द्रोण पर्व · अध्याय 110
युधिष्ठिर सात्यकि को अर्जुन की सहायता के लिए भेजते हैं
द्रोण और सात्यकि में बाणों का आदान-प्रदान होता है; सात्यकि के संकट में पड़ने पर युधिष्ठिर पाण्डव-सेना और धृष्टद्युम्न को उन्हें बचाने भेजते हैं, और द्रोण पांचालों, सृंजयों, मत्स्यों तथा केकयों का संहार करते हैं। कृष्ण के शंख की ध्वनि सुनकर पर गाण्डीव की टंकार न सुनकर युधिष्ठिर को अर्जुन की चिन्ता होती है। वे सात्यकि को अर्जुन का शिष्य और मित्र बताकर उनकी प्रशंसा करते हैं और देर तक आग्रह करते हैं कि वे कौरव-सेना को भेदकर अर्जुन तक पहुँचें।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (7.110.1)
भारद्वाजं कथं युद्धे युयुधानो न्यवारयत् । सञ्जयाचक्ष्व तत्त्वेन परं कौतूहलं हि मे ॥
bhāradvājaṃ kathaṃ yuddhe yuyudhāno nyavārayat | sañjayācakṣva tattvena paraṃ kautūhalaṃ hi me
संजय, युद्ध में युयुधान ने भरद्वाज-पुत्र द्रोण को कैसे रोका? मुझे ठीक-ठीक बताओ, क्योंकि मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ी हुई है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 2 (7.110.2)
शृणु राजन्महाप्राज्ञ सङ्ग्रामं रोमहर्षणम् । द्रोणस्य पाण्डवैः सार्धं युयुधानपुरोगमैः ॥
śṛṇu rājanmahāprājña saṅgrāmaṃ romaharṣaṇam | droṇasya pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ yuyudhānapurogamaiḥ
हे परम बुद्धिमान् राजन्, सुनिए — युयुधान को आगे रखकर चलने वाले पाण्डवों के साथ द्रोण का वह रोमांचकारी संग्राम कैसा हुआ।
श्लोक 3 (7.110.3)
वध्यमानं बलं दृष्ट्वा युयुधानेन मारिष । अभ्यद्रवत्स्वयं द्रोणः सात्यकिं सत्यविक्रमम् ॥
vadhyamānaṃ balaṃ dṛṣṭvā yuyudhānena māriṣa | abhyadravatsvayaṃ droṇaḥ sātyakiṃ satyavikramam
हे स्वामी, युयुधान के हाथों अपनी सेना को कटते देखकर स्वयं द्रोण सत्य-पराक्रमी सात्यकि पर टूट पड़े।
श्लोक 4 (7.110.4)
तमापतन्तं सहसा भारद्वाजं महारथम् । सात्यकिः पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत् ॥
tamāpatantaṃ sahasā bhāradvājaṃ mahāratham | sātyakiḥ pañcaviṃśatyā kṣudrakāṇāṃ samārpayat
भरद्वाज-पुत्र उस महारथी को अचानक अपनी ओर आते देख सात्यकि ने उन पर क्षुद्रक नामक पचीस छोटे बाण चलाए।
श्लोक 5 (7.110.5)
द्रोणोऽपि युधि विक्रान्तो युयुधानं समाहितः । अविध्यत्पञ्चभिस्तूर्णं हेमपुङ्खैः शरैः शितैः ॥
droṇo'pi yudhi vikrānto yuyudhānaṃ samāhitaḥ | avidhyatpañcabhistūrṇaṃ hemapuṅkhaiḥ śaraiḥ śitaiḥ
युद्ध में पराक्रमी द्रोण ने भी शान्त भाव से शीघ्र ही सोने के पंखों वाले पाँच तीखे बाणों से युयुधान को बींध दिया।
श्लोक 6 (7.110.6)
ते वर्म भित्त्वा सुदृढं द्विषत्पिशितभोजनाः । अभ्ययुर्धरणीं राजन्वल्मीकमिव पन्नगाः ॥
te varma bhittvā sudṛḍhaṃ dviṣatpiśitabhojanāḥ | abhyayurdharaṇīṃ rājanvalmīkamiva pannagāḥ
हे राजन्, शत्रु का मांस खाने वाले वे बाण उसके दृढ़ कवच को भेदकर वैसे ही धरती में समा गए, जैसे साँप बाँबी में घुसते हैं।
श्लोक 7 (7.110.7)
दीर्घबाहुरभिक्रुद्धस्तोत्रार्दित इव द्विपः । द्रोणं पञ्चाशताऽविध्यन्नाराचैरग्निसन्निभैः ॥
dīrghabāhurabhikruddhastotrārdita iva dvipaḥ | droṇaṃ pañcāśatā'vidhyannārācairagnisannibhaiḥ
अंकुश से बिंधे हाथी की तरह क्रुद्ध लम्बी भुजाओं वाले सात्यकि ने अग्नि-समान दमकते पचास नाराचों से द्रोण को बींधा।
श्लोक 8 (7.110.8)
भारद्वाजो रणे विद्धो युयुधानेन सत्वरम् । सात्यकिं बहुभिर्बाणैर्यतमानमविध्यत ॥
bhāradvājo raṇe viddho yuyudhānena satvaram | sātyakiṃ bahubhirbāṇairyatamānamavidhyata
युद्ध में युयुधान के द्वारा शीघ्रता से बिंधे हुए भरद्वाज-पुत्र ने भी डटकर जूझते सात्यकि को बहुत-से बाणों से बींध दिया।
श्लोक 9 (7.110.9)
ततः क्रुद्धो महेष्वासो भूय एव महाबलः । सात्वतं पीडयामास व्रातेन नतपर्वणाम् ॥
tataḥ kruddho maheṣvāso bhūya eva mahābalaḥ | sātvataṃ pīḍayāmāsa vrātena nataparvaṇām
तब महान् धनुर्धर और अतिबली द्रोण ने फिर क्रुद्ध होकर झुकी हुई गाँठों वाले बाणों की बौछार से सात्वत सात्यकि को पीड़ित किया।
श्लोक 10 (7.110.10)
स वध्यमानः समरे भारद्वाजेन सात्यकिः । नान्वपद्यत कर्तव्यं किञ्चिदेव विशाम्पते ॥
sa vadhyamānaḥ samare bhāradvājena sātyakiḥ | nānvapadyata kartavyaṃ kiñcideva viśāmpate
हे प्रजापालक, युद्ध में भरद्वाज-पुत्र के प्रहारों से घायल होते सात्यकि को कुछ भी करने योग्य नहीं सूझा।
श्लोक 11 (7.110.11)
विषण्णवदनश्चापि युयुधानोऽभवन्नृप । भारद्वाजं रणे दृष्ट्वा विसृजन्तं शिताञ्शरान् ॥
viṣaṇṇavadanaścāpi yuyudhāno'bhavannṛpa | bhāradvājaṃ raṇe dṛṣṭvā visṛjantaṃ śitāñśarān
हे राजन्, भरद्वाज-पुत्र को रण में तीखे बाण छोड़ते देखकर युयुधान का मुख उदास हो गया।
श्लोक 12 (7.110.12)
तं तु सम्प्रेक्ष्य ते पुत्राः सैनिकाश्च विशाम्पते । प्रहृष्टमनसो भूत्वा सिंहवद्व्यनदन्मुहुः ॥
taṃ tu samprekṣya te putrāḥ sainikāśca viśāmpate | prahṛṣṭamanaso bhūtvā siṃhavadvyanadanmuhuḥ
हे प्रजापालक, उसे ऐसा देखकर आपके पुत्र और सैनिक मन में हर्षित हो उठे और बार-बार सिंह की तरह गरजने लगे।
श्लोक 13 (7.110.13)
तं श्रुत्वा निनदं घोरं पीड्यमानं च माधवम् । युधिष्ठिरोऽब्रवीद्राजा सर्वसैन्यानि भारत ॥
taṃ śrutvā ninadaṃ ghoraṃ pīḍyamānaṃ ca mādhavam | yudhiṣṭhiro'bravīdrājā sarvasainyāni bhārata
हे भारत, वह भयंकर गर्जन सुनकर और माधव को पीड़ित जानकर राजा युधिष्ठिर ने सारी सेनाओं से कहा —
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 14 (7.110.14)
एष वृष्णिवरो वीरः सात्यकिः सत्यविक्रमः । ग्रस्यते युधि वीरेण भानुमानिव राहुणा । अभिद्रवत गच्छध्वं सात्यकिर्यत्र युध्यते ॥
eṣa vṛṣṇivaro vīraḥ sātyakiḥ satyavikramaḥ | grasyate yudhi vīreṇa bhānumāniva rāhuṇā | abhidravata gacchadhvaṃ sātyakiryatra yudhyate
“वह वृष्णियों के श्रेष्ठ, सत्य-पराक्रमी वीर सात्यकि युद्ध में एक वीर के द्वारा वैसे ही ग्रसे जा रहे हैं, जैसे सूर्य राहु से। दौड़ो! जहाँ सात्यकि लड़ रहे हैं, वहाँ जाओ!”
सञ्जय उवाच
श्लोक 15 (7.110.15)
अभिद्रवत गच्छध्वं सात्यकिर्यत्र युध्यते । धृष्टद्युम्नं च पाञ्चाल्यमिदमाह जनाधिपः । द्रोणं वारय सुक्षिप्रं सात्यकिं मावधीद्द्विजः ॥
abhidravata gacchadhvaṃ sātyakiryatra yudhyate | dhṛṣṭadyumnaṃ ca pāñcālyamidamāha janādhipaḥ | droṇaṃ vāraya sukṣipraṃ sātyakiṃ māvadhīddvijaḥ
“दौड़ो! जहाँ सात्यकि लड़ रहे हैं, वहाँ जाओ!” फिर उस नरेश ने पांचाल-राजकुमार धृष्टद्युम्न से यह कहा — “द्रोण को शीघ्र रोको, कहीं वह ब्राह्मण सात्यकि को मार न डाले।”
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 16 (7.110.16)
अभिद्रव द्रुतं द्रोणं किमु तिष्ठसि पार्षत । न पश्यसि भयं द्रोणाद्घोरं नः समुपस्थितम् ॥
abhidrava drutaṃ droṇaṃ kimu tiṣṭhasi pārṣata | na paśyasi bhayaṃ droṇādghoraṃ naḥ samupasthitam
“हे पार्षत, तुरंत द्रोण पर धावा बोलो! खड़े क्यों हो? क्या तुम्हें दिखता नहीं कि द्रोण की ओर से हम पर कैसा भयंकर संकट आ पड़ा है?
श्लोक 17 (7.110.17)
असौ द्रोणो महेष्वासो युयुधानेन संयुगे । क्रीडते सूत्रबद्धेन पक्षिणा बालको यथा ॥
asau droṇo maheṣvāso yuyudhānena saṃyuge | krīḍate sūtrabaddhena pakṣiṇā bālako yathā
वह देखो, महाधनुर्धर द्रोण युद्ध में युयुधान के साथ वैसे ही खेल रहे हैं, जैसे बालक डोरी से बँधे पक्षी के साथ खेलता है।
श्लोक 18 (7.110.18)
तत्रैव सर्वे गच्छन्तु भीमसेनपुरोगमाः । त्वयैव सहिताः सर्वे युयुधानरथं प्रति ॥
tatraiva sarve gacchantu bhīmasenapurogamāḥ | tvayaiva sahitāḥ sarve yuyudhānarathaṃ prati
भीमसेन को आगे करके सब लोग वहीं, युयुधान के रथ की ओर, तुम्हारे साथ ही चलें।
श्लोक 19 (7.110.19)
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि त्वामहं सहसैनिकः । सात्यकिं मोक्षयस्वाद्य यमदंष्ट्रान्तरं गतम् ॥
pṛṣṭhato'nugamiṣyāmi tvāmahaṃ sahasainikaḥ | sātyakiṃ mokṣayasvādya yamadaṃṣṭrāntaraṃ gatam
मैं अपनी सेना के साथ तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा। यम की दाढ़ों के बीच पहुँचे हुए सात्यकि को आज छुड़ा लाओ।”
सञ्जय उवाच
श्लोक 20 (7.110.20)
एवमुक्त्वा ततो राजा सर्वसैन्येन भारत । अभ्यद्रवद्रणे द्रोणं युयुधानस्य कारणात् ॥
evamuktvā tato rājā sarvasainyena bhārata | abhyadravadraṇe droṇaṃ yuyudhānasya kāraṇāt
हे भारत, ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर युयुधान के लिए अपनी पूरी सेना के साथ रण में द्रोण पर टूट पड़े।
श्लोक 21 (7.110.21)
तत्रारावो महानासीद्द्रोणमेकं युयुत्सताम् । पाण्डवानां च भद्रं ते सृञ्जयानां च सर्वशः ॥
tatrārāvo mahānāsīddroṇamekaṃ yuyutsatām | pāṇḍavānāṃ ca bhadraṃ te sṛñjayānāṃ ca sarvaśaḥ
तब अकेले द्रोण से लड़ने को उत्सुक पाण्डवों और सृंजयों की ओर से सब ओर बड़ा कोलाहल उठा — आपका कल्याण हो।
श्लोक 22 (7.110.22)
ते समेत्य नरव्याघ्रा भारद्वाजं महारथम् । अभ्यवर्षञ्शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ॥
te sametya naravyāghrā bhāradvājaṃ mahāratham | abhyavarṣañśaraistīkṣṇaiḥ kaṅkabarhiṇavājitaiḥ
उन पुरुषसिंहों ने एकत्र होकर भरद्वाज-पुत्र उस महारथी पर कंक और मोर के पंखों वाले तीखे बाणों की वर्षा की।
श्लोक 23 (7.110.23)
स्मयन्नेव तु तान्वीरान्द्रोणः प्रत्यग्रहीत्स्वयम् । अतिथीनागतान्यद्वत्सलिलेनासनेन च ॥
smayanneva tu tānvīrāndroṇaḥ pratyagrahītsvayam | atithīnāgatānyadvatsalilenāsanena ca
द्रोण ने मुस्कराते हुए ही उन वीरों का स्वयं स्वागत किया, जैसे आए हुए अतिथियों का जल और आसन से सत्कार किया जाता है।
श्लोक 24 (7.110.24)
तर्पितास्ते शरैस्तस्य भारद्वाजस्य धन्विनः । आतिथेयं गृहं प्राप्य तर्प्यन्तेऽतिथयो यथा ॥
tarpitāste śaraistasya bhāradvājasya dhanvinaḥ | ātitheyaṃ gṛhaṃ prāpya tarpyante'tithayo yathā
धनुर्धर भरद्वाज-पुत्र के बाणों से वे योद्धा वैसे ही तृप्त हुए, जैसे अतिथि सत्कार करने वाले घर में पहुँचकर तृप्त होते हैं।
श्लोक 25 (7.110.25)
भारद्वाजं च ते सर्वे न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् । मध्यन्दिनमनुप्राप्तं सहस्रांशुमिव प्रभो ॥
bhāradvājaṃ ca te sarve na śekuḥ prativīkṣitum | madhyandinamanuprāptaṃ sahasrāṃśumiva prabho
हे प्रभो, मध्याह्न में चढ़े हुए सहस्र-किरण सूर्य की तरह खड़े भरद्वाज-पुत्र की ओर उनमें से कोई आँख उठाकर देख भी न सका।
श्लोक 26 (7.110.26)
तांस्तु सर्वान्महेष्वासान्द्रोणः शस्त्रभृतां वरः । अतापयच्छरव्रातैर्गभस्तिभिरिवांशुमान् ॥
tāṃstu sarvānmaheṣvāsāndroṇaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | atāpayaccharavrātairgabhastibhirivāṃśumān
शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ द्रोण ने उन सब महाधनुर्धरों को अपने बाणों की झड़ी से वैसे ही तपाया, जैसे दीप्तिमान् सूर्य अपनी किरणों से तपाता है।
श्लोक 27 (7.110.27)
वध्यमाना महाराज पाण्डवाः सृञ्जयास्तथा । त्रातारं नाध्यगच्छन्त पङ्कमग्ना इव द्विपाः ॥
vadhyamānā mahārāja pāṇḍavāḥ sṛñjayāstathā | trātāraṃ nādhyagacchanta paṅkamagnā iva dvipāḥ
हे महाराज, मार खाते हुए पाण्डवों और सृंजयों को कीचड़ में धँसे हाथियों की तरह कोई रक्षक नहीं मिला।
श्लोक 28 (7.110.28)
द्रोणस्य च व्यदृश्यन्त विसर्पन्तो महाशराः । गभस्तय इवार्कस्य प्रतपन्तः समन्ततः ॥
droṇasya ca vyadṛśyanta visarpanto mahāśarāḥ | gabhastaya ivārkasya pratapantaḥ samantataḥ
द्रोण के बड़े-बड़े बाण सूर्य की किरणों की तरह सब ओर दमकते और फैलते दिखाई देते थे।
श्लोक 29 (7.110.29)
तस्मिन्द्रोणेन निहताः पाञ्चालाः पञ्चविंशतिः । महारथाः समाख्याता धृष्टद्युम्नस्य सम्मताः ॥
tasmindroṇena nihatāḥ pāñcālāḥ pañcaviṃśatiḥ | mahārathāḥ samākhyātā dhṛṣṭadyumnasya sammatāḥ
उस युद्ध में द्रोण ने धृष्टद्युम्न के माने हुए, महारथी कहे जाने वाले पचीस पांचालों को मार डाला।
श्लोक 30 (7.110.30)
पाण्डूनां सर्वसैन्येषु पाञ्चालानां तथैव च । द्रोणं स्म ददृशुः शूरं विनिघ्नन्तं वरान्वरान् ॥
pāṇḍūnāṃ sarvasainyeṣu pāñcālānāṃ tathaiva ca | droṇaṃ sma dadṛśuḥ śūraṃ vinighnantaṃ varānvarān
पाण्डवों और पांचालों की सारी सेनाओं में लोगों ने वीर द्रोण को एक के बाद एक चुने हुए योद्धाओं को मारते देखा।
श्लोक 31 (7.110.31)
केकयानां शतं हत्वा विद्राव्य च समन्ततः । द्रोणस्तस्थौ महाराज व्यादितास्य इवान्तकः ॥
kekayānāṃ śataṃ hatvā vidrāvya ca samantataḥ | droṇastasthau mahārāja vyāditāsya ivāntakaḥ
हे महाराज, सौ केकयों को मारकर और शेष को चारों ओर भगाकर द्रोण मुँह फैलाए हुए काल की तरह खड़े थे।
श्लोक 32 (7.110.32)
पाञ्चालान्सृञ्जयान्मत्स्यान्केकयांश्च नराधिप । द्रोणोऽजयन्महाबाहुः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
pāñcālānsṛñjayānmatsyānkekayāṃśca narādhipa | droṇo'jayanmahābāhuḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
हे नरेश, महाबाहु द्रोण ने पांचालों, सृंजयों, मत्स्यों और केकयों को सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में परास्त किया।
श्लोक 33 (7.110.33)
तेषां समभवच्छब्दो विद्धानां द्रोणसायकैः । वनौकसामिवारण्ये व्याप्तानां धूमकेतुना ॥
teṣāṃ samabhavacchabdo viddhānāṃ droṇasāyakaiḥ | vanaukasāmivāraṇye vyāptānāṃ dhūmaketunā
द्रोण के बाणों से बिंधे हुए उन योद्धाओं का आर्तनाद वैसा ही उठा, जैसा वन में आग से घिरे वनवासियों का उठता है।
श्लोक 34 (7.110.34)
तत्र देवाः सगन्धर्वाः पितरश्चाब्रुवन्नृप । एते द्रवन्ति पाञ्चालाः पाण्डवाश्च ससैनिकाः ॥
tatra devāḥ sagandharvāḥ pitaraścābruvannṛpa | ete dravanti pāñcālāḥ pāṇḍavāśca sasainikāḥ
हे राजन्, तब देवता, गन्धर्व और पितर कहने लगे — “ये पांचाल और पाण्डव अपनी सेना सहित भाग रहे हैं।”
श्लोक 35 (7.110.35)
तं तथा समरे द्रोणं निघ्नन्तं सौमकान्रणे । न चाप्यभिययुः केचिदपरे नैव विव्यधुः ॥
taṃ tathā samare droṇaṃ nighnantaṃ saumakānraṇe | na cāpyabhiyayuḥ kecidapare naiva vivyadhuḥ
इस प्रकार रण में सोमकों को मारते हुए द्रोण पर कुछ ने चढ़ाई ही नहीं की, और कुछ ने उन पर प्रहार नहीं किया।
श्लोक 36 (7.110.36)
वर्तमाने तथा रौद्रे तस्मिन्वीरवरक्षये । अशृणोत्सहसा पार्थः पाञ्चजन्यस्य निःस्वनम् ॥
vartamāne tathā raudre tasminvīravarakṣaye | aśṛṇotsahasā pārthaḥ pāñcajanyasya niḥsvanam
श्रेष्ठ वीरों के उस भयंकर संहार के बीच पार्थ (युधिष्ठिर) ने सहसा पाञ्चजन्य का घोष सुना।
श्लोक 37 (7.110.37)
पूरिते वासुदेवेन शङ्खराजे महात्मना । युध्यमानेषु वीरेषु सैन्धवस्याभिरक्षिषु ॥
pūrite vāsudevena śaṅkharāje mahātmanā | yudhyamāneṣu vīreṣu saindhavasyābhirakṣiṣu
जब महात्मा वासुदेव ने शंखराज को फूँका था और सैन्धव के रक्षक वीर लड़ रहे थे,
श्लोक 38 (7.110.38)
नदत्सु धार्तराष्ट्रेषु विजयस्य रथं प्रति । गाण्डीवस्य च निर्घोषे विप्रनष्टे समन्ततः ॥
nadatsu dhārtarāṣṭreṣu vijayasya rathaṃ prati | gāṇḍīvasya ca nirghoṣe vipranaṣṭe samantataḥ
जब धृतराष्ट्र के पुत्रों के योद्धा विजय (अर्जुन) के रथ की ओर गरज रहे थे और गाण्डीव की टंकार सब ओर से लुप्त हो गई थी,
श्लोक 39 (7.110.39)
कश्मलाभिहतो राजा चिन्तयामास पाण्डवः । न नूनं स्वस्ति पार्थाय यथा नदति शङ्खराट् ॥
kaśmalābhihato rājā cintayāmāsa pāṇḍavaḥ | na nūnaṃ svasti pārthāya yathā nadati śaṅkharāṭ
तब मूर्च्छा-सी से घिरे पाण्डव राजा ने सोचा — “निश्चय ही पार्थ का कुशल नहीं है, क्योंकि शंखराज इस तरह बज रहा है,
श्लोक 40 (7.110.40)
कौरवाश्च यथा हृष्टा विनदन्ति मुहुर्मुहुः । व्यक्तमद्य विनश्यन्ति सर्वलोकमहारथाः ॥
kauravāśca yathā hṛṣṭā vinadanti muhurmuhuḥ | vyaktamadya vinaśyanti sarvalokamahārathāḥ
और कौरव हर्षित होकर बार-बार गरज रहे हैं। स्पष्ट है कि आज सारे लोक के महारथी नष्ट हो रहे हैं।”
श्लोक 41 (7.110.41)
एवं सञ्चिन्तयित्वा तु व्याकुलेनान्तरात्मना । अजातशत्रुः कौन्तेयः सात्वतं प्रत्यभाषत ॥
evaṃ sañcintayitvā tu vyākulenāntarātmanā | ajātaśatruḥ kaunteyaḥ sātvataṃ pratyabhāṣata
इस प्रकार व्याकुल मन से विचार करके अजातशत्रु कुन्ती-पुत्र ने सात्वत सात्यकि से कहा —
श्लोक 42 (7.110.42)
बाष्पगद्गदया वाचा मुह्यमानो मुहुर्मुहुः । कृत्यस्यानन्तरापेक्षी शैनेयं शिनिपुङ्गवम् ॥
bāṣpagadgadayā vācā muhyamāno muhurmuhuḥ | kṛtyasyānantarāpekṣī śaineyaṃ śinipuṅgavam
आँसुओं से भरे गद्गद कण्ठ से, बार-बार विह्वल होते हुए और आगे के कर्तव्य की ही चिन्ता करते हुए, शिनियों में श्रेष्ठ शैनेय से।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 43 (7.110.43)
यः स धर्मः पुरा दृष्टः सद्भिः शैनेय शाश्वतः । साम्पराये सुहृत्कृत्ये तस्य कालोऽयमागतः ॥
yaḥ sa dharmaḥ purā dṛṣṭaḥ sadbhiḥ śaineya śāśvataḥ | sāmparāye suhṛtkṛtye tasya kālo'yamāgataḥ
हे शैनेय, सज्जनों ने जिस सनातन धर्म को पहले से जाना है, संकट की घड़ी में मित्र के काम आने का उसका समय अब आ गया है।
श्लोक 44 (7.110.44)
सर्वेष्वपि च योधेषु चिन्तयञ्शिनिपुङ्गव । त्वत्तः सुहृत्तमं कञ्चिन्नाभिजानामि सात्यके ॥
sarveṣvapi ca yodheṣu cintayañśinipuṅgava | tvattaḥ suhṛttamaṃ kañcinnābhijānāmi sātyake
हे शिनिप्रवर सात्यके, सब योद्धाओं पर विचार करता हूँ तो तुमसे बढ़कर अपना हितैषी किसी को नहीं पाता।
श्लोक 45 (7.110.45)
यो हि प्रीतमना नित्यं यश्च नित्यमनुव्रतः । स कार्ये साम्पराये तु नियोज्य इति मे मतिः ॥
yo hi prītamanā nityaṃ yaśca nityamanuvrataḥ | sa kārye sāmparāye tu niyojya iti me matiḥ
जो सदा प्रेम रखता है और सदा अनुकूल रहता है, उसी को युद्ध-संकट के काम में लगाना चाहिए — ऐसा मेरा मत है।
श्लोक 46 (7.110.46)
यथा च केशवो नित्यं पाण्डवानां परायणम् । तथा त्वमपि वार्ष्णेय कृष्णतुल्यपराक्रमः ॥
yathā ca keśavo nityaṃ pāṇḍavānāṃ parāyaṇam | tathā tvamapi vārṣṇeya kṛṣṇatulyaparākramaḥ
हे वृष्णिवंशी, जैसे केशव सदा पाण्डवों के आश्रय हैं, वैसे ही तुम भी पराक्रम में कृष्ण के समान हो।
श्लोक 47 (7.110.47)
सोऽहं भारं समाधास्ये त्वयि तं वोढुमर्हसि । अभिप्रायं च मे नित्यं न वृथा कर्तुमर्हसि ॥
so'haṃ bhāraṃ samādhāsye tvayi taṃ voḍhumarhasi | abhiprāyaṃ ca me nityaṃ na vṛthā kartumarhasi
वह भार मैं तुम पर डालूँगा, और उसे उठाना तुम्हें उचित है। मेरे अभिप्राय को तुम कभी व्यर्थ न करना।
श्लोक 48 (7.110.48)
स त्वं भ्रातुर्वयस्यस्य गुरोरपि च संयुगे । कुरु कृच्छ्रे सहायार्थमर्जुनस्य नरर्षभ ॥
sa tvaṃ bhrāturvayasyasya gurorapi ca saṃyuge | kuru kṛcchre sahāyārthamarjunasya nararṣabha
हे नरश्रेष्ठ, इसलिए तुम इस संकट में युद्ध के बीच अर्जुन की सहायता करो — वे तुम्हारे भाई, सखा और गुरु भी हैं।
श्लोक 49 (7.110.49)
त्वं हि सत्यव्रतः शूरो मित्राणामभयङ्करः । लोके विख्यायसे वीर कर्मभिः सत्यवागिति ॥
tvaṃ hi satyavrataḥ śūro mitrāṇāmabhayaṅkaraḥ | loke vikhyāyase vīra karmabhiḥ satyavāgiti
तुम सत्यव्रती, शूर और मित्रों को अभय देने वाले हो; हे वीर, संसार में तुम अपने कर्मों से सत्यवादी के रूप में प्रसिद्ध हो।
श्लोक 50 (7.110.50)
यो हि शैनेय मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत्तनुम् । पृथिवीं च द्विजातिभ्यो यो दद्यात्स समो भवेत् ॥
yo hi śaineya mitrārthe yudhyamānastyajettanum | pṛthivīṃ ca dvijātibhyo yo dadyātsa samo bhavet
हे शैनेय, जो मित्र के लिए लड़ते हुए प्राण त्यागता है और जो ब्राह्मणों को पृथ्वी का दान देता है, वे दोनों समान हैं।
श्लोक 51 (7.110.51)
श्रुताश्च बहवोऽस्माभी राजानो ये दिवं गताः । दत्त्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ॥
śrutāśca bahavo'smābhī rājāno ye divaṃ gatāḥ | dattvemāṃ pṛthivīṃ kṛtsnāṃ brāhmaṇebhyo yathāvidhi
हमने सुना है कि बहुत-से राजा इस सारी पृथ्वी को विधिपूर्वक ब्राह्मणों को देकर स्वर्ग गए हैं।
श्लोक 52 (7.110.52)
दीयमाना च बहुभिर्दास्यते च मुहुर्मही । न हि कश्चिद्रणे प्राणान्मित्रार्थे त्यक्तवानिह ॥
dīyamānā ca bahubhirdāsyate ca muhurmahī | na hi kaścidraṇe prāṇānmitrārthe tyaktavāniha
पृथ्वी को बहुतों ने दिया है और आगे भी बार-बार दिया जाएगा; पर यहाँ किसी ने भी मित्र के लिए युद्ध में अपने प्राण नहीं त्यागे।
श्लोक 53 (7.110.53)
एवं त्वामपि धर्मात्मन्प्रयाचेऽहं कृताञ्जलिः । पृथिवीदानतुल्यं स्यादधिकं वा फलं विभो ॥
evaṃ tvāmapi dharmātmanprayāce'haṃ kṛtāñjaliḥ | pṛthivīdānatulyaṃ syādadhikaṃ vā phalaṃ vibho
हे धर्मात्मन्, हे विभो, इसी प्रकार मैं भी हाथ जोड़कर तुमसे प्रार्थना करता हूँ — तुम्हें पृथ्वी-दान के बराबर, या उससे भी अधिक फल मिले।
श्लोक 54 (7.110.54)
एक एव सदा कृष्णो मित्राणामभयङ्करः । रणे सन्त्यजति प्राणान्द्वितीयस्त्वं च सात्यके ॥
eka eva sadā kṛṣṇo mitrāṇāmabhayaṅkaraḥ | raṇe santyajati prāṇāndvitīyastvaṃ ca sātyake
मित्रों को अभय देने वाले और रण में प्राण तक न्योछावर कर देने वाले एकमात्र कृष्ण हैं; दूसरे तुम हो, सात्यके।
श्लोक 55 (7.110.55)
विक्रान्तस्य च वीरस्य युद्धे प्रार्थयतो यशः । शूर एव सहायः स्यान्नेतरः प्राकृतो जनः ॥
vikrāntasya ca vīrasya yuddhe prārthayato yaśaḥ | śūra eva sahāyaḥ syānnetaraḥ prākṛto janaḥ
जो पराक्रमी वीर युद्ध में यश चाहता है, उसका सहायक कोई शूर ही हो सकता है; कोई साधारण मनुष्य नहीं।
श्लोक 56 (7.110.56)
ईदृशे तु परामर्दे वर्तमानस्य माधव । त्वदन्यो हि रणे गोप्ता विजयस्य न विद्यते ॥
īdṛśe tu parāmarde vartamānasya mādhava | tvadanyo hi raṇe goptā vijayasya na vidyate
हे माधव, ऐसे कठिन संकट में पड़े हुए के लिए रण में विजय का रक्षक तुम्हारे सिवा और कोई नहीं है।
श्लोक 57 (7.110.57)
श्लाघन्नेव हि कर्माणि शतशस्तव पाण्डवः । मम सञ्जनयन्हर्षं पुनः पुनरकीर्तयत् ॥
ślāghanneva hi karmāṇi śataśastava pāṇḍavaḥ | mama sañjanayanharṣaṃ punaḥ punarakīrtayat
स्वयं पाण्डव अर्जुन तुम्हारे कर्मों की सैकड़ों बार सराहना करते हुए बार-बार उनका बखान करके मुझे हर्षित करते रहे हैं।
श्लोक 58 (7.110.58)
लघुहस्तश्चित्रयोधी तथा लघुपराक्रमः । प्राज्ञः सर्वास्त्रविच्छूरो मुह्यते न च संयुगे ॥
laghuhastaścitrayodhī tathā laghuparākramaḥ | prājñaḥ sarvāstravicchūro muhyate na ca saṃyuge
हल्के हाथ वाला, विचित्र ढंग से लड़ने वाला, शीघ्र पराक्रमी, बुद्धिमान्, सब अस्त्रों का जानकार, ऐसा शूर जो युद्ध में कभी मोहित नहीं होता —
श्लोक 59 (7.110.59)
महास्कन्धो महोरस्को महाबाहुर्महाहनुः । महाबलो महावीर्यः स महात्मा महारथः ॥
mahāskandho mahorasko mahābāhurmahāhanuḥ | mahābalo mahāvīryaḥ sa mahātmā mahārathaḥ
चौड़े कंधों, चौड़ी छाती, लम्बी भुजाओं और बड़ी ठोड़ी वाला, महान् बल और महान् वीर्य से सम्पन्न, महात्मा और महारथी।
श्लोक 60 (7.110.60)
शिष्यो मम सखा चैव प्रियोऽस्याहं प्रियश्च मे । युयुधानः सहायो मे प्रमथिष्यति कौरवान् ॥
śiṣyo mama sakhā caiva priyo'syāhaṃ priyaśca me | yuyudhānaḥ sahāyo me pramathiṣyati kauravān
“वह मेरा शिष्य और मित्र है; मैं उसे प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है। युयुधान मेरा सहायक होकर कौरवों को कुचल देगा।
श्लोक 61 (7.110.61)
अस्मदर्थं च राजेन्द्र सन्नह्येद्यदि केशवः । रामो वाप्यनिरुद्धो वा प्रद्युम्नो वा महारथः ॥
asmadarthaṃ ca rājendra sannahyedyadi keśavaḥ | rāmo vāpyaniruddho vā pradyumno vā mahārathaḥ
हे राजेन्द्र, यदि केशव हमारे लिए कवच बाँधें, या बलराम, अनिरुद्ध अथवा महारथी प्रद्युम्न,
श्लोक 62 (7.110.62)
गदो वा सारणो वापि साम्वो वा सह वृष्णिभिः । सहायार्थं महाराज सङ्ग्रामोत्तममूर्धनि ॥
gado vā sāraṇo vāpi sāmvo vā saha vṛṣṇibhiḥ | sahāyārthaṃ mahārāja saṅgrāmottamamūrdhani
या गद, सारण अथवा साम्ब वृष्णियों के साथ, हे महाराज, इस श्रेष्ठ संग्राम के मुहाने पर हमारी सहायता के लिए आएँ,
श्लोक 63 (7.110.63)
तथाप्यहं नरव्याघ्रं शैनेयं सत्यविक्रमम् । साहाय्ये विनियोक्ष्यामि नास्ति मेऽन्योहि तत्समः ॥
tathāpyahaṃ naravyāghraṃ śaineyaṃ satyavikramam | sāhāyye viniyokṣyāmi nāsti me'nyohi tatsamaḥ
तो भी मैं नरश्रेष्ठ, सत्य-पराक्रमी शैनेय को ही इस सहायता में लगाऊँगा; उसके समान मेरा और कोई नहीं है।”
श्लोक 64 (7.110.64)
इति द्वैतवने तात मामुवाच धनञ्जयः । परोक्षे त्वद्गुणांस्तथ्यान्कथयन्नार्यसंसदि ॥
iti dvaitavane tāta māmuvāca dhanañjayaḥ | parokṣe tvadguṇāṃstathyānkathayannāryasaṃsadi
हे तात, द्वैतवन में धनञ्जय ने आर्यजनों की सभा में तुम्हारी अनुपस्थिति में तुम्हारे सच्चे गुणों का बखान करते हुए मुझसे यही कहा था।
श्लोक 65 (7.110.65)
तस्य त्वमेवं सङ्कल्पं न वृथा कर्तुमर्हसि । धनञ्जयस्य वार्ष्णेय मम भीमस्य चोभयोः ॥
tasya tvamevaṃ saṅkalpaṃ na vṛthā kartumarhasi | dhanañjayasya vārṣṇeya mama bhīmasya cobhayoḥ
हे वार्ष्णेय, उसके इस संकल्प को तुम्हें व्यर्थ नहीं करना चाहिए — धनञ्जय के, और मेरे तथा भीम के भी।
श्लोक 66 (7.110.66)
यच्चापि तीर्थानि चरन्नगच्छं द्वारकां प्रति । तत्राहमपि ते भक्तिमर्जुनं प्रति दृष्टवान् ॥
yaccāpi tīrthāni carannagacchaṃ dvārakāṃ prati | tatrāhamapi te bhaktimarjunaṃ prati dṛṣṭavān
और जब तीर्थों में घूमते हुए मैं द्वारका गया था, तब वहाँ भी मैंने अर्जुन के प्रति तुम्हारी भक्ति देखी थी।
श्लोक 67 (7.110.67)
न तत्सौहृदमन्येषु मया शैनेय लक्षितम् । यथा त्वमस्मान्भजसे वर्तमानानुपप्लवे ॥
na tatsauhṛdamanyeṣu mayā śaineya lakṣitam | yathā tvamasmānbhajase vartamānānupaplave
हे शैनेय, संकट के इस समय तुम हम पर जैसा स्नेह रखते हो, वैसा स्नेह मैंने किसी और में नहीं देखा।
श्लोक 68 (7.110.68)
सोऽभिजात्या च भक्त्या च सख्यस्याचार्यकस्य च । सौहृदस्य च वीर्यस्य कुलीनत्वस्य माधव ॥
so'bhijātyā ca bhaktyā ca sakhyasyācāryakasya ca | sauhṛdasya ca vīryasya kulīnatvasya mādhava
हे माधव, इसलिए अपने उत्तम कुल और भक्ति के नाते, मित्रता और गुरु-शिष्य के सम्बन्ध के नाते, सौहार्द, पराक्रम और कुलीनता के नाते,
श्लोक 69 (7.110.69)
सत्यस्य च महाबाहो अनुकम्पार्थमेव च । अनुरूपं महेष्वास कर्म त्वं कर्तुमर्हसि ॥
satyasya ca mahābāho anukampārthameva ca | anurūpaṃ maheṣvāsa karma tvaṃ kartumarhasi
हे महाबाहो, अपने दिए हुए वचन और करुणा के नाते भी, हे महाधनुर्धर, तुम्हें इन सबके अनुरूप कर्म करना चाहिए।
श्लोक 70 (7.110.70)
सुयोधनो हि सहसा गतो द्रोणेन दंशितः । पूर्वमेवानुयातास्ते कौरवाणां महारथाः ॥
suyodhano hi sahasā gato droṇena daṃśitaḥ | pūrvamevānuyātāste kauravāṇāṃ mahārathāḥ
द्रोण के द्वारा कवच पहनाया हुआ दुर्योधन अचानक चला गया है, और कौरवों के महारथी तो उससे भी पहले उसके पीछे जा चुके थे।
श्लोक 71 (7.110.71)
सुमहान्निनदश्चैव श्रूयते विजयं प्रति । स शैनेय जवेनाशु गन्तुमर्हसि मानद ॥
sumahānninadaścaiva śrūyate vijayaṃ prati | sa śaineya javenāśu gantumarhasi mānada
विजय (अर्जुन) की ओर बहुत भारी कोलाहल सुनाई दे रहा है। इसलिए हे शैनेय, हे सम्मान देने वाले, तुम्हें शीघ्रता से वहाँ जाना चाहिए।
श्लोक 72 (7.110.72)
भीमसेनो वयं चैव संयत्ताः सहसैनिकाः । द्रोणमावारयिष्यामो यदि त्वां प्रतियोत्स्यते ॥
bhīmaseno vayaṃ caiva saṃyattāḥ sahasainikāḥ | droṇamāvārayiṣyāmo yadi tvāṃ pratiyotsyate
भीमसेन और हम सब अपनी सेना के साथ तैयार हैं; यदि द्रोण तुमसे लड़ने आएँगे तो हम उन्हें रोक लेंगे।
श्लोक 73 (7.110.73)
पश्य शैनेय सैन्यानि द्रवमाणानि संयुगे । महान्तं च रणे शब्दं दीर्यमाणां च भारतीम् ॥
paśya śaineya sainyāni dravamāṇāni saṃyuge | mahāntaṃ ca raṇe śabdaṃ dīryamāṇāṃ ca bhāratīm
हे शैनेय, देखो, रण में सेनाएँ भाग रही हैं, और भरत की सेना के फटने का यह बड़ा शब्द सुनो।
श्लोक 74 (7.110.74)
महामारुतवेगेन समुद्रमिव पर्वसु । धार्तराष्ट्रबलं तात विक्षिप्तं सव्यसाचिना ॥
mahāmārutavegena samudramiva parvasu | dhārtarāṣṭrabalaṃ tāta vikṣiptaṃ savyasācinā
हे तात, पर्व के दिनों में प्रचण्ड वायु के वेग से उमड़े समुद्र की तरह धृतराष्ट्र की सेना को सव्यसाची ने तितर-बितर कर दिया है।
श्लोक 75 (7.110.75)
रथैर्विपरिधावद्भिर्मनुष्यैश्च हयैश्च ह । सैन्यं रजःसमुद्भूतमेतत्सम्परिवर्तते ॥
rathairviparidhāvadbhirmanuṣyaiśca hayaiśca ha | sainyaṃ rajaḥsamudbhūtametatsamparivartate
वहाँ रथों, मनुष्यों और घोड़ों के चारों ओर दौड़ने से उठी धूल में लिपटी सेना चक्कर काट रही है।
श्लोक 76 (7.110.76)
संवृतः सिन्धुसौवीरैर्नखरप्रासयोधिभिः । अत्यन्तोपचितैः शूरैः फल्गुनः परवीरहा ॥
saṃvṛtaḥ sindhusauvīrairnakharaprāsayodhibhiḥ | atyantopacitaiḥ śūraiḥ phalgunaḥ paravīrahā
शत्रु-वीरों का नाश करने वाले फल्गुन को नखर और प्रास से लड़ने वाले, अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट सिन्धु और सौवीर देश के शूरों ने घेर रखा है।
श्लोक 77 (7.110.77)
नैतद्बलमसंवार्यं शक्यो जेतुं जयद्रथः । एते हि सैन्धवस्यार्थे सर्वे सन्त्यक्तजीविताः ॥
naitadbalamasaṃvāryaṃ śakyo jetuṃ jayadrathaḥ | ete hi saindhavasyārthe sarve santyaktajīvitāḥ
इस सेना को रोके बिना जयद्रथ को जीतना सम्भव नहीं; क्योंकि ये सब सैन्धव के लिए प्राणों का मोह छोड़ चुके हैं।
श्लोक 78 (7.110.78)
शरशक्तिध्वजवरं हयनागसमाकुलम् । पश्यैतद्धार्तराष्ट्राणामनीकं सुदुरासदम् ॥
śaraśaktidhvajavaraṃ hayanāgasamākulam | paśyaitaddhārtarāṣṭrāṇāmanīkaṃ sudurāsadam
बाणों, शक्तियों और ध्वजाओं से सुशोभित, घोड़ों और हाथियों से भरी, अत्यन्त दुर्जेय धृतराष्ट्र-पुत्रों की उस सेना को देखो।
श्लोक 79 (7.110.79)
शृणु दुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खशब्दांश्च पुष्कलान् । सिंहनादरवांश्चैव रथनेमिस्वनांस्तथा ॥
śṛṇu dundubhinirghoṣaṃ śaṅkhaśabdāṃśca puṣkalān | siṃhanādaravāṃścaiva rathanemisvanāṃstathā
नगाड़ों की गूँज, शंखों की बहुत-सी ध्वनियाँ, सिंहनाद और रथ के पहियों की घर्घराहट सुनो।
श्लोक 80 (7.110.80)
नागानां शृणु शब्दं च पत्तीनां च सहस्रशः । सादिनां द्रवतां चैव शृणु कम्पयतां महीम् ॥
nāgānāṃ śṛṇu śabdaṃ ca pattīnāṃ ca sahasraśaḥ | sādināṃ dravatāṃ caiva śṛṇu kampayatāṃ mahīm
हाथियों का शब्द सुनो, हज़ारों पैदल सैनिकों का और पृथ्वी को कँपाते दौड़ते घुड़सवारों का शब्द सुनो।
श्लोक 81 (7.110.81)
पुरस्तात्सैन्धवानीकं द्रोणानीकं च पृष्ठतः । बहुत्वाद्धि नरव्याघ्र देवेन्द्रमपि पीडयेत् ॥
purastātsaindhavānīkaṃ droṇānīkaṃ ca pṛṣṭhataḥ | bahutvāddhi naravyāghra devendramapi pīḍayet
हे पुरुषसिंह, सामने सैन्धव की सेना है और पीछे द्रोण की; संख्या की बहुतायत से वह देवराज इन्द्र को भी पीड़ित कर सकती है।
श्लोक 82 (7.110.82)
अपर्यन्ते बले मग्नो जह्यादपि च जीवितम् । तस्मिंश्च निहते युद्धे कथं जीवेत मादृशः ॥
aparyante bale magno jahyādapi ca jīvitam | tasmiṃśca nihate yuddhe kathaṃ jīveta mādṛśaḥ
असीम सेना में फँसा मनुष्य प्राण भी गँवा सकता है; और यदि वह उस युद्ध में मारा गया, तो मेरे जैसा व्यक्ति कैसे जिएगा?
श्लोक 83 (7.110.83)
सर्वथा समनुप्राप्तः सुकृच्छ्रं त्वयि जीवति । श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयश्च पाण्डवः ॥
sarvathā samanuprāptaḥ sukṛcchraṃ tvayi jīvati | śyāmo yuvā guḍākeśo darśanīyaśca pāṇḍavaḥ
तुम्हारे जीवित रहते हुए भी वह सब प्रकार से भारी संकट में आ पड़ा है — वह साँवला, युवा, गुडाकेश और देखने में सुन्दर पाण्डव —
श्लोक 84 (7.110.84)
लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च प्रविष्टस्तात भारतीम् । सूर्योदये महाबाहुर्दिवसश्चातिवर्तते ॥
laghvastraścitrayodhī ca praviṣṭastāta bhāratīm | sūryodaye mahābāhurdivasaścātivartate
हल्के अस्त्र-संचालन वाला और विचित्र योद्धा, हे तात, वह भरत की सेना में घुस गया है। वह महाबाहु सूर्योदय के समय गया था और अब दिन बीता जा रहा है।
श्लोक 85 (7.110.85)
तन्न जानामि वार्ष्णेय यदि जीवति वा न वा । कुरूणां चापि तत्सैन्यं सागरप्रतिमं महत् ॥
tanna jānāmi vārṣṇeya yadi jīvati vā na vā | kurūṇāṃ cāpi tatsainyaṃ sāgarapratimaṃ mahat
हे वार्ष्णेय, मैं नहीं जानता कि वह जीवित है या नहीं; और कौरवों की वह सेना सागर के समान विशाल है।
श्लोक 86 (7.110.86)
एक एव च बीभत्सुः प्रविष्टस्तात भारतीम् । अविषह्यां महाबाहुः सुरैरपि महाहवे ॥
eka eva ca bībhatsuḥ praviṣṭastāta bhāratīm | aviṣahyāṃ mahābāhuḥ surairapi mahāhave
हे तात, महाबाहु बीभत्सु अकेला ही भरत की उस सेना में घुसा है, जिसे महायुद्ध में देवता भी नहीं सह सकते।
श्लोक 87 (7.110.87)
न हि मे वर्तते बुद्धिरद्य युद्धे कथञ्चन । द्रोणोऽपि रभसो युद्धे मम पीडयते बलम् ॥
na hi me vartate buddhiradya yuddhe kathañcana | droṇo'pi rabhaso yuddhe mama pīḍayate balam
आज इस युद्ध में मेरी बुद्धि किसी भी तरह स्थिर नहीं रहती; और युद्ध में उतावले द्रोण मेरी सेना को पीड़ित कर रहे हैं।
श्लोक 88 (7.110.88)
प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथाऽसौ चरति द्विजः । युगपच्च समेतानां कार्याणां त्वं विचक्षणः । महार्थं लघुसंयुक्तं कर्तुमर्हसि मानद ॥
pratyakṣaṃ te mahābāho yathā'sau carati dvijaḥ | yugapacca sametānāṃ kāryāṇāṃ tvaṃ vicakṣaṇaḥ | mahārthaṃ laghusaṃyuktaṃ kartumarhasi mānada
हे महाबाहो, तुम स्वयं देख रहे हो कि वह ब्राह्मण कैसे विचर रहा है। एक साथ आ पड़े कार्यों में तुम विवेकी हो; हे सम्मान देने वाले, जो कार्य सबसे महान् हो और शीघ्र सिद्ध हो सके, उसे तुम करो।
श्लोक 89 (7.110.89)
तस्य मे सर्वकार्येषु कार्यमेतन्मतं महत् । अर्जुनस्य परित्राणं कर्तव्यमिति संयुगे ॥
tasya me sarvakāryeṣu kāryametanmataṃ mahat | arjunasya paritrāṇaṃ kartavyamiti saṃyuge
मेरे सब कार्यों में मेरी दृष्टि में यही सबसे बड़ा कार्य है कि युद्ध में अर्जुन की रक्षा की जाए।
श्लोक 90 (7.110.90)
नाहं शोचामि दाशार्हं गोप्तारं जगतः पतिम् । स हि शक्तो रणे तात त्रीँल्लोकानपि सङ्गतान् ॥
nāhaṃ śocāmi dāśārhaṃ goptāraṃ jagataḥ patim | sa hi śakto raṇe tāta trīm̐llokānapi saṅgatān
हे तात, जगत् के रक्षक और स्वामी दाशार्ह (कृष्ण) के लिए मैं शोक नहीं करता; वे युद्ध में एकत्र हुए तीनों लोकों को भी जीत सकते हैं,
श्लोक 91 (7.110.91)
विजेतुं पुरुषव्याघ्रः सत्यमेतद्ब्रवीमि ते । किम्पुनर्धार्तराष्ट्रस्य बलमेतत्सुदुर्बलम् ॥
vijetuṃ puruṣavyāghraḥ satyametadbravīmi te | kimpunardhārtarāṣṭrasya balametatsudurbalam
हे पुरुषसिंह, मैं तुमसे सच कहता हूँ — फिर धृतराष्ट्र-पुत्र की इस अत्यन्त दुर्बल सेना की तो बात ही क्या!
श्लोक 92 (7.110.92)
अर्जुनस्त्वेष वार्ष्णेय पीडितो बहुभिर्युधि । प्रजह्यात्समरे प्राणांस्तस्माद्विन्दामि कश्मलम् ॥
arjunastveṣa vārṣṇeya pīḍito bahubhiryudhi | prajahyātsamare prāṇāṃstasmādvindāmi kaśmalam
किन्तु हे वार्ष्णेय, बहुतों से घिरा हुआ यह अर्जुन युद्ध में प्राण त्याग सकता है; इसीलिए मैं व्याकुल हूँ।
श्लोक 93 (7.110.93)
तस्य त्वं पदवीं गच्छ गच्छेयुस्त्वादृशा यथा । तादृशस्येदृशे काले मादृशेनाभिनोदितः ॥
tasya tvaṃ padavīṃ gaccha gaccheyustvādṛśā yathā | tādṛśasyedṛśe kāle mādṛśenābhinoditaḥ
तुम उसके पथ पर जाओ, जैसे तुम्हारे जैसे लोग जाते हैं — ऐसे समय, ऐसे व्यक्ति की ओर, मेरे जैसे व्यक्ति से प्रेरित होकर।
श्लोक 94 (7.110.94)
रणे वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथौ स्मृतौ । प्रद्युम्नश्च महाबाहुस्त्वं च सात्वत विश्रुतः ॥
raṇe vṛṣṇipravīrāṇāṃ dvāvevātirathau smṛtau | pradyumnaśca mahābāhustvaṃ ca sātvata viśrutaḥ
हे सात्वत, युद्ध में वृष्णियों के वीरों में केवल दो ही अतिरथी माने गए हैं — महाबाहु प्रद्युम्न और विख्यात तुम।
श्लोक 95 (7.110.95)
अस्त्रे नारायणसमः सङ्कर्षणसमो बले । वीरतायां नरव्याघ्र धनञ्जयसमो ह्यसि ॥
astre nārāyaṇasamaḥ saṅkarṣaṇasamo bale | vīratāyāṃ naravyāghra dhanañjayasamo hyasi
हे पुरुषसिंह, अस्त्र-विद्या में तुम नारायण के समान हो, बल में संकर्षण के समान, और वीरता में धनञ्जय के समान।
श्लोक 96 (7.110.96)
भीष्मद्रोणावतिक्रम्य सर्वयुद्धविशारदम् । त्वामेव पुरुषव्याघ्रं लोके सन्तः प्रचक्षते ॥
bhīṣmadroṇāvatikramya sarvayuddhaviśāradam | tvāmeva puruṣavyāghraṃ loke santaḥ pracakṣate
हे पुरुषसिंह, भीष्म और द्रोण को छोड़कर, सब प्रकार के युद्ध में निपुण तुम्हीं को संसार के सज्जन पुरुषव्याघ्र कहते हैं।
श्लोक 97 (7.110.97)
सदेवासुरगन्धर्वान्सकिन्नरमहोरगान् । योधयेच्च जगत्सर्वं विजयेत रिपून्बहून् ॥
sadevāsuragandharvānsakinnaramahoragān | yodhayecca jagatsarvaṃ vijayeta ripūnbahūn
“वह देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर और महानागों से भी लड़ सकता है — सारे जगत् से भी — और बहुत-से शत्रुओं को जीत सकता है।
श्लोक 98 (7.110.98)
इति ब्रुवन्ति लोकेषु जनास्तव गुणांस्तथा । समागमेषु सर्वेषु पृथगेव च सर्वदा । नाशक्यं विद्यते लोके सात्यकेरिति माधव ॥
iti bruvanti lokeṣu janāstava guṇāṃstathā | samāgameṣu sarveṣu pṛthageva ca sarvadā | nāśakyaṃ vidyate loke sātyakeriti mādhava
संसार में लोग तुम्हारे गुणों का ऐसा ही बखान करते हैं, और सब सभाओं में भी अलग-अलग सदा ऐसा ही कहते हैं।” हे माधव, वे कहते हैं — “संसार में सात्यकि के लिए कुछ भी असम्भव नहीं।”
श्लोक 99 (7.110.99)
तत्त्वां यदभिवक्ष्यामि तत्कुरुष्व महाबल ॥
tattvāṃ yadabhivakṣyāmi tatkuruṣva mahābala
हे महाबली, अब मैं तुमसे जो कहने जा रहा हूँ, उसे करो।
श्लोक 100 (7.110.100)
सम्भावना हि लोकस्य मम पार्थस्य चोभयोः । नान्यथा तां महाबाहो सम्प्रकर्तुमिहार्हसि ॥
sambhāvanā hi lokasya mama pārthasya cobhayoḥ | nānyathā tāṃ mahābāho samprakartumihārhasi
संसार की, मेरी और पार्थ की भी जो तुम पर आस्था है, हे महाबाहो, उसे तुम्हें अन्यथा नहीं करना चाहिए।
श्लोक 101 (7.110.101)
परित्यज्य प्रियान्प्राणान्रणे चर विभीतवत् । न हि शैनेय दाशार्हा रणे रक्षन्ति जीवितम् ॥
parityajya priyānprāṇānraṇe cara vibhītavat | na hi śaineya dāśārhā raṇe rakṣanti jīvitam
प्रिय प्राणों का मोह छोड़कर निर्भय होकर रण में विचरो। हे शैनेय, दाशार्ह लोग युद्ध में अपने प्राण नहीं बचाते।
श्लोक 102 (7.110.102)
अयुद्धमनवस्थानं सङ्ग्रामे च पलायनम् । भीरूणामसतां मार्गे नैष दाशार्हसेवितः ॥
ayuddhamanavasthānaṃ saṅgrāme ca palāyanam | bhīrūṇāmasatāṃ mārge naiṣa dāśārhasevitaḥ
युद्ध न करना, डटकर न खड़ा रहना और संग्राम से भाग जाना — यह कायरों और नीच पुरुषों का मार्ग है; दाशार्हों ने इसका सेवन नहीं किया।
श्लोक 103 (7.110.103)
तवार्जुनो गुरुस्तात धर्मात्मा शिनिपुङ्गव । वासुदेवो गुरुश्चापि तव पार्थस्य धीमतः ॥
tavārjuno gurustāta dharmātmā śinipuṅgava | vāsudevo guruścāpi tava pārthasya dhīmataḥ
हे तात, शिनिवंश के श्रेष्ठ, धर्मात्मा अर्जुन तुम्हारे गुरु हैं, और वासुदेव भी तुम्हारे और बुद्धिमान् पार्थ — दोनों के गुरु हैं।
श्लोक 104 (7.110.104)
कारणद्वयमेतद्धि जानंस्त्वामहमब्रुवम् । मावमंस्था वचो मह्यं गुरुस्तव गुरोर्ह्यहम् ॥
kāraṇadvayametaddhi jānaṃstvāmahamabruvam | māvamaṃsthā vaco mahyaṃ gurustava gurorhyaham
इन दो कारणों को जानकर ही मैंने तुमसे यह कहा है। मेरी बात का अनादर मत करना; मैं तुम्हारे गुरु का भी गुरु हूँ।
श्लोक 105 (7.110.105)
वासुदेवमतं चैव मम चैवार्जुनस्य च । सत्यमेतन्मयोक्तं ते याहि यत्र धनञ्जयः ॥
vāsudevamataṃ caiva mama caivārjunasya ca | satyametanmayoktaṃ te yāhi yatra dhanañjayaḥ
यह वासुदेव का भी मत है, मेरा भी और अर्जुन का भी। मैंने तुमसे जो कहा, वह सत्य है। जहाँ धनञ्जय हैं, वहाँ जाओ।
श्लोक 106 (7.110.106)
एतद्वचनमाज्ञाय मम सत्यपराक्रम । प्रविशैतद्बलं तात धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥
etadvacanamājñāya mama satyaparākrama | praviśaitadbalaṃ tāta dhārtarāṣṭrasya durmateḥ
हे सत्य-पराक्रमी, मेरे इस वचन को समझकर, हे तात, दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र-पुत्र की इस सेना में प्रवेश करो,
श्लोक 107 (7.110.107)
प्रविश्य च यथान्यायं सङ्गम्य च महारथैः । यथार्हमात्मनः कर्म रणे सात्वत दर्शय ॥
praviśya ca yathānyāyaṃ saṅgamya ca mahārathaiḥ | yathārhamātmanaḥ karma raṇe sātvata darśaya
और विधिपूर्वक प्रवेश करके तथा महारथियों से भिड़कर, हे सात्वत, रण में अपने अनुरूप पराक्रम दिखाओ।