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द्रोण पर्व · अध्याय 109

घटोत्कच द्वारा अलम्बुस का वध

द्रोण को पाण्डव-सेना में तबाही मचाते देख घटोत्कच रथ पर निकल पड़ता है और राक्षस अलम्बुस से भिड़ता है; दोनों शस्त्रों और मायाओं से वैसे ही लड़ते हैं जैसे कभी राम और रावण लड़े थे। भीम आदि पाण्डवों के अलम्बुस को घेरने पर वह छूटकर उन्हें घायल करता है, किन्तु घटोत्कच उसके रथ को तोड़ देता है, उससे गुँथ जाता है और अन्त में उसे उठाकर भूमि पर पटककर चूर कर देता है। पाण्डव-सेना हर्ष से गरज उठती है और युधिष्ठिर घटोत्कच को गले लगाते हैं।

अध्याय 108अध्याय-सूचीअध्याय 110

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (7.109.1)

किरन्तं शरवर्षाणि रोषाद्द्रोणं महाहवे । वित्रासयन्तं तां सेनां कौन्तेयानां महीपते ॥

kirantaṃ śaravarṣāṇi roṣāddroṇaṃ mahāhave | vitrāsayantaṃ tāṃ senāṃ kaunteyānāṃ mahīpate

हे पृथ्वीपते! महायुद्ध में क्रोध से बाणों की वर्षा करते हुए और कुन्ती-पुत्रों की उस सेना को त्रस्त करते हुए द्रोण को —

श्लोक 2 (7.109.2)

दृष्ट्वा ततो महेष्वासो निघ्नन्तं च रथान्भृशम् । घटोत्कचो महाबाहू रणायाभिजगाम ह ॥

dṛṣṭvā tato maheṣvāso nighnantaṃ ca rathānbhṛśam | ghaṭotkaco mahābāhū raṇāyābhijagāma ha

तथा रथों को बुरी तरह मारते देखकर, महान् धनुर्धर महाबाहु घटोत्कच युद्ध के लिए आगे बढ़ा।

श्लोक 3 (7.109.3)

पिशाचवदनैर्युक्तं रथं काञ्चनभूषितम् । समास्थाय महाराज नानाप्रहरणैर्युतः ॥

piśācavadanairyuktaṃ rathaṃ kāñcanabhūṣitam | samāsthāya mahārāja nānāpraharaṇairyutaḥ

हे महाराज! पिशाच-जैसे मुखों वाले अश्वों से जुते, सोने से सजे रथ पर सवार होकर, अनेक शस्त्रों से सुसज्जित,

श्लोक 4 (7.109.4)

दंशितस्तपनीयेन कवचेन सुवर्चसा । भूषणैराचिताङ्गश्च नदन्निव च तोयदः ॥

daṃśitastapanīyena kavacena suvarcasā | bhūṣaṇairācitāṅgaśca nadanniva ca toyadaḥ

चमकते सुनहरे कवच से ढका, आभूषणों से अलंकृत अंगों वाला, मेघ की भाँति गरजता हुआ,

श्लोक 5 (7.109.5)

हैडिम्बेयः सुसङ्क्रुद्धो द्रोणमभ्यद्रवद्बली । तमभ्यधावदायान्तं क्रुद्धरूपमलम्बुसः ॥

haiḍimbeyaḥ susaṅkruddho droṇamabhyadravadbalī | tamabhyadhāvadāyāntaṃ kruddharūpamalambusaḥ

अत्यन्त क्रुद्ध बलवान् हिडिम्बा-पुत्र द्रोण पर टूट पड़ा; और उसे आते देख भयंकर रूप वाला अलम्बुस उस पर दौड़ा।

श्लोक 6 (7.109.6)

ऋक्षचर्मपरिक्षिप्तं रथमास्थाय दंशितः । रक्तोष्ठः सधनुष्पाणिः प्रांशुः कल्प इव स्थितः ॥

ṛkṣacarmaparikṣiptaṃ rathamāsthāya daṃśitaḥ | raktoṣṭhaḥ sadhanuṣpāṇiḥ prāṃśuḥ kalpa iva sthitaḥ

रीछ की खाल से ढके रथ पर कवच पहने सवार, लाल होंठों वाला, धनुष हाथ में लिए वह ऊँचे कद का कल्पवृक्ष के समान खड़ा था।

श्लोक 7 (7.109.7)

क्षिपञ्छतघ्नीर्विपुलाः मुसलोपमतोमरान् । मुसण्ठीर्बहुलाश्चैव त्रिशूलानपि पट्टसान् ॥

kṣipañchataghnīrvipulāḥ musalopamatomarān | musaṇṭhīrbahulāścaiva triśūlānapi paṭṭasān

विशाल शतघ्नियाँ, मूसल-जैसे तोमर, बहुत-से मुसण्ठि, त्रिशूल और पट्टस फेंकता हुआ,

श्लोक 8 (7.109.8)

कर्पराञ्छतधारांश्च पिनाकान्विविधांस्तथा । चक्राणि च क्षुरप्राणि क्षेपणीश्च कटङ्कटान् ॥

karparāñchatadhārāṃśca pinākānvividhāṃstathā | cakrāṇi ca kṣuraprāṇi kṣepaṇīśca kaṭaṅkaṭān

कर्पर, सौ धार वाले अस्त्र, नाना प्रकार के पिनाक, चक्र, क्षुरप्र, क्षेपणी और कटङ्कट,

श्लोक 9 (7.109.9)

नाराचान्विविधानस्यन्सकङ्कोलूकवायसान् । चिक्षेप धनुरादाय निनदन्भैरवान्रवान् ॥

nārācānvividhānasyansakaṅkolūkavāyasān | cikṣepa dhanurādāya ninadanbhairavānravān

उसने धनुष उठाकर कङ्क, उल्लू और कौए के पंखों वाले नाना प्रकार के नाराच बरसाए, और भयंकर गर्जनाएँ कीं।

श्लोक 10 (7.109.10)

तं रौद्रं क्रूरमायान्तं दृष्ट्वा कालमिवागतम् । प्राद्रवद्भयसंविग्ना राजन्पाण्डववाहिनी ॥

taṃ raudraṃ krūramāyāntaṃ dṛṣṭvā kālamivāgatam | prādravadbhayasaṃvignā rājanpāṇḍavavāhinī

उस भयंकर, क्रूर राक्षस को काल के समान आता देखकर, हे राजन्! पाण्डवों की सेना भय से व्याकुल होकर भाग चली।

श्लोक 11 (7.109.11)

सात्यकिस्तु रथव्याघ्रो दृष्ट्वा तं राक्षसं युधि । अभ्ययादमरप्रख्यो भ्रामयित्वा महद्धनुः ॥

sātyakistu rathavyāghro dṛṣṭvā taṃ rākṣasaṃ yudhi | abhyayādamaraprakhyo bhrāmayitvā mahaddhanuḥ

तब रथियों में व्याघ्र, देवताओं के समान तेजस्वी सात्यकि उस राक्षस को युद्ध में देखकर अपने विशाल धनुष को घुमाते हुए उसकी ओर बढ़े।

श्लोक 12 (7.109.12)

अभ्यद्रवच्च तद्रक्षस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । अलम्बुसं राक्षसेन्द्रं सोऽस्त्रवर्षैरवाकिरत् ॥

abhyadravacca tadrakṣastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt | alambusaṃ rākṣasendraṃ so'stravarṣairavākirat

"ठहर, ठहर!" कहते हुए वे उस राक्षस पर दौड़े और राक्षसराज अलम्बुस को अस्त्रों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 13 (7.109.13)

ततः पाण्डवसैन्यानि विद्रुतान्यथ भारत । निरीक्ष्याभ्यद्रवत्तूर्णं त्वरमाणो घटोत्कचः ॥

tataḥ pāṇḍavasainyāni vidrutānyatha bhārata | nirīkṣyābhyadravattūrṇaṃ tvaramāṇo ghaṭotkacaḥ

हे भारत! तब पाण्डव-सेनाओं को भागते देखकर घटोत्कच शीघ्रता करता हुआ तुरन्त आगे बढ़ा।

श्लोक 14 (7.109.14)

चिक्षेप च गदाशक्तीस्तोमरानथ पट्टसान् । हेमचित्रत्सरूनुग्रान्खड्गानाकाशसप्रभान् ॥

cikṣepa ca gadāśaktīstomarānatha paṭṭasān | hemacitratsarūnugrānkhaḍgānākāśasaprabhān

उसने गदाएँ, शक्तियाँ, तोमर, पट्टस, और सोने से चित्रित मूठों वाले, आकाश के समान चमकते उग्र खड्ग फेंके।

श्लोक 15 (7.109.15)

अन्योन्यमारादालोक्य राक्षसौ तौ महाबलौ । भैरवं नदतुर्नादान्सतोयाविव तोयदौ ॥

anyonyamārādālokya rākṣasau tau mahābalau | bhairavaṃ nadaturnādānsatoyāviva toyadau

पास से एक-दूसरे को देखकर वे दोनों महाबली राक्षस जल से भरे दो बादलों की भाँति भयंकर गर्जना करने लगे।

श्लोक 16 (7.109.16)

ततः प्रववृते युद्धं घोरं राक्षससिंहयोः । यादृगेव पुरा वृत्तं रामरावणयोर्मृधे ॥

tataḥ pravavṛte yuddhaṃ ghoraṃ rākṣasasiṃhayoḥ | yādṛgeva purā vṛttaṃ rāmarāvaṇayormṛdhe

तब उन दोनों राक्षस-सिंहों में वैसा ही घोर युद्ध छिड़ गया, जैसा पूर्वकाल में राम और रावण के बीच हुआ था।

श्लोक 17 (7.109.17)

तौ शक्तीश्च पिनाकांश्च वज्रान्खड्गान्परश्वथान् । अन्योन्यमभिसङ्क्रुद्धौ तदा व्यसृजतामुभौ ॥

tau śaktīśca pinākāṃśca vajrānkhaḍgānparaśvathān | anyonyamabhisaṅkruddhau tadā vyasṛjatāmubhau

अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन दोनों ने एक-दूसरे पर शक्तियाँ, पिनाक, वज्र, खड्ग और फरसे चलाए।

श्लोक 18 (7.109.18)

आकृष्यमाणे धनुषि तयोर्बाहुबलेन च । यन्त्रेणेव तदा राजन्भृशं नादान्प्रचक्रतुः ॥

ākṛṣyamāṇe dhanuṣi tayorbāhubalena ca | yantreṇeva tadā rājanbhṛśaṃ nādānpracakratuḥ

हे राजन्! अपनी भुजाओं के बल से धनुष खींचते हुए वे दोनों मानो किसी यन्त्र की-सी ध्वनि से भारी नाद करने लगे।

श्लोक 19 (7.109.19)

अलम्बुसस्ततश्चक्रं कृतान्तज्वलनप्रभम् । घटोत्कचाय चिक्षेप यत्नमास्थाय वीर्यवान् ॥

alambusastataścakraṃ kṛtāntajvalanaprabham | ghaṭotkacāya cikṣepa yatnamāsthāya vīryavān

तब बलवान् अलम्बुस ने यत्नपूर्वक घटोत्कच पर काल की अग्नि के समान प्रज्वलित चक्र फेंका।

श्लोक 20 (7.109.20)

तद्भैमसेनिः सम्प्रेक्ष्य चक्रं वेगवदन्तरे । गदया ताडयामास तद्दीर्णं शतधाऽभवत् ॥

tadbhaimaseniḥ samprekṣya cakraṃ vegavadantare | gadayā tāḍayāmāsa taddīrṇaṃ śatadhā'bhavat

भीमसेन के पुत्र ने बीच में ही वेग से आते उस चक्र को देखकर गदा से उस पर प्रहार किया; वह टूटकर सौ टुकड़े हो गया।

श्लोक 21 (7.109.21)

ततोऽग्निचूर्णैः सहसा चक्रघातविनिःसृतैः । दंशकैरिव सा सेना पतद्भिर्भृशसंकुला ॥

tato'gnicūrṇaiḥ sahasā cakraghātaviniḥsṛtaiḥ | daṃśakairiva sā senā patadbhirbhṛśasaṃkulā

तब चक्र पर पड़ी चोट से निकले अग्नि के कण सहसा चारों ओर उड़ने लगे, और डंक मारने वाले कीड़ों के गिरने की भाँति उनसे वह सेना अत्यन्त व्याकुल हो उठी।

श्लोक 22 (7.109.22)

ततः प्रतिहते चक्रे स वीरो रोषसंकुलः । प्राहिणोत्तरसा शूलं शक्तीर्दशशतं तदा ॥

tataḥ pratihate cakre sa vīro roṣasaṃkulaḥ | prāhiṇottarasā śūlaṃ śaktīrdaśaśataṃ tadā

फिर चक्र के निष्फल हो जाने पर क्रोध से भरे उस वीर ने वेग से एक शूल और एक हजार शक्तियाँ फेंकीं।

श्लोक 23 (7.109.23)

ज्वलन्तीश्च किरन्तीश्च ज्वालामालाः समन्ततः । युगान्तोल्कानिभास्तीक्ष्णा हेमदण्डा महास्वनाः ॥

jvalantīśca kirantīśca jvālāmālāḥ samantataḥ | yugāntolkānibhāstīkṣṇā hemadaṇḍā mahāsvanāḥ

वे ज्वाला की मालाएँ चारों ओर बिखेरती हुई प्रज्वलित हो रही थीं, युग के अन्त की उल्काओं जैसी तीखी, सोने की डण्डियों वाली और भारी गर्जना करती हुई।

श्लोक 24 (7.109.24)

ताश्चापतन्तीः सम्प्रेक्ष्य राक्षसस्य घटोत्कचः । अर्धचन्द्रैः प्रचिच्छेद नाराचैः कङ्कपत्रिभिः ॥

tāścāpatantīḥ samprekṣya rākṣasasya ghaṭotkacaḥ | ardhacandraiḥ praciccheda nārācaiḥ kaṅkapatribhiḥ

उन्हें गिरते देखकर घटोत्कच ने राक्षस की उन शक्तियों को अर्धचन्द्र बाणों और कङ्कपत्र वाले नाराचों से काट डाला।

श्लोक 25 (7.109.25)

ततो रोषपरीताङ्गः प्रमुमोच स राक्षसः । शरवर्षं महाघोरं घटोत्कचरथं प्रति ॥

tato roṣaparītāṅgaḥ pramumoca sa rākṣasaḥ | śaravarṣaṃ mahāghoraṃ ghaṭotkacarathaṃ prati

तब क्रोध से व्याप्त शरीर वाले उस राक्षस ने घटोत्कच के रथ पर अत्यन्त भयंकर बाण-वर्षा की।

श्लोक 26 (7.109.26)

तयोः प्रतिभयं युद्धमासीद्राक्षससिंहयोः । कुर्वतोर्विविधा मायाः शक्रशम्बरयोरिव ॥

tayoḥ pratibhayaṃ yuddhamāsīdrākṣasasiṃhayoḥ | kurvatorvividhā māyāḥ śakraśambarayoriva

इन्द्र और शम्बर की भाँति नाना माया रचते हुए उन दोनों राक्षस-सिंहों में भयानक युद्ध हुआ।

श्लोक 27 (7.109.27)

अलम्बुसो भृशं क्रुद्धो घटोत्कचमताडयत् ॥

alambuso bhṛśaṃ kruddho ghaṭotkacamatāḍayat

अत्यन्त क्रुद्ध अलम्बुस ने घटोत्कच पर प्रहार किया।

श्लोक 28 (7.109.28)

तयोर्युद्धं समभवद्रक्षोग्रामणिमुख्ययोः । यादृगेव पुरा वृत्तं रामरावणयोः प्रभो ॥

tayoryuddhaṃ samabhavadrakṣogrāmaṇimukhyayoḥ | yādṛgeva purā vṛttaṃ rāmarāvaṇayoḥ prabho

हे प्रभो! राक्षसों के उन दो प्रधान नायकों का युद्ध वैसा ही हुआ जैसा पूर्वकाल में राम और रावण का हुआ था।

श्लोक 29 (7.109.29)

घटोत्कचस्तु विंशत्या नाराचानां स्तनान्तरे । अलम्बुसमथो विद्ध्वा सिंहवद्व्यनदन्मुहुः ॥

ghaṭotkacastu viṃśatyā nārācānāṃ stanāntare | alambusamatho viddhvā siṃhavadvyanadanmuhuḥ

घटोत्कच ने बीस नाराचों से अलम्बुस की छाती के बीच बींधकर बार-बार सिंह की भाँति गर्जना की।

श्लोक 30 (7.109.30)

तथैवालम्बुसो राजन्हैडिम्बिं युद्धदुर्मदम् । विद्ध्वा विद्ध्वाऽनदद्धृष्टः पूरयन्खं समन्ततः ॥

tathaivālambuso rājanhaiḍimbiṃ yuddhadurmadam | viddhvā viddhvā'nadaddhṛṣṭaḥ pūrayankhaṃ samantataḥ

हे राजन्! उसी प्रकार अलम्बुस ने भी युद्ध में मदमत्त हिडिम्बा-पुत्र को बार-बार बींधकर हर्षित हो आकाश को चारों ओर भरते हुए गर्जना की।

श्लोक 31 (7.109.31)

तथा तौ भृशसङ्क्रुद्धौ राक्षसेन्द्रौ महाबलौ । निर्विशेषमयुध्येतां मायाभिरितरेतरम् ॥

tathā tau bhṛśasaṅkruddhau rākṣasendrau mahābalau | nirviśeṣamayudhyetāṃ māyābhiritaretaram

इस प्रकार अत्यन्त क्रुद्ध वे दोनों महाबली राक्षसराज माया से एक-दूसरे से बिना किसी भेद के लड़ते रहे।

श्लोक 32 (7.109.32)

मायाशतसृजौ नित्यं मोहयन्तौ परस्परम् । मायायुद्धेषु कुशलौ मायायुद्धमयुध्यताम् ॥

māyāśatasṛjau nityaṃ mohayantau parasparam | māyāyuddheṣu kuśalau māyāyuddhamayudhyatām

सैकड़ों मायाओं के रचने वाले, सदा एक-दूसरे को मोहित करते, माया-युद्ध में निपुण वे दोनों माया-युद्ध करते रहे।

श्लोक 33 (7.109.33)

यांयां घटोत्कचो युद्धे मायां दर्शयते नृप । तां तामलम्बुसो राजन्माययैव निजघ्निवान् ॥

yāṃyāṃ ghaṭotkaco yuddhe māyāṃ darśayate nṛpa | tāṃ tāmalambuso rājanmāyayaiva nijaghnivān

हे राजन्! घटोत्कच युद्ध में जो-जो माया दिखाता, उस-उस को अलम्बुस माया से ही नष्ट कर देता।

श्लोक 34 (7.109.34)

तं तथा युध्यमानं तु मायायुद्धविशारदम् । अलम्बुसं राक्षसेन्द्रं दृष्ट्वाऽक्रुध्यन्त पाण्डवाः ॥

taṃ tathā yudhyamānaṃ tu māyāyuddhaviśāradam | alambusaṃ rākṣasendraṃ dṛṣṭvā'krudhyanta pāṇḍavāḥ

माया-युद्ध में कुशल राक्षसराज अलम्बुस को इस प्रकार लड़ते देखकर पाण्डव क्रोध से भर उठे।

श्लोक 35 (7.109.35)

त एनं भृशसंविग्नाः सर्वतः प्रवरा रथैः । अभ्यद्रवन्त सङ्क्रुद्धा भीमसेनादयो नृप ॥

ta enaṃ bhṛśasaṃvignāḥ sarvataḥ pravarā rathaiḥ | abhyadravanta saṅkruddhā bhīmasenādayo nṛpa

हे राजन्! अत्यन्त उद्विग्न और क्रुद्ध भीमसेन आदि श्रेष्ठ रथी चारों ओर से रथों सहित उस पर टूट पड़े।

श्लोक 36 (7.109.36)

त एनं कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष । सर्वतो व्यकिरन्बाणैरुल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥

ta enaṃ koṣṭhakīkṛtya rathavaṃśena māriṣa | sarvato vyakiranbāṇairulkābhiriva kuñjaram

हे मान्यवर! रथों की पंक्ति से उसे बाड़े की तरह घेरकर वे चारों ओर से उस पर बाण बरसाने लगे, जैसे हाथी पर जलती लकड़ियाँ बरसाई जाती हैं।

श्लोक 37 (7.109.37)

स तेषामस्त्रवेगं तं प्रतिहत्यास्त्रमायया । तस्माद्रथव्रजान्मुक्तो वनदाहादिव द्विपः ॥

sa teṣāmastravegaṃ taṃ pratihatyāstramāyayā | tasmādrathavrajānmukto vanadāhādiva dvipaḥ

उसने अपनी अस्त्र-माया से उनके अस्त्रों का वेग रोककर, वन की आग से निकले हाथी की भाँति उस रथ-समूह से अपने को छुड़ा लिया।

श्लोक 38 (7.109.38)

स विष्फार्य धनुर्घोरमिन्द्राशनिसमस्वनम् । मारुतिं पञ्चविंशत्या भैमसेनिं च पञ्चभिः ॥

sa viṣphārya dhanurghoramindrāśanisamasvanam | mārutiṃ pañcaviṃśatyā bhaimaseniṃ ca pañcabhiḥ

इन्द्र के वज्र जैसी ध्वनि वाले अपने भयंकर धनुष को खींचकर उसने मारुति (भीम) को पच्चीस और भीमसेन के पुत्र (घटोत्कच) को पाँच बाणों से बींधा,

श्लोक 39 (7.109.39)

युधिष्ठिरं त्रिभिर्विद्ध्वा सहदेवं च सप्तभिः । नकुलं च त्रिसप्तत्या द्रौपदेयांश्च मारिष । पञ्चभिःपञ्चभिर्विद्ध्वा घोरं नादं ननाद ह ॥

yudhiṣṭhiraṃ tribhirviddhvā sahadevaṃ ca saptabhiḥ | nakulaṃ ca trisaptatyā draupadeyāṃśca māriṣa | pañcabhiḥpañcabhirviddhvā ghoraṃ nādaṃ nanāda ha

युधिष्ठिर को तीन, सहदेव को सात, नकुल को तिहत्तर और द्रौपदी के पुत्रों को, हे मान्यवर, पाँच-पाँच बाणों से बींधकर उसने भयंकर गर्जना की।

श्लोक 40 (7.109.40)

तं भीमसेनो नवभिः सहदेवस्तु पञ्चभिः । युधिष्ठिरः शतेनैव राक्षसं प्रत्यविध्यत । नकुलस्तु चतुःषष्ट्या द्रौपदेयास्त्रिभिस्त्रिभिः ॥

taṃ bhīmaseno navabhiḥ sahadevastu pañcabhiḥ | yudhiṣṭhiraḥ śatenaiva rākṣasaṃ pratyavidhyata | nakulastu catuḥṣaṣṭyā draupadeyāstribhistribhiḥ

उस राक्षस को भीमसेन ने नौ, सहदेव ने पाँच, युधिष्ठिर ने सौ, नकुल ने चौंसठ और द्रौपदी के पुत्रों ने तीन-तीन बाणों से बींध दिया।

श्लोक 41 (7.109.41)

हैडिम्बो राक्षसं विद्ध्वा युद्धे पञ्चाशता शरैः । पुनर्विव्याध सप्तत्या ननाद च महाबलः ॥

haiḍimbo rākṣasaṃ viddhvā yuddhe pañcāśatā śaraiḥ | punarvivyādha saptatyā nanāda ca mahābalaḥ

हिडिम्बा-पुत्र ने भी युद्ध में उस राक्षस को पचास बाणों से बींधकर फिर सत्तर से बींधा और वह महाबली गरज उठा।

श्लोक 42 (7.109.42)

तस्य नादेन महता कम्पितेयं वसुन्धरा । सपर्वतवना राजन्सपादपजलाशया ॥

tasya nādena mahatā kampiteyaṃ vasundharā | saparvatavanā rājansapādapajalāśayā

हे राजन्! उसकी महान् गर्जना से पर्वतों, वनों, वृक्षों और जलाशयों सहित यह पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 43 (7.109.43)

सोऽतिविद्धो महेष्वासैः सर्वतस्तैर्महारथैः । प्रतिविव्याध तान्सर्वान्पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥

so'tividdho maheṣvāsaiḥ sarvatastairmahārathaiḥ | prativivyādha tānsarvānpañcabhiḥ pañcabhiḥ śaraiḥ

उन महान् धनुर्धर महारथियों द्वारा चारों ओर से बहुत बिंधे हुए उसने उन सब को पाँच-पाँच बाणों से प्रत्युत्तर में बींधा।

श्लोक 44 (7.109.44)

तं क्रुद्धं राक्षसं युद्धे प्रतिक्रुद्धस्तु राक्षसः । हैडिम्बो भरतश्रेष्ठ शरैर्विव्याध सप्तभिः ॥

taṃ kruddhaṃ rākṣasaṃ yuddhe pratikruddhastu rākṣasaḥ | haiḍimbo bharataśreṣṭha śarairvivyādha saptabhiḥ

हे भरतश्रेष्ठ! उस क्रुद्ध राक्षस पर प्रतिशोध में क्रुद्ध हिडिम्बा-पुत्र राक्षस ने सात बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 45 (7.109.45)

सोऽतिविद्धो बलवता राक्षसेन्द्रो महाबलः । व्यसृजत्सायकांस्तूर्णं रुक्मपुङ्खाञ्शिलाशितान् ॥

so'tividdho balavatā rākṣasendro mahābalaḥ | vyasṛjatsāyakāṃstūrṇaṃ rukmapuṅkhāñśilāśitān

उस बलवान् से अत्यन्त बिंधे हुए महाबली राक्षसराज ने शीघ्र ही सोने के पंखों वाले, शिला पर तेज किए हुए बाण छोड़े।

श्लोक 46 (7.109.46)

ते शरा नतपर्वाणो भैमसेनिविनिर्भिदः । रुषिताः पन्नगा यद्वद्योधमुख्यानुपागमन् ॥

te śarā nataparvāṇo bhaimasenivinirbhidaḥ | ruṣitāḥ pannagā yadvadyodhamukhyānupāgaman

झुकी हुई गाँठों वाले, भीमसेन के पुत्र को बींधने वाले वे बाण क्रोधित सर्पों की भाँति मुख्य योद्धाओं पर जा पहुँचे।

श्लोक 47 (7.109.47)

ततस्ते पाण्डवा राजन्समन्तान्निशिताञ्शरान् । प्रेषयामासुरुद्विग्ना हैडिम्बश्च घटोत्कचः ॥

tataste pāṇḍavā rājansamantānniśitāñśarān | preṣayāmāsurudvignā haiḍimbaśca ghaṭotkacaḥ

तब हे राजन्! उद्विग्न पाण्डवों ने और हिडिम्बा-पुत्र घटोत्कच ने चारों ओर से तीखे बाण चलाए।

श्लोक 48 (7.109.48)

स विध्यमानः समरे पाण्डवैर्जितकाशिभिः । नाभ्यपद्यत कर्तव्यमार्श्यशृङ्गिर्महाबलः ॥

sa vidhyamānaḥ samare pāṇḍavairjitakāśibhiḥ | nābhyapadyata kartavyamārśyaśṛṅgirmahābalaḥ

विजय के हर्ष से दीप्त पाण्डवों के बाणों से रण में बिंधते हुए महाबली आर्श्यशृङ्गि को कोई उपाय न सूझा।

श्लोक 49 (7.109.49)

घटोत्कचं महाराज शरवर्षैरवाकिरत् । दग्धाद्रिकूटसदृशं तमञ्जनचयोपमम् ॥

ghaṭotkacaṃ mahārāja śaravarṣairavākirat | dagdhādrikūṭasadṛśaṃ tamañjanacayopamam

हे महाराज! उसने जले हुए पर्वत-शिखर के समान और अंजन के ढेर-से काले घटोत्कच को बाणों की वर्षा से ढक दिया।

श्लोक 50 (7.109.50)

घटोत्कचोऽप्यसम्भ्रान्तः शरवर्षं महत्तरम् । अलम्बुसवधप्रेप्सुर्मुमोचाग्निरिव ज्वलन् ॥

ghaṭotkaco'pyasambhrāntaḥ śaravarṣaṃ mahattaram | alambusavadhaprepsurmumocāgniriva jvalan

घटोत्कच ने भी अविचलित रहकर, अलम्बुस के वध की इच्छा से, अग्नि की भाँति जलते हुए और भी बड़ी बाण-वर्षा छोड़ी।

श्लोक 51 (7.109.51)

अलम्बुसवधाच्चोग्राद्धटोत्कचवधादपि । शराः प्रादुर्भवन्ति स्म द्विरेफा इव शाखिनः ॥

alambusavadhāccogrāddhaṭotkacavadhādapi | śarāḥ prādurbhavanti sma dvirephā iva śākhinaḥ

अलम्बुस के भयंकर वध से और घटोत्कच के वध से भी, वृक्षों पर भौंरों की भाँति बाण प्रकट होने लगे।

श्लोक 52 (7.109.52)

अभ्रच्छायेव रचिता बाणैस्तत्र नरेश्वर । न स्म विज्ञायते किञ्चिदन्धकारे कृते शरैः ॥

abhracchāyeva racitā bāṇaistatra nareśvara | na sma vijñāyate kiñcidandhakāre kṛte śaraiḥ

हे नरेश्वर! बाणों से बादल की छाया-सी बन गई, और बाणों से अँधेरा हो जाने पर कुछ भी दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 53 (7.109.53)

तत आकर्णमुक्तेन भल्लेन च घटोत्कचः । अलम्बुसस्य चिच्छेद शिरो यन्तुर्महाबलः ॥

tata ākarṇamuktena bhallena ca ghaṭotkacaḥ | alambusasya ciccheda śiro yanturmahābalaḥ

तब कान तक खींचकर छोड़े गए भल्ल से महाबली घटोत्कच ने अलम्बुस के सारथि का सिर काट डाला।

श्लोक 54 (7.109.54)

ततोऽपरैर्वेगवद्भिः क्षुरैस्तस्य घटोत्कचः । अक्षमीषां युगं चैव चिच्छेद युधि ताडयन् ॥

tato'parairvegavadbhiḥ kṣuraistasya ghaṭotkacaḥ | akṣamīṣāṃ yugaṃ caiva ciccheda yudhi tāḍayan

फिर दूसरे वेगवान् क्षुर-बाणों से प्रहार करते हुए घटोत्कच ने युद्ध में उसके रथ की धुरी, ईषा और जुए को काट डाला।

श्लोक 55 (7.109.55)

अवस्कन्द्य रथात्तूर्णं कैर्मीरः क्रोधमूर्च्छितः । तस्मिन्मायामयं घोरमस्त्रवर्षं ववर्ष ह ॥

avaskandya rathāttūrṇaṃ kairmīraḥ krodhamūrcchitaḥ | tasminmāyāmayaṃ ghoramastravarṣaṃ vavarṣa ha

क्रोध से उन्मत्त कैर्मीर रथ से तुरन्त कूदकर उस पर माया से रचित भयंकर अस्त्र-वर्षा करने लगा।

श्लोक 56 (7.109.56)

घटोत्कचोऽप्याशु रथात्प्रस्कन्द्य स तमेव च । मायास्त्रेणैव मायास्त्रं व्यधमत्समरे रिपोः ॥

ghaṭotkaco'pyāśu rathātpraskandya sa tameva ca | māyāstreṇaiva māyāstraṃ vyadhamatsamare ripoḥ

घटोत्कच भी शीघ्र रथ से कूदकर उसी पर टूट पड़ा और माया-अस्त्र से ही रण में शत्रु के माया-अस्त्र को नष्ट कर दिया।

श्लोक 57 (7.109.57)

हैडिम्बेनार्द्यमानस्तु युधि सोऽलम्बुसोऽद्रवत् । अन्तर्हितो महाराज घटोत्कचमयोधयत् ॥

haiḍimbenārdyamānastu yudhi so'lambuso'dravat | antarhito mahārāja ghaṭotkacamayodhayat

हिडिम्बा-पुत्र से युद्ध में पीड़ित होता हुआ अलम्बुस भागा; हे महाराज! अदृश्य होकर वह घटोत्कच से लड़ता रहा।

श्लोक 58 (7.109.58)

अन्तर्धानगतं दृष्ट्वा तत्रतत्र घटोत्कचः । गदया ताडयामास वेगवत्या महाबलः ॥

antardhānagataṃ dṛṣṭvā tatratatra ghaṭotkacaḥ | gadayā tāḍayāmāsa vegavatyā mahābalaḥ

उसे अन्तर्धान हुआ देखकर महाबली घटोत्कच ने जहाँ-तहाँ वेगवती गदा से उस पर प्रहार किया।

श्लोक 59 (7.109.59)

उत्पपात ततो व्योम्नि प्रहारपरिपीडितः । अलम्बुसो राक्षसेन्द्रः सहसा पक्षिराडिव ॥

utpapāta tato vyomni prahāraparipīḍitaḥ | alambuso rākṣasendraḥ sahasā pakṣirāḍiva

प्रहार से पीड़ित राक्षसराज अलम्बुस पक्षिराज गरुड़ की भाँति सहसा आकाश में उछल गया।

श्लोक 60 (7.109.60)

घटोत्कचोऽप्यसम्भ्रान्तः खड्गपाणिरथोत्पतत् । ततो वेगेन महता विवर्षिषुरिवाम्बुदः ॥

ghaṭotkaco'pyasambhrāntaḥ khaḍgapāṇirathotpatat | tato vegena mahatā vivarṣiṣurivāmbudaḥ

घटोत्कच भी अविचलित रहकर, हाथ में खड्ग लिए, बड़े वेग से ऊपर उछला, जैसे बरसने को उद्यत बादल।

श्लोक 61 (7.109.61)

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य कैर्मीरी राक्षसोत्तमः । अभिदुद्राव वेगेन सिंहः सिंहमिव स्थितम् ॥

tamāpatantaṃ samprekṣya kairmīrī rākṣasottamaḥ | abhidudrāva vegena siṃhaḥ siṃhamiva sthitam

उसे उछलता देखकर राक्षसश्रेष्ठ कैर्मीरि सिंह के सिंह पर झपटने की भाँति वेग से उस पर टूट पड़ा।

श्लोक 62 (7.109.62)

दक्षिणेनासिमुद्यम्य वक्षः प्रच्छाद्य वर्मणा । अभिदुद्राव वेगेन वेगवन्तं घटोत्कचः ॥

dakṣiṇenāsimudyamya vakṣaḥ pracchādya varmaṇā | abhidudrāva vegena vegavantaṃ ghaṭotkacaḥ

दाहिने हाथ में तलवार उठाए और छाती को कवच से ढककर घटोत्कच भी उस वेगवान् पर वेग से झपटा।

श्लोक 63 (7.109.63)

तावुभौ वेगसंरब्धावलम्बुसघटोत्कचौ । अन्योन्यस्य तथैवोरू समाजघ्नतुरञ्जसा ॥

tāvubhau vegasaṃrabdhāvalambusaghaṭotkacau | anyonyasya tathaivorū samājaghnaturañjasā

वेग से भरे वे दोनों, अलम्बुस और घटोत्कच, इसी प्रकार एक-दूसरे की जाँघों पर सीधे प्रहार करने लगे।

श्लोक 64 (7.109.64)

अन्योन्यस्याभिघातेन तयो राक्षससिंहयोः । शैलेनाभिहतस्येव शैलस्याभून्महास्वनः ॥

anyonyasyābhighātena tayo rākṣasasiṃhayoḥ | śailenābhihatasyeva śailasyābhūnmahāsvanaḥ

उन दो राक्षस-सिंहों के परस्पर टकराने से ऐसा बड़ा शब्द हुआ जैसे पर्वत से टकराए हुए पर्वत का होता है।

श्लोक 65 (7.109.65)

ततोऽपसृत्य सहसा पुनरापेततुर्भृशम् । चरन्तावसिमार्गांस्तान्विविधान्राक्षसोत्तमौ ॥

tato'pasṛtya sahasā punarāpetaturbhṛśam | carantāvasimārgāṃstānvividhānrākṣasottamau

फिर वे दोनों श्रेष्ठ राक्षस अचानक पीछे हटकर तलवार के नाना पैंतरों में विचरते हुए पुनः जोर से भिड़ गए।

श्लोक 66 (7.109.66)

तयोर्गात्रेषु पतितावसी भिन्नौ निपेततुः । वेगोत्सृष्टे मघवता वज्रे शैलतटेष्विव ॥

tayorgātreṣu patitāvasī bhinnau nipetatuḥ | vegotsṛṣṭe maghavatā vajre śailataṭeṣviva

उनके शरीरों पर पड़ी तलवारें टूटकर गिर गईं, जैसे इन्द्र के वेग से फेंके गए वज्र पर्वत की ढलानों पर गिरकर टूटते हैं।

श्लोक 67 (7.109.67)

ततः सैन्यानि ददृशुस्तद्युद्धमतिदारुणम् । युद्धं तयो राक्षसयोरामिषे श्येनयोरिव ॥

tataḥ sainyāni dadṛśustadyuddhamatidāruṇam | yuddhaṃ tayo rākṣasayorāmiṣe śyenayoriva

तब सेनाओं ने उन दोनों राक्षसों का वह अत्यन्त भयंकर युद्ध देखा, जैसे मांस के लिए लड़ते दो बाजों का।

श्लोक 68 (7.109.68)

ततो लोहितरक्ताक्षावुभौ तौ राक्षसोत्तमौ । तथैक्ष्येतां तु शार्दूलौ सन्ध्यारक्ताविवाम्बुदौ ॥

tato lohitaraktākṣāvubhau tau rākṣasottamau | tathaikṣyetāṃ tu śārdūlau sandhyāraktāvivāmbudau

तब रक्त के समान लाल आँखों वाले वे दोनों श्रेष्ठ राक्षस सन्ध्या की लाली से रँगे दो बादलों की भाँति, दो बाघों-से दिखाई देते थे।

श्लोक 69 (7.109.69)

चक्राते श्येनवच्चैव मण्डलानि सहस्रशः । उभौ निस्त्रिंशहस्तौ तौ सपक्षाविव पक्षिणौ ॥

cakrāte śyenavaccaiva maṇḍalāni sahasraśaḥ | ubhau nistriṃśahastau tau sapakṣāviva pakṣiṇau

वे बाजों की भाँति हजारों चक्कर काटते थे; हाथ में तलवार लिए वे दोनों पंखधारी पक्षियों-से लगते थे।

श्लोक 70 (7.109.70)

भ्रामयित्वा तु तं खड्गं पाण्डोः किर्मीरनन्दनः । चिक्षेपास्य शिरो हर्तुं स च तस्य घटोत्कचः ॥

bhrāmayitvā tu taṃ khaḍgaṃ pāṇḍoḥ kirmīranandanaḥ | cikṣepāsya śiro hartuṃ sa ca tasya ghaṭotkacaḥ

तलवार घुमाकर किर्मीर के पुत्र ने पाण्डु-वंश के उस वीर का सिर काटने के लिए उसे फेंका, और घटोत्कच ने भी उस पर वैसा ही किया।

श्लोक 71 (7.109.71)

तावसी युगपद्दीप्तौ समेत्य विपुलौ भुवि । पतितौ तौ तु बाहुभ्यां राक्षसौ समसज्जताम् ॥

tāvasī yugapaddīptau sametya vipulau bhuvi | patitau tau tu bāhubhyāṃ rākṣasau samasajjatām

वे दोनों दीप्त, विशाल तलवारें एक साथ टकराकर भूमि पर गिरीं; और गिरे हुए वे दोनों राक्षस भुजाओं से गुँथ गए।

श्लोक 72 (7.109.72)

शीर्षघातांसघातैश्च परस्परमथाहतौ । पुनर्विमिश्रितौ वीरौ व्यायुध्येते मुहुर्मुहुः ॥

śīrṣaghātāṃsaghātaiśca parasparamathāhatau | punarvimiśritau vīrau vyāyudhyete muhurmuhuḥ

सिर और कंधों के प्रहारों से परस्पर मारते हुए वे दोनों वीर बार-बार गुँथकर लड़ते रहे।

श्लोक 73 (7.109.73)

भैमसेनिरथोत्क्षिप्य समाविध्य पुनः पुनः । निष्पिपेष क्षितौ क्षिप्रं पूर्णकुम्भमिवाश्मनि ॥

bhaimasenirathotkṣipya samāvidhya punaḥ punaḥ | niṣpipeṣa kṣitau kṣipraṃ pūrṇakumbhamivāśmani

भीमसेन के पुत्र ने उसे ऊपर उठाकर बार-बार घुमाया और फिर शीघ्र भूमि पर पटककर चूर कर दिया, जैसे पत्थर पर भरा हुआ घड़ा।

श्लोक 74 (7.109.74)

बललाघवसम्पन्नः सम्पन्नो विक्रमेण च । भैमसेनिरथ क्रुद्धः सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥

balalāghavasampannaḥ sampanno vikrameṇa ca | bhaimaseniratha kruddhaḥ sarvasainyasya paśyataḥ

बल की फुर्ती और पराक्रम से सम्पन्न भीमसेन के पुत्र ने तब क्रुद्ध होकर, समस्त सेना के देखते-देखते —

श्लोक 75 (7.109.75)

असृक्क्षरितसर्वाङ्गश्चूर्णितास्थिविभूषणः । घटोत्कचेन निष्पिष्टो हतः सालकटङ्कटः ॥

asṛkkṣaritasarvāṅgaścūrṇitāsthivibhūṣaṇaḥ | ghaṭotkacena niṣpiṣṭo hataḥ sālakaṭaṅkaṭaḥ

रक्त से लथपथ सर्वांग वाला, चूर्ण हुई हड्डियों को ही आभूषण बनाए हुए वह सालकटङ्कट राक्षस घटोत्कच के द्वारा पीसकर मार डाला गया।

श्लोक 76 (7.109.76)

पाण्डवानां ततः सेना तं दृष्ट्वा विनिपातितम् । ननाद सुमहानादं हर्षवेगसमाप्लुता ॥

pāṇḍavānāṃ tataḥ senā taṃ dṛṣṭvā vinipātitam | nanāda sumahānādaṃ harṣavegasamāplutā

उसे गिरा हुआ देखकर पाण्डवों की सेना हर्ष के वेग से भरकर महानाद करने लगी।

श्लोक 77 (7.109.77)

ततस्तु निपपाताशु गतासुर्भुवि राक्षसः । शिखरं पर्वतस्येव वज्रवेगेन पातितम् ॥

tatastu nipapātāśu gatāsurbhuvi rākṣasaḥ | śikharaṃ parvatasyeva vajravegena pātitam

तब प्राणहीन वह राक्षस वज्र के वेग से गिराए गए पर्वत-शिखर की भाँति धरती पर गिर पड़ा।

श्लोक 78 (7.109.78)

पतता तेन महता रथिनां दन्तिनां दश । तव सैन्ये महाराज निहताः सुबृहत्तया ॥

patatā tena mahatā rathināṃ dantināṃ daśa | tava sainye mahārāja nihatāḥ subṛhattayā

हे महाराज! उसके बहुत बड़े आकार के कारण उस विशाल के गिरने से आपकी सेना के दस रथी और दस हाथी मारे गए।

श्लोक 79 (7.109.79)

ततो घटोत्कचो हत्वा तद्रक्षो वृत्रसन्निभम् । पुनः स रथमास्थाय विजिगीषुर्ननाद ह ॥

tato ghaṭotkaco hatvā tadrakṣo vṛtrasannibham | punaḥ sa rathamāsthāya vijigīṣurnanāda ha

तब घटोत्कच उस वृत्र-जैसे राक्षस को मारकर फिर रथ पर बैठा और विजय की कामना से गरज उठा।

श्लोक 80 (7.109.80)

ततः सुमनसः पार्था हते तस्मिन्निशाचरे । चुक्रुशुः सिंहनादांश्च वासांस्यादुधुवुश्च ह ॥

tataḥ sumanasaḥ pārthā hate tasminniśācare | cukruśuḥ siṃhanādāṃśca vāsāṃsyādudhuvuśca ha

तब उस निशाचर के मारे जाने पर पृथा के पुत्र प्रसन्न मन से सिंहनाद करने लगे और वस्त्र हिलाने लगे।

श्लोक 81 (7.109.81)

तावकाश्च हतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रं महाबलम् । अलम्बुसं तथा शूरा विशीर्णमिव पर्वतम् । हाहाकारमकार्षुश्च सैन्यानि भरतर्षभ ॥

tāvakāśca hataṃ dṛṣṭvā rākṣasendraṃ mahābalam | alambusaṃ tathā śūrā viśīrṇamiva parvatam | hāhākāramakārṣuśca sainyāni bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! महाबली राक्षसराज अलम्बुस को टूटे हुए पर्वत की भाँति मरा देखकर आपके शूरवीरों ने और सेनाओं ने भी हाहाकार किया।

श्लोक 82 (7.109.82)

जनाश्च तद्ददृशिरे रक्षः कौतूहलान्विताः । यदृच्छया निपतितं भूमावङ्गारकं यथा ॥

janāśca taddadṛśire rakṣaḥ kautūhalānvitāḥ | yadṛcchayā nipatitaṃ bhūmāvaṅgārakaṃ yathā

लोगों ने कौतूहल से उस राक्षस को देखा, जो संयोग से भूमि पर गिरे अंगारक (मंगल ग्रह) के समान पड़ा था।

श्लोक 83 (7.109.83)

घटोत्कचस्तु तद्धत्वा रक्षो बलवतां वरम् । मुमोच बलवन्नादं बलं हत्वेव वासवः ॥

ghaṭotkacastu taddhatvā rakṣo balavatāṃ varam | mumoca balavannādaṃ balaṃ hatveva vāsavaḥ

घटोत्कच ने बलवानों में श्रेष्ठ उस राक्षस को मारकर बड़ा गर्जन किया, जैसे वासव ने बल को मारकर किया था।

श्लोक 84 (7.109.84)

स पूज्यमानः पितृभिः सबान्धवैः । घटोत्कचः कर्मणि दुष्करे कृते । रिपुं निहत्याभिननन्द वै तदा । ह्यलम्बुसं पक्वमलम्बुषं यथा ॥

sa pūjyamānaḥ pitṛbhiḥ sabāndhavaiḥ | ghaṭotkacaḥ karmaṇi duṣkare kṛte | ripuṃ nihatyābhinananda vai tadā | hyalambusaṃ pakvamalambuṣaṃ yathā

अपने पिताओं और उनके बन्धुओं से सम्मानित घटोत्कच ने कठिन कार्य पूरा करके, शत्रु को मारकर उस समय आनन्द मनाया, मानो अलम्बुस पका हुआ अलम्बुष फल हो।

श्लोक 85 (7.109.85)

ततो निनादः सुमहान्समुत्थितः । सशङ्खनानाविधबाणघोषवान् । निशम्य तं प्रत्यनदंस्तु पाण्डवाः । ततो ध्वनिर्भुवनमथाऽस्पृशद्भृशम् ॥

tato ninādaḥ sumahānsamutthitaḥ | saśaṅkhanānāvidhabāṇaghoṣavān | niśamya taṃ pratyanadaṃstu pāṇḍavāḥ | tato dhvanirbhuvanamathā'spṛśadbhṛśam

तब शंखों और नाना प्रकार के बाणों के घोष से युक्त एक भारी नाद उठा; उसे सुनकर पाण्डवों ने भी उत्तर में गर्जना की, और वह ध्वनि स्वर्गलोक तक जा पहुँची।

श्लोक 86 (7.109.86)

ततोऽभिगम्य राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । स्वकर्मावेदयन्मूर्ध्ना प्राञ्जलिर्निपपात ह ॥

tato'bhigamya rājānaṃ dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram | svakarmāvedayanmūrdhnā prāñjalirnipapāta ha

तब राजा धर्मपुत्र युधिष्ठिर के पास जाकर उसने अपना कर्म निवेदन किया और हाथ जोड़े, सिर झुकाए उनके चरणों में गिर पड़ा।

श्लोक 87 (7.109.87)

मूर्ध्न्युपाघ्राय तं ज्येष्ठः परिष्वज्य च पाण्डवः । प्रीतोऽस्मीत्यब्रवीद्राजन्हर्षादुत्फुल्ललोचनः ॥

mūrdhnyupāghrāya taṃ jyeṣṭhaḥ pariṣvajya ca pāṇḍavaḥ | prīto'smītyabravīdrājanharṣādutphullalocanaḥ

हे राजन्! ज्येष्ठ पाण्डव (युधिष्ठिर) ने उसका मस्तक सूँघा और उसे गले लगाकर, हर्ष से विकसित नेत्रों से कहा — "मैं प्रसन्न हूँ।"

श्लोक 88 (7.109.88)

घटोत्कचेन निष्पिष्टे हते सालकटङ्कटे । बभूवुर्मुदिताः सर्वे हते तस्मिन्निशाचरे ॥

ghaṭotkacena niṣpiṣṭe hate sālakaṭaṅkaṭe | babhūvurmuditāḥ sarve hate tasminniśācare

घटोत्कच के द्वारा सालकटङ्कट राक्षस के कुचले जाकर मारे जाने पर उस निशाचर के मरने से सभी आनन्दित हुए।

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