द्रोण पर्व · अध्याय 102
कृष्ण अर्जुन को दुर्योधन को मारने के लिए प्रेरित करते हैं
दुर्योधन को आगे आया देखकर कृष्ण अर्जुन से चिरसंचित क्रोध छोड़ने और पाण्डवों के दुःखों की जड़ उस पुरुष को मारने का आग्रह करते हैं। अर्जुन सहमत होते हैं और द्रौपदी के अपमान का स्मरण करते हैं; फिर दोनों श्वेत घोड़ों को दुर्योधन की ओर बढ़ाते हैं। निडर दुर्योधन उन्हें रोक लेता है और सेनाओं में बड़ा कोलाहल उठता है; कृष्ण और अर्जुन शंख बजाते हैं, कौरव निराश हो जाते हैं, और दुर्योधन अपने योद्धाओं को निर्भय रहने को कहकर अर्जुन को अपने सब अस्त्र और बल दिखाने के लिए ललकारता है।
वासुदेव उवाच
श्लोक 1 (7.102.1)
दुर्योधनमतिक्रान्तमेतं पश्य धनञ्जय । आपद्गतमिमं मन्ये नास्त्यस्य सदृशो रथः ॥
duryodhanamatikrāntametaṃ paśya dhanañjaya | āpadgatamimaṃ manye nāstyasya sadṛśo rathaḥ
हे धनञ्जय, आगे बढ़े हुए इस दुर्योधन को देखो। मेरे विचार से यह संकट में आ पड़ा है, फिर भी इसके समान कोई रथी नहीं है।
श्लोक 2 (7.102.2)
दूरपाती महेष्वासः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः । दृढहस्तश्चित्रयोधी धार्तराष्ट्रो महाबलः ॥
dūrapātī maheṣvāsaḥ kṛtāstro yuddhadurmadaḥ | dṛḍhahastaścitrayodhī dhārtarāṣṭro mahābalaḥ
यह दूर तक बाण चलाने वाला, महाधनुर्धर, अस्त्रविद्या में निपुण, युद्ध में उन्मत्त, दृढ़ हाथों वाला और अद्भुत योद्धा है—धृतराष्ट्र का यह पुत्र बड़ा बलवान् है।
श्लोक 3 (7.102.3)
अत्यन्तसुखसंवृद्धो मानितश्च महारथैः । कृती च सततं पार्थ नित्यं द्वेष्टि च पाण्डवान् ॥
atyantasukhasaṃvṛddho mānitaśca mahārathaiḥ | kṛtī ca satataṃ pārtha nityaṃ dveṣṭi ca pāṇḍavān
हे पार्थ, यह अत्यन्त सुख में पला है, महारथियों से सम्मानित है, कुशल है और सदा पाण्डवों से द्वेष रखता है।
श्लोक 4 (7.102.4)
तेन युद्धमहं मन्ये प्राप्तकालं तवानघ । अत्र नो द्यूतमायत्तं विजयायेतराय वा ॥
tena yuddhamahaṃ manye prāptakālaṃ tavānagha | atra no dyūtamāyattaṃ vijayāyetarāya vā
हे निष्पाप, मैं समझता हूँ कि इसके साथ युद्ध का तुम्हारा समय आ गया है। यहीं हमारी विजय या पराजय का दाँव टिका है।
श्लोक 5 (7.102.5)
अत्र क्रोधविषं पार्थ विमुञ्च चिरसम्भृतम् । एष मूलमनर्थानां पाण्डवानां महात्मनाम् ॥
atra krodhaviṣaṃ pārtha vimuñca cirasambhṛtam | eṣa mūlamanarthānāṃ pāṇḍavānāṃ mahātmanām
हे पार्थ, यहीं चिरकाल से सँजोया क्रोध का विष उगल दो। यही महात्मा पाण्डवों के समस्त अनर्थों की जड़ है।
श्लोक 6 (7.102.6)
सोऽयं प्राप्तस्तवाक्षेपं पश्य साफल्यमात्मनः । कथं हि राजा राज्यार्थी त्वया गच्छेत संयुगम् ॥
so'yaṃ prāptastavākṣepaṃ paśya sāphalyamātmanaḥ | kathaṃ hi rājā rājyārthī tvayā gaccheta saṃyugam
यही अब तुम्हारे प्रहार की पहुँच में आ गया है; अपने उद्देश्य की सफलता देखो। भला राज्य चाहने वाला राजा तुम्हारे सामने युद्ध में कैसे आता?
श्लोक 7 (7.102.7)
दिष्ट्या त्विदानीं सम्प्राप्त एष ते बाणगोचरम् । यथाऽयं जीवितं जह्यात्तथा कुरु धनञ्जय ॥
diṣṭyā tvidānīṃ samprāpta eṣa te bāṇagocaram | yathā'yaṃ jīvitaṃ jahyāttathā kuru dhanañjaya
सौभाग्य से अब यह तुम्हारे बाणों की पहुँच में आ गया है। हे धनञ्जय, ऐसा करो कि यह प्राण त्याग दे।
श्लोक 8 (7.102.8)
ऐश्वर्यमदसम्मूढो नैष दुःखमुपेयिवान् । न च ते संयुगे वीर्यं जानाति पुरुषर्षभ ॥
aiśvaryamadasammūḍho naiṣa duḥkhamupeyivān | na ca te saṃyuge vīryaṃ jānāti puruṣarṣabha
ऐश्वर्य के मद से मूढ़ यह कभी दुःख में नहीं पड़ा, और हे पुरुषश्रेष्ठ, यह युद्ध में तुम्हारा पराक्रम नहीं जानता।
श्लोक 9 (7.102.9)
त्वां हि लोकास्त्रयः पार्थ ससुरासुरमानवाः । नोत्सहन्ते रणे जेतुं किमुतैकः सुयोधनः ॥
tvāṃ hi lokāstrayaḥ pārtha sasurāsuramānavāḥ | notsahante raṇe jetuṃ kimutaikaḥ suyodhanaḥ
हे पार्थ, देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित तीनों लोक भी युद्ध में तुम्हें जीतने का साहस नहीं करते; अकेले सुयोधन की तो बात ही क्या?
श्लोक 10 (7.102.10)
स दिष्ट्या समनुप्राप्तस्तव पार्थ रथान्तिकम् । जह्येनं त्वं महाबाहो यथा वृत्रं पुरन्दरः ॥
sa diṣṭyā samanuprāptastava pārtha rathāntikam | jahyenaṃ tvaṃ mahābāho yathā vṛtraṃ purandaraḥ
सौभाग्य से यह तुम्हारे रथ के पास आ पहुँचा है। हे महाबाहो, इसे वैसे मार डालो जैसे पुरन्दर ने वृत्र को मारा था।
श्लोक 11 (7.102.11)
एष ह्यनर्थे सततं पराक्रान्तस्तवानघ । निकृत्या धर्मराजं च द्यूते वञ्चितवानयम् ॥
eṣa hyanarthe satataṃ parākrāntastavānagha | nikṛtyā dharmarājaṃ ca dyūte vañcitavānayam
हे निष्पाप, यह सदा तुम्हारे अनिष्ट में लगा रहा है, और इसने छल से धर्मराज को द्यूत में ठग लिया था।
श्लोक 12 (7.102.12)
बहूनि सुनृशंसानि कृतान्येतेन मानद । युष्मासु पापमतिना अपापेष्वपि नित्यदा ॥
bahūni sunṛśaṃsāni kṛtānyetena mānada | yuṣmāsu pāpamatinā apāpeṣvapi nityadā
हे मानद, इस पापबुद्धि ने तुम निरपराधों के साथ सदा बहुत-से अत्यन्त क्रूर कर्म किए हैं।
श्लोक 13 (7.102.13)
तमनार्यं सदा क्रुद्धं पुरुषं कामरूपिणम् । आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि पार्थाविचारयन् ॥
tamanāryaṃ sadā kruddhaṃ puruṣaṃ kāmarūpiṇam | āryāṃ yuddhe matiṃ kṛtvā jahi pārthāvicārayan
हे पार्थ, युद्ध में श्रेष्ठ पुरुषों का मार्ग अपनाने का निश्चय करके, बिना विचार किए उस अनार्य, सदा क्रुद्ध रहने वाले, इच्छानुसार रूप धरने वाले पुरुष को मार डालो।
श्लोक 14 (7.102.14)
निकृत्या राज्यहरणं वनवासं च पाण्डव । परिक्लेशं च कृष्णाया हृदि कृत्वा पराक्रम ॥
nikṛtyā rājyaharaṇaṃ vanavāsaṃ ca pāṇḍava | parikleśaṃ ca kṛṣṇāyā hṛdi kṛtvā parākrama
हे पाण्डव, छल से राज्य के हरण, वनवास और कृष्णा के क्लेश को हृदय में रखकर पराक्रम करो।
श्लोक 15 (7.102.15)
दिष्ट्यैष तव बाणानां गोचरे परिवर्तते । प्रतिघाताय कार्यस्य दिष्ट्या च यततेऽग्रतः ॥
diṣṭyaiṣa tava bāṇānāṃ gocare parivartate | pratighātāya kāryasya diṣṭyā ca yatate'grataḥ
सौभाग्य से यह तुम्हारे बाणों की पहुँच में घूम रहा है, और सौभाग्य से तुम्हारे कार्य को रोकने के लिए तुम्हारे सामने प्रयत्न कर रहा है।
श्लोक 16 (7.102.16)
दिष्ट्या जानाति सङ्ग्रामे योद्धव्यं हि त्वया सह । दिष्ट्या च सफलाः पार्थ सर्वे कामा हि कामिताः ॥
diṣṭyā jānāti saṅgrāme yoddhavyaṃ hi tvayā saha | diṣṭyā ca saphalāḥ pārtha sarve kāmā hi kāmitāḥ
सौभाग्य से यह जानता है कि युद्ध में इसे तुम्हारे साथ लड़ना होगा, और हे पार्थ, सौभाग्य से तुम्हारी सब चाही हुई कामनाएँ सफल हो रही हैं।
श्लोक 17 (7.102.17)
तस्माज्जहि रणे पार्थ धार्तराष्ट्रं कुलाधमम् । यथेन्द्रेण हतः पूर्वं जम्भो देवासुरे मृधे ॥
tasmājjahi raṇe pārtha dhārtarāṣṭraṃ kulādhamam | yathendreṇa hataḥ pūrvaṃ jambho devāsure mṛdhe
इसलिए हे पार्थ, कुल के उस अधम धृतराष्ट्रपुत्र को युद्ध में वैसे ही मार डालो जैसे देवासुर-संग्राम में इन्द्र ने पूर्वकाल में जम्भ को मारा था।
श्लोक 18 (7.102.18)
अस्मिन्हते त्वया सैन्यमनाथं भिद्यतामिदम् । वैरस्य दिष्ट्या सहजं मूलं छिन्धि दुरात्मनाम् ॥
asminhate tvayā sainyamanāthaṃ bhidyatāmidam | vairasya diṣṭyā sahajaṃ mūlaṃ chindhi durātmanām
इसके मारे जाने पर यह अनाथ सेना बिखर जाए। सौभाग्य से इन दुरात्माओं के वैर की स्वाभाविक जड़ काट डालो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 19 (7.102.19)
तं तथेत्यब्रवीत्पार्थः कृत्यरूपमिदं मम । सर्वमन्यदनादृत्य गच्छ यत्र सुयोधनः ॥
taṃ tathetyabravītpārthaḥ kṛtyarūpamidaṃ mama | sarvamanyadanādṛtya gaccha yatra suyodhanaḥ
पार्थ ने उनसे "ऐसा ही हो" कहकर कहा—"यह मेरा ही कार्य है; और सब कुछ छोड़कर वहाँ चलो जहाँ सुयोधन है।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 20 (7.102.20)
येनैतद्दीर्घकालं नो भुक्तं राज्यमकण्टकम् । अप्यस्य युधि विक्रम्य च्छिन्द्यां मूर्धानमाहवे ॥
yenaitaddīrghakālaṃ no bhuktaṃ rājyamakaṇṭakam | apyasya yudhi vikramya cchindyāṃ mūrdhānamāhave
"जिसने इस हमारे निष्कण्टक राज्य को इतने लंबे समय तक भोगा, उसका सिर मैं युद्ध में पराक्रम दिखाकर काट सकूँ।"
श्लोक 21 (7.102.21)
अपि तस्य ह्यनर्हायाः परिक्लेशस्य माधव । कृष्णायाः शक्नुयां गन्तुं पदं केशप्रधर्षणे ॥
api tasya hyanarhāyāḥ parikleśasya mādhava | kṛṣṇāyāḥ śaknuyāṃ gantuṃ padaṃ keśapradharṣaṇe
"और हे माधव, मैं कृष्णा के उस अनुचित क्लेश का—उसके केश खींचे जाने के अपमान का—बदला चुकाने की स्थिति तक पहुँच सकूँ।"
श्लोक 22 (7.102.22)
अप्यहं तानि दुःखानि पूर्ववृत्तानि माधव । दुर्योधनं रणे हत्वा प्रतिमोक्ष्ये कथञ्चन ॥
apyahaṃ tāni duḥkhāni pūrvavṛttāni mādhava | duryodhanaṃ raṇe hatvā pratimokṣye kathañcana
"हे माधव, दुर्योधन को युद्ध में मारकर मैं किसी प्रकार उन पुराने दुःखों का बदला चुका सकूँ।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (7.102.23)
इत्येवंवादिनौ कृष्णौ हृष्टौ श्वेतान्हयोत्तमान् । प्रेषयामासतुः सङ्ख्ये प्रेप्सन्तौ तं नराधिपम् ॥
ityevaṃvādinau kṛṣṇau hṛṣṭau śvetānhayottamān | preṣayāmāsatuḥ saṅkhye prepsantau taṃ narādhipam
ऐसा कहते हुए वे दोनों कृष्ण प्रसन्न होकर उस नरेश को पाने की इच्छा से युद्ध में श्वेत उत्तम घोड़ों को आगे बढ़ाने लगे।
श्लोक 24 (7.102.24)
तयोः समीपं सम्प्राप्य पुत्रस्ते भरतर्षभ । न चकार भयं प्राप्ते भये महति मारिष ॥
tayoḥ samīpaṃ samprāpya putraste bharatarṣabha | na cakāra bhayaṃ prāpte bhaye mahati māriṣa
हे भरतश्रेष्ठ, उन दोनों के निकट पहुँचकर भी आपके पुत्र ने भय नहीं किया, यद्यपि हे मान्यवर, महान् भय उपस्थित था।
श्लोक 25 (7.102.25)
तदस्य क्षत्रियाः कर्म सर्व एवाभ्यपूजयन् । यदर्जुनहृषीकेशौ प्रत्युद्यातौ न्यवारयत् ॥
tadasya kṣatriyāḥ karma sarva evābhyapūjayan | yadarjunahṛṣīkeśau pratyudyātau nyavārayat
उसके उस कर्म की सब क्षत्रियों ने प्रशंसा की कि उसने सामने आते अर्जुन और हृषीकेश को रोक दिया।
श्लोक 26 (7.102.26)
ततः सर्वस्य सैन्यस्य तावकस्य विशाम्पते । महानादो ह्यभूत्तत्र दृष्ट्वा राजानमाहवे ॥
tataḥ sarvasya sainyasya tāvakasya viśāmpate | mahānādo hyabhūttatra dṛṣṭvā rājānamāhave
तब हे प्रजापालक, युद्ध में अपने राजा को देखकर आपकी सारी सेना में बड़ा कोलाहल हुआ।
श्लोक 27 (7.102.27)
तस्मिञ्जनसमुन्नादे प्रवृत्ते भैरवे सति । कदर्थीकृत्य ते पुत्रः प्रत्यमित्रमवारयत् ॥
tasmiñjanasamunnāde pravṛtte bhairave sati | kadarthīkṛtya te putraḥ pratyamitramavārayat
लोगों के उस भयंकर शोर के उठने पर आपके पुत्र ने शत्रु को तुच्छ समझकर रोक लिया।
श्लोक 28 (7.102.28)
आवारितस्तु कौन्तेयस्तव पुत्रेण धन्विना । संरम्भमगमद्भूयः स च तस्मिन्परन्तपः ॥
āvāritastu kaunteyastava putreṇa dhanvinā | saṃrambhamagamadbhūyaḥ sa ca tasminparantapaḥ
पर धनुर्धर आपके पुत्र द्वारा रोके जाने पर वह शत्रुतापन कुन्तीपुत्र फिर क्रोध में भर गया।
श्लोक 29 (7.102.29)
तौ दृष्ट्वा प्रतिसंरब्धौ दुर्योधनधनञ्जयौ । अभ्यवैक्षन्त राजानो भीमरूपाः समन्ततः ॥
tau dṛṣṭvā pratisaṃrabdhau duryodhanadhanañjayau | abhyavaikṣanta rājāno bhīmarūpāḥ samantataḥ
दुर्योधन और धनञ्जय को क्रोध में भरा देखकर चारों ओर खड़े भयानक रूप वाले राजा देखने लगे।
श्लोक 30 (7.102.30)
दृष्ट्वा तु पार्थं संरब्धं वासुदेवं च मारिष । प्रहसन्नेव पुत्रस्ते योद्धुकामः समाह्वयत् ॥
dṛṣṭvā tu pārthaṃ saṃrabdhaṃ vāsudevaṃ ca māriṣa | prahasanneva putraste yoddhukāmaḥ samāhvayat
हे मान्यवर, पार्थ और वासुदेव को क्रोध में देखकर आपके पुत्र ने हँसते हुए-से युद्ध की इच्छा से उन्हें ललकारा।
श्लोक 31 (7.102.31)
ततः प्रहृष्टो दाशार्हः पाण्डवश्च धनञ्जयः । व्यक्रोशेतां महानादं दध्मतुश्चाम्बुजोत्तमौ ॥
tataḥ prahṛṣṭo dāśārhaḥ pāṇḍavaśca dhanañjayaḥ | vyakrośetāṃ mahānādaṃ dadhmatuścāmbujottamau
तब प्रसन्न होकर दाशार्ह कृष्ण और पाण्डुपुत्र धनञ्जय ने बड़ी गर्जना की और अपने उत्तम शंख बजाए।
श्लोक 32 (7.102.32)
तौ हृष्टरूपौ सम्प्रेक्ष्य कौरवेयास्तु सर्वशः । निराशाः समपद्यन्त पुत्रस्य तव जीविते ॥
tau hṛṣṭarūpau samprekṣya kauraveyāstu sarvaśaḥ | nirāśāḥ samapadyanta putrasya tava jīvite
उन दोनों को हर्ष में देखकर सब ओर के कौरव आपके पुत्र के जीवन से निराश हो गए।
श्लोक 33 (7.102.33)
शोकमापुः परं चैव कुरवः सर्व एव ते । अमन्यन्त च पुत्रं ते वैश्वानरमुखे हुतम् ॥
śokamāpuḥ paraṃ caiva kuravaḥ sarva eva te | amanyanta ca putraṃ te vaiśvānaramukhe hutam
वे सभी कौरव अत्यन्त शोक में डूब गए और उन्होंने आपके पुत्र को मानो अग्नि के मुख में आहुति की भाँति पड़ा समझा।
श्लोक 34 (7.102.34)
तथा तु दृष्ट्वा योधास्ते प्रहृष्टौ कृष्णपाण्डवौ । हतो राजा हतो राजेत्यूचिरे च भयार्दिताः ॥
tathā tu dṛṣṭvā yodhāste prahṛṣṭau kṛṣṇapāṇḍavau | hato rājā hato rājetyūcire ca bhayārditāḥ
कृष्ण और पाण्डव को इस प्रकार हर्षित देखकर वे योद्धा भय से पीड़ित होकर पुकारने लगे—"राजा मारा गया! राजा मारा गया!"
श्लोक 35 (7.102.35)
जनस्य सन्निनादं तु श्रुत्वा दुर्योधनोऽब्रवीत् । व्येतु वो भीरहं कृष्णौ प्रेषयिष्यामि मृत्यवे ॥
janasya sanninādaṃ tu śrutvā duryodhano'bravīt | vyetu vo bhīrahaṃ kṛṣṇau preṣayiṣyāmi mṛtyave
लोगों का वह कोलाहल सुनकर दुर्योधन बोला—"तुम्हारा भय दूर हो; मैं दोनों कृष्णों को मृत्यु के पास भेज दूँगा।"
श्लोक 36 (7.102.36)
इत्युक्त्वा सैनिकान्सर्वाञ्जयापेक्षी नराधिपः । पार्थमाभाष्य संरम्भादिदं वचनमब्रवीत् ॥
ityuktvā sainikānsarvāñjayāpekṣī narādhipaḥ | pārthamābhāṣya saṃrambhādidaṃ vacanamabravīt
सब सैनिकों से ऐसा कहकर विजय की आकांक्षा वाले उस राजा ने क्रोध में भरकर पार्थ को सम्बोधित कर यह वचन कहा।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 37 (7.102.37)
पार्थ यच्छिक्षितं तेऽस्त्रं दिव्यं पार्थिवमेव च । तद्दर्शय मयि क्षिप्रं यदि जातोऽसि पाण्डुना ॥
pārtha yacchikṣitaṃ te'straṃ divyaṃ pārthivameva ca | taddarśaya mayi kṣipraṃ yadi jāto'si pāṇḍunā
"हे पार्थ, तुमने जो दिव्य और पार्थिव अस्त्र सीखे हैं, यदि तुम सचमुच पाण्डु से उत्पन्न हो तो उन्हें शीघ्र मुझ पर दिखाओ।"
श्लोक 38 (7.102.38)
यद्बलं तव वीर्यं च केशवस्य तथैव च । तत्कुरुष्व मयि क्षिप्रं पश्यामस्तव पौरुषम् ॥
yadbalaṃ tava vīryaṃ ca keśavasya tathaiva ca | tatkuruṣva mayi kṣipraṃ paśyāmastava pauruṣam
"तुम्हारा जो बल और पराक्रम है और केशव का भी, उसे शीघ्र मुझ पर प्रकट करो; हम तुम्हारा पुरुषार्थ देखें।"
श्लोक 39 (7.102.39)
अस्मत्परोक्षं कर्माणि कृतानि प्रवदन्ति ते । स्वामिसत्कारयुक्तानि यानि तानीह दर्शय ॥
asmatparokṣaṃ karmāṇi kṛtāni pravadanti te | svāmisatkārayuktāni yāni tānīha darśaya
"हमारी अनुपस्थिति में किए तुम्हारे कर्मों की लोग चर्चा करते हैं; स्वामी की सेवा में किए गए जो तुम्हारे कर्म हैं, उन्हें यहाँ दिखाओ।"