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द्रोण पर्व · अध्याय 114

धृतराष्ट्र का विलाप; कृतवर्मा द्वारा पाण्डवों का प्रतिरोध

धृतराष्ट्र अपनी सेना की श्रेष्ठता का वर्णन करते हैं और पूछते हैं कि वह कैसे टूट गई, क्योंकि कृष्ण और अर्जुन सात्यकि के साथ उसे लाँघ गए हैं। सञ्जय उत्तर देते हैं कि यह विनाश धृतराष्ट्र के अपने ही दोषों का फल है, फिर बताते हैं कि कैसे कृतवर्मा ने अकेले भीम और पाण्डवों को रोका, भीम का धनुष और ध्वज गिरा दिया, भीम की शक्ति के दो टुकड़े कर दिए, और पाण्डव, पाञ्चाल, चेदि तथा केकय योद्धाओं को युद्धभूमि से पीछे हटा दिया।

अध्याय 113अध्याय-सूचीअध्याय 115

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (7.114.1)

एवं बहुगुणं सैन्यमेवं प्रविचितं बलम् । व्यूढमेवं यथान्यायमेवं बहु च सञ्जय ॥

evaṃ bahuguṇaṃ sainyamevaṃ pravicitaṃ balam | vyūḍhamevaṃ yathānyāyamevaṃ bahu ca sañjaya

इतनी गुणों से भरी सेना, इतना सोच-समझकर चुना हुआ बल, नियमानुसार इस प्रकार व्यूह में खड़ा किया हुआ, और इतनी विशाल, हे सञ्जय,

श्लोक 2 (7.114.2)

नित्यं पूजितमस्माभिरभिकामं च नः सदा । प्रौढमत्यद्भुताकारं पुरस्ताद्दृष्टविक्रमम् ॥

nityaṃ pūjitamasmābhirabhikāmaṃ ca naḥ sadā | prauḍhamatyadbhutākāraṃ purastāddṛṣṭavikramam

जिसका हमने सदा सम्मान किया और जो सदा हमारे प्रति अनुरक्त रही, जो पुष्ट और अद्भुत रूप वाली थी, और जिसका पराक्रम पहले देखा जा चुका था,

श्लोक 3 (7.114.3)

नातिवृद्धमबालं च नाकृशं नातिपीवरम् । लघुवृत्तायतप्रायं सारगात्रमनामयम् ॥

nātivṛddhamabālaṃ ca nākṛśaṃ nātipīvaram | laghuvṛttāyataprāyaṃ sāragātramanāmayam

जो न अधिक बूढ़ी थी, न बालक, न दुबली, न अत्यन्त स्थूल, जो फुर्तीली चाल वाली और प्रायः ऊँचे डील-डौल की थी, सुदृढ़ अंगों वाली और नीरोग,

श्लोक 4 (7.114.4)

आत्तसन्नाहसञ्छन्नं बहुशस्त्रपरिच्छदम् । शस्त्रग्रहणविद्यासु बह्वीषु परिनिष्ठितम् ॥

āttasannāhasañchannaṃ bahuśastraparicchadam | śastragrahaṇavidyāsu bahvīṣu pariniṣṭhitam

जो कवच पहने हुए थी, अनेक शस्त्रों से सुसज्जित थी, और शस्त्र चलाने की अनेक विद्याओं में पूर्ण निष्णात थी,

श्लोक 5 (7.114.5)

आरोहे पर्यवस्कन्दे सरणे सान्तरप्लुते । सम्यक्प्रहरणे याने व्यपयाने च कोविदम् ॥

ārohe paryavaskande saraṇe sāntaraplute | samyakpraharaṇe yāne vyapayāne ca kovidam

जो चढ़ने में, कूदकर उतरने में, आगे बढ़ने में, बीच में अन्तर देकर उछलने में, ठीक-ठीक प्रहार करने में, आगे चलने में और पीछे हटने में कुशल थी,

श्लोक 6 (7.114.6)

नागेष्वश्वेषु बहुशो रथेषु च परीक्षितम् । चर्मनिस्त्रिंशयुद्धे च नियुद्धे च विशारदम् । परीक्ष्य च यथान्यायं वेतनेनोपपादितम् ॥

nāgeṣvaśveṣu bahuśo ratheṣu ca parīkṣitam | carmanistriṃśayuddhe ca niyuddhe ca viśāradam | parīkṣya ca yathānyāyaṃ vetanenopapāditam

जो हाथियों, घोड़ों और रथों में बार-बार परखी गई थी, ढाल-तलवार के युद्ध और मल्लयुद्ध में निपुण थी, और भली-भाँति जाँचकर वेतन देकर रखी गई थी;

श्लोक 7 (7.114.7)

न गोष्ठ्या नोपकारेण न सम्बन्धनिमित्ततः । नानाहूतं नाप्यभृतं मम सैन्यं बभूव ह ॥

na goṣṭhyā nopakāreṇa na sambandhanimittataḥ | nānāhūtaṃ nāpyabhṛtaṃ mama sainyaṃ babhūva ha

मेरी सेना न गप-शप से, न उपकार से, न सम्बन्ध के कारण बनी थी; उसमें कोई बिना बुलाए नहीं आया था और कोई बिना वेतन के नहीं था।

श्लोक 8 (7.114.8)

कुलीनार्यजनोपेतं तुष्टपुष्टमनुद्धतम् । कृतमानोपचारं च यशस्वि च मनस्वि च ॥

kulīnāryajanopetaṃ tuṣṭapuṣṭamanuddhatam | kṛtamānopacāraṃ ca yaśasvi ca manasvi ca

वह कुलीन और श्रेष्ठ जनों से युक्त थी, सन्तुष्ट और पुष्ट थी, उद्दण्ड नहीं थी, मान और सेवा से सम्मानित थी, यशस्वी और स्वाभिमानी थी,

श्लोक 9 (7.114.9)

सचिवैश्चापरैर्मुख्यैर्बहुभिः पुण्यकर्मभिः । लोकपालोपमैस्तात पालितं नरसत्तमैः ॥

sacivaiścāparairmukhyairbahubhiḥ puṇyakarmabhiḥ | lokapālopamaistāta pālitaṃ narasattamaiḥ

और मन्त्रियों तथा पुण्यकर्मा अनेक अन्य प्रमुख जनों से, हे तात, लोकपालों के समान श्रेष्ठ पुरुषों से उसकी रक्षा होती थी,

श्लोक 10 (7.114.10)

बहुभिः पार्थिवैर्गुप्तमस्मत्प्रियचिकीर्षुभिः । अस्मानभिसृतैः कामात्सबलैः सपदानुगैः ॥

bahubhiḥ pārthivairguptamasmatpriyacikīrṣubhiḥ | asmānabhisṛtaiḥ kāmātsabalaiḥ sapadānugaiḥ

हमारा प्रिय करने की इच्छा रखने वाले, अपनी इच्छा से अपनी सेनाओं और अनुचरों सहित हमारे पास आए हुए बहुत-से राजाओं ने उसे घेरकर बचा रखा था,

श्लोक 11 (7.114.11)

महोदधिमिवापूर्णमापगाभिः समन्ततः । अपक्षैः पक्षिसङ्काशै रथैरश्वैश्च संवृतम् ॥

mahodadhimivāpūrṇamāpagābhiḥ samantataḥ | apakṣaiḥ pakṣisaṅkāśai rathairaśvaiśca saṃvṛtam

वह चारों ओर से नदियों से भरे महासागर के समान थी, पंखहीन होकर भी पक्षियों जैसे रथों और घोड़ों से ढकी हुई,

श्लोक 12 (7.114.12)

प्रभिन्नकरटैश्चैव द्विरदैरावृतं महत् । यदहन्यत मे सैन्यं किमन्यद्भागधेयतः ॥

prabhinnakaraṭaiścaiva dviradairāvṛtaṃ mahat | yadahanyata me sainyaṃ kimanyadbhāgadheyataḥ

और मद बहाते गण्डस्थल वाले हाथियों से घिरी हुई। ऐसी मेरी सेना जो मारी गई, वह भाग्य के सिवा और क्या है?

श्लोक 13 (7.114.13)

योधाक्षय्यजलं भीमं वाहनोर्मितरङ्गिणम् । क्षेपण्यसिगदाशक्तिशरप्रासझषाकुलम् ॥

yodhākṣayyajalaṃ bhīmaṃ vāhanormitaraṅgiṇam | kṣepaṇyasigadāśaktiśaraprāsajhaṣākulam

योद्धा उसके अक्षय जल थे और वह भयंकर थी; वाहन उसकी लहरें और तरंगें थे, और गोफन, तलवारें, गदाएँ, शक्तियाँ, बाण और प्रास उसकी मछलियाँ बनकर उसमें भरे थे;

श्लोक 14 (7.114.14)

ध्वजभूषणसम्बाधरत्नोपलसुसञ्चितम् । वाहनैरभिधावद्भिर्वायुवेगविकम्पितम् ॥

dhvajabhūṣaṇasambādharatnopalasusañcitam | vāhanairabhidhāvadbhirvāyuvegavikampitam

वह ध्वजाओं और आभूषणों से भरी थी, रत्नों और मणियों से सुशोभित ढेर-सी थी, और दौड़ते वाहनों से वायु के वेग के समान काँप रही थी;

श्लोक 15 (7.114.15)

द्रोणगम्भीरपातालं कृतवर्ममहाह्रदम् । जलसन्धमहाग्राहं कर्णचन्द्रोदयोद्धतम् ॥

droṇagambhīrapātālaṃ kṛtavarmamahāhradam | jalasandhamahāgrāhaṃ karṇacandrodayoddhatam

द्रोण उसका अथाह पाताल थे, कृतवर्मा उसका विशाल सरोवर, जलसन्ध उसका महाग्राह, और कर्ण उसे उमड़ाने वाला चन्द्रोदय।

श्लोक 16 (7.114.16)

गते सैन्यार्णवं भित्त्वा तरसा पाण्डवर्षभे । सञ्जयैकरथेनैव युयुधाने च मामकम् ॥

gate sainyārṇavaṃ bhittvā tarasā pāṇḍavarṣabhe | sañjayaikarathenaiva yuyudhāne ca māmakam

जब पाण्डवों का वह वृषभ उस सैन्य-सागर को बलपूर्वक भेदकर भीतर चला गया, और हे सञ्जय, युयुधान भी, एक-एक रथ के साथ ही, मेरी सेना में घुस गया,

श्लोक 17 (7.114.17)

तत्र शेषं न पश्यामि प्रविष्टे सव्यसाचिनि । सात्वते च रथोदारे मम सैन्यस्य सञ्जय ॥

tatra śeṣaṃ na paśyāmi praviṣṭe savyasācini | sātvate ca rathodāre mama sainyasya sañjaya

तो सव्यसाची के और उत्तम रथ वाले सात्वत के प्रवेश कर लेने पर मुझे वहाँ अपनी सेना का कुछ भी शेष नहीं दिखाई देता।

श्लोक 18 (7.114.18)

तौ तत्र समतिक्रान्तौ दृष्ट्वाऽतीव तरस्विनौ । सिन्धुराजं तु सम्प्रेक्ष्य गाण्डीवस्य च गोचरम् ॥

tau tatra samatikrāntau dṛṣṭvā'tīva tarasvinau | sindhurājaṃ tu samprekṣya gāṇḍīvasya ca gocaram

उन दोनों अत्यन्त वेगवान वीरों को वहाँ से आगे निकलते देखकर, और सिन्धुराज को गाण्डीव की पहुँच में देखकर,

श्लोक 19 (7.114.19)

किं नु वा कुरवः कृत्यं विदधुः कालचोदिताः । दारुणैकायनेऽकाले कथं वा प्रतिपेदिरे ॥

kiṃ nu vā kuravaḥ kṛtyaṃ vidadhuḥ kālacoditāḥ | dāruṇaikāyane'kāle kathaṃ vā pratipedire

कालप्रेरित कौरवों ने उस समय क्या किया? उस भयंकर, अनुचित बेला में, जब एक ही मार्ग शेष था, उन्होंने उसका सामना कैसे किया?

श्लोक 20 (7.114.20)

ग्रस्तान्हि कौरवान्मन्ये मृत्युना तात सङ्गतान् । विक्रमोऽपि रणे तेषां न तथा दृश्यते हि वै ॥

grastānhi kauravānmanye mṛtyunā tāta saṅgatān | vikramo'pi raṇe teṣāṃ na tathā dṛśyate hi vai

हे तात! मैं समझता हूँ कि कौरवों को मृत्यु ने ग्रस लिया है; क्योंकि युद्ध में उनका पराक्रम अब पहले जैसा दिखाई नहीं देता।

श्लोक 21 (7.114.21)

अक्षतौ संयुगे तत्र प्रविष्टौ कृष्णपाण्डवौ । न च वारयिता कश्चित्तयोरस्तीह सञ्जय ॥

akṣatau saṃyuge tatra praviṣṭau kṛṣṇapāṇḍavau | na ca vārayitā kaścittayorastīha sañjaya

कृष्ण और पाण्डव अर्जुन बिना घाव खाए युद्ध में घुस गए, और हे सञ्जय, यहाँ उन दोनों को रोकने वाला कोई नहीं है।

श्लोक 22 (7.114.22)

भृताश्च बहवो योधाः परीक्ष्यैव महारथाः । वेतनेन यथायोगं प्रियवादेन चापरे ॥

bhṛtāśca bahavo yodhāḥ parīkṣyaiva mahārathāḥ | vetanena yathāyogaṃ priyavādena cāpare

बहुत-से योद्धा, महारथी, परखकर ही रखे गए थे: कुछ योग्यता के अनुसार वेतन देकर, और कुछ प्रिय वचन कहकर।

श्लोक 23 (7.114.23)

असत्कारभृतस्तात मम सैन्ये न विद्यते । कर्मणा ह्यनुरूपेण लभ्यते भक्तवेतनम् ॥

asatkārabhṛtastāta mama sainye na vidyate | karmaṇā hyanurūpeṇa labhyate bhaktavetanam

हे तात! मेरी सेना में कोई भी बिना सत्कार के नहीं रखा गया; क्योंकि भोजन और वेतन अनुरूप कर्म से ही प्राप्त होता है।

श्लोक 24 (7.114.24)

न च योधोऽभवत्कश्चिन्मम सैन्ये तु सञ्जय । अल्पदानभृतस्तात तथा चाभृतको नरः ॥

na ca yodho'bhavatkaścinmama sainye tu sañjaya | alpadānabhṛtastāta tathā cābhṛtako naraḥ

हे सञ्जय! मेरी सेना में ऐसा कोई योद्धा नहीं था जो थोड़े दान से रखा गया हो, हे तात, और न कोई ऐसा मनुष्य था जिसे वेतन न मिला हो।

श्लोक 25 (7.114.25)

पूजितो हि यथाशक्त्या दानमानासनैर्मया । तथा पुत्रैश्च मे तात ज्ञातिभिश्च सबान्धवैः ॥

pūjito hi yathāśaktyā dānamānāsanairmayā | tathā putraiśca me tāta jñātibhiśca sabāndhavaiḥ

उनमें से प्रत्येक का मैंने यथाशक्ति दान, मान और आसनों से सत्कार किया था, और वैसे ही मेरे पुत्रों ने तथा बन्धुओं सहित मेरे जातिजनों ने भी।

श्लोक 26 (7.114.26)

ते च प्राप्यैव सङ्ग्रामे निर्जिताः सव्यसाचिना । शैनेयेन परामृष्टाः किमन्यद्भागधेयतः ॥

te ca prāpyaiva saṅgrāme nirjitāḥ savyasācinā | śaineyena parāmṛṣṭāḥ kimanyadbhāgadheyataḥ

फिर भी वे युद्ध में सव्यसाची से भिड़ते ही हार गए और शैनेय के हाथों कुचले गए। यह भाग्य के सिवा और क्या है?

श्लोक 27 (7.114.27)

रक्ष्यते यश्च सङ्ग्रामे ये च सञ्जय रक्षिणः । एकः साधारणः पन्थाः रक्ष्यस्य सह रक्षिभिः ॥

rakṣyate yaśca saṅgrāme ye ca sañjaya rakṣiṇaḥ | ekaḥ sādhāraṇaḥ panthāḥ rakṣyasya saha rakṣibhiḥ

हे सञ्जय! युद्ध में जिसकी रक्षा की जाती है और जो रक्षक हैं, उन रक्षित और रक्षकों दोनों का मार्ग एक ही और साझा है।

श्लोक 28 (7.114.28)

अर्जुनं समरे दृष्ट्वा सैन्धवस्याग्रतः स्थितम् । पुत्रो मम भृशं मूढः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ॥

arjunaṃ samare dṛṣṭvā saindhavasyāgrataḥ sthitam | putro mama bhṛśaṃ mūḍhaḥ kiṃ kāryaṃ pratyapadyata

अर्जुन को युद्ध में सैन्धव के सामने खड़ा देखकर अत्यन्त घबराए हुए मेरे पुत्र ने क्या उपाय अपनाया?

श्लोक 29 (7.114.29)

सात्यकिं च रणे दृष्ट्वा प्रविशन्तमभीतवत् । किं नु दुर्योधनः कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ॥

sātyakiṃ ca raṇe dṛṣṭvā praviśantamabhītavat | kiṃ nu duryodhanaḥ kṛtyaṃ prāptakālamamanyata

और सात्यकि को निर्भय के समान युद्ध में घुसते देखकर दुर्योधन ने उस समय क्या करना उचित समझा?

श्लोक 30 (7.114.30)

सर्वशस्त्रातिगौ सेनां प्रविष्टौ रथिसत्तमौ । दृष्ट्वा कां वै धृतिं युद्धे प्रत्यपद्यन्त मामकाः ॥

sarvaśastrātigau senāṃ praviṣṭau rathisattamau | dṛṣṭvā kāṃ vai dhṛtiṃ yuddhe pratyapadyanta māmakāḥ

सब शस्त्रों को लाँघ जाने वाले उन दोनों श्रेष्ठ रथियों को सेना में घुसा देखकर मेरे योद्धाओं ने युद्ध में कौन-सा धैर्य पाया?

श्लोक 31 (7.114.31)

दृष्ट्वा कृष्णं तु दाशार्हमर्जुनार्थे व्यवस्थितम् । शिनीनामृषभं चैव मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

dṛṣṭvā kṛṣṇaṃ tu dāśārhamarjunārthe vyavasthitam | śinīnāmṛṣabhaṃ caiva manye śocanti putrakāḥ

दाशार्ह कृष्ण को अर्जुन के कार्य में लगा देखकर, और शिनियों के वृषभ को भी, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 32 (7.114.32)

दृष्ट्वा सेनां व्यतिक्रान्तां सात्वतेनार्जुनेन च । पलायमानांश्च कुरून्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

dṛṣṭvā senāṃ vyatikrāntāṃ sātvatenārjunena ca | palāyamānāṃśca kurūnmanye śocanti putrakāḥ

सात्वत और अर्जुन द्वारा सेना को लाँघ लिया गया और कौरवों को भागते देखकर, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 33 (7.114.33)

विद्रुतान्रथिनो दृष्ट्वा निरुत्साहान्द्विषज्जये । पलायनकृतोत्साहान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

vidrutānrathino dṛṣṭvā nirutsāhāndviṣajjaye | palāyanakṛtotsāhānmanye śocanti putrakāḥ

रथियों को भागते, शत्रु पर विजय के उत्साह से रहित और भाग निकलने पर उतारू देखकर, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 34 (7.114.34)

शून्यान्कृतान्रथोपस्थान्सात्वतेनार्जुनेन च । हतांश्च योधान्संदृश्य मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

śūnyānkṛtānrathopasthānsātvatenārjunena ca | hatāṃśca yodhānsaṃdṛśya manye śocanti putrakāḥ

सात्वत और अर्जुन द्वारा रथों के आसन सूने कर दिए गए और योद्धाओं को मारा गया देखकर, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 35 (7.114.35)

व्यश्वनागरथान्दृष्ट्वा तत्र वीरान्सहस्रशः । धावमानान्रणे व्यग्रान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

vyaśvanāgarathāndṛṣṭvā tatra vīrānsahasraśaḥ | dhāvamānānraṇe vyagrānmanye śocanti putrakāḥ

वहाँ घोड़ों, हाथियों और रथों से रहित हज़ारों वीरों को युद्ध में घबराकर दौड़ते देखकर, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 36 (7.114.36)

महानागान्विद्रवतो दृष्ट्वाऽर्जुनशराहतान् । पतितान्पततश्चान्यान्मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

mahānāgānvidravato dṛṣṭvā'rjunaśarāhatān | patitānpatataścānyānmanye śocanti putrakāḥ

अर्जुन के बाणों से घायल बड़े-बड़े हाथियों को भागते, कुछ को गिरे हुए और कुछ को गिरते देखकर, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 37 (7.114.37)

विहीनांश्च कृतानश्वान्विरथांश्च कृतान्नरान् । तत्र सात्यकिपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

vihīnāṃśca kṛtānaśvānvirathāṃśca kṛtānnarān | tatra sātyakipārthābhyāṃ manye śocanti putrakāḥ

वहाँ सात्यकि और अर्जुन द्वारा घोड़ों को सवारों से रहित और मनुष्यों को रथहीन किया हुआ देखकर, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 38 (7.114.38)

हयौघान्निहतान्दृष्ट्वा द्रवमाणांस्ततस्ततः । रणे माधवपार्थाभ्यां मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

hayaughānnihatāndṛṣṭvā dravamāṇāṃstatastataḥ | raṇe mādhavapārthābhyāṃ manye śocanti putrakāḥ

माधव और अर्जुन द्वारा युद्ध में घोड़ों के झुण्ड मारे गए और इधर-उधर भागते देखकर, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 39 (7.114.39)

पत्तिसङ्घान्रणे दृष्ट्वा धावमानांश्च सर्वशः । निराशा विजये सर्वे मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

pattisaṅghānraṇe dṛṣṭvā dhāvamānāṃśca sarvaśaḥ | nirāśā vijaye sarve manye śocanti putrakāḥ

युद्ध में पैदल सैनिकों के दलों को सब ओर भागते और सबको विजय से निराश देखकर, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 40 (7.114.40)

द्रोणस्य समतिक्रान्तावनीकमपराजितौ । क्षणेन दृष्ट्वा तौ वीरौ मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ॥

droṇasya samatikrāntāvanīkamaparājitau | kṣaṇena dṛṣṭvā tau vīrau manye śocanti putrakāḥ

उन दोनों अपराजित वीरों को क्षण भर में द्रोण की सेना को लाँघते देखकर, मैं समझता हूँ कि मेरे पुत्र शोक कर रहे हैं।

श्लोक 41 (7.114.41)

सम्मूढोऽस्मि भृशं तात श्रुत्वा कृष्णधनञ्जयौ । प्रविष्टौ मामकं सैन्यं सात्वतेन सहाच्युतौ ॥

sammūḍho'smi bhṛśaṃ tāta śrutvā kṛṣṇadhanañjayau | praviṣṭau māmakaṃ sainyaṃ sātvatena sahācyutau

हे तात! यह सुनकर कि कृष्ण और धनञ्जय, वे दोनों अच्युत, सात्वत के साथ मेरी सेना में घुस गए हैं, मैं अत्यन्त मोहित हो गया हूँ।

श्लोक 42 (7.114.42)

तस्मिन्प्रविष्टे पृतनां शिनीनां प्रवरे रथे । भोजानीकं व्यतिक्रान्ते किमकुर्वत कौरवाः ॥

tasminpraviṣṭe pṛtanāṃ śinīnāṃ pravare rathe | bhojānīkaṃ vyatikrānte kimakurvata kauravāḥ

जब शिनियों का वह प्रधान रथ पर सेना में घुस गया और भोज की टुकड़ी को लाँघ गया, तब कौरवों ने क्या किया?

श्लोक 43 (7.114.43)

तथा द्रोणेन समरे निगृहीतेषु पाण्डुषु । कथं युद्धमभूत्तत्र तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

tathā droṇena samare nigṛhīteṣu pāṇḍuṣu | kathaṃ yuddhamabhūttatra tanmamācakṣva sañjaya

और जब रण में द्रोण ने पाण्डवों को रोक रखा था, तब वहाँ युद्ध कैसे हुआ? हे सञ्जय, वह मुझे बताओ।

श्लोक 44 (7.114.44)

द्रोणो हि बलवान्श्रेष्ठः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः । पाञ्चालास्तं महेष्वासं प्रत्ययुध्यन्कथं रणे ॥

droṇo hi balavānśreṣṭhaḥ kṛtāstro yuddhadurmadaḥ | pāñcālāstaṃ maheṣvāsaṃ pratyayudhyankathaṃ raṇe

क्योंकि द्रोण बलवान हैं, श्रेष्ठ हैं, अस्त्रविद्या में निपुण हैं और युद्ध में प्रचण्ड हैं। पाञ्चालों ने उन महाधनुर्धर से रण में कैसे युद्ध किया?

श्लोक 45 (7.114.45)

बद्धवैरास्ततो द्रोणे धनञ्जयजयैषिणः । भारद्वाजसुतस्तेषु दृढवैरो महारथः ॥

baddhavairāstato droṇe dhanañjayajayaiṣiṇaḥ | bhāradvājasutasteṣu dṛḍhavairo mahārathaḥ

वे द्रोण के प्रति वैर बाँधे हुए और धनञ्जय की विजय चाहने वाले थे; और भरद्वाज के पुत्र, वह महारथी, उनके प्रति दृढ़ वैर रखते थे।

श्लोक 46 (7.114.46)

अर्जुनश्चापि यच्चक्रे सिन्धुराजवधं प्रति । तन्मे सर्वं समाचक्ष्व कुशलो ह्यसि सञ्जय ॥

arjunaścāpi yaccakre sindhurājavadhaṃ prati | tanme sarvaṃ samācakṣva kuśalo hyasi sañjaya

और सिन्धुराज के वध के लिए अर्जुन ने जो कुछ किया, वह सब मुझे बताओ; हे सञ्जय, तुम कुशल हो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 47 (7.114.47)

आत्मापराधात्सम्भूतं व्यसनं भरतर्षभ । प्राप्य प्राकृतवद्वीर न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

ātmāparādhātsambhūtaṃ vyasanaṃ bharatarṣabha | prāpya prākṛtavadvīra na tvaṃ śocitumarhasi

हे भरतश्रेष्ठ! यह विपत्ति आपके ही अपराध से उत्पन्न हुई है; इसे पाकर, हे वीर, आपको साधारण मनुष्य की भाँति शोक नहीं करना चाहिए।

श्लोक 48 (7.114.48)

पुरा यदुच्यसे प्राज्ञैः सुहृद्भिर्विदुरादिभिः । मा हार्षीः पाण्डवान्राजन्निति तन्न त्वया श्रुतम् ॥

purā yaducyase prājñaiḥ suhṛdbhirvidurādibhiḥ | mā hārṣīḥ pāṇḍavānrājanniti tanna tvayā śrutam

विदुर आदि बुद्धिमान सुहृदों ने आपसे पहले जो कहा था कि "हे राजन्! पाण्डवों का हरण मत कीजिए," उसे आपने नहीं सुना।

श्लोक 49 (7.114.49)

सुहृदां हितकामानां वाक्यं यो न शृणोति ह । स महद्व्यसनं प्राप्य शोचते वै यथा भवान् ॥

suhṛdāṃ hitakāmānāṃ vākyaṃ yo na śṛṇoti ha | sa mahadvyasanaṃ prāpya śocate vai yathā bhavān

जो हितैषी सुहृदों की बात नहीं सुनता, वह बड़ी विपत्ति में पड़कर वैसे ही शोक करता है जैसे आप कर रहे हैं।

श्लोक 50 (7.114.50)

याचितोऽसि पुरा राजन्दाशार्हेण शमं प्रति । न च तं लब्धवान्कामं त्वत्तः कृष्णो महायशाः ॥

yācito'si purā rājandāśārheṇa śamaṃ prati | na ca taṃ labdhavānkāmaṃ tvattaḥ kṛṣṇo mahāyaśāḥ

हे राजन्! पहले दाशार्ह कृष्ण ने आपसे शान्ति के लिए याचना की थी, परन्तु महायशस्वी कृष्ण को आपसे वह इच्छित वस्तु नहीं मिली।

श्लोक 51 (7.114.51)

तव निर्गुणतां ज्ञात्वा पक्षपातं सुतेषु च । द्वैधीभावं तथा धर्मे पाण्डवेषु च मत्सरम् ॥

tava nirguṇatāṃ jñātvā pakṣapātaṃ suteṣu ca | dvaidhībhāvaṃ tathā dharme pāṇḍaveṣu ca matsaram

आपके गुणहीन होने को, पुत्रों के प्रति पक्षपात को, धर्म के विषय में आपकी अस्थिरता को और पाण्डवों के प्रति आपकी डाह को जानकर,

श्लोक 52 (7.114.52)

तव जिह्ममभिप्रायं विदित्वा पाण्डवान्प्रति । आर्तप्रलापांश्च बहून्मनुजाधिप सत्तम ॥

tava jihmamabhiprāyaṃ viditvā pāṇḍavānprati | ārtapralāpāṃśca bahūnmanujādhipa sattama

पाण्डवों के प्रति आपके कुटिल अभिप्राय को और आपके अनेक दीन विलापों को जानकर, हे नरेश्वर, हे नरश्रेष्ठ,

श्लोक 53 (7.114.53)

सर्वलोकस्य तत्त्वज्ञः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः । वासुदेवस्ततो युद्धं कुरूणामकरोन्महत् ॥

sarvalokasya tattvajñaḥ sarvalokeśvaraḥ prabhuḥ | vāsudevastato yuddhaṃ kurūṇāmakaronmahat

समस्त लोक के तत्त्व को जानने वाले, सब लोकों के स्वामी और प्रभु वासुदेव ने तब कौरवों का वह महान् युद्ध कराया।

श्लोक 54 (7.114.54)

आत्मापराधात्सुमहान्प्राप्तस्ते विपुलः क्षयः । नैनं दुर्योधने दोषं कर्तुमर्हसि मानद ॥

ātmāparādhātsumahānprāptaste vipulaḥ kṣayaḥ | nainaṃ duryodhane doṣaṃ kartumarhasi mānada

आपके अपने ही अपराध से आप पर यह अत्यन्त बड़ा और विशाल विनाश आ पड़ा है। हे मानद! इस दोष को आपको दुर्योधन पर नहीं डालना चाहिए।

श्लोक 55 (7.114.55)

न हि ते सुकृतं किञ्चिदादौ मध्ये च भारत । दृश्यते पृष्ठतश्चैव त्वन्मूलो हि पराजयः ॥

na hi te sukṛtaṃ kiñcidādau madhye ca bhārata | dṛśyate pṛṣṭhataścaiva tvanmūlo hi parājayaḥ

हे भारत! आपका कोई भी सुकृत न आरम्भ में, न मध्य में, और न बाद में दिखाई देता है; यह पराजय आप ही के कारण हुई है।

श्लोक 56 (7.114.56)

तस्मादद्य स्थिरो भूत्वा ज्ञात्वा लोकस्य निर्णयम् । शृणु युद्धं यथावृत्तं घोरं देवासुरोपमम् ॥

tasmādadya sthiro bhūtvā jñātvā lokasya nirṇayam | śṛṇu yuddhaṃ yathāvṛttaṃ ghoraṃ devāsuropamam

इसलिए आज स्थिर होकर, लोक की नियति को जानते हुए, उस युद्ध को जैसा हुआ वैसा सुनिए, जो भयंकर था और देवासुर-संग्राम के समान था।

श्लोक 57 (7.114.57)

प्रविष्टे तव सैन्यं तु शैनेये सत्यविक्रमे । भीमसेनमुखाः पार्थाः प्रतीयुर्वाहिनीं तव ॥

praviṣṭe tava sainyaṃ tu śaineye satyavikrame | bhīmasenamukhāḥ pārthāḥ pratīyurvāhinīṃ tava

सत्यपराक्रमी शैनेय के आपकी सेना में घुस जाने पर, भीमसेन को आगे करके पाण्डव आपकी सेना पर चढ़ आए।

श्लोक 58 (7.114.58)

आगच्छतस्तान्सहसा क्रुद्धरूपान्सहानुगान् । दधारैको रणे पाण्डून्कृतवर्मा महारथः ॥

āgacchatastānsahasā kruddharūpānsahānugān | dadhāraiko raṇe pāṇḍūnkṛtavarmā mahārathaḥ

क्रोधित रूप वाले और अनुचरों सहित उन्हें सहसा आते देखकर महारथी कृतवर्मा ने अकेले ही रण में पाण्डवों को रोक लिया।

श्लोक 59 (7.114.59)

यथोद्वृत्तं वारयते वेला वै सलिलार्णवम् । पाण्डुसैन्यं तथा सङ्ख्ये हार्दिक्यः समवारयत् ॥

yathodvṛttaṃ vārayate velā vai salilārṇavam | pāṇḍusainyaṃ tathā saṅkhye hārdikyaḥ samavārayat

जैसे तट उमड़े हुए समुद्र को रोक लेता है, वैसे ही हार्दिक्य ने युद्ध में पाण्डव-सेना को रोक दिया।

श्लोक 60 (7.114.60)

तत्राद्भुतमपश्याम हार्दिक्यस्य पराक्रमम् । यदेनं सहिताः पार्था नातिचक्रमुराहवे ॥

tatrādbhutamapaśyāma hārdikyasya parākramam | yadenaṃ sahitāḥ pārthā nāticakramurāhave

वहाँ हमने हार्दिक्य के पराक्रम में एक अद्भुत बात देखी: कि इकट्ठे होकर भी पाण्डव युद्ध में उसे लाँघ न सके।

श्लोक 61 (7.114.61)

ततो भीमस्त्रिभिर्विद्ध्वा कृतवर्माणमाशुगैः । शङ्खं दध्मौ महाबाहुर्हर्षयन्सर्वपाण्डवान् ॥

tato bhīmastribhirviddhvā kṛtavarmāṇamāśugaiḥ | śaṅkhaṃ dadhmau mahābāhurharṣayansarvapāṇḍavān

तब महाबाहु भीम ने तीन बाणों से कृतवर्मा को बींधकर शंख बजाया, जिससे सब पाण्डव हर्षित हो उठे।

श्लोक 62 (7.114.62)

सहदेवस्तु विंशत्या धर्मराजश्च पञ्चभिः । शतेन नकुलश्चापि हार्दिक्यं समविध्यत ॥

sahadevastu viṃśatyā dharmarājaśca pañcabhiḥ | śatena nakulaścāpi hārdikyaṃ samavidhyata

सहदेव ने बीस से, धर्मराज ने पाँच से और नकुल ने सौ बाणों से हार्दिक्य को बींधा।

श्लोक 63 (7.114.63)

द्रौपदेयास्त्रिसप्तत्या सप्तभिश्च घटोत्कचः । धृष्टद्युम्नस्त्रिभिश्चापि कृतवर्माणमार्दयत् ॥

draupadeyāstrisaptatyā saptabhiśca ghaṭotkacaḥ | dhṛṣṭadyumnastribhiścāpi kṛtavarmāṇamārdayat

द्रौपदी के पुत्रों ने तिहत्तर से, घटोत्कच ने सात से और धृष्टद्युम्न ने तीन से कृतवर्मा को पीड़ित किया।

श्लोक 64 (7.114.64)

विराटो द्रुपदश्चैव याज्ञसेनिश्च पञ्चभिः । शिखण्डी चैव हार्दिक्यं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः ॥

virāṭo drupadaścaiva yājñaseniśca pañcabhiḥ | śikhaṇḍī caiva hārdikyaṃ viddhvā pañcabhirāśugaiḥ

विराट, द्रुपद और याज्ञसेनि ने पाँच-पाँच से, और शिखण्डी ने भी हार्दिक्य को पाँच तीव्र बाणों से बींधकर,

श्लोक 65 (7.114.65)

पुनर्विव्याध विंशत्या सायकानां हसन्निव । कृतवर्मा ततो राजन्सर्वतस्तान्महारथान् ॥

punarvivyādha viṃśatyā sāyakānāṃ hasanniva | kṛtavarmā tato rājansarvatastānmahārathān

फिर बीस बाणों से हँसते हुए-से उसे दोबारा बींधा। तब हे राजन्! कृतवर्मा ने चारों ओर से उन महारथियों को,

श्लोक 66 (7.114.66)

एकैकं पञ्चभिर्विद्ध्वा भीमं विव्याध सप्तभिः । धनुर्ध्वजं चास्य तदा रथाद्भूमावपातयत् ॥

ekaikaṃ pañcabhirviddhvā bhīmaṃ vivyādha saptabhiḥ | dhanurdhvajaṃ cāsya tadā rathādbhūmāvapātayat

एक-एक को पाँच से बींधकर भीम को सात से बींधा, और तब उसके धनुष और ध्वज को रथ से भूमि पर गिरा दिया।

श्लोक 67 (7.114.67)

अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महारथः । आजघानोरसि क्रुद्धः सप्तत्या निशितैः शरैः ॥

athainaṃ chinnadhanvānaṃ tvaramāṇo mahārathaḥ | ājaghānorasi kruddhaḥ saptatyā niśitaiḥ śaraiḥ

तब धनुष कट जाने पर उस महारथी ने शीघ्रता और क्रोध से उसकी छाती पर सत्तर तीखे बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 68 (7.114.68)

स गाढविद्धो बलवान्हार्दिक्यस्य शरोत्तमैः । चचाल रथमध्यस्थः क्षितिकम्पे यथाऽचलः ॥

sa gāḍhaviddho balavānhārdikyasya śarottamaiḥ | cacāla rathamadhyasthaḥ kṣitikampe yathā'calaḥ

हार्दिक्य के उत्तम बाणों से गहरा बिंधा हुआ वह बलवान रथ के बीच बैठा हुआ ऐसे काँप उठा जैसे भूकम्प में पर्वत।

श्लोक 69 (7.114.69)

भीमसेनं तथा दृष्ट्वा धर्मराजपुरोगमाः । विसृजन्तः शरान्राजन्कृतवर्माणमार्दयन् ॥

bhīmasenaṃ tathā dṛṣṭvā dharmarājapurogamāḥ | visṛjantaḥ śarānrājankṛtavarmāṇamārdayan

भीमसेन को ऐसा देखकर, हे राजन्! धर्मराज के नेतृत्व में पाण्डव बाणों की वर्षा करते हुए कृतवर्मा को पीड़ित करने लगे।

श्लोक 70 (7.114.70)

तं तथा कोष्ठकीकृत्य रथवंशेन मारिष । विव्यधुः सायकैर्हृष्टा रक्षार्थं मारुतेर्मृधे ॥

taṃ tathā koṣṭhakīkṛtya rathavaṃśena māriṣa | vivyadhuḥ sāyakairhṛṣṭā rakṣārthaṃ mārutermṛdhe

हे मारिष! रथों की पंक्ति से उसे इस प्रकार घेरकर, मारुति (भीम) की रक्षा के लिए उन्होंने हर्ष से बाणों द्वारा उसे बींधा।

श्लोक 71 (7.114.71)

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां भीमसेनो महाबलः । शक्तिं जग्राह समरे हेमदण्डामयस्मयीम् ॥

pratilabhya tataḥ saṃjñāṃ bhīmaseno mahābalaḥ | śaktiṃ jagrāha samare hemadaṇḍāmayasmayīm

तब होश में आकर महाबली भीमसेन ने युद्ध में सोने की डण्डी वाली लोहे की शक्ति उठा ली,

श्लोक 72 (7.114.72)

चिक्षेप च रथात्तूर्णं कृतवर्मरथं प्रति । सा भीमभुजनिर्मुक्ता निर्मुक्तोरगसन्निभा ॥

cikṣepa ca rathāttūrṇaṃ kṛtavarmarathaṃ prati | sā bhīmabhujanirmuktā nirmuktoragasannibhā

और रथ से तुरन्त उसे कृतवर्मा के रथ की ओर फेंका; भीम की भुजा से छूटी हुई वह केंचुली छोड़े हुए सर्प के समान थी,

श्लोक 73 (7.114.73)

कृतवर्माणमभितः प्रजज्वाल सुदारुणा । तामापतन्तीं सहसा युगान्ताग्निसमप्रभाम् ॥

kṛtavarmāṇamabhitaḥ prajajvāla sudāruṇā | tāmāpatantīṃ sahasā yugāntāgnisamaprabhām

और कृतवर्मा के चारों ओर भयंकर रूप से जल उठी। युगान्त की अग्नि के समान प्रभा वाली उसे सहसा अपने ऊपर गिरती देख,

श्लोक 74 (7.114.74)

द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यो निजघान द्विधा तदा । सा छिन्ना पतिता भूमौ शक्तिः कनकभूषणा ॥

dvābhyāṃ śarābhyāṃ hārdikyo nijaghāna dvidhā tadā | sā chinnā patitā bhūmau śaktiḥ kanakabhūṣaṇā

हार्दिक्य ने दो बाणों से उसके दो टुकड़े कर दिए। कटी हुई वह सोने से सजी शक्ति भूमि पर गिर पड़ी,

श्लोक 75 (7.114.75)

द्योतयन्ती दिशो राजन्महोल्केव नभश्च्युता । शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा भीमश्चुक्रोध वै भृशम् ॥

dyotayantī diśo rājanmaholkeva nabhaścyutā | śaktiṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā bhīmaścukrodha vai bhṛśam

हे राजन्! दिशाओं को प्रकाशित करती हुई, आकाश से गिरी बड़ी उल्का के समान। शक्ति को नष्ट हुआ देखकर भीम अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे।

श्लोक 76 (7.114.76)

ततोऽन्यद्धनुरादाय वेगवत्सुमहास्वनम् । भीमसेनो रणे क्रुद्धो हार्दिक्यं समवारयत् ॥

tato'nyaddhanurādāya vegavatsumahāsvanam | bhīmaseno raṇe kruddho hārdikyaṃ samavārayat

तब वेगवान और बड़े गर्जन वाला दूसरा धनुष लेकर क्रोधित भीमसेन ने रण में हार्दिक्य को रोका।

श्लोक 77 (7.114.77)

अथैनं पञ्चभिर्बाणैराजघान स्तनान्तरे । भीमो भीमबलो राजंस्तव दुर्मन्त्रितेन च ॥

athainaṃ pañcabhirbāṇairājaghāna stanāntare | bhīmo bhīmabalo rājaṃstava durmantritena ca

फिर उसने उसकी छाती के बीच में पाँच बाणों से प्रहार किया; हे राजन्! भयंकर बल वाले भीम का यह प्रहार आपकी दुर्मन्त्रणा के कारण हुआ।

श्लोक 78 (7.114.78)

भोजस्तु क्षतसर्वाङ्गो भीमसेनेन मारिष । रक्ताशोक इवोत्फुल्लो व्यभ्राजत रणाजिरे ॥

bhojastu kṣatasarvāṅgo bhīmasenena māriṣa | raktāśoka ivotphullo vyabhrājata raṇājire

हे मारिष! भीमसेन द्वारा सारे अंगों में घायल किया हुआ वह भोज रणभूमि में खिले हुए लाल अशोक के समान शोभित हुआ।

श्लोक 79 (7.114.79)

ततः क्रुद्धस्त्रिभिर्बाणैर्भीमसेनं हसन्निव । अभिहत्य दृढं युद्धे तान्सर्वान्प्रत्यविध्यत ॥

tataḥ kruddhastribhirbāṇairbhīmasenaṃ hasanniva | abhihatya dṛḍhaṃ yuddhe tānsarvānpratyavidhyata

तब क्रुद्ध होकर, हँसते हुए-से, उसने तीन बाणों से भीमसेन को दृढ़ता से मारा और उन सबको भी बदले में बींधा।

श्लोक 80 (7.114.80)

त्रिभिस्त्रिभिर्महेष्वासो यतमानान्महारथान् । तेऽपि तं प्रत्यविध्यन्त सप्तभिः सप्तभिः शरैः ॥

tribhistribhirmaheṣvāso yatamānānmahārathān | te'pi taṃ pratyavidhyanta saptabhiḥ saptabhiḥ śaraiḥ

उस महाधनुर्धर ने प्रयत्न करते हुए उन महारथियों को तीन-तीन बाणों से बींधा; और उन्होंने भी बदले में उसे सात-सात बाणों से बींधा।

श्लोक 81 (7.114.81)

शिखण्डिनस्ततः क्रुद्धः क्षुरप्रेण महारथः । धनुश्चिच्छेद समरे प्रहसन्निव सात्वतः ॥

śikhaṇḍinastataḥ kruddhaḥ kṣurapreṇa mahārathaḥ | dhanuściccheda samare prahasanniva sātvataḥ

तब क्रोधित सात्वत महारथी ने रण में हँसते हुए-से क्षुरप्र बाण से शिखण्डी का धनुष काट डाला।

श्लोक 82 (7.114.82)

शिखण्डी तु ततः क्रुद्धश्छिन्ने धनुषि सत्वरः । असिं जग्राह समरे शतचन्द्रं च भास्वरम् ॥

śikhaṇḍī tu tataḥ kruddhaśchinne dhanuṣi satvaraḥ | asiṃ jagrāha samare śatacandraṃ ca bhāsvaram

तब धनुष कट जाने पर क्रुद्ध शिखण्डी ने शीघ्र ही युद्ध में तलवार और सौ चन्द्रों वाली चमकती ढाल ले ली।

श्लोक 83 (7.114.83)

भ्रामयित्वा महच्चर्म चामीकरविभूषितम् । तमसिं प्रेषयामास कृतवर्मरथं प्रति ॥

bhrāmayitvā mahaccarma cāmīkaravibhūṣitam | tamasiṃ preṣayāmāsa kṛtavarmarathaṃ prati

सोने से सजी उस बड़ी ढाल को घुमाकर उसने वह तलवार कृतवर्मा के रथ की ओर फेंकी।

श्लोक 84 (7.114.84)

स तस्य सशरं चापं छित्त्वा राजन्महानसिः । अभ्यगाद्धरणीं राजंश्च्युतं ज्योतिरिवाम्बरात् ॥

sa tasya saśaraṃ cāpaṃ chittvā rājanmahānasiḥ | abhyagāddharaṇīṃ rājaṃścyutaṃ jyotirivāmbarāt

वह बड़ी तलवार उसके बाण सहित धनुष को काटकर, हे राजन्, आकाश से गिरे हुए ज्योतिपिण्ड की तरह, हे राजन्, भूमि पर आ गिरी।

श्लोक 85 (7.114.85)

एतस्मिन्नेव काले तु त्वरमाणं महारथाः । विव्यधुः सायकैर्गाढं कृतवर्माणमाहवे ॥

etasminneva kāle tu tvaramāṇaṃ mahārathāḥ | vivyadhuḥ sāyakairgāḍhaṃ kṛtavarmāṇamāhave

उसी समय महारथियों ने रण में शीघ्रता करते हुए कृतवर्मा को बाणों से गहरा बींधा।

श्लोक 86 (7.114.86)

अथान्यद्धनुरादाय त्यक्त्वा तच्च महद्धनुः । विशीर्णं भरतश्रेष्ठ हार्दिक्यः परवीरहा ॥

athānyaddhanurādāya tyaktvā tacca mahaddhanuḥ | viśīrṇaṃ bharataśreṣṭha hārdikyaḥ paravīrahā

तब हे भरतश्रेष्ठ! टूटे हुए उस बड़े धनुष को छोड़कर और दूसरा धनुष लेकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले हार्दिक्य ने,

श्लोक 87 (7.114.87)

विव्याध पाण्डवान्युद्धे त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः । शिखण्डिनं च विव्याध त्रिभिः पञ्चभिरेव च ॥

vivyādha pāṇḍavānyuddhe tribhistribhirajihmagaiḥ | śikhaṇḍinaṃ ca vivyādha tribhiḥ pañcabhireva ca

युद्ध में तीन-तीन सीधे बाणों से पाण्डवों को बींधा, और शिखण्डी को तीन और फिर पाँच बाणों से बींधा।

श्लोक 88 (7.114.88)

धनुरन्यत्समादाय शिखण्डी तु महायशाः । अवारयत्कूर्मनखैराशुगैर्हृदिकात्मजम् ॥

dhanuranyatsamādāya śikhaṇḍī tu mahāyaśāḥ | avārayatkūrmanakhairāśugairhṛdikātmajam

तब महायशस्वी शिखण्डी ने दूसरा धनुष लेकर कछुए के नाखून जैसे आकार वाले तीव्र बाणों से हृदिक के पुत्र को रोका।

श्लोक 89 (7.114.89)

ततः क्रुद्धो रणे राजन्हृदिकस्यात्मसम्भवः । अभिदुद्राव वेगेन याज्ञसेनिं महारथम् ॥

tataḥ kruddho raṇe rājanhṛdikasyātmasambhavaḥ | abhidudrāva vegena yājñaseniṃ mahāratham

तब हे राजन्! रण में क्रुद्ध हृदिक के पुत्र ने महारथी याज्ञसेनि (शिखण्डी) पर वेग से धावा बोल दिया,

श्लोक 90 (7.114.90)

भीष्मस्य समरे राजन्मृत्योर्हेतुं महात्मनः । विदर्शयन्बलं शूरः शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥

bhīṣmasya samare rājanmṛtyorhetuṃ mahātmanaḥ | vidarśayanbalaṃ śūraḥ śārdūla iva kuñjaram

जो रण में महात्मा भीष्म की मृत्यु का कारण था; हे राजन्! वह शूर अपना बल दिखाता हुआ, जैसे सिंह हाथी पर टूटता है, वैसे टूट पड़ा।

श्लोक 91 (7.114.91)

तौ दिशागजसङ्काशौ ज्वलिताविव पावकौ । समापेततुरन्योन्यं शरसङ्घैररिन्दमौ ॥

tau diśāgajasaṅkāśau jvalitāviva pāvakau | samāpetaturanyonyaṃ śarasaṅghairarindamau

दिग्गजों के समान और जलती हुई दो अग्नियों जैसे वे दोनों शत्रुदमन बाणों की झड़ियों से एक-दूसरे पर टूट पड़े।

श्लोक 92 (7.114.92)

विधुन्वानौ धनुःश्रेष्ठे सन्दधानौ च सायकान् । विसृजन्तौ च शतशो गभस्तीनिव भास्करौ ॥

vidhunvānau dhanuḥśreṣṭhe sandadhānau ca sāyakān | visṛjantau ca śataśo gabhastīniva bhāskarau

अपने उत्तम धनुषों को खींचते, बाण चढ़ाते और सैकड़ों को छोड़ते हुए वे दोनों किरणें बिखेरते दो सूर्यों के समान लग रहे थे,

श्लोक 93 (7.114.93)

तापयन्तौ शरैस्तीक्ष्णैरन्योन्यं तौ महारथौ । युगान्तप्रतिमौ वीरौ रेजतुर्भास्कराविव ॥

tāpayantau śaraistīkṣṇairanyonyaṃ tau mahārathau | yugāntapratimau vīrau rejaturbhāskarāviva

तीखे बाणों से एक-दूसरे को तपाते हुए वे दोनों महारथी वीर, युगान्त के समान, दो सूर्यों की भाँति शोभित हुए।

श्लोक 94 (7.114.94)

कृतवर्मा च समरे याज्ञसेनिं महारथम् । विद्ध्वेषुभिस्त्रिसप्तत्या पुनर्विव्याध सप्तभिः ॥

kṛtavarmā ca samare yājñaseniṃ mahāratham | viddhveṣubhistrisaptatyā punarvivyādha saptabhiḥ

और कृतवर्मा ने रण में महारथी याज्ञसेनि (शिखण्डी) को तिहत्तर बाणों से बींधकर फिर सात से बींधा।

श्लोक 95 (7.114.95)

स गाढविद्धो व्यथितो रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं मूर्च्छयाऽभिपरिप्लुतः ॥

sa gāḍhaviddho vyathito rathopastha upāviśat | visṛjya saśaraṃ cāpaṃ mūrcchayā'bhipariplutaḥ

गहरा बिंधा हुआ और व्यथित वह धनुष-बाण छोड़कर मूर्च्छा से अभिभूत होता हुआ रथ के पिछले भाग में बैठ गया।

श्लोक 96 (7.114.96)

तं विषण्णं रणे दृष्ट्वा तावकाः पुरुषर्षभ । हार्दिक्यं पूजयामासुर्वासांस्यादुधुवुश्च ह ॥

taṃ viṣaṇṇaṃ raṇe dṛṣṭvā tāvakāḥ puruṣarṣabha | hārdikyaṃ pūjayāmāsurvāsāṃsyādudhuvuśca ha

हे पुरुषश्रेष्ठ! उसे रण में निराश देखकर आपके योद्धाओं ने हार्दिक्य का सम्मान किया और वस्त्र हिलाए।

श्लोक 97 (7.114.97)

शिखण्डिनं तथा ज्ञात्वा हार्दिक्यशरपीडितम् । अपोवाह रणाद्यन्ता त्वरमाणो महारथम् ॥

śikhaṇḍinaṃ tathā jñātvā hārdikyaśarapīḍitam | apovāha raṇādyantā tvaramāṇo mahāratham

शिखण्डी को हार्दिक्य के बाणों से पीड़ित जानकर उसका सारथि शीघ्रता से उस महारथी को रणभूमि से हटा ले गया।

श्लोक 98 (7.114.98)

सादितं तु रथोपस्थे दृष्ट्वा पार्थाः शिखण्डिनम् । परिवव्रू रथैस्तूर्णं कृतवर्माणमाहवे ॥

sāditaṃ tu rathopasthe dṛṣṭvā pārthāḥ śikhaṇḍinam | parivavrū rathaistūrṇaṃ kṛtavarmāṇamāhave

शिखण्डी को रथ के पिछले भाग में गिरा देखकर पाण्डवों ने रथों से कृतवर्मा को तुरन्त घेर लिया।

श्लोक 99 (7.114.99)

तत्राद्भुतं परं चक्रे कृतवर्मा महारथः । यदेकः समरे पार्थान्वारयामास सानुगान् ॥

tatrādbhutaṃ paraṃ cakre kṛtavarmā mahārathaḥ | yadekaḥ samare pārthānvārayāmāsa sānugān

वहाँ महारथी कृतवर्मा ने परम अद्भुत कार्य किया: कि उसने अकेले ही रण में अनुचरों सहित पाण्डवों को रोक लिया।

श्लोक 100 (7.114.100)

पार्थाञ्जित्वाऽजयच्चेदीन्पाञ्चालान्सृञ्जयानपि । केकयांश्च महावीर्यान्कृतवर्मा महारथः ॥

pārthāñjitvā'jayaccedīnpāñcālānsṛñjayānapi | kekayāṃśca mahāvīryānkṛtavarmā mahārathaḥ

पाण्डवों को जीतकर महारथी कृतवर्मा ने चेदियों, पाञ्चालों और सृञ्जयों को भी जीता, और महापराक्रमी केकयों को भी।

श्लोक 101 (7.114.101)

ते वध्यमानाः समरे हार्दिक्येन स्म पाण्डवाः । इतश्चेतश्च धावन्तो नैव चक्रुर्धृतिं रणे ॥

te vadhyamānāḥ samare hārdikyena sma pāṇḍavāḥ | itaścetaśca dhāvanto naiva cakrurdhṛtiṃ raṇe

रण में हार्दिक्य के द्वारा मारे जाते हुए वे पाण्डव इधर-उधर भागते हुए युद्ध में धैर्य नहीं पा सके।

श्लोक 102 (7.114.102)

जित्वा पाण्डुसुतान्युद्धे भीमसेनपुरोगमान् । हार्दिक्यः समरेऽतिष्ठद्विधूम इव पावकः ॥

jitvā pāṇḍusutānyuddhe bhīmasenapurogamān | hārdikyaḥ samare'tiṣṭhadvidhūma iva pāvakaḥ

भीमसेन को आगे रखने वाले पाण्डुपुत्रों को युद्ध में जीतकर हार्दिक्य रण में धूमरहित अग्नि के समान डटा रहा।

श्लोक 103 (7.114.103)

ते द्राव्यमाणाः समरे हार्दिक्येन महारथाः । विमुखाः समपद्यन्त शरवृष्टिभिरार्दिताः ॥

te drāvyamāṇāḥ samare hārdikyena mahārathāḥ | vimukhāḥ samapadyanta śaravṛṣṭibhirārditāḥ

हार्दिक्य द्वारा रण में खदेड़े जाते हुए वे महारथी उसकी बाण-वर्षा से पीड़ित होकर युद्ध से विमुख हो गए।

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