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द्रोण पर्व · अध्याय 108

द्रौपदी-पुत्रों द्वारा शल का वध; भीम से अलम्बुस की पराजय

सौमदत्ति (शल) द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को घायल करता है, किन्तु वे उसे घेर लेते हैं और सहदेव-पुत्र उसका सिर काट डालता है; कौरव-सेना भाग खड़ी होती है। उधर राक्षस अलम्बुस भीम से भिड़ता है; भीम के मूर्च्छित होकर फिर सँभल जाने पर वह अपने भाई बक के वध का उलाहना देकर अदृश्य हो जाता है और पाण्डव-सेना पर शस्त्रों तथा रक्त की नदी की वर्षा करता है। भीम त्वाष्ट्र अस्त्र चलाकर उसकी माया नष्ट कर देते हैं और उसे द्रोण की सेना की ओर खदेड़ देते हैं; पाण्डव विजय का सिंहनाद करते हैं।

अध्याय 107अध्याय-सूचीअध्याय 109

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.108.1)

द्रौपदेयान्महेष्वासान्सौमदत्तिर्महायशाः । एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सप्तभिः ॥

draupadeyānmaheṣvāsānsaumadattirmahāyaśāḥ | ekaikaṃ pañcabhirviddhvā punarvivyādha saptabhiḥ

महायशस्वी सौमदत्ति ने द्रौपदी के महाधनुर्धर पुत्रों में से प्रत्येक को पाँच बाणों से बींधकर फिर सात बाणों से बींध डाला।

श्लोक 2 (7.108.2)

ते पीडिता भृशं तेन रौद्रेण सहसा विभो । प्रमूढा नैव विविदुर्मृधे कृत्यं स्म किंचन ॥

te pīḍitā bhṛśaṃ tena raudreṇa sahasā vibho | pramūḍhā naiva vividurmṛdhe kṛtyaṃ sma kiṃcana

हे विभो! उस रौद्र योद्धा से सहसा अत्यन्त पीड़ित होकर वे घबरा गए, और युद्ध में उन्हें कुछ भी करना न सूझा।

श्लोक 3 (7.108.3)

नाकुलिश्च शतानीकः सौमदत्तिं नरर्षभम् । द्वाभ्यां विद्ध्वाऽनदद्धृष्टः शराभ्यां शत्रुकर्शनः ॥

nākuliśca śatānīkaḥ saumadattiṃ nararṣabham | dvābhyāṃ viddhvā'nadaddhṛṣṭaḥ śarābhyāṃ śatrukarśanaḥ

शत्रुओं को क्षीण करने वाले नकुल-पुत्र शतानीक ने नरश्रेष्ठ सौमदत्ति को दो बाणों से बींधकर निर्भय होकर गर्जना की।

श्लोक 4 (7.108.4)

तथेतरे रणे यत्तास्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः । विव्यधुः समरे तूर्णं सौमदत्तिममर्षणम् ॥

tathetare raṇe yattāstribhistribhirajihmagaiḥ | vivyadhuḥ samare tūrṇaṃ saumadattimamarṣaṇam

इसी प्रकार अन्य वीरों ने भी युद्ध में डटकर तीन-तीन सीधे जाने वाले बाणों से अमर्षशील सौमदत्ति को शीघ्रता से बींध दिया।

श्लोक 5 (7.108.5)

स तान्प्रति महाराज पञ्च चिक्षेप सायकान् । एकैकं हृदि चाजघ्ने एकैकेन महायशाः ॥

sa tānprati mahārāja pañca cikṣepa sāyakān | ekaikaṃ hṛdi cājaghne ekaikena mahāyaśāḥ

हे महाराज! उसने उन पर पाँच बाण छोड़े और उन महायशस्वी ने एक-एक बाण से उनमें से प्रत्येक की छाती में प्रहार किया।

श्लोक 6 (7.108.6)

ततस्ते भ्रातरः पञ्च शरैर्विद्धा महात्मना । परिवार्य रणे वीरं विव्यधुः सायकैर्भृशम् ॥

tataste bhrātaraḥ pañca śarairviddhā mahātmanā | parivārya raṇe vīraṃ vivyadhuḥ sāyakairbhṛśam

तब उस महात्मा के बाणों से बिंधे हुए वे पाँचों भाई रण में उस वीर को घेरकर बाणों से उसे खूब बींधने लगे।

श्लोक 7 (7.108.7)

आर्जुनिस्तु हयांस्तस्य चतुर्भिर्निशितैः शरैः । प्रेषयामास सङ्क्रुद्धो यमस्य सदनं प्रति ॥

ārjunistu hayāṃstasya caturbhirniśitaiḥ śaraiḥ | preṣayāmāsa saṅkruddho yamasya sadanaṃ prati

अर्जुन-पुत्र ने क्रुद्ध होकर चार तीखे बाणों से उसके घोड़ों को यम के धाम भेज दिया।

श्लोक 8 (7.108.8)

भैमसेनिर्धनुश्छित्त्वा सौमदत्तेर्महात्मनः । ननाद बलवन्नादं विव्याध च शितैः शरैः ॥

bhaimasenirdhanuśchittvā saumadattermahātmanaḥ | nanāda balavannādaṃ vivyādha ca śitaiḥ śaraiḥ

भीमसेन के पुत्र ने महात्मा सौमदत्ति का धनुष काटकर बड़ी गर्जना की और तीखे बाणों से उसे बींध दिया।

श्लोक 9 (7.108.9)

यौधिष्ठिरिर्ध्वजं तस्य च्छित्त्वा भूमावपातयत् । नाकुलिश्चाथ यन्तारं रथनीडादपाहरत् ॥

yaudhiṣṭhirirdhvajaṃ tasya cchittvā bhūmāvapātayat | nākuliścātha yantāraṃ rathanīḍādapāharat

युधिष्ठिर के पुत्र ने उसकी ध्वजा काटकर भूमि पर गिरा दी, और नकुल के पुत्र ने रथ के भीतर से उसके सारथि को खींच लिया।

श्लोक 10 (7.108.10)

साहदेविस्तु तं ज्ञात्वा भ्रातृभिर्विमुखीकृतम् । क्षुरप्रेण शिरो राजन्निचकर्त महात्मनः ॥

sāhadevistu taṃ jñātvā bhrātṛbhirvimukhīkṛtam | kṣurapreṇa śiro rājannicakarta mahātmanaḥ

हे राजन्! भाइयों द्वारा उसे विमुख कर दिया गया जानकर सहदेव के पुत्र ने क्षुरप्र बाण से उस महात्मा का सिर काट डाला।

श्लोक 11 (7.108.11)

तच्छिरो न्यपतद्भूमौ तपनीयविभूषितम् । अभासयद्रणोद्देशं बालसूर्यसमप्रभम् ॥

tacchiro nyapatadbhūmau tapanīyavibhūṣitam | abhāsayadraṇoddeśaṃ bālasūryasamaprabham

सोने से विभूषित वह सिर भूमि पर गिरा और उदय होते सूर्य के समान प्रभा से रणभूमि को प्रकाशित करने लगा।

श्लोक 12 (7.108.12)

सौमदत्तेः शिरो दृष्ट्वा निपतत्तन्महात्मनः । वित्रस्तास्तावका राजन्प्रदुद्रुवुरनेकधा ॥

saumadatteḥ śiro dṛṣṭvā nipatattanmahātmanaḥ | vitrastāstāvakā rājanpradudruvuranekadhā

हे राजन्! महात्मा सौमदत्ति का सिर गिरता देखकर आपके योद्धा भयभीत होकर अनेक दिशाओं में भाग खड़े हुए।

श्लोक 13 (7.108.13)

अलम्बुसस्तु समरे भीमसेनं महाबलम् । योधयामास सङ्क्रुद्धो लक्ष्मणं रावणिर्यथा ॥

alambusastu samare bhīmasenaṃ mahābalam | yodhayāmāsa saṅkruddho lakṣmaṇaṃ rāvaṇiryathā

उधर अलम्बुस ने क्रोध में भरकर रण में महाबली भीमसेन से वैसे ही युद्ध किया जैसे रावण के पुत्र ने लक्ष्मण से किया था।

श्लोक 14 (7.108.14)

सम्प्रयुद्धौ रणे दृष्ट्वा तावुभौ नरराक्षसौ । विस्मयः सर्वभूतानां भयं चासीत्सुदारुणम् ॥

samprayuddhau raṇe dṛṣṭvā tāvubhau nararākṣasau | vismayaḥ sarvabhūtānāṃ bhayaṃ cāsītsudāruṇam

युद्ध में भिड़े हुए उन दोनों, नर और राक्षस, को देखकर सब प्राणियों को विस्मय हुआ और अत्यन्त भीषण भय भी हुआ।

श्लोक 15 (7.108.15)

आर्श्यशृङ्गिं ततो भीमो नवभिर्निशितैः शरैः । विव्याध प्रहसन्राजन्राक्षसेन्द्रममर्षणम् ॥

ārśyaśṛṅgiṃ tato bhīmo navabhirniśitaiḥ śaraiḥ | vivyādha prahasanrājanrākṣasendramamarṣaṇam

हे राजन्! तब भीम ने हँसते हुए क्रोधी राक्षसराज आर्श्यशृङ्गि को नौ तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 16 (7.108.16)

तद्रक्षः समरे विद्धं कृत्वा नादं भयावहम् । अभ्यद्रवत्ततो भीमं ये च तस्य पदानुगाः ॥

tadrakṣaḥ samare viddhaṃ kṛtvā nādaṃ bhayāvaham | abhyadravattato bhīmaṃ ye ca tasya padānugāḥ

रण में बिंधा हुआ वह राक्षस भयंकर गर्जना करके अपने अनुचरों सहित भीम पर टूट पड़ा।

श्लोक 17 (7.108.17)

स भीमं पञ्चभिर्विद्ध्वा शरैः सन्नतपर्वभिः । भैमान्परिजघानाशु रथांस्त्रिशतमाहवे । पुनश्चतुःशतान्हत्वा भीमं विव्याध पत्रिणा ॥

sa bhīmaṃ pañcabhirviddhvā śaraiḥ sannataparvabhiḥ | bhaimānparijaghānāśu rathāṃstriśatamāhave | punaścatuḥśatānhatvā bhīmaṃ vivyādha patriṇā

उसने सुदृढ़ गाँठों वाले पाँच बाणों से भीम को बींधकर युद्ध में भीम के तीन सौ रथों को शीघ्र मार डाला; फिर चार सौ और मारकर एक पंखदार बाण से भीम को बींध दिया।

श्लोक 18 (7.108.18)

सोऽतिविद्धस्तथा भीमो राक्षसेन महाबलः । निषसाद रथोपस्थे मूर्च्छयाऽभिपरिप्लुतः ॥

so'tividdhastathā bhīmo rākṣasena mahābalaḥ | niṣasāda rathopasthe mūrcchayā'bhipariplutaḥ

राक्षस के प्रहार से अत्यन्त बिंधा हुआ महाबली भीम मूर्च्छा में डूबकर रथ के भीतर बैठ गया।

श्लोक 19 (7.108.19)

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां मारुतिः क्रोधमूर्च्छितः । विकृष्य कार्मुकं घोरं भारसाधनमुत्तमम् । अलम्बुसं शरैस्तीक्ष्णैरर्दयामास सर्वतः ॥

pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ mārutiḥ krodhamūrcchitaḥ | vikṛṣya kārmukaṃ ghoraṃ bhārasādhanamuttamam | alambusaṃ śaraistīkṣṇairardayāmāsa sarvataḥ

फिर चेतना लौटने पर क्रोध से भरे वायुपुत्र ने भारी काम साधने में श्रेष्ठ अपने भयंकर धनुष को खींचकर तीखे बाणों से अलम्बुस को चारों ओर से पीड़ित किया।

श्लोक 20 (7.108.20)

स विद्धो बहुभिर्बाणैर्नीलाञ्जनचयोपमः । शुशुभे सर्वतो राजन्प्रफुल्ल इव किंशुकः ॥

sa viddho bahubhirbāṇairnīlāñjanacayopamaḥ | śuśubhe sarvato rājanpraphulla iva kiṃśukaḥ

हे राजन्! बहुत-से बाणों से बिंधा हुआ, काले अंजन के ढेर-सा वह राक्षस चारों ओर से खिले हुए पलाश के वृक्ष की भाँति शोभित हुआ।

श्लोक 21 (7.108.21)

स वध्यमानः समरे भीमचापच्युतैः शरैः । स्मरन्भ्रातृवधं चैव पाण्डवेन महात्मना । घोरं रूपमथो कृत्वा भीमसेनमभाषत ॥

sa vadhyamānaḥ samare bhīmacāpacyutaiḥ śaraiḥ | smaranbhrātṛvadhaṃ caiva pāṇḍavena mahātmanā | ghoraṃ rūpamatho kṛtvā bhīmasenamabhāṣata

भीम के धनुष से छूटे बाणों से रण में मारा जाता हुआ, महात्मा पाण्डव (भीम) द्वारा अपने भाई के वध का स्मरण करता हुआ, वह भयंकर रूप धारण करके भीमसेन से बोला —

अलम्बुस उवाच

श्लोक 22 (7.108.22)

तिष्ठेदानीं रणे पार्थ पश्य मेऽद्य पराक्रमम् ॥

tiṣṭhedānīṃ raṇe pārtha paśya me'dya parākramam

हे पार्थ! अब रण में ठहर, और आज मेरा पराक्रम देख।

श्लोक 23 (7.108.23)

बको नाम सुदुर्बुद्धे राक्षसप्रवरो बली । परोक्षं मम तद्वृत्तं यद्भ्राता मे हतस्त्वया ॥

bako nāma sudurbuddhe rākṣasapravaro balī | parokṣaṃ mama tadvṛttaṃ yadbhrātā me hatastvayā

अरे दुर्बुद्धि! बक नाम का एक बलवान् राक्षस-श्रेष्ठ था। मेरी आँखों से परे जो हुआ, कि तूने मेरे भाई को मार डाला, वह मैं नहीं भूला।

सञ्जय उवाच

श्लोक 24 (7.108.24)

एवमुक्त्वा ततो भीममन्तर्धानं गतस्तदा । महता शरवर्षेण भृशं तं समवाकिरत् ॥

evamuktvā tato bhīmamantardhānaṃ gatastadā | mahatā śaravarṣeṇa bhṛśaṃ taṃ samavākirat

यह कहकर वह उसी क्षण अन्तर्धान हो गया और भीम पर भारी बाण-वर्षा से चारों ओर से बौछार करने लगा।

श्लोक 25 (7.108.25)

भीमस्तु समरे राजन्नदृश्ये राक्षसे तदा । आकाशं पूरयामास शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

bhīmastu samare rājannadṛśye rākṣase tadā | ākāśaṃ pūrayāmāsa śaraiḥ sannataparvabhiḥ

हे राजन्! राक्षस के अदृश्य हो जाने पर भीम ने झुकी हुई गाँठों वाले बाणों से आकाश को भर दिया।

श्लोक 26 (7.108.26)

स वध्यमानो भीमेन निमेषाद्रथमास्थितः । जगाम धरणीं चैव क्षुद्रः खं सहसाऽगमत् ॥

sa vadhyamāno bhīmena nimeṣādrathamāsthitaḥ | jagāma dharaṇīṃ caiva kṣudraḥ khaṃ sahasā'gamat

भीम के प्रहारों से बिंधता हुआ वह पल भर में रथ पर आ खड़ा हुआ; वह नीच कभी धरती पर उतर जाता और सहसा आकाश में चला जाता।

श्लोक 27 (7.108.27)

उच्चावचानि रूपाणि चकार सुबहूनि च । अणुर्बृहत्पुनः स्थूलो नादान्मुञ्चन्निवाम्बुदः ॥

uccāvacāni rūpāṇi cakāra subahūni ca | aṇurbṛhatpunaḥ sthūlo nādānmuñcannivāmbudaḥ

उसने ऊँचे-नीचे, छोटे-बड़े, बहुत-से रूप धारण किए; कभी सूक्ष्म, कभी विशाल, कभी स्थूल होकर वह मेघ के समान गर्जनाएँ करता था।

श्लोक 28 (7.108.28)

निपेतुर्गगनाच्चैव शरधाराः सहस्रशः । शक्तयः कणपाः प्रासाः शूलपट्टसतोमराः ॥

nipeturgaganāccaiva śaradhārāḥ sahasraśaḥ | śaktayaḥ kaṇapāḥ prāsāḥ śūlapaṭṭasatomarāḥ

आकाश से हजारों बाण-धाराएँ, शक्तियाँ, कणप, प्रास, शूल, पट्टस और तोमर बरसने लगे,

श्लोक 29 (7.108.29)

शतघ्न्यः परिघाश्चैव भिण्डिपालाः परश्वथाः । शिलाः खड्गा गुडाश्चैव ऋष्टीर्वज्राणि चैव ह ॥

śataghnyaḥ parighāścaiva bhiṇḍipālāḥ paraśvathāḥ | śilāḥ khaḍgā guḍāścaiva ṛṣṭīrvajrāṇi caiva ha

शतघ्नियाँ, परिघ, भिण्डिपाल, फरसे, शिलाएँ, खड्ग, गुड़, ऋष्टियाँ और वज्र भी।

श्लोक 30 (7.108.30)

सा राक्षसविसृष्टा तु शस्त्रवृष्टिः सुदारुणा । जघान पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान्रणमूर्धनि ॥

sā rākṣasavisṛṣṭā tu śastravṛṣṭiḥ sudāruṇā | jaghāna pāṇḍuputrasya sainikānraṇamūrdhani

राक्षस की छोड़ी हुई वह अत्यन्त भयंकर शस्त्र-वर्षा रण के अग्रभाग में पाण्डव (भीम) के सैनिकों को मारने लगी।

श्लोक 31 (7.108.31)

उच्चावचास्तथा वाचो व्याजहार समन्ततः । तेन पाण्डवसैन्यानां सूदिता युधि वारणाः ॥

uccāvacāstathā vāco vyājahāra samantataḥ | tena pāṇḍavasainyānāṃ sūditā yudhi vāraṇāḥ

वह चारों ओर ऊँचे-नीचे सब प्रकार के स्वरों में चिल्लाता था; और उसके द्वारा पाण्डव-सेनाओं के हाथी युद्ध में मारे गए,

श्लोक 32 (7.108.32)

हयाश्च बहवो राजन्पत्तयश्च तथा पुनः । रथेभ्यो रथिनः पेतुस्तस्य नुन्नाः स्म सायकैः ॥

hayāśca bahavo rājanpattayaśca tathā punaḥ | rathebhyo rathinaḥ petustasya nunnāḥ sma sāyakaiḥ

और हे राजन्! बहुत-से घोड़े, पैदल सैनिक और रथी भी उसके बाणों से मारे जाकर रथों से गिर पड़े।

श्लोक 33 (7.108.33)

शोणितोदां रथावर्तां हस्तिग्राहसमाकुलाम् । छत्रहंसां कर्दमिनीं बाहुपन्नगसङ्कुलाम् ॥

śoṇitodāṃ rathāvartāṃ hastigrāhasamākulām | chatrahaṃsāṃ kardaminīṃ bāhupannagasaṅkulām

उसने रक्त के जल वाली, रथों के भँवरों वाली, हाथियों रूपी मगरों से भरी, छत्र-रूपी हंसों वाली, कीचड़ से भरी और भुजा-रूपी सर्पों से व्याप्त —

श्लोक 34 (7.108.34)

नदीं प्रवर्तयामास रक्षोगणसमाकुलाम् । वहन्तीं बहुधा राजंश्चेदिपाञ्चालसृञ्जयान् ॥

nadīṃ pravartayāmāsa rakṣogaṇasamākulām | vahantīṃ bahudhā rājaṃścedipāñcālasṛñjayān

राक्षसों के झुण्डों से भरी, ऐसी नदी बहा दी, हे राजन्! जो चेदियों, पाञ्चालों और सृञ्जयों को अनेक प्रकार से बहाए लिए जा रही थी।

श्लोक 35 (7.108.35)

तं तथा समरे राजन्विचरन्तमभीतवत् । पाण्डवा भृशसंविग्नाः प्रापश्यंस्तस्य विक्रमम् ॥

taṃ tathā samare rājanvicarantamabhītavat | pāṇḍavā bhṛśasaṃvignāḥ prāpaśyaṃstasya vikramam

हे राजन्! रण में निर्भय होकर विचरते हुए उसके पराक्रम को पाण्डवों ने अत्यन्त व्याकुल होकर देखा।

श्लोक 36 (7.108.36)

तावकानां तु सैन्यानां प्रहर्षः समजायत । वादित्रनिनदश्चोग्रः सुमहान्रोमहर्षणः ॥

tāvakānāṃ tu sainyānāṃ praharṣaḥ samajāyata | vāditraninadaścograḥ sumahānromaharṣaṇaḥ

तब आपकी सेनाओं में हर्ष छा गया और वाद्यों का अत्यन्त उग्र, रोमांचकारी महानाद हुआ।

श्लोक 37 (7.108.37)

तं श्रुत्वा निनदं घोरं तव सैन्यस्य पाण्डवः । नामृष्यत यथा नागस्तलशब्दं समीरितम् ॥

taṃ śrutvā ninadaṃ ghoraṃ tava sainyasya pāṇḍavaḥ | nāmṛṣyata yathā nāgastalaśabdaṃ samīritam

आपकी सेना का वह भयंकर नाद सुनकर पाण्डव (भीम) उसे सह न सका, जैसे हाथी हथेली की ताल की ध्वनि को नहीं सह पाता।

श्लोक 38 (7.108.38)

ततः क्रोधाभिताम्राक्षो निर्दहन्निव पावकः । सन्दधे त्वाष्ट्रमस्त्रं स स्वयं त्वष्टेव मारुतिः ॥

tataḥ krodhābhitāmrākṣo nirdahanniva pāvakaḥ | sandadhe tvāṣṭramastraṃ sa svayaṃ tvaṣṭeva mārutiḥ

तब क्रोध से लाल आँखों वाले, मानो सब कुछ भस्म करते हुए अग्नि के समान वायुपुत्र ने स्वयं त्वष्टा की भाँति त्वाष्ट्र अस्त्र का सन्धान किया।

श्लोक 39 (7.108.39)

ततः शरसहस्राणि प्रादुरासन्समन्ततः । तैः शरैस्तव सैन्यस्य विद्रवः सुमहानभूत् ॥

tataḥ śarasahasrāṇi prādurāsansamantataḥ | taiḥ śaraistava sainyasya vidravaḥ sumahānabhūt

तब चारों ओर हजारों बाण प्रकट हो गए, और उन बाणों से आपकी सेना में भारी भगदड़ मच गई।

श्लोक 40 (7.108.40)

तदस्त्रं प्रेरितं तेन भीमसेनेन संयुगे । राक्षसस्य महामायां हत्वा राक्षसमार्दयत् ॥

tadastraṃ preritaṃ tena bhīmasenena saṃyuge | rākṣasasya mahāmāyāṃ hatvā rākṣasamārdayat

युद्ध में भीमसेन के प्रेरित किए हुए उस अस्त्र ने राक्षस की महामाया को नष्ट करके राक्षस को पीड़ित किया।

श्लोक 41 (7.108.41)

स वध्यमानो बहुधा भीमसेनेन राक्षसः । सन्त्यज्य समरे भीमं द्रोणानीकमुपाद्रवत् ॥

sa vadhyamāno bahudhā bhīmasenena rākṣasaḥ | santyajya samare bhīmaṃ droṇānīkamupādravat

भीमसेन के द्वारा अनेक प्रकार से मारा जाता हुआ वह राक्षस रण में भीम को छोड़कर द्रोण की सेना की ओर भाग गया।

श्लोक 42 (7.108.42)

तस्मिंस्तु निर्जिते राजन्राक्षसेन्द्रे महात्मना । अनादयन्सिंहनादैः पाण्डवाः सर्वतो दिशम् ॥

tasmiṃstu nirjite rājanrākṣasendre mahātmanā | anādayansiṃhanādaiḥ pāṇḍavāḥ sarvato diśam

हे राजन्! उस राक्षसराज के महात्मा भीम से हार जाने पर पाण्डवों ने सब दिशाओं को सिंहनादों से गुँजा दिया।

श्लोक 43 (7.108.43)

अपूजयन्मारुतिं च संहृष्टास्ते महाबलम् । प्रह्रादमिव दैतेया यथा शक्रं मरुद्गणाः ॥

apūjayanmārutiṃ ca saṃhṛṣṭāste mahābalam | prahrādamiva daiteyā yathā śakraṃ marudgaṇāḥ

प्रसन्न होकर उन्होंने महाबली वायुपुत्र का वैसे ही सम्मान किया जैसे दैत्य प्रह्राद का और मरुद्गण इन्द्र का करते हैं।

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