे ही मार डालेगा और मेरे बल को भी नष्ट कर देगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 25 (7.103.25)

ततो दुर्योधनः कृष्णौ नवभिर्नवभिः शरैः । अविध्यत रणे राजञ्शरैराशीविषोपमैः ॥

tato duryodhanaḥ kṛṣṇau navabhirnavabhiḥ śaraiḥ | avidhyata raṇe rājañśarairāśīviṣopamaiḥ

तब दुर्योधन ने युद्ध में दोनों कृष्णों को नौ-नौ विषैले साँपों जैसे बाणों से बेध दिया, हे राजन्।

श्लोक 26 (7.103.26)

भूय एवाभ्यवर्षच्च समरे कृष्णपाण्डवौ । शरवर्षेण महता ततोऽहृष्यन्त तावकाः । चक्रुर्वादित्रनिनदान्सिंहनादरवांस्तथा ॥

bhūya evābhyavarṣacca samare kṛṣṇapāṇḍavau | śaravarṣeṇa mahatā tato'hṛṣyanta tāvakāḥ | cakrurvāditraninadānsiṃhanādaravāṃstathā

और उसने युद्ध में कृष्ण तथा पाण्डव पर फिर बाणों की भारी वर्षा की; इससे आपके योद्धा हर्षित हुए और उन्होंने वाद्य बजाए तथा सिंहनाद किए।

श्लोक 27 (7.103.27)

ततः क्रुद्धो रणे पार्थः सृक्विणी परिसंलिहन् । नापश्यच्च ततोऽस्याङ्गं यन्न स्याद्वर्मरक्षितम् ॥

tataḥ kruddho raṇe pārthaḥ sṛkviṇī parisaṃlihan | nāpaśyacca tato'syāṅgaṃ yanna syādvarmarakṣitam

तब युद्ध में क्रुद्ध पार्थ ने होंठों के कोने चाटते हुए उसके शरीर का कोई ऐसा अंग नहीं देखा जो कवच से रक्षित न हो।

श्लोक 28 (7.103.28)

ततोऽस्य निशितैर्बाणैः सुमुक्तैरन्तकोपमैः । हयांश्चकार निर्देहानुभौ च पार्ष्णिसारथी ॥

tato'sya niśitairbāṇaiḥ sumuktairantakopamaiḥ | hayāṃścakāra nirdehānubhau ca pārṣṇisārathī

तब उन्होंने तीखे, भली-भाँति छोड़े गए, यमराज जैसे बाणों से उसके घोड़ों को और दोनों पार्ष्णि-सारथियों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया।

श्लोक 29 (7.103.29)

धनुरस्याच्छिनत्तूर्णं हस्तावापं च वीर्यवान् । रथं च शकलीकर्तुं सव्यसाची प्रचक्रमे ॥

dhanurasyācchinattūrṇaṃ hastāvāpaṃ ca vīryavān | rathaṃ ca śakalīkartuṃ savyasācī pracakrame

उस बलवान् ने शीघ्र उसके धनुष और हाथ के रक्षक-पट्ट को काट डाला, और सव्यसाची उसके रथ को चूर-चूर करने में लग गया।

श्लोक 30 (7.103.30)

दुर्योधनं च बाणाभ्यां तीक्ष्णाभ्यां विरथीकृतम् । आविद्ध्यद्धस्ततलयोरुभयोरर्जुनस्तदा ॥

duryodhanaṃ ca bāṇābhyāṃ tīkṣṇābhyāṃ virathīkṛtam | āviddhyaddhastatalayorubhayorarjunastadā

तब अर्जुन ने दो तीखे बाणों से रथहीन किए हुए दुर्योधन की दोनों हथेलियों को बेध दिया।

श्लोक 31 (7.103.31)

प्रयत्नज्ञो हि कौन्तयो नखमांसान्तरेषुभिः । स वेदनाभिराविग्नः पलायनपरायणः ॥

prayatnajño hi kauntayo nakhamāṃsāntareṣubhiḥ | sa vedanābhirāvignaḥ palāyanaparāyaṇaḥ

प्रयत्न में निपुण कुन्तीपुत्र ने उसे नाखून और माँस के बीच बाणों से बेध दिया था; वह पीड़ा से व्याकुल होकर भाग निकलने पर उतारू हो गया।

श्लोक 32 (7.103.32)

तं कृच्छ्रामापदं प्राप्तं दृष्ट्वा परमधन्विनः । समापेतुः परीप्सन्तो धनञ्जयशरार्दितम् ॥

taṃ kṛcchrāmāpadaṃ prāptaṃ dṛṣṭvā paramadhanvinaḥ | samāpetuḥ parīpsanto dhanañjayaśarārditam

उसे भारी विपत्ति में पड़ा और धनञ्जय के बाणों से पीड़ित देखकर श्रेष्ठ धनुर्धर उसकी रक्षा की इच्छा से एक साथ आ पहुँचे।

श्लोक 33 (7.103.33)

तं रथैर्बहुसाहस्रैः कल्पितैः कुञ्जरैर्हयैः । पदात्योघैश्च संरब्धैः परिवव्रुर्धनञ्जयम् ॥

taṃ rathairbahusāhasraiḥ kalpitaiḥ kuñjarairhayaiḥ | padātyoghaiśca saṃrabdhaiḥ parivavrurdhanañjayam

उन्होंने हजारों रथों, सजे हुए हाथियों-घोड़ों और क्रुद्ध पैदल दलों के साथ धनञ्जय को घेर लिया।

श्लोक 34 (7.103.34)

अथ नार्जुनगोविन्दौ न रथो वा व्यदृश्यत । अस्त्रवर्षेण महता शरौघैश्चापि संवृतौ ॥

atha nārjunagovindau na ratho vā vyadṛśyata | astravarṣeṇa mahatā śaraughaiścāpi saṃvṛtau

तब बाणों की भारी वर्षा और अस्त्रों के समूह से ढके हुए अर्जुन, गोविन्द और उनका रथ दिखाई नहीं दिए।

श्लोक 35 (7.103.35)

ततोऽर्जुनोऽस्त्रवीर्येण निजघ्ने तां वरूथिनीम् । तत्र व्यङ्गी कृताः पेतुः शतशोऽथ रथद्विपाः ॥

tato'rjuno'stravīryeṇa nijaghne tāṃ varūthinīm | tatra vyaṅgī kṛtāḥ petuḥ śataśo'tha rathadvipāḥ

तब अर्जुन ने अस्त्र के बल से उस सेना का संहार किया; वहाँ सैकड़ों रथ और हाथी अंग-भंग होकर गिर पड़े।

श्लोक 36 (7.103.36)

ते हता हन्यमानाश्च न्यगृह्णंस्तं रथोत्तमम् । स रथः स्तम्भितस्तस्थौ क्रोशमात्रे समन्ततः ॥

te hatā hanyamānāśca nyagṛhṇaṃstaṃ rathottamam | sa rathaḥ stambhitastasthau krośamātre samantataḥ

मरते और मारे जाते हुए भी वे उस उत्तम रथ को पकड़े रहे; वह रथ चारों ओर एक कोस के घेरे में रुका खड़ा रहा।

श्लोक 37 (7.103.37)

ततोऽर्जुनं वृष्णिवीरस्त्वरितो वाक्यमब्रवीत् । धनुर्विष्फारयात्यर्थमहं ध्मास्यामि चाम्बुजम् ॥

tato'rjunaṃ vṛṣṇivīrastvarito vākyamabravīt | dhanurviṣphārayātyarthamahaṃ dhmāsyāmi cāmbujam

तब वृष्णिवीर ने जल्दी से अर्जुन से कहा—"धनुष को खूब ज़ोर से टंकारो, मैं शंख बजाता हूँ।"

श्लोक 38 (7.103.38)

ततो विष्फार्य बलवद्गाण्डीवं जघ्निवान्रिपून् । महता शरवर्षेण तलशब्देन चार्जुनः ॥

tato viṣphārya balavadgāṇḍīvaṃ jaghnivānripūn | mahatā śaravarṣeṇa talaśabdena cārjunaḥ

तब अर्जुन ने गाण्डीव को ज़ोर से टंकारकर बाणों की भारी वर्षा और करतल की ध्वनि के साथ शत्रुओं का संहार किया।

श्लोक 39 (7.103.39)

पाञ्चजन्यं च बलवान्दध्मौ तारेण केशवः । रजसा ध्वस्तपक्ष्मान्तः प्रस्विन्नवदनो भृशम् ॥

pāñcajanyaṃ ca balavāndadhmau tāreṇa keśavaḥ | rajasā dhvastapakṣmāntaḥ prasvinnavadano bhṛśam

और बलवान् केशव ने धूल से ढकी पलकों और पसीने से भीगे मुख से पाञ्चजन्य को गम्भीर, ऊँचे स्वर में बजाया।

श्लोक 40 (7.103.40)

तेनाच्युतोष्ठपुटपूरितमारुतेन । शङ्खान्तरोदरविवृद्धविनिःसृतेन । नादेन सासुरवियत्सुरलोकपालम् । उद्विग्नमीश्वर जगत्स्फुटतीव सर्वम् ॥

tenācyutoṣṭhapuṭapūritamārutena | śaṅkhāntarodaravivṛddhaviniḥsṛtena | nādena sāsuraviyatsuralokapālam | udvignamīśvara jagatsphuṭatīva sarvam

अच्युत के अधरपुटों से भरी हवा से, शंख की भीतरी गुहा में बढ़कर निकले उस नाद से, हे ईश्वर, असुरों, आकाश और देवलोक के लोकपालों सहित सारा जगत् व्याकुल होकर मानो फटने लगा।

श्लोक 41 (7.103.41)

तस्य शङ्खस्य नादेन धनुषो निःस्वनेन च । निःसत्वाश्च ससत्वाश्च क्षितौ पेतुस्तदा जनाः ॥

tasya śaṅkhasya nādena dhanuṣo niḥsvanena ca | niḥsatvāśca sasatvāśca kṣitau petustadā janāḥ

उस शंख के नाद और धनुष की टंकार से निर्बल और सबल, सभी लोग उस समय धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 42 (7.103.42)

तैर्विमुक्तो रथो रेजे वाय्वीरित इवाम्बुदः । जयद्रथस्य गोप्तारस्ततः क्षुब्धाः सहानुगाः ॥

tairvimukto ratho reje vāyvīrita ivāmbudaḥ | jayadrathasya goptārastataḥ kṣubdhāḥ sahānugāḥ

उनसे मुक्त हुआ वह रथ वायु से चलाए बादल की तरह शोभित हुआ; तब जयद्रथ के रक्षक अनुचरों सहित क्षुब्ध हो उठे।

श्लोक 43 (7.103.43)

ते दृष्ट्वा सहसा पार्थं गोप्तारः सैन्धवस्य तु । चक्रुर्नादान्महेष्वासाः कम्पयन्तो वसुन्धराम् ॥

te dṛṣṭvā sahasā pārthaṃ goptāraḥ saindhavasya tu | cakrurnādānmaheṣvāsāḥ kampayanto vasundharām

सैन्धव के रक्षक महाधनुर्धरों ने सहसा पार्थ को देखकर पृथ्वी को कँपाते हुए गर्जन किए।

श्लोक 44 (7.103.44)

बाणशब्दरवांश्चोग्रान्विमिश्राञ्शङ्खनिःस्वनैः । प्रादुश्चक्रुर्महात्मानः सिंहनादरवानपि ॥

bāṇaśabdaravāṃścogrānvimiśrāñśaṅkhaniḥsvanaiḥ | prāduścakrurmahātmānaḥ siṃhanādaravānapi

उन महात्माओं ने शंखध्वनियों में मिले बाणों और धनुषों के भयंकर शब्द तथा सिंहनाद भी किए।

श्लोक 45 (7.103.45)

तं श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां समुत्थितम् । प्रदध्मतुः शङ्खवरौ वासुदेवधनञ्जयौ ॥

taṃ śrutvā ninadaṃ ghoraṃ tāvakānāṃ samutthitam | pradadhmatuḥ śaṅkhavarau vāsudevadhanañjayau

आपके योद्धाओं का उठा हुआ वह भयंकर नाद सुनकर वासुदेव और धनञ्जय ने अपने श्रेष्ठ शंख बजाए।

श्लोक 46 (7.103.46)

तेन शब्देन महता पूरितेयं वसुन्धरा । सशैला सार्णवद्वीपा सपाताला विशाम्पते ॥

tena śabdena mahatā pūriteyaṃ vasundharā | saśailā sārṇavadvīpā sapātālā viśāmpate

हे प्रजापालक, उस महान् शब्द से पर्वतों, समुद्रों, द्वीपों और पातालों सहित यह पृथ्वी भर गई।

श्लोक 47 (7.103.47)

स शब्दो भरतश्रेष्ठ व्याप्य सर्वा दिशो दश । प्रतिसस्वान तत्रैव कुरुपाण्डवयोर्बले ॥

sa śabdo bharataśreṣṭha vyāpya sarvā diśo daśa | pratisasvāna tatraiva kurupāṇḍavayorbale

हे भरतश्रेष्ठ, वह शब्द दसों दिशाओं में फैलकर कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं में वहीं गूँज उठा।

श्लोक 48 (7.103.48)

तावका रथिनस्तत्र दृष्ट्वा कृष्णधनञ्जयौ । सम्भ्रमं परमं प्राप्तास्त्वरमाणा महारथाः ॥

tāvakā rathinastatra dṛṣṭvā kṛṣṇadhanañjayau | sambhramaṃ paramaṃ prāptāstvaramāṇā mahārathāḥ

कृष्ण और धनञ्जय को देखकर आपके महारथी वहाँ अत्यन्त घबरा गए और उतावले हो उठे।

श्लोक 49 (7.103.49)

अथ कृष्णौ महाभागौ तावका वीक्ष्य दंशितौ । अभ्यद्रवन्त सङ्क्रुद्धास्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

atha kṛṣṇau mahābhāgau tāvakā vīkṣya daṃśitau | abhyadravanta saṅkruddhāstadadbhutamivābhavat

तब उन दोनों महाभाग कृष्णों को कवच पहने देखकर आपके योद्धा क्रोध में भरकर उन पर टूट पड़े—वह एक अद्भुत-सा दृश्य था।

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