द्रोण पर्व · अध्याय 113
सात्यकि का द्रोण को लाँघकर आगे बढ़ना और कृतवर्मा से युद्ध
युयुधान कुरु-सेना में घुसता है, युधिष्ठिर उसके पीछे चलते हैं और पाण्डव योद्धा उसका मार्ग खोलने के लिए ललकारते हैं। सात्यकि कौरव-सैनिकों को बिखेर देता है, पर द्रोण उसका रास्ता रोक लेते हैं; बाणों के आदान-प्रदान के बाद द्रोण उसे अर्जुन के पीछे चलने का ताना देते हैं, और सात्यकि उत्तर देता है कि वह युधिष्ठिर की आज्ञा से जा रहा है, फिर सारथि से अवन्ती, दाक्षिणात्य और बाह्लिक सेनाओं के बीच के अन्तर से रथ ले चलने को कहता है। द्रोण को लाँघकर वह कर्ण की सेना को चीरता है और कृतवर्मा से लड़कर उसके सारथि को मार देता है, फिर काम्बोजों की ओर बढ़ता है, जबकि पाण्डव योद्धा द्रोण को रोके रखते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (7.113.1)
प्रयाते तव सैन्यं तु युयुधाने युयुत्सया । धर्मराजो महाराज स्वेनानीकेन संवृतः । प्रायाद्द्रोणरथं प्रेप्सुर्युयुधानस्य पृष्ठतः ॥
prayāte tava sainyaṃ tu yuyudhāne yuyutsayā | dharmarājo mahārāja svenānīkena saṃvṛtaḥ | prāyāddroṇarathaṃ prepsuryuyudhānasya pṛṣṭhataḥ
हे महाराज! जब युयुधान युद्ध की इच्छा से आपकी सेना की ओर बढ़ा, तब धर्मराज युधिष्ठिर भी अपनी सेना से घिरे हुए, द्रोण के रथ तक पहुँचने की इच्छा से, युयुधान के पीछे-पीछे चल पड़े।
श्लोक 2 (7.113.2)
ततः पाञ्चालराजस्य पुत्रः समरदुर्मदः । प्रयाते माधवे राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥
tataḥ pāñcālarājasya putraḥ samaradurmadaḥ | prayāte mādhave rājannidaṃ vacanamabravīt
हे राजन्! तब पाञ्चाल राजा के रणमद से भरे पुत्र ने, माधव (सात्यकि) के आगे बढ़ते ही, ये वचन कहे; और राजा वसुदान ने भी पाण्डव-सेना में पुकारकर कहा —
श्लोक 3 (7.113.3)
प्राक्रोशत्पाण्डवानीके वसुदानश्च पार्थिवः । आगच्छत प्रहरत द्रुतं विपरिधावत ॥
prākrośatpāṇḍavānīke vasudānaśca pārthivaḥ | āgacchata praharata drutaṃ viparidhāvata
राजा वसुदान ने पाण्डव-सेना में पुकारा — "आओ! प्रहार करो! शीघ्रता से चारों ओर दौड़ पड़ो,
पाञ्चालराजपुत्र उवाच
श्लोक 4 (7.113.4)
यथा सुखेन गच्छेत सात्यकिर्युद्धदुर्मदः । महारथा हि बहवो यतिष्यन्तेऽस्य निर्जये ॥
yathā sukhena gaccheta sātyakiryuddhadurmadaḥ | mahārathā hi bahavo yatiṣyante'sya nirjaye
जिससे युद्ध में दुर्धर्ष सात्यकि सुगमता से आगे जा सके; क्योंकि बहुत-से महारथी उसे जीतने का प्रयत्न करेंगे!"
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (7.113.5)
सेनापतिवचः श्रुत्वा पाण्डवेयाः समन्ततः । अभ्युद्ययुर्महाराज तव सैन्यं समन्ततः ॥
senāpativacaḥ śrutvā pāṇḍaveyāḥ samantataḥ | abhyudyayurmahārāja tava sainyaṃ samantataḥ
हे महाराज! सेनापति के वचन सुनकर पाण्डव चारों ओर से आपकी सेना पर टूट पड़े,
श्लोक 6 (7.113.6)
जहि प्रहर गृह्णीहि विध्य विद्रव चाद्रव । इति ब्रुवन्तो वेगेन निपेतुस्ते महारथाः ॥
jahi prahara gṛhṇīhi vidhya vidrava cādrava | iti bruvanto vegena nipetuste mahārathāḥ
"मारो! प्रहार करो! पकड़ो! बेधो! टूट पड़ो, दौड़ो!" — यों चिल्लाते हुए वे महारथी वेग से जा गिरे।
श्लोक 7 (7.113.7)
वयं प्रतिजिगीषन्तस्तत्र तान्समभिद्रुताः । बाणशङ्खरवान्कृत्वा विमिश्रान्वाद्यनिस्वनैः ॥
vayaṃ pratijigīṣantastatra tānsamabhidrutāḥ | bāṇaśaṅkharavānkṛtvā vimiśrānvādyanisvanaiḥ
उनका सामना करने की इच्छा से हम वहीं उन पर झपट पड़े; आपके योद्धा बाणों और शंखों के नाद को वाद्यों की ध्वनि में मिलाते हुए,
श्लोक 8 (7.113.8)
युयुधानरथं दृष्ट्वा तावका अभिदुद्रुवुः । ततः शब्दो महानासीद्युयुधानरथं प्रति ॥
yuyudhānarathaṃ dṛṣṭvā tāvakā abhidudruvuḥ | tataḥ śabdo mahānāsīdyuyudhānarathaṃ prati
युयुधान का रथ देखकर आपके सैनिक आगे दौड़ पड़े। तब युयुधान के रथ के चारों ओर बड़ा कोलाहल उठा।
श्लोक 9 (7.113.9)
आकीर्यमाणा धावन्ती तव पुत्रस्य वाहिनी । सात्वतेन महाराज शतधाऽभिव्यशीर्यत ॥
ākīryamāṇā dhāvantī tava putrasya vāhinī | sātvatena mahārāja śatadhā'bhivyaśīryata
हे महाराज! चारों ओर से बाणों से ढकी हुई भागती हुई आपके पुत्र की सेना को सात्वत (सात्यकि) ने सौ टुकड़ों में बिखेर दिया।
श्लोक 10 (7.113.10)
तस्यां विदीर्यमाणायां शिनेः पुत्रो महारथः । सप्तवीरान्महेष्वासानग्रानीकेष्वपोथयत् ॥
tasyāṃ vidīryamāṇāyāṃ śineḥ putro mahārathaḥ | saptavīrānmaheṣvāsānagrānīkeṣvapothayat
जब वह सेना छिन्न-भिन्न की जा रही थी, तब शिनि के पुत्र उस महारथी ने सेना के अग्रभाग में सात महाधनुर्धरों को मार गिराया।
श्लोक 11 (7.113.11)
अथान्यानपि राजेन्द्र नानाजनपदेश्वरान् । शरैरनलसङ्काशैर्निन्ये वीरान्यमक्षयम् ॥
athānyānapi rājendra nānājanapadeśvarān | śarairanalasaṅkāśairninye vīrānyamakṣayam
हे राजेन्द्र! फिर उसने आग के समान तेजस्वी बाणों से नाना देशों के अन्य स्वामी वीरों को भी यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 12 (7.113.12)
शतमेकेन विव्याध शतेनैकं च पत्रिणाम् । द्विपारोहान्द्विपांश्चैव हयारोहान्हयांस्तथा । रथिनः साश्वसूतांश्च जघानेशः पशूनिव ॥
śatamekena vivyādha śatenaikaṃ ca patriṇām | dvipārohāndvipāṃścaiva hayārohānhayāṃstathā | rathinaḥ sāśvasūtāṃśca jaghāneśaḥ paśūniva
उसने एक बाण से सौ को और सौ बाणों से एक को बेध डाला; हाथी-सवारों और हाथियों को, घुड़सवारों और घोड़ों को, तथा घोड़ों और सारथियों सहित रथियों को उसने उसी प्रकार मार डाला जैसे ईश (रुद्र) पशुओं को मारते हैं।
श्लोक 13 (7.113.13)
तं तथाऽद्भुतकर्माणं शरसम्पातवर्षिणम् । न केचनाभ्यधावन्वै सात्यकिं तव सैनिकाः ॥
taṃ tathā'dbhutakarmāṇaṃ śarasampātavarṣiṇam | na kecanābhyadhāvanvai sātyakiṃ tava sainikāḥ
बाणों की वर्षा करते हुए उस अद्भुत कर्म करनेवाले सात्यकि पर आपके सैनिकों में से कोई भी नहीं झपटा।
श्लोक 14 (7.113.14)
ते भीता मृद्यमानाश्च प्रमृष्टा दीर्घबाहुना । आयोधनं जहुर्वीरा दृष्ट्वा तमतिमानिनम् ॥
te bhītā mṛdyamānāśca pramṛṣṭā dīrghabāhunā | āyodhanaṃ jahurvīrā dṛṣṭvā tamatimāninam
उस दीर्घबाहु योद्धा से कुचले और मिटाए जाते हुए, भयभीत वे वीर उस अत्यन्त अभिमानी को देखकर रणभूमि छोड़कर भाग गए।
श्लोक 15 (7.113.15)
तमेकं बहुधा पश्यन्मोहितास्तस्य तेजसा । सङ्ग्रामकोविदं वीरं विचरन्तमभीतवत् ॥
tamekaṃ bahudhā paśyanmohitāstasya tejasā | saṅgrāmakovidaṃ vīraṃ vicarantamabhītavat
उस एक ही वीर को बहुत रूपों में देखकर वे उसके तेज से मोहित हो गए — वह रणकुशल वीर निर्भय होकर विचर रहा था।
श्लोक 16 (7.113.16)
रथैर्विमथितैश्चैव भग्ननीडैश्च मारिष । चक्रैर्विमथितैश्छत्रैर्ध्वजैश्च विनिपातितैः ॥
rathairvimathitaiścaiva bhagnanīḍaiśca māriṣa | cakrairvimathitaiśchatrairdhvajaiśca vinipātitaiḥ
हे मान्य! टूटे हुए रथों और टूटे हुए रथ-बैठकों से, चूर-चूर हुए पहियों से, तथा गिरे हुए छत्रों और ध्वजाओं से,
श्लोक 17 (7.113.17)
अनुकर्षैः पताकाभिः शिरस्त्राणैः सकाञ्चनैः । बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः साङ्गदैश्च विशाम्पते ॥
anukarṣaiḥ patākābhiḥ śirastrāṇaiḥ sakāñcanaiḥ | bāhubhiścandanādigdhaiḥ sāṅgadaiśca viśāmpate
हे विशाम्पते! रथ के निचले ढाँचों, पताकाओं, सोने से जड़े शिरस्त्राणों, चन्दन-लिप्त और बाजूबन्दों से सजी भुजाओं से,
श्लोक 18 (7.113.18)
हस्तिहस्तोपमैश्चापि भुजङ्गाभोगसन्निभैः । ऊरुभिः पृथिवी च्छन्ना मनुजानां नराधिप ॥
hastihastopamaiścāpi bhujaṅgābhogasannibhaiḥ | ūrubhiḥ pṛthivī cchannā manujānāṃ narādhipa
तथा हाथी की सूँड़ जैसी और सर्पों के कुण्डल जैसी जाँघों से, हे नराधिप! मनुष्यों के अंगों से पृथ्वी ढक गई थी।
श्लोक 19 (7.113.19)
शशाङ्कसन्निभैश्चैव वदनैश्चारुकुण्डलैः । पतितैर्ऋषभाक्षाणां बभौ भारत मेदिनी ॥
śaśāṅkasannibhaiścaiva vadanaiścārukuṇḍalaiḥ | patitairṛṣabhākṣāṇāṃ babhau bhārata medinī
हे भारत! बैल की आँखों जैसी आँखोंवाले योद्धाओं के गिरे हुए, चन्द्रमा के समान सुन्दर और मनोहर कुण्डलों से सजे मुखों से पृथ्वी शोभित हो रही थी।
श्लोक 20 (7.113.20)
गजैश्च बहुधा छिन्नैः शयानैः पर्वतोपमैः । रराजातिभृशं भूमिर्विकीर्णैरिव पर्वतैः ॥
gajaiśca bahudhā chinnaiḥ śayānaiḥ parvatopamaiḥ | rarājātibhṛśaṃ bhūmirvikīrṇairiva parvataiḥ
अनेक प्रकार से कटे हुए, पर्वतों के समान पड़े हाथियों से पृथ्वी ऐसी अत्यन्त शोभित हो रही थी मानो उस पर पर्वत बिखरे पड़े हों।
श्लोक 21 (7.113.21)
तपनीयमयैर्योक्त्रैर्मुक्ताजालविभूषितैः । उरश्छदैर्विचित्रैश्च व्यशोभन्त तुरङ्गमाः । गतसत्वा महीं प्राप्य प्रमृष्टा दीर्घबाहुना ॥
tapanīyamayairyoktrairmuktājālavibhūṣitaiḥ | uraśchadairvicitraiśca vyaśobhanta turaṅgamāḥ | gatasatvā mahīṃ prāpya pramṛṣṭā dīrghabāhunā
सोने के जुओं और मोतियों के जाल से सजे हुए तथा विचित्र वक्षस्त्राणों से युक्त घोड़े भी, उस दीर्घबाहु के हाथों कुचले जाकर प्राणहीन होकर भूमि पर पड़े शोभा पा रहे थे।
श्लोक 22 (7.113.22)
नानाविधानि सैन्यानि तव हत्वा तु सात्वतः । प्रविष्टस्तावकं सैन्यं द्रावयित्वा चमूं भृशम् ॥
nānāvidhāni sainyāni tava hatvā tu sātvataḥ | praviṣṭastāvakaṃ sainyaṃ drāvayitvā camūṃ bhṛśam
आपकी नाना प्रकार की सेनाओं को मारकर सात्वत (सात्यकि) आपकी सेना में घुस गया और उस वाहिनी को पूरी तरह भगा दिया।
श्लोक 23 (7.113.23)
ततस्तेनैव मार्गेण येन यातो धनञ्जयः । इयेष सात्यकिर्गन्तुं ततो द्रोणेन वारितः ॥
tatastenaiva mārgeṇa yena yāto dhanañjayaḥ | iyeṣa sātyakirgantuṃ tato droṇena vāritaḥ
तब सात्यकि उसी मार्ग से जाना चाहता था जिससे धनञ्जय गया था, परन्तु द्रोण ने उसे रोक लिया।
श्लोक 24 (7.113.24)
भारद्वाजं समासाद्य युयुधानश्च सात्यकिः । न न्यवर्तत सङ्क्रुद्धो वेलामिव जलाशयः ॥
bhāradvājaṃ samāsādya yuyudhānaśca sātyakiḥ | na nyavartata saṅkruddho velāmiva jalāśayaḥ
भारद्वाज (द्रोण) के सामने पहुँचकर क्रोध से भरा हुआ युयुधान सात्यकि पीछे नहीं हटा, जैसे समुद्र अपने तट से टकराकर भी पीछे नहीं हटता।
श्लोक 25 (7.113.25)
निवार्य तु रणे द्रोणो युयुधानं महारथम् । विव्याध निशितैर्बाणैः पञ्चभिर्मर्मभेदिभिः ॥
nivārya tu raṇe droṇo yuyudhānaṃ mahāratham | vivyādha niśitairbāṇaiḥ pañcabhirmarmabhedibhiḥ
युद्ध में महारथी युयुधान को रोककर द्रोण ने मर्म को भेदनेवाले पाँच तीखे बाणों से उसे बेध दिया।
श्लोक 26 (7.113.26)
सात्यकिस्तु रणे द्रोणं राजन्विव्याध सप्तभिः । हेमपुङ्घैः शिलाधौतैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ॥
sātyakistu raṇe droṇaṃ rājanvivyādha saptabhiḥ | hemapuṅghaiḥ śilādhautaiḥ kaṅkabarhiṇavājitaiḥ
परन्तु हे राजन्! सात्यकि ने भी युद्ध में द्रोण को सात बाणों से बेधा, जो सोने की मूठवाले, पत्थर पर तेज किए हुए तथा कंक और मोर के पंखों से सजे थे।
श्लोक 27 (7.113.27)
तं षड्भिः सायकैर्द्रोणः साश्वयन्तारमार्दयत् । स तं न ममृषे द्रोणं युयुधानो महारथः ॥
taṃ ṣaḍbhiḥ sāyakairdroṇaḥ sāśvayantāramārdayat | sa taṃ na mamṛṣe droṇaṃ yuyudhāno mahārathaḥ
द्रोण ने छह बाणों से घोड़ों और सारथि सहित उसे पीड़ित किया; और महारथी युयुधान उसे द्रोण से सह न सका।
श्लोक 28 (7.113.28)
सिंहनादं ततः कृत्वा द्रोणं विव्याध सात्यकिः । दशभिः सायकैश्चान्यैः षड्भिरष्टाभिरेव च ॥
siṃhanādaṃ tataḥ kṛtvā droṇaṃ vivyādha sātyakiḥ | daśabhiḥ sāyakaiścānyaiḥ ṣaḍbhiraṣṭābhireva ca
तब सिंहनाद करके सात्यकि ने द्रोण को दस बाणों से बेधा, और फिर अन्य छह तथा आठ बाणों से भी।
श्लोक 29 (7.113.29)
युयुधानः पुनर्द्रोणं विव्याध दशभिः शरैः । एकेन सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् । ध्वजमेकेन बाणेन विव्याध युधि मारिष ॥
yuyudhānaḥ punardroṇaṃ vivyādha daśabhiḥ śaraiḥ | ekena sārathiṃ cāsya caturbhiścaturo hayān | dhvajamekena bāṇena vivyādha yudhi māriṣa
युयुधान ने फिर द्रोण को दस बाणों से बेधा; एक से उनके सारथि को, चार से चारों घोड़ों को, और हे मान्य! एक बाण से उनकी ध्वजा को युद्ध में बेध डाला।
श्लोक 30 (7.113.30)
तं द्रोणः साश्वयन्तारं सरथध्वजमाशुगैः । त्वरन्प्राच्छादयद्बाणैः शलभानामिव व्रजैः ॥
taṃ droṇaḥ sāśvayantāraṃ sarathadhvajamāśugaiḥ | tvaranprācchādayadbāṇaiḥ śalabhānāmiva vrajaiḥ
द्रोण ने शीघ्रता से उसे घोड़ों, सारथि, रथ और ध्वजा सहित टिड्डियों के झुंडों के समान बाणों से ढक दिया।
श्लोक 31 (7.113.31)
तथैव युयुधानोऽपि द्रोणं बहुभिराशुगैः । प्राच्छादयदसम्भ्रान्तस्त्वरमाणो महारथः ॥
tathaiva yuyudhāno'pi droṇaṃ bahubhirāśugaiḥ | prācchādayadasambhrāntastvaramāṇo mahārathaḥ
उसी प्रकार महारथी युयुधान ने भी, अविचल और फुर्तीला होकर, द्रोण को बहुत-से शीघ्रगामी बाणों से ढक दिया।
श्लोक 32 (7.113.32)
द्रोणस्तु परमक्रुद्धः सात्यकिं परवीरहा । अवाकिरच्छितैर्बाणैर्वासुदेवपराक्रमम् ॥
droṇastu paramakruddhaḥ sātyakiṃ paravīrahā | avākiracchitairbāṇairvāsudevaparākramam
और शत्रुवीरों के संहारक द्रोण ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर वासुदेव के समान पराक्रमी सात्यकि पर तीखे बाणों की वर्षा की।
श्लोक 33 (7.113.33)
तं तथा शरजालेन प्रच्छाद्य महता पुनः । द्रोणः प्रहस्य शैनेयमिदं वचनमब्रवीत् ॥
taṃ tathā śarajālena pracchādya mahatā punaḥ | droṇaḥ prahasya śaineyamidaṃ vacanamabravīt
उसे फिर बाणों के बड़े जाल से ढककर द्रोण ने हँसते हुए शिनि के वंशज से यह बात कही —
द्रोण उवाच
श्लोक 34 (7.113.34)
तवाचार्यो रणं हित्वा गतः कापुरुषो यथा । युध्यमानं च मां हित्वा प्रदक्षिणमवर्तत ॥
tavācāryo raṇaṃ hitvā gataḥ kāpuruṣo yathā | yudhyamānaṃ ca māṃ hitvā pradakṣiṇamavartata
"तुम्हारा आचार्य युद्ध छोड़कर कायर की तरह चला गया; और लड़ते हुए मुझ को छोड़कर वह मुझे अपनी दाहिनी ओर रखता हुआ घूमकर निकल गया।
श्लोक 35 (7.113.35)
त्वं हि मे युध्यतो नाद्य जीवन्यास्यसि माधव । यदि मां त्वं रणे हित्वा न यास्याचार्यवद्द्रुतम् ॥
tvaṃ hi me yudhyato nādya jīvanyāsyasi mādhava | yadi māṃ tvaṃ raṇe hitvā na yāsyācāryavaddrutam
हे माधव! यदि तुम भी अपने आचार्य की तरह मुझे युद्ध में छोड़कर शीघ्र नहीं भागोगे, तो आज मेरे लड़ते रहते तुम जीवित नहीं जाओगे।"
सात्यकिरुवाच
श्लोक 36 (7.113.36)
धनञ्जयस्य पदवीं धर्मराजस्य शासनात् । गच्छामि स्वस्ति ते ब्रह्मन्न मे कालात्ययो भवेत् ॥
dhanañjayasya padavīṃ dharmarājasya śāsanāt | gacchāmi svasti te brahmanna me kālātyayo bhavet
"धर्मराज की आज्ञा से मैं धनञ्जय के मार्ग पर जा रहा हूँ। हे ब्राह्मण! आपका कल्याण हो; मेरा समय व्यर्थ न जाए।
श्लोक 37 (7.113.37)
आचार्यानुगतो मार्गः शिष्यैरन्वास्यते सदा । तस्मादेव व्रजाम्याशु यथा मे स गुरुर्गतः ॥
ācāryānugato mārgaḥ śiṣyairanvāsyate sadā | tasmādeva vrajāmyāśu yathā me sa gururgataḥ
आचार्य जिस मार्ग से गए हों, शिष्य सदा उसी का अनुसरण करते हैं; इसलिए मैं भी उसी मार्ग से शीघ्र जा रहा हूँ जिससे मेरे गुरु गए हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 38 (7.113.38)
एतावदुक्त्वा शैनेय आचार्यं परिवर्जयन् । प्रयातः सहसा राजन्सारथिं चेदमब्रवीत् ॥
etāvaduktvā śaineya ācāryaṃ parivarjayan | prayātaḥ sahasā rājansārathiṃ cedamabravīt
यह कहकर शिनि का वंशज आचार्य को बचाकर, हे राजन्! सहसा आगे बढ़ गया और अपने सारथि से बोला —
सात्यकिरुवाच
श्लोक 39 (7.113.39)
द्रोणः करिष्यते यत्नं सर्वथा मम वारणे । यत्तो याहि रणे सूत शृणु चेदं वचः परम् ॥
droṇaḥ kariṣyate yatnaṃ sarvathā mama vāraṇe | yatto yāhi raṇe sūta śṛṇu cedaṃ vacaḥ param
"द्रोण मुझे रोकने के लिए सब प्रकार से यत्न करेंगे। हे सूत! सावधान होकर युद्ध में आगे बढ़ो, और मेरी यह दूसरी बात भी सुनो।
श्लोक 40 (7.113.40)
एतदालोक्यते सैन्यमावन्त्यानां महाप्रभम् । अस्यानन्तरतस्त्वेतद्दाक्षिणात्यं महद्बलम् ॥
etadālokyate sainyamāvantyānāṃ mahāprabham | asyānantaratastvetaddākṣiṇātyaṃ mahadbalam
यह अवन्तिवासियों की तेजस्वी सेना दिखाई देती है, और इसके ठीक आगे दक्षिण देश के योद्धाओं की वह विशाल सेना है।
श्लोक 41 (7.113.41)
तदनन्तरमेतच्च बाह्लिकानां महद्बलम् । बाह्लिकाभ्याशतो युक्तं कर्णस्य च महद्बलम् ॥
tadanantarametacca bāhlikānāṃ mahadbalam | bāhlikābhyāśato yuktaṃ karṇasya ca mahadbalam
उसके बाद बाह्लिकों की वह बड़ी सेना है, और बाह्लिकों के निकट ही कर्ण की भी विशाल सेना खड़ी है।
श्लोक 42 (7.113.42)
अन्योन्येन हि सैन्यानि भिन्नान्येतानि सारथे । अन्योन्यं समुपाश्रित्य न त्यक्ष्यन्ति रणाजिरम् ॥
anyonyena hi sainyāni bhinnānyetāni sārathe | anyonyaṃ samupāśritya na tyakṣyanti raṇājiram
हे सारथे! ये सेनाएँ एक-दूसरे से अलग-अलग हैं, फिर भी एक-दूसरे का सहारा लेकर रणभूमि नहीं छोड़ेंगी।
श्लोक 43 (7.113.43)
एतदन्तरमासाद्य चोदयाश्वान्प्रहृष्टवत् । मध्यमं जवमास्थाय वह मामत्र सारथे ॥
etadantaramāsādya codayāśvānprahṛṣṭavat | madhyamaṃ javamāsthāya vaha māmatra sārathe
हे सारथे! इनके बीच के अन्तर में पहुँचकर प्रसन्न मन से घोड़ों को हाँको; मध्यम गति से मुझे यहीं से ले चलो —
श्लोक 44 (7.113.44)
बाह्लिका यत्र दृश्यन्ते नानाप्रहरणोद्यताः । दाक्षिणात्याश्च बहवः सूतपुत्रपुरोगमाः ॥
bāhlikā yatra dṛśyante nānāpraharaṇodyatāḥ | dākṣiṇātyāśca bahavaḥ sūtaputrapurogamāḥ
वहाँ, जहाँ नाना प्रकार के शस्त्र उठाए बाह्लिक दिखाई देते हैं और सूतपुत्र (कर्ण) को आगे किए हुए बहुत-से दाक्षिणात्य हैं,
श्लोक 45 (7.113.45)
हस्त्यश्वरथसम्बाधं यच्चानीकं विलोक्यते । नानादेशसमुत्थैश्च पदातिभिरधिष्ठितम् ॥
hastyaśvarathasambādhaṃ yaccānīkaṃ vilokyate | nānādeśasamutthaiśca padātibhiradhiṣṭhitam
और जहाँ हाथियों, घोड़ों और रथों से ठसाठस भरी तथा नाना देशों से आए पैदल सैनिकों से घिरी वह सेना दिखाई देती है।
श्लोक 46 (7.113.46)
ततः शक्यो महाव्यूहो भेत्तुं स सहसा रणे । तं देशं त्वरिता यामो मृद्नन्तो युधि शात्रवान् ॥
tataḥ śakyo mahāvyūho bhettuṃ sa sahasā raṇe | taṃ deśaṃ tvaritā yāmo mṛdnanto yudhi śātravān
तब उस महाव्यूह को युद्ध में अचानक भेदा जा सकता है; शत्रुओं को रौंदते हुए हम शीघ्र उसी स्थान पर चलें।
श्लोक 47 (7.113.47)
तत्रैते सम्प्रहृष्टत्वान्नास्मान्प्रति युयुत्सवः ॥
tatraite samprahṛṣṭatvānnāsmānprati yuyutsavaḥ
वहाँ वे अत्यन्त हर्ष में मग्न होने के कारण हमारे विरुद्ध लड़ने को उत्सुक नहीं हैं।
श्लोक 48 (7.113.48)
अयुध्यमानो बहुभिरेकं प्राप्य सुदुर्बलम् । बलं प्रमथ्य गच्छामि मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥
ayudhyamāno bahubhirekaṃ prāpya sudurbalam | balaṃ pramathya gacchāmi miṣatāṃ sarvadhanvinām
बहुतों से न लड़ते हुए मैं उस एक अत्यन्त दुर्बल स्थान तक पहुँचूँगा, और सब धनुर्धरों के देखते-देखते सेना को कुचलकर निकल जाऊँगा।
श्लोक 49 (7.113.49)
मध्यतो याहि यत्रोग्रं कर्णस्य सुमहद्बलम् । यत्रैते परमक्रुद्धा दाक्षिणात्या महारथाः । एतान्विजित्य सङ्ग्रामे ततो यामो धनञ्जयम् ॥
madhyato yāhi yatrograṃ karṇasya sumahadbalam | yatraite paramakruddhā dākṣiṇātyā mahārathāḥ | etānvijitya saṅgrāme tato yāmo dhanañjayam
बीच से चलो, जहाँ कर्ण की उग्र और विशाल सेना है और जहाँ ये दाक्षिणात्य महारथी अत्यन्त क्रुद्ध खड़े हैं। युद्ध में इन्हें जीतकर हम फिर धनञ्जय के पास चलेंगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 50 (7.113.50)
युयुधानवचः श्रुत्वा युयुधानस्य सारथिः । यथोक्तमगमद्राजन्वर्जयन्द्रोणमाहवे ॥
yuyudhānavacaḥ śrutvā yuyudhānasya sārathiḥ | yathoktamagamadrājanvarjayandroṇamāhave
युयुधान के वचन सुनकर, हे राजन्! युयुधान का सारथि द्रोण से बचता हुआ, जैसा कहा गया था वैसे ही रणभूमि में चल पड़ा।
श्लोक 51 (7.113.51)
तं द्रोणोऽनुययौ क्रुद्धो विकिरन्विशिखान्बहून् । युयुधानं महाभागं गच्छन्तमनिवर्तिनम् ॥
taṃ droṇo'nuyayau kruddho vikiranviśikhānbahūn | yuyudhānaṃ mahābhāgaṃ gacchantamanivartinam
क्रुद्ध द्रोण बहुत-से बाण बिखेरते हुए उसके पीछे चले, जब वह महाभाग युयुधान बिना लौटे आगे बढ़ता जा रहा था।
श्लोक 52 (7.113.52)
स च सैन्यं महद्भित्त्वा दाक्षिणात्यबलं च तत् । कर्णस्य सैन्यं सुमहदभिहत्य शितैः शरैः ॥
sa ca sainyaṃ mahadbhittvā dākṣiṇātyabalaṃ ca tat | karṇasya sainyaṃ sumahadabhihatya śitaiḥ śaraiḥ
उस सात्यकि ने महान सेना को और उस दाक्षिण सेना को चीरकर, तथा कर्ण की विशाल सेना को तीखे बाणों से मारकर,
श्लोक 53 (7.113.53)
प्राविशद्भारतीं सेनामपर्यन्तां स सात्यकिः । सात्यको हि ततः सैन्यं द्रावयन्स समन्ततः ॥
prāviśadbhāratīṃ senāmaparyantāṃ sa sātyakiḥ | sātyako hi tataḥ sainyaṃ drāvayansa samantataḥ
वह सात्यकि भरतों की उस सेना में घुस गया जिसका कोई अन्त न दिखता था। और सात्यकि ने तब सेना को चारों ओर भगाते हुए,
श्लोक 54 (7.113.54)
प्रविष्टे युयुधाने तु सैनिकेषु द्रुतेषु च । अमर्षी कृतवर्मा तु सात्यकिं पर्यवारयत् ॥
praviṣṭe yuyudhāne tu sainikeṣu druteṣu ca | amarṣī kṛtavarmā tu sātyakiṃ paryavārayat
जब युयुधान घुस गया और सैनिक भाग रहे थे, तब अमर्ष से भरे कृतवर्मा ने सात्यकि को घेर लिया।
श्लोक 55 (7.113.55)
तमापतन्तं विशिखैः षड्भिराहत्य सात्यकिः । चतुर्भिश्चतुरोऽस्याश्वानाजघानाशु वीर्यवान् ॥
tamāpatantaṃ viśikhaiḥ ṣaḍbhirāhatya sātyakiḥ | caturbhiścaturo'syāśvānājaghānāśu vīryavān
जब कृतवर्मा झपटकर आया, तब सात्यकि ने उसे छह बाणों से मारा और उस पराक्रमी ने चार बाणों से उसके चारों घोड़ों को शीघ्र मार डाला।
श्लोक 56 (7.113.56)
ततः पुनः षोडशभिर्नतपर्वभिराशुगैः । सात्यकिः कृतवर्माणं प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे ॥
tataḥ punaḥ ṣoḍaśabhirnataparvabhirāśugaiḥ | sātyakiḥ kṛtavarmāṇaṃ pratyavidhyatstanāntare
फिर सात्यकि ने झुकी गाँठोंवाले सोलह शीघ्रगामी बाणों से कृतवर्मा की छाती में प्रहार किया।
श्लोक 57 (7.113.57)
स ताड्यमानो विशिखैर्बहुभिस्तिग्मतेजनैः । सात्वतेन महाराज कृतवर्मा न चक्षमे ॥
sa tāḍyamāno viśikhairbahubhistigmatejanaiḥ | sātvatena mahārāja kṛtavarmā na cakṣame
हे महाराज! सात्वत के तेज नोकवाले बहुत-से बाणों से पीड़ित कृतवर्मा इसे सह न सका।
श्लोक 58 (7.113.58)
स वत्सदन्तं सन्धाय तिग्मांश्वनलसप्रभम् । आकृष्य राजन्नाकर्णाद्विव्याधोरसि सात्यकिम् ॥
sa vatsadantaṃ sandhāya tigmāṃśvanalasaprabham | ākṛṣya rājannākarṇādvivyādhorasi sātyakim
उसने सूर्य और अग्नि के समान दीप्त एक वत्सदन्त बाण चढ़ाया और हे राजन्! कान तक खींचकर सात्यकि की छाती में मारा।
श्लोक 59 (7.113.59)
स तस्य देहावरणं भित्त्वा देहं च सायकः । सपुङ्खपत्रः पृथिवीं विवेश रुधिरोक्षितः ॥
sa tasya dehāvaraṇaṃ bhittvā dehaṃ ca sāyakaḥ | sapuṅkhapatraḥ pṛthivīṃ viveśa rudhirokṣitaḥ
वह बाण, पुंख और पंखों सहित, उसके कवच और शरीर को भेदकर रक्त से भीगा हुआ पृथ्वी में समा गया।
श्लोक 60 (7.113.60)
अथास्य बहुभिर्बाणैरच्छिनत्परमास्त्रवित् । स मार्गणगणं राजन्कृतवर्मा शरासनम् ॥
athāsya bahubhirbāṇairacchinatparamāstravit | sa mārgaṇagaṇaṃ rājankṛtavarmā śarāsanam
तब हे राजन्! परम अस्त्रों के ज्ञाता कृतवर्मा ने बहुत-से बाणों से उसके धनुष को, उस पर चढ़े बाणों के समूह सहित, काट डाला,
श्लोक 61 (7.113.61)
विव्याध च रणे राजन्सात्यकिं सत्यविक्रमम् । दशभिर्विशिखैस्तीक्ष्णैरभिक्रुद्धः स्तनान्तरे ॥
vivyādha ca raṇe rājansātyakiṃ satyavikramam | daśabhirviśikhaistīkṣṇairabhikruddhaḥ stanāntare
और अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसने सत्यपराक्रमी सात्यकि को रण में दस तीखे बाणों से छाती में बेध दिया।
श्लोक 62 (7.113.62)
ततः प्रशीर्णे धनुषि शक्त्या शक्तिमतां वरः । जघान दक्षिणं बाहुं सात्यकिः कृतवर्मणः ॥
tataḥ praśīrṇe dhanuṣi śaktyā śaktimatāṃ varaḥ | jaghāna dakṣiṇaṃ bāhuṃ sātyakiḥ kṛtavarmaṇaḥ
तब धनुष के टूट जाने पर बलवानों में श्रेष्ठ सात्यकि ने शक्ति (बरछी) से कृतवर्मा की दाहिनी भुजा पर प्रहार किया।
श्लोक 63 (7.113.63)
ततोऽन्यत्सुदृढं चापं पूर्णमायम्य सात्यकिः । व्यसृजद्विशिखांस्तूर्णं शतशोऽथ सहस्रशः ॥
tato'nyatsudṛḍhaṃ cāpaṃ pūrṇamāyamya sātyakiḥ | vyasṛjadviśikhāṃstūrṇaṃ śataśo'tha sahasraśaḥ
फिर सात्यकि ने दूसरा सुदृढ़ धनुष पूरा खींचकर शीघ्र ही सैकड़ों और हज़ारों बाण छोड़े।
श्लोक 64 (7.113.64)
सरथं कृतवर्माणं समन्तात्पर्यवारयत् । छादयित्वा रणे राजन्हार्दिक्यं स तु सात्यकिः । अथास्य भल्लेन शिरः सारथेः समकृन्तत ॥
sarathaṃ kṛtavarmāṇaṃ samantātparyavārayat | chādayitvā raṇe rājanhārdikyaṃ sa tu sātyakiḥ | athāsya bhallena śiraḥ sāratheḥ samakṛntata
सात्यकि ने रथ सहित कृतवर्मा को चारों ओर से घेर लिया, और हे राजन्! रण में हार्दिक्य को पूरी तरह ढककर उसने एक भल्ल से उसके सारथि का सिर काट डाला।
श्लोक 65 (7.113.65)
स पपात हतः सूतो हार्दिक्यस्य महारथात् । ततस्ते यन्तृरहिताः प्राद्रवंस्तुरगा भृशम् ॥
sa papāta hataḥ sūto hārdikyasya mahārathāt | tataste yantṛrahitāḥ prādravaṃsturagā bhṛśam
मारा गया सारथि हार्दिक्य के महारथ से गिर पड़ा, और तब सारथि के बिना वे घोड़े बड़े वेग से भाग निकले।
श्लोक 66 (7.113.66)
अथ भोजस्तु सम्भ्रान्तो निगृह्य तुरगान्स्वयम् । तस्थौ वीरो धनुष्पाणिस्तत्सैन्यान्यभ्यपूजयन् ॥
atha bhojastu sambhrānto nigṛhya turagānsvayam | tasthau vīro dhanuṣpāṇistatsainyānyabhyapūjayan
तब घबराए हुए भोज (कृतवर्मा) ने स्वयं घोड़ों को रोककर थामा और वह वीर धनुष हाथ में लिए खड़ा रहा, जबकि उसके सैनिक उसका अभिनन्दन कर रहे थे।
श्लोक 67 (7.113.67)
स मुहूर्तमिवाश्वास्य सदश्वान्समनोदयत् । व्यपेतभीरमित्राणामावहत्सुमहद्भयम् ॥
sa muhūrtamivāśvāsya sadaśvānsamanodayat | vyapetabhīramitrāṇāmāvahatsumahadbhayam
क्षण भर विश्राम करके उसने अपने उत्तम घोड़ों को फिर हाँका; भयरहित होकर वह शत्रुओं पर बड़ा भय ले आया।
श्लोक 68 (7.113.68)
सात्यकिश्चात्यगात्तस्मात्स तु भीममुपाद्रवत् ॥
sātyakiścātyagāttasmātsa tu bhīmamupādravat
सात्यकि उसे लाँघकर आगे निकल गया, परन्तु वह (कृतवर्मा) भीम पर टूट पड़ा।
श्लोक 69 (7.113.69)
युयुधानोऽपि राजेन्द्र भोजानीकाद्विनिःसृतः । प्रययौ त्वरितस्तूर्णं काम्भोजानां महाचमूम् ॥
yuyudhāno'pi rājendra bhojānīkādviniḥsṛtaḥ | prayayau tvaritastūrṇaṃ kāmbhojānāṃ mahācamūm
हे राजेन्द्र! युयुधान भी भोज की सेना से निकलकर शीघ्रता से काम्बोजों की विशाल सेना की ओर चल पड़ा।
श्लोक 70 (7.113.70)
स तत्र बहुभिः शूरैः सन्निरुद्धो महारथैः । न चचाल तदा राजन्सात्यकिः सत्यविक्रमः ॥
sa tatra bahubhiḥ śūraiḥ sanniruddho mahārathaiḥ | na cacāla tadā rājansātyakiḥ satyavikramaḥ
वहाँ अनेक शूर महारथियों से घिर जाने पर भी सत्यपराक्रमी सात्यकि, हे राजन्! विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 71 (7.113.71)
सन्धाय च चमूं द्रोणो भोजे भारं निवेश्य च । अभ्यधावद्रणे यत्तो युयुधानं युयुत्सया ॥
sandhāya ca camūṃ droṇo bhoje bhāraṃ niveśya ca | abhyadhāvadraṇe yatto yuyudhānaṃ yuyutsayā
द्रोण ने सेना को फिर व्यवस्थित किया और भोज पर भार सौंपकर, सावधान होकर, लड़ने की इच्छा से युद्ध में युयुधान का पीछा किया।
श्लोक 72 (7.113.72)
तथा तमनुधावन्तं युयुधानस्य पृष्ठतः । न्यवारयन्त संहृष्टाः पाण्डुसैन्ये बृहत्तमाः । समासाद्य तु हार्दिक्यं रथानां प्रवरं रथम् ॥
tathā tamanudhāvantaṃ yuyudhānasya pṛṣṭhataḥ | nyavārayanta saṃhṛṣṭāḥ pāṇḍusainye bṛhattamāḥ | samāsādya tu hārdikyaṃ rathānāṃ pravaraṃ ratham
इस प्रकार युयुधान के पीछे दौड़ते हुए द्रोण को पाण्डव-सेना के महान योद्धाओं ने हर्ष के साथ रोका; और रथियों में श्रेष्ठ हार्दिक्य के रथ के सामने पहुँचकर,
श्लोक 73 (7.113.73)
पाञ्चाला विगतोत्साहा भीमसेनपुरोगमाः । विक्रम्य वारिता राजन्वीरेण कृतवर्मणा ॥
pāñcālā vigatotsāhā bhīmasenapurogamāḥ | vikramya vāritā rājanvīreṇa kṛtavarmaṇā
भीमसेन के नेतृत्व में पाञ्चाल उत्साहहीन हो गए, हे राजन्! और पराक्रम करते हुए भी वीर कृतवर्मा द्वारा रोक लिए गए।
श्लोक 74 (7.113.74)
यतमानांश्च तान्सर्वानीषद्विगतचेतसः । अभितस्ताञ्शरौघेण क्लान्तवाहानकारयत् ॥
yatamānāṃśca tānsarvānīṣadvigatacetasaḥ | abhitastāñśaraugheṇa klāntavāhānakārayat
जब वे प्रयत्न करते रहे, कुछ मोहग्रस्त चित्त से, तब उसने उन सब को चारों ओर से बाणों की बाढ़ से घेरकर उनके वाहनों को थका दिया।
श्लोक 75 (7.113.75)
निगृहीतास्तु भोजेन भोजानीकेप्सवो रणे । अतिष्ठन्नार्यवद्वीराः प्रार्थयन्तो महद्यशः । हार्दिक्यं समरे यत्ता न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् ॥
nigṛhītāstu bhojena bhojānīkepsavo raṇe | atiṣṭhannāryavadvīrāḥ prārthayanto mahadyaśaḥ | hārdikyaṃ samare yattā na śekuḥ prativīkṣitum
भोज द्वारा रोके गए, भोज की सेना तक पहुँचने की इच्छावाले वे वीर आर्यों की भाँति महान यश की कामना करते हुए रण में डटे रहे; फिर भी युद्ध में दृढ़ खड़े हार्दिक्य की ओर वे देख तक न सके।