द्रोण पर्व · अध्याय 99
अर्जुन विन्द-अनुविन्द का वध करते हैं और घोड़ों के लिए सरोवर बनाते हैं
अर्जुन और कृष्ण सैन्धव की ओर बढ़ते हैं; अर्जुन अपने बाणों से कौरव-सेना के बीच मार्ग बनाते हैं और कृष्ण रथ चलाने की अपनी निपुणता दिखाते हैं। घायल और थके घोड़ों की गति मन्द पड़ने पर अवन्ति के भाई विन्द और अनुविन्द आक्रमण करते हैं और अर्जुन के हाथों मारे जाते हैं। फिर घिर जाने पर अर्जुन कृष्ण से पूछते हैं कि अब क्या करें और घोड़ों को खोलने का सुझाव देते हैं; वे रथ से उतरकर अकेले ही अपने बाणों से सारी सेना को रोके रखते हैं। कृष्ण कहते हैं कि घोड़ों के लिए पानी नहीं है; अर्जुन भूमि को भेदकर सरोवर बना देते हैं और उसके चारों ओर बाणों का घर रच देते हैं, जिस पर कृष्ण उनकी प्रशंसा करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.99.1)
वर्तमाने तदा युद्धे द्रोणस्य सह पाण्डुभिः । परिवर्तमान आदित्ये तत्र सूर्ये च रश्मिभिः । रजसा कीर्यमाणाश्च मन्दीभूताश्च कौरवाः ॥
vartamāne tadā yuddhe droṇasya saha pāṇḍubhiḥ | parivartamāna āditye tatra sūrye ca raśmibhiḥ | rajasā kīryamāṇāśca mandībhūtāśca kauravāḥ
द्रोण का पाण्डवों के साथ युद्ध चल रहा था; सूर्य ढलने लगा था, और उसकी किरणों में धूल से ढके हुए कौरव मन्द और निस्तेज हो गए।
श्लोक 2 (7.99.2)
तिष्ठतां युध्यमानानां पुनरावर्ततामपि । भज्यतां जयतां चैव जगाम तदहः शनैः ॥
tiṣṭhatāṃ yudhyamānānāṃ punarāvartatāmapi | bhajyatāṃ jayatāṃ caiva jagāma tadahaḥ śanaiḥ
कोई डटे रहे, कोई लड़ते हुए फिर लौट पड़े, कोई टूटकर भागे और कोई जीतते रहे; इसी प्रकार वह दिन धीरे-धीरे बीतता गया।
श्लोक 3 (7.99.3)
तथा तेषु विषक्तेषु सैन्येषु जयगृद्धिषु । अर्जुनो वासुदेवश्च सैन्धवायैव जग्मतुः ॥
tathā teṣu viṣakteṣu sainyeṣu jayagṛddhiṣu | arjuno vāsudevaśca saindhavāyaiva jagmatuḥ
इस प्रकार विजय के लोभी वे सेनाएँ आपस में जूझती रहीं, और अर्जुन तथा वासुदेव सैन्धव की ओर ही बढ़ते चले गए।
श्लोक 4 (7.99.4)
रथमार्गप्रमाणं तु कौन्तेयो निशितैः शरैः । चकार यं च पन्थानं ययौ तेन जनार्दनः ॥
rathamārgapramāṇaṃ tu kaunteyo niśitaiḥ śaraiḥ | cakāra yaṃ ca panthānaṃ yayau tena janārdanaḥ
कुन्तीपुत्र ने अपने तीखे बाणों से रथ के चलने भर चौड़ा मार्ग बना दिया, और जनार्दन उसी मार्ग से रथ हाँकते चले।
श्लोक 5 (7.99.5)
यत्रयत्र रथो याति पाण्डवस्य महात्मनः । तत्रतत्रैव दीर्यन्ते सेनास्तव विशाम्पते ॥
yatrayatra ratho yāti pāṇḍavasya mahātmanaḥ | tatratatraiva dīryante senāstava viśāmpate
हे प्रजापालक, महात्मा पाण्डव का रथ जहाँ-जहाँ जाता, वहीं-वहीं आपकी सेनाएँ विदीर्ण होती जातीं।
श्लोक 6 (7.99.6)
रथशिक्षां तु दाशार्हो दर्शयामास वीर्यवान् । उत्तमाधममध्यानि मण्डलानि विदर्शयन् ॥
rathaśikṣāṃ tu dāśārho darśayāmāsa vīryavān | uttamādhamamadhyāni maṇḍalāni vidarśayan
पराक्रमी दाशार्ह ने रथ हाँकने की कुशलता दिखाई; वे उत्तम, निम्न और मध्यम, सब प्रकार के मण्डल (गोल चक्कर) दिखाते चल रहे थे।
श्लोक 7 (7.99.7)
ते तु नामाङ्किता बाणाः कालज्वलनसन्निभाः । स्नायुनद्धाः सुपर्वाणः पृथवो दीर्घगामिनः ॥
te tu nāmāṅkitā bāṇāḥ kālajvalanasannibhāḥ | snāyunaddhāḥ suparvāṇaḥ pṛthavo dīrghagāminaḥ
उनके नाम से अंकित वे बाण कालाग्नि के समान दहकते, स्नायु से बँधे, सुन्दर गाँठों वाले, चौड़े और दूर तक जाने वाले थे,
श्लोक 8 (7.99.8)
वैणवाश्चायसाश्चोग्रा ग्रसन्तो विविधानरीन् । रुधिरं पतगैः सार्धं प्राणिनां पपुराहवे ॥
vaiṇavāścāyasāścogrā grasanto vividhānarīn | rudhiraṃ patagaiḥ sārdhaṃ prāṇināṃ papurāhave
बाँस और लोहे के बने वे भयंकर बाण नाना प्रकार के शत्रुओं को निगलते हुए, उड़ने वाले पक्षियों के साथ, युद्ध में प्राणियों का रक्त पीते थे।
श्लोक 9 (7.99.9)
रथस्थितोऽग्रतः क्रोशं यानस्यत्यर्जुनः शरान् । रथे क्रोशमतिक्रान्ते तस्य ते घ्नन्ति शात्रवान् ॥
rathasthito'grataḥ krośaṃ yānasyatyarjunaḥ śarān | rathe krośamatikrānte tasya te ghnanti śātravān
रथ पर खड़े अर्जुन जिन बाणों को एक कोस आगे छोड़ते, रथ के एक कोस आगे निकल जाने पर उनके वे ही बाण शत्रुओं को मारते थे।
श्लोक 10 (7.99.10)
तार्क्ष्यमारुतरंहोभिर्वाजिभिः साधुवाहिभिः । यथाऽगच्छद्धृषीकेशः कृत्स्नं विस्मापयञ्जगत् ॥
tārkṣyamārutaraṃhobhirvājibhiḥ sādhuvāhibhiḥ | yathā'gacchaddhṛṣīkeśaḥ kṛtsnaṃ vismāpayañjagat
गरुड़ और वायु के समान वेग वाले, भली-भाँति रथ खींचने वाले घोड़ों से हृषीकेश ऐसे चले कि सारा संसार विस्मित हो उठा।
श्लोक 11 (7.99.11)
न तथा गच्छति रथस्तपनस्य विशाम्पते । नेन्द्रस्य न तु रुद्रस्य नापि वैश्रवणस्य च ॥
na tathā gacchati rathastapanasya viśāmpate | nendrasya na tu rudrasya nāpi vaiśravaṇasya ca
हे प्रजानाथ, सूर्य का रथ भी वैसे नहीं चलता, न इन्द्र का, न रुद्र का, और न वैश्रवण का।
श्लोक 12 (7.99.12)
नान्यस्य समरे राजन्गतपूर्वस्तथा रथः । यथा ययावर्जुनस्य मनोभिप्रायशीघ्रगः ॥
nānyasya samare rājangatapūrvastathā rathaḥ | yathā yayāvarjunasya manobhiprāyaśīghragaḥ
हे राजन्, युद्ध में किसी दूसरे का रथ पहले कभी वैसा नहीं गया, जैसा अर्जुन का रथ गया, जो उनके मन के संकल्प के समान तीव्र चलता था।
श्लोक 13 (7.99.13)
प्रविश्य तु रणे राजन्केशवः परवीरहा । सेनामध्ये हयांस्तूर्णं चोदयामास भारत ॥
praviśya tu raṇe rājankeśavaḥ paravīrahā | senāmadhye hayāṃstūrṇaṃ codayāmāsa bhārata
हे राजन्, शत्रुवीरों का संहार करने वाले केशव ने रण में घुसकर, हे भारत, सेना के बीच घोड़ों को तेजी से बढ़ाया।
श्लोक 14 (7.99.14)
ततस्तस्य रथौघस्य मध्यं प्राप्य हयोत्तमाः । कृच्छ्रेणरथमूहुस्तं क्षुत्पिपासासमन्विताः ॥
tatastasya rathaughasya madhyaṃ prāpya hayottamāḥ | kṛcchreṇarathamūhustaṃ kṣutpipāsāsamanvitāḥ
तब रथों के उस समूह के बीच पहुँचकर भूख-प्यास से पीड़ित वे श्रेष्ठ घोड़े उस रथ को बड़ी कठिनाई से खींच पा रहे थे।
श्लोक 15 (7.99.15)
क्षताश्च बहुभिः शस्त्रैर्युद्धशौण्डैरनेकशः । मण्डलानि विचित्राणि विचेरुस्ते मुहुर्मुहुः ॥
kṣatāśca bahubhiḥ śastrairyuddhaśauṇḍairanekaśaḥ | maṇḍalāni vicitrāṇi viceruste muhurmuhuḥ
युद्ध में निपुण अनेक योद्धाओं के बहुत-से शस्त्रों से बार-बार घायल होकर भी वे विचित्र मण्डल बनाते हुए बार-बार दौड़ते रहे।
श्लोक 16 (7.99.16)
हतानां वाजिनागानां रथानां च नरैः सह । उपरिष्टादतिक्रान्ताः शैलाभानां सहस्रशः ॥
hatānāṃ vājināgānāṃ rathānāṃ ca naraiḥ saha | upariṣṭādatikrāntāḥ śailābhānāṃ sahasraśaḥ
मरे हुए घोड़ों, हाथियों और रथों के, मनुष्यों सहित, पर्वत जैसे सहस्रों ढेरों के ऊपर से वे निकल गए।
श्लोक 17 (7.99.17)
श्रमेण महता युक्तास्ते हया वातरंहसः । मन्दवेगगता राजन्संवृत्तास्तत्र संयुगे ॥
śrameṇa mahatā yuktāste hayā vātaraṃhasaḥ | mandavegagatā rājansaṃvṛttāstatra saṃyuge
हे राजन्, वायु के समान वेग वाले वे घोड़े भारी थकान से भरकर वहाँ युद्ध में मन्द गति के हो गए थे।
श्लोक 18 (7.99.18)
एतस्मिन्नन्तरे वीरावावन्त्यौ भ्रातरौ नृप । सहसेनौ समार्च्छेतां पाण्डवं क्लान्तवाहनम् ॥
etasminnantare vīrāvāvantyau bhrātarau nṛpa | sahasenau samārcchetāṃ pāṇḍavaṃ klāntavāhanam
हे राजन्, इसी बीच अवन्ति के दो वीर भाई अपनी सेना सहित उस पाण्डव पर चढ़ आए, जिसके घोड़े थक चुके थे।
श्लोक 19 (7.99.19)
तावर्जुनं चतुःषष्ट्या सप्तत्या च जनार्दनम् । शराणां च शतैरश्वानविध्येतां मुदान्वितौ ॥
tāvarjunaṃ catuḥṣaṣṭyā saptatyā ca janārdanam | śarāṇāṃ ca śatairaśvānavidhyetāṃ mudānvitau
उन दोनों ने प्रसन्न होकर अर्जुन को चौंसठ बाणों से, जनार्दन को सत्तर से, और घोड़ों को सैकड़ों बाणों से बेधा।
श्लोक 20 (7.99.20)
तावर्जुनो महाराज नवभिर्नतपर्वभिः । आजघान रणे क्रुद्धो मर्मज्ञो मर्मभेदिभिः ॥
tāvarjuno mahārāja navabhirnataparvabhiḥ | ājaghāna raṇe kruddho marmajño marmabhedibhiḥ
हे महाराज, मर्मों के ज्ञाता अर्जुन ने रण में क्रुद्ध होकर उन दोनों को मर्म भेदने वाले, झुकी हुई गाँठों वाले नौ बाणों से मारा।
श्लोक 21 (7.99.21)
ततस्तौ तु शरौघेण बीभत्सुं सहकेशवम् । आच्छादयेतां संरब्धौ सिंहनादं च चक्रतुः ॥
tatastau tu śaraugheṇa bībhatsuṃ sahakeśavam | ācchādayetāṃ saṃrabdhau siṃhanādaṃ ca cakratuḥ
तब उन दोनों ने क्रोध में भरकर बीभत्सु को केशव सहित बाणों की बाढ़ से ढक दिया और सिंहनाद किया।
श्लोक 22 (7.99.22)
तयोस्तु धनुषी मुष्टौ भल्लाभ्यां श्वेतवाहनः । चिच्छेद समरे तूर्णं भूय एव धनञ्जयः । अथान्यैर्विशिखैस्तूर्णं ध्वजौ च कनकोज्ज्वलौ ॥
tayostu dhanuṣī muṣṭau bhallābhyāṃ śvetavāhanaḥ | ciccheda samare tūrṇaṃ bhūya eva dhanañjayaḥ | athānyairviśikhaistūrṇaṃ dhvajau ca kanakojjvalau
तब श्वेतवाहन धनञ्जय ने रण में दो भल्लों से फिर शीघ्र उन दोनों के मुट्ठी पर पकड़े हुए धनुष काट दिए, और दूसरे बाणों से तुरन्त उनकी सोने-सी दमकती दोनों ध्वजाएँ भी काट डालीं।
श्लोक 23 (7.99.23)
अथान्ये धनुषी राजन्प्रगृह्य समरे तदा । पाण्डवं भृशसङ्क्रुद्धावर्दयामासतुः शरैः ॥
athānye dhanuṣī rājanpragṛhya samare tadā | pāṇḍavaṃ bhṛśasaṅkruddhāvardayāmāsatuḥ śaraiḥ
हे राजन्, तब उन दोनों ने रण में दूसरे धनुष लेकर अत्यन्त क्रुद्ध हो पाण्डव को बाणों से पीड़ित किया।
श्लोक 24 (7.99.24)
तयोस्तु भृशसङ्क्रुद्धः शराभ्यां पाण्डुनन्दनः । धनुषी चिच्छिदे तूर्णं भूय एव धनञ्जयः ॥
tayostu bhṛśasaṅkruddhaḥ śarābhyāṃ pāṇḍunandanaḥ | dhanuṣī cicchide tūrṇaṃ bhūya eva dhanañjayaḥ
अत्यन्त क्रुद्ध पाण्डुपुत्र धनञ्जय ने दो बाणों से उन दोनों के धनुष फिर शीघ्र काट दिए।
श्लोक 25 (7.99.25)
तथान्यैर्विशिखैस्तूर्णं रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः । जघानाश्वांस्तथा सूतौ पार्ष्णी च सपदानुगौ ॥
tathānyairviśikhaistūrṇaṃ rukmapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | jaghānāśvāṃstathā sūtau pārṣṇī ca sapadānugau
फिर सोने के पंखों वाले, पत्थर पर तेज किए हुए अन्य बाणों से उन्होंने उनके घोड़ों को, दोनों सारथियों को और दोनों पार्ष्णि-रक्षकों को, उनके पैदल अनुचरों सहित, मार डाला।
श्लोक 26 (7.99.26)
ज्येष्ठस्य च शिरः कायात्क्षुरप्रेण न्यकृन्तत । स पपात हतः पृथ्व्यां वातरुग्ण इव द्रुमः ॥
jyeṣṭhasya ca śiraḥ kāyātkṣurapreṇa nyakṛntata | sa papāta hataḥ pṛthvyāṃ vātarugṇa iva drumaḥ
और क्षुरप्र बाण से उन्होंने बड़े भाई का सिर धड़ से काट डाला; वह मरकर आँधी से उखड़े हुए वृक्ष की तरह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 27 (7.99.27)
विन्दं तु निहतं दृष्ट्वा ह्यनुविन्दः प्रतापवान् । हताश्वं रथमुत्सृज्य गदां गृह्य महाबलः ॥
vindaṃ tu nihataṃ dṛṣṭvā hyanuvindaḥ pratāpavān | hatāśvaṃ rathamutsṛjya gadāṃ gṛhya mahābalaḥ
विन्द को मरा देखकर पराक्रमी और महाबली अनुविन्द ने घोड़े मर जाने पर रथ छोड़ दिया और गदा हाथ में ले ली।
श्लोक 28 (7.99.28)
अभ्यवर्तत सङ्ग्रामे भ्रातुर्वधमनुस्मरन् । गदया रथिनां श्रेष्ठो नृत्यन्निव महारथः ॥
abhyavartata saṅgrāme bhrāturvadhamanusmaran | gadayā rathināṃ śreṣṭho nṛtyanniva mahārathaḥ
भाई के वध का स्मरण करते हुए रथियों में श्रेष्ठ वह महारथी गदा से मानो नाचता हुआ युद्ध में आगे बढ़ा।
श्लोक 29 (7.99.29)
अनुविन्दस्तु गदया ललाटे मधुसूदनम् । स्पष्ट्वा नाकम्पयत्क्रुद्धो मैनाकमिव पर्वतम् ॥
anuvindastu gadayā lalāṭe madhusūdanam | spaṣṭvā nākampayatkruddho mainākamiva parvatam
अनुविन्द ने क्रुद्ध होकर गदा से मधुसूदन के ललाट पर प्रहार किया, परन्तु जैसे मैनाक पर्वत को कोई हिला नहीं सकता, वैसे उन्हें हिला न सका।
श्लोक 30 (7.99.30)
तस्यार्जुनः शरैः षड्भिर्ग्रीवां पादौ भुजौ शिरः । निचकर्त स सञ्छन्नः पपाताद्रिचयो यथा ॥
tasyārjunaḥ śaraiḥ ṣaḍbhirgrīvāṃ pādau bhujau śiraḥ | nicakarta sa sañchannaḥ papātādricayo yathā
अर्जुन ने छह बाणों से उसकी गर्दन, दोनों पैर, दोनों भुजाएँ और सिर काट डाले; कटकर वह पर्वत की शिला-राशि की तरह गिर पड़ा।
श्लोक 31 (7.99.31)
ततस्तौ निहतौ दृष्ट्वा तयो राजन्पदानुगाः । अभ्यद्रुवन्त सङ्क्रुद्धाः किरन्तः शतशः शरान् ॥
tatastau nihatau dṛṣṭvā tayo rājanpadānugāḥ | abhyadruvanta saṅkruddhāḥ kirantaḥ śataśaḥ śarān
हे राजन्, उन दोनों को मरा देखकर उनके पैदल अनुचर क्रोध में भरकर सैकड़ों बाण बरसाते हुए टूट पड़े।
श्लोक 32 (7.99.32)
तानर्जुनः शरैस्तूर्णं निहत्य भरतर्षभ । व्यरोचत यथा वह्निर्दावं दग्ध्वा हिमात्यये ॥
tānarjunaḥ śaraistūrṇaṃ nihatya bharatarṣabha | vyarocata yathā vahnirdāvaṃ dagdhvā himātyaye
हे भरतश्रेष्ठ, अर्जुन ने उन्हें बाणों से तुरन्त मारकर वैसी ही शोभा पाई, जैसे शीत ऋतु बीतने पर वन को जलाकर अग्नि शोभित होती है।
श्लोक 33 (7.99.33)
तयोः सेनामतिक्रम्य कृच्छ्रादिव धनञ्जयः । विबभौ जलदं हित्वा दिवाकर इवोदितः ॥
tayoḥ senāmatikramya kṛcchrādiva dhanañjayaḥ | vibabhau jaladaṃ hitvā divākara ivoditaḥ
उन दोनों की सेना को मानो बड़ी कठिनाई से पार करके धनञ्जय ऐसे शोभित हुए, जैसे बादल को छोड़कर उदित हुआ सूर्य।
श्लोक 34 (7.99.34)
तं दृष्ट्वा कुरवस्त्रस्ताः प्रहृष्टाश्चाभवन्पुनः । अभ्यवर्तन्त पार्थं च समन्ताद्भरतर्षभ ॥
taṃ dṛṣṭvā kuravastrastāḥ prahṛṣṭāścābhavanpunaḥ | abhyavartanta pārthaṃ ca samantādbharatarṣabha
उन्हें देखकर भयभीत कौरव फिर हर्ष से भर उठे, और हे भरतश्रेष्ठ, चारों ओर से पार्थ पर टूट पड़े।
श्लोक 35 (7.99.35)
श्रान्तं चैनं समालक्ष्य ज्ञात्वा दूरे च सैन्धवम् । सिंहनादेन महता सर्वतः पर्यवारयन् ॥
śrāntaṃ cainaṃ samālakṣya jñātvā dūre ca saindhavam | siṃhanādena mahatā sarvataḥ paryavārayan
उन्हें थका हुआ देखकर और यह जानकर कि सैन्धव दूर है, उन्होंने बड़े सिंहनाद के साथ उन्हें सब ओर से घेर लिया।
श्लोक 36 (7.99.36)
तांस्तु दृष्ट्वा सुसंरब्धानुत्स्मयन्पुरुषर्षभः । शनकैरिव दाशार्हमर्जुनो वाक्यमब्रवीत् ॥
tāṃstu dṛṣṭvā susaṃrabdhānutsmayanpuruṣarṣabhaḥ | śanakairiva dāśārhamarjuno vākyamabravīt
उन्हें अत्यन्त क्रुद्ध देखकर पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन मुसकराते हुए दाशार्ह से मानो धीरे-से यह बात बोले।
अर्जुन उवाच
श्लोक 37 (7.99.37)
शरार्दिताश्च ग्लानाश्च हया दूरे च सैन्धवः । किमिहानन्तरं कार्यं साधिष्ठं तव रोचते ॥
śarārditāśca glānāśca hayā dūre ca saindhavaḥ | kimihānantaraṃ kāryaṃ sādhiṣṭhaṃ tava rocate
"घोड़े बाणों से पीड़ित और थके हुए हैं, और सैन्धव दूर है। अब आगे क्या करना चाहिए? आपको क्या सबसे उत्तम जान पड़ता है?"
श्लोक 38 (7.99.38)
ब्रूहि कृष्ण यथातत्त्वं त्वं हि प्राज्ञतमः सदा । भवन्नेत्रा रणे शत्रून्विजेष्यन्तीह पाण्डवाः ॥
brūhi kṛṣṇa yathātattvaṃ tvaṃ hi prājñatamaḥ sadā | bhavannetrā raṇe śatrūnvijeṣyantīha pāṇḍavāḥ
"कृष्ण, जो ठीक हो वह बताइए; आप तो सदा सबसे अधिक बुद्धिमान हैं। आप जैसे नेता के रहते पाण्डव रण में शत्रुओं को जीतेंगे।"
श्लोक 39 (7.99.39)
मम त्वनन्तरं कृत्यं यद्वै तत्त्वं निबोध मे । हयान्विमुच्य हि सुखं विशल्यान्कुरु माधव ॥
mama tvanantaraṃ kṛtyaṃ yadvai tattvaṃ nibodha me | hayānvimucya hi sukhaṃ viśalyānkuru mādhava
"मुझे जो आगे करना उचित लगता है, वह मुझसे सुनिए: माधव, घोड़ों को खोलकर उन्हें आराम से बाणों की नोकों से मुक्त कीजिए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 40 (7.99.40)
एवमुक्तस्तु पार्थेन केशवः प्रत्युवाच तम् । ममाप्येतन्मतं पार्थ यदितं ते प्रभाषितम् ॥
evamuktastu pārthena keśavaḥ pratyuvāca tam | mamāpyetanmataṃ pārtha yaditaṃ te prabhāṣitam
पार्थ के ऐसा कहने पर केशव ने उनसे उत्तर दिया, "पार्थ, तुमने जो कहा, वही मेरा भी मत है।"
अर्जुन उवाच
श्लोक 41 (7.99.41)
अहमावारयिष्यामि सर्वसैन्यानि केशव । त्वमप्यत्र यथान्यायं कुरु कार्यमनन्तरम् ॥
ahamāvārayiṣyāmi sarvasainyāni keśava | tvamapyatra yathānyāyaṃ kuru kāryamanantaram
"केशव, मैं सब सेनाओं को रोक लूँगा; आप भी यहाँ उचित रीति से आगे का कार्य कीजिए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 42 (7.99.42)
सोऽवतीर्य रथोपस्थादसम्भ्रान्तो धनञ्जयः । गाण्डीवं धनुरादाय तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥
so'vatīrya rathopasthādasambhrānto dhanañjayaḥ | gāṇḍīvaṃ dhanurādāya tasthau giririvācalaḥ
निर्भ्रान्त धनञ्जय रथ के आसन से उतरे और गाण्डीव धनुष लेकर पर्वत की तरह अचल खड़े हो गए।
श्लोक 43 (7.99.43)
तमभ्यधावन्क्रोशन्तः क्षत्रिया जयकाङ्क्षिणः । इदं छिद्रमिति ज्ञात्वा धरणीस्थं धनञ्जयम् ॥
tamabhyadhāvankrośantaḥ kṣatriyā jayakāṅkṣiṇaḥ | idaṃ chidramiti jñātvā dharaṇīsthaṃ dhanañjayam
विजय की इच्छा वाले क्षत्रिय, "यही अवसर है" यह समझकर, धनञ्जय को भूमि पर खड़ा देख, चिल्लाते हुए उन पर दौड़े।
श्लोक 44 (7.99.44)
तमेकं रथवंशेन महता पर्यवारयन् । विकर्षन्तश्च चापानि विसृजन्तश्च सायकान् ॥
tamekaṃ rathavaṃśena mahatā paryavārayan | vikarṣantaśca cāpāni visṛjantaśca sāyakān
रथों के बहुत बड़े समूह से उन्होंने उस अकेले को घेर लिया; वे धनुष खींचते और बाण छोड़ते जाते थे।
श्लोक 45 (7.99.45)
शस्त्राणि च विचित्राणि क्रुद्धास्तत्र व्यदर्शयन् । छादयन्तः शरैः पार्थं मेघा इव दिवाकरम् ॥
śastrāṇi ca vicitrāṇi kruddhāstatra vyadarśayan | chādayantaḥ śaraiḥ pārthaṃ meghā iva divākaram
क्रुद्ध होकर उन्होंने वहाँ नाना प्रकार के विचित्र शस्त्र दिखाए और जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं, वैसे पार्थ को बाणों से ढक दिया।
श्लोक 46 (7.99.46)
अभ्यद्रवन्त वेगेन क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् । नरसिंहं रथोदाराः सिंहं मत्ता इव द्विपाः ॥
abhyadravanta vegena kṣatriyāḥ kṣatriyarṣabham | narasiṃhaṃ rathodārāḥ siṃhaṃ mattā iva dvipāḥ
रथों में उदार वे क्षत्रिय क्षत्रियों में श्रेष्ठ उस नरसिंह पर वेग से टूट पड़े, जैसे मतवाले हाथी सिंह पर।
श्लोक 47 (7.99.47)
तत्र पार्थस्य भुजयोर्महद्बलमदृश्यत । यत्क्रुद्धो बहुलाः सेनाः सर्वतः समवारयत् ॥
tatra pārthasya bhujayormahadbalamadṛśyata | yatkruddho bahulāḥ senāḥ sarvataḥ samavārayat
तब पार्थ की भुजाओं का महान् बल दिखाई दिया, क्योंकि क्रुद्ध होकर उन्होंने सब ओर से आती हुई बहुत-सी सेनाओं को रोक लिया।
श्लोक 48 (7.99.48)
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्विषतां सर्वतो विभुः । इषुभिर्बहुभिस्तूर्णं सर्वानेव समावृणोत् ॥
astrairastrāṇi saṃvārya dviṣatāṃ sarvato vibhuḥ | iṣubhirbahubhistūrṇaṃ sarvāneva samāvṛṇot
सर्वसमर्थ अर्जुन ने शत्रुओं के अस्त्रों को अपने अस्त्रों से रोककर बहुत-से बाणों से उन सबको तुरन्त ढक दिया।
श्लोक 49 (7.99.49)
तत्रान्तरिक्षे बाणानां प्रगाढानां विशाम्पते । सङ्घर्षेण महार्चिष्मान्पावकः समजायत ॥
tatrāntarikṣe bāṇānāṃ pragāḍhānāṃ viśāmpate | saṅgharṣeṇa mahārciṣmānpāvakaḥ samajāyata
हे प्रजानाथ, आकाश में गहरे धँसे बाणों की रगड़ से वहाँ बड़ी लपटों वाली आग उत्पन्न हो गई।
श्लोक 50 (7.99.50)
तत्रतत्र महेष्वासैः श्वसद्भिः शोणितोक्षितैः । हयैर्नागैश्च सम्भिन्नैर्नदद्भिश्चारिकर्शन ॥
tatratatra maheṣvāsaiḥ śvasadbhiḥ śoṇitokṣitaiḥ | hayairnāgaiśca sambhinnairnadadbhiścārikarśana
हे शत्रुसंहारक, जहाँ-तहाँ हाँफते, रक्त से लथपथ महाधनुर्धरों से और घायल, चिंघाड़ते हाथी-घोड़ों से,
श्लोक 51 (7.99.51)
संरब्धैश्चारिभिर्वीरैः प्रार्थयद्भिर्जयं मृधे । एकस्थैर्बहुभिः क्रुद्धैरूष्मेव समजायत ॥
saṃrabdhaiścāribhirvīraiḥ prārthayadbhirjayaṃ mṛdhe | ekasthairbahubhiḥ kruddhairūṣmeva samajāyata
तथा क्रुद्ध, रण में विजय की कामना करने वाले, एक स्थान पर इकट्ठे बहुत-से शत्रुवीरों से मानो एक गर्मी-सी उठ आई।
श्लोक 52 (7.99.52)
शरोर्मिणं ध्वजावर्तं नागनक्रं दुरत्ययम् । पदातिमत्स्यकलिलं शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनम् ॥
śarormiṇaṃ dhvajāvartaṃ nāganakraṃ duratyayam | padātimatsyakalilaṃ śaṅkhadundubhiniḥsvanam
वह एक समुद्र था जिसकी लहरें बाण थे, भँवर ध्वजाएँ, मगर हाथी; जो पार करने में कठिन था, पैदल सैनिकरूपी मछलियों से भरा था, और शंखों तथा दुन्दुभियों के घोष से गूँजता था;
श्लोक 53 (7.99.53)
असङ्ख्येयमपारं च रजो नीरमतीव च । उष्णीषकमठं छत्रपताकाफेनमालिनम् ॥
asaṅkhyeyamapāraṃ ca rajo nīramatīva ca | uṣṇīṣakamaṭhaṃ chatrapatākāphenamālinam
जो असंख्य और अपार था, जिसका जल अत्यन्त धूल था, पगड़ियाँ जिसके कछुए थे, और छत्रों तथा पताकाओं के फेन की माला जिसने पहन रखी थी;
श्लोक 54 (7.99.54)
रथसागरमक्षोभ्यं मातङ्गाङ्गशिलाचितम् । वेलाभूतस्तदा पार्थः पत्रिभिः समवारयत् ॥
rathasāgaramakṣobhyaṃ mātaṅgāṅgaśilācitam | velābhūtastadā pārthaḥ patribhiḥ samavārayat
हाथियों के शरीररूपी शिलाओं से पटे उस अक्षोभ्य रथ-समुद्र को तट बनकर पार्थ ने तब अपने बाणों से रोक लिया।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 55 (7.99.55)
अर्जुने धरणीं प्राप्ते हयहस्ते च केशवे । एतदन्तरमासाद्य कथं पार्थो न घातितः ॥
arjune dharaṇīṃ prāpte hayahaste ca keśave | etadantaramāsādya kathaṃ pārtho na ghātitaḥ
"जब अर्जुन भूमि पर आ गए थे और केशव घोड़ों को सँभालने में लगे थे, तो इस अवसर का लाभ उठाकर पार्थ को मार क्यों नहीं गिराया गया?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 56 (7.99.56)
सद्यः पार्थिव पार्थेन निरुद्धाः सर्वपार्थिवाः । रथस्था धरणीस्थेन वाक्यमच्छान्दसं यथा ॥
sadyaḥ pārthiva pārthena niruddhāḥ sarvapārthivāḥ | rathasthā dharaṇīsthena vākyamacchāndasaṃ yathā
"हे राजन्, पृथ्वी पर खड़े पार्थ ने रथों पर खड़े सब राजाओं को तुरन्त रोक लिया, जैसे छन्द से विरुद्ध वाक्य रोक दिया जाता है।"
श्लोक 57 (7.99.57)
स पार्थः पार्थिवान्सर्वान्भूमिस्थोऽपि रथस्थितान् । एको निवारयामास लोभः सर्वगुणानिव ॥
sa pārthaḥ pārthivānsarvānbhūmistho'pi rathasthitān | eko nivārayāmāsa lobhaḥ sarvaguṇāniva
"भूमि पर खड़े होकर भी पार्थ ने रथों पर स्थित सब राजाओं को अकेले रोक लिया, जैसे लोभ सब गुणों को रोक देता है।"
श्लोक 58 (7.99.58)
ततो जनार्दनः सङ्ख्ये प्रियं पुरुषसत्तमम् । असम्भ्रान्तो महाबाहुरर्जुनं वाक्यमब्रवीत् ॥
tato janārdanaḥ saṅkhye priyaṃ puruṣasattamam | asambhrānto mahābāhurarjunaṃ vākyamabravīt
तब रणभूमि में महाबाहु जनार्दन ने शान्त भाव से अपने प्रिय पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन से यह बात कही।
वासुदेव उवाच
श्लोक 59 (7.99.59)
उदपानमिहाश्वानां नालमस्ति रणेऽर्जुन । परीप्सन्ते जलं चेमे पेयं न त्ववगाहनम् ॥
udapānamihāśvānāṃ nālamasti raṇe'rjuna | parīpsante jalaṃ ceme peyaṃ na tvavagāhanam
"अर्जुन, यहाँ रण में घोड़ों के लिए पर्याप्त पानी पीने का स्थान नहीं है; ये पीने के लिए जल चाहते हैं, नहाने के लिए नहीं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 60 (7.99.60)
इदमस्तीत्यसम्भ्रान्तो ब्रुवन्नस्त्रेण मेदिनीम् । अभिहत्यार्जुनश्चक्रे वाजिपानं सरः शुभम् ॥
idamastītyasambhrānto bruvannastreṇa medinīm | abhihatyārjunaścakre vājipānaṃ saraḥ śubham
"यह रहा," कहकर अर्जुन ने निश्चिन्त भाव से अस्त्र से भूमि को भेदा और घोड़ों के पानी पीने के लिए एक सुन्दर सरोवर बना दिया।
श्लोक 61 (7.99.61)
हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम् । सुविस्तीर्णं प्रसन्नाम्भः प्रफुल्लवरपङ्कजम् ॥
haṃsakāraṇḍavākīrṇaṃ cakravākopaśobhitam | suvistīrṇaṃ prasannāmbhaḥ praphullavarapaṅkajam
वह सरोवर हंसों और कारण्डव पक्षियों से भरा, चक्रवाकों से सुशोभित, अत्यन्त विस्तृत, निर्मल जल वाला और खिले हुए सुन्दर कमलों वाला था;
श्लोक 62 (7.99.62)
कूर्ममत्स्यगणाकीर्णमगाधमृषिसेवितम् । आगच्छन्नारदमुनिर्दर्शनार्थं कृतं क्षणात् ॥
kūrmamatsyagaṇākīrṇamagādhamṛṣisevitam | āgacchannāradamunirdarśanārthaṃ kṛtaṃ kṣaṇāt
कछुओं और मछलियों के समूहों से भरा, अथाह और ऋषियों से सेवित था; और क्षण भर में बने उसे देखने के लिए मुनि नारद आए।
श्लोक 63 (7.99.63)
शरवंशं शरस्थूणं शराच्छादनमद्भुतम् । शरवेश्माकरोत्पार्थस्त्वष्टेवाद्भुतकर्मकृत् ॥
śaravaṃśaṃ śarasthūṇaṃ śarācchādanamadbhutam | śaraveśmākarotpārthastvaṣṭevādbhutakarmakṛt
त्वष्टा की तरह अद्भुत कर्म करने वाले पार्थ ने बाणों का अद्भुत घर बना दिया, जिसकी बल्लियाँ बाणों की थीं, खम्भा बाणों का और छत बाणों की।
श्लोक 64 (7.99.64)
ततः प्रहस्य गोविन्दः साधुसाध्वित्यथाब्रवीत् । शरवेश्मनि पार्थेन कृते तस्मिन्महात्मना ॥
tataḥ prahasya govindaḥ sādhusādhvityathābravīt | śaraveśmani pārthena kṛte tasminmahātmanā
महात्मा पार्थ के उस बाण-गृह को बना देने पर गोविन्द ने हँसकर कहा, "साधु, साधु!"