द्रोण पर्व · अध्याय 100
कृष्ण घोड़ों की सेवा करते हैं और रथ आगे बढ़ता है
कृष्ण घोड़ों को खोलकर उनकी सेवा करते और उन्हें पानी पिलाते हैं, जबकि पैदल खड़े अर्जुन राजाओं के छोड़े हुए सब शस्त्रों को निगल जाते हैं; कौरव विस्मय से भर जाते हैं। रथ को फिर जुता देखकर और कृष्ण-अर्जुन को आगे जाते देखकर सैनिक निराश हो जाते हैं और कुछ लोग सेना के विनाश के लिए दुर्योधन को दोष देते हैं। पाण्डव सिंह के मृगों को बिखेरने की तरह सेना को तितर-बितर करते हुए सैन्धव की ओर और तेजी से बढ़ते हैं; क्रुद्ध राजा उन्हें घेर लेते हैं और दुर्योधन उनके पीछे जाता है, जबकि धूल और बाणों से व्याकुल योद्धा दोनों कृष्णों की ओर देख भी नहीं पाते।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.100.1)
सलिले जनिते तस्मिन्कौन्तेयेन महात्मना । निस्तारिते द्विषत्सैन्ये कृते च शरवेश्मनि ॥
salile janite tasminkaunteyena mahātmanā | nistārite dviṣatsainye kṛte ca śaraveśmani
महात्मा कुन्तीपुत्र के द्वारा वह जल उत्पन्न कर दिए जाने पर, शत्रु की सेना के रोक दिए जाने पर और बाणों का घर बन जाने पर,
श्लोक 2 (7.100.2)
वासुदेवो रथात्तूर्णमवतीर्य महाद्युतिः । मोचयामास तुरगान्विनुन्नान्कङ्कपत्रिभिः ॥
vāsudevo rathāttūrṇamavatīrya mahādyutiḥ | mocayāmāsa turagānvinunnānkaṅkapatribhiḥ
महातेजस्वी वासुदेव रथ से शीघ्र उतरे और कंकपत्र (बगुले के पंख वाले) बाणों से बिंधे हुए घोड़ों को खोल दिया।
श्लोक 3 (7.100.3)
अदृष्टपूर्वं तद्दृष्ट्वा साधुवादो महानभूत् । सिद्धचारणसङ्घानां सैनिकानां च सर्वशः ॥
adṛṣṭapūrvaṃ taddṛṣṭvā sādhuvādo mahānabhūt | siddhacāraṇasaṅghānāṃ sainikānāṃ ca sarvaśaḥ
वह अभूतपूर्व दृश्य देखकर सिद्धों और चारणों के समूहों तथा सब ओर के सैनिकों में बड़ा साधुवाद उठा।
श्लोक 4 (7.100.4)
पदातिनं तु कौन्तेयं युध्यमानं महारथाः । नाशक्नुवन्वारयितुं तदद्भुतमिवाभवत् ॥
padātinaṃ tu kaunteyaṃ yudhyamānaṃ mahārathāḥ | nāśaknuvanvārayituṃ tadadbhutamivābhavat
पैदल लड़ते हुए कुन्तीपुत्र को महारथी रोक न सके; यह एक अद्भुत-सी बात थी।
श्लोक 5 (7.100.5)
आपतत्सु रथौघेषु प्रभूतगजवाजिषु । नासम्भ्रमत्तदा पार्थस्तदस्य पुरुषानति ॥
āpatatsu rathaugheṣu prabhūtagajavājiṣu | nāsambhramattadā pārthastadasya puruṣānati
जब बहुत-से हाथी-घोड़ों वाले रथों के समूह उन पर टूट पड़ रहे थे, तब भी पार्थ विचलित नहीं हुए; इसमें वे सामान्य पुरुषों से बहुत ऊपर थे।
श्लोक 6 (7.100.6)
व्यसृजन्त शरौघांस्ते पाण्डवं प्रति पार्थिवाः । न चाव्यथत धर्मात्मा वासविः परवीरहा ॥
vyasṛjanta śaraughāṃste pāṇḍavaṃ prati pārthivāḥ | na cāvyathata dharmātmā vāsaviḥ paravīrahā
राजाओं ने पाण्डव पर बाणों की बाढ़ छोड़ी, परन्तु शत्रुवीरों का संहार करने वाले धर्मात्मा इन्द्रपुत्र व्यथित नहीं हुए।
श्लोक 7 (7.100.7)
शतानि शरजालानि गदाः प्रासांश्च वीर्यवान् । आगतानग्रसत्पार्थः सरितः सागरो यथा ॥
śatāni śarajālāni gadāḥ prāsāṃśca vīryavān | āgatānagrasatpārthaḥ saritaḥ sāgaro yathā
आते हुए सैकड़ों बाण-जाल, गदाओं और भालों को पराक्रमी पार्थ ने वैसे ही निगल लिया, जैसे समुद्र नदियों को निगल लेता है।
श्लोक 8 (7.100.8)
अस्त्रवेगेन महता पार्थो बाहुबलेन च । सर्वेषां पार्थिवेन्द्राणामग्रसत्ताञ्शरोत्तमान् ॥
astravegena mahatā pārtho bāhubalena ca | sarveṣāṃ pārthivendrāṇāmagrasattāñśarottamān
अपने अस्त्रों के प्रचण्ड वेग और भुजाओं के बल से पार्थ ने उन सब श्रेष्ठ राजाओं के उत्तम बाणों को निगल लिया।
श्लोक 9 (7.100.9)
तत्तु पार्थस्य विक्रान्तं वासुदेवस्य चोभयोः । अपूजयन्महाराज कौरवा महदद्भुतम् ॥
tattu pārthasya vikrāntaṃ vāsudevasya cobhayoḥ | apūjayanmahārāja kauravā mahadadbhutam
हे महाराज, कौरवों ने पार्थ और वासुदेव, दोनों के उस पराक्रम को परम अद्भुत मानकर सराहा।
कौरवा ऊचुः
श्लोक 10 (7.100.10)
किमद्भुततमं लोके भविताऽप्यथवा ह्यभूत् । यदश्वान्पार्थगोविन्दौ पाययामासतू रणे ॥
kimadbhutatamaṃ loke bhavitā'pyathavā hyabhūt | yadaśvānpārthagovindau pāyayāmāsatū raṇe
"संसार में इससे अधिक अद्भुत बात और क्या होगी, या कभी हुई होगी, कि पार्थ और गोविन्द ने रण के बीच घोड़ों को पानी पिलाया?"
श्लोक 11 (7.100.11)
भयं विपुलमस्मासु तावधत्तां नरोत्तमौ । तेजो विदधतुश्चोग्रं यत्सैन्यं तावकं विभो । दधारैको रणे पार्थो वेलेवोद्वृत्तमर्णवम् ॥
bhayaṃ vipulamasmāsu tāvadhattāṃ narottamau | tejo vidadhatuścograṃ yatsainyaṃ tāvakaṃ vibho | dadhāraiko raṇe pārtho velevodvṛttamarṇavam
"उन दोनों नरश्रेष्ठों ने हम पर बड़ा भय डाल दिया और उग्र तेज प्रकट किया; और हे प्रभो, आपकी उस सेना को पार्थ ने अकेले ही रण में रोक लिया, जैसे तट उमड़ते हुए समुद्र को रोक लेता है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 12 (7.100.12)
पार्थस्य शरसञ्छन्ने तस्मिन्सद्मनि भारत । आकाशमिव सम्प्राप्य विचेरुस्तत्र पक्षिणः ॥
pārthasya śarasañchanne tasminsadmani bhārata | ākāśamiva samprāpya vicerustatra pakṣiṇaḥ
हे भारत, पार्थ के बाणों से ढके उस घर में पक्षी ऐसे उड़ते फिरे, मानो आकाश में पहुँच गए हों।
श्लोक 13 (7.100.13)
न चैनं युधि तिष्ठन्तं सैन्येषु तव मारिष । अभ्यद्रवत्सुसङ्क्रुद्धः पुमान्कश्चित्तु तावकः ॥
na cainaṃ yudhi tiṣṭhantaṃ sainyeṣu tava māriṣa | abhyadravatsusaṅkruddhaḥ pumānkaścittu tāvakaḥ
हे मान्यवर, युद्ध में आपकी सेनाओं के बीच खड़े उन पर आपके पक्ष का एक भी पुरुष क्रोध में भरकर नहीं दौड़ा।
श्लोक 14 (7.100.14)
सर्वे विमनसोऽभूवंस्तव योधा विशाम्पते । सम्प्रेक्ष्य तत्र गोविन्दं पाण्डवं च धनञ्जयम् ॥
sarve vimanaso'bhūvaṃstava yodhā viśāmpate | samprekṣya tatra govindaṃ pāṇḍavaṃ ca dhanañjayam
हे प्रजानाथ, वहाँ गोविन्द और पाण्डव धनञ्जय को देखकर आपके सब योद्धा उदास हो गए।
श्लोक 15 (7.100.15)
अथ स्मयन्हृषीकेशः स्त्रीमध्य इव भारत । अर्जुनेन कृते सङ्ख्ये शरगर्भगृहे तदा ॥
atha smayanhṛṣīkeśaḥ strīmadhya iva bhārata | arjunena kṛte saṅkhye śaragarbhagṛhe tadā
तब रण में अर्जुन के बनाए बाणों के गर्भगृह में, हे भारत, स्त्रियों के बीच जैसे हँसते हुए हृषीकेश ने,
श्लोक 16 (7.100.16)
उपावर्तयदव्यग्रस्तानश्वान्पुष्करेक्षणः । मिषतां सर्वसैन्यानां त्वदीयानां विशाम्पते ॥
upāvartayadavyagrastānaśvānpuṣkarekṣaṇaḥ | miṣatāṃ sarvasainyānāṃ tvadīyānāṃ viśāmpate
उन कमलनयन ने निश्चिन्त भाव से, हे प्रजानाथ, आपकी सब सेनाओं के देखते-देखते उन घोड़ों को घुमाकर सँभाला।
श्लोक 17 (7.100.17)
उपावृत्त्योत्थितानश्वान्पाणिभ्यां पुष्करेक्षणः । सम्मार्जयन्रणे राजन्पश्यतां सर्वयोधिनाम् ॥
upāvṛttyotthitānaśvānpāṇibhyāṃ puṣkarekṣaṇaḥ | sammārjayanraṇe rājanpaśyatāṃ sarvayodhinām
उठे हुए घोड़ों को घुमाकर कमलनयन ने, हे राजन्, सब योद्धाओं के देखते-देखते रण में अपने हाथों से उन्हें सहलाया।
श्लोक 18 (7.100.18)
तेषां श्रमं च ग्लानिं च वमथुं वेपथुं व्रणान् । सर्वं व्यपानुदत्कृष्णः कुशलो ह्यश्वकर्मणि ॥
teṣāṃ śramaṃ ca glāniṃ ca vamathuṃ vepathuṃ vraṇān | sarvaṃ vyapānudatkṛṣṇaḥ kuśalo hyaśvakarmaṇi
घोड़ों की सेवा में कुशल कृष्ण ने उनकी थकान, ग्लानि, मुँह से झाग आना, काँपना और घाव, सब दूर कर दिए।
श्लोक 19 (7.100.19)
शल्यानुद्धृत्य पाणिभ्यां परिमृज्य च तान्हयान् । उपावर्त्य यथान्यायं पाययामास वारि सः ॥
śalyānuddhṛtya pāṇibhyāṃ parimṛjya ca tānhayān | upāvartya yathānyāyaṃ pāyayāmāsa vāri saḥ
उन्होंने दोनों हाथों से बाणों के फल निकाले, उन घोड़ों को सहलाया, विधिपूर्वक घुमाया-फिराया और उन्हें पानी पिलाया।
श्लोक 20 (7.100.20)
स ताँल्लब्धोदकान्स्नाताञ्जग्धान्नान्विगतक्लमान् । योजयामास संहृष्टः पुनरेव रथोत्तमे ॥
sa tām̐llabdhodakānsnātāñjagdhānnānvigataklamān | yojayāmāsa saṃhṛṣṭaḥ punareva rathottame
जल पी चुके, नहा चुके, चारा खा चुके और थकान से मुक्त उन घोड़ों को उन्होंने प्रसन्न होकर फिर उस उत्तम रथ में जोत दिया।
श्लोक 21 (7.100.21)
स तं रथवरं शौरिः सर्वशस्त्रभृतां वरः । समास्थाय महातेजाः सार्जुनः प्रययौ द्रुतम् ॥
sa taṃ rathavaraṃ śauriḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | samāsthāya mahātejāḥ sārjunaḥ prayayau drutam
सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी शौरि उस उत्तम रथ पर अर्जुन के साथ बैठे और तेजी से चल पड़े।
श्लोक 22 (7.100.22)
योजयित्वा हयांस्तस्य विधिदृष्टेन कर्मणा । रणे चचार गोविन्दस्तृणीकृत्य महारथान् ॥
yojayitvā hayāṃstasya vidhidṛṣṭena karmaṇā | raṇe cacāra govindastṛṇīkṛtya mahārathān
विधि में बताई रीति से घोड़ों को जोतकर गोविन्द महारथियों को तिनके के समान समझते हुए रण में विचरने लगे।
श्लोक 23 (7.100.23)
रथं रथवरस्याजौ युक्तं लब्धोदकैर्हयैः । दृष्ट्वा कुरुबलश्रेष्ठाः पुनर्विमनसोऽभवन् ॥
rathaṃ rathavarasyājau yuktaṃ labdhodakairhayaiḥ | dṛṣṭvā kurubalaśreṣṭhāḥ punarvimanaso'bhavan
जल पाए हुए घोड़ों से जुते हुए उस श्रेष्ठ रथी के रथ को युद्ध में देखकर कुरु-सेना के प्रमुख वीर फिर निराश हो गए।
श्लोक 24 (7.100.24)
विनिःस्वसन्तस्ते राजन्भग्नदंष्ट्रा इवोरगाः । धिगहोऽतिगतः पार्थः कृष्णश्चेत्यब्रुवन्पृथक् ॥
viniḥsvasantaste rājanbhagnadaṃṣṭrā ivoragāḥ | dhigaho'tigataḥ pārthaḥ kṛṣṇaścetyabruvanpṛthak
हे राजन्, वे टूटे दाँतों वाले सर्पों की तरह फुफकारते हुए अलग-अलग कहने लगे, "धिक्कार! हाय! पार्थ और कृष्ण तो निकल गए!"
श्लोक 25 (7.100.25)
तत्सैन्यं सर्वतो दृष्ट्वा रोमहर्षणमद्भुतम् । त्वरध्वमिति चाक्रन्दन्नैतदस्तीति चाब्रुवन् ॥
tatsainyaṃ sarvato dṛṣṭvā romaharṣaṇamadbhutam | tvaradhvamiti cākrandannaitadastīti cābruvan
उस अद्भुत और रोमांचकारी दृश्य को चारों ओर देखकर उस सेना ने "जल्दी करो!" कहकर पुकारा और "यह नहीं हो सकता!" कहा।
कौरवा ऊचुः
श्लोक 26 (7.100.26)
सर्वक्षत्रस्य मिषतो रथेनैकेन दंशितौ । बालः क्रीडनकेनेव कदर्थीकृत्य नो बलम् ॥
sarvakṣatrasya miṣato rathenaikena daṃśitau | bālaḥ krīḍanakeneva kadarthīkṛtya no balam
"सारे क्षत्रियों के देखते-देखते वे दोनों कवच पहने एक ही रथ में हमारी सेना को बच्चों के खिलौने की तरह तुच्छ बनाकर,"
श्लोक 27 (7.100.27)
क्रोशतां यतमानानामसंसक्तौ परन्तपौ । दर्शयित्वाऽत्मनो वीर्यं प्रयातौ सर्वराजसु ॥
krośatāṃ yatamānānāmasaṃsaktau parantapau | darśayitvā'tmano vīryaṃ prayātau sarvarājasu
"हमारे चिल्लाने और प्रयत्न करने पर भी, बिना किसी बाधा के, वे दोनों शत्रुसंतापक अपना पराक्रम दिखाकर सब राजाओं के बीच से चले गए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 28 (7.100.28)
यथा देवासुरे युद्धे तृणीकृत्य च दानवान् । इन्द्राविष्णू पुरा राजञ्जम्भस्य वधकाङ्क्षिणौ ॥
yathā devāsure yuddhe tṛṇīkṛtya ca dānavān | indrāviṣṇū purā rājañjambhasya vadhakāṅkṣiṇau
जैसे प्राचीन काल में देवासुर-संग्राम में जम्भ का वध चाहने वाले इन्द्र और विष्णु ने, हे राजन्, दानवों को तिनके के समान माना था।
श्लोक 29 (7.100.29)
तौ प्रयातौ पुनर्दृष्ट्वा तदाऽन्ये सैनिकाब्रुवन् । त्वरध्वं कुरवः सर्वे वधे कृष्णकिरीटिनोः ॥
tau prayātau punardṛṣṭvā tadā'nye sainikābruvan | tvaradhvaṃ kuravaḥ sarve vadhe kṛṣṇakirīṭinoḥ
उन दोनों को फिर आगे जाते देखकर दूसरे सैनिक बोले, "कुरुओ, सब शीघ्रता करो, कृष्ण और किरीटी को मारने के लिए!"
सैनिका ऊचुः
श्लोक 30 (7.100.30)
रथं युङ्क्त्वा हि दाशार्हो मिषतां सर्वधन्विनाम् । जयद्रथाय यात्येष कदर्थीकृत्य नो रणे ॥
rathaṃ yuṅktvā hi dāśārho miṣatāṃ sarvadhanvinām | jayadrathāya yātyeṣa kadarthīkṛtya no raṇe
"सब धनुर्धरों के देखते-देखते रथ जोतकर यह दाशार्ह हमें रण में तुच्छ बनाकर जयद्रथ के पास जा रहा है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 31 (7.100.31)
तत्र केचिन्मिथो राजन्समभाषन्त भूमिपाः । अदृष्टपूर्वं सङ्ग्रामे तद्दृष्ट्वा महदद्भुतम् ॥
tatra kecinmitho rājansamabhāṣanta bhūmipāḥ | adṛṣṭapūrvaṃ saṅgrāme taddṛṣṭvā mahadadbhutam
हे राजन्, वहाँ कुछ राजा आपस में बातें करने लगे; उन्होंने रण में वह अभूतपूर्व महान् आश्चर्य देखा था।
क्षत्रिया ऊचुः
श्लोक 32 (7.100.32)
सर्वसैन्यानि राजा च धृतराष्ट्रोऽत्ययं गतः । दुर्योधनापराधेन क्षत्रं कृत्स्ना च मेदिनी ॥
sarvasainyāni rājā ca dhṛtarāṣṭro'tyayaṃ gataḥ | duryodhanāparādhena kṣatraṃ kṛtsnā ca medinī
"दुर्योधन के अपराध से सब सेनाएँ और राजा धृतराष्ट्र विनाश को प्राप्त हो गए हैं; क्षत्रिय-वर्ग और सारी पृथ्वी भी"
श्लोक 33 (7.100.33)
विलयं समनुप्राप्ता तच्च राजा न बुध्यते । इत्येवं क्षत्रियास्तत्र ब्रुवन्त्यन्ये च भारत ॥
vilayaṃ samanuprāptā tacca rājā na budhyate | ityevaṃ kṣatriyāstatra bruvantyanye ca bhārata
"सर्वनाश को पहुँच गई है, और राजा यह समझते नहीं।" हे भारत, वहाँ क्षत्रिय और दूसरे लोग ऐसा कह रहे थे।
श्लोक 34 (7.100.34)
सिन्धुराजस्य यत्कृत्यं गतस्य यमसादनम् । तत्करोतु वृथादृष्टिर्धार्तराष्ट्रोऽनुपायवित् ॥
sindhurājasya yatkṛtyaṃ gatasya yamasādanam | tatkarotu vṛthādṛṣṭirdhārtarāṣṭro'nupāyavit
"यमलोक गए सिन्धुराज के लिए जो कुछ करना है, उसे निष्फल दृष्टि वाला, उपाय न जानने वाला धृतराष्ट्र का पुत्र करे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 35 (7.100.35)
ततः शीघ्रतरं प्रायात्पाण्डवः सैन्धवं प्रति । विवर्तमाने तिग्मांशौ हृष्टैः पीतोदकैर्हयैः ॥
tataḥ śīghrataraṃ prāyātpāṇḍavaḥ saindhavaṃ prati | vivartamāne tigmāṃśau hṛṣṭaiḥ pītodakairhayaiḥ
तब सूर्य के ढलते समय पाण्डव पानी पिए हुए प्रसन्न घोड़ों के साथ सैन्धव की ओर और भी तेजी से चले।
श्लोक 36 (7.100.36)
तं प्रयान्तं महाबाहुं सर्वशस्त्रभृतां वरम् । नाशक्नुवन्वारयितुं योधाः क्रुद्धमिवान्तकम् ॥
taṃ prayāntaṃ mahābāhuṃ sarvaśastrabhṛtāṃ varam | nāśaknuvanvārayituṃ yodhāḥ kruddhamivāntakam
सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ उन महाबाहु को, जो क्रुद्ध अन्तक की तरह बढ़े जा रहे थे, योद्धा रोक न सके।
श्लोक 37 (7.100.37)
विद्राव्य तु ततः सैन्यं पाण्डवः शत्रुतापनः । यथा मृगगणान्सिंहः सैन्धवार्थे व्यलोडयत् ॥
vidrāvya tu tataḥ sainyaṃ pāṇḍavaḥ śatrutāpanaḥ | yathā mṛgagaṇānsiṃhaḥ saindhavārthe vyaloḍayat
शत्रुओं को तपाने वाले पाण्डव ने सेना को खदेड़कर सैन्धव के लिए उसे उसी तरह मथ डाला जैसे सिंह मृगों के झुण्डों को।
श्लोक 38 (7.100.38)
गाहमानस्त्वनीकानि तूर्णमश्वानचोदयत् । बलाकाभं तु दाशार्हः पाञ्चजन्यं व्यनादयत् ॥
gāhamānastvanīkāni tūrṇamaśvānacodayat | balākābhaṃ tu dāśārhaḥ pāñcajanyaṃ vyanādayat
सेनाओं में घुसते हुए उन्होंने घोड़ों को तेजी से हाँका, और दाशार्ह ने बगुले की तरह श्वेत पाञ्चजन्य बजाया।
श्लोक 39 (7.100.39)
कौन्तेयेनाग्रतः सृष्टा न्यपतन्पृष्ठतः शराः । तूर्णात्तूर्णतरं ह्यश्वाः प्रावहन्वातरंहसः ॥
kaunteyenāgrataḥ sṛṣṭā nyapatanpṛṣṭhataḥ śarāḥ | tūrṇāttūrṇataraṃ hyaśvāḥ prāvahanvātaraṃhasaḥ
कुन्तीपुत्र के आगे छोड़े हुए बाण पीछे गिरते थे; वायु के समान वेग वाले घोड़े तेज से और तेज दौड़ते जाते थे।
श्लोक 40 (7.100.40)
ततो नृपतयः क्रुद्धाः परिवव्रुर्धनञ्जयम् । क्षत्रिया बहवश्चान्ये जयद्रथवधैषिणम् ॥
tato nṛpatayaḥ kruddhāḥ parivavrurdhanañjayam | kṣatriyā bahavaścānye jayadrathavadhaiṣiṇam
तब क्रुद्ध राजाओं और अनेक अन्य क्षत्रियों ने जयद्रथ के वध की इच्छा करने वाले धनञ्जय को घेर लिया।
श्लोक 41 (7.100.41)
सैन्येषु विप्रयातेषु धिष्ठितं पुरुषर्षभम् । दुर्योधनोऽन्वयात्पार्थं त्वरमाणो महाहवे ॥
sainyeṣu viprayāteṣu dhiṣṭhitaṃ puruṣarṣabham | duryodhano'nvayātpārthaṃ tvaramāṇo mahāhave
सेनाओं के बिखर जाने पर दुर्योधन उस महायुद्ध में पुरुषश्रेष्ठ पार्थ के पीछे शीघ्रता से चला, जो कुछ क्षण ठहरे हुए थे।
श्लोक 42 (7.100.42)
वातोद्धूतपताकं तं रथं जलदनिःस्वनम् । घोरं कपिध्वजं दृष्ट्वा विषण्णा रथिनोऽभवन् ॥
vātoddhūtapatākaṃ taṃ rathaṃ jaladaniḥsvanam | ghoraṃ kapidhvajaṃ dṛṣṭvā viṣaṇṇā rathino'bhavan
वायु से उड़ती पताकाओं वाले, मेघ-सी गर्जना करने वाले उस भयंकर कपिध्वज रथ को देखकर रथी योद्धा खिन्न हो गए।
श्लोक 43 (7.100.43)
दिवाकरेऽथ रजसा सर्वतः संवृते भृशम् । शरार्ताश्चरणे योधाः शेकुः कृष्णौ न वीक्षितुम् ॥
divākare'tha rajasā sarvataḥ saṃvṛte bhṛśam | śarārtāścaraṇe yodhāḥ śekuḥ kṛṣṇau na vīkṣitum
सूर्य के चारों ओर से धूल से अत्यन्त ढक जाने पर बाणों से पीड़ित योद्धा रण में दोनों कृष्णों को देख भी न सके।