द्रोण पर्व · अध्याय 112
सात्यकि सज्जित होकर निकलते हैं; भीम राजा की रक्षा के लिए रुकते हैं
कायर कहे जाने के भय से सचेत सात्यकि अर्जुन के पास जाना स्वीकार करते हैं और युधिष्ठिर को उस सेना के बारे में बताते हैं जिसे वे भेदेंगे: म्लेच्छों और किरातों की हस्ति-सेना, रुक्मरथ राजकुमार, काम्भोज और शक। उनका रथ सजाया जाता है और घोड़े जोते जाते हैं; वे स्नान कर हज़ार स्नातकों को स्वर्ण देते हैं, युधिष्ठिर का आशीर्वाद पाकर रथ पर चढ़ते हैं। भीम उनके पीछे आगे तक आते हैं, पर सात्यकि उन्हें राजा की रक्षा के लिए लौटा देते हैं और द्रोण की सेना में घुस पड़ते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.112.1)
धर्मराजस्य तद्वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गवः । स पार्थाद्भयमाशंसन्परित्यागान्महीपतेः ॥
dharmarājasya tadvākyaṃ niśamya śinipuṅgavaḥ | sa pārthādbhayamāśaṃsanparityāgānmahīpateḥ
धर्मराज का वह वचन सुनकर शिनिवंश के श्रेष्ठ सात्यकि ने, राजा को छोड़ जाने के कारण पार्थ की ओर से भय की आशंका करते हुए,
श्लोक 2 (7.112.2)
अपवादं ह्यात्मनश्च लोकाद्रक्षन्विशेषतः । न मां भीतमिति ब्रूयात्प्रयान्तं फल्गुनं प्रति ॥
apavādaṃ hyātmanaśca lokādrakṣanviśeṣataḥ | na māṃ bhītamiti brūyātprayāntaṃ phalgunaṃ prati
और विशेष रूप से लोक में अपनी निन्दा से बचने का ध्यान रखते हुए — कि फल्गुन के पास जाते हुए मुझे कोई डरपोक न कह दे —
श्लोक 3 (7.112.3)
निश्चित्य बहुधैवं स सात्यकिर्युद्धदुर्मदः । नातिव्यक्तमिवाभाष्य धर्मराजं महायशाः ॥
niścitya bahudhaivaṃ sa sātyakiryuddhadurmadaḥ | nātivyaktamivābhāṣya dharmarājaṃ mahāyaśāḥ
इस प्रकार अनेक रूपों में निश्चय करके, युद्ध में दुर्धर्ष और महायशस्वी सात्यकि ने धर्मराज से कुछ अस्पष्ट-सा कहकर,
श्लोक 4 (7.112.4)
शोकगद्गदया वाचा शोकोपहतचेतनः । यथेदानीमिति ध्यात्वा धर्मराजमथाब्रवीत् ॥
śokagadgadayā vācā śokopahatacetanaḥ | yathedānīmiti dhyātvā dharmarājamathābravīt
शोक से गद्गद वाणी में, शोक से व्याकुल चित्त होकर, "अब जैसा उचित हो" यह सोचकर, उन्होंने धर्मराज से कहा:
सात्यकिरुवाच
श्लोक 5 (7.112.5)
कृतां चेन्मन्यसे रक्षां स्वस्ति तेऽस्तु विशाम्पते । अनुयास्यामि बीभत्सुं करिष्ये वचनं तव ॥
kṛtāṃ cenmanyase rakṣāṃ svasti te'stu viśāmpate | anuyāsyāmi bībhatsuṃ kariṣye vacanaṃ tava
यदि आप मानते हैं कि आपकी रक्षा का प्रबन्ध हो चुका है, तो हे विशाम्पते, आपका कल्याण हो; मैं बीभत्सु (अर्जुन) के पीछे जाऊँगा और आपकी आज्ञा पूरी करूँगा।
श्लोक 6 (7.112.6)
न हि मे पाण्डवात्कश्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते । यो मे प्रियतरो राजन्सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥
na hi me pāṇḍavātkaścittriṣu lokeṣu vidyate | yo me priyataro rājansatyametadbravīmi te
हे राजन्, तीनों लोकों में पाण्डव (अर्जुन) से बढ़कर मुझे कोई प्रिय नहीं है; यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ।
श्लोक 7 (7.112.7)
तस्याहं पदवीं यास्ये सन्देशात्तव मानद । त्वत्कृते न च मे किञ्चिदकर्तव्यं कथञ्चन ॥
tasyāhaṃ padavīṃ yāsye sandeśāttava mānada | tvatkṛte na ca me kiñcidakartavyaṃ kathañcana
हे मानद, आपके आदेश से मैं उनके मार्ग पर चलूँगा; आपके लिए मेरे लिए कुछ भी अकरणीय नहीं है।
श्लोक 8 (7.112.8)
यथा हि मे गुरोर्वाक्यं विशिष्टं द्विपदां वर । तथा तवापि वचनं विशिष्टतरमेव मे ॥
yathā hi me gurorvākyaṃ viśiṣṭaṃ dvipadāṃ vara | tathā tavāpi vacanaṃ viśiṣṭatarameva me
हे द्विपदों में श्रेष्ठ, जैसे मेरे गुरु (अर्जुन) का वचन मेरे लिए सर्वोपरि है, वैसे ही आपका वचन मेरे लिए उससे भी अधिक मान्य है।
श्लोक 9 (7.112.9)
प्रिये हि तव वर्तेते भ्रातरौ कृष्णपाण्डवौ । तयोः प्रिये स्थितं चैव विद्धि मां राजपुङ्गव ॥
priye hi tava vartete bhrātarau kṛṣṇapāṇḍavau | tayoḥ priye sthitaṃ caiva viddhi māṃ rājapuṅgava
कृष्ण और अर्जुन दोनों भाई आपके प्रिय कार्य में लगे हैं; हे राजश्रेष्ठ, जान लीजिए कि मैं भी उन दोनों के प्रिय कार्य में स्थित हूँ।
श्लोक 10 (7.112.10)
तवाज्ञां शिरसा गृह्य पाण्डवार्थमहं प्रभो । भित्त्वेदं दुर्भिदं सैन्यं प्रयास्ये नरपुङ्गव ॥
tavājñāṃ śirasā gṛhya pāṇḍavārthamahaṃ prabho | bhittvedaṃ durbhidaṃ sainyaṃ prayāsye narapuṅgava
हे नरश्रेष्ठ, आपकी आज्ञा सिर पर रखकर मैं पाण्डव के लिए इस दुर्भेद्य सेना को भेदकर आगे जाऊँगा।
श्लोक 11 (7.112.11)
द्रोणानीकं विशाम्येष क्रुद्धो झष इवार्णवम् । तत्र यास्यामि यत्रासौ राजन्राजा जयद्रथः ॥
droṇānīkaṃ viśāmyeṣa kruddho jhaṣa ivārṇavam | tatra yāsyāmi yatrāsau rājanrājā jayadrathaḥ
जैसे क्रुद्ध बड़ी मछली समुद्र में घुसती है, वैसे ही मैं द्रोण की सेना में घुसता हूँ; और हे राजन्, जहाँ राजा जयद्रथ है, वहाँ जाऊँगा —
श्लोक 12 (7.112.12)
यत्र सेनान्तमाश्रित्य भीतस्तिष्ठति पाण्डवात् । गुप्तो रथवरश्रेष्ठैर्द्रौणिकर्णकृपादिभिः ॥
yatra senāntamāśritya bhītastiṣṭhati pāṇḍavāt | gupto rathavaraśreṣṭhairdrauṇikarṇakṛpādibhiḥ
जो सेना के पिछले छोर का आश्रय लेकर पाण्डव के भय से खड़ा है, और द्रोण-पुत्र, कर्ण, कृप आदि श्रेष्ठ रथियों से रक्षित है।
श्लोक 13 (7.112.13)
इतस्त्रियोजनं मन्ये तमध्वानं विशाम्पते । यत्र तिष्ठति पार्थोऽसौ जयद्रथवधोद्यतः ॥
itastriyojanaṃ manye tamadhvānaṃ viśāmpate | yatra tiṣṭhati pārtho'sau jayadrathavadhodyataḥ
हे विशाम्पते, मैं समझता हूँ कि वह मार्ग यहाँ से तीन योजन है, जहाँ जयद्रथ के वध में तत्पर वे पार्थ खड़े हैं।
श्लोक 14 (7.112.14)
त्रियोजनगतस्यापि तस्य यास्याम्यहं पदम् । आसैन्धववधाद्राजन्सुदृढेनान्तरात्मना ॥
triyojanagatasyāpi tasya yāsyāmyahaṃ padam | āsaindhavavadhādrājansudṛḍhenāntarātmanā
हे राजन्, वे तीन योजन आगे भी निकल गए हों, तो भी मैं दृढ़ निश्चय के साथ सैन्धव के वध तक उनके पीछे जाऊँगा।
श्लोक 15 (7.112.15)
अनादिष्टस्तु गुरुणा को नु युध्येत मानवः । आदिष्टस्तु यथा राजन्को न युध्येत मादृशः ॥
anādiṣṭastu guruṇā ko nu yudhyeta mānavaḥ | ādiṣṭastu yathā rājanko na yudhyeta mādṛśaḥ
गुरु की आज्ञा के बिना भी कौन मनुष्य लड़ेगा? और हे राजन्, आपकी आज्ञा पाकर मुझ जैसा कौन न लड़ेगा?
श्लोक 16 (7.112.16)
अभिजानामि तं देशमितः पूर्णं त्रियोजनम् । यत्र तिष्ठति राजाऽसौ सैन्धवो बालघातकः ॥
abhijānāmi taṃ deśamitaḥ pūrṇaṃ triyojanam | yatra tiṣṭhati rājā'sau saindhavo bālaghātakaḥ
मैं उस स्थान को जानता हूँ, जो यहाँ से पूरे तीन योजन पर है, जहाँ बालक का घातक राजा सैन्धव खड़ा है।
श्लोक 17 (7.112.17)
सागरप्रतिमं सैन्यं गर्जन्तमिव सागरम् । हलशक्तिगदाप्रासचर्मखड्गर्ष्टितोमरम् । इष्वस्त्रवरसम्बाधं क्षोभयित्वा व्रजाम्यहम् ॥
sāgarapratimaṃ sainyaṃ garjantamiva sāgaram | halaśaktigadāprāsacarmakhaḍgarṣṭitomaram | iṣvastravarasambādhaṃ kṣobhayitvā vrajāmyaham
समुद्र के समान, गरजते सागर जैसी उस सेना को — जो हल, शक्ति, गदा, प्रास, ढाल, तलवार, ऋष्टि और तोमरों से तथा उत्तम बाणों और अस्त्रों से भरी है — मथकर मैं आगे जाऊँगा।
श्लोक 18 (7.112.18)
यदेतत्कुञ्जरानीकं सहस्रमनुपश्यसि । कुलमाञ्जनकं नाम यत्रैते वीर्यशालिनः ॥
yadetatkuñjarānīkaṃ sahasramanupaśyasi | kulamāñjanakaṃ nāma yatraite vīryaśālinaḥ
यह जो हज़ार हाथियों की टुकड़ी आप देख रहे हैं, जिसका नाम अञ्जन-कुल है, जिसमें ये पराक्रमी हाथी हैं,
श्लोक 19 (7.112.19)
आस्थिता बहुभिर्म्लेच्छैर्युद्धशौण्डैः प्रहारिभिः । नागा नगनिभा राजन्क्षरन्त इव तोयदाः ॥
āsthitā bahubhirmlecchairyuddhaśauṇḍaiḥ prahāribhiḥ | nāgā naganibhā rājankṣaranta iva toyadāḥ
जिन पर बहुत-से युद्ध-मदमत्त, प्रहार करने में कुशल म्लेच्छ सवार हैं — हे राजन्, पर्वत जैसे ये हाथी मद बहाते हुए बादलों जैसे हैं।
श्लोक 20 (7.112.20)
नैते जातु निवर्तेरन्प्रेषिता हस्तिसादिभिः । अन्यत्र हि वधादेषां नास्ति राजन्पराजयः ॥
naite jātu nivarteranpreṣitā hastisādibhiḥ | anyatra hi vadhādeṣāṃ nāsti rājanparājayaḥ
हाथीवानों के प्रेरित करने पर ये कभी पीछे नहीं हटते; हे राजन्, इनके मारे जाने के सिवा इनकी पराजय नहीं होती।
श्लोक 21 (7.112.21)
अथ यान्रथिनो राजन्सहस्रमनुपश्यसि । एते रुक्मरथा नाम राजपुत्रा महारथाः ॥
atha yānrathino rājansahasramanupaśyasi | ete rukmarathā nāma rājaputrā mahārathāḥ
और हे राजन्, जो हज़ार रथी आप देखते हैं, ये रुक्मरथ नामक राजकुमार महारथी हैं।
श्लोक 22 (7.112.22)
रथेष्वस्त्रेषु निपुणा नागेषु च विशाम्पते । धनुर्वेदे गताः पारं मुष्टियुद्धे च कोविदाः ॥
ratheṣvastreṣu nipuṇā nāgeṣu ca viśāmpate | dhanurvede gatāḥ pāraṃ muṣṭiyuddhe ca kovidāḥ
हे विशाम्पते, ये रथों, अस्त्रों और हाथियों के संचालन में निपुण हैं, धनुर्वेद में पारंगत हैं और मुष्टियुद्ध में कुशल हैं;
श्लोक 23 (7.112.23)
गदायुद्धविशेषज्ञा नियुद्धकुशलास्तथा । खड्गप्रहरणे युक्ताः सम्पाते चासिचर्मणोः ॥
gadāyuddhaviśeṣajñā niyuddhakuśalāstathā | khaḍgapraharaṇe yuktāḥ sampāte cāsicarmaṇoḥ
गदायुद्ध की बारीकियाँ जानते हैं, मल्लयुद्ध में दक्ष हैं, तलवार के प्रहार में लगे रहने वाले हैं और असि-चर्म (तलवार-ढाल) के मेल में निपुण हैं।
श्लोक 24 (7.112.24)
शूराश्च कृतविद्याश्च स्पर्धन्ते च परस्परम् । नित्यं हि समरे राजन्विजिगीषन्ति मानवान् ॥
śūrāśca kṛtavidyāśca spardhante ca parasparam | nityaṃ hi samare rājanvijigīṣanti mānavān
ये शूर और शिक्षित हैं और आपस में होड़ करते हैं; हे राजन्, ये सदा युद्ध में मनुष्यों को जीतना चाहते हैं।
श्लोक 25 (7.112.25)
कर्णेन विहिता राजन्दुःशासनमनुव्रताः । एतांस्तु वासुदेवोऽपि रथोदारान्प्रशंसति ॥
karṇena vihitā rājanduḥśāsanamanuvratāḥ | etāṃstu vāsudevo'pi rathodārānpraśaṃsati
हे राजन्, ये कर्ण द्वारा नियुक्त हैं और दुःशासन के अनुयायी हैं; इन श्रेष्ठ रथियों की प्रशंसा वासुदेव भी करते हैं।
श्लोक 26 (7.112.26)
सततं प्रियकामाश्च कर्णस्यैते वशे स्थिताः । तस्यैव वचनाद्राजन्निवृत्ताः श्वेतवाहनात् ॥
satataṃ priyakāmāśca karṇasyaite vaśe sthitāḥ | tasyaiva vacanādrājannivṛttāḥ śvetavāhanāt
ये सदा कर्ण का प्रिय करने वाले हैं और उसी के वश में रहते हैं; हे राजन्, उसी के कहने पर ये श्वेतवाहन (अर्जुन) से पीछे हट गए थे।
श्लोक 27 (7.112.27)
ते न क्लान्ता न च श्रान्ता दृढावरणकार्मुकाः । मदर्थेऽधिष्ठिता नूनं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ॥
te na klāntā na ca śrāntā dṛḍhāvaraṇakārmukāḥ | madarthe'dhiṣṭhitā nūnaṃ dhārtarāṣṭrasya śāsanāt
ये न थके हैं, न क्लान्त; दृढ़ कवच और धनुष वाले ये धृतराष्ट्र-पुत्र की आज्ञा से निश्चय ही मेरे लिए ही यहाँ डटे हैं।
श्लोक 28 (7.112.28)
एतान्प्रमथ्य सङ्ग्रामे प्रियार्थं तव कौरव । प्रयास्यामि ततः पश्चात्पदवीं सव्यसाचिनः ॥
etānpramathya saṅgrāme priyārthaṃ tava kaurava | prayāsyāmi tataḥ paścātpadavīṃ savyasācinaḥ
हे कौरव, आपके प्रिय के लिए इन्हें युद्ध में कुचलकर मैं उसके बाद सव्यसाची के मार्ग पर जाऊँगा।
श्लोक 29 (7.112.29)
यांस्त्वेतानपरान्राजन्नागान्सप्तशतानिमान् । प्रेक्षसे वर्मसञ्छन्नान्किरातैः समधिष्ठितान् ॥
yāṃstvetānaparānrājannāgānsaptaśatānimān | prekṣase varmasañchannānkirātaiḥ samadhiṣṭhitān
हे राजन्, और जो ये अन्य सात सौ हाथी आप देखते हैं, जो कवचों से ढके हैं और जिन पर किरात सवार हैं,
श्लोक 30 (7.112.30)
किरातराजो यान्प्रादाद्गृहीतः सव्यसाचिना । स्वलङ्कृतांस्तदा प्रेष्यानिच्छञ्जीवितमात्मनः ॥
kirātarājo yānprādādgṛhītaḥ savyasācinā | svalaṅkṛtāṃstadā preṣyānicchañjīvitamātmanaḥ
जिन्हें किरातों के राजा ने, सव्यसाची के हाथों पकड़े जाने पर, अपने प्राण बचाने की इच्छा से, भली-भाँति सजाकर सेवकों के रूप में तब दिया था —
श्लोक 31 (7.112.31)
आसन्नेते पुरा राजंस्तव कर्मकरा दृढम् । त्वामेवाद्य युयुत्सन्ते पश्य कालस्य पर्ययम् ॥
āsannete purā rājaṃstava karmakarā dṛḍham | tvāmevādya yuyutsante paśya kālasya paryayam
हे राजन्, ये पहले निश्चय ही आपके सेवक थे, और आज आप ही से लड़ना चाहते हैं; समय का यह फेर देखिए।
श्लोक 32 (7.112.32)
एषामेते महामात्राः किराता युद्धदुर्मदाः । हस्तिशिक्षाविदश्चैव सर्वे चैवाग्नियोनयः ॥
eṣāmete mahāmātrāḥ kirātā yuddhadurmadāḥ | hastiśikṣāvidaścaiva sarve caivāgniyonayaḥ
इनके ये प्रधान महावत किरात हैं, जो युद्ध में उन्मत्त, हाथियों की शिक्षा के जानकार और सब अग्नि से उत्पन्न हैं।
श्लोक 33 (7.112.33)
एते विनिर्जिताः सङ्ख्ये सङ्ग्रामे सव्यसाचिना । मदर्थमद्य संयत्ता दुर्योधनवशानुगाः ॥
ete vinirjitāḥ saṅkhye saṅgrāme savyasācinā | madarthamadya saṃyattā duryodhanavaśānugāḥ
सव्यसाची ने युद्ध में इन्हें जीत लिया था; अब ये दुर्योधन के वश में रहकर मेरे लिए ही आज डटे हैं।
श्लोक 34 (7.112.34)
एतान्हत्वा शरै राजन्किरातान्युद्धदुर्मदान् । सैन्धवस्य वधे यत्तमनुयास्यामि पाण्डवम् ॥
etānhatvā śarai rājankirātānyuddhadurmadān | saindhavasya vadhe yattamanuyāsyāmi pāṇḍavam
हे राजन्, युद्ध में उन्मत्त इन किरातों को बाणों से मारकर, मैं सैन्धव के वध में लगे पाण्डव के पीछे जाऊँगा।
श्लोक 35 (7.112.35)
ये त्वेते सुमहानागा अञ्जनस्य कुलोद्भवाः । कर्कशाश्च विनीताश्च प्रभिन्नकरटामुखाः ॥
ye tvete sumahānāgā añjanasya kulodbhavāḥ | karkaśāśca vinītāśca prabhinnakaraṭāmukhāḥ
और जो ये बड़े-बड़े हाथी अञ्जन (वरुण के वाहन) के वंश में उत्पन्न हैं, कठोर, सधे हुए, जिनके कनपटी के मद बह रहे हैं,
श्लोक 36 (7.112.36)
जाम्बूनदमयैः सर्वैर्वर्मभिः सुविभूषिताः । लब्धलक्ष्या रणे राजन्नैरावणसमा युधि ॥
jāmbūnadamayaiḥ sarvairvarmabhiḥ suvibhūṣitāḥ | labdhalakṣyā raṇe rājannairāvaṇasamā yudhi
जो सब-के-सब सोने के कवचों से सजे हैं, जो निशाना साधने में सिद्ध हैं और युद्ध में ऐरावत के समान हैं,
श्लोक 37 (7.112.37)
आस्थिता दस्युभिस्तीक्ष्णैः शूरैरुत्तमपार्वतैः । कर्कशैः प्रवरैर्योधैः कार्ष्णायसतनुच्छदैः ॥
āsthitā dasyubhistīkṣṇaiḥ śūrairuttamapārvataiḥ | karkaśaiḥ pravarairyodhaiḥ kārṣṇāyasatanucchadaiḥ
उन पर तीखे दस्यु सवार हैं — उत्तम पर्वतीय वीर, कठोर, श्रेष्ठ योद्धा, काले लोहे के कवच पहने हुए।
श्लोक 38 (7.112.38)
सन्ति गोयोनयश्चात्र सन्ति वानरयोनयः । अनेकयोनयश्चान्ये तथा मानुषयोनयः ॥
santi goyonayaścātra santi vānarayonayaḥ | anekayonayaścānye tathā mānuṣayonayaḥ
यहाँ गाय से उत्पन्न (गोयोनि) और वानर से उत्पन्न भी हैं, और अनेक अन्य योनियों के तथा मनुष्य-योनि वाले भी हैं।
श्लोक 39 (7.112.39)
अनीकमसतामेतद्धूम्रवर्णमुदीर्यते । म्लेच्छानां पापकर्तॄणां हिमदुर्गनिवासिनाम् ॥
anīkamasatāmetaddhūmravarṇamudīryate | mlecchānāṃ pāpakartṝṇāṃ himadurganivāsinām
यह दुष्टों की, पापकर्म करने वाले, हिम के दुर्गों में रहने वाले म्लेच्छों की धूम्र-वर्ण (धुएँ के रंग की) सेना कही जाती है।
श्लोक 40 (7.112.40)
एतद्दुर्योधनो लब्ध्वा समग्रं राजमण्डलम् । कृपं च सौमदत्तिं च द्रोणं च रथिनां वरम् ॥
etadduryodhano labdhvā samagraṃ rājamaṇḍalam | kṛpaṃ ca saumadattiṃ ca droṇaṃ ca rathināṃ varam
दुर्योधन ने इस (सेना) को पाकर, राजाओं के सम्पूर्ण मण्डल को, कृप को, सोमदत्त के पुत्र को और रथियों में श्रेष्ठ द्रोण को पाकर,
श्लोक 41 (7.112.41)
सिन्धुराजं तथा कर्णमवमन्यत पाण्डवान् । कृतार्थमथ चात्मानं मन्यते कालचोदितः ॥
sindhurājaṃ tathā karṇamavamanyata pāṇḍavān | kṛtārthamatha cātmānaṃ manyate kālacoditaḥ
तथा सिन्धुराज और कर्ण को पाकर पाण्डवों को तुच्छ समझा; और काल से प्रेरित होकर वह अपने को कृतार्थ मानता है।
श्लोक 42 (7.112.42)
ते तु सर्वेऽद्य सम्प्राप्ता मम नाराचगोचरम् । न भविष्यन्ति कौन्तेय यद्यपि स्युर्मनोजवाः ॥
te tu sarve'dya samprāptā mama nārācagocaram | na bhaviṣyanti kaunteya yadyapi syurmanojavāḥ
हे कौन्तेय, वे सब आज मेरे नाराचों की पहुँच में आ गए हैं; यदि वे मन के समान वेगवान भी हों, तो भी वे जीवित न रहेंगे।
श्लोक 43 (7.112.43)
तेन संभाविता नित्यं परवीर्योपजीविना । विनाशमुपयास्यन्ति मच्छरौघनिपीडिताः ॥
tena saṃbhāvitā nityaṃ paravīryopajīvinā | vināśamupayāsyanti maccharaughanipīḍitāḥ
उसके द्वारा सदा सम्मानित और दूसरों के पराक्रम पर जीने वाले ये सब मेरे बाणों की बौछार से पीड़ित होकर विनाश को प्राप्त होंगे।
श्लोक 44 (7.112.44)
ये त्वेते रथिनो राजन्दृश्यन्ते काञ्चनध्वजाः । एते दुर्वारणा नाम काम्भोजा यदि ते श्रुताः ॥
ye tvete rathino rājandṛśyante kāñcanadhvajāḥ | ete durvāraṇā nāma kāmbhojā yadi te śrutāḥ
हे राजन्, जो ये सोने की ध्वजाओं वाले रथी दिखाई देते हैं, ये दुर्वारण नामक काम्भोज हैं, यदि आपने उनके विषय में सुना हो।
श्लोक 45 (7.112.45)
शूराश्च कृतविद्याश्च धनुर्वेदे च निष्ठिताः । संहताश्च भृशं ह्येते अन्योन्यस्य हितैषिणः ॥
śūrāśca kṛtavidyāśca dhanurvede ca niṣṭhitāḥ | saṃhatāśca bhṛśaṃ hyete anyonyasya hitaiṣiṇaḥ
ये शूर, शिक्षित और धनुर्वेद में निपुण हैं, और परस्पर अत्यन्त संगठित तथा एक-दूसरे के हितैषी हैं।
श्लोक 46 (7.112.46)
अक्षौहिण्यश्च संरब्धा धार्तराष्ट्रस्य भारत । यत्ता मदर्थे तिष्ठन्ति कुरुवीराभिरक्षिताः ॥
akṣauhiṇyaśca saṃrabdhā dhārtarāṣṭrasya bhārata | yattā madarthe tiṣṭhanti kuruvīrābhirakṣitāḥ
हे भारत, धृतराष्ट्र-पुत्र की क्रोध से भरी अक्षौहिणियाँ, कुरुवीरों से रक्षित होकर, मेरे ही लिए डटी हुई हैं।
श्लोक 47 (7.112.47)
अप्रमत्ता महाराज मामेव प्रत्युपस्थिताः । तानहं प्रमथिष्यामि तृणानीव हुताशनः ॥
apramattā mahārāja māmeva pratyupasthitāḥ | tānahaṃ pramathiṣyāmi tṛṇānīva hutāśanaḥ
हे महाराज, सावधान होकर वे मेरे ही सामने आ खड़ी हुई हैं; मैं उन्हें वैसे ही कुचल दूँगा जैसे आग तिनकों को।
श्लोक 48 (7.112.48)
तस्मात्सर्वानुपासङ्गान्सर्वोपकरणानि च । रथे कुर्वन्तु मे राजन्यथावद्रथकल्पकाः ॥
tasmātsarvānupāsaṅgānsarvopakaraṇāni ca | rathe kurvantu me rājanyathāvadrathakalpakāḥ
इसलिए हे राजन्, रथ तैयार करने वाले मेरे रथ में सब तूणीर और सब साधन विधिपूर्वक रख दें।
श्लोक 49 (7.112.49)
अस्मिंस्तु किल सम्मर्दे ग्राह्यं विविधमायुधम् । यथोपदिष्टमाचार्यैः कार्यः पञ्चगुणो रथः ॥
asmiṃstu kila sammarde grāhyaṃ vividhamāyudham | yathopadiṣṭamācāryaiḥ kāryaḥ pañcaguṇo rathaḥ
इस भीषण युद्ध में अनेक प्रकार के आयुध ले जाने होंगे; आचार्यों के उपदेश के अनुसार रथ को पाँच गुना सामग्री से सज्जित करना चाहिए।
श्लोक 50 (7.112.50)
काम्भोजैर्हि समेष्यामि तीक्ष्णैराशीविषोपमैः । नानाशस्त्रसमावायैर्विविधायुधयोधिभिः ॥
kāmbhojairhi sameṣyāmi tīkṣṇairāśīviṣopamaiḥ | nānāśastrasamāvāyairvividhāyudhayodhibhiḥ
मैं तीखे, विषैले सर्पों जैसे काम्भोजों से भिड़ूँगा, जो अनेक प्रकार के शस्त्रों के समूहों और भाँति-भाँति के आयुध वाले योद्धाओं से युक्त हैं।
श्लोक 51 (7.112.51)
किरातैश्च समेष्यामि विषकल्पैः प्रहारिभिः । लालितैः सततं राज्ञा दुर्योधनहितैषिभिः ॥
kirātaiśca sameṣyāmi viṣakalpaiḥ prahāribhiḥ | lālitaiḥ satataṃ rājñā duryodhanahitaiṣibhiḥ
मैं किरातों से भी भिड़ूँगा, जो विष के समान घातक प्रहार करने वाले हैं, जिन्हें राजा ने सदा लाड़-प्यार से रखा है और जो दुर्योधन के हितैषी हैं।
श्लोक 52 (7.112.52)
शकैश्चापि समेष्यामि शक्रतुल्यपराक्रमैः । अग्निकल्पैर्दुराधर्षैः प्रदीप्तैरिव पावकैः ॥
śakaiścāpi sameṣyāmi śakratulyaparākramaiḥ | agnikalpairdurādharṣaiḥ pradīptairiva pāvakaiḥ
मैं शकों से भी भिड़ूँगा, जो इन्द्र के समान पराक्रमी, अग्नि के तुल्य, दुर्धर्ष और जलती ज्वालाओं जैसे प्रदीप्त हैं।
श्लोक 53 (7.112.53)
तथाऽन्यैर्विविधैर्योधैः कालकल्पैर्दुरासदैः । समेष्यामि रणे राजन्बहुभिर्युद्धदुर्मदैः ॥
tathā'nyairvividhairyodhaiḥ kālakalpairdurāsadaiḥ | sameṣyāmi raṇe rājanbahubhiryuddhadurmadaiḥ
और हे राजन्, मैं युद्ध में अन्य अनेक प्रकार के योद्धाओं से भिड़ूँगा, जो काल के समान, दुर्जेय और युद्ध-मदमत्त हैं।
श्लोक 54 (7.112.54)
त्रियोजनगतस्यापि पदवीं सव्यसाचिनः । यास्यामि रथिनां श्रेष्ठं प्रवरं च धनुष्मताम् ॥
triyojanagatasyāpi padavīṃ savyasācinaḥ | yāsyāmi rathināṃ śreṣṭhaṃ pravaraṃ ca dhanuṣmatām
तीन योजन आगे निकल गए हों, तब भी मैं सव्यसाची के मार्ग पर चलूँगा, जो रथियों में श्रेष्ठ और धनुर्धरों में उत्तम हैं।
श्लोक 55 (7.112.55)
सूर्योदयगतस्याहं पाण्डवस्य गतिं चरन् । अपराह्णगते सूर्ये गमिष्यामि न संशयः ॥
sūryodayagatasyāhaṃ pāṇḍavasya gatiṃ caran | aparāhṇagate sūrye gamiṣyāmi na saṃśayaḥ
सूर्योदय के समय गए हुए पाण्डव की गति का अनुसरण करते हुए मैं अपराह्न में सूर्य के ढलते-ढलते उनके पास पहुँच जाऊँगा, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 56 (7.112.56)
तस्माद्वै वाजिनो मुख्यान्विश्रुताञ्शुभलक्षणैः । उपावृत्तांश्च पीतांश्च पुनर्युञ्जन्तु मे रथे ॥
tasmādvai vājino mukhyānviśrutāñśubhalakṣaṇaiḥ | upāvṛttāṃśca pītāṃśca punaryuñjantu me rathe
इसलिए प्रसिद्ध, शुभ लक्षणों वाले मुख्य घोड़ों को, जो लोट चुके हैं और पानी पी चुके हैं, फिर मेरे रथ में जोत दो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 57 (7.112.57)
तस्य सर्वानुपासङ्गान्सर्वोपकरणानि च । रथे चास्थापयद्राजा शस्त्राणि विविधानि च ॥
tasya sarvānupāsaṅgānsarvopakaraṇāni ca | rathe cāsthāpayadrājā śastrāṇi vividhāni ca
राजा (युधिष्ठिर) ने उनके सब तूणीर, सब साधन और अनेक प्रकार के शस्त्र रथ में रखवा दिए।
श्लोक 58 (7.112.58)
ततस्तान्सर्वतोमुक्तान्सदश्वांश्चतुरो जनाः । रसवत्पाययामासुः पानं मदसमीरणम् ॥
tatastānsarvatomuktānsadaśvāṃścaturo janāḥ | rasavatpāyayāmāsuḥ pānaṃ madasamīraṇam
तब लोगों ने उन चारों उत्तम घोड़ों को सब ओर से खोलकर उन्हें स्वादिष्ट, उमंग जगाने वाला पेय पिलाया।
श्लोक 59 (7.112.59)
पीतोपवृत्तान्स्नातांश्च जग्धान्नान्समलङ्कृतान् । विनीतशल्यांस्तुरगांश्चतुरो हेममालिनः ॥
pītopavṛttānsnātāṃśca jagdhānnānsamalaṅkṛtān | vinītaśalyāṃsturagāṃścaturo hemamālinaḥ
पानी पीकर, लोट-पोटकर, नहाकर, चारा खाकर और सजकर, तीर-काँटे निकाले हुए, सोने की मालाएँ पहने वे चारों घोड़े —
श्लोक 60 (7.112.60)
तान्युक्तान्रुक्मवर्णाभान्विनीताञ्शीघ्रगामिनः । संहृष्टमनसोऽव्यग्रान्विधिवत्कल्पितान्रथे ॥
tānyuktānrukmavarṇābhānvinītāñśīghragāminaḥ | saṃhṛṣṭamanaso'vyagrānvidhivatkalpitānrathe
सोने के रंग की आभा वाले, सधे हुए, शीघ्रगामी, प्रसन्न-चित्त और शान्त, रथ में विधिवत् जुते हुए उन घोड़ों को —
श्लोक 61 (7.112.61)
महाध्वजेन सिंहेन हेमकेसरमालिना । संवृते केतकैर्हैमैर्मणिविद्रुमचित्रितैः ॥
mahādhvajena siṃhena hemakesaramālinā | saṃvṛte ketakairhaimairmaṇividrumacitritaiḥ
सोने की अयाल और माला वाले सिंह के चिह्न की विशाल ध्वजा से ढके, मणियों और मूँगों से जड़े सोने के केतकों से युक्त,
श्लोक 62 (7.112.62)
पाण्डुराभ्रप्रकाशाभिः पताकाभिरलङ्कृते । हेमदण्डोच्छ्रितच्छत्रे बहुशस्त्रपरिच्छदे । योजयामास विधिवद्धेमभाण्डविभूषितान् ॥
pāṇḍurābhraprakāśābhiḥ patākābhiralaṅkṛte | hemadaṇḍocchritacchatre bahuśastraparicchade | yojayāmāsa vidhivaddhemabhāṇḍavibhūṣitān
सफ़ेद बादलों जैसी चमकने वाली पताकाओं से सजे, सोने की डण्डी पर ऊँचा छत्र लगाए और बहुत-से शस्त्रों की सामग्री से भरे रथ में, सोने के साज से सजे उन घोड़ों को विधिपूर्वक जोत दिया।
श्लोक 63 (7.112.63)
दारुकस्यानुजो भ्राता सूतस्तस्य प्रियः सखा । न्यवेदयद्रथं युक्तं वासवस्येव मातलिः ॥
dārukasyānujo bhrātā sūtastasya priyaḥ sakhā | nyavedayadrathaṃ yuktaṃ vāsavasyeva mātaliḥ
दारुक के छोटे भाई ने, जो उनके सारथि और प्रिय मित्र थे, जैसे इन्द्र को मातलि, वैसे ही रथ के तैयार होने की सूचना दी।
श्लोक 64 (7.112.64)
ततः स्नातः शुचिर्भूत्वा कृतकौतुकमङ्गलः । स्नातकानां सहस्रस्य स्वर्णनिष्कानथो ददौ ॥
tataḥ snātaḥ śucirbhūtvā kṛtakautukamaṅgalaḥ | snātakānāṃ sahasrasya svarṇaniṣkānatho dadau
तब स्नान कर, शुद्ध होकर, कौतुक-मंगल कर्म पूरे करके उसने हज़ार स्नातक ब्राह्मणों को सोने के निष्क दिए।
श्लोक 65 (7.112.65)
आशीर्वादैः परिष्वक्तः सात्यकिः श्रीमतां वरः । ततः समधुपर्काम्भः पीत्वा कैरातकं मधु ॥
āśīrvādaiḥ pariṣvaktaḥ sātyakiḥ śrīmatāṃ varaḥ | tataḥ samadhuparkāmbhaḥ pītvā kairātakaṃ madhu
आशीर्वादों से आलिङ्गित होकर श्रीमानों में श्रेष्ठ सात्यकि ने फिर मधुपर्क-जल और किरात-देश का मधु पिया।
श्लोक 66 (7.112.66)
लोहिताक्षो बभौ तत्र मदविह्वललोचनः । आलभ्य वीरकांस्यं च हर्षेण महताऽन्वितः ॥
lohitākṣo babhau tatra madavihvalalocanaḥ | ālabhya vīrakāṃsyaṃ ca harṣeṇa mahatā'nvitaḥ
वहाँ उनकी आँखें लाल हो गईं; मद से विह्वल नेत्रों वाले वे अत्यन्त हर्ष के साथ वीरों के काँसे-पात्र को छूकर शोभित हुए।
श्लोक 67 (7.112.67)
द्विगुणीकृततेजोभिः प्रज्वलन्निव पावकः । उत्सङ्गे धनुरादाय सशरं रथिनां वरः ॥
dviguṇīkṛtatejobhiḥ prajvalanniva pāvakaḥ | utsaṅge dhanurādāya saśaraṃ rathināṃ varaḥ
उनका तेज दुगुना हो गया था, वे प्रज्वलित अग्नि जैसे दिख रहे थे; रथियों में श्रेष्ठ उन्होंने गोद में बाण सहित धनुष ले लिया।
श्लोक 68 (7.112.68)
आशीर्वादैः परिष्वक्तः सात्यकिः श्रीमतां वरः । कृतस्वस्त्ययनो विप्रैः कवची समलङ्कृतः ॥
āśīrvādaiḥ pariṣvaktaḥ sātyakiḥ śrīmatāṃ varaḥ | kṛtasvastyayano vipraiḥ kavacī samalaṅkṛtaḥ
आशीर्वादों से आलिङ्गित, श्रीमानों में श्रेष्ठ सात्यकि ने ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया और कवच पहनकर सजकर —
श्लोक 69 (7.112.69)
लाजैर्गन्धैस्तथा माल्यैः कन्याभिश्चाभिनन्दितः । युधिष्ठिरस्य चरणावभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥
lājairgandhaistathā mālyaiḥ kanyābhiścābhinanditaḥ | yudhiṣṭhirasya caraṇāvabhivādya kṛtāñjaliḥ
लाजा, गन्ध, मालाओं और कन्याओं से अभिनन्दित होकर, हाथ जोड़कर युधिष्ठिर के चरणों में प्रणाम किया;
श्लोक 70 (7.112.70)
तेन मूर्धन्युपाघ्रातः कृतस्वस्त्ययनोऽपि च । आशिषो विविधाः श्रुत्वा धर्मराजमुखेरिताः । हर्षेण महता युक्त आरुरोह महारथम् ॥
tena mūrdhanyupāghrātaḥ kṛtasvastyayano'pi ca | āśiṣo vividhāḥ śrutvā dharmarājamukheritāḥ | harṣeṇa mahatā yukta āruroha mahāratham
उन्होंने उनका सिर सूँघा; धर्मराज के मुख से निकले अनेक आशीर्वाद सुनकर, बड़े हर्ष से भरकर वे उस महारथ पर चढ़ गए।
श्लोक 71 (7.112.71)
ततस्ते वाजिनो हृष्टाः सुपुष्टा वातरंहसः । अजय्या जैत्रमूहुस्तं विकुर्वाणाः स्म सैन्धवाः । यथा शक्ररथं राजन्नूहुस्ते हरयः पुरा ॥
tataste vājino hṛṣṭāḥ supuṣṭā vātaraṃhasaḥ | ajayyā jaitramūhustaṃ vikurvāṇāḥ sma saindhavāḥ | yathā śakrarathaṃ rājannūhuste harayaḥ purā
तब वे प्रसन्न, पुष्ट, वायु-वेग वाले, अजेय सैन्धव घोड़े उस विजयी रथ को खींच ले चले, मानो पूर्वकाल में इन्द्र के हरे घोड़ों ने शक्र का रथ खींचा था, हे राजन्।
श्लोक 72 (7.112.72)
तथैव भीमसेनोऽपि धर्मराजेन पूजितः । प्रायात्सात्यकिना सार्धमभिवाद्य युधिष्ठिरम् ॥
tathaiva bhīmaseno'pi dharmarājena pūjitaḥ | prāyātsātyakinā sārdhamabhivādya yudhiṣṭhiram
इसी प्रकार धर्मराज से सम्मानित भीमसेन भी युधिष्ठिर को प्रणाम करके सात्यकि के साथ चल पड़े।
श्लोक 73 (7.112.73)
तौ दृष्ट्वा प्रविविक्षन्तौ तव सेनामरिंदमौ । संयत्तास्तावकाः सर्वे तस्थुर्द्रोणपुरोगमाः ॥
tau dṛṣṭvā pravivikṣantau tava senāmariṃdamau | saṃyattāstāvakāḥ sarve tasthurdroṇapurogamāḥ
शत्रुओं का दमन करने वाले उन दोनों को आपकी सेना में घुसना चाहते देखकर द्रोण के नेतृत्व में आपके सब योद्धा तैयार होकर डट गए।
श्लोक 74 (7.112.74)
सन्नद्धमनुगच्छन्तं दृष्ट्वा भीमं स सात्यकिः । अभिनन्द्याब्रवीद्वीरस्तदा हर्षकरं वचः ॥
sannaddhamanugacchantaṃ dṛṣṭvā bhīmaṃ sa sātyakiḥ | abhinandyābravīdvīrastadā harṣakaraṃ vacaḥ
कवचधारी भीम को पीछे आते देखकर वीर सात्यकि ने उनका अभिनन्दन किया और तब आनन्द देने वाली यह बात कही।
सात्यकिरुवाच
श्लोक 75 (7.112.75)
त्वं भीम रक्ष राजानमेतत्कार्यतमं हि ते । अहं भित्त्वा प्रवेक्ष्यामि कालपक्वमिदं बलम् ॥
tvaṃ bhīma rakṣa rājānametatkāryatamaṃ hi te | ahaṃ bhittvā pravekṣyāmi kālapakvamidaṃ balam
हे भीम, तुम राजा की रक्षा करो, यही तुम्हारा सबसे आवश्यक कार्य है। मैं काल से पकी हुई इस सेना को भेदकर भीतर घुसूँगा।
श्लोक 76 (7.112.76)
आयत्यां च तदात्वे च श्रेयो राज्ञोऽभिरक्षणम् । जानीषे मम वीर्यं त्वं तव चाहमरिन्दम । तस्माद्भीम निवर्तस्व मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥
āyatyāṃ ca tadātve ca śreyo rājño'bhirakṣaṇam | jānīṣe mama vīryaṃ tvaṃ tava cāhamarindama | tasmādbhīma nivartasva mama cedicchasi priyam
भविष्य में भी और वर्तमान में भी राजा की रक्षा ही श्रेयस्कर है। हे अरिन्दम, तुम मेरा बल जानते हो और मैं तुम्हारा। इसलिए हे भीम, यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो लौट जाओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 77 (7.112.77)
तथोक्तः सात्यकिं प्राह व्रज त्वं कार्यसिद्धये । अहं राज्ञः करिष्यामि रक्षां पुरुषसत्तम ॥
tathoktaḥ sātyakiṃ prāha vraja tvaṃ kāryasiddhaye | ahaṃ rājñaḥ kariṣyāmi rakṣāṃ puruṣasattama
यह सुनकर भीम ने सात्यकि से कहा: "अपना कार्य सिद्ध करने के लिए जाओ; हे पुरुषोत्तम, राजा की रक्षा मैं करूँगा।"
श्लोक 78 (7.112.78)
एवमुक्तः प्रत्युवाच भीमसेनं स माधवः । गच्छ गच्छ ध्रुवं पार्थ ध्रुवो हि विजयो मम ॥
evamuktaḥ pratyuvāca bhīmasenaṃ sa mādhavaḥ | gaccha gaccha dhruvaṃ pārtha dhruvo hi vijayo mama
यह सुनकर माधव ने भीमसेन को उत्तर दिया: "जाओ, जाओ पार्थ, निश्चय ही जाओ; मेरी विजय निश्चित है।
सात्यकिरुवाच
श्लोक 79 (7.112.79)
यन्मे स्निग्धोऽनुरक्तश्च त्वमद्य वशमास्थितः । निमित्तानि च धन्यानि यथा भीम वदन्ति मां ॥
yanme snigdho'nuraktaśca tvamadya vaśamāsthitaḥ | nimittāni ca dhanyāni yathā bhīma vadanti māṃ
क्योंकि तुम स्नेही और अनुरक्त होकर आज मेरी बात मान गए हो, और हे भीम, शुभ शकुन भी मुझसे वैसा ही कह रहे हैं —
श्लोक 80 (7.112.80)
निहते सैन्धवे पापे पाण्डवेन महात्मना । परिष्वजिष्ये राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । अप्रमादश्च ते कार्यो द्रोणं प्रति महारथम् ॥
nihate saindhave pāpe pāṇḍavena mahātmanā | pariṣvajiṣye rājānaṃ dharmātmānaṃ yudhiṣṭhiram | apramādaśca te kāryo droṇaṃ prati mahāratham
जब दुष्ट सैन्धव महात्मा पाण्डव के हाथों मारा जाएगा, तब मैं धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर को गले लगाऊँगा। और तुम्हें महारथी द्रोण के प्रति असावधान नहीं होना चाहिए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 81 (7.112.81)
एतावदुक्त्वा भीमं तु विसृज्य च महायशाः । सम्प्रैक्षत्तावकं सैन्यं व्याघ्रो मृगगणानिव ॥
etāvaduktvā bhīmaṃ tu visṛjya ca mahāyaśāḥ | sampraikṣattāvakaṃ sainyaṃ vyāghro mṛgagaṇāniva
बस इतना कहकर और भीम को विदा करके उन महायशस्वी ने आपकी सेना को वैसे देखा जैसे बाघ मृगों के झुण्ड को देखता है।
श्लोक 82 (7.112.82)
तं दृष्ट्वा प्रविविक्षन्तं सैन्यं तव जनाधिप । भूय एवाभवन्मूढं सुभृशं चाप्यकम्पत ॥
taṃ dṛṣṭvā pravivikṣantaṃ sainyaṃ tava janādhipa | bhūya evābhavanmūḍhaṃ subhṛśaṃ cāpyakampata
हे जनाधिप, उन्हें घुसने को उद्यत देखकर आपकी सेना फिर और भी घबरा गई और बुरी तरह काँप उठी।
श्लोक 83 (7.112.83)
ततः प्रयातः सहसा तव सैन्यं स सात्यकिः । दिदृक्षुरर्जुनं राजन्धर्मराजस्य शासनात् ॥
tataḥ prayātaḥ sahasā tava sainyaṃ sa sātyakiḥ | didṛkṣurarjunaṃ rājandharmarājasya śāsanāt
तब हे राजन्, धर्मराज की आज्ञा से अर्जुन को देखने की इच्छा से सात्यकि सहसा आपकी सेना की ओर बढ़ चले।