द्रोण पर्व · अध्याय 111
सात्यकि अर्जुन का आदेश सुनाते हैं; युधिष्ठिर उन्हें भेजते हैं
अर्जुन के पास जाने के युधिष्ठिर के आदेश पर सात्यकि कहते हैं कि वे आज्ञा मानेंगे, पर वे अर्जुन का बार-बार दिया हुआ आदेश सुनाते हैं कि राजा को उन्हें पकड़ने को उद्यत द्रोण से बचाना है, और कहते हैं कि युधिष्ठिर को बिना रक्षक छोड़कर वे नहीं जा सकते। युधिष्ठिर भीम, धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पुत्रों, केकयों, विराट, द्रुपद आदि को अपने रक्षक बताते हैं और सात्यकि को निश्चिन्त होकर भेज देते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.111.1)
प्रीतियुक्तं च हृद्यं च माननीयं च सर्वशः । कालयुक्तं च चित्रं च स्वधिया चाभिभाषितम् ॥
prītiyuktaṃ ca hṛdyaṃ ca mānanīyaṃ ca sarvaśaḥ | kālayuktaṃ ca citraṃ ca svadhiyā cābhibhāṣitam
वह वचन प्रेम से भरा, हृदय को भाने वाला, सब प्रकार से आदर के योग्य, समय के अनुकूल और विविध भावों वाला था, जो उन्होंने अपनी ही सूझ-बूझ से कहा था।
श्लोक 2 (7.111.2)
धर्मराजस्य तद्वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गवः । सात्यकिर्भरतश्रेष्ठ प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥
dharmarājasya tadvākyaṃ niśamya śinipuṅgavaḥ | sātyakirbharataśreṣṭha pratyuvāca yudhiṣṭhiram
हे भरतश्रेष्ठ, धर्मराज की वह बात सुनकर शिनिवंश के श्रेष्ठ सात्यकि ने युधिष्ठिर को उत्तर दिया।
सात्यकिरुवाच
श्लोक 3 (7.111.3)
श्रुतं ते गदतो वाक्यं सर्वमेतन्मयाऽच्युत । न्याययुक्तं च सत्यं च फल्गुनार्थे यशस्करम् ॥
śrutaṃ te gadato vākyaṃ sarvametanmayā'cyuta | nyāyayuktaṃ ca satyaṃ ca phalgunārthe yaśaskaram
हे अच्युत, आपके कहे ये सब वचन मैंने सुने; ये न्यायसंगत और सत्य हैं तथा फल्गुन (अर्जुन) के निमित्त यश देने वाले हैं।
श्लोक 4 (7.111.4)
एवंविधे तथा काले मादृशं प्रेक्ष्य सत्तम । वक्तुमर्हसि राजेन्द्र यथा पार्थं तथैव माम् ॥
evaṃvidhe tathā kāle mādṛśaṃ prekṣya sattama | vaktumarhasi rājendra yathā pārthaṃ tathaiva mām
हे सत्तम, ऐसे समय में मुझ जैसे को देखकर, हे राजेन्द्र, आपको मुझसे वैसे ही कहना चाहिए जैसे आप पार्थ से कहते।
श्लोक 5 (7.111.5)
न मे धनञ्जयस्यार्थे प्राणा रक्ष्याः कथञ्चन । त्वत्प्रयुक्तः पुनरहं किं न कुर्यां महाहवे ॥
na me dhanañjayasyārthe prāṇā rakṣyāḥ kathañcana | tvatprayuktaḥ punarahaṃ kiṃ na kuryāṃ mahāhave
धनञ्जय के लिए मुझे किसी प्रकार भी अपने प्राण बचाकर नहीं रखने हैं। आपके भेजने पर मैं उस महायुद्ध में क्या नहीं कर सकता?
श्लोक 6 (7.111.6)
लोकत्रयं योधयेयं सदेवासुरमानुषम् । त्वत्प्रयुक्तो नरेन्द्रेन्द्र किम्पुनस्तान्सुदुर्बलान् ॥
lokatrayaṃ yodhayeyaṃ sadevāsuramānuṣam | tvatprayukto narendrendra kimpunastānsudurbalān
आपके भेजे जाने पर, हे नरेन्द्रों के इन्द्र, मैं देवताओं, असुरों और मनुष्यों सहित तीनों लोकों से भी लड़ सकता हूँ; फिर इन अत्यन्त दुर्बलों की क्या बात!
श्लोक 7 (7.111.7)
सुयोधनबलं त्वद्य योधयिष्ये समन्ततः । विजेष्ये च रणे राजन्सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
suyodhanabalaṃ tvadya yodhayiṣye samantataḥ | vijeṣye ca raṇe rājansatyametadbravīmi te
आज मैं दुर्योधन की सेना से चारों ओर लड़ूँगा और हे राजन्, युद्ध में उसे जीतूँगा; यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।
श्लोक 8 (7.111.8)
कुशल्यहं कुशलिनं समासाद्य धनञ्जयम् । हते जयद्रथे राजन्पुनरेष्यामि तेऽन्तिकम् ॥
kuśalyahaṃ kuśalinaṃ samāsādya dhanañjayam | hate jayadrathe rājanpunareṣyāmi te'ntikam
हे राजन्, मैं कुशल रहकर कुशल धनञ्जय के पास पहुँचूँगा और जयद्रथ के मारे जाने पर फिर आपके पास लौट आऊँगा।
श्लोक 9 (7.111.9)
अवश्यं तु मया सर्वं विज्ञाप्यस्त्वं नराधिप । वासुदेवस्य यद्वाक्यं फल्गुनस्य च धीमतः ॥
avaśyaṃ tu mayā sarvaṃ vijñāpyastvaṃ narādhipa | vāsudevasya yadvākyaṃ phalgunasya ca dhīmataḥ
हे नराधिप, वासुदेव और बुद्धिमान फल्गुन ने जो कुछ कहा है, वह सब मुझे आपको अवश्य बताना है।
श्लोक 10 (7.111.10)
दृढं त्वभिहितश्चाहमर्जुनेन पुनःपुनः । मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य वासुदेवस्य शृण्वतः ॥
dṛḍhaṃ tvabhihitaścāhamarjunena punaḥpunaḥ | madhye sarvasya sainyasya vāsudevasya śṛṇvataḥ
अर्जुन ने सारी सेना के बीच, वासुदेव के सुनते हुए, मुझसे बार-बार दृढ़ता से कहा था:
श्लोक 11 (7.111.11)
अद्य माधव राजानमप्रमत्तोऽनुपालय । आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा यावद्धन्मि जयद्रथम् ॥
adya mādhava rājānamapramatto'nupālaya | āryāṃ yuddhe matiṃ kṛtvā yāvaddhanmi jayadratham
'हे माधव, आज तुम सावधान रहकर राजा की रक्षा करना; युद्ध में उत्तम संकल्प रखना, जब तक मैं जयद्रथ को मार न दूँ।
श्लोक 12 (7.111.12)
त्वयि चाहं महाबाहो प्रद्युम्ने वा महारथे । नृपं निक्षिप्य गच्छेयं निरपेक्षो जयद्रथम् ॥
tvayi cāhaṃ mahābāho pradyumne vā mahārathe | nṛpaṃ nikṣipya gaccheyaṃ nirapekṣo jayadratham
हे महाबाहो, मैं राजा को तुम्हें अथवा महारथी प्रद्युम्न को सौंपकर निश्चिन्त होकर जयद्रथ की ओर जा सकूँ।
श्लोक 13 (7.111.13)
जानीषे हि रणे द्रोणं कुरुषु श्रेष्ठसम्मतम् । प्रतिज्ञा चापि ते नित्यं श्रुता द्रोणस्य माधव ॥
jānīṣe hi raṇe droṇaṃ kuruṣu śreṣṭhasammatam | pratijñā cāpi te nityaṃ śrutā droṇasya mādhava
तुम युद्ध में द्रोण को जानते हो, जो कौरवों में श्रेष्ठ माने जाते हैं; और हे माधव, द्रोण की प्रतिज्ञा भी तुमने सदा सुनी है।
श्लोक 14 (7.111.14)
ग्रहणे धर्मराजस्य भारद्वाजोऽपि गृध्यति । शक्तश्चापि रणे द्रोणो निग्रहीतुं युधिष्ठिरम् ॥
grahaṇe dharmarājasya bhāradvājo'pi gṛdhyati | śaktaścāpi raṇe droṇo nigrahītuṃ yudhiṣṭhiram
भरद्वाज के पुत्र द्रोण धर्मराज को पकड़ने के लिए उत्सुक हैं, और वे युद्ध में युधिष्ठिर को पकड़ लेने में समर्थ भी हैं।
श्लोक 15 (7.111.15)
एवं त्वयि समाघाय धर्मराजं नरोत्तमम् । अहमद्य गमिष्यामि सैन्धवस्य वधाय हि ॥
evaṃ tvayi samāghāya dharmarājaṃ narottamam | ahamadya gamiṣyāmi saindhavasya vadhāya hi
इस प्रकार नरश्रेष्ठ धर्मराज को तुम्हारे भरोसे सौंपकर मैं आज सैन्धव का वध करने जाऊँगा।
श्लोक 16 (7.111.16)
स त्वमद्य रणे यत्तो रक्ष माधव पाण्डवम् । रक्षणे धर्मराजस्य ध्रुवो हि विजयो मम ॥
sa tvamadya raṇe yatto rakṣa mādhava pāṇḍavam | rakṣaṇe dharmarājasya dhruvo hi vijayo mama
इसलिए, हे माधव, आज तुम युद्ध में सजग रहकर पाण्डव की रक्षा करो; धर्मराज की रक्षा होने पर मेरी विजय निश्चित है।
श्लोक 17 (7.111.17)
जयद्रथं च हत्वाऽहं द्रुतमेष्यामि माधव । धर्मराजं न चेद्द्रोणो निगृह्णीयाद्रणे बलात् ॥
jayadrathaṃ ca hatvā'haṃ drutameṣyāmi mādhava | dharmarājaṃ na ceddroṇo nigṛhṇīyādraṇe balāt
हे माधव, जयद्रथ को मारकर मैं शीघ्र लौट आऊँगा — यदि द्रोण युद्ध में धर्मराज को बलपूर्वक पकड़ न लें।
श्लोक 18 (7.111.18)
निगृहीते नरश्रेष्ठे भारद्वाजेन माधव । सैन्धवस्य वधो न स्यान्ममाप्रीतिस्तथा भवेत् ॥
nigṛhīte naraśreṣṭhe bhāradvājena mādhava | saindhavasya vadho na syānmamāprītistathā bhavet
हे माधव, यदि नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर को भरद्वाज के पुत्र ने पकड़ लिया, तो सैन्धव का वध नहीं हो पाएगा और मुझे अप्रसन्नता होगी।
श्लोक 19 (7.111.19)
एवङ्गते नरश्रेष्ठे पाण्डवे सत्यवादिनि । अस्माकं गमनं व्यक्तं वनं प्रति भवेत्पुनः ॥
evaṅgate naraśreṣṭhe pāṇḍave satyavādini | asmākaṃ gamanaṃ vyaktaṃ vanaṃ prati bhavetpunaḥ
सत्यवादी पाण्डव की ऐसी दशा हो जाने पर हमें निश्चय ही फिर वन को जाना पड़ेगा।
श्लोक 20 (7.111.20)
सोऽयं मम जयो व्यक्तं व्यर्थ एव भविष्यति । यदि द्रोणो रणे क्रुद्धो निगृह्णीयाद्युधिष्ठिरम् ॥
so'yaṃ mama jayo vyaktaṃ vyartha eva bhaviṣyati | yadi droṇo raṇe kruddho nigṛhṇīyādyudhiṣṭhiram
तब मेरी यह विजय स्पष्ट ही व्यर्थ हो जाएगी, यदि क्रुद्ध द्रोण ने युद्ध में युधिष्ठिर को पकड़ लिया।
श्लोक 21 (7.111.21)
स त्वमद्य महाबाहो प्रियार्थं मम माधव । जयार्थं च यशोर्थं च रक्ष राजानमाहवे ॥
sa tvamadya mahābāho priyārthaṃ mama mādhava | jayārthaṃ ca yaśorthaṃ ca rakṣa rājānamāhave
इसलिए, हे महाबाहो माधव, आज मेरे प्रिय के लिए, विजय और यश के लिए, युद्ध में राजा की रक्षा करो।'
श्लोक 22 (7.111.22)
स भवान्मयि निक्षेपो निक्षिप्तः सव्यसाचिना । भारद्वाजाद्भयं नित्यं मन्यमानेन वै प्रभो ॥
sa bhavānmayi nikṣepo nikṣiptaḥ savyasācinā | bhāradvājādbhayaṃ nityaṃ manyamānena vai prabho
हे प्रभो, आप मेरे पास सव्यसाची की रखी हुई धरोहर हैं, क्योंकि वे भरद्वाज के पुत्र से आपके लिए सदा भय देखते रहते हैं।
श्लोक 23 (7.111.23)
तस्यापि च महाबाहो नित्यं पश्यामि संयुगे । नान्यं हि प्रतियोद्धारं रौक्मिणेयादृते प्रभो ॥
tasyāpi ca mahābāho nityaṃ paśyāmi saṃyuge | nānyaṃ hi pratiyoddhāraṃ raukmiṇeyādṛte prabho
हे महाबाहो, द्रोण के लिए भी मैं युद्ध में सदा देखता हूँ कि रुक्मिणी के पुत्र को छोड़कर कोई दूसरा उनका प्रतिद्वन्द्वी नहीं है, हे प्रभो।
श्लोक 24 (7.111.24)
मां चापि मन्यते युद्धे भारद्वाजस्य धीमतः । सोऽहं संभावनां चैतामाचार्यवचनं च तत् । पृष्ठतो नोत्सहे कर्तुं त्वां वा त्यक्तुं महीपते ॥
māṃ cāpi manyate yuddhe bhāradvājasya dhīmataḥ | so'haṃ saṃbhāvanāṃ caitāmācāryavacanaṃ ca tat | pṛṣṭhato notsahe kartuṃ tvāṃ vā tyaktuṃ mahīpate
और (अर्जुन) मुझे भी युद्ध में बुद्धिमान भरद्वाज-पुत्र के बराबर का मानते हैं। इसलिए इस सम्मान को और अपने आचार्य के उस वचन को पीछे डालना, अथवा हे महीपते, आपको छोड़ देना — यह मुझसे नहीं हो सकता।
श्लोक 25 (7.111.25)
आचार्यो लघुहस्तत्वादभेद्यकवचावृतः । उपलभ्य रणे क्रीडेद्यथा शकुनिना शिशुः ॥
ācāryo laghuhastatvādabhedyakavacāvṛtaḥ | upalabhya raṇe krīḍedyathā śakuninā śiśuḥ
आचार्य द्रोण हाथ के हल्केपन और अभेद्य कवच से ढके होने के कारण, आपको पकड़कर युद्ध में ऐसे खेलेंगे जैसे बालक पक्षी के साथ खेलता है।
श्लोक 26 (7.111.26)
यदि कार्ष्णिर्धनुष्पाणिरिह स्यान्मकरध्वजः । तस्मै त्वां विसृजेयं वै स त्वां रक्षेद्यथाऽर्जुनः ॥
yadi kārṣṇirdhanuṣpāṇiriha syānmakaradhvajaḥ | tasmai tvāṃ visṛjeyaṃ vai sa tvāṃ rakṣedyathā'rjunaḥ
यदि धनुष हाथ में लिए कृष्ण के पुत्र मकरध्वज (प्रद्युम्न) यहाँ होते, तो मैं आपको उन्हें सौंप देता; वे अर्जुन की तरह आपकी रक्षा करते।
श्लोक 27 (7.111.27)
कुरु त्वमात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि । यः प्रतीयाद्रणे द्रोणं यावद्गच्छामि पाण्डवम् ॥
kuru tvamātmano guptiṃ kaste goptā gate mayi | yaḥ pratīyādraṇe droṇaṃ yāvadgacchāmi pāṇḍavam
आप अपनी रक्षा का प्रबन्ध कीजिए; मेरे चले जाने पर कौन आपका रक्षक होगा, जो पाण्डव (अर्जुन) के पास मेरे पहुँचने तक युद्ध में द्रोण का सामना कर सके?
श्लोक 28 (7.111.28)
मा च ते भयमद्यास्तु राजन्नर्जुनसम्भवम् । न स जातु महाबाहुर्भारमुद्यम्य सीदति ॥
mā ca te bhayamadyāstu rājannarjunasambhavam | na sa jātu mahābāhurbhāramudyamya sīdati
हे राजन्, आज आपको अर्जुन के विषय में कोई भय न रहे; वे महाबाहु उठाया हुआ भार लेकर कभी नहीं थकते।
श्लोक 29 (7.111.29)
ये च सौवीरका योधास्तथा सैन्धवपौरवाः । उदीच्या दाक्षिणात्याश्च ये चान्येऽपि महारथाः ॥
ye ca sauvīrakā yodhāstathā saindhavapauravāḥ | udīcyā dākṣiṇātyāśca ye cānye'pi mahārathāḥ
जो सौवीर योद्धा, सैन्धव और पौरव हैं, उत्तर और दक्षिण के निवासी हैं, और जो अन्य महारथी हैं,
श्लोक 30 (7.111.30)
ये च कर्णमुखा राजन्रथोदाराः प्रकीर्तिताः । एतेऽर्जुनस्य क्रुद्धस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
ye ca karṇamukhā rājanrathodārāḥ prakīrtitāḥ | ete'rjunasya kruddhasya kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm
तथा हे राजन्, कर्ण को आगे रखने वाले जिन श्रेष्ठ रथियों की ख्याति है — ये सब क्रुद्ध अर्जुन की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं हैं।
श्लोक 31 (7.111.31)
उद्युक्ताः पृथिवीपाल ससुरासुरमानुषाः । सराक्षसगणा राजन्सकिन्नरमहोरगाः ॥
udyuktāḥ pṛthivīpāla sasurāsuramānuṣāḥ | sarākṣasagaṇā rājansakinnaramahoragāḥ
हे पृथ्वीपाल, देवता, असुर और मनुष्य, राक्षसों के दल, किन्नर और महानाग भी उद्यत होकर,
श्लोक 32 (7.111.32)
जङ्गमस्थावरैः सार्धं नालं पार्थस्य संयुगे । एवं ज्ञात्वा महाराज व्येतु ते भीर्धनञ्जये ॥
jaṅgamasthāvaraiḥ sārdhaṃ nālaṃ pārthasya saṃyuge | evaṃ jñātvā mahārāja vyetu te bhīrdhanañjaye
चर-अचर प्राणियों के साथ भी युद्ध में पार्थ के सामने समर्थ नहीं हैं। हे महाराज, यह जानकर धनञ्जय के विषय में आपका भय दूर हो जाए।
श्लोक 33 (7.111.33)
एवं वीरौ महेष्वासौ कृष्णौ सत्यपराक्रमौ । न तत्र कर्मणो व्यापत्कथंचिदपि विद्यते ॥
evaṃ vīrau maheṣvāsau kṛṣṇau satyaparākramau | na tatra karmaṇo vyāpatkathaṃcidapi vidyate
ऐसे वीर, महाधनुर्धर, सत्यपराक्रमी दोनों कृष्णों के रहते उनके कार्य में किसी प्रकार की विफलता नहीं हो सकती।
श्लोक 34 (7.111.34)
दैवं कृतास्त्रतां योगममर्षं शौर्यमाहवे । कृतज्ञतां दयां चैव भ्रातुस्त्वमनुचिन्तय ॥
daivaṃ kṛtāstratāṃ yogamamarṣaṃ śauryamāhave | kṛtajñatāṃ dayāṃ caiva bhrātustvamanucintaya
अपने भाई की दिव्यता, अस्त्र-कौशल, योग-शक्ति, अटल क्रोध, रणशौर्य, कृतज्ञता और दया का आप स्मरण कीजिए।
श्लोक 35 (7.111.35)
मयि चापि सहाये ते गच्छमानेऽर्जुनं प्रति । द्रोणे चित्रास्त्रतां सङ्ख्ये राजंस्त्वमनुचिन्तय ॥
mayi cāpi sahāye te gacchamāne'rjunaṃ prati | droṇe citrāstratāṃ saṅkhye rājaṃstvamanucintaya
और हे राजन्, जब मैं आपका सहायक बनकर अर्जुन के पास जा रहा हूँ, तब युद्ध में द्रोण के विचित्र अस्त्र-कौशल का भी आप ध्यान कीजिए।
श्लोक 36 (7.111.36)
आचार्यो हि भृशं राजन्निग्रहे तव गृध्यति । प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्सत्यां कर्तुं च भारत ॥
ācāryo hi bhṛśaṃ rājannigrahe tava gṛdhyati | pratijñāmātmano rakṣansatyāṃ kartuṃ ca bhārata
हे भारत, आचार्य अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करते हुए, उसे सत्य करने के लिए, आपको पकड़ने को अत्यन्त उत्सुक हैं।
श्लोक 37 (7.111.37)
कुरुष्वाद्यात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि । यस्याहं प्रत्ययात्पार्थं गच्छेयं फल्गुनं प्रति ॥
kuruṣvādyātmano guptiṃ kaste goptā gate mayi | yasyāhaṃ pratyayātpārthaṃ gaccheyaṃ phalgunaṃ prati
आज अपनी रक्षा का उपाय कीजिए; मेरे चले जाने पर कौन आपका रक्षक होगा, जिसके भरोसे मैं पार्थ फल्गुन के पास जा सकूँ?
श्लोक 38 (7.111.38)
न ह्यहं त्वां महाराज अनिक्षिप्य महाहवे । क्वचिद्यास्यामि कौरव्य सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
na hyahaṃ tvāṃ mahārāja anikṣipya mahāhave | kvacidyāsyāmi kauravya satyametadbravīmi te
हे महाराज, हे कौरव्य, मैं आपको किसी को सौंपे बिना इस महायुद्ध में कहीं नहीं जाऊँगा; यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।
श्लोक 39 (7.111.39)
न पश्यामि रथं कञ्चिद्यस्ते गोप्ता भवेदिह । शक्तं यं मन्यसे राजन्गोप्तारं प्रति पाण्डव ॥
na paśyāmi rathaṃ kañcidyaste goptā bhavediha | śaktaṃ yaṃ manyase rājangoptāraṃ prati pāṇḍava
मुझे यहाँ कोई ऐसा रथी नहीं दिखता जो आपका रक्षक हो सके; हे पाण्डव, जिसे आप रक्षक होने में समर्थ मानें, वैसा कोई नहीं दिखता।
श्लोक 40 (7.111.40)
एतद्विचार्य बहुशो बुद्ध्या बुद्धिमतां वर । दृष्ट्वा श्रेयः परं बुद्ध्या ततो राजन्प्रशाधि माम् ॥
etadvicārya bahuśo buddhyā buddhimatāṃ vara | dṛṣṭvā śreyaḥ paraṃ buddhyā tato rājanpraśādhi mām
हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, इसे बुद्धि से बार-बार सोचकर और परम कल्याण को समझकर, हे राजन्, अब मुझे आज्ञा दीजिए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 41 (7.111.41)
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव । न तु मे शुद्ध्यते भावः श्वेताश्वं प्रति मारिष ॥
evametanmahābāho yathā vadasi mādhava | na tu me śuddhyate bhāvaḥ śvetāśvaṃ prati māriṣa
हे महाबाहो माधव, जैसा तुम कहते हो वह वैसा ही है; किन्तु हे मारिष, श्वेताश्व (अर्जुन) के विषय में मेरा मन शान्त नहीं होता।
श्लोक 42 (7.111.42)
करिष्ये परमं यत्नमात्मनो रक्षणे ह्यहम् । गच्छ त्वं समनुज्ञातो यत्र यातो धनञ्जयः ॥
kariṣye paramaṃ yatnamātmano rakṣaṇe hyaham | gaccha tvaṃ samanujñāto yatra yāto dhanañjayaḥ
मैं अपनी रक्षा के लिए पूरा प्रयत्न करूँगा। तुम मेरी अनुमति से वहाँ जाओ जहाँ धनञ्जय गए हैं।
श्लोक 43 (7.111.43)
आत्मसंरक्षणं सङ्ख्ये गमनं चार्जुनं प्रति । विचार्यैतत्स्वयं बुद्ध्या गमनं तत्र रोचये ॥
ātmasaṃrakṣaṇaṃ saṅkhye gamanaṃ cārjunaṃ prati | vicāryaitatsvayaṃ buddhyā gamanaṃ tatra rocaye
युद्ध में अपनी रक्षा और अर्जुन के पास जाना — इन दोनों को स्वयं अपनी बुद्धि से विचारकर मुझे तुम्हारा वहाँ जाना ही उचित लगता है।
श्लोक 44 (7.111.44)
स त्वमातिष्ठ यानाय यत्र यातो धनञ्जयः । ममापि रक्षणं भीमः करिष्यति महाबलः ॥
sa tvamātiṣṭha yānāya yatra yāto dhanañjayaḥ | mamāpi rakṣaṇaṃ bhīmaḥ kariṣyati mahābalaḥ
इसलिए तुम उसी मार्ग पर प्रस्थान करो जिस पर धनञ्जय गए हैं; महाबली भीम भी मेरी रक्षा करेंगे।
श्लोक 45 (7.111.45)
पार्षतश्च ससोदर्यः पार्थिवाश्च महाबलाः । द्रौपदेयाश्च मां तात रक्षिष्यन्ति न संशयः ॥
pārṣataśca sasodaryaḥ pārthivāśca mahābalāḥ | draupadeyāśca māṃ tāta rakṣiṣyanti na saṃśayaḥ
हे तात, पार्षत (धृष्टद्युम्न) अपने भाइयों सहित, महाबली राजा लोग और द्रौपदी के पुत्र मेरी रक्षा करेंगे, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 46 (7.111.46)
केकया भ्रातरः पञ्च राक्षसश्च घटोत्कचः । विराटो द्रुपदश्चैव शिखण्डी च महारथः ॥
kekayā bhrātaraḥ pañca rākṣasaśca ghaṭotkacaḥ | virāṭo drupadaścaiva śikhaṇḍī ca mahārathaḥ
पाँच केकय भाई, राक्षस घटोत्कच, विराट, द्रुपद और महारथी शिखण्डी,
श्लोक 47 (7.111.47)
धृष्टकेतुश्च बलवान्कुन्तिभोजश्च मातुलः । नकुलः सहदेवश्च पाञ्चालाः सृञ्जयास्तथा । एते समाहितास्तात रक्षिष्यन्ति न संशयः ॥
dhṛṣṭaketuśca balavānkuntibhojaśca mātulaḥ | nakulaḥ sahadevaśca pāñcālāḥ sṛñjayāstathā | ete samāhitāstāta rakṣiṣyanti na saṃśayaḥ
बलवान धृष्टकेतु, मेरे मामा कुन्तिभोज, नकुल, सहदेव, पाञ्चाल और सृञ्जय — हे तात, ये सब सावधान रहकर मेरी रक्षा करेंगे, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 48 (7.111.48)
न द्रोणः सह सैन्येन कृतवर्मा च संयुगे । समासादयितुं शक्तो न च मां धर्षयिष्यति ॥
na droṇaḥ saha sainyena kṛtavarmā ca saṃyuge | samāsādayituṃ śakto na ca māṃ dharṣayiṣyati
द्रोण अपनी सेना के साथ और कृतवर्मा भी युद्ध में मुझ तक नहीं पहुँच सकते, और न मुझे दबा सकेंगे।
श्लोक 49 (7.111.49)
धृष्टद्युम्नश्च समरे द्रोणं क्रुद्धं परन्तपः । वारयिष्यति विक्रम्य वेलेव मकरालयम् ॥
dhṛṣṭadyumnaśca samare droṇaṃ kruddhaṃ parantapaḥ | vārayiṣyati vikramya veleva makarālayam
शत्रुओं को तपाने वाला धृष्टद्युम्न युद्ध में क्रुद्ध द्रोण को अपने पराक्रम से वैसे ही रोक लेगा जैसे तट समुद्र को रोकता है।
श्लोक 50 (7.111.50)
यत्र स्थास्यति सङ्ग्रामे पार्षतः परवीरहा । न द्रोणस्य बलं तात क्रमेत्तत्र कथञ्चन ॥
yatra sthāsyati saṅgrāme pārṣataḥ paravīrahā | na droṇasya balaṃ tāta kramettatra kathañcana
हे तात, शत्रु-वीरों का संहार करने वाला पार्षत संग्राम में जहाँ खड़ा होगा, वहाँ द्रोण की सेना किसी प्रकार आगे नहीं बढ़ सकेगी।
श्लोक 51 (7.111.51)
एष द्रोणविनाशाय समुत्पन्नो हुताशनात् । कवची स शरी खड्गी धन्वी च वरभूषणः ॥
eṣa droṇavināśāya samutpanno hutāśanāt | kavacī sa śarī khaḍgī dhanvī ca varabhūṣaṇaḥ
यह द्रोण के विनाश के लिए अग्नि से उत्पन्न हुआ है; कवच पहने, धनुष-बाण और तलवार लिए, उत्तम आभूषणों से सजा।
श्लोक 52 (7.111.52)
एष द्रोणं रणे क्रुद्धं वारयेत स वै प्रभो । पाञ्चालः सहितैः सर्वैः पाण्डवानां च धन्विभिः ॥
eṣa droṇaṃ raṇe kruddhaṃ vārayeta sa vai prabho | pāñcālaḥ sahitaiḥ sarvaiḥ pāṇḍavānāṃ ca dhanvibhiḥ
हे प्रभो, वह पाञ्चाल समस्त पाञ्चालों और पाण्डवों के धनुर्धरों के साथ युद्ध में क्रुद्ध द्रोण को रोकेगा।
श्लोक 53 (7.111.53)
विस्रब्धं गच्छ शैनेय मा कार्षीर्मयि सम्भ्रमम् । धृष्टद्युम्नो रणे क्रुद्धं द्रोणमावारयिष्यति ॥
visrabdhaṃ gaccha śaineya mā kārṣīrmayi sambhramam | dhṛṣṭadyumno raṇe kruddhaṃ droṇamāvārayiṣyati
हे शैनेय, निश्चिन्त होकर जाओ, मेरे विषय में घबराओ मत; धृष्टद्युम्न युद्ध में क्रुद्ध द्रोण को रोक लेगा।