द्रोण पर्व · अध्याय 101
कृष्ण और अर्जुन द्रोण की सेना को भेदकर निकलते हैं
सञ्जय बताते हैं कि द्रोण की सेना और भोजों की पंक्तियों को पार करके कृष्ण और अर्जुन राहु से छूटे सूर्य-चन्द्रमा की तरह दिखाई देते हैं, और कौरव जयद्रथ के जीवन की आशा छोड़ देते हैं। दोनों छह महारथियों के बीच खड़े निकटवर्ती सिन्धुराज को मारने की बात करते हैं। द्रोण से कवच बँधवाया हुआ दुर्योधन अकेले एक रथ पर निकलकर उनके सामने आ खड़ा होता है, जिससे कौरव सेनाएँ हर्षित हो उठती हैं, और कृष्ण अर्जुन से बोलते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.101.1)
स्रंसन्त इव मज्जानस्तावकानां भयान्नृप । तौ दृष्ट्वा समतिक्रान्तौ वासुदेवधनञ्जयौ ॥
sraṃsanta iva majjānastāvakānāṃ bhayānnṛpa | tau dṛṣṭvā samatikrāntau vāsudevadhanañjayau
हे राजन्! वासुदेव और धनञ्जय को आगे निकलता देखकर आपके योद्धाओं की मज्जा भय से मानो गल गई।
श्लोक 2 (7.101.2)
सर्वे तु प्रतिसंरब्धा ह्रीमन्तः सत्वचोदिताः । स्थिरीभूता महात्मानः प्रत्यगच्छन्धनञ्जयम् ॥
sarve tu pratisaṃrabdhā hrīmantaḥ satvacoditāḥ | sthirībhūtā mahātmānaḥ pratyagacchandhanañjayam
फिर भी लज्जाशील और साहस से प्रेरित वे सब महात्मा सँभलकर, दृढ़ होकर धनञ्जय के सामने बढ़े।
श्लोक 3 (7.101.3)
ये गताः पाण्डवं युद्धे रोषामर्षसमन्विताः । तेऽद्यापि न निवर्तन्ते सिन्धवः सागरादिव ॥
ye gatāḥ pāṇḍavaṃ yuddhe roṣāmarṣasamanvitāḥ | te'dyāpi na nivartante sindhavaḥ sāgarādiva
जो रोष और अमर्ष से भरकर युद्ध में पाण्डुपुत्र पर चढ़ गए थे, वे आज भी वैसे ही नहीं लौटे, जैसे नदियाँ समुद्र से नहीं लौटतीं।
श्लोक 4 (7.101.4)
असन्तस्तु न्यवर्तन्त वेदेभ्य इव नास्तिकाः । नरकं भजमानास्ते प्रत्यपद्यन्त किल्बिषम् ॥
asantastu nyavartanta vedebhya iva nāstikāḥ | narakaṃ bhajamānāste pratyapadyanta kilbiṣam
पर जो नीच थे, वे वैसे ही पीछे हट गए जैसे नास्तिक वेदों से मुँह मोड़ लेते हैं; नरक की ओर जाते हुए उन्होंने पाप ही अपने ऊपर लिया।
श्लोक 5 (7.101.5)
तावतीत्य रथानीकं विमुक्तौ पुरुषर्षभौ । ददृशाते यथा राहोरास्यान्मुक्तौ प्रभाकरौ ॥
tāvatītya rathānīkaṃ vimuktau puruṣarṣabhau | dadṛśāte yathā rāhorāsyānmuktau prabhākarau
रथों की उस सेना को लाँघकर वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ ऐसे दिखाई दिए जैसे राहु के मुख से छूटे हुए सूर्य और चन्द्रमा।
श्लोक 6 (7.101.6)
मत्स्याविव महाजालं विदार्य विगतक्लमौ । तथा कृष्णावदृश्येतां सेनाजालं विदार्य तत् ॥
matsyāviva mahājālaṃ vidārya vigataklamau | tathā kṛṣṇāvadṛśyetāṃ senājālaṃ vidārya tat
जैसे दो मछलियाँ विशाल जाल को फाड़कर थकान से मुक्त हो जाती हैं, वैसे ही वे दोनों कृष्ण उस सेना-रूपी जाल को चीरकर दिखाई दिए।
श्लोक 7 (7.101.7)
विमुक्तौ शस्त्रसम्बाधाद्रोणानीकात्सुदुर्भिदात् । अदृश्येतां महात्मानौ कालसूर्याविवोदितौ ॥
vimuktau śastrasambādhādroṇānīkātsudurbhidāt | adṛśyetāṃ mahātmānau kālasūryāvivoditau
शस्त्रों की भीड़ से और द्रोण की अत्यन्त दुर्भेद्य सेना से छूटे हुए वे दोनों महात्मा प्रलयकाल के उदित सूर्यों के समान दिखाई देने लगे।
श्लोक 8 (7.101.8)
अस्त्रसम्बाधनिर्मुक्तौ विमुक्तौ शस्त्रसङ्कटात् । अदृश्येतां महात्मानौ शत्रुसम्बाधकारिणौ ॥
astrasambādhanirmuktau vimuktau śastrasaṅkaṭāt | adṛśyetāṃ mahātmānau śatrusambādhakāriṇau
अस्त्रों की रुकावट से छूटे और शस्त्रों के संकट से मुक्त वे दोनों महात्मा दिखाई दिए, जो स्वयं शत्रुओं को संकट में डालने वाले थे।
श्लोक 9 (7.101.9)
विमुक्तौ ज्वलनस्पर्शान्मकरास्याज्झषाविव । अक्षोभयेतां सेनां तौ समुद्रं मकराविव ॥
vimuktau jvalanasparśānmakarāsyājjhaṣāviva | akṣobhayetāṃ senāṃ tau samudraṃ makarāviva
अग्नि के स्पर्श से छूटकर, मगर के जबड़ों से निकली दो मछलियों की भाँति, उन दोनों ने समुद्र को मथते दो मगरों के समान सेना को क्षुब्ध कर दिया।
श्लोक 10 (7.101.10)
तावकास्तव पुत्राश्च द्रोणानीकस्थयोस्तयोः । नैतौ तरिष्यतो द्रोणमिति चक्रुस्तदा मतिम् ॥
tāvakāstava putrāśca droṇānīkasthayostayoḥ | naitau tariṣyato droṇamiti cakrustadā matim
द्रोण की सेना के बीच स्थित उन दोनों को देखकर आपके योद्धाओं और पुत्रों ने तब मन में ठान लिया था कि ये दोनों द्रोण को पार नहीं कर सकेंगे।
श्लोक 11 (7.101.11)
तौ तु दृष्ट्वा व्यतिक्रान्तौ द्रोणानीकं महाद्युती । नाशशंसुर्महाराज सिन्धुराजस्य जीवितम् ॥
tau tu dṛṣṭvā vyatikrāntau droṇānīkaṃ mahādyutī | nāśaśaṃsurmahārāja sindhurājasya jīvitam
किन्तु उन दोनों महातेजस्वियों को द्रोण की सेना लाँघते देखकर, हे महाराज, उन्हें सिन्धुराज के जीवन की आशा न रही।
श्लोक 12 (7.101.12)
आशा बलवती राजन्सिन्धुराजस्य जीविते । द्रोणहार्दिक्ययोः कृष्णौ न मोक्ष्येते इति प्रभो ॥
āśā balavatī rājansindhurājasya jīvite | droṇahārdikyayoḥ kṛṣṇau na mokṣyete iti prabho
हे राजन्, सिन्धुराज के जीवन के विषय में उनकी आशा प्रबल थी—"हे प्रभो, दोनों कृष्ण द्रोण और हार्दिक्य से नहीं बच पाएँगे।"
श्लोक 13 (7.101.13)
तामाशां विफलीकृत्य सन्तीर्णौ तौ परन्तपौ । द्रोणानीकं महाराज भोजानीकं च दुस्तरम् ॥
tāmāśāṃ viphalīkṛtya santīrṇau tau parantapau | droṇānīkaṃ mahārāja bhojānīkaṃ ca dustaram
उस आशा को निष्फल करके वे दोनों शत्रुतापन द्रोण की सेना को और अत्यन्त दुस्तर भोज-सेना को पार कर गए, हे महाराज।
श्लोक 14 (7.101.14)
अथ दृष्ट्वा व्यतिक्रान्तौ ज्वलिताविव पावकौ । निराशाः सिन्धुराजस्य जीवितं न शशंसिरे ॥
atha dṛṣṭvā vyatikrāntau jvalitāviva pāvakau | nirāśāḥ sindhurājasya jīvitaṃ na śaśaṃsire
फिर प्रज्वलित अग्नियों की भाँति उन्हें आगे निकले देखकर वे निराश हो गए और सिन्धुराज के जीवन की कोई आशा न रखी।
श्लोक 15 (7.101.15)
मिथश्च समभाषेतामभीतौ भयवर्धनौ । जयद्रथवधे वाचस्तास्ताः कृष्णधनञ्जयौ ॥
mithaśca samabhāṣetāmabhītau bhayavardhanau | jayadrathavadhe vācastāstāḥ kṛṣṇadhanañjayau
तब निर्भय और भय बढ़ाने वाले वे दोनों, कृष्ण और धनञ्जय, जयद्रथ के वध के विषय में आपस में वही बातें करने लगे।
कृष्णार्जुनावूचतुः
श्लोक 16 (7.101.16)
असौ मध्ये कृतः षड्भिर्धार्तराष्ट्रैर्महारथैः । चक्षुर्विषयसम्प्राप्तो न मे मोक्ष्यति सैन्धवः ॥
asau madhye kṛtaḥ ṣaḍbhirdhārtarāṣṭrairmahārathaiḥ | cakṣurviṣayasamprāpto na me mokṣyati saindhavaḥ
"छह महारथी धृतराष्ट्रपुत्रों के बीच खड़ा किया गया यह सैन्धव मेरी आँखों के सामने आ गया है; अब यह मुझसे बचकर नहीं जाएगा।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 17 (7.101.17)
यद्यस्य समरे गोप्ता शक्रो देवगणैः सह । तथाप्येनं निहंस्याव इति कृष्णावभाषताम् ॥
yadyasya samare goptā śakro devagaṇaiḥ saha | tathāpyenaṃ nihaṃsyāva iti kṛṣṇāvabhāṣatām
"यदि युद्ध में देवगणों सहित इन्द्र भी इसकी रक्षा करे, तो भी हम इसे मार डालेंगे"—ऐसा दोनों कृष्णों ने कहा।
श्लोक 18 (7.101.18)
इति कृष्णौ महाबाहू मिथः कथयतां तदा । सिन्धुराजमवेक्षन्तौ त्वत्पुत्रा बहु चुक्रुशुः ॥
iti kṛṣṇau mahābāhū mithaḥ kathayatāṃ tadā | sindhurājamavekṣantau tvatputrā bahu cukruśuḥ
इस प्रकार वे दोनों महाबाहु कृष्ण उस समय आपस में बात करते रहे और सिन्धुराज की ओर देखते रहे; तब आपके पुत्र बहुत चिल्लाए।
श्लोक 19 (7.101.19)
अतीत्य मरुधन्वानं प्रयान्तौ तृषितौ गजौ । पीत्वा वारि समाश्वस्तौ तथैवास्तामरिन्दमौ ॥
atītya marudhanvānaṃ prayāntau tṛṣitau gajau | pītvā vāri samāśvastau tathaivāstāmarindamau
जैसे मरुभूमि को पार करके चलते दो प्यासे हाथी पानी पीकर आश्वस्त हो जाते हैं, वैसे ही वे दोनों शत्रुदमन आश्वस्त हो गए।
श्लोक 20 (7.101.20)
व्याघ्रसिंहगजाकीर्णानतिक्रम्य च पर्वतान् । वणिजाविव दृश्येतां हीनमृत्यू जरातिगौ ॥
vyāghrasiṃhagajākīrṇānatikramya ca parvatān | vaṇijāviva dṛśyetāṃ hīnamṛtyū jarātigau
बाघ, सिंह और हाथियों से भरे पर्वतों को लाँघकर आए दो वणिकों की भाँति वे दोनों मृत्यु से बचे और जरा से परे दिखाई दिए।
श्लोक 21 (7.101.21)
तथाहि मुखवर्णोऽयमनयोरिति मेनिरे । तावका वीक्ष्य मुक्तौ तौ विक्रोशन्ति स्म सर्वशः ॥
tathāhi mukhavarṇo'yamanayoriti menire | tāvakā vīkṣya muktau tau vikrośanti sma sarvaśaḥ
इन दोनों के मुख का रंग देखकर आपके योद्धाओं ने समझ लिया कि ये निकल आए हैं, और वे चारों ओर चिल्ला उठे।
श्लोक 22 (7.101.22)
द्रोणादाशीविषाकाराज्ज्वलितादिव पावकात् । अन्येभ्यः पार्थिवेभ्यश्च भास्वन्ताविव भास्करौ ॥
droṇādāśīviṣākārājjvalitādiva pāvakāt | anyebhyaḥ pārthivebhyaśca bhāsvantāviva bhāskarau
विषैले सर्प जैसे, प्रज्वलित अग्नि जैसे द्रोण से और अन्य राजाओं से निकलकर वे दोनों दो सूर्यों की भाँति दमक उठे।
श्लोक 23 (7.101.23)
विमुक्तौ सागरप्रख्याद्रोणानीकादरिन्दमौ । अदृश्येतां मुदा युक्तौ समुत्तीर्यार्णवं यथा ॥
vimuktau sāgaraprakhyādroṇānīkādarindamau | adṛśyetāṃ mudā yuktau samuttīryārṇavaṃ yathā
सागर जैसी विशाल द्रोण की सेना से छूटे हुए वे दोनों शत्रुदमन, मानो समुद्र पार कर आए हों, आनन्द से भरे दिखाई दिए।
श्लोक 24 (7.101.24)
अस्त्रौघान्महतो मुक्तौ द्रोणहार्दिक्यरक्षितात् । रोचमानावदृश्येतामिन्द्राग्न्योः सदृशौ रणे ॥
astraughānmahato muktau droṇahārdikyarakṣitāt | rocamānāvadṛśyetāmindrāgnyoḥ sadṛśau raṇe
द्रोण और हार्दिक्य से रक्षित अस्त्रों के विशाल समूह से छूटे हुए वे दोनों युद्ध में इन्द्र और अग्नि के समान चमकते दिखाई दिए।
श्लोक 25 (7.101.25)
उद्भिन्नरुधिरौ कृष्णौ भारद्वाजस्य सायकैः । शितैश्चितौ व्यरोचेतां कर्णिकारैरिवाचलौ ॥
udbhinnarudhirau kṛṣṇau bhāradvājasya sāyakaiḥ | śitaiścitau vyarocetāṃ karṇikārairivācalau
भरद्वाजपुत्र के बाणों से जिनका रक्त फूट निकला था और जो तीखे बाणों से बिंधे थे, वे दोनों कृष्ण कर्णिकार के फूलों से ढके पर्वतों की तरह शोभित हुए।
श्लोक 26 (7.101.26)
द्रोणग्राहह्रदान्मुक्तौ शक्त्याशीविषसङ्कटात् । अयःशरोग्रमकरात्क्षत्रियप्रवराम्भसः ॥
droṇagrāhahradānmuktau śaktyāśīviṣasaṅkaṭāt | ayaḥśarogramakarātkṣatriyapravarāmbhasaḥ
वे उस सरोवर से छूटे, जिसमें द्रोण ग्राह थे, शक्तियाँ विषैले सर्प थीं, लोहे के भयंकर बाण मगर थे और श्रेष्ठ क्षत्रिय जल थे।
श्लोक 27 (7.101.27)
ज्याघोषतलनिर्हादाद्गदानिस्त्रिंशविद्युतः । द्रोणास्त्रमेघान्निर्मुक्तौ सूर्येन्दू तिमिरादिव ॥
jyāghoṣatalanirhādādgadānistriṃśavidyutaḥ | droṇāstrameghānnirmuktau sūryendū timirādiva
प्रत्यंचा की टंकार और करतल की ध्वनि जिसकी गर्जना थी, गदाएँ और तलवारें जिसकी बिजली थीं, द्रोण के अस्त्रों के उस मेघ से निकले हुए वे दोनों अन्धकार से निकले सूर्य और चन्द्रमा के समान दिखे।
श्लोक 28 (7.101.28)
बाहुभ्यामिव सन्तीर्णौ सिन्धुषष्ठाः समुद्रगाः । तपान्ते सरितः पूर्णा महाग्राहसमाकुलाः ॥
bāhubhyāmiva santīrṇau sindhuṣaṣṭhāḥ samudragāḥ | tapānte saritaḥ pūrṇā mahāgrāhasamākulāḥ
वे दोनों मानो अपनी भुजाओं से तैरकर पार हुए, जैसे ग्रीष्म के अन्त में बड़े-बड़े ग्राहों से भरी, उमड़ती हुई उन छह नदियों को—जिनमें सिन्धु छठी है और जो समुद्र की ओर जाती हैं—कोई तैरकर पार करे।
श्लोक 29 (7.101.29)
महाशैलोच्चयां घोरां लङ्घयित्वा महानदीम् । निस्तीर्णावध्वगौ यद्वत्तद्वत्तौ तारितौ रणे ॥
mahāśailoccayāṃ ghorāṃ laṅghayitvā mahānadīm | nistīrṇāvadhvagau yadvattadvattau tāritau raṇe
जैसे दो राही विशाल पर्वत-शिखरों के बीच बहती भयंकर महानदी को लाँघकर पार उतर जाते हैं, वैसे ही वे दोनों युद्ध में पार उतार दिए गए।
श्लोक 30 (7.101.30)
इति कृष्णौ महेष्वासौ प्रशस्तौ लोकविश्रुतौ । सर्वभूतान्यमन्यन्त द्रोणास्त्रबलवारणात् ॥
iti kṛṣṇau maheṣvāsau praśastau lokaviśrutau | sarvabhūtānyamanyanta droṇāstrabalavāraṇāt
इस प्रकार द्रोण के अस्त्रों का बल रोक देने के कारण सब प्राणी उन दोनों लोकविख्यात महाधनुर्धर कृष्णों को सराहने योग्य मानने लगे।
श्लोक 31 (7.101.31)
जयद्रथं समीपस्थमवेक्षन्तौ जिघांसया । रुरुं वनान्ते लिप्सन्तौ व्याघ्रवत्तावतिष्ठताम् ॥
jayadrathaṃ samīpasthamavekṣantau jighāṃsayā | ruruṃ vanānte lipsantau vyāghravattāvatiṣṭhatām
जयद्रथ को निकट देखकर उसे मारने की इच्छा से वे दोनों वैसे ही खड़े रहे जैसे वन के छोर पर हिरन को पाने की इच्छा करते दो बाघ।
श्लोक 32 (7.101.32)
यथा हि मुखवर्णोऽयमनयोरिति मेनिरे । तव योधा महाराज हतमेव जयद्रथम् ॥
yathā hi mukhavarṇo'yamanayoriti menire | tava yodhā mahārāja hatameva jayadratham
उन दोनों के मुख का रंग देखकर आपके योद्धाओं ने, हे महाराज, जयद्रथ को मरा हुआ ही मान लिया।
श्लोक 33 (7.101.33)
लोहिताक्षौ महाबाहू संयुक्तौ कृष्णपाण्डवौ । सिन्धुराजमभिप्रेक्ष्य हृष्टौ व्यनदतां मुहुः ॥
lohitākṣau mahābāhū saṃyuktau kṛṣṇapāṇḍavau | sindhurājamabhiprekṣya hṛṣṭau vyanadatāṃ muhuḥ
लाल आँखों वाले, महाबाहु, साथ-साथ डटे कृष्ण और पाण्डुपुत्र सिन्धुराज को देखकर प्रसन्न होकर बार-बार गरजे।
श्लोक 34 (7.101.34)
शौरेरभीषुहस्तस्य पार्थस्य च धनुष्मतः । तयोरासीत्प्रभा राजन्सूर्यपावकयोरिव ॥
śaurerabhīṣuhastasya pārthasya ca dhanuṣmataḥ | tayorāsītprabhā rājansūryapāvakayoriva
हे राजन्, लगाम थामे शौरि और धनुषधारी पार्थ की उस समय सूर्य और अग्नि जैसी आभा थी।
श्लोक 35 (7.101.35)
हर्ष एव तयोरासीद्द्रोणानीकप्रमुक्तयोः । समीपे सैन्धवं दृष्ट्वा श्येनयोरामिषं यथा ॥
harṣa eva tayorāsīddroṇānīkapramuktayoḥ | samīpe saindhavaṃ dṛṣṭvā śyenayorāmiṣaṃ yathā
द्रोण की सेना से छूटे हुए उन दोनों को सैन्धव को निकट देखकर वैसा ही हर्ष हुआ जैसा दो बाजों को माँस देखकर होता है।
श्लोक 36 (7.101.36)
तौ तु सैन्धवमालोक्य वर्तमानमिवान्तिके । सहसा पेततुः क्रुद्धौ क्षिप्रं श्येनाविवामिषम् ॥
tau tu saindhavamālokya vartamānamivāntike | sahasā petatuḥ kruddhau kṣipraṃ śyenāvivāmiṣam
सैन्धव को मानो पास ही देखकर वे दोनों क्रुद्ध होकर माँस पर झपटते बाजों की तरह सहसा उस पर टूट पड़े।
श्लोक 37 (7.101.37)
तौ दृष्ट्वा तु व्यतिक्रान्तौ हृषीकेशधनञ्जयौ । सिन्धुराजस्य रक्षार्थं पराक्रान्तः सुतस्तव ॥
tau dṛṣṭvā tu vyatikrāntau hṛṣīkeśadhanañjayau | sindhurājasya rakṣārthaṃ parākrāntaḥ sutastava
हृषीकेश और धनञ्जय को आगे निकलता देखकर आपके पुत्र ने सिन्धुराज की रक्षा के लिए पराक्रम किया।
श्लोक 38 (7.101.38)
द्रोणेनाबद्धकवचो राजा दुर्योधनस्ततः । ययावेकरथेनाजौ हयसंस्कारवित्प्रभो ॥
droṇenābaddhakavaco rājā duryodhanastataḥ | yayāvekarathenājau hayasaṃskāravitprabho
तब द्रोण द्वारा कवच बँधवाए हुए, घोड़ों के संचालन में निपुण राजा दुर्योधन, हे प्रभो, अकेले एक रथ पर युद्ध में चला।
श्लोक 39 (7.101.39)
कृष्णपार्थौ महेष्वासौ व्यतिक्रम्याथ ते सुतः । अग्रतः पुण्डरीकाक्षं प्रतीयाय नराधिप ॥
kṛṣṇapārthau maheṣvāsau vyatikramyātha te sutaḥ | agrataḥ puṇḍarīkākṣaṃ pratīyāya narādhipa
हे नरेश्वर, उन दोनों महाधनुर्धर कृष्ण और पार्थ को लाँघकर आपका पुत्र कमलनयन कृष्ण के ठीक सामने जा पहुँचा।
श्लोक 40 (7.101.40)
ततः सर्वेषु सैन्येषु वादित्राणि प्रहृष्टवत् । प्रावाद्यन्त व्यतिक्रान्ते तव पुत्रे धनञ्जयम् ॥
tataḥ sarveṣu sainyeṣu vāditrāṇi prahṛṣṭavat | prāvādyanta vyatikrānte tava putre dhanañjayam
तब आपके पुत्र के धनञ्जय के आगे निकल जाने पर सब सेनाओं में हर्षपूर्वक वाद्य बजने लगे।
श्लोक 41 (7.101.41)
सिंहनादरवाश्चासञ्शङ्खशब्दविमिश्रिताः । दृष्ट्वा दुर्योधनं तत्र कृष्णयोः प्रमुखे स्थितम् ॥
siṃhanādaravāścāsañśaṅkhaśabdavimiśritāḥ | dṛṣṭvā duryodhanaṃ tatra kṛṣṇayoḥ pramukhe sthitam
दोनों कृष्णों के सामने दुर्योधन को खड़ा देखकर शंखों की ध्वनि में मिले सिंहनाद गूँज उठे।
श्लोक 42 (7.101.42)
ये च ते सिन्धुराजस्य गोप्तारः पावकोपमाः । ते प्राहृष्यन्त समरे दृष्ट्वा पुत्रं तव प्रभो ॥
ye ca te sindhurājasya goptāraḥ pāvakopamāḥ | te prāhṛṣyanta samare dṛṣṭvā putraṃ tava prabho
और सिन्धुराज के जो अग्नि-समान रक्षक थे, वे आपके पुत्र को देखकर, हे प्रभो, युद्ध में हर्ष से भर उठे।
श्लोक 43 (7.101.43)
दृष्ट्वा दुर्योधनं कृष्णो व्यतिक्रान्तं सहानुगम् । अब्रवीदर्जुनं राजन्प्राप्तकालमिदं वचः ॥
dṛṣṭvā duryodhanaṃ kṛṣṇo vyatikrāntaṃ sahānugam | abravīdarjunaṃ rājanprāptakālamidaṃ vacaḥ
हे राजन्, अनुचरों सहित दुर्योधन को आगे आया देखकर कृष्ण ने अर्जुन से यह समयोचित वचन कहा।